औरत कब सुरक्षित होगी दरिंदों से?

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कोलकाता । उस रात सब कुछ आम था। सड़क पर हल्की रौशनी, पास की चाय की दुकान से उठती अदरक की महक, और घर लौटती एक लड़की, जिसकी बस एक ही ख्वाहिश थी , कोई उसे उसके हाल पर छोड़ दे। पीछे से क़दमों की आहट आई। कुछ सेकेंड। एक चीख। फिर सन्नाटा। चेहरे पर तेज़ाब जैसा कुछ फेंका गया, इतनी तेज़ी से कि ज़िंदगी फौरन दो हिस्सों में बँट गई, हमले से पहले और हमले के बाद।

यह कोई कहानी नहीं, आज के भारत की हक़ीकत है।
भारत में औरतों के ख़िलाफ़ हिंसा का साया अब क़िलों, राजदरबारों और युद्धभूमियों से उतरकर स्कूलों, अस्पतालों, गलियों और घरों तक फैल गया है। फर्क बस इतना है कि पहले ज़ुल्म सत्ता और तलवार के दम पर होता था, आज यह “ठुकराए हुए इश्क़”, “आहत मर्दानगी” और सस्ते तेज़ाब के भरोसे अंजाम दिया जा रहा है।

हमारे विकसित होते समाज की जटिल बुनावट में हाल के यौन अपराध और एसिड हमले, क्रूरता के एक ऐसे नक्शे में बदल गए हैं जो अभिजात वर्ग के विशेषाधिकार से खिसककर रोज़मर्रा की दहशत बन चुका है। 2024 के कोलकाता आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज की रेप–मर्डर जैसी घटनाओं में, जहाँ एक सिविक वॉलंटियर ने कार्यस्थल के भरोसे का बेरहमी से दुरुपयोग कर एक डॉक्टर के साथ बर्बरता की, या बदलापुर के स्कूल में छोटी बच्चियों पर सफ़ाई कर्मचारी द्वारा हमला , आगरा में एक रिसर्च स्कॉलर की लेब में हत्या, अवसरवादी क्रूरता का एक नया पैटर्न देखने में आ रहा है।

यही रुझान एसिड हमलों में भी साफ़ दिखता है, जो अधिकतर ठुकराए गए प्रेमियों, पतियों या परिचितों द्वारा अंजाम दिए जाते हैं , तीव्र बदले की उस मानसिकता को दिखाते हुए, जिसमें औरत के “ना” को माफ़ नहीं किया जाता। 2023 में देश में 207 एसिड हमले दर्ज हुए, जिनमें से अकेले पश्चिम बंगाल में 57 मामले थे। उत्तर प्रदेश, गुजरात और कई दूसरे राज्यों में भी ये घटनाएँ अब असामान्य ख़बर नहीं रहीं। घरेलू विवादों में पति द्वारा जबरन तेज़ाब पिलाने से लेकर आशिक़ों द्वारा चेहरा बिगाड़ देने तक, हिंसा की ये कहानियाँ हमारे समय की क्रूर डायरियाँ हैं। आज प्रेम प्रस्ताव ठुकराना किसी लड़की के लिए “सज़ा” बन जाता है। औरतों को न कहने का अधिकार नहीं है। कहीं पति ने झगड़े में तेज़ाब पिला दिया, कहीं आशिक़ ने “सुंदरता मिटाने” की कसम खा ली। यह सिर्फ़ अपराध नहीं, इंसानी गिरावट की इंतिहा है।

इतिहास के पन्ने पलटें, तो तस्वीरें बदलती हैं, माजरा नहीं। प्राचीन और मध्यकालीन भारत में औरतें युद्ध की “लूट” मानी जाती थीं। दुश्मन को नीचा दिखाने के लिए उनकी इज़्ज़त कुचली जाती थी। सत्ता के खिलाफ विद्रोह हो या सामंती संघर्ष , निशाना अक्सर स्त्रियाँ ही बनती रहीं। राजाओं और सामंतों के लिए यह ताक़त दिखाने का सुविधाजनक तरीक़ा था।

औपनिवेशिक क़ानूनों ने भी “क्राइम ऑफ़ पैशन” का जुमला गढ़कर कई हत्याओं के लिए नरम सज़ाओं का रास्ता खोला, मानो औरत की जान से ज़्यादा मर्द का ग़ुस्सा अहम हो।
लेकिन आज?

