कोई सुनता क्यों नहीं ट्रंप चचे की!!

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दिल्ली । क्यों ठंडा पड़ गया वो जोश? जो डोनाल्ड ट्रंप 24 घंटे में अमन का वादा करता था, उसके पास दूसरे साल में अल्फ़ाज़ क्यों कम पड़ गए? क्या शोर-शराबा ही नीति था, अकड़ को ही कूटनीति समझ लिया गया, या बिना नक़्शे की तोड़-फोड़ ही सब कुछ थी? और सबसे बड़ा सवाल, क्या दुनिया अब प्रभावित होना बंद कर चुकी है?

जनवरी 2026 की सुबह में, दुनिया का स्कोरबोर्ड कुछ और ही कहानी सुना रहा है। ट्रंप का दूसरा कार्यकाल टी-20 की पारी जैसा शुरू हुआ, चौके-छक्के, तालियाँ, विरोधियों में खलबली। 2025 की शुरुआत में ट्रंप ऐसे उभरे जैसे हर झगड़े के मसीहा हों। भारत-पाक तनाव, पश्चिम एशिया, थाईलैंड-कंबोडिया सीमा, यहाँ तक कि यूक्रेन-रूस, हर जगह शांति का श्रेय उन्होंने खुद ले लिया। पैग़ाम साफ़ था, सिर्फ़ मैं ही ठीक कर सकता हूँ।
वो हर टकराव में कूद पड़े, कूटनीति की तहज़ीब को किनारे किया, दोस्तों को डाँटा, दुश्मनों को गले लगाया, और खुद को सबसे बड़ा सौदेबाज़ बताया। नर्मी गई, नज़ाकत गई। यह थी सीधी-सादी, लेन-देन वाली राजनीति, नए अमीर की तरह, हर हाथ मिलाने पर दाम चिपका हुआ। “अमेरिका फ़र्स्ट” नारा नहीं, चेतावनी बन गया।

2025 टैरिफ़ के तमाशों का साल बना। ट्रंप ने टैक्स ऐसे लगाए जैसे चालान, दोस्त, दुश्मन, पड़ोसी, सब बराबर। नाम लिए गए, दिल दुखे, रिश्ते बिगड़े। जे.डी. वेंस जैसे वफ़ादार, ट्रंप के साथ ” डॉन किहोते” (Don Quixote) बनकर काल्पनिक पवनचक्कियों पर टूट पड़े, जबकि असली आग कहीं और लगी थी। बयानबाज़ी बढ़ी, ज़ुबान फिसली, और ग़लतियाँ जमा होती गईं। तब तक ट्रंप बेपरवाह रहे, जब तक रन बनना बंद नहीं हो गया।
2025 के आख़िरी महीनों में फुसफुसाहट तेज़ हुई। क्या ट्रंप ठीक हैं? ग़ाज़ा जल रहा है, यूक्रेन खून बहा रहा है, और ट्रंप वेनेज़ुएला पर तंज कस रहे हैं, ये कैसी राजनीति है? नोबेल शांति पुरस्कार का सपना कहाँ गया? जो बल्लेबाज़ कभी हर गेंद को सीमा के पार भेजता था, अब वही क्रीज़ पर अटका, डरा-डरा सा खेल रहा है।

रणनीतिक जानकार कहते हैं कि ट्रंप की उथल-पुथल ने अमेरिका को मज़बूत नहीं, कमज़ोर किया। भरोसा घटा, असर कम हुआ। एकध्रुवीय दुनिया बहुध्रुवीय बन गई। वादा की गई शांति प्रेस नोट बनी रही, नीति नहीं। यूक्रेन सुलगता रहा। ग़ाज़ा रोता रहा। और ट्रंप की सबसे बड़ी भूल? भारत।
कभी नरेंद्र मोदी के साथ दोस्ती पर फ़ख़्र करने वाले ट्रंप ने भारत को बुरी तरह ग़लत पढ़ा। भारतीय डायस्पोरा, जो अमेरिका-भारत रिश्तों की मज़बूत कड़ी है, नाराज़ हो गया, गुस्से में है, समय का इंतेज़ार कर रहा है। वीज़ा की बातें हों या व्यापार की धमकियाँ, सद्भावना उड़ गई। यहाँ तक कि अमेरिकी कंजरवेटिव तबक़ा भी व्हाइट हाउस के किरायेदार की संजीदगी पर सवाल उठाने लगा है। ताक़त के साथ तमीज़ भी चाहिए।

