मुद्दा ठीक है, पर बेईमान है आन्दोलन

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सन्त समीर

दिल्ली।  मुद्दा ठीक है, पर आन्दोलन ग़लत है। मुझे लगता है कि अब तक के सारे आन्दोलनों में सबसे बेईमान आन्दोलन यही था या है। यह उनका आन्दोलन न के बराबर था, जिनके नाम पर किया गया। अतीत के हर आन्दोलन में कोई-न-कोई सुनिश्चित चरित्र आप तलाश सकते हैं, परन्तु इस ‘कॉक्रोच जनता पार्टी’ वाले को आप चरित्र-हीन आन्दोलन कह सकते हैं। कोई अकेला पुलिसवाला दिख जाए तो उसे घेरकर पीटने लगना और शान्त खड़ी पुलिस पर पत्थर चलाना, ताकि वह जवाबी कार्रवाई करे और आन्दोलन के लिए माहौल बनाया जा सके—इसे क्या कहेंगे? मञ्च पर जो चेहरे दिखते रहे, उनमें से कई पुराने परिचित हैं। ये सब अपनी उस तरह की अजीबोग़रीब प्रतिबद्धता पर डटे रहे हैं, जिसे कि मैं महज़ वैचारिक बेईमानी मानता हूँ। इन्हीं जैसों की सङ्गत में रहते हुए आज की तारीख़ में इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि विचारधारा की ज़िद बहुत हद तक मानसिक बीमारी का ही एक रूप है।

अन्ना आन्दोलन और इस आन्दोलन के बीच बुनियादी फ़र्क़ यह था कि अन्ना का अपना कोई राजनीतिक स्वार्थ नहीं था, जबकि इस आन्दोलन में जितने भी चेहरे मञ्च पर दिखे, उनमें से एक भी ऐसा नहीं था, जिसका कि कोई राजनीतिक स्वार्थ न रहा हो।

वैसे कुछ लोगों को उम्मीद थी कि मैं भी वहाँ पहुँचूँगा। सोनम वाङ्चुग कुछ समझदारी से आए होते तो हमारे जैसे लोग हौसला बढ़ाने पहुँच ही सकते थे, लेकिन पहले दिन ही ध्यान दिया तो जन्तर-मन्तर तक जाने की ज़हमत उठाना बेमतलब लगा। अलबत्ता, कुछ किन्तु-परन्तु के बावजूद केन-बेतवा के मसले पर कल तक चले आदिवासियों के ‘चिता आन्दोलन’ का मैं समर्थन करता हूँ।

कॉक्रोच जनता पार्टी जैसी गतिविधियों का उभरना स्वाभाविक है, क्योंकि जब सत्ता की संवेदना सही तरीक़े से सही जगह तक नहीं पहुँचेगी तो आज नहीं तो कल, ग़ुस्सा किसी भी रूप में फूटेगा। आक्रोशित भावनाओं की लगाम ग़लत लोगों के हाथों में पहुँचेगी तो कुछ अराजकताएँ भी दिखेंगी ही। इन्हीं अराजकताओं के कारण सत्ता को भी दमन का मौक़ा मिलता है और वह भूल जाती है कि समस्या सचमुच कुछ है। वैसे एक सच यह भी है कि पेपर लीक के मामले में जितनी तेज़ी से इस सरकार ने कार्रवाई की थी, उतनी तेज़ी से पहले की किसी सरकार ने कभी नहीं की थी।

जो भी हो, अद्भुत है कि मुद्दा कुछ है, पर मञ्च से चिन्ता यह जताई जा रही है कि मोदी को कैसे हटाया जाए। गान्धी का नाम लेकर अनशन चल रहा है, लेकिन वक्ता एक भी ऐसा नहीं दिखा, जिसके मुँह से नफ़रत के इतर बोल निकले हों। गान्धी आत्मशुद्धि के लिए, लोगों की चेतना जगाने के लिए अनशन पर बैठते थे और यहाँ महज़ एक मन्त्री को हटाने के लिए अनशन शुरू किया गया। सहज प्रश्न उठता है कि एक नहीं, दो-चार मन्त्री भी हट जाएँ तो क्या व्यवस्था ठीक हो जाएगी? और ग़ज़ब कि आन्दोलन एक मन्त्री हटाने के लिए, पर मञ्च पर कई नारों के बीच एक नारा यह भी कि ‘नाम रहेगा अल्लाह का’।

