घूंघट की घुटन से मुक्ति: खामोश बगावत की आहट

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मथुरा । उत्तर प्रदेश के प्रयागराज ज़िले के एक छोटे से गाँव की धूल भरी गलियों में, एक 18 वर्ष की लड़की सुनीता रानी (काल्पनिक नाम), दुल्हन बनकर आई। चेहरा लाल घूंघट में ढका हुआ था। स्कूल की दहलीज़ अभी पीछे छूटी ही थी कि वह एक ऐसी दुनिया में दाख़िल हो गई, जहाँ रिवायत का मतलब था, ख़ामोशी और ओझल रहना। उस सुबह किसी ने उसका चेहरा नहीं देखा, बस घूंघट देखा गया। वही उसकी पहचान बन गया। उसका नाम मिटकर “बहू” हो गया, सर ढका रहे, नज़रें झुकी रहें और ज़ुबान बंद।

घूंघट सिर्फ़ कपड़ा नहीं था, हुक्म था, न देखो, न बोलो, न इजाज़त के बिना बाहर निकलो। इसे मर्यादा कहा जाता था। उसके लिए यह घूंघट की घुटन थी। हँसी भी क़ायदे में बंधी थी। मर्द बोलते थे, औरतें सुनती थीं।

यह घूंघट सिर्फ़ चेहरा नहीं छुपाता था, पहचान भी मिटा देता था। शादियों में दुल्हनें एक-सी लगती थीं। भीड़ में औरतें रास्ता खो देती थीं, कभी-कभी ख़ुद को भी। ऐसे में अजीब-क़िस्से जन्म लेते, किसी ने घूंघट न करने पर बीवी को तलाक़ दे दिया, कोई घूंघट में ग़लत बस में बैठकर दूसरे गाँव पहुँच गई। इन क़िस्सों को “संस्कृति” कहकर टाल दिया जाता, लेकिन इनके पीछे एक गहरी त्रासदी छुपी थी। सुनीता को स्कूल की बेंच और ब्लैकबोर्ड याद आते थे, जहाँ मास्टरजी उसे “तेज़ समझदार” कहते थे। वह चिंगारी अब भी ज़िंदा थी।

इतिहास बताता है कि घूंघट कोई सनातन हिंदू परंपरा नहीं, बल्कि उधार ली गई रिवायत है। प्राचीन भारत की मूर्तियों और ग्रंथों में महिलाएँ बिना घूंघट के दिखाई देती हैं, ख़ासकर दक्षिण और पूर्व भारत में। माना जाता है कि सातवीं सदी में फ़ारसी असर और बाद में मुग़ल दौर में यह रिवायत मज़बूत हुई। कुछ क्षेत्रों में इसे शान और हैसियत का निशान माना गया जो धीरे-धीरे पितृसत्ता का औज़ार बन गया। परिवार की “इज़्ज़त” के नाम पर यह औरतों की आज़ादी पर ताला बन गया, जिसे समाज सुधारकों ने ज़ुल्म कहा।

महात्मा गांधी ने पर्दा प्रथा को “अमानवीय और अनैतिक” बताया और लिखा कि यह स्वराज के रास्ते में रुकावट है। समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भी घूंघट को पिछड़ेपन की निशानी बताते हुए इसके ख़ात्मे की माँग की। फिर भी यह चलन ज़िंदा रहा, क्योंकि ख़ामोशी से ताक़त को फ़ायदा होता है।

सुनीता की ज़िंदगी में पहला मोड़ तालीम से आया। ताने मिले, “ज़्यादा पढ़-लिखकर क्या करेगी?” लेकिन उसने पढ़ाई पूरी की। फिर 2018 में वह आशा कार्यकर्ता बनी। शुरुआत में घूंघट में ही वह घर-घर जाकर टीकाकरण, पोषण और सुरक्षित डिलीवरी की बात समझाने लगी। औरतें उसकी बात सुनती थीं, क्योंकि वह उन्हीं में से एक थी।

धीरे-धीरे घूंघट सरकने लगा, पहले मीटिंग में, फिर रास्ते में, और आख़िरकार घर में। कोई नारा नहीं, कोई शोर नहीं, बस ख़ामोश हौसला। डॉक्टरों से बात करना, रजिस्टर भरना, सवालों के जवाब देना, सब उसने सीखा। इल्म से हिम्मत आई, काम से इज़्ज़त मिली, और कमाई से आवाज़। गाँव ने यह बदलाव देखा। जो बुज़ुर्ग पहले डाँटते थे, अब सेहत के लिए उससे मशविरा लेने लगे। जो औरतें हँसती थीं, वे भी अपना घूंघट ढीला करने लगीं, बग़ावत में नहीं, सुकून में।