यह सब नया नहीं था। ट्रंप की विदेश नीति का पैटर्न पुराना है, शोरदार एंट्री, चमकदार तस्वीरें, और फिर सन्नाटा। उत्तर कोरिया याद है? किम जोंग उन के साथ ऐतिहासिक मुलाक़ातें, बड़े वादे, और नतीजा? मिसाइल परीक्षण। ईरान? परमाणु समझौता तोड़कर बिना विकल्प के “अधिकतम दबाव”, जिससे हालात और बिगड़े।

चीन के साथ व्यापार युद्ध से उद्योग लौटाने का दावा था। हक़ीक़त में महँगाई बढ़ी, सप्लाई चेन टूटी, नौकरियाँ कम ही बढ़ीं। अफ़ग़ानिस्तान? तालिबान से कमज़ोर सौदे ने उग्रवाद को ताक़त दी। सीरिया? अचानक सेना हटाने से कुर्द साथी असहाय हुए। नाटो को धमकियाँ दी गईं, सुधार नहीं हुए। वेनेज़ुएला में सत्ता बदलने का ख़्वाब टूट गया।

दूसरे कार्यकाल में भी कहानी वही रही। यूक्रेन में शांति वार्ता अटकी रही। ग़ाज़ा में युद्धविराम लागू न हो सका। यमन में हमले हुए, लेकिन समुद्री रास्ते नहीं खुले। ईरान से बातचीत आगे नहीं बढ़ी। पाकिस्तान के फ़ौजी सरदार से खनिज सौदों की नज़दीकी, आम लोगों को दरकिनार कर, अमेरिका के लोकतंत्र उपदेश खोखले हो गए हैं।

क्या ट्रंप ने कुछ सीखा? या उनके पास अब नए ख़याल ही नहीं बचे हैं?
आलोचक कहते हैं, ऊर्जा घट गई है, बुढ़ाय गए हैं, सोच कुंठित है। मगर यह सिर्फ़ ट्रंप की नाकामी नहीं, अमेरिका की थकान भी है। इराक़ के झूठे हथियार, लीबिया की अधूरी जंग, अफ़ग़ानिस्तान से अव्यवस्थित वापसी, पेरिस समझौते से दूरी, कोविड का कुप्रबंधन, 2008 की मंदी, ग्वांतानामो का दाग़, इन सबने भरोसा खोखला किया।

हर ग़लती ने साख कम की। हर विरोधाभास ने असर घटाया। ट्रंप ने गिरावट शुरू नहीं की, उसे तेज़ कर दिया।

अफ़सोस यह कि इससे अमेरिका को भी फ़ायदा नहीं हुआ। एकतरफ़ा फैसलों ने उसे अलग-थलग किया। अस्थिरता ने उसे बेनक़ाब किया। पाखंड ने उसे शर्मिंदा किया। दोस्त संभल गए, विरोधी इंतज़ार करने लगे, और दुनिया आगे बढ़ गई।

ट्रंप की दूसरी पारी अब घमंड का सबक लगती है, आतिशबाज़ी बहुत, दिशा कम। शुरुआत का शोर अब बचाव में बदल गया है। 2026 के साथ एक सवाल हवा में तैर रहा है: क्या डोनाल्ड ट्रंप ने दुनिया बदली है या दुनिया ही उनसे आगे निकल चुकी है?

भारत की धीमी रफ्तार में छिपा सुकून का राज़

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जयपुर । पिछले हफ्ते मॉर्निंग वॉक पर अचानक भाटिया जी से मुलाक़ात हो गई। उम्र ढल चुकी थी, चाल में ठहराव था, और आँखों में एक अजीब-सी राहत। बातचीत आगे बढ़ी तो पता चला, 42 साल बाद उन्होंने हमेशा के लिए बोरिया-बिस्तर बाँध लिया और अमेरिका को अलविदा कह दिया। वजह बस इतनी थी कि अपने sunset years में, उनको अपने शहर की मिट्टी की खुशबू ने वापिस खींच लिया।

