जहाँ एल्गोरिद्म रुक जाता है, वहाँ अनुभव शुरू होता है

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डॉ नीलम महेंद्र

दिल्ली । हाल ही में अमेरिका की प्रतिष्ठित ऑटोमोबाइल कंपनी “फोर्ड” ने AI को अपनाकर अपने कुछ कर्मचारियों को हटा दिया था। लेकिन शीघ्र ही उसे AI की सीमाओं के चलते होने वाले नुक्सान को देखते हुए उन्हें पुनः काम पर रखना पड़ा। इसी प्रकार ग्राहक सेवा क्षेत्र की एक नामी फिनटेक कंपनी “क्लार्ना” को भी यह स्वीकार करना पड़ा कि केवल AI आधारित संवाद ग्राहक संतुष्टि का विकल्प नहीं बन सकता, इसलिए उसे भी अपने संस्थान में कर्मचारियों की संख्या फिर से बढ़ानी पड़ी। ऐसे ही एक अन्य प्रमुख अमरीकी IT कम्पनी IBM ने भी AI के साथ अनुभव और विशेषज्ञता वाले कार्मिकों की आवश्यकता को दोबारा रेखांकित किया है। ये सभी कंपनियां बदलते समय के साथ ताल से ताल मिलकर अपने सिस्टम को AI आधारित बनाने की ओर बढ़ रही थीं और अपने कर्मचारियों को हटा के उनका काम AI से लेने लगीं थीं। लेकिन इनको शीघ्र ही अपने कर्मचारी वापस बुलाने पड़े। ये वे घटनाएँ हैं जो हमें AI पर हमारी बढ़ती निर्भरता पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर रही हैं।

ये घटनाएँ AI की विफलता की सूचक नहीं हैं लेकिन हाँ इस भ्रम के टूटने का संकेत अवश्य हैं कि AI मानव का स्थान ले सकती है।

हम मनुष्यों ने सदियों तक मशीनें इसलिए बनाईं कि वे हमारा शारीरिक श्रम कम कर सकें। लेकिन इतिहास में पहली बार आज मशीनें बौद्धिक श्रम भी कर रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता Artificial Intelligence) के इस दौर ने हम सभी के सामने एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या मशीनें केवल हमारा काम आसान करेंगी, या एक दिन हमारे अनुभव, निर्णय और विवेक का भी स्थान ले लेंगी?

दरअसल पिछले कुछ वर्षों में AI को लेकर जितना उत्साह दिखाई दिया, उतनी ही आशंकाएँ भी पैदा हुईं। एक तरफ यह विज्ञान के चमत्कार के रूप में देखा जा रहा था तो दूसरी तरफ करोड़ों नौकरियों के अंत की शुरुआत के रूप में। किंतु परिदृश्य लगातार बदलता जा रहा है।

समय के साथ यह बात सामने आ रही है कि आखिर AI की भी सीमाएं हैं। भले ही वह कुछ ही क्षणों में करोड़ों दस्तावेज़ों का विश्लेषण कर सकता है, पैटर्न पहचान सकता है, संभावनाओं का अनुमान लगा सकता है और मनुष्य से कहीं अधिक गति से उत्तर दे सकता है। लेकिन मूलभूत तथ्य यह है कि AI सोच नहीं सकता। हाँ, वह गणना कर सकता है लेकिन उसका प्रत्येक उत्तर उसी डेटा पर आधारित होता है जिससे उसे प्रशिक्षित किया गया है। यदि डेटा अधूरा, पक्षपाती या त्रुटिपूर्ण है, तो वो परिणाम भी वैसा ही देगी।

यहीं से अनुभव एवं डाटा तथा तार्किक बुद्धि और तथ्यात्मक विश्लेषण में समन्वय का महत्व रेखांकित होता है।