देश भर के सटीक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन शहरों में यह चलन कम हो रहा है। महिला केंद्रित योजनाओं ने लाखों ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है।

भारतीय सिनेमा ने भी घूंघट पर सवाल उठाए हैं। पाकीज़ा और उमराव जान जैसी फ़िल्मों में घूंघट में क़ैद औरतों की तन्हाई दिखी। हाल की फ़िल्म लापता लेडीज़ (2023) में एक-से घूंघट की वजह से दो दुल्हनों का अदला-बदली होना, इस रिवायत की बेवक़ूफ़ी को हँसी में उजागर करता है।

आज तमाम शिक्षित महिलाएं बिना घूंघट चल रही हैं। उनकी चाल में भरोसा है। आंखों में चमक, उत्साह है। बच्चे उनका चेहरा देखते हैं, बेटियाँ सपने देखती हैं, घूंघट से परे। घूंघट अब भी कई घरों में टंगा है, इज़्ज़त के नाम पर। लेकिन सुनीता, आशा, रानी, देवी जैसी युवा महिलाओं की कहानियाँ इस प्रथा की गिरफ़्त ढीली कर रही हैं। बदलाव शोर से नहीं आता, आहिस्ता, हौले हौले आता है, शिक्षा से, कानून से, सोशल मीडिया से। जब कोई औरत अपना घूंघट उठाती है और ग़ायब होने से इंकार कर देती है, तब एक नई सुबह की शुरुआत होती है।

एक जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और देश विरोधी गैंग सक्रिय

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दिल्ली । माननीय सुप्रीमकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में फरवरी 2020 में उत्तर- पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के मुख्य आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज कर दी। इन दंगों में 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक घायल हुए थे। इसी केस में उमर और शरजील के 5 साथियों को 12 कड़ी शर्तो के साथ जमानत मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट ने उमर और शरजील इमाम पर कड़ी टिप्पणियां करी हैं । अब ये दोनों अभियुक्त आने वाले एक साल में जमानत के लिए अपील भी नहीं कर पाएंगे।

फरवरी 2020 के दिल्ली दंगे अत्यंत वीभत्स दंगो में से एक थे। इस दंगे में मारे गए 53 निर्दोष लोगों में एक युवा आईबी अधिकारी अंकित शर्मा, पौढ़ी गढ़वाल से पांच महीने पहले आया गरीब माता का बेटा दिलबर नेगी और दो पुलिस कर्मी भी शामिल थे। ऐसे कुख्यात दंगों के अपराधियों को जमानत न मिलने पर सर्व साधारण में संतोष का भाव है किन्तु कुछ लोग इस पर भी तुष्टीकरण की रोटियां सेंकते हुए उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए न केवल आंसू बहा रहे हैं वरन अनर्गल प्रलाप भी कर रहे हैं ।

शरजील इमाम केवल दिल्ली दंगों का ही अपराधी नहीं है वरन चिकन नेक तोड़कर पूर्वोत्तर भारत को देश से अलग करने कि बात करने वाला देशद्रोही है । शरजील इमाम भारत को खंड -खंड मे विभाजित देखना चाहता हैं। भारत के जो विपक्षी दलो ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत ण मिलने पर उसको सांप्रदायिक रंग दे रहे हैं क्या वे इन विचारों से सहमत हैं?

दरअसल उमर व शरजील के साथ खड़े लोग अपनी कुंठा और हताशा को ही जगजाहिर कर रहे हैं। इस कुंठित टोली मे कोई जमानत न मिलने को कायरता पूर्ण कार्रवाई कह रहा है तो कोई इसे बेतुका बता रहा है जबकि कोई इसे अत्याचार बता रहा है । एक ने तो सारी लज्जा त्यागते हुए इसे लोकतंत्र के लिए काला दिन बता दिया। एक व्यक्ति ने कहा कि 5 साल से अधिक बिना किसी दोष साबित हुए जेल में रखना बर्बरता बता दिया। यह बात भारतीय जनमानस के समझने योग्य है कि इन सेक्युलर नेताओं को सुप्रीम कोर्ट का फैसला बर्बर लग रहा है। अमेरिकी अब्राहम लिंकन ने एक बार कहा था कि जो अदालतों के अधिकार व उनके फैसलों को नकारता है वह राष्ट्र की नींव को नकारता है ।