“बच्चे अपने-अपने शहरों में सेटल हैं। पत्नी का इंतक़ाल हो चुका है। अमेरिका के उस बड़े, सलीकेदार, महलनुमा घर में न कोई बात करने वाला था, न हाल पूछने वाला। सुविधाएँ थीं, लेकिन अपनापन नहीं। हेल्थ इंश्योरेंस था, पर हेल्थ नहीं। अकेलापन हर कमरे में पसरा रहता था। आख़िरकार मैने तय किया, ज़िंदगी लंबी नहीं, जीने लायक होनी चाहिए। और भारत लौट आया,” भाटिया जी ने बताया।

भाटिया जी कोई अपवाद नहीं हैं। पश्चिमी दुनिया में बसे हज़ारों भारतवंशी, तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद भीतर से खाली हैं। जानकर लोग बताते हैं कि वहाँ सिस्टम है, अनुशासन है, सुरक्षा है, पर रिश्तों की गर्माहट नहीं। और जब उम्र बढ़ती है, तो एहसास होता है कि बैंक बैलेंस से ज़्यादा ज़रूरी है, कोई हाल पूछने वाला।

हम तरक़्क़ी को अक्सर पश्चिमी पैकेज में देखते हैं, स्टील और ग्लास के टावर, तेज़ रफ्तार ज़िंदगी, और हर वक़्त की थकान। मगर भारत में अब भी रफ्तार मध्यम है। हौले-हौले चलती ज़िंदगी। यही असल में पर्यावरण-फ्रेंडली, किफ़ायती और टिकाऊ जीवनशैली है। यहाँ सुकून कोई शो-पीस नहीं, रोज़मर्रा की आदत है। और कई बार यही ख़ामोश ऐश, सबसे बड़ी अमीरी बन जाती है।

दिल्ली की धुँधली सुबह में सड़क किनारे चाय की चुस्कियाँ, बेंगलुरु में ऑफिस से पहले खिचड़ी और हँसी, मुंबई की लोकल में साझा जगह, आगरा की नुक्कड़ पर हलवाई का खोमचा, भटियारे की तवा-गपशप, इन सबमें एक आराम का रिदम छिपा है। कोई जल्दबाज़ी नहीं, बस बहाव है। ज़िंदगी दौड़ नहीं, साथ चलना है।

विदेश में ज़िंदगी अक्सर काम और बिलों के बीच पिसती है। यहाँ एक समोसे पर भी UPI से मुस्कुराता हुआ “पेमेंट साउंड” आता है। टेक्नोलॉजी यहाँ दबाव नहीं बनाती, बस मदद करती है। ऑटो वाला डिजिटल है, लेकिन अब भी इंसान है, रास्ता भी बताएगा और हाल भी पूछ लेगा।

आज की सबसे बड़ी लग्ज़री वक़्त है, और भारत में वह अब भी बचा है। मदद यहाँ अमीरों की ऐय्याशी नहीं, हर घर की हक़ीक़त है। सुबह दरवाज़े की घंटी से ज़िंदगी जागती है, कुक, वॉशर, दूधवाला, डिलीवरी बॉय, सब आपकी आदतों से वाक़िफ़ हैं, बिना कोई डेटा प्राइवेसी पॉलिसी पढ़े। वर्क-लाइफ़ बैलेंस यहाँ किसी पॉडकास्ट से नहीं, इन्हीं लोगों से आता है।

इलाज की बात करें तो हाँ, अस्पतालों में भीड़ है, अव्यवस्था है, लेकिन काम होता है। आज डॉक्टर ने देखा, तो शाम तक रिपोर्ट। बुख़ार बढ़े, इससे पहले दवा घर पहुँच जाती है। कई देशों में अपॉइंटमेंट के लिए हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता है; यहाँ ज़्यादा से ज़्यादा लिफ़्ट का।

भारत की “राम भरोसे” व्यवस्था चिल्लाती नहीं, मगर चलती रहती है। “यह एक अजीब-सी दक्षता है, अराजक दिखने वाला अनुशासन, जो किसी तरह काम कर ही जाता है,” कहते हैं बुजुर्ग डॉ प्रधान।

और समाज, यहाँ अब भी रिश्ते हैं। रेस्तराँ में पानी मुफ़्त आता है, और कभी-कभी मुस्कान भी। मोहल्लों में दरवाज़े अब भी चेहरे पहचानते हैं। यहाँ इंसान, अब भी इंसान से जुड़ा है, किसी ऐप से नहीं।