एक अनुभवी इंजीनियर मशीन की हल्की-सी असामान्य आवाज़ सुनकर आने वाली बड़ी खराबी का अनुमान लगा सकता है। एक वरिष्ठ डॉक्टर जाँच रिपोर्ट सामान्य होने के बावजूद रोगी के शारीरिक लक्षणों एवं व्यवहार से छिपी हुई बीमारी को उसके शुरुआती स्टेज में ही पहचान सकता है। एक संवेदनशील शिक्षक यह समझ लेता है कि किसी छात्र की चुप्पी उसकी कमज़ोरी नहीं उसके मानसिक संघर्ष का संकेत है। एक कुशल प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन या बढ़ई वर्षों के अपने अनुभव से ऐसी सूक्ष्म त्रुटियाँ पकड़ लेता है जिन्हें कोई मशीन तुरंत नहीं पहचान सकती। और यहीं AI मनुष्य से पिछड़ जाती है क्योंकि अनुभव वह संपत्ति है जिसे डाउनलोड नहीं किया जा सकता।

क्योंकि ज्ञान अपने आप में तब तक अधूरा है जब तक उसे व्यवहार में न उतरा जाए। केवल युटुब के वीडियो देखकर आप परफेक्ट आटा गूंथना या रोटी बेलना या पेंटिंग करना नहीं सीख सकते जब तक आप के पास अभ्यास का अनुभव न हो।

AI और मनुष्य के बीच सबसे बड़ा अंतर भी यही है।

AI डेटा देखता है, मनुष्य संदर्भ समझता है।

AI पैटर्न पहचानता है, मनुष्य अपवाद पहचानता है।

AI संभावना बताता है, मनुष्य जोखिम का आकलन करता है।

AI उत्तर देता है, मनुष्य निर्णय लेता है।

और सबसे महत्वपूर्ण, AI अपने निर्णय की नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेता, मनुष्य लेता है।

यही कारण है कि करुणा, सहानुभूति, अंतर्ज्ञान, नैतिक विवेक और उत्तरदायित्व आज भी किसी एल्गोरिद्म में नहीं डाले जा सके हैं। AI कभी अपराधबोध महसूस नहीं करता, वह कभी दुविधा में नहीं पड़ता और न ही किसी निर्णय के नैतिक परिणामों का बोझ उठाता है। वह वही सीखता है जो मनुष्य उसे सिखाता है। इसलिए AI की गुणवत्ता अंततः मनुष्य की गुणवत्ता पर ही निर्भर करती है।

अतः भविष्य में सबसे अधिक मूल्य उन लोगों का होगा जिनके पास गहरी विशेषज्ञता, व्यावहारिक अनुभव और निर्णय क्षमता होगी ताकि वे AI की सहायता से कार्य की गुणवत्ता को सुधार सकें।

इतिहास गवाह है कि हर तकनीकी क्रांति ने मनुष्य की क्षमता बढ़ाई है, उसका महत्व कम नहीं किया। भाप के इंजन ने श्रम को बदला, कंप्यूटर ने गणना को बदला, इंटरनेट ने संचार को बदला। AI भी काम करने के तरीके बदलेगा, लेकिन वह अनुभव, विवेक और मानवीय संवेदना का विकल्प नहीं बन सकता।
क्योंकि जहाँ एल्गोरिद्म रुक जाता है, वहीं से अनुभव अपना रास्ता बनाना शुरू करता है।

(लेखिका पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय में हिन्दी सलाहकार समिति की सदस्य हैं)

भारतीय मजदूर संघ : 71 वर्षों की राष्ट्रनिष्ठ श्रमिक यात्रा, जिसने श्रम आंदोलन को दिया भारतीय दृष्टिकोण

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल।  जुलाई 1955 को स्थापित भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) आज केवल देश का सबसे बड़ा श्रमिक संगठन होने के नाते भारतीय श्रम दर्शन का सबसे सशक्त प्रतिनिधि है। वस्‍तुत: जब विश्व का श्रमिक आंदोलन पूंजीवाद और साम्यवाद के बीच संघर्ष की धुरी पर घूम रहा था, तब राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी ने भारतीय मजदूर संघ की स्थापना करते हुए श्रम आंदोलन को एक तीसरा मार्ग दिया, जिसके लिए कहा गया, “राष्ट्रहित, उद्योगहित और मजदूरहित” का मार्ग। यही कारण है कि सात दशक बाद भी आज बीएमएस राष्ट्र निर्माण में श्रमिकों की रचनात्मक भागीदारी का एक सशक्त मंच बनकर खड़ा है।