इस तुष्टीकरण गैंग से पूछा जाना चाहिए कि आज देश में 4 लाख 34 हजार 302 विचाराधीन कैदी हैं जो सजा पाए बिना जेल में बंद हैं। करीब 26 हजार ऐसे कैदी हैं जो 3 से 5 साल तक जेल में बंद हैं और करीब साढ़े 11 हजार ऐसे कैदी हैं जो 5 वर्षों से अधिक समय से जेल में बंद हैं । यह आंकड़े केवल 2020 तक के ही हैं । इंडिया जस्टिस रिपोर्ट- 2025 के अनुसार यह आंकड़ा और भी बढ़ सकता है। इसमें भी अधिकांश बंदी जन गरीब, दलित अल्पसंख्यक व महिला समाज के हैं । इन कैदियों के लिए टुकड़े टुकड़े गैंग के समर्थकों का मन कभी नहीं छटपटाता है। यह लोग उन उमर खलिद और शरजील इमाम के लिए रो रहे हैं जिनकी जमानत के फैसले से पूर्व ही न्यूयार्क के मेयर ममदानी का एक आपत्तिजनक पत्र सार्वजनिक हो गया था। ममदानी के पत्र से पता चलता है कि भारत के खिलाफ कितनी गहरी साजिशें रची जा रही हैं। यूएपीए कानून के तहत गिरफ्तार किया गया शरजील इमाम राष्ट्र द्रोही व घातक व्यक्ति है।

चिंता का विषय है कि उमर खालिद और शरजील इमाम के बचाव में अदालत में जो लोग खड़े हुए हैं वह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं अपितु देश के पूर्व केंद्रीय मंत्री, वरिष्ठ काग्रेंस नेता और प्रभावशाली व्यक्ति हैं। इनमें कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंघवी, अश्विनी कुमार जैसे नाम शामिल हैं जिन्होंने कांग्रेस सरकार मेंं बडे मंत्रालय संभाले। इसके अतिरिकत सिद्धार्थ दवे, सिद्धार्थ लूथरा, त्रिदीप पैइस भी इनके वकील रहे।प्रश्न यह उठता है कि ”क्या यह केवल कानूनी सहायता है” या ”किसी विशेष मानसिकता का स्पष्ट संकेत ?”

यह सब चल ही रहा था तभी बीच में जेएनयू के ढपली वालों ने आकर ताल से ताल मिला दी। दिल्ली में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की जमीन से एक बार फिर देश के विरुद्ध आपतिजनक नारे लगे। दस साल पूर्व भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह -इंशा अल्लाह के नारे लगाए गएा थे उसी जगह “मोदी तेरी कब्र खुदेगी , अमित शाह तेरी कब्र खुदेगी खुदेगी“ जैसे आपत्तिजनक नारे लगाए गए। इस गैंग की नारेबाजी की वजह थी दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत की अर्जी का खारिज होना। कांग्रेस व उसके अन्य विरोधी दलों के नेताओं ने इस प्रदर्शन व नारेबाजी को गुस्से ,नाराजगी के प्रकटीकरण का तरीका बता दिया।

दिल्ली दंगो से सम्बंधित एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उस समय दिल्ली में आप मुखिया अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री थे। दंगो की जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि हिंसा अचानक नहीं हुई थी आप पार्षद ताहिर हुसैन और विधायक अमानतुल्लाह खान की इसमें बड़ी भूमिका थी, इनकी जांच प्रगति पर है और अभी कोई बरी नहीं हुआ है। केजरीवाल मुख्यमंत्री रहते सरकारी तौर पर इन तत्वों को बचाने का पूरा प्रयास किया गया और उन्हीं की वजह से आज भी वह जमानत पर घूम रहे हैं । जब तक दिल्ली में केजरीवाल मुख्यमंत्री रहे तब तक उनकी ओर से दिल्ली दंगो की जांच में कोई सहयोग नहीं किया जा रहा था। अब मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के नेतृत्व में संभव है फरवरी 2020 के पीड़ितों को न्याय मिल जाए ।