रिटायर्ड बैंकर प्रेम भाई कहते हैं, “यह कम्फ़र्ट सिर्फ़ रईसों के लिए नहीं। भारत में मिडिल क्लास भी आराम से रह सकता है, अगर उसे दिखावा न चाहिए। विदेशी तनख़्वाह के साथ तो यह जगह सचमुच स्वर्ग ही समझो।”

पश्चिमी दुनिया के विशेषज्ञ प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी के मुताबिक, “वेस्ट में मिडिल क्लास हमेशा बीमा, टैक्स, किराए और पढ़ाई के बोझ तले दबी रहती है। भारत में वही पैसा घर, मदद, आराम और इज़्ज़त खरीद लेता है। ड्राइवर, कुक, डिलीवरी, जो वहाँ लग्ज़री हैं, यहाँ ज़िंदगी का हिस्सा हैं। यही असली बराबरी है।”

फिर संस्कृति, भारत में त्योहार रुकते नहीं, साल भर चलते हैं। दीवाली हो या क्रिसमस, घर बोलते हैं, लोग नाचते हैं। कोई अपॉइंटमेंट नहीं चाहिए, बस दरवाज़ा चाहिए। पश्चिम अपने अकेलेपन से थेरेपी में लड़ता है, भारत उसे चाय में घोल देता है, या नाचते गाते कीर्तन में उड़ा देता है।

रूहानियत यहाँ हॉबी नहीं, हवा में घुली है। वाराणसी के घाट, ऋषिकेश की सुबह, हिमालय की ख़ामोशी, इनके लिए पासवर्ड नहीं चाहिए, बस दिल चाहिए। जहाँ पश्चिम माइंडफुलनेस बेचता है, भारत उसे जीता है, अनजाने में ही। कश्मीर की हसीन वादियों में एक सप्ताह बिताकर लौटे जगन मुक्ता दंपत्ति कहते हैं, “मजा आ गया, वाकई जन्नत है, कितनी वैरायटी और आकर्षण हैं अपने देश में!”

यह सच है कि भारत में असमानताएँ हैं। सड़कें टूटी हैं, सिस्टम अधूरा है। लेकिन रिश्ते अब भी जुड़े हुए हैं। और शायद यही सबसे बड़ी बात है। जब ज़िंदगी इतनी मानवीय ढंग से, इतनी आसानी से चल सकती है, तो उसे किसी चमकदार छत और ऊँची तनख़्वाह के नीचे क्यों ख़रीदा जाए?
भारत अब भी वह जगह है, जहाँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी अपने आप में लग्ज़री बन जाती है। और अगर आपके पास थोड़ा-सा विदेशी पैसा है, तो माफ़ कीजिए, आप राजा हैं। क्योंकि यहाँ सच्ची ऐश वो नहीं जो दिखती है, बल्कि वो है जिसकी फिक्र आपको करनी ही नहीं पड़ती।

जब सुप्रीम कोर्ट ने कदम पीछे खींचे: 2025 के पाँच प्रमुख न्यायिक पुनर्विचार

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दिल्ली । साल 2025 भारत की सुप्रीम कोर्ट के लिए असाधारण रहा। कई महत्वपूर्ण मामलों में अदालत ने अपने ही फैसलों पर पुनर्विचार किया, कभी जन विरोध के कारण, कभी प्रक्रियात्मक त्रुटियों की वजह से, तो कभी व्यापक जनहित को देखते हुए। कुछ ने इन्हें यू-टर्न कहा, कुछ ने न्यायिक सुधार। वास्तव में, ये पाँच बड़े मामले थे जहाँ समीक्षा, विरोध या नए तथ्यों ने अदालत को दिशा बदलने पर मजबूर किया। ये घटनाएँ न्यायपालिका की जीवंतता दिखाती हैं, लेकिन बार-बार बदलाव से संस्थागत विश्वसनीयता पर सवाल भी उठाती हैं।

पहला: अरावली पहाड़ियों की परिभाषा

अरावली विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में एक है, हिमालय से भी पुरानी। ये उत्तर भारत का पर्यावरणीय ढाल हैं: थार मरुस्थल को रोकती हैं, भूजल रिचार्ज करती हैं और दिल्ली जैसे शहरों को धूल भरे तूफानों से बचाती हैं। वर्षों से खनन और निर्माण ने इन्हें भारी क्षति पहुँचाई।