यहां ध्‍यान देने योग्‍य है कि भारतीय मजदूर संघ का जन्म ऐसे समय हुआ था, जब अधिकांश ट्रेड यूनियनें राजनीतिक दलों अथवा वैचारिक समूहों के प्रभाव में काम कर रही थीं। कहीं वर्ग संघर्ष की कम्युनिस्ट अवधारणा प्रमुख थी तो कहीं श्रमिक आंदोलन राजनीतिक दबाव का माध्यम बन गया था। बीएमएस ने इस सोच से अलग हटकर स्पष्ट किया कि उद्योग और श्रमिक एक-दूसरे के विरोधी न होकर परस्‍पर एक-दूसरे के पूरक हैं, वे सभी एक औद्योगिक परिवार के सदस्य हैं।

कहना होगा कि दत्तोपंत ठेंगड़ी ने “उद्योगों का राष्ट्रीयकरण, श्रमिकों का उद्योगीकरण और राष्ट्र का श्रमिकीकरण” का जो सूत्र दिया, वह आज भी बीएमएस की कार्यदिशा है। संगठन का मानना रहा कि श्रमिक का सम्मान और उद्योग की प्रगति एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि उद्योग बढ़ेगा तो रोजगार बढ़ेगा और यदि श्रमिक सुरक्षित होगा तो उत्पादन तथा उत्पादकता दोनों बढ़ेंगे।

भारतीय संस्कृति से जुड़ा श्रम दर्शन

बीएमएस की सबसे बड़ी विशेषता उसका भारतीय सांस्कृतिक आधार है। संगठन श्रम को राष्ट्रसेवा का माध्यम मानता है। ऋग्वेद में वर्णित विश्वकर्मा की परंपरा, कर्मयोग और यज्ञ की भावना को आधुनिक औद्योगिक संबंधों से जोड़ते हुए संगठन यह संदेश देता है कि श्रमिक और उद्योगपति दोनों राष्ट्र निर्माण के साझेदार हैं। इसी कारण बीएमएस ने पश्चिमी “मालिक बनाम मजदूर” की अवधारणा के स्थान पर “औद्योगिक परिवार” की संकल्पना को आगे बढ़ाया। इसी कारण से आज यह दृष्टिकोण उसे अन्य ट्रेड यूनियनों से अलग पहचान देता है।

असंगठित श्रमिकों की आवाज बना भारतीय मजदूर संघ

भारत के लगभग 90 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्र में कार्य करते हैं। लंबे समय तक यह विशाल वर्ग सामाजिक सुरक्षा से वंचित रहा। भारतीय मजदूर संघ उन पहले संगठनों में था जिसने इस वर्ग की समस्याओं को राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाया। संगठन के लंबे संघर्ष के परिणामस्वरूप असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 अस्तित्व में आया। इसके बाद बीएमएस लगातार ऐसे राष्ट्रीय डेटाबेस की मांग करता रहा, जिससे प्रत्येक श्रमिक की पहचान सुनिश्चित हो सके।

इसी दिशा में आगे चलकर ई-श्रम पोर्टल अस्तित्व में आया, जिसके माध्यम से करोड़ों असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, दुर्घटना बीमा तथा अन्य सरकारी लाभों से जुड़े। तथ्‍यों के आधार पर आप हम सभी ये देख सकते हैं कि कैसे यह एक प्रशासनिक सुधार श्रमिकों को औपचारिक पहचान देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम सिद्ध हुआ।