अमेरिका की विरासत: इंसानियत को पैगाम, सामर्थ्यवान को कोई दोष नहीं

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दिल्ली । लास्ट ईयर जब एक उम्रदराज़ महान नेता ने शांति के लिए नोबेल प्राइज की इच्छा जाहिर की थी, तब ही समझ लेना चाहिए था कि शांति का मतलब युद्ध तनाव होता है। यह वही दोहरी ज़ुबान है, जिसे जॉर्ज ऑरवेल ने डबलस्पीक कहा था, जो अब उस लोकतंत्र की पहचान बन चुकी है, जिसने ताक़त और डर को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। इसलिए जब वेनेज़ुएला पर एक और “महान अभियान” की ख़बर आई, तो दुनिया ने बस थकी निगाहों से पूछा “इतनी देर क्यों कर दी हुजूर आते आते?” लगता है, अमेरिकी सपना ज़िंदा रहने के लिए , समय समय पर बूस्टर डोज, तनाव और संकट की खुराक मांगता है।

हक़ीक़त यह है कि वेनेजुएला अपहरण कांड कोई ताज़ा ग़लती नहीं है, बल्कि दो सौ साल पुराने एक प्रोजेक्ट का शायद आख़िरी, निर्वस्त्र पड़ाव है। हिरोशिमा की राख से लेकर वियतनाम के जलते जंगल तक, एटम से लेकर नेपाम बम तक, यह सब एक ही श्रृंखला के मोती हैं। अमेरिका के इनीशिएटिव्स और एक्सपेरिमेंटस, बेलगाम पूंजीवाद और तकनीकी साम्राज्यवाद का गठजोड़, अपने चरम पर है। नक़ाब उतर चुका है, चेहरा खुल गया है।
अब सवाल यह है, अंकल सैम ने इंसानियत को असल में क्या विरासत दी है ? जवाब है, एक ज़हरीली खौफनाक संस्कृति, जो आज़ादी के फटे झंडे में लिपटी हुई है।

सबसे पहले आती है झूठ की राजनीति, एक ऐसी उपभोक्तावादी बाढ़, जो स्थानीय परंपराओं को स्क्रीन और ब्रांड की हवस में डुबो देती है। यह संस्कृति बग़ावत को भी सजावटी माल बना देती है, ताक़त बेचती है, और रिश्तों को एल्गोरिदम की प्रदर्शनी में बदल देती है। इसी से जन्म लेती है एक प्रकृति-विरोधी जीवनशैली, जो धरती को इस्तेमाल कर फेंकने वाली चीज़ मानती है। अमेरिका का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन दुनिया के औसत से कई गुना ज़्यादा है, मगर इसकी सज़ा सबसे ग़रीब देश भुगत रहे हैं। आसमान को नाली गटर बना दिया गया है।

बाहरी लूट भीतर की सड़ांध का आईना है। यह यक़ीन कि पैसा सब खरीद सकता है, इंसाफ़, ज़िंदगी और रूह तक, पूरी दुनिया में फैलाया जा चुका है। नतीजा यह कि इलाज एक जुआ बन गया, पढ़ाई क़र्ज़ की कै़द, और राजनीति कॉरपोरेट की नीलामी। इसी नैतिक खोखलेपन से पैदा हुई बंदूक-संस्कृति, जिसने समाज की जगह ख़ौफ़ बसा दिया है। अमेरिका में हर साल हज़ारों लोग गोली का निशाना बनते हैं, यह “लोकतंत्र” नहीं, दिन-प्रतिदिन की लॉटरी है जिसमें ज़िंदगी दाँव पर लगी रहती है।

सदियों तक इस साम्राज्य को एक कहानी चाहिए थी, “लोकतंत्र फैलाने” की। पर उसी नाम पर लैटिन अमेरिका में मौत के दस्ते खड़े किए गए, पश्चिम एशिया में ज़ालिम हुक़ूमतें बैठाई गईं, और दक्षिण-पूर्व एशिया को नेपाम से जला डाला गया। पाखंड इसका कवच था; अब वह भी टूट चुका है।
आज आर्थिक गला-घोंटना और तख़्तापलट का समर्थन खुलेआम किया जाता है। “राजनयिक” अब वसूली के एजेंट बन चुके हैं। साम्राज्य अब सभ्यता सिखाने का नाटक नहीं करता, बस फ़रमान जारी करता है: हमारी बात मान लो, क्योंकि तुम्हारे पास वे संसाधन हैं जो हमें चाहिए । इतिहास गवाह है, ग्वाटेमाला से चिली तक, यह लोकतंत्र कभी जनता की मर्ज़ी का नहीं, बल्कि पूंजी की मर्ज़ी का नाम था।