20 नवंबर 2025 को कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय की समिति की रिपोर्ट स्वीकार कर अरावली की परिभाषा सीमित कर दी: स्थानीय स्तर से 100 मीटर ऊँची भूमि और 500 मीटर दायरे में जुड़े क्लस्टर। इसे वैज्ञानिक बताया गया, लेकिन पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी कि इससे बड़े क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाएँगे, खनन और निर्माण के द्वार खुल जाएँगे। विरोध भड़क उठा, सोशल मीडिया से सड़कों तक हंगामा, प्रदर्शन और याचिकाएँ।

29 दिसंबर 2025 को छुट्टियों में विशेष बेंच ने स्वयं संज्ञान लिया। नवंबर फैसले पर रोक लगा दी और नई हाई-पावर एक्सपर्ट कमेटी गठित की, जो परिभाषा, छूट, खनन जोखिम और पूरी श्रृंखला की सेहत की जाँच करेगी। तब तक पूर्व प्रतिबंध बरकरार। यह जनता की आवाज़ की जीत थी, न्याय की बुद्धिमत्ता, जो गलती सुधारने में नहीं हिचकिचाती। अरावली अब भी खड़ी हैं, क्योंकि लोग और अदालत ने सुन लिया।

दूसरा: एक्स-पोस्ट-फैक्टो पर्यावरण मंज़ूरी
मई 2025 में वनशक्ति मामले में कोर्ट ने बाद में दी जाने वाली (एक्स-पोस्ट-फैक्टो) पर्यावरण मंज़ूरी को अवैध घोषित किया। कई परियोजनाएँ रुक गईं, इसे पर्यावरण संरक्षण की मजबूत मिसाल कहा गया। लेकिन नवंबर में समीक्षा पर तीन जजों की बेंच (2:1 बहुमत) ने फैसला पलट दिया। कुछ विशेष हालात में इन्हें मान्य किया, ताकि पूरी परियोजनाएँ ध्वस्त न हों और जनहित प्रभावित न हो। आलोचकों ने कहा यह उल्लंघन को वैध बनाता है, जबकि समर्थकों ने इसे व्यावहारिक बताया।

तीसरा: राज्यपालों की विधेयक स्वीकृति पर समय-सीमा
अप्रैल 2025 में कोर्ट ने राज्यपालों को विधेयकों पर समयबद्ध फैसला लेने का निर्देश दिया, जिससे राज्यों में राहत की लहर दौड़ी। लेकिन नवंबर में पाँच जजों की संविधान पीठ ने इसे रद्द कर दिया, कहा कि समय-सीमा तय करना न्यायपालिका का क्षेत्र नहीं। राज्यपालों की विवेक शक्ति बरकरार, लेकिन अनिश्चित देरी संघवाद के खिलाफ। यह राष्ट्रपति के संदर्भ पर दिया गया मत था, जो संघीय संतुलन की याद दिलाता है।

चौथा: भूषण पावर एंड स्टील दिवालिया मामला
मई 2025 में कोर्ट ने कंपनी को लिक्विडेशन का आदेश दिया, क्योंकि रिज़ॉल्यूशन प्लान में गंभीर प्रक्रियात्मक खामियाँ पाई गईं, यहाँ तक कि JSW की खरीद भी प्रभावित हुई। बाज़ार और कर्मचारियों में हड़कंप मचा। बाद में समीक्षा पर अदालत ने फैसला वापस लिया, त्रुटियाँ स्वीकारीं और कंपनी पुनर्जीवन की अनुमति दी। यह IBC के उद्देश्य, कंपनी बचाना, लिक्विडेशन अंतिम विकल्प, की पुनर्स्थापना थी।

पाँचवाँ: आवारा कुत्तों का पशु कल्याण मामला
शुरू में अगस्त 2025 में कोर्ट ने सार्वजनिक स्थानों, खासकर स्कूलों-अस्पतालों से कुत्तों को हटाने पर सख्ती दिखाई। पशु प्रेमियों के विरोध और प्रदर्शनों के बाद नीति संशोधित हुई, नसबंदी, टीकाकरण और वापस छोड़ने पर जोर, लेकिन संवेदनशील संस्थागत क्षेत्रों से हटाने की व्यवस्था बरकरार। यह जन सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच संतुलन का प्रयास था।