इस आन्दोलन की बेईमानी यही है कि यह एक मुद्दे के बहाने हिन्दुत्व के पुनर्जागरण को किसी भी तरह से रोकने का आन्दोलन बनता गया।

मुझे ऐसा लगता है कि मज़बूत मुद्दा नहीं मिला तो एक ख़त्म होते मुद्दे को जैसे-तैसे पकड़ा गया और जन्तर-मन्तर पर आकर ख़ुद ही उस मुद्दे को किनारे करके कुछ और एजेण्डा चलाया जाने लगा। युवाओं को जोड़ने के लिए युवाओं वाला मुद्दा तो चाहिए ही था, लेकिन इतने पर भी वे युवा बहुत कम दिख रहे थे, जिनका पेपर लीक से लेना-देना था।

आन्दोलन की सबसे बड़ी त्रासदी यही रही कि पेपर लीक और युवाओं के भविष्य जैसे प्रश्न धीरे-धीरे पीछे चले गए और मञ्च पर राजनीतिक नारे, नफ़रती भाषण और सत्ता परिवर्तन की आकाङ्क्षा आगे आती चली गई। जब आन्दोलन का चेहरा उसके मुद्दे से बड़ा हो जाए, तब जनता यह पूछने लगती है कि लड़ाई वास्तव में किस बात की है।

किसी भी छात्र आन्दोलन की सबसे बड़ी शक्ति स्वयं छात्र होते हैं। लेकिन जब आन्दोलन की पहचान प्रभावित युवाओं से अधिक उसके नेताओं और राजनीतिक प्रतीकों से बनने लगे, तब उसके उद्देश्य पर प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है।

बहरहाल, आन्दोलन एजेण्डे के लिए हो या किसी और निहित स्वार्थ के लिए, यदि सत्ता उसे अनदेखा करती है, तो यह भी किसी बुरे आन्दोलन से कम बुरा नहीं है। आप स्वयं को यदि जनता के सेवक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं और सेवक के बजाय मालिक के तेवर दिखा रहे हैं, तो यह आमजन के साथ एक तरह का छल है। समय निकल जाने के बाद दिखने वाली विनम्रता भी बेमानी ही लगती है।

ऐसा लगता है कि भाजपा के लोगों ने आन्दोलनों से निपटना शायद शुतुरमुर्गों से सीखा है। जैसे ही कोई आन्दोलन शुरू होता है, वैसे ही ये लोग सिर रेत में घुसा लेते हैं। इन्हें लगता है कि एक दिन लोग थक जाएँगे और आन्दोलन अपनी मौत मर जाएगा। अनसुना करने की इस प्रवृत्ति से एक-दो बार इन्हें प्रत्यक्ष फ़ायदा होता दिखा है, तो शायद इसी नाते इस तरीक़े को इन्होंने रामबाण मान लिया है। लेकिन सत्ता मिलती गई, तो यह अंदाज़ा ही नहीं लगा पा रहे हैं कि इसका परोक्ष घाटा कितना बड़ा हुआ है।

याद रखिए, राम की ज़रूरत इस देश को है; हज़ार साल से भयभीत और दबी-सहमी मानसिकता में जी रहे हिन्दू मन को खुलकर व्यक्त होने का वातावरण भी आपने बनाया, इसकी भी ज़रूरत इस देश को थी; परन्तु यदि आपको लगता है कि राम नाम की आड़ हर कहीं काम आ जाएगी तो यह आपकी बहुत बड़ी भूल है। अहङ्कार और अकड़ राम-विरोधी तत्त्व हैं। इन्हें आप जैसे-जैसे अपने चरित्र में जगह देंगे, वैसे-वैसे राम आपसे दूर होते चले जाएँगे। सनातन राम क्षणभङ्गुर मन्दिर के क्षणिक विषय नहीं हो सकते हैं, अन्ततः राम काम में बसते हैं। यह भी पहचानिए कि राम सनातन संस्कृति की मूलधारा में हैं, लेकिन रोटी साँस ले रहे हर आदमी की पहली अनिवार्यता है। बेरोज़गारी पर गहन विचार की ज़रूरत है। किसानों के मुद्दों पर चलताऊ समाधान से बात लम्बे समय तक नहीं बनेगी।