श्रम सुधारों में रचनात्मक भूमिका

जब देश के 44 पुराने श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समाहित करने की प्रक्रिया शुरू हुई, तब भारतीय मजदूर संघ ने न तो आंख मूंदकर समर्थन किया और न ही विरोध की राजनीति अपनाई, उसने श्रमिक हितों की रक्षा करते हुए अनेक महत्वपूर्ण सुझाव केंद्र सरकार को दिए। जिसके परिणाम स्‍वरूप संगठन के आग्रह पर गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों को पहली बार कानूनी पहचान मिली। फिक्स्ड टर्म कर्मचारियों के लिए ग्रेच्युटी संबंधी प्रावधानों में सुधार हुआ। अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों, नियुक्ति पत्र, राशन की पोर्टेबिलिटी और यात्रा सुविधाओं जैसे विषयों को भी श्रम सुधारों में स्थान मिला। बीएमएस का मानना रहा कि सुधार आवश्यक हैं, किंतु उनका उद्देश्य श्रमिक सुरक्षा को कमजोर करना नहीं होना चाहिए।

ईपीएफ, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा के लिए सतत अभियान

भारतीय मजदूर संघ ने कर्मचारियों के भविष्य निधि, न्यूनतम पेंशन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े विषयों पर लगातार राष्ट्रव्यापी आंदोलन चलाए। ईपीएफओ कार्यालयों के समक्ष आयोजित अभियानों ने कर्मचारियों की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुखता दिलाई। इसी क्रम में भविष्य निधि दावों के ऑटो-सेटलमेंट जैसी व्यवस्थाओं तथा पेंशन प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में भी सुधार देखने को मिले। बीएमएस का मानना है कि श्रमिक का सम्मान केवल नौकरी तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसके वृद्धावस्था जीवन की सुरक्षा भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।

महिला श्रमिकों के अधिकारों की मुखर आवाज

औद्योगिक क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को देखते हुए भारतीय मजदूर संघ ने सुरक्षित कार्यस्थल, समान वेतन और गरिमामय कार्य परिस्थितियों की मांग को लगातार उठाया। श्रम संहिताओं में महिलाओं की सुरक्षा, परिवहन, क्रेच सुविधा तथा आवश्यक सुरक्षा उपायों के साथ रात्रिकालीन कार्य संबंधी प्रावधानों को अधिक व्यवस्थित बनाने में संगठन की भूमिका उल्लेखनीय रही। एक तरह से बीएमएस का दृष्टिकोण सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

वैश्विक मंच पर भारतीय श्रम दृष्टि

भारतीय मजदूर संघ अब सिर्फ राष्ट्रीय संगठन नहीं रह गया है। भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान लेबर-20 (एल-20) में संगठन की सक्रिय भूमिका रही, जहाँ सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा, सम्मानजनक रोजगार तथा कौशल विकास जैसे विषयों पर भारतीय दृष्टिकोण को प्रमुखता मिली। ब्रिक्स ट्रेड यूनियन फोरम में भी बीएमएस ने भारतीय राष्ट्रीय हितों को स्पष्ट रूप से रखा। संगठन का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी श्रमिक संगठनों को राष्ट्रहित से ऊपर किसी वैचारिक या राजनीतिक आग्रह को नहीं रखना चाहिए। यही कारण है कि बीएमएस स्वयं को केवल ट्रेड यूनियन से अधिक राष्ट्रवादी श्रमिक आंदोलन का प्रतिनिधि मानता है।

वैश्वीकरण की चुनौतियों के बीच भारतीय विकल्प

उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद रोजगार का स्वरूप तेजी से बदला। स्थायी नौकरियों की जगह संविदा प्रणाली बढ़ी, गिग अर्थव्यवस्था विकसित हुई और रोजगार की अनिश्चितता नई चुनौती बनकर सामने आई। बीएमएस ने इन परिवर्तनों का विरोध करने के बजाय श्रमिक सुरक्षा को नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालने पर बल दिया है।

संगठन लगातार यह कहता रहा है कि तकनीकी परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल अर्थव्यवस्था के युग में श्रमिकों के कौशल उन्नयन, सामाजिक सुरक्षा और गरिमामय रोजगार पर समान रूप से ध्यान देना होगा। यही भविष्य के भारत की श्रम नीति का आधार बन सकता है।

