एक की बदकिस्मती, दूसरे का बोनस और सब की सांसों का बिल!

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पटना । सुबह अगर आंख खुलते ही जलन हो, जैसे किसी ने मिर्ची का स्प्रे मार दिया हो, गले में खराश चिपक जाए मानो कोई पुराना कर्ज़ वसूल करने आ गया हो, और फेफड़े ऐसे खांसें जैसे ईएमआई की आखिरी किस्त पर डिफॉल्ट हो गया हो, तो घबराइए मत! बधाई हो, आप “विकास-प्रदत्त ऑक्सीजन” का मजा ले रहे हैं। गहरी सांस लीजिए, ये बदबू नहीं, बल्कि “सक्सेस की सिग्नेचर फ्रेग्रेंस” है। मुफ्त की हवा है जी, और मुफ्त में जो मिले, वो सबसे प्रीमियम क्वालिटी का होता है, बस एक्सपायरी डेट चेक मत करना!

ईश्वर का लाख-लाख शुक्र कि वो “ओवर-प्योरिटी” का पिछड़ा जमाना खत्म हुआ, जहां हवा साफ होती थी और लोग बिना मास्क के घूमते थे। हमने सालों की मेहनत से ये ज्ञान अर्जित किया है कि प्रदूषण कोई समस्या नहीं, बल्कि “इम्युनिटी बूस्टर” है, जैसे वो महंगे सप्लीमेंट्स, बस ये फ्री में मिलता है। जो ज्यादा खांस रहा है, वही ज्यादा आगे बढ़ रहा है; जो सांस रोककर जी रहा है, वही असली योगी है। कोरोना तो बस ट्रेलर था, असली फिल्म तो ये रोज़ाना का स्मॉग-शो है!

स्मॉग? वो ग्रे चादर है जो हमें नीले आसमान की “टॉक्सिक पॉजिटिविटी” से बचाती है। नीला आसमान? उफ्फ! उससे विटामिन-D की ओवरडोज हो जाती थी, और ज्यादा सेहत तो किसी ग्लोबल साजिश से कम नहीं। स्मॉग हमें असली बराबरी सिखाता है: अमीर-गरीब सबकी आंखें जलेंगी, सांसें अटकेंगी, ये है असली “सबका साथ, सबका सफरिंग”! दिल्ली-NCR में तो स्मॉग इतना घना है कि लोग एक-दूसरे को देखकर कहते हैं, “भाई, तू तो फोटोशॉप्ड लग रहा है!” और वो AQI? 300, 400, 500 ? वो तो हमारा नेशनल प्राइड स्कोर है, जितना हाई, उतना हाई-क्लास!

हमारी नदियां भी अब शर्मीली पारदर्शिता छोड़कर “मल्टी-कलर थेरपी” में लग गई हैं। रंग-बिरंगी, झागदार, हैवी मेटल्स से लबालब, पूरी बॉडी डिटॉक्स पैकेज! एंड होली रिवर्स? वो अब “इंडस्ट्रियल स्पा” बन गई हैं, जहां फैक्टरियां अपना “वेस्ट” डंप करती हैं और हम “पवित्र स्नान” कहते हैं। साफ पानी? सिर्फ पूंजीवादी वहम था, असली पानी वही जो डॉक्टरों को अमीर बनाए, हॉस्पिटल्स को फुल रखे। यमुना पर फोम पार्टी? फ्री की है, बस स्विमिंग सूट की जगह PPE सूट पहनना!

जंगलों को हमने “आजादी” दी है, पेड़ों की बेड़ियां काटकर उन्हें “फ्रीडम फाइटर” बना दिया। वृक्ष तो प्रगति के रोडब्लॉकर थे, चिड़ियों की चहचहाहट ऑफिस प्रोडक्टिविटी में डिस्टर्बेंस। छाया? वो आलस्य फैलाती थी, अब सूरज की धूप में हम “नेचुरल टैनिंग” लेते हैं। पहाड़ों को नंगा करके हमने उनका असली मकसद उजागर किया: खनन, पूजन, बेचन, फिर डेवलपमेंट! भूस्खलन? यानी ग्रैविटी के चंगुल से मुक्ति । बाढ़? प्रकृति की “फ्लैशबैक” जहां पानी अपनी पुरानी यादें ताजा करने आता है, और हमारे घरों को फ्री वॉटर पार्क बना देता है। केदारनाथ, चमोली, ये तो बस ट्रेलर हैं, असली फिल्म तो हिमालय के माइनिंग प्रोजेक्ट्स में है!

हमारे प्रबुद्ध गुरु, जो मोटिवेशनल लेक्चर देते हैं, समझाते हैं कि बीमारी दुख नहीं, “ओपॉर्चुनिटी” है। वायरस? मेडिकल इंडस्ट्री के “एंजेल इन्वेस्टर”! जितनी महामारी, उतनी रिसर्च ग्रांट्स; जितनी खांसी, उतने फार्मा शेयर्स। अस्पतालों के गलियारे गुलजार, स्टॉक्स स्काईरॉकेट, बरकत हो तो ऐसी! कोविड ने हमें मास्क की “एकजुटता” सिखाई, अब स्मॉग ने N95 को नेशनल यूनिफॉर्म बना दिया। थोड़ा “मैनेज्ड पैनिक” जरूरी है, वरना नागरिक सवाल पूछने लगेंगे, like “ये फैक्टरियां क्यों नहीं बंद?” और सवाल? वो विकास के सबसे बड़े दुश्मन हैं, जीडीपी गिरा देते हैं!