भाजपा के लोगों से यही कहूँगा कि कई मुद्दे आपने शानदार ढङ्ग से हल किए हैं, जिनके लिए वर्षों तक याद किए जाएँगे, परन्तु किसानों और नौजवानों के मुद्दों पर आप हमेशा चलताऊ तरीक़े आज़माकर सन्तुष्ट हो लेते हैं। समय के साथ यह आप पर भारी पड़ेगा।

और अन्त में, इतना भर और कहूँगा कि जिन समस्याओं से इधर-उधर करके आप बचना चाहते हैं, वे कठिन क़तई नहीं हैं।

 शिक्षा के नए क्षितिज पर भारत: नीतियों से नवाचार तक विकास की स्वर्णिम यात्रा

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प्रो. मुरलीमनोहर पाठक

दिल्ली। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी शिक्षा व्यवस्था में निहित होती है। समृद्ध अर्थव्यवस्था, वैज्ञानिक प्रगति, सामाजिक समरसता और वैश्विक नेतृत्व का मार्ग गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से होकर ही गुजरता है। भारत जैसे युवा राष्ट्र के लिए शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर, सशक्त और विकसित भारत के निर्माण का सबसे प्रभावी साधन है। इसी दृष्टि से वर्तमान भारत सरकार ने शिक्षा को राष्ट्रीय विकास की केंद्रीय धुरी मानते हुए व्यापक नीतिगत सुधारों, आधुनिक तकनीक, कौशल विकास तथा अनुसंधान-आधारित शिक्षण को प्रोत्साहन देने की दिशा में अनेक महत्त्वपूर्ण पहलें की हैं।

इन प्रयासों का सबसे उल्लेखनीय आयाम राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 है। लगभग तीन दशकों के अंतराल के पश्चात लागू की गई यह नीति भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन का आधार बनी है। नई नीति ने शिक्षा को परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था से निकालकर ज्ञान, कौशल, नवाचार, अनुसंधान तथा व्यक्तित्व विकास की दिशा में अग्रसर करने का प्रयास किया है। प्रारंभिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन करते हुए 5+3+3+4 की नवीन शैक्षिक व्यवस्था लागू की गई, जिससे बाल्यावस्था में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को विशेष महत्त्व प्राप्त हुआ।सरकार ने मातृभाषा एवं भारतीय भाषाओं में प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा देकर विद्यार्थियों की सहज बौद्धिक अभिव्यक्ति और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को सुदृढ़ करने का प्रयास किया है। साथ ही विद्यार्थियों को विषय चयन में अधिक स्वतंत्रता प्रदान कर पारंपरिक शैक्षिक सीमाओं को समाप्त करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। इससे बहुविषयक शिक्षा और रचनात्मक चिंतन को नई गति मिली है।डिजिटल क्रांति के इस युग में शिक्षा को तकनीक से जोड़ना समय की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से पीएम ई-विद्या, दीक्षा, स्वयं, स्वयं प्रभा तथा अन्य डिजिटल शिक्षण मंचों का विस्तार किया गया।

इन पहलों ने देश के दूरस्थ क्षेत्रों तक गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री पहुँचाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। विशेषकर कोविड-19 महामारी के कठिन दौर में डिजिटल शिक्षा ने लाखों विद्यार्थियों की शैक्षणिक निरंतरता बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।विद्यालयी शिक्षा को अधिक प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए निपुण भारत मिशन प्रारंभ किया गया, जिसका उद्देश्य प्रत्येक बालक में प्रारंभिक स्तर पर बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मक दक्षता विकसित करना है। वहीं पीएम श्री विद्यालय योजना के अंतर्गत देशभर के चयनित विद्यालयों को अत्याधुनिक संसाधनों, स्मार्ट कक्षाओं, विज्ञान प्रयोगशालाओं, डिजिटल अवसंरचना तथा नवाचार आधारित शिक्षण प्रणाली से सुसज्जित किया जा रहा है, जिससे वे उत्कृष्ट विद्यालयों के रूप में विकसित हो सकें।उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी सुधारों का व्यापक विस्तार हुआ है।

अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट, मल्टीपल एंट्री एवं एग्जिट प्रणाली, अनुसंधान को प्रोत्साहन तथा बहुविषयक विश्वविद्यालयों की अवधारणा ने भारतीय उच्च शिक्षा को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने की दिशा में नई संभावनाएँ उत्पन्न की हैं। अनुसंधान, नवाचार और स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देकर युवाओं को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था का सक्रिय भागीदार बनाने का प्रयास किया जा रहा है।आज का युग कौशल और नवाचार का युग है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए सरकार ने प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना सहित अनेक कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा को रोजगारोन्मुख बनाया है।

विद्यालयों और महाविद्यालयों में व्यावसायिक शिक्षा तथा कौशल प्रशिक्षण को बढ़ावा देकर युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सार्थक प्रयास किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि ऐसे दक्ष, सक्षम और नवाचारी नागरिक तैयार करना है, जो वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत का नेतृत्व कर सकें।समावेशी शिक्षा की भावना को सुदृढ़ करते हुए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगजन तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, आवासीय सुविधाओं तथा शैक्षिक सहायता कार्यक्रमों का भी विस्तार किया गया है। बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन देने तथा शिक्षा के अवसरों में समानता स्थापित करने के उद्देश्य से भी अनेक योजनाओं का प्रभावी संचालन किया जा रहा है।निस्संदेह, शिक्षा के क्षेत्र में वर्तमान भारत सरकार द्वारा किए गए सुधारों ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को नई दिशा और नई ऊर्जा प्रदान की है। शिक्षा को ज्ञान, कौशल, प्रौद्योगिकी, अनुसंधान और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के समन्वय से जोड़ने का प्रयास भविष्य के भारत की मजबूत आधारशिला सिद्ध हो सकता है।

यद्यपि किसी भी नीति की वास्तविक सफलता उसके प्रभावी क्रियान्वयन, राज्यों के सहयोग, शिक्षकों की सक्रिय भागीदारी तथा गुणवत्तापूर्ण अधिगम के सतत मूल्यांकन पर निर्भर करती है, तथापि यह निर्विवाद है कि शिक्षा को राष्ट्रीय विकास के केंद्र में स्थापित करने की दिशा में उठाए गए ये कदम भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की आकांक्षा को नई गति प्रदान करते हैं।वास्तव में, जब शिक्षा सशक्त होती है, तभी समाज समृद्ध होता है; और जब समाज समृद्ध होता है, तभी राष्ट्र विश्व मंच पर नेतृत्व करने की क्षमता प्राप्त करता है। विकसित भारत की संकल्पना का सबसे सुदृढ़ आधार एक सक्षम, आधुनिक, समावेशी और मूल्यनिष्ठ शिक्षा व्यवस्था ही है।

 (प्रो. पाठक श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति हैं)

संसद मार्च : सीजेपी की अराजकता, ये भारत के युवा नहीं हो सकते ?

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल। दिल्ली में संसद मार्च के दौरान सामने आए दृश्य आज प्रत्‍येक देशभक्‍त भारतवासी को चिंता में डाल रहे हैं! जिसने भी इन्‍हें देखा, प्रतिक्रिया एक ही सामने आ रही थी, ये अराजकता भारत के युवा चरित्र पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है। यदि लोकतांत्रिक विरोध के नाम पर बैरिकेड तोड़े जाएँ, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाए, पुलिस पर पथराव हो, संसद तक बलपूर्वक पहुँचने का प्रयास किया जाए और सोशल मीडिया पर भड़काऊ भाषणों तथा अपुष्ट सूचनाओं के माध्यम से वातावरण को और उग्र बनाया जाए, तब स्वाभाविक रूप से यही कहा जाएगा कि क्या यही वह युवा है, जिसकी कल्पना स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, महात्मा गांधी और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जैसे भारत के महान देशभक्‍तों ने की थी?