इस तरह यदि सम्‍यक रूप से देखें तो भारतीय मजदूर संघ का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उसने श्रमिक आंदोलन को वेतन, बोनस और भत्तों से आगे का रास्‍ता दिखाया। संगठन ने श्रमिक को राष्ट्र निर्माण की केंद्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। संगठन का विश्वास है कि मजबूत राष्ट्र वही बन सकता है, जहाँ उद्योग प्रतिस्पर्धी हों, श्रमिक सम्मानित हों और विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। इसी सोच के कारण बीएमएस ने कभी भी श्रमिक हितों को राष्ट्रहित से अलग नहीं माना। उसके लिए श्रमिक का कल्याण, उद्योग की प्रगति और राष्ट्र की समृद्धि, यह तीनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं।

अत: भारतीय मजदूर संघ के स्थापना दिवस पर उसके सात दशकों के योगदान का मूल्यांकन सिर्फ सदस्य संख्या या आंदोलनों से मत लगाइए, उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने भारतीय श्रम आंदोलन को एक ऐसी वैचारिक दिशा दी, जिसमें संघर्ष के स्थान पर समरसता, टकराव के स्थान पर संवाद और वर्ग संघर्ष के स्थान पर राष्ट्र निर्माण की भावना को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। यही विचार आज भी उसे भारत के श्रमिक आंदोलन की सबसे विशिष्ट और प्रभावशाली संस्था बनाता है और साथ में श्रम क्षेत्र का सबसे बड़ा संगठन भी।

नसीर का दादा था, अंग्रेजों का पीट्ठू!

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विष्णु शर्मा

मुम्बई। नसीरुद्दीन शाह, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘जाहिल’ कहकर तीखी आलोचना की, खुद एक ऐसे खानदान से ताल्लुक रखते हैं जिसकी जड़ें 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के साथ खड़ी होने में हैं। शाह के परदादा (कुछ स्रोतों में परदादा या परपरदादा) जन-फिशान खान (सैय्यद मुहम्मद खान) अफगानिस्तान से आए एक कुख्यात मर्सिनरी लीडर थे।


जन-फिशान खान का नाम ही ‘जान बिखेरने वाला’ था। उन्होंने करीब 5,000 अफगान लड़ाकों-लुटेरों की टोली का नेतृत्व किया, जो किराए पर फौज उपलब्ध कराने का धंधा करते थे। 1857 की क्रांति से ठीक तीन महीने पहले, फरवरी में, उन्हें भारत में बगावत की खबर लगी। सबसे पहले उन्होंने अंग्रेजों को चेताया। जब मेरठ में विद्रोह फूटा, तो खान ने अपने घुड़सवारों की टुकड़ी लेकर ब्रिटिश जनरल विल्सन की मदद की। उनके लोग मेरठ, दिल्ली और झांसी तक अंग्रेजों के साथ लड़े।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीरगति में इन अफगान लड़ाकों की भूमिका महत्वपूर्ण बताई जाती है। क्रूरता के लिए मशहूर ये सैनिक विद्रोहियों के खिलाफ अंग्रेजों की जीत में सहायक साबित हुए। इनाम में ब्रिटिश सरकार ने खान खानदान को मेरठ के पास सरधना में 10,000 एकड़ विशाल जागीर, नवाब की उपाधि, एक हजार रुपये मासिक पेंशन दी। तुलना करें तो 70 साल बाद महात्मा गांधी को महज 100 रुपये की पेंशन मिली थी।

आज उनका वंशज नसीरुद्दीन शाह देश के लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री को ‘जाहिल’ कहकर गाली दे रहा है। एक कलाकार जो खुद अपने पूर्वजों के इतिहास से अनजान दिखता है या उसे छिपाना चाहता है।

यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि दोहरे मापदंड की है। जो लोग इतिहास को तोड़-मरोड़कर राष्ट्रवाद सिखाते हैं, उन्हें खुद अपने घर के आईने में झांकना चाहिए। भारत आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, जबकि कुछ खानदान पैसे और जागीर के लालच में अंग्रेजों का साथ दे रहे थे।

वोट से बदलाव लाइए, हिंसा या गालियों से नहीं। लेकिन इतिहास को याद रखिए—क्योंकि जिनके घर शीशे के होते हैं, उन्हें दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए।

संसद तक प्रदर्शनकारियों की पहुंच: सुरक्षा चूक या ढुलमुल नीति?