गरीबी को हमने “रिब्रैंड” किया है, अब वो शर्म नहीं, “लाइफस्टाइल ब्रांड” है। ऑस्कर-विनिंग फिल्में बनती हैं, TED टॉक्स चमकते हैं। “मिनिमलिज्म” अनिवार्य: कम सामान, कम चिंता, टपकती छत “माइंडफुलनेस” सिखाती है, भूख “इंटरमिटेंट फास्टिंग”। क्या शानदार “सेल्फ-हेल्प” प्रोग्राम! उधर हमारे दूरदर्शी नेता “आकांक्षी प्रचुरता” का अभ्यास करते हैं, प्राइवेट जेट्स से उड़ते हुए, ट्रैफिक के ऊपर से। वे हमें बताते हैं कि ऊंचाई पर नैतिकता के नियम अलग: “नीचे वाले सांस लें या न लें, हम तो क्लीन एयर जोन में हैं!” शोर? वो परेशानी नहीं, “लाइफ का साउंडट्रैक”, हॉर्न, ड्रिल, बीप, सब कहते हैं, “सिस्टम जिंदा है!” शांति में तो “खतरनाक विचार” पैदा होते हैं, जैसे “पर्यावरण कानून लागू क्यों नहीं?”

इतिहास ने सिखाया: युद्ध ही शांति है (आर्म्स इंडस्ट्री चलती है), अज्ञानता ही ताकत (ज्ञान आज्ञाकारिता बिगाड़ देता है), और विनाश ही विकास (फोटोज अच्छी आती हैं, फंडिंग मिलती है)। फिर भी, खांसी, बाढ़ और सायरन के बीच एक मनहूस सवाल कौंधता है: क्या हमें ऐसी हवा की जरूरत नहीं जो आंखें न जलाए?

और हां, हमारे प्लास्टिक महासागर! वाह! समुद्र तटों की “मॉडर्न आर्ट” सजावट, मछलियों की “प्लास्टिक डाइट”, जो उन्हें “इवॉल्व” करा रही है। पक्षियों के रंगीन खिलौने, जो सदियों तक अमर रहेंगे, हमारी “उन्नति का इटरनल लोगो”। ट्रैफिक जाम? वो तो “सोशल नेटवर्किंग इवेंट”, घंटों कार में बैठकर फैमिली बॉन्डिंग, पड़ोसी से गपशप, हॉर्न की “सिम्फनी” में मेडिटेशन। तेज रफ्तार दुर्घटनाएं लाती थी, अब धीमी गति में “लाइफ का रस” घोलिए, और अगर स्टक हो गए, तो ऑनलाइन शॉपिंग कर लीजिए!

जलवायु परिवर्तन? प्रकृति का “सरप्राइज गिफ्ट बॉक्स”! लंबी गर्मियां, AC और स्विमिंग पूल बिकेंगे। बाढ़ का मतलब नए “एडवेंचर टूरिज्म” स्पॉट्स। सूखा यानी पानी की “ट्रू वैल्यू” समझ आएगी। बर्फ पिघले? बढ़िया! आर्कटिक में “लक्जरी रिसॉर्ट्स” खुलेंगे, इंडियन टूरिस्ट्स के लिए स्पेशल “मेल्टिंग आइस” पैकेज। कॉर्पोरेट देवता कहते हैं, प्रदूषण “आर्थिक विकास का मीठा फल” है, अस्पताल, दवाइयां, एयर प्यूरीफायर, मास्क, सबका बूमिंग बिजनेस! गरीबों को “फ्री स्मॉग”, अमीरों को “प्राइवेट जेट की शुद्ध हवा”, ये है असली “इनक्लूसिव ग्रोथ”! ये सड़न भी एक “फफूंद वाली दवा” है। हम सब इसके आदी हो चुके हैं, क्योंकि प्रगति का ये “हेल्दी पॉटलक” कभी खत्म नहीं होता, बस स्वाद बदलता रहता है: आज स्मॉग, कल प्लास्टिक, परसों… कौन जाने? चीयर्स टू मोर डेवलपमेंट! बस, सांस लेते रहिए, जब तक ले सकें!