स्वामी विवेकानन्द ने भारत के युवाओं के लिए ऊर्जावान के साथ चरित्रवान होने का स्वप्न देखा था। उनका प्रसिद्ध कथन है, “हमें ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे चरित्र का निर्माण हो, मन की शक्ति बढ़े, बुद्धि का विकास हो और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सके।” उन्होंने युवाओं से “उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए” का आह्वान अवश्य किया, किंतु कहीं भी यह नहीं कहा कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए कानून तोड़ो, हिंसा करो या समाज में अराजकता फैलाओ। विवेकानन्द के लिए युवा वह था, जो अपने आत्मबल, संयम और राष्ट्रभक्ति से समाज का नेतृत्व करे।

महर्षि अरविन्द भी भारत के युवाओं को राष्ट्र की आध्यात्मिक और नैतिक शक्ति मानते हैं। उनका विश्वास है कि भारत का पुनर्जागरण राजनीतिक के स्‍थान पर चरित्रवान युवाओं से होगा, क्‍यों‍कि राष्ट्र निर्माण का आधार आत्मानुशासन है। यही कारण है कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जितने भी महान युवा सामने आए, उन्होंने संघर्ष अवश्य किया, परंतु राष्ट्र की संपत्ति को नष्ट करना, समाज में भय का वातावरण बनाना अथवा भीड़ के उन्माद को नेतृत्व मानना कभी स्वीकार नहीं किया।

यहां महात्मा गांधी के विचारों को भी समझना उपर्युक्‍त होगा, वे कहते हैं, “अहिंसा निर्बलों का नहीं, वीरों का अस्त्र है।” लोकतंत्र में असहमति का अधिकार मौलिक है, किंतु हिंसा किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति को समाप्त कर देती है। यदि किसी आंदोलन का परिणाम आम नागरिकों की पीड़ा, सार्वजनिक संपत्ति की क्षति और कानून-व्यवस्था का संकट बन जाए, तो वह जनांदोलन कैसे कहला सकता है? वह तो लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तोड़ने का कार्य है। विरोध और विध्वंस में यही मूल अंतर है, जिसे कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को अपने प्रदर्शन के दौरान समझना चाहिए था।

क्‍या आज हम इस तथ्‍य को नजरअंदाज कर सकते हैं कि भारत विश्व का सबसे युवा राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के अनुसार देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्‍या 35 वर्ष से कम आयु की है। यही युवा भारत की सबसे बड़ी शक्ति है, किंतु यदि यह शक्ति राष्ट्र निर्माण के स्थान पर अराजकता की दिशा में मुड़ जाए, तब‍ फिर क्‍या कहा जाएगा, सच पूछिए तो यही स्‍थ‍िति एक सफल देश के लिए उसकी सबसे बड़ी त्रासदी बन जाती है, जैसा कि दृष्‍य दिल्‍ली में दिखा है!

संसद मार्च के दौरान जो घटनाएँ सामने आईं, वस्‍तुत: उनमें प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान, यातायात का ठप हो जाना तथा सोशल मीडिया पर उग्र और विवादित वीडियो का प्रसार, इन सबने लोकतांत्रिक विरोध और भीड़तंत्र के बीच की रेखा को आज पुनः चर्चा के केंद्र में ला दिया है। कई वायरल वीडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं होने के बाद भी जिस तरह से उनका प्रसार किया जा रहा था, उससे यही समझ आता है कि भारत को कैसे अराजक बनाया जा सकता है, इसके लिए लगता है, देश में कई शक्‍तियां कार्य कर रही हैं जोकि इस शांति मार्च के नाम पर एक साथ आती हुई दिखीं।