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अनीता

दिल्ली : भारतीय लोकतंत्र की सबसे पवित्र संस्था संसद तक हजारों प्रदर्शनकारियों का पहुंच जाना मात्र एक घटना नहीं, बल्कि गहरी चिंता का विषय है। जब NEET पेपर लीक जैसे संवेदनशील मुद्दे पर छात्र, अभिभावक और युवा सड़कों पर उतर आए, तो उनकी आवाज़ संसद की सीढ़ियों तक गूंज गई। सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी संसद की नाक तक कैसे पहुंच गए? क्या यह सुरक्षा एजेंसियों की चूक थी या सरकार का जानबूझकर अपनाया गया ढुलमुल रवैया?

सरकार और खुफिया एजेंसियों के पास अगर पहले से कोई इनपुट नहीं था, तो यह और भी गंभीर है। एक ऐसा मुद्दा जो देश के हर बच्चे और माता-पिता से जुड़ा है, उसकी गंभीरता को समझने में कहीं कोई कमी तो नहीं रही? लाखों युवा डॉक्टर और इंजीनियर बनने के सपने देखते हैं। उनके माता-पिता घर-खेत बेचकर, कर्ज लेकर उन्हें पढ़ाते हैं। ऐसे में पेपर लीक न केवल उनकी मेहनत पर पानी फेरता है, बल्कि पूरे सिस्टम पर भरोसा भी तोड़ता है। इस संवेदनशील मुद्दे पर जितना कम राजनीतिक खेल खेला जाए, उतना बेहतर होता।

दुर्भाग्य से मीडिया कवरेज और घटनाक्रम यह इशारा कर रहे हैं कि इस बार कोई मीडिया मैनेजमेंट नहीं किया गया। ठीक वैसे ही जैसे राम मंदिर चंदा संग्रह में कोई गड़बड़ी सामने आई तो उस पर भी चुप्पी साध ली गई। समाधान की बजाय मुद्दा लटकता रहा और अब “कॉकरोच की दुकान” फिर सज रही है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान और गृह मंत्री अमित शाह की साढ़े चार घंटे लंबी बैठक में पीयूष गोयल और किरन रिजिजू भी शामिल हुए, लेकिन न तो कोई ठोस निष्कर्ष आया और न ही आने वाले दिनों की रणनीति स्पष्ट हुई। ऑफ द रिकॉर्ड जो चर्चाएं चल रही हैं, वे निपेन्द्र मिश्रा वाले एपिसोड की याद दिलाती हैं। कौन किसके साथ खड़ा है, यह राजनीतिक गणित अलग है, लेकिन जनता का मुद्दा अलग है।

NEET पेपर लीक अब केवल एक परीक्षा का सवाल नहीं रहा। यह लाखों परिवारों की आशाओं और भविष्य का सवाल है। प्रदर्शनकारियों को संसद तक पहुंचने देने को अगर “प्रेशर पॉलिटिक्स” कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। पुलिस की लाइन हाज़िर व्यवस्था को सजा की जगह “सेफ मोड” माना जाता है। इंस्पेक्टर, दरोगा या सिपाही कुछ महीने आराम से निकाल लेते हैं और फिर बेहतर पोस्टिंग पा लेते हैं। इस बार भी यही रणनीति अपनाई गई तो मामला शांत हो सकता था। रिसफ़्लिंग के बहाने लाइन हाज़िर करा दिया जाता, संगठन और कैबिनेट दोनों के दरवाजे खुले रहते।

समय आ गया है कि सरकार इस मुद्दे को केवल नियंत्रण की नजर से न देखे। संवेदना, पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई जरूरी है। अगर संसद की सुरक्षा और प्रतिष्ठा तक चुनौती पहुंच रही है, तो इसका मतलब है कि जड़ में कुछ गड़बड़ है। राजनीतिक लाभ की बजाय छात्रों के भविष्य को प्राथमिकता दी जाए। अन्यथा यह आग सिर्फ सड़कों पर नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को भी जला देगी।

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