मोहब्बत के दीवानों को कोर्ट से नई राहत, नया हौसला

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मुंबई : मोहल्ले की उस तंग गली में, हल्के पीले बल्ब की रोशनी तले, अब दो लोग डरकर नहीं मिलते। न उनके हाथ में फर्जी काग़ज़ हैं, न झूठे वादे, सिर्फ़ एक अदालत का आदेश है, जिसने उनके साथ रहने के हक़ को सरकारी शक और सामाजिक पहरेदारी से ऊपर रख दिया है। दरवाज़े के उस पार अब खौफ़ कम है। पहली बार क़ानून उनके साथ खड़ा दिखता है, उनके ख़िलाफ़ नहीं।
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भारत की न्यायपालिका में इन दिनों एक खामोश लेकिन गहरा बदलाव आकार ले रहा है। यह बदलाव अदालतों के ठोस, सोचे-समझे फैसलों के ज़रिये रोज़मर्रा की ज़िंदगी में उतर रहा है। न्यायपालिका संविधान की रोशनी में समाज के पुराने “नैतिक” समझौतों को नए सिरे से परख रही है, खासकर निजी रिश्तों के मामले में।

इन फैसलों का संदेश सीधा है: जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक घबराहट आमने-सामने हों, वहां संविधान को प्राथमिकता मिलेगी, परंपरा को नहीं। यह वह कानून है जो हमदर्दी, गरिमा और इंसानी अनुभव को उन रूढ़ियों से ऊपर रखता है, जो प्रेम, साथ रहने और साथी चुनने के फैसलों को संदेह की निगाह से देखती रही हैं। अदालतें लगातार याद दिला रही हैं कि संविधान का अनुच्छेद 21, गरिमा के साथ जीने का अधिकार, प्रेम और साझेदारी के चुनाव को भी अपने भीतर समेटे है। न्यायपालिका अब परंपरा की चौकीदारी नहीं, बदलती ज़िंदगियों की संवैधानिक संरक्षक बनती दिख रही है।

सबसे साफ़ बदलाव लिव-इन रिश्तों को लेकर न्यायिक दृष्टिकोण में नज़र आता है। जो संबंध लंबे समय तक समाज की नज़रों में संदिग्ध और कानून के लिए असहज रहे, उन्हें अदालतें अब सामाजिक यथार्थ मानकर सुरक्षा के दायरे में ला रही हैं। सुप्रीम कोर्ट और कई हाई कोर्ट्स ने माना है कि यदि कोई जोड़ा लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहा है, तो धारा 125 CrPC जैसे भरण-पोषण के प्रावधानों को “सिर्फ़ काग़ज़ी शादी” की संकीर्ण शर्त में नहीं बांधा जा सकता। अदालतों ने स्पष्ट किया है कि धारा 125 कोई तकनीकी कानून नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा का औज़ार है, जिसका उद्देश्य छोड़ी गई या आर्थिक रूप से कमज़ोर महिला और बच्चों की हिफ़ाज़त है। अब सवाल स्टैम्प पेपर का नहीं, बल्कि यह देखने का है कि रिश्ता व्यवहार में शादी जैसा था या नहीं।

न्यायपालिका ने एक और नाज़ुक मोड़ पर संतुलित हस्तक्षेप किया है। जब दो बालिग लोग वर्षों तक आपसी सहमति से साथ रहते हैं और रिश्ता टूट जाता है, तो क्या हर ब्रेकअप आपराधिक मुक़दमे में बदल जाना चाहिए? हालिया फैसलों में अदालतों ने साफ़ कहा है कि “शादी का झूठा वादा” और लंबे समय तक चला सहमति-आधारित रिश्ता एक जैसे नहीं हैं। जहां रिश्ता आपसी सहमति से चला हो, वहां सिर्फ़ अलगाव को आपराधिक आरोपों का हथियार नहीं बनने दिया जा सकता। यह सोच दोहरी सुरक्षा देती है, एक तरफ़ यौन हिंसा के असली मामलों की गंभीरता बनी रहती है, दूसरी तरफ़ भावनात्मक टूटन को आपराधिक बदले में बदल देने की प्रवृत्ति पर रोक लगती है।
अंतर-धार्मिक जोड़ों की सुरक्षा से जुड़े फैसले इस बदलाव की सबसे मानवीय तस्वीर पेश करते हैं। सुप्रीम कोर्ट बार-बार दोहरा चुका है कि बालिग नागरिकों को अपना साथी चुनने का अधिकार संविधान ने दिया है, और राज्य का कर्तव्य उस अधिकार की रक्षा करना है, न कि उस पर शक करना। अनुच्छेद 21 के तहत “अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीने” की आज़ादी, धर्म से परे शादी करने या साथ रहने के अधिकार को भी शामिल करती है। कई हाई कोर्ट्स ने धमकियों और हिंसा के डर से जूझ रहे अंतर-धार्मिक जोड़ों को तुरंत पुलिस सुरक्षा देने का आदेश देते हुए साफ़ कहा है कि यह पारिवारिक “इज़्ज़त” का नहीं, संवैधानिक अधिकार का सवाल है। “लव जिहाद” जैसे राजनीतिक नारों और धर्मांतरण-विरोधी कानूनों के शोर के बीच अदालतें यह रेखांकित कर रही हैं कि कोई भी कानून प्रेम और आस्था की निजी पसंद को अपराध घोषित करने का औज़ार नहीं बन सकता।