इसकी सबसे स्थायी “एक्सपोर्ट” है, अराजकता और स्थायी तनाव की व्यवस्था। आज का अमेरिका शांति में नहीं जी सकता, क्योंकि शांति हथियारों, सुरक्षा और पुनर्निर्माण के बाज़ार को नुकसान पहुँचाती है। इसे हमेशा एक दुश्मन चाहिए, हमेशा नया मोर्चा। इंसानी हक़, अख़लाक़, गरिमा, ये सब विलासिता की चीज़ें हैं, केवल अमीर लोगों के लिए।

इसलिए दुनिया का चौंकना अब महज़ दिखावा है। शैतान नहीं बदला, बस उसका नक़ाब उतर गया है। पूंजी, लोभ और युद्ध से चलने वाली यह मशीन अब दिन-दहाड़े काम कर रही है, उन उसूलों को तोड़ती हुई जिनका वह कभी दम भरती थी। पीछे छूटते हैं घायल समाज, शारीरिक भी, रूहानी भी।
फिर भी, इस अंधेरे के पार एक उम्मीद है। हम इस सच को पहचानें और एक नया रास्ता चुनें। सचमुच आज़ाद समाज वह है जो इंसानियत को बाज़ार से ऊपर रखे, धरती से जुड़ा हो और शक की जगह एकजुटता पर खड़ा हो और जिसे किसी ऑरवेलियन अनुवाद की ज़रूरत न पड़े।

साइंस फिक्शन के वो उपन्यास जो हकीकत बन गए

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मुंबई । एक पनडुब्बी अनजाने समंदर की गहराइयों में उतरती है, वो भी 1870 में, जब बैटरी नाम की चीज़ बस तजुर्बा भर थी। एलियन तीन पैरों वाली डरावनी मशीनों से हमला करते हैं, और वही कल्पना इंसानों को चाँद तक ले जाने वाले रॉकेट्स की प्रेरणा बन जाती है। बिजली से “ज़ॉम्बी” को ज़िंदा करने की कहानी, आज अस्पतालों में दिल बचा रही है।

ज़रा ठहरिए… अगर मैं कहूँ कि ये “अजीब” कहानियाँ सिर्फ़ मनोरंजन नहीं थीं? इन्होंने हमारी दुनिया का नक़्शा बनाया। जब कहानियाँ बड़े ख़्वाब देखती हैं, तो विज्ञान जाग उठता है, और हक़ीक़त पीछे-पीछे दौड़ती है। पहले ख़याल आते हैं, औज़ार बाद में।

रात के 2 बजे, तीसरी चाय और मोबाइल की रौशनी के बीच एक अजीब सा ख़याल आता है, क्या भविष्य चुपचाप आ चुका है, बिना किसी फ़िल्मी संगीत के? क्या जिन गैजेट्स को हम रोज़ छूते हैं, जो मशीनें सोचती दिखती हैं, और जो स्क्रीन हमें देखती हैं, ये सब पहले ही सोची जा चुकी थीं? लगता है भविष्य अचानक नहीं आया, वो धीरे-धीरे, अध्याय दर अध्याय टपकता रहा।

1945 में सेटेलाइट कम्युनिकेशन का सपना देखने वाले, सर आर्थर सी. क्लार्क ने कहा था, बहुत उन्नत तकनीक जादू जैसी लगती है। जो उन्होंने नहीं कहा, वो ये कि ये जादू अक्सर किसी की लिखी कहानी से शुरू होता है।

1870 में जूल्स वर्ने ने ट्वेंटी थाउज़ैंड लीग्स अंडर द सी लिखी। समंदर तब भी रहस्य था। उनकी पनडुब्बी नॉटिलस बिजली से चलती थी, बैलास्ट टैंक थे, स्लीक अंदरूनी ढांचा था, और महीनों लहरों के नीचे रहने वाली टीम। तब बैटरियाँ भारी-भरकम खिलौने थीं, पनडुब्बियाँ ताबूत समझी जाती थीं। वर्ने को “कल्पनाशील” कहकर छोड़ दिया गया।