ये पुनर्विचार गंभीर सवाल उठाते हैं: बीच का नुकसान, पर्यावरणीय क्षति, रुके निवेश, खोई नौकरियाँ, बढ़ते हमले, की जिम्मेदारी किसकी? अगर विरोध न होता, तो क्या गलत फैसले बने रहते? न्याय तब सच्चा होगा जब अदालतें त्रुटियाँ सुधारें, नुकसान का मूल्यांकन करें और सुनिश्चित करें कि हर आवाज़ सुनी जाए, चाहे जोरदार हो या नहीं।

2025 ने साबित किया: न्यायपालिका सुनती है, सुधारती है। लेकिन बार-बार बदलाव विश्वास हिलाते हैं। अंत में, ये लोकतंत्र की ताकत है, जनता की आवाज़ न्याय को नई दिशा देती है।

दो बैलों की जोड़ी से ट्रैक्टर तक, खेत से लैब तक: आज का किसान

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आगरा । सुबह की धूप अभी हल्की थी।
मेरठ जिले के एक गाँव में किसान रमेश अपने खेत पर खड़े थे। मोबाइल हाथ में थामे, वे स्क्रीन पर चमकते मौसम अलर्ट पर नजर गड़ाए हुए थे , “आज सिंचाई नहीं।”, उन्होंने तुरंत मोटर बंद कर दी। मुस्कराते हुए बोले, “अब खेत आसमान देखकर नहीं, ऐप देखकर चलते हैं।”

उनके दादा हरिया चौधरी के जमाने में यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। तब खेत का मिजाज मिट्टी की गंध से परखा जाता था, और बीज राम भरोसे बोए जाते थे। बरसात आई तो फसल, नहीं तो कर्ज़ और भूख। खेती तब अनुभव और विश्वास पर चलती थी, विज्ञान पर नहीं।
तीन पीढ़ियों में खेती ने जो छलांग लगाई है, वह केवल तकनीकी नहीं , मानसिकता की क्रांति है।

हरिया चौधरी के पास बैलों की जोड़ी थी, लकड़ी का हल, और अपने बचाए बीज; पैदावार सीमित थी, मगर मन में उम्मीद थी। वे कहते थे, “खेत को जितना दोगे, उतना लौटाएगा।”

आज वही खेत हरियाणा के चौधरी मुल्तान सिंह के लिए प्रयोगशाला बन चुका है , जहाँ मिट्टी में नमी सेंसर लगा है, ड्रिप पाइपें बिछी हैं, फसल की निगरानी ड्रोन करते हैं, और दाम व्हाट्सऐप पर तय होते हैं। खेती अब केवल मेहनत नहीं, डेटा, एल्गोरिद्म और सूचनाओं की साझेदारी है।
यह बदलाव केवल आगरा, हाथरस या मथुरा का नहीं, यह पूरे देश की कहानी है।

आजादी के बाद भारत भूखा था, अनाज कम, जनसंख्या अधिक। 1960 के दशक में जब सूखा पड़ा, तब अमेरिका से जहाजों में गेहूं मंगवाना पड़ा। दुनिया सवाल कर रही थी “क्या भारत खुद को कभी खिला सकेगा?” उत्तर मिला, हरित क्रांति के रूप में।

वैज्ञानिक आए, नए बीज आए, सिंचाई के साधन और खाद के प्रयोग शुरू हुए। किसान ने जोखिम उठाया और भरोसा किया। सरकार ने सहयोग दिया। वर्ष दर वर्ष खेतों ने जवाब दिया , हरे-भरे दानों की भाषा में।

1960 के दशक में खाद्यान्न उत्पादन कुल 50 से 60 मिलियन टन था। आज 2024-25 में भारत ने 357 मिलियन टन का रिकॉर्ड उत्पादन हासिल किया है। यही नहीं, भारत अब चावल का सबसे बड़ा निर्यातक और गेहूं में भी प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। कृषि निर्यात का मूल्य 50 अरब डॉलर पार कर चुका है, जो विदेशी मुद्रा के साथ करोड़ों किसानों की आय भी बढ़ा रहा है।

यह यात्रा भूख से आत्मनिर्भरता और फिर आत्मविश्वास तक की है , खेतों में हुई एक शांत वैज्ञानिक क्रांति।
रमेश बताते हैं, “अब खेती अंदाज़े से नहीं, आँकड़े से होती है। पहले एक फसल में जितना कमाते थे, अब दो में दोगुना हो जाता है।”

