असम चुनाव 2026: सत्ता, अस्मिता और बदलाव के बीच निर्णायक संघर्ष

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नव ठाकुरीया

दिल्ली । आगामी 9 अप्रैल 2026 को असम की 126 विधानसभा सीटों के लिए होने वाला मतदान राज्य की राजनीति का एक निर्णायक अध्याय लिखने जा रहा है। लगभग 2.5 करोड़ मतदाता इस चुनाव में भाग लेंगे और उनका निर्णय केवल सरकार के गठन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करेगा कि असम विकास, सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान के बीच किस संतुलन को प्राथमिकता देता है। मतगणना 4 मई को होगी, लेकिन चुनावी परिदृश्य पहले ही पूरी तरह सक्रिय और प्रतिस्पर्धी हो चुका है।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही है। पार्टी ने अपने ‘संकल्प पत्र’ में विकास और आर्थिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ कल्याणकारी योजनाओं की निरंतरता पर जोर दिया है। भाजपा का दावा है कि पिछले कार्यकाल में 1.6 लाख से अधिक सरकारी नौकरियां दी गईं और अगले पांच वर्षों में दो लाख और नौकरियां सृजित की जाएंगी।

‘अरुणोदय योजना’ के तहत लगभग 40 लाख महिलाओं को आर्थिक सहायता दी गई है और अब तक करीब 17,000 करोड़ रुपये वितरित किए जा चुके हैं। इसके अलावा, चाय बागान मजदूरों को भूमि अधिकार देने और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का विस्तार भाजपा की उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

भाजपा ने सुरक्षा और पहचान के मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया है। अवैध प्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई, ‘प्रवासी (असम से निष्कासन) अधिनियम 1950’ के प्रावधानों का उपयोग, समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा और ‘लव जिहाद’ व ‘लैंड जिहाद’ जैसे मुद्दों पर कानून बनाने की बात चुनावी विमर्श को स्पष्ट रूप से प्रभावित कर रही है। बाल विवाह और बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ अभियान को भी सामाजिक सुधार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

दूसरी ओर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके सहयोगी दल इस चुनाव को सत्ता के खिलाफ जनादेश में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। ‘जनता का आरोप-पत्र’ जारी कर कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार, वादाखिलाफी और प्रशासनिक विफलता के आरोप लगाए हैं। पार्टी का कहना है कि बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक असंतुलन ने आम जनता को प्रभावित किया है।

विपक्षी गठबंधन में असम जातीय परिषद और रायजोर दल जैसे क्षेत्रीय दल शामिल हैं, जो भाजपा के खिलाफ एंटी-इन्कंबेंसी को भुनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। हालांकि, AIUDF की मौजूदगी कुछ सीटों पर कांग्रेस के लिए चुनौती बनी हुई है, जिससे विपक्षी वोटों के बिखराव की संभावना बनी रहती है।

हाल के दल-बदल और टिकट वितरण को लेकर असंतोष ने भी चुनावी समीकरणों को जटिल बना दिया है। कई नेताओं के पाला बदलने से कुछ सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। दिसपुर, जोरहाट और सिबसागर जैसे निर्वाचन क्षेत्रों में कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है।

जालुकबारी में मुख्यमंत्री सरमा की स्थिति मजबूत मानी जाती है, जबकि जोरहाट में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है। सिबसागर में रायजोर दल के नेता अखिल गोगोई की चुनौती भी चर्चा में है। इन क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवारों की छवि और संगठनात्मक क्षमता निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू नागरिक समाज की भूमिका भी है। 200 से अधिक बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों ने मतदाताओं से अपील की है कि वे सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और विकास को ध्यान में रखते हुए मतदान करें। उन्होंने जनसंख्या के बदलते स्वरूप, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और नशे के खिलाफ सख्त नीतियों की आवश्यकता पर जोर दिया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी मतदाताओं से अधिकतम मतदान करने और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए अपने मताधिकार का प्रयोग करने की अपील की है।