एक दूसरा दृष्‍य भी भारत में जिखता है, जिसमें स्टार्टअप, डिजिटल अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन और वैश्विक नेतृत्व की ओर तेजी से बढ़ना शामिल। चंद्रयान, आदित्य-एल1, डिजिटल भुगतान, नवाचार और विश्वस्तरीय स्टार्टअप पारिस्थितिकी ने यह सिद्ध किया है कि जब भारतीय युवा अपनी प्रतिभा का उपयोग निर्माण में करता है, तो वह पूरी दुनिया को चकित कर देता है। दूसरी ओर जब इन्‍हीं युवाओं का एक वर्ग अपनी ऊर्जा हिंसा, तोड़फोड़ और भीड़ के उन्माद में व्यर्थ करता दिखता है, तो यह राष्ट्रीय क्षमता की हानि के रूप में दिखाई देता है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक और चिंताजनक पक्ष सोशल मीडिया की भूमिका है। आज कुछ सेकंड का वीडियो लाखों लोगों की भावनाओं को प्रभावित कर देता है। बिना सत्यापन के प्रसारित दावे, उत्तेजक भाषण और आधी-अधूरी सूचनाएँ भीड़ को भड़काने का माध्यम बन जाती हैं। उन राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना चाहिए, जोकि अपने हित में देश की युवा शक्‍ति का गलत इस्‍तेमाल करते हैं। युवा शक्ति को राजनीतिक प्रदर्शन का औजार बनाना किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत कभी नहीं हो सकता। ध्‍यान रहे, लोकतंत्र में सत्ता बदल सकती है, सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन यदि युवा पीढ़ी का चरित्र बदल गया तो उसकी भरपाई किसी राजनीतिक परिवर्तन से नहीं हो सकेगी।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम कहा कहते थे, “सपने वे नहीं होते जो हम सोते समय देखते हैं, बल्कि सपने वे होते हैं जो हमें सोने नहीं देते।” उनका सपना ऐसा भारत था, जहाँ युवा प्रयोगशालाओं में शोध करें, उद्योग स्थापित करें, विज्ञान और तकनीक में दुनिया का नेतृत्व करें तथा समाज को नई दिशा दें। वास्‍तव में इस परिभाषा से वही भारत का वास्तविक युवा है जो निर्माण करता है, विनाश नहीं; जो समाधान खोजता है, संकट नहीं बढ़ाता; जो राष्ट्र को जोड़ता है, तोड़ता नहीं और न ही दिल्‍ली जैसी अराजकता बिल्‍डिंगों में घुसकर एवं खड़े वाहनों में तोड़-फोड करके फैलाता है!

आज जो भी देश में अराजकता व्‍याप्‍ति में लगे हैं, वे समझ लें कि पत्थर कभी विचार का स्थान नहीं ले सकते और भीड़ कभी चरित्र का विकल्प नहीं बन सकती। स्वामी विवेकानन्द का युवा हाथ में पुस्तक लेकर चलता है; वह किसी पर पत्‍थर फैककर सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट नहीं करता है, वह तो राष्ट्र की संपत्ति बढ़ाता है और समाज को संगठित करता है, इसलिए संसद मार्च की घटनाओं के बाद सबसे बड़ा प्रश्न ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) यही है कि वे अपने आन्‍दोलन से भारत के युवाओं को किस दिशा में ले जा रही है?

आम आदमी का बच्चा लाठी खाए: नेताओं के बच्चे मौज उड़ाएं  

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दिल्ली। आजकल भारत में शिक्षा, परीक्षा घोटाले और युवाओं के भविष्य को लेकर जंतर मंतर पर जोरदार आंदोलन चल रहा है। ‘चलो संसद’ जैसे नारे लग रहे हैं, पुलिस की लाठियां पड़ रही हैं और छात्र सड़कों पर हैं। ठीक इसी माहौल में बॉलीवुड अभिनेता नसीरुद्दीन शाह अपने बेटों इमाद और विवान के साथ जंतर मंतर पहुंचे। वे खड़े रहे, समर्थन दिखाया, लेकिन अपने बच्चों को आंदोलन का सक्रिय हिस्सा नहीं बनने दिया। यह दृश्य विपक्षी नेताओं की मानसिकता को बेनकाब करता है – वे आम आदमी के बच्चों से संघर्ष की अपेक्षा रखते हैं, लेकिन अपने खून को जोखिम में नहीं डालते।

आम आदमी पार्टी (AAP) अक्सर दूसरों पर उंगली उठाती है, लेकिन जब मौका आया तो अरविंद केजरीवाल की बेटी हर्षिता या मनीष सिसोदिया के बेटे को इस प्रोटेस्ट में शामिल होते नहीं देखा गया। संजय सिंह की बेटी एशिता भी अब मुंबई में एक्ट्रेस बनने की राह पर है और विदेशी यात्राओं की तस्वीरें शेयर करती है। सवाल उठता है – यदि यह संघर्ष इतना पवित्र और सही है, तो इन नेताओं ने अपने बच्चों को क्यों नहीं झोंका? क्यों आम आदमी का बच्चा लाठी खाएगा, जबकि नेता का बेटा-बेटी सुरक्षित विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़ रहा है?