आज न कोई राजा है, न कोई युद्ध मैदान। आज ज़ुल्म करने वाला “आम आदमी” है , पड़ोसी, सहकर्मी, प्रेमी, पति। यह हिंसा का एक खौफ़नाक लोकतंत्रीकरण है। तेज़ाब अब हथियार है, क्योंकि वह सस्ता है, आसानी से मिल जाता है और उम्र भर का दाग दे जाता है , शरीर पर भी, ज़िंदगी पर भी।

पहले औरत पर हमला दुश्मन कबीले को हराने के लिए होता था। आज हमला इसलिए होता है, क्योंकि औरत ने “ना” कहने की हिम्मत की।

यह बदलाव क्यों आया?

एक वजह है झूठी मर्दानगी, जो बराबरी को अपमान समझती है। आर्थिक और सामाजिक बदलावों ने औरतों को आत्मनिर्भर बनाया है; वे अपने फ़ैसले खुद ले रही हैं, शहरों से गाँवों तक फ़ासले घट रहे हैं। लेकिन पितृसत्ता का ज़ेहन अभी भी वहीं अटका है। नतीजा यह कि इंकार को बेइज़्ज़ती मान लिया जाता है और बदले का हक़ समझ लिया जाता है।

दूसरी वजह है क़ानून का ढीला अमल। तेज़ाब बिक्री पर रोक के बावजूद यह आराम से मिल जाता है। जिलों के केमिस्ट और केमिकल दुकानदार बिना पूछताछ बोतल थमा देते हैं। मुक़दमे सालों तक रेंगते हैं। पीड़िता को इंसाफ़ से पहले ताने और सवाल मिलते हैं, अपराधी को सज़ा से पहले जमानत और हौसला।
डिजिटल दौर ने ज़ुल्म को और चालाक बना दिया है। तेज़ाब से चेहरा बिगाड़ना हो या डीपफेक से इज़्ज़त, मक़सद एक ही है , औरत को सार्वजनिक तौर पर तोड़ देना। यह हिंसा की नई नस्ल है, जहाँ निशाना सिर्फ़ शरीर नहीं, पहचान भी है। तस्वीर, आवाज़, सोशल मीडिया प्रोफाइल , सब युद्धभूमि हैं।

सबसे डरावनी बात ये है कि अब कोई जगह सचमुच सुरक्षित नहीं दिखती। स्कूल, घर, सड़क, अस्पताल , हर जगह खतरे की हल्की-सी, लेकिन लगातार गूँज मौजूद है। उम्र भी मायने नहीं रखती। बच्ची हो या बुज़ुर्ग, विवाहित हो या अकेली , हिंसा का यह साया सबको अपनी ज़द में ले रहा है।

यह हालात एक कड़वा सच बयान करते हैं: हमने बराबरी की भाषा तो सीख ली, लेकिन इंसानियत का सबक अब भी अधूरा है। अब समाधान सिर्फ़ मोमबत्ती जुलूसों या सोशल मीडिया के तात्कालिक ग़ुस्से से नहीं आएगा।

ज़रूरत है : बचपन से सहमति और सम्मान की तालीम की। तेज़ाब पर सख़्त, पारदर्शी और वाक़ई लागू नियंत्रण की। तेज़, संवेदनशील और भरोसा बहाल करने वाले न्याय की। और सबसे ज़रूरी, सोच की बुनियादी तब्दीली की।

वरना यह साया और गहरा होगा।

और हर उस औरत को, जो “ना” कहने की हिम्मत जुटाती है, यह डर सताता रहेगा कि कहीं उसकी ज़िंदगी भी दो हिस्सों में न बँट जाए , हमले से पहले और हमले के बाद।