IPC की धारा 498A को लेकर भी न्यायपालिका ने संतुलन का रास्ता चुना है। एक ओर इसे वैवाहिक हिंसा और दहेज उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के लिए ज़रूरी सुरक्षा कवच माना गया, तो दूसरी ओर इसके दुरुपयोग पर सख़्त चेतावनी भी दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि सामान्य, अस्पष्ट और सामूहिक आरोपों के आधार पर आपराधिक कार्रवाई नहीं चल सकती। क्रूरता साबित करने के लिए ठोस, विशिष्ट घटनाओं और प्रमाणों की ज़रूरत है। दशकों पुराने, सबूतहीन मामलों को ख़ारिज करते हुए अदालतों ने यह भी कहा कि झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए आरोप न्याय को उतना ही नुकसान पहुंचाते हैं जितना असली अपराधों पर चुप्पी।

इन तमाम फैसलों के बीच एक बड़ा, लगभग अनकहा संकेत छिपा है। कानून, जो कभी परंपरा और पितृसत्ता का रखवाला लगता था, अब बदलते भारत की जटिल सच्चाइयों को सुनने लगा है। अदालतें “स्थिर सामाजिक व्यवस्था” बचाने से ज़्यादा इस सवाल से जूझ रही हैं कि क्या संविधान का वादा असली ज़िंदगियों, उलझे रिश्तों और असहज चुनावों के साथ न्याय कर रहा है। ऐसे दौर में, जब प्यार, साथ रहना और अलग होना, सब कुछ राजनीति और भीड़-निर्मित नैतिकता तय करने लगी है, न्यायपालिका ने संवैधानिक तर्क, व्यक्तिगत गरिमा और समानता को प्राथमिकता देने का रास्ता चुना है।

अदालत में हथौड़े की आवाज़ आज भी गूंजती है, लेकिन अब वह सिर्फ़ आदेश नहीं लगती, वह एक भरोसे की तरह सुनाई देती है। यह भरोसा कि कम से कम न्यायालयों की चारदीवारी के भीतर, मोहब्बत करने, साथ रहने या अलग हो जाने की अपनी कहानी लिखने का हक़ कानून की भाषा में भी दर्ज हो सकता है, सावधानी के साथ, लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ।

सिंहासन बत्तीसी का बैताल

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भगवान सिंह

दिल्ली । जेम्स मिल का दुर्भाग्य था कि उस समय तक सिंधु सभ्यता का पता नहीं चला था, अन्यथा वह उसकी भी वैज्ञानिक व्याख्या कर देता। यह मौक़ा मार्शल को मिला और उसने अपनी भूमिका में कई तरह के शीर्षासन करके यह सिद्ध कर दिया कि न तो आर्य सिंधु सभ्यता से पहले भारत में थे न उसके निर्माता थे, न समकालीन थे, वे आए सिंधु सभ्यता के विनाश के बाद उस सभ्यता के ख़स्ताहाल उत्तराधिकारियों से सिंधु सभ्यता की सारी विशेषताएं अपना ली और उन बेचारों को ज़मीन जायदाद से तो बेदखल करके उन्हें भागने को तो बाध्य किया या दास बनाया ही, उनकी याददाश्त भी छीन ली क्योंकि उन्हें यह तो मानना ही पड़ा कि केवल आर्यों की परंपरा में विचार, विश्वास, संस्कार, नागर सभ्यता के सभी उपादान बचे हैं । मार्शल ने अपनी मनवाने के लिए कुछ हेराफेरी भी की थी पर वह पूरे वैज्ञानिक होते तो काम अधूरा न नहीं छोड़ते।

यह वैज्ञानिक इतिहासकारों का सौभाग्य था कि जो काम जेम्समिल से संभव न था और मार्शल ने जिसे अधूरा छोड़ दिया था उसे पूरा करने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला पुरातत्वविद मिल गया, जिसने सिद्ध कर दिया कि हिन्दू पाँच हज़ार साल से मुसलमानों पर अत्याचार करते आ रहे हैं । यह थे Five Thousand Years of Pakistan के लेखक मार्टिमर ह्वीलर। जिनको विज्ञान की समझ नहीं है, वे कहेंगे, पाँच हज़ार साल पहले तो इस्लाम ही नहीं था फिर मुसलमान कैसे हो गए? पाकिस्तान 1947 में बना फिर वह 5000 साल का कैसे हो गया? यह सतही नज़र वालों की समस्या है। विज्ञान उसे देख लेता है जो नंगी आँखों दिखाई नहीं देता । उसे जान लेता है जो मोटी अकल वाले नहीं जान पाते। किसी भारतीय मार्क्सवादी से पूछिए । उसकी खोपड़ी में विज्ञान ही विज्ञान भरा रहता है, इतना विज्ञान कि ज्ञान के लिए जगह ही नहीं बची है । वह बताएगा कि हिंदुओं ने जो पहले अपने को आर्य कहते थे और ढोर चराते हे, उनका दिमाग़ गोबर की सुलभता से इतना उपजाऊ हो गया था कि बिना किसी भूल-चूक के किसी आलमारी में अटने वाला साहित्य अपनी खोपड़ी में भर लेते थे और फिर भी दिमाग़ का एक हिस्सा दार्शनिक चिंतन के लिए ख़ाली रहता था, इसलिए हिंदू दार्शनिक हुआ करते थे। परंतु ऐसे दार्शनिक केवल भारत में और वह भी तभी तक पैदा होते थे, जब तक ढोर चराना जारी रहा।