यह दोहरा मापदंड विपक्ष तक सीमित नहीं है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी युवाओं के मुद्दों पर भाषण देते हैं, लेकिन उनके परिवार की अगली पीढ़ी आंदोलनों में सड़क पर उतरती नजर नहीं आती। इसी तरह, कई विपक्षी और सत्ताधारी परिवारों में बच्चों को विदेश भेजने का चलन आम है। जहां आम छात्र NEET, JEE जैसे घोटालों से जूझ रहे हैं, वहां नेता के बच्चे ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड या लंदन जैसे संस्थानों में पढ़ रहे हैं। केजरीवाल सरकार दिल्ली के सरकारी स्कूलों की तारीफ करती है, लेकिन खुद के परिवार की शिक्षा पर चुप्पी साध लेती है। सिसोदिया शिक्षा क्रांति के प्रतीक बने, लेकिन उनके बेटे की पढ़ाई पर भी सवाल उठते हैं।

विपक्षी दलों के और उदाहरण देखें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। कई कांग्रेस और क्षेत्रीय नेताओं के बच्चे विदेशी यूनिवर्सिटी में हैं, जबकि वे भारत में ‘सिस्टम बदलो’ का नारा लगाते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ प्रमुख विपक्षी परिवारों में बच्चे अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोप में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसा भाजपा नेताओं पर आरोप लगाया जाता है – जहां मंत्री ‘स्वदेशी’ और ‘भारतीय शिक्षा’ की बात करते हैं, लेकिन उनके बच्चे विदेश जाते हैं। लेकिन विपक्ष खुद इस जाल में फंसा हुआ है। AAP के कई नेता, जो ‘आम आदमी’ की बात करते हैं, उनके बच्चे अब विदेश में हैं या सुरक्षित करियर बना रहे हैं।

यह hypocrisy क्यों? क्योंकि आंदोलन राजनीतिक लाभ के लिए है, न कि वास्तविक बलिदान के लिए। लाठी चार दिन पहले ‘काक्रोच पार्टी’ बनाने वाले अभिजीत दीपिके या आशुतोष रंका जैसे लोगों पर नहीं पड़ती। वे चाय पर चर्चा में व्यस्त रहते हैं, जबकि पब्लिक का बच्चा पुलिस की गोली-लाठी का शिकार होता है। दूसरी तरफ विजेता दहिया जैसे कार्यकर्ता लापता हो जाते हैं, बड़े नेताओं के बच्चे चुनावी उत्तराधिकारी बनकर तैयार किए जाते हैं।

भारतीय राजनीति में यह पैटर्न पुराना है। नेहरू-गांधी परिवार से लेकर क्षेत्रीय दलों तक, नेता अपने बच्चों को सुरक्षित रखते हैं। AAP ने ‘परिवर्तन’ का वादा किया था, लेकिन सत्ता में आते ही उनके बच्चे भी उसी रास्ते पर चले गए। यदि संघर्ष सच्चा है, तो नेता पहले अपने बच्चों को आगे करें। उन्हें भी जंतर मंतर पर खड़ा करें, लाठियां खाने दें। या फिर सीधे कह दें कि यह सिर्फ वोट बैंक का खेल है।

आम आदमी थक चुका है इस दोहरेपन से। शिक्षा सुधार की बात हर नेता करता है, लेकिन अपना परिवार विदेश भेज देता है। प्रोटेस्ट में ‘देश बचाओ’ का नारा लगता है, लेकिन अपने बच्चे को जोखिम नहीं। समय आ गया है कि जनता इन नेताओं से जवाब मांगे – यदि रास्ता सही है, तो अपने बच्चों को भी इसमें शामिल करो। नहीं तो यह सिर्फ ‘डंडा पब्लिक खाएगी, नेता वोट और सत्ता बनाएगा’ वाला खेल है।

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