गहरा रही है भारत में जिहादी सोच : इसका ताजा उदाहरण है हुमायूं कबीर का बयान

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष ढांचे के सामने आज जो चुनौती खड़ी है, वह राजनीतिक होने के साथ ही वैचारिक और सामाजिक भी है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर का ताजा बयान इसी चुनौती की एक तीखी अभिव्यक्ति कही जा सकती है। मुर्शिदाबाद में बनने वाली तथाकथित बाबरी मस्जिद को लेकर उनका यह कहना, “यह कोई अयोध्या नहीं है, जो बाबरी को कोई हाथ लगा दे”, वस्‍तुत: सिर्फ जुबान की फिसलन नहीं है। यह एक सोची समझी मानसिकता, एक उकसावे और टकराव की राजनीति का संकेत है जोकि बीते वर्षों में जिहाद के नाम पर पनप रही इस्लामिक कट्टर सोच, उम्‍मा और पॉलिटिकल इस्‍लाम से गहराई से जुड़ी हुई है।

अयोध्या विवाद भारत के संवैधानिक इतिहास का एक लंबा और पीड़ादायक अध्याय रहा है, जिसमें हिन्‍दुओं के अस्‍तित्‍व और स्‍वाभिमान को लगातार 500 वर्षों तक बार-बार चुनौती दी जाती रही, जिसे कि उच्‍चतम न्यायालय के फैसले ने कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से समाप्त किया। इसके बाद राम मंदिर निर्माण को लेकर देश ने एक कठिन लेकिन जरूरी मोड़ पार किया। ऐसे समय में अयोध्या का संदर्भ उठाकर बाबरी नाम को दोबारा सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में लाना यह दिखाता है कि कुछ लोग उस फैसले को स्वीकार नहीं कर पाए हैं और वे भारतीय समाज को फिर से उसी खाई की ओर धकेलना चाहते हैं, जिससे निकलने में दशकों लगे हैं।

हुमायूं कबीर द्वारा मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के निर्माण की विस्तृत योजना बताना, उसकी फंडिंग, ईंटों की व्यवस्था और साप्ताहिक नमाज की तैयारियों का सार्वजनिक ऐलान करना, ये सभी कृत्‍य महज धार्मिक गतिविधि का विवरण नहीं हो सकते हैं । साफ तौर पर इस कर्मकाण्‍ड से राजनीतिक संदेश दिया जा रहा है। यह संदेश उन लोगों के लिए है जो बाबरी ढांचे के विध्वंस को आज भी बदले की भावना से देखते हैं, बाबर जैसे जिहादी, क्रूर आक्रमकारी, हिन्‍दू द्रोही को अपना आदर्श मानते हैं। दरअसल ऐसे लोग मस्जिद का नाम बाबरी रखकर उस सामूहिक आक्रोश को बढ़ाना चाहते हैं, जो भारत में मुसलमानों द्वारा हिन्‍दुओं पर हिंसा करने का कारण बन सकता है!

पिछले एक दशक में भारत ने इस्लामिक कट्टरपंथ के कई रूप देखे हैं। यह सीमा पार से होने वाला इस्‍लामिक आतंकवाद नहीं रहा है, अनेक बार अब तक सामने आ चुका है कि देश के भीतर वैचारिक स्तर पर भी इसका विस्तार बहुत तेजी से हुआ है। सोशल मीडिया के जरिये युवाओं को कट्टर विचारधाराओं से जोड़ने की कोशिशें हुईं। आईएसआईएस और अल कायदा से जुड़े मॉड्यूलों का भंडाफोड़ हुआ। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया, सिम‍ि जैसे संगठनों पर कार्रवाई ने यह साफ किया कि कैसे मजहब और सामाजिक सेवा की आड़ में इस्‍लाम के उग्र नेटवर्क खड़े किए जा रहे थे। कश्मीर से लेकर केरल और बंगाल तक, जिहाद की भाषा अलग अलग रूपों में सामने आई है, जिसका कि मूल मकदस एक ही है। गैर मुसलमानों पर हिंसा।