कुछ दशक बाद न्यूक्लियर सबमरीन समंदरों में गश्त करने लगीं, हैरतअंगेज़ तौर पर वैसी ही। पेरिस्कोप झाँकता है, धड़ फिसलता है, ख़ामोशी गूंजती है। वर्ने ने सिर्फ़ मशीन नहीं, उसकी ज़िंदगी भी लिख दी थी।

1898 में एच. जी. वेल्स ने द वॉर ऑफ़ द वर्ल्ड्स से लोगों को दहला दिया। मंगल ग्रह के जीव, तीन पैरों वाली मशीनें, गर्म किरणें। इन्हें पढ़ने वालों में एक लड़का था, रॉबर्ट गोडार्ड। उसे एलियंस का डर नहीं लगा, उसे रॉकेट्स का शौक़ लगा। आगे चलकर वही आधुनिक रॉकेट्री का पिता बना। एलियन नहीं आए, इंसान चाँद पर पहुँचे। कल्पना ने धरती पर हमला नहीं किया, हमें उससे आगे धकेल दिया।

वेल्स यहीं नहीं रुके। 1914 में द वर्ल्ड सेट फ़्री में उन्होंने “एटॉमिक बम” का ज़िक्र किया, न्यूक्लियर विज्ञान से बहुत पहले। वैज्ञानिक लियो सिलार्ड ने माना कि इस ख़याल ने सोच को झकझोरा। डरावनी बात ये है, ख़याल इजाज़त नहीं माँगते, वो हक़ीक़त बन जाते हैं।

मैरी शेली की फ़्रैंकनस्टाइन (1818) को हम डरावनी कहानी मानते हैं। पर असल में ये बिजली से ज़िंदगी को फिर जगाने की बात है। आज डिफ़िब्रिलेटर वही करते हैं, बिना राक्षस के। दिल रुकता है, बिजली दौड़ती है, ज़िंदगी लौट आती है। जो कभी सिहरन देता था, आज रोज़ जान बचाता है।

साइंस-फिक्शन माहौल में चूक सकता है, तरीक़ा अक्सर सही बैठता है।ब्रैडबरी के कानों में फिट रेडियो, आज के वायरलेस ईयरबड्स। क्लार्क के स्पेस स्टेशन की स्क्रीन, हमारे टैबलेट। स्टार ट्रेक के कम्युनिकेटर, फ़्लिप फोन की प्रेरणा। नील स्टीफ़ेंसन का “मेटावर्स”, विलियम गिब्सन का “साइबरस्पेस”।
आज एआई पर बहसें, आइज़ैक असिमोव के 1940 के रोबोट क़ानूनों की गूँज हैं। कोड इंजीनियर लिखते हैं, पर भविष्य के फ़लसफ़ीकार अक्सर पहले लेखक होते हैं।

बिग ब्रदर, जॉर्ज ऑरवेल की 1984 ने निगरानी की चेतावनी दी। हमने सिर हिलाया… और हर जगह कैमरे लगा दिए। ऑल्डस हक्सले की ब्रेव न्यू वर्ल्ड, क्लोनिंग और डिज़ाइनर बच्चे, आज छिड़ी नैतिक बहस। ब्लैक मिरर पूछता है, तकनीक बढ़ेगी, पर इंसानी गरिमा बचेगी?

लेखक कल्पना करते हैं। वैज्ञानिक जाँचते हैं। इंजीनियर बनाते हैं। कहानीकार न हों तो नवाचार बेकाबू हो जाता है; विज्ञान न हो तो कहानियाँ ख़्वाब रह जाती हैं।

एआई, जलवायु अनिश्चितता और डिजिटल लत के दौर में यह साझेदारी और भी ज़रूरी है। कल्पना विज्ञान को ज़मीर देती है; विज्ञान कल्पना को सच होने का मौक़ा।

तो अगली बार कोई साइंस-फिक्शन कहानी बेतुकी लगे, ज़्यादा हँसिए मत। मुमकिन है आप कल का इंस्ट्रक्शन मैनुअल पढ़ रहे हों।
लेखक ख़्वाब देखते हैं, लैब उन्हें आज़माती है। बिना ख़्वाब विज्ञान अटकता है, बिना विज्ञान ख़्वाब बिखरते हैं।
लेकिन हैरी पॉटर की जादुई दुनिया अगर हकीकत में तब्दील हो गई तब क्या होगा?

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