हम अपनी ओर से बता दें कि वे त्रिकालदर्शी थे, क्योंकि वर्तमान को अपनी आँख से, भविष्य को ढोरों की नज़र सें देखते थे, और जो बीत गया वह तो सबको देखा जाना होता है। सो उन्होंने पाँच हज़ार साल पहले ही जान लिया था कि एक न एक दिन यहाँ पाकिस्तान बनेगा और यहाँ मुसलमानों का राज होगा। इस्लाम तो सृष्टि के आदि से अरबी ज़बान में अल्लाह के पास था ही। मुहम्मद साहब पर तो वह बहुत बाद में आयद हुआ था। जहाँ आदमी की नज़र न जाए, वहाँ जानवरों की पहुँच जाती है । उनकी आँखों यह भी देख लिया होगा कि इन्हीं सिंधियों के बच्चे इस्लाम क़बूल करेंगे। अब क्या था! उन्होंने आव देखा न ताव । उनके नगरों पर हमला कर दिया ।

आप कहेंगे नगरों की इतनी मज़बूत दीवारें भला टूट कैसे सकती हैं । तो यहीं आप चूक करते हैं । हिमालय पार करते समय उन्होंने ढोरों की पीठ पर बड़े बड़े पत्थर लाद लिए थे कि आगे काम आएँगे । इन्हें ही इन्द्र का वज्र कहा गया है । और दीवारें तोड़ने के बाद उन्होंने नागरिकों का वैसा ही संहार किया जैसे तैमूर लंग किया करता था । विश्वास नहीं होता । हाथ कंगन को आरसी क्या! ह्वीलर ने कत्ल किए गए लोगों के कंकाल पेश कर दिए और अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा से नरसंहार का आँखों देखा हाल प्रस्तुत कर दिया। Five Thousand Years of Pakistan, 1950 ह्वीलर ने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण से अवकाश लेने के बाद, पाकिस्तान में बैठकर, उसका पुरातत्व सलाहकार रहते हुए लिखा था, जिसका आमुख पाकिस्तान के वाणिज्य और शिक्षामंत्री फजलुर्रहमान ने लिखा था और वह इस पर इतने फ़िदा थे कि उन्होंने कहा था कि इस कहानी को अगली पीढ़ियों को पढ़ाया जाना चाहिए । पाकिस्तान की पाठ्यपुस्तकों के लेखन में यह वैज्ञानिक इतिहास बहुत मददगार हुआ।

पर वैज्ञानिक इतिहास की ज़रूरत तो पाकिस्तान से अधिक पाकिस्तान बना कर भी वहां न गए, या न जाने वाले, हिंदुस्तानियों को थी। जेम्स मिल के बाद भारतीय वैज्ञानिक इतिहासकारों को अपना स्वधर्मा ह्वीलर मिला जिन्होंने अपने इतिहास लेखन के लिए माडल पाकिस्तानी पाठ्य पुस्तकों को चुना। और वह भी तब जब 1964 में डेल्स द्वारा मोहेंजोदड़ो से मिले कंकालों की बारीकी से छीनबीन करने के बाद 1950 में नरसंहार को मिथक सिद्ध कर दिया गया और 1966 और उससे बाद के संस्करणों में उनको स्वीकार करना पड़ा इतनी विशाल नगर सभ्यता का अंत किसी नरसंहार से नहीं हो सकता। इसका ह्रास और नागरिकों का विस्थापन हुआ था।

आश्चर्य की बात यह है कि उन अकाट्य प्रमाणों को देखकर भी पहले ह्वीलर ने नज़रअंदाज़ क्यों किया? ह्वीलर बहुत अनुभवी, दूरदर्शी और सधे हुए पुरातत्वविद थे उनकी नजर में इन बातों में से कोई नजर नहीं आई जिनकी ओर डेल्स और दूसरों का ध्यान चला गया। वह स्वयं मानते हैं:

And the verdict of those who have dug into and through them is unanimous: they represent progressive degeneration. One thing at least is clear about the end of Mohenjodaro : the city was already slowly dying before its ultimate end…What is not conjectural is the intermittent impact of deep and prolonged flooding, in excess of the annual swelling of the river by normal rains and snow-melt…At a number of points this abnormal flooding can still be detected in the form of deep deposits of silty clay, thick layers of collapsed building-material mixed with clay, and compensating mud-brick platforms upon which the inhabitants had at different levels sought to rebuild their town after flood-disaster. Many of these phenomena occur high above the present flood-plain and imply long and overriding encroachments of mud for which some special cause must be adduced. …cause must be adduced….It has further been observed that these flood-deposits are silty clay of still-water origin, as distinct from those of the freely flowing, seasonal floods normal to the river-system. …The whole problem is now in the hands of the hydrologist and the geologist and may be left there for a while.