कहना होगा कि इस पूरे परिदृश्य में गजवा-ए-हिंद की सोच एक बेहद खतरनाक वैचारिक हथियार बनकर उभरी है। यह कोई मासूम मजहबी कल्पना नहीं है; एक आक्रामक राजनीतिक और सैन्य कल्पना है, जो भारत को एक लक्ष्य के रूप में देखती है। जांच एजेंसियों की रिपोर्टों और गिरफ्तार आतंकियों के बयानों में बार-बार इस विचार का उल्लेख हुआ है। भले ही भारत के अधिकांश मुसलमान इस सोच को नकारते हों, लेकिन कुछ कट्टर तत्व इसे अपनी पहचान और उद्देश्य बना चुके हैं। यही वजह है कि हर ऐसा बयान, हर ऐसा प्रतीकात्मक कदम जो इस सोच को बल देता है, उसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

हुमायूं कबीर का यह तर्क कि चुनाव में जय श्रीराम बोलना सही है तो अल्लाह हू अकबर कहना भी उतना ही सही है, सतही समानता का उदाहरण है। यह तर्क इस सच्चाई को नजरअंदाज करता है कि नारों का राजनीतिक इस्तेमाल किस संदर्भ में किया जा रहा है। ऐसे में पश्चिम बंगाल का संदर्भ यहां विशेष महत्व रखता है। सीमावर्ती जिले, अवैध घुसपैठ, जनसांख्यिकीय बदलाव और कट्टरपंथी गतिविधियों को लेकर राज्य पहले ही सवालों के घेरे में है। मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल और सीमा से सटे इलाके में, छह दिसंबर को बाबरी मस्जिद की नींव रखना महज संयोग नहीं माना जा सकता। इसे चुनना यह दिखाता है कि संदेश किसे और क्यों दिया जा रहा है।यही वह बिंदु है जहां जिहादी सोच और अवसरवादी राजनीति एक दूसरे से हाथ मिला लेती हैं।

भारत को आज जिस चीज की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह है राजनीतिक जिम्मेदारी और वैचारिक स्पष्टता। मजहबी स्वतंत्रता का अर्थ उकसावे की छूट नहीं हो सकता। आस्था का सम्मान बदले की भावना से नहीं किया जा सकता। हुमायूं कबीर का बयान और उससे जुड़ा पूरा घटनाक्रम आज बता रहा है कि अगर समय रहते जिहादी और कट्टर सोच को वैचारिक स्तर पर चुनौती नहीं दी गई, तो यह कानून व्यवस्था से कहीं अधिक राष्ट्रीय एकता के लिए घातक होगा। वस्‍तुत: जो लोग देश को बार-बार अतीत के अंधेरे में खींचना चाहते हैं, आज जरूरत है उनसे सख्ती से, लोकतांत्रिक तरीके से निपटा जाए । वास्‍तव में यही समय की मांग है।

सरकार को सुरक्षित करना होगा हर नागरिक का स्वच्छ हवा का मूल अधिकार

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दिल्ली । सुबह सवेरे, वह मज़दूर कुछ देर ज़्यादा खाँसता रहा। ठंड थी, धुंध थी, और फेफड़ों में चुभती जलन थी। उसे नहीं पता था कि यह सर्दी की एलर्जी है या ज़हरीली हवा का असर। पता बस इतना था कि काम पर जाना ज़रूरी है, क्योंकि सांस भले ही दूषित हो, रोज़ी-रोटी नहीं रुक सकती।

उत्तर भारत की सर्दियों में यह दृश्य अब अपवाद नहीं, सामान्य सच बन चुका है। हवा इतनी जहरीली हो गई है कि सांस लेना अपने आप में एक जोखिम बन गया है। यह अब मौसम की मार नहीं, एक गहरी और स्थायी पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी है।