ड्रिप सिंचाई से पानी बचा, मल्चिंग से खरपतवार रुके, मिट्टी परीक्षण से खाद का सही संतुलन मिला। ड्रोन ने मेहनत घटाई, और AI ने मौसम के बदलते तेवर का अनुमान लगाया। खेती अब तकनीक और परंपरा की साझेदारी है।

इस बदलाव की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इससे पर्यावरण को भी राहत मिली है। कम पानी, कम कीटनाशक, और अधिक नियंत्रण , भूमिगत जल पर दबाव घट रहा है। मिट्टी की सेहत सुधर रही है। खेतों में जितना पानी बचेगा, नदियों में उतनी सांस बचेगी। अब खेती और पर्यावरण विरोधी नहीं, सहयोगी हैं।

इस क्रांति में महिलाएँ भी पीछे नहीं। “नमो ड्रोन दीदी” जैसी योजनाओं ने उन्हें तकनीकी रूप से सशक्त किया है। आज गाँव की महिलाएँ खेतों में ड्रोन उड़ा रही हैं, स्प्रे कर रही हैं, सर्वे कर रही हैं। यह केवल आय का नहीं, सम्मान का परिवर्तन है।

ब्रज और पश्चिमी उत्तर प्रदेश का यह इलाका, अब हरित संभावना का क्षेत्र बन चुका है। पॉलीहाउस में टमाटर, खीरा, शिमला मिर्च जैसी फसलें सालभर उगाई जा रही हैं। मौसम की मार से सुरक्षित, कम जमीन में अधिक उत्पादन , यही है स्मार्ट खेती का मूलमंत्र। खेती अब केवल गुज़ारा नहीं, व्यापार है।
फिर भी चुनौतियाँ बाकी हैं।

मौसम का मिजाज बिगड़ता जा रहा है कभी बाढ़, कभी सूखा, कभी कीटों का हमला। मिट्टी थकान महसूस कर रही है। किसान चिंतित हैं, पर अब वे अकेले नहीं। उनके साथ हैं कृषि वैज्ञानिक, नीति निर्माता और तकनीक।

अब उम्मीद की खेती होती है, रमेश मुस्कराते हैं। शाम को जब वे खेत से लौटते हैं, तो घर की दीवार पर टंगी दादा हरिया की पुरानी तस्वीर को देखते हैं। धीमे स्वर में कहते हैं, “दादा ने जो खेत जोते, हम उन्हें आगे बढ़ा रहे हैं, पर अब समस्याओं के हल हमारे दिमाग में नहीं, लैब में तैयार हो रहे हैं।”

हरित क्रांति की अनकही रीढ़ रहे हैं वे संस्थान, जिन्होंने खेत को दिशा दी , आगरा के बिचपुरी कृषि संस्थान जैसे केंद्रों ने प्रयोगशाला से खेत तक ज्ञान पहुँचाया। मिट्टी, बीज और पानी पर अनुसंधान हुए। नई किस्में विकसित हुईं, रोगरोधी पौधे बने। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान वैज्ञानिक सोच की ओर बढ़े।

आगरा की लोहा ढलाई इकाइयों ने इस यात्रा को औज़ार दिए , हल, हैरो, पंप, थ्रेशर, पूरे देश के खेतों तक पहुँचने वाली मशीनरी यहीं निर्मित हुई। हरित क्रांति को सिर्फ अच्छे बीज नहीं, मजबूत औज़ार भी चाहिए थे , और आगरा की फाउंड्रियों ने यह जिम्मेदारी निभाई।

आज जब भारत खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर है, यह समझना जरूरी है कि यह संघर्ष केवल धरती का नहीं, सोच का भी था।
1970 के दशक में जब लोग भूख से मरते थे, आज कोविड के बाद के भारत में करोड़ों गरीबों को मुफ्त अनाज मिल रहा है। यह परिवर्तन किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है, पर यह हर किसान के पसीने से लिखी सच्ची गाथा है।
भारतीय कृषि अब पीछे नहीं देख रही। हल से ड्रोन तक, बैलों से सेंसर तक, खेत से लैब तक , किसान ने खुद को बदला है, और इसी बदलाव ने भारत को विश्व कृषि मानचित्र पर अग्रणी बनाया है।
भविष्य की खेती स्मार्टफोन और मिट्टी, दोनों के मेल से चलेगी , जहाँ परंपरा की जड़ें विज्ञान के पंखों से जुड़ी होंगी।

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