आत्मसमर्पण करने के बाद घालमेल करने की कोशिश क्यों की और नरसंहार की उनकी मान्यता के निषेध को चलन सा कह कर उसे पुनरुज्जीवित करने का बहाना क्यों निकाल लिया :

It has of late been fashionable to decry the witness of sprawling groups of skeletons which are liable to encumber the later strata of Mohenjo-daro.

फिर आंखों देखा चित्र वाली घिसीपिटी डिस्क क्यों चलाने लगे, जिसका केवल एक अंश देना ही पर्याप्त होगा:

A public well-room in the DK Area was the scene of a tragedy which involved four deaths. The well was approached from the higher level of the adjacent ‘Low Lane’ by a short flight of brick steps. ‘On the stairs were found the skeletons of two persons, evidently lying where they died in a vain endeavour with their last remaining strength to climb the stairs to the street/One of them was probably a woman. It appears that the ‘second victim fell over backwards just prior to death’. Remains of a third and a fourth body were found close outside.’ There seems no doubt that these four people were murdered … It can be regarded as almost certain that these skeletal remains date from the latter end of the occupation of Mohenjo-daro and are not later intrusions. The fact that some of the bones of one of these skeletons rested on the brick pavement of the well-room and that the skull of another lay on the floor of a (brick-lined) sediment-pit (adjoining the entrance) prove beyond doubt that both well-room and pit were in actual use when the tragedy took place.’ And these were of the latest architectural period on the site.

वह जानते थे कि इससे आर्यों के आक्रमण की पुष्टि तो नहीं होती और इसे स्वीकार भी किया (Who were the destroyers? We shall not know. It may be that some hill-tribe fell upon the enfeebled city and put it to the sword. …What brought the final blow the coup the grace to the dying cilization? Years ago I suggested the Aryan invaders from the north-west of the subcontinent as ultimate agents of destruction. This may not be proved and may be quite incorrect, but it is not an impossibility. और इस तरह बैताल लौट कर उसी डाल पर। वह हड़प्पा का वैदिक नाम हरियूपीया का सुझाव देने वालों के तर्क को मान लेते हैं और इसको विजेता आक्रमणकारियों द्वारा दिया गया नाम कह कर अपनी बात पर अड़े रहते हैं और उन्हीं दलीलों को दुहराते हैं जिनसे कुछ सिद्ध नहीं होता।

पर इसके बाद भी वह हमारे वैज्ञानिक इतिहासकारों द्वारा सबसे भरोसेमंद इतिहासकार के रूप में चुन लिए जाते हैं और लगभग दो दशक पहले के पाकिस्तानी माडल पर भारत की पाठ्यपुस्तकें लिखवाई जाती हैं। विज्ञान में यह चलता है।

(सोशल मीडिया से साभार)

मुक्ति आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका महत्वपूर्ण

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भोपाल : भारत की धरती का दक्षिणी अंग गोवा 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र नहीं हो पाया था । वहाँ पुर्तगालियों की सत्ता बनी रही । गोवा मुक्ति केलिये अलग से आँदोलन हुआ । भारत का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ से गोवा मुक्ति आंदोलन केलिये जत्थे नहीं पहुँचे। गोवा मुक्ति आंदोलन में जन जाग्रति करने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही ।

पन्द्रह अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजों से मुक्त हुआ लेकिन भारत के कुछ ऐसे भूभाग भी थे जो स्वतंत्र नहीं हो सके थे। इनमें पांडिचेरी पर फ्रांसीसी और गोवा, दमन और दीव पर पुर्तगालियों की सत्ता बनी रही । अंग्रेजों की तरह पुर्तगाली भी व्यापारी बनकर ही भारत आये थे । उनका पहला जत्था वास्कोडिगामा के नेतृत्व में मई 1498 में भारत आया था और गुजरात के कालीकट से अपना व्यापार शुरु किया । व्यापार के बहाने दक्षिण भारत में पैर जमाये और 1510 में गोवा पर अधिकार कर लिया । पुर्तगालियों ने गोवा को ईसाई धर्म प्रचार का केन्द्र बनाया था इसीलिए चर्च के संकेत पर अंग्रेजों ने भी गोवा में बहुत हस्तक्षेप नहीं किया और गोवा पर पुर्तगालियों की सत्ता लगभग साढ़े चार सौ वर्षों तक बनी रही।