जैसे-जैसे सर्दी उत्तरी भारत पर अपनी पकड़ मज़बूत कर रही है, ज़हरीला स्मॉग एक बार फिर शहरों को निगल रहा है। दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) अक्सर 400 के आसपास दर्ज हो रहा है। “बहुत ख़राब” से “गंभीर” श्रेणी में। PM2.5 सुरक्षित सीमा से कई गुना ऊपर है। ताजमहल के शहर आगरा में भी हाल बेहतर नहीं; यहाँ AQI 300 तक पहुँच जाता है, और PM10 व PM2.5 दोनों ही सेहत पर सीधा वार कर रहे हैं। गोरखपुर, लखनऊ जैसे शहर भी इसी दमघोंटू घेरे में हैं।

यह संकट अब सिर्फ़ उत्तर भारत तक सीमित नहीं रहा। मुंबई में AQI लगभग 180, पुणे में 212 और हैदराबाद में 166 के आसपास दर्ज किया गया, जो बताता है कि समस्या देशव्यापी हो चुकी है। IQAir, AQI.in और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़े एक कड़वी सच्चाई सामने रखते हैं: बरसों की मॉनिटरिंग, जागरूकता अभियानों और भारी फंडिंग के बावजूद हवा की हालत में ठोस सुधार नहीं आया।

हाल ही में जनाग्रह द्वारा आयोजित राष्ट्रीय राउंडटेबल, “शहरों में वायु प्रदूषण: चुनौतियाँ और आगे का रास्ता”, ने इस संकट की जड़ पर उंगली रखी। सरकार, अकादमिक जगत, परोपकार संस्थानों और सिविल सोसाइटी के 35 से अधिक विशेषज्ञ एक बिंदु पर सहमत थे: डेटा बढ़ा है, लेकिन गवर्नेंस नहीं।
जनाग्रह की एक साल लंबी स्टडी, जो नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) और 15वें वित्त आयोग के फंड पर आधारित है, एक बड़ा अंतर उजागर करती है। कुछ बड़े शहरों में फंड का आंशिक उपयोग हुआ, लेकिन 85.5% शहर 2024–25 के PM10 घटाने के लक्ष्य से पीछे हैं। CREA के ताज़ा विश्लेषण बताते हैं कि केवल 20–30% NCAP शहरों में ही प्रदूषण में वास्तविक और टिकाऊ कमी दर्ज की गई है, जबकि अब लक्ष्य 2026 तक 40% कटौती का है।

यह नाकामी केवल इरादों या पैसों की कमी की कहानी नहीं है। देशभर में मॉनिटरिंग नेटवर्क तेज़ी से फैला है, लेकिन वायु प्रदूषण आज भी एक क्षेत्रीय और बहु-क्षेत्रीय समस्या बना हुआ है। परिवहन, निर्माण, कचरा जलाना, उद्योग और शहरों के बाहर की खेती, प्रदूषण के स्रोत हर जगह हैं, मगर ज़िम्मेदारी बिखरी हुई। नगर निकायों से नतीजे तो मांगे जाते हैं, पर न उन्हें पूरा अधिकार मिलता है, न तकनीकी क्षमता, न समय पर फंड।
राउंडटेबल में यह भी साफ़ हुआ कि डेटा बहुत है, पर वही डेटा नीतियों और फैसलों में नहीं उतरता। काग़ज़ों पर अनुपालन दिख जाता है, ज़मीन पर असर नहीं। आईआईटी तिरुपति के डॉ. सुरेश जैन ने चेताया कि प्रदूषण सीमाएँ नहीं मानता; औपचारिक जवाबदेही से आगे बढ़कर साझा ज़िम्मेदारी का ढाँचा बनाना होगा। जनाग्रह के चीफ पॉलिसी एंड इनसाइट्स ऑफिसर आनंद अय्यर ने कहा, “वायु प्रदूषण का हल संभव है, शर्त यह है कि शहर सरकारों को असली ताक़त दी जाए, क्योंकि वही नागरिकों के सबसे क़रीब हैं।” जनाग्रह के सीईओ श्रीकांत विश्वनाथन ने मुख्यमंत्रियों और राज्य सरकारों से अपील की कि क्लीन एयर एजेंडा को शीर्ष प्राथमिकता बनाएं और सिविल सोसाइटी के साथ लंबी अवधि की साझेदारी करें।