कुल मिलाकर, असम चुनाव 2026 एक बहुआयामी राजनीतिक संघर्ष बन गया है। भाजपा जहां अपने विकास कार्यों, कल्याणकारी योजनाओं और नेतृत्व की स्थिरता के आधार पर जनादेश मांग रही है, वहीं कांग्रेस और उसके सहयोगी दल बदलाव और जवाबदेही की मांग को लेकर जनता के बीच हैं। अब यह मतदाताओं पर निर्भर करता है कि वे स्थिरता और निरंतरता को प्राथमिकता देते हैं या बदलाव और नई दिशा को। 4 मई को आने वाला जनादेश न केवल नई सरकार का गठन करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि असम आने वाले वर्षों में किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार)

आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय के सहयोगी 17 देश , 455 एकड़ का विशाल परिसर * प्राचीन और अर्वाचीन वास्तु कला का अद्भुत संगम ।

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मुंबई : नव स्थापित नालंदा विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद द्वारा आयोजित ‘गिरमिटिया देशों का इतिहास , वर्तमान और भविष्य की दिशा’ पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार(28-29 मार्च) में वक्ता के रूप में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। इस विश्वविद्यालय को 17 देशों के सहयोग से पुनर्जीवित किया गया है। भारत सरकार ने 2010 में नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया और बिहार में राजगीर के पास ही 2014 में इसका शैक्षणिक सत्र प्रारंभ हुआ। इस विश्वविद्यालय का नवीन परिसर 455 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है जो प्राचीन नालंदा और अर्वाचीन वास्तु कला का अद्भुत उदाहरण है । भारत सहित विभिन्न देशों के लगभग 700 विद्यार्थी इस विश्वविद्यालय में अध्ययनरत हैं। ।

नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास पांचवीं शताब्दी में शुरू होता है जब गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने बिहार के राजगीर में 427 ई के लगभग इसकी स्थापना की थी और इसे बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र माना जाता था ।यह दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था जिसमें 10,000 से अधिक छात्र और लगभग 2000 शिक्षक थे। चीन, तिब्बत, जावा ,जापान कोरिया, म्यांमार, कंबोडिया श्रीलंका आदि देशों से यहां छात्र अध्ययन के लिए आते थे। चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग ने यहां कई साल रहकर अध्ययन किया और नालंदा के वैभव को दुनिया तक पहुंचाया। विश्वविद्यालय का 9 मंजिला पुस्तकालय जिसे धर्मगंज कहा जाता था, में ज्ञान का विपुल भंडार था। यह विश्वविद्यालय 800 वर्षों तक शिक्षा और शोध का वैश्विक केंद्र बना रहा ।ज्ञान की इस विशाल ज्योति को 1193 इस्वी में तुर्क आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने बुझा दिया किंतु नालंदा विश्वविद्यालय अब पुनः अपने वैभव को अर्जित करने के लिए कुलपति प्रो. सतीश चतुर्वेदी के नेतृत्व में प्रयासरत है। अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के महासचिव श्री श्याम परांडे, सचिन श्री गोपाल अरोड़ा और निदेशक श्री नारायण कुमार को इस सफल आयोजन के लिए बधाई और धन्यवाद।

कल धुरंधर-2 फिर से देख आया…

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राजीव मिश्रा

दिल्ली । दोबारा. इस बार बच्चों के साथ.