भारत में स्वतंत्रता आँदोलन जब शुरु हुआ तब गोवा लगभग छूटा हुआ था । गोवा में स्वतंत्रता आँदोलन 1940 के आसपास आरंभ हुआ । गोवा मुक्ति के लिये आँदोलन करने वालों में सबसे पहला एक प्रमुख नाम महादेव शास्त्री जोशी का आता है । उन्होने मानों अपना पूरा जीवन ही गोवा मुक्ति केलिये समर्पित कर दिया था । उनकी पत्नि सुधाताई भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर सक्रिय रहीं। इस दंपत्ति ने गोवा मुक्ति के लिये देशभर के सभी राजनैतिक और सामाजिक संगठनों से संपर्क किया । इनमें काँग्रेस, हिन्दु महासभा, आर्य समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठन प्रमुख थे । दोनों पति पत्नि कयी बार गिरफ्तार हुये । 1946 में उन्हें गोवा से बाहर कर दिया गया । तब उन्होंने अपना केन्द्र पुणे बनाया । यहाँ उनका संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वातंत्र्यवीर दामोदर सावरकर से बना और आँदोलन को गति मिली । वर्ष 1946 गोवा मुक्ति आंदोलन के लिये एक मील का पत्थर साबित हुआ । एक ओर गोवा प्रशासन के दमन से स्वतंत्रता समर्थक स्थानीय नागरिकों में आक्रोश आया दूसरी डॉ. राम मनोहर लोहिया की मडगांव में एक सभा हुई । डा लोहिया गोवा में अपने किसी अन्य कार्य केलिये आये थे लेकिन उन्होंने गोवा में सरकार का आतंक देखा तो वे रुक गये और उन्होंने मंडगाव में सभा की । इससे स्थानीय स्तर पर स्वतंत्रता का वातावरण बना ।

लेकिन इस संघर्ष में कुछ गतिरोध आया । भारत विभाजन की त्रासदी और गाँधीजी की हत्या से उत्पन्न उथल पुथल से जहाँ भारत के अन्य भागों विशेषकर महाराष्ट्र से इस आँदोलन को अधिक सहायता नहीं मिल सकी वहीं गोवा सरकार ने चर्च को सक्रिय करके स्थानीय नागरिकों में विभाजन की नींव रखी । इन दोनों कारणों से गोवा मुक्ति आंदोलन कुछ धीमा हुआ । इसी बीच डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर आँदोलन का आव्हान किया था उस ओर भी पूरे भारत का ध्यान आकर्षित हो गया था ।

गोवा मुक्ति के लिये आँदोलन में गति 1952 के बाद आई । यह सक्रियता दोनों ओर बढ़ी । भारत के विभिन्न स्थानों पर भी जाग्रति अभियान चले और गोवा की स्थिति का आकलन करने केलिये विभिन्न सामाजिक और राजनेताओ का आवागमन भी गोवा में बढ़ा । गोवा मुक्ति आन्दोलन के लिये दो प्रमुख केन्द्र बनाये गये । एक मुम्बई और दूसरा पुणे । इन दोनों केन्द्रों के संचालन के व्यवस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हाथ में थी । मुम्बई में तो स्वतंत्रवीर दामोदर सावरकर भी गोवा जाने वाले मुक्ति आंदोलन कारियों का उत्साह वर्धन कर रहे थे । गोवा प्रशासन ने आंदोलन को दबाने का पूरा प्रयास किया और भारत सरकार से सहयोग करने की बात भी की । पुर्तगाल सरकार चाहती थी कि गोवा उसी तरह एक स्वतंत्र इकाई रहे जैसे सिक्किम और नेपाल थे। ऐसे ही तनाव और तैयारी में लगभग दो वर्ष निकले । लेकिन 1954 के बाद गोवा मुक्ति आंदोलन में गति आई । पूरे भारत में सभाओं और जुलूस का क्रम चला और एक गोवा मुक्ति के लिये एक निर्णायक आँदोलन की रूपरेखा बनी । इसके लिये 15 अगस्त 1955 का दिन निश्चित हुआ । 15 अगस्त भारत की स्वतंत्रता का दिन था । योजना बनी कि उसदिन भारतीय तिरंगा फहराकर गोवा को पुर्तगाल के आधिपत्य से मुक्त करा लिया जाये । इसके वर्ष 1954 में पूरे देश में जाग्रति अभियान चला ।

गोवा मुक्ति आन्दोलन में यद्यपि पूरे देश में सभाएँ हुई, जाग्रति केलिये जुलूस निकले और जत्थे गोवा गये । फिर भी इसका सर्वाधिक जोर महाराष्ट्र में रहा । महाराष्ट्र में इस जाग्रति के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका मानी महत्वपूर्ण मानी जाती है । संघ ने पहले स्वतंत्रता आँदोलन और फिर सामाजिक आँदोलनों में जो भी सक्रियता दिखाई अपने नाम और बैनर का उपयोग नहीं किया ।जहाँ जो नेतृत्वकर्ता थे उन्हीं को सहयोग किया । स्वतंत्रता आँदोलन में यदि डाक्टर हेडगेवार जेल गये तो कांग्रेस नेतृत्व में ही गये थे । इसी प्रकार 1942 के भारत छोड़ो आँदोलन में भी संघ की भूमिका यही थी । गोवा मुक्ति आँदोलन महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महादेव शास्त्री जोशी और उनकी पत्नि सुधाताई दोनों का जीवन गोवा की मुक्ति केलिये समर्पित रहा । इनका संपर्क भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से था। इनके संपर्क से ही इस आँदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ी। महाराष्ट्र का ऐसा कोई गांव या कस्बा न बचा था जहाँ गोवा मुक्ति केलिये सभाएँ न हुई हों।