इस संकट की इंसानी क़ीमत सबसे ज़्यादा ग़रीबों और बाहर काम करने वालों को चुकानी पड़ती है। यह एक असमान आपदा है, जो अमीर और ग़रीब की सांसों के बीच खाई पैदा करती है, उम्र घटाती है और अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डालती है। सर्दी 2025 में दिल्ली, आगरा और लखनऊ जैसे शहरों में AQI बार-बार खतरनाक स्तर पार करता रहा, स्कूल बंद हुए, सफ़र मुश्किल हुआ, और रोज़मर्रा की ज़िंदगी ठहर-सी गई। छोटे शहर और कम शहरीकृत राज्य उतने ही जोखिम में हैं, लेकिन कमज़ोर मॉनिटरिंग और संस्थागत ढांचे के कारण वे अक्सर नज़रअंदाज़ रह जाते हैं।

समाधान साफ़ है, पर आसान नहीं। सिर्फ़ मॉनिटरिंग और खर्च की निगरानी से आगे बढ़कर नतीजों पर आधारित सुधार करने होंगे। शहर, ज़िला और राज्य स्तर पर ज़िम्मेदारियाँ स्पष्ट करनी होंगी; सेक्टर-वार उत्सर्जन संकेतक अपनाने होंगे; भरोसेमंद टूल्स, इम्पैक्ट असेसमेंट और प्लानिंग सपोर्ट देना होगा; और फंडिंग में ऐसी पारदर्शिता लानी होगी कि जनता जान सके, पैसा कहाँ गया और क्या बदला।

सर्दी 2025 के आंकड़े एक अंतिम चेतावनी हैं। दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानियों में गिनी जा रही है, आगरा की ऐतिहासिक विरासत धुएँ की चादर में छिपती जा रही है, और करोड़ों लोग रोज़ ज़हरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। अब आधे-अधूरे क़दम काफी नहीं।

स्वच्छ हवा कोई लक्ज़री नहीं, एक मौलिक सार्वजनिक अधिकार है। इसे टालना आने वाली पीढ़ियों को उस संकट के हवाले करना है, जिसे आज रोका जा सकता है। अब “मापने” से आगे बढ़कर “जवाबदेही तय करने” का समय है, वरना यह लोकतंत्र ज़हरीली सांसों पर ही चलता रहेगा।

भारत राष्ट्र के स्वाभिमान और बुन्देलखण्ड की रक्षा केलिये सतत संघर्ष

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महाराजा छत्रसाल का पूरा जीवन स्वाभिमान रक्षा के संघर्ष में बीता। जब केवल बारह वर्ष के थे तब माता पिता का बलिदान हो गया। कभी मामा के यहाँ रहे कभी जंगल में भटके लेकिन अपनी मातृभूमि का मान बचाने का संकल्प कभी न डिगा। और अंत में औरंगजेब जैसे क्रूर आक्रमणकारी को पीछे धकेलकर बुंदेलखंड राज्य की स्थापना की।