बच्चे हिन्दी फिल्में बर्दाश्त नहीं कर पाते. मुझे भी गले से मुश्किल से ही उतरती हैं, पर बच्चे बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर पाते. लेकिन पहले घर पर प्रोजेक्टर पर लगा कर साढ़े तीन घंटे धुरंधर-1 देखी, फिर उठकर पार्ट 2 देखने गए. और खूब पसंद आई, बेटे ने कहा…इंडिया का टेस्ट सुधर रहा है लगता है.
उसके एक दिन पहले मैंने “बारामुला” भी देखी. अभी तक नहीं देखी थी, क्योंकि कुछ खास एक्सपेक्टेशन नहीं थी. फिल्म देख कर सोचा, दस वर्ष पहले कोई सोचता भी था कि ऐसी फिल्में हिंदी में बना करेंगी? पांच वर्ष पहले जब काश्मीर फाइल जैसी फिल्में बननी शुरू हुई थी तो उनकी सिनेमैटिक गुणवत्ता मुश्किल से बर्दाश्त करने लायक थी. तब लगता था कि अनुराग कश्यप या विशाल भारद्वाज जैसे डायरेक्टर हमारे साइड की फिल्में क्यों नहीं बनाते? हमारे बीच कोई अपना भी खड़ा हो सकता है यह ख्याल भी नहीं आता था.

लेकिन यह अंतर अपने आप नहीं आया. आज से दस साल पहले जब मोदी बॉलीवुड के लोगों से मिला करते थे तब लोग सवाल खड़े करते थे और उनके पिछले ट्वीट की स्क्रीनशॉट टांग दिया करते थे कि मोदी सेकुलर हो गए.
लेकिन धीरे धीरे एक एक कर लोग बदलते गए और अपना इकोसिस्टम खड़ा होता दिखाई देने लगा. हमारी कहानी कहती फिल्में बनने लगीं. सिर्फ फिल्में ही नहीं, तीन चौथाई मीडिया अपने पक्ष में खड़ा हो गया. ज्यूडिशियरी से अपने पक्ष में फैसले आने लगे.

आज जो लोग दो इलेक्शन में बंगाल नहीं जीत पाने पर मोदी शाह को कोस रहे हैं उन्हें शायद पता नहीं हो कि अधिक पुरानी बात नहीं है जब किसी को बंगाल जीतने के सपने भी नहीं आते थे. अजी, बंगाल तो छोड़िए.. यूपी में चौथे नंबर की पार्टी हुआ करते थे. तब किस किस ने सोचा था कि एक दिन योगी जैसे मुख्यमंत्री आयेंगे और अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसों के माफिया राज से छुटकारा मिलेगा. आसाम में जीत मिलेगी और ऐसा मुख्यमंत्री आयेगा जो घुसपैठ और अलगाववाद को लगाम लगाएगा, नॉर्थ ईस्ट मुख्यधारा से जुडेगा, देश से नक्सलवाद खत्म हो जायेगा.

यह सब हुआ है तो एक एक ईंट जोड़ कर हुआ है. आसानी से और फटाफट कुछ नहीं हो जाता. फटाफट सिर्फ सपने आते हैं, कुर्सी पर बैठे बैठे खयाल आते हैं कि मोदी ने बारह साल बर्बाद कर दिए. लेकिन यह बात समझ में नहीं आती कि मोदी ने हमें बारह साल दिए जिसे हमने बर्बाद कर दिया. मोदी ने बारह साल नहीं बर्बाद किए. मोदी ने बारह साल में जितना करके दिया उतना किसी और ने किसी और बारह साल में नहीं कर के दिया है.

नहीं, हमें तो बैक सीट ड्राइविंग करनी है..सलाह देनी है. अपनी दूरदर्शिता और बुद्धिमता का लाभ मोदी को देना है. लेकिन मेरी दूरदर्शिता तो इतनी है कि यूजीसी पर आग लगा देनी है…मोदी और शाह तुगलक, खिलजी, तैमूर और नादिरशाह से अधिक खतरनाक दिखाई देने लगते है. उनको सबक सिखाने की हुड़क अपने सर्वाइवल से अधिक बड़ा और महत्व का प्रश्न दिखाई देने लगता है. फिर सोचते हैं कि आखिर मेरी इस दूरदृष्टि और बुद्धिमता का लाभ उठाने वाला कोई क्यों नहीं मिलता…