मध्यप्रदेश में गोवा मुक्ति आंदोलन ने 1952 के बाद जोर पकड़ा इसका सर्वाधिक जोर मालवा, मध्यभारत और भोपाल अंचल में रहा । मालवा में गोवा मुक्ति केलिये चेतना जगाने का काम राजाभाऊ महाकाल ने किया । राजाभाऊ संघ के प्रचारकथे । मालवा का ऐसा कोई कस्बा न बचा जहाँ राजाभाऊ ने सभाएँ न कीं हों। भोपाल क्षेत्र में भाई उद्धवदास मेहता की सक्रियता रही । उद्धवदास मेहता उन दिनों नगर संघ चालक थे उन्होंने भोपाल के अतिरिक्त सीहोर रायसेन बरेली आदि क्षेत्रों में यात्रा की । उनके साथ पं भगवान दास सारस्वत, ब्रजभूषण गोयल, नन्नूलाल चौधरी आदि की टोली थी । विदिशा क्षेत्र में निरंजन वर्मा ने, ग्वालियर क्षेत्र में ब्रज नारायण ब्रजेश ने और जबलपुर क्षेत्र में बाबूराव परांजपे की भूमिका महत्वपूर्ण रही थी । इन सभी का गहरा संपर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से रहा है ।

मध्यप्रदेश से जत्थे गोवा मुक्ति केलिये रवाना हुआ उनमें उज्जैन के जत्थे में सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद वाकणकर जी भी थे यह जत्था 9 अगस्त रवाना हुआ । जबकि इंदौर, जबलपुर से 10 अगस्त को और भोपाल से यह जत्था11 अगस्त को रवाना हुआ । योजनानुसार देशभर के सभी जत्थे मुम्बई पहुँचे वहाँ से गोवा रवाना हुये । मुम्बई और नासिक ही नहीं गोवा के समीप सभी भारतीय सीमाओं से गोवा केलिये परिवहन के साधन रोक दिये गये थे । सभी आँदोलन कारी पैदल ही मुम्बई से महाराष्ट्र और गोवा की सीमा पर स्थित पत्रादेवी केलिये रवाना हुये । इन जत्थों के पत्रादेवी में सभी जत्थों का स्वागत उस समय के प्रसिद्ध समाजसेवी श्री राणे, मोहन रानाडे, बालाजी पेंडाकर, मधु दंडवते, विश्वनाथ लंबदे आदि ने स्वागत किया । इस पूरे मार्ग जलपान की व्यवस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने ही की थी ।

गोवा सरकार की सेना ने पत्रादेवी में ही नाकाबंदी कर रखी थी । जत्थों ने तिरंगा हाथ में लेकर आगे बढ़ने का प्रयास किया । सेना ने रोका और गोली चालन कर दिया । इसमें तीस से अधिक कार्यकर्ता बलिदान हुये और सौ से अधिक घायल हुये । बलिदान होने वालों में उज्जैन के राजाभाऊ भी थे । उनके सिर में तीन गोलियाँ लगी थीं। यह 15 अगस्त 1955 का दिन था । बलिदान होने वालों की संख्या इससे अधिक बताई गई। यह संख्या तो सरकारी आकड़ों की थी । कितने ही आँदोलनकारियों को “गुमशुदगी” के रूप में दर्ज किया जिनका कभी पता नहीं चला । इसमें मध्यप्रदेश के चार कार्यकर्ता थे ।
इसके बाद तनाव निरंतर बढ़ा। आँदोलन की शैली में थोड़ा परिवर्तन हुआ । इसके बाद आँदोलन तो सतत रहा लेकिन भारतीय और गोवा की सीमा पर प्रदर्शन हुये । तथा देशभर में सभाएँ हुईं। भारत सरकार पर दबाब बना । सरकार से अपेक्षा की गई कि जैसा अभियान जूनागढ़ और हैदराबाद आदि में चला था वैसा गोवा में चलारा जार । अंततः भारत सरकार तैयार हुई और भारतीय सेना सक्रिय हुई । 1 नवम्बर 1961 में भारतीय सेना के तीनों अंगों को युद्ध के लिए तैयार रहने का आदेश हुआ और भारतीय सेना ने दो दिसंबर को गोवा मुक्ति का अभियान शुरू किया । शुरु में गोवा में तैनात पुर्तगाल की सेना ने मुकाबला किया । लेकिन वह टिक न सकी । अंततः गोवा में पुर्तगाल की सेना और वहाँ तैनात पुर्तगाल के गवर्नर जनरल मैन्यु आंतोनियो सिल्वा ने समर्पण सन्धि पर हस्ताक्षर किये । यह हस्ताक्षर 19 दिसम्बर 1961 की रात साढ़े आठ बजे हुये । इसी के साथ गोवा पर 451 वर्ष पुराना पुर्तगाली शासन समाप्त हुआ और वह भारतीय गणतंत्र का अंग बन गया ।

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