ऐसे इतिहास प्रसिद्ध महाराजा छत्रसाल का जन्म 17 जून 1648 को विन्ध्य पर्वत क्षेत्र में बसे ग्राम मोर पहाड़ी चंदेरा में हुआ था। अब यह गांव टीकमगढ़ जिले के अंतर्गत आता है। महाराजा छत्रसाल के पूर्वज ओरछा के शासक रहे हैं लेकिन दिल्ली सल्तनत के लगातार आक्रमणों से जूझते हुये पिता चंपतराय वनों में रहकर अपने स्वाभिमान और राज्य रक्षा केलिये निरंतर संघर्ष कर रहे थे। संघर्ष के इन्हीं दिनों में महाराजा छत्रसाल का जन्म हुआ। जब वे बारह वर्ष के थे तो औरंगजेब की सेना से युद्ध करते हुये माता पिता दोनों का बलिदान हो गया। युद्ध में पति को घायल देखकर महारानी लालकुंवरि ने बड़ी कठिनाई से बालक छत्रसाल को सुरक्षित निकाला और दोनों ने प्राण त्याग दिये।
कोई कल्पना कर सकता है बारह वर्ष के उस बालक की जो मरणासन्न माता पिता की अवस्था में माता के आदेश पर जंगल में निकल गया हो। यहाँ उन सेवाभावी सैनिकों की प्रसंशा भी करनी होगी जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर ब्रह्म वर्षीय बालक छत्रसाल को उनके मामा साहेबसिंह जू देव धंधेरे के पास देलवाड़ा तक सुरक्षित पहुँचाया फिर वे देवगढ़ गये। यहाँ अपने बड़े भाई अंगद जू देव बुन्देला के साथ रहे। उनका विवाह परमार वंश की कन्या महारानी देवकुंअरि जू देव से विवाह किया। यह विवाह पिता ने अपने जीवन काल में ही निश्चित कर दिया था। और महाराज छत्रसाल ने पिता के वचन का पालन किया। पिता के वचन के अनुसार विवाह करके युवा छत्रसाल ने पिता के सम्मान और राज्य रक्षा की ओर कदम बढ़ाया। इसके लिये आवश्यक कुशल सैन्य प्रशिक्षण और संगठित सेना की आवश्यकता थी। इसके लिये वे जयपुर गये और अपने बड़े भाई के साथ राजा जयसिंह से मिले। राजा जयसिंह उन दिनों मुगल बादशाह औरंगजेब के सेनानायक थे। राजा जयसिंह ने दोनों भाइयों को अपनी सेना से जोड़ लिया एक एक छोटी टुकड़ी का प्रभारी बना दिया। युवा छत्रसाल को यहाँ दो अवसर मिले। एक तो सैन्य प्रशिक्षण और दूसरा औरंगजेब से सुरक्षा। सैन्य प्रशिक्षण लेना प्रारंभ कर दिया। इसी बीच ने औरंगजेब ने राजा जयसिंह को दक्षिण के अभियान पर भेजा। छत्रसाल भी उनके साथ इस अभियान पर गये। मई 1665 में बीजापुर युद्ध में महाराज छत्रसाल जू देव ने असाधारण वीरता दिखायी। वे जिस ओर गये वहाँ सेना को विजय मिली। वस्तुतः यह उनके जीवन का एक प्रशिक्षण और अपने पैर मजबूत करने का समय था। वे मुगलों की कुटिलता और क्रूरता दोनों से परिचित थे। इसलिये सैनिकों के बीच उन्होंने एक ऐसा समूह तैयार कर लिया था जो उनके साथ बुन्देलखण्ड चल सके।

अपनी दक्षिण यात्रा के दौरान 1668 में महाराज छत्रसाल की शिवाजी महाराज से भेंट हुई। इस भेंट का विवरण इतिहास में तो नहीं मिलता लेकिन इसके बाद घटे घटनाक्रम से स्पष्ट है कि इस भेंट में मंत्रणा क्या हुई होगी। वर्ष 1670 में महाराज छत्रसाल जू देव बुन्देला अपनी जन्मभूमि लौट आये। उन्होंने बुंदेलखंड भूमि की स्थिति भिन्न देखी। संपूर्ण क्षेत्र में विध्वंस की स्थिति थी। उनके लौटते ही समूचे जन सामान्य ने उनकी ओर से आशा भरी दृष्टि से देखा और संघर्ष करने का आव्हान किया। जन सामान्य में एक गीत बड़ा प्रसिद्ध है-

करो देस के राज छतारे
हम तुम तें कबहूं नहिं न्यारे।
दौर देस मुगलन को मारो
दपटि दिली के दल संहारो।
तुम हो महावीर मरदाने
करिहो भूमि भोग हम जाने।
जो इतही तुमको हम राखें
तो सब सुयस हमारे भाषें।