प्रिय मोदी जी, धर्मांतरण पर नीति चाहिए, इसे रोकने राष्ट्रीय कानून आवश्यक

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । केरल के तिरुवल्ला में आयोजित एनडीए की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विपक्ष पर “झूठ के नैरेटिव” फैलाने के आरोपों के बीच एक महत्वपूर्ण और गंभीर विमर्श पर संवाद खड़ा किया गया, वह है “धर्मांतरण”। विशेषकर धोखे, प्रलोभन या दबाव के माध्यम से होने वाले मतांतरण पर उनकी तीखी टिप्‍पणियां सुनने को मिलीं। अब एक तरह से देखें तो ‘द केरल स्टोरी’ और ‘द कश्‍मीर फाइल्‍स’ जैसी फिल्मों के माध्‍यम से उठी यह विचार क्रांति देश की कानून व्यवस्था, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक संतुलन के केंद्र में आ खड़ी हुई है ।

वस्‍तुत: इसके बाद सवाल साफ है कि क्या भारत को इस विषय पर एक समान, स्पष्ट और सख्त केंद्रीय कानून की आवश्यकता नहीं है या यह मुद्दा सिर्फ राज्यों के भरोसे ही छोड़ दिया जाए? और यदि इस पर कार्रवाई होनी चाहिए तो क्‍यों नहीं केंद्रीय स्‍तर पर कानून बनाया जाता है! जबकि यह सर्वविदित है कि भारत में धर्मांतरण (कन्‍वर्जन) का प्रश्न नया नहीं है, जिसमें कि हाल के वर्षों में इसके स्वरूप और प्रभाव को लेकर चिंताएं तेज हुई हैं। विशेष रूप से जनजाति और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में प्रलोभन, दबाव या कथित छल (इस्‍लाम) के माध्यम से धर्म परिवर्तन के आरोपों ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है।

यही कारण भी है कि इस विषय की गंभीरता को देखते हुए इसी साल मार्च माह में देश के सर्वोच्‍च सदन राज्यसभा में डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी द्वारा इसे एक मांग के रूप में उठाया गया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “यह विषय सिर्फ धार्मिक आस्था का प्रश्न होने भर तक सीमित नहीं है, आज यह हमारी सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक स्थिरता और संवैधानिक संतुलन का विषय बन चुका है।”

वर्तमान स्थिति यह है कि भारत में धर्मांतरण को लेकर कोई विशिष्ट केंद्रीय कानून मौजूद नहीं है। केंद्र सरकार ने संसद में यह स्पष्ट किया है कि “लव जिहाद” जैसी कोई परिभाषित कानूनी अवधारणा नहीं है। इसके बावजूद, कई राज्यों ने अपने-अपने स्तर पर कानून बनाए हैं, जिनका उद्देश्य जबरन या धोखे से धर्मांतरण को रोकना है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में ऐसे कानून लागू हैं, जिनमें सजा और दंड के प्रावधान हैं। उदाहरण के तौर पर, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में 2021 के अधिनियमों के तहत जबरन धर्मांतरण पर 10 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है, जबकि छत्तीसगढ़ ने 2026 में पारित विधेयक में इसे और कठोर बनाते हुए आजीवन कारावास और भारी जुर्माने का प्रावधान जोड़ा है।

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न एकरूपता का भी है। जब एक ही देश में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कानून और प्रक्रियाएँ हों, तो न्यायिक और प्रशासनिक स्तर पर जटिलताएँ उत्पन्न होना स्वाभाविक है। अंतरराज्यीय मामलों में यह समस्या और गहरी हो जाती है, जहाँ अपराध की प्रकृति और उसके कानूनी परिणाम राज्य के अनुसार बदल सकते हैं। यही कारण है कि एक समान केंद्रीय कानून की मांग को अब अधिक समर्थन मिलने लगा है और वर्तमान समय की यह एक जरूरी आवश्‍यकता बनकर सामने आया है।

इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारतीय संविधान भी है, जिसमें कि अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, किंतु यह स्वतंत्रता पूर्ण नहीं है, इसके पीछे कुछ उत्‍तरदायित्‍व भी हैं, यह “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य” के अधीन है। दूसरी ओर, अनुच्छेद 21 व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें अपनी पसंद के साथी से विवाह करने और जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। किंतु यहां भी किसी को धोखा देना, लालच देना, भय दिखाना स्‍वीकार्य नहीं है।

राज्य सरकारों का तर्क है कि जब धर्मांतरण धोखे, दबाव या प्रलोभन के माध्यम से होता है, तब वह व्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है, साथ ही यह सामाजिक संतुलन को भी प्रभावित करता है, इसलिए ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करना राज्य का दायित्व है। हम सभी जानते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय विभिन्न राज्यों के धर्मांतरण विरोधी कानूनों की संवैधानिक वैधता की इस समय समीक्षा भी कर रहा है। किंतु दूसरी आरे फिल्मों और मीडिया ने इस विषय को व्यापक जनचर्चा का हिस्सा बना दिया है। ‘द केरल स्टोरी’ और ‘द कश्मीर फाइल्स’ जैसी फिल्मों ने धर्मांतरण, लव जिहाद जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस में प्रमुख स्थान दिलाया है। ऐसे में केंद्रीय कानून के पक्ष में तर्क स्पष्ट हैं कि एकरूपता, स्पष्टता और प्रभावशीलता ऐसे प्रकरणों के विषय में देश भर में होना आज की आवश्‍यकता है।

आज इस पूरे परिदृश्य में एक सबसे महत्वपूर्ण बात यह भी है कि धर्मांतरण, लव जिहाद का जो मुद्दा राजनीतिक भाषण के स्‍तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा केरल के तिरुवल्ला में आयोजित एनडीए की रैली को संबोधित करते हुए उठाया गया है, वह सिर्फ राजनीतिक स्‍तर पर उठाया जानेवाला मुद्दा बनकर ही न रहे, इस दिशा में ठोस कार्य एवं नीति भी बने। यहां प्रधानमंत्री मोदी ने सीएए का उदाहरण देते हुए कहा भी कि जब नागरिकता संशोधन कानून लाया गया तो विपक्ष ने देश को डराने की कोशिश की लेकिन आज सीएए लागू हो चुका है और देश को कोई नुकसान नहीं हुआ। यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता गोवा में दशकों से लागू है और वहां कोई समस्या नहीं है।

वास्‍तव में ‘धुरंधर: द रिवेंज’ राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य अभियानों पर आधारित फिल्म है, जिसमें मजबूत राष्ट्रीय चेतना है। ‘द कश्मीर फाइल्स’ 1990 के दशक में कश्मीरी पंडितों के पलायन और हिंसा की सच्ची कहानी दिखाती है। वहीं ‘द केरल स्टोरी’ केरल की उन महिलाओं की कहानी है जिन्हें चरमपंथी संगठनों में भर्ती किया गया। इसके दूसरे पार्ट में लव जिहाद में फंसाई जा रही हिन्‍दू बेटियों की कहानी है, जोकि एक हकीकत भी है।

वस्‍तुत: ऐसे में अब यह जरूरी हो जाता है कि देश में यदि वास्तव में धोखे या दबाव से धर्म परिवर्तन हो रहे हैं, तो यह एक गंभीर अपराध घोषित किए जाएं। देश में इसे रोकने के लिए एक समान प्रभावी कानून बने। अत: कुल मिलाकर कहना यही है कि आज आवश्यकता अवैध धर्मांतरण पर अंकुश लगाने के लिए संवैधानिक मर्यादाओं, सामाजिक वास्तविकताओं और न्यायिक संतुलन के आधार पर एक ठोस निर्णय लिए जाने की है, त‍ाकि भारत में अमन-शांति बनी रहे और कोई भी देश की बेटी अपने को छला हुआ, भयक्रांत, डरा-सहमा महसूस न करे।

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