जन भावनाओं के अनुरूप उन्होंने संघर्ष केलिये अपने रिश्तेदारों से संपर्क किया। लेकिन अधिकांश रिश्तेदारों ने मुगलों के आधीनता स्वीकार कर ली थी। महाराज छत्रसाल ने सबसे मिलकर संगठित संघर्ष का प्रस्ताव रखा पर कोई मुगल सल्तनत से भिड़ने को तैयार न हुआ। फिर उन्होंने दतिया नरेश शुभकरणजी और ओरछा नरेश सुजान सिंह जूदेव से संपर्क किया। लेकिन एकजुट होकर संघर्ष के लिये तैयार न हुये। तब महाराज छत्रसाल ने अपने बड़े भाई के साथ जन सामान्य को एकजुट करके स्वयं संघर्ष करने का संकल्प लिया। उन्होंने सबसे पहले 5 घुड़सवारों और 25 पैदल सैनिकों की एक छोटी सैन्य टुकड़ी तैयार की और ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पंचमी दिन रविवार को अपने संघर्ष का उद्घोष कर दिया।

यहीं से आरंभ होता है उनका स्वाभिमान संघर्ष। कभी आगे बढ़े कभी रणनीति के तहत पीछे हटकर कुछ समझौते भी किये। लेकिन समर्पण नहीं किया और अंत में औरंगजेब को पीछे हटना पड़ा। महाराज छत्रसाल ने अपनी जन्मभूमि को सुरक्षित कर लिया था। गर्भकाल से लेकर बाल्यकाल तक उन्होंने स्वाभिमान का बड़ा संघर्ष देखा था। यही भाव उनके उनकी प्रत्येक श्वाँस में था। इसकी झलक उनके पूरे जीवन में। निरंतर संघर्ष से ही उन्होंने अपना साम्राज्य स्थापित किया था। उनके साम्राज्य की सीमा और उनके शौर्य के बारे में एक दोहा प्रसिद्ध है-

“इत यमुना, उत नर्मदा,
इत चम्बल, उत टोंस।
छत्रसाल सों लरन की,
रही न काहू हौंस।।”

अर्थात यमुना, नर्मदा, चंबल और टोंस नदियों के बीच के क्षेत्र में महाराज छत्रसाल का राज्य स्थापित था और उनसे युद्ध करने का साहस मुगलों में बचा ही नहीं था।

महाराज छत्रसाल योद्धा होने के साथ एक कुशल प्रशासक भी थे। प्रजा की सुरक्षा सम्मान और हित उनकी प्राथमिकता में थे। वे समाज जीवन में शस्त्र और शास्त्र दोनों को आवश्यक मानते थे। उनके दरबार में विद्वानों और कवियों का आदर होता था। महाकवि भूषण द्वारा रचित ‘छत्रसाल-दशक’ उनकी वीरता का साहित्यिक प्रमाण है।

समय अपनी गति से आगे बढ़ा। बुंदेलखंड एक सशक्त राज्य के रूप में स्थापित हुआ। उन्होंने ही छतरपुर नगर की स्थापना की। महोबा को राजधानी बनाया। उनका पूरा जीवन धर्म की स्थापना और संस्कृति एवं स्वाभिमान की रक्षा में बीता। 20 दिसंबर 1731 को 83 वर्ष की आयु में उन्होंने जीवन की अंतिम श्वाँस ली। उनकी गणना महाराणा प्रताप और छत्रपति शिवाजी महाराज परंपरा में की जाती है। वे ऐसे इतिहासपुरुष थे जिन्होंने विषम परिस्थिति में जीवन संघर्ष आरंभ किया और अपने स्वाभिमान का राज्य स्थापित किया। पुण्यतिथि पर उनका स्मरण साहस, स्वाभिमान, संघर्ष कर्तव्यबोध का आत्मचिंतन करना और भविष्य की यात्रा आरंभ करना है।

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