5 फरवरी 2026 को सोशल मीडिया में लिखा था 

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल
रायपुर : आप सोरोस के ‘पपेट’ को हल्के में बिल्कुल मत लीजिए। वो जैसे ख़ुद अराजक है वैसे ही सदन के अंदर और बाहर अराजकता फैला रहा है। वो अपने आकाओं का एजेंडा लेकर पूरे लाव लश्कर के साथ उतरा है। ऐसे में सतर्कता ज़रुरी है। सोरोस के पपेट ‘आउल’ गैंडी के निशाने पर हर वो चीज़ है “— जो राष्ट्रीय एकता और भारतीय संस्कृति का मानबिंदु है। आप उसे Underestimate मत कीजिए।वो तय स्क्रिप्ट पढ़ रहा है और उसी अनुरूप लहालोट हो रहा है। उसका एजेंडा फिक्स्ड है— भारतीय समाज को तोड़कर किसी तरह सत्ता में आना। लेकिन भारतीय समाज की संगठित शक्ति, सोरोस और उसके पपेट को किसी जमूरे से कम नहीं समझता है।
तिस पर इस समय सोरोस के पपेट को उछल कूद करते हुए देखकर — एक गिरोह की बांछे खिल आई हैं। अब भी ‘आउल गैंडी’ को नायक मानने वालों की कमी नहीं है। ‘मोदी हटाओ अभियान’ के जितने तथाकथित धूर्त—समीक्षक हैं। वो सब ‘आउल गैंडी’ में जननायक की छवि देख रहे हैं। एक बार फिर से बढ़िया सी भाषाई चासनी में आउल गैंडी’ के समर्थक ज़हर उगल रहे हैं। अचानक से इनका पुराना प्रेम फिर जाग रहा है। मोदी को हटाना ही है तो खुलकर आइए। ये निष्पक्षता का चोला क्यों ओढ़े बैठे हैं? क्या फ़ालतू का कुर्सियां तोड़ रहे हैं?

इन धूर्तों को मोदी फूटी आंख नहीं सुहाते लेकिन क्या करें? ये बेचारों की मजबूरी है कि—मोदी को बर्दाश्त करना पड़ेगा। क्योंकि जनता बारंबार मोदी को चुनकर भेज रही है। वरना इन कृतघ्नों का वश चलता तो वो मोदी को कब से सत्ता से बेदखल कर आते।

हर चुनाव में ये मोदी को हारते हुए देखना चाहते हैं। लेकिन हर चुनाव में जनता— इन जाहिलों के मुंह पर ऐसा करारा तमाचा मारती है कि — ये कराह तक नहीं पाते। फिर चाहते न चाहते हुए भी मोदी की प्रशंसा करने का दिखावा करना पड़ जाता हैं। मोदी पर न जाने हर समय कितने आरोप लगाते रहते हैं। काश ये जितने आरोप मोदी पर लगाते हैं — वैसा मोदी की सरकार करती तो ये कहीं किसी कूड़ेदान में पड़े होते।

काश! ‘कों-ग्रेस’ जैसे मोदी की डबल इंजन सरकारें — इनका अच्छे से इलाज़ करतीं तो ये जितने धूर्त शेखी बघारते रहते हैं। ये उफ़ तक न करते। इन्हें पता है कि मोदी को गाली दीजिए, बीजेपी के वैचारिक अधिष्ठान को गाली दीजिए। इसके बावजूद भी इन पर कोई आंच नहीं आएगी। इसीलिए ये तथाकथित ज्ञानी— दिन-रात विष-वमन में जुटे रहते हैं। ये वही लोग हैं जिनकी तथाकथित ‘सीधी रीढ़’ – न जाने कितनी चौखटों पर सजदा और मुजरा करते हुए तनी हैं।

ये ख़ारिज लोग — मोदी को हटाने का स्वप्न पाले ऐंठ रहे हैं। इन्हें मालूम नहीं कि रस्सी के जल जाने के बाद ऐंठना नहीं चाहिए। क्योंकि अगर ‘कों-ग्रेस’ जैसे मोदी और उनकी डबल इंजन सरकारें — इंटरफेयर करना शुरू कीं तो फिर ठिकाना ढूंढना मुश्किल हो जाएगा। फिर ये सोरोस के पपेट की महानता के कसीदे गढ़ना भूली बिसरी बातें हो जाएंगी। पैसा मोदी की सरकार का चाहिए। ऊपर से स्वयंसेवक मोदी और उसके वैचारिक अधिष्ठान को गरियाना भी है। गज़ब का दोगलापन है न कि— एक ओर मोदी फासिस्ट है, सेंसरशिप है। दूसरी ओर उसी को दिन रात गालियां दी जा रही हैं। लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा है। आख़िर ऐसा कब तक चलेगा? मोदी और उसकी डबल इंजन सरकारें कुछ कहती नहीं है़ लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उन्हें कोई ख़बर नहीं है..!

 विशाल माहेश्वरी के स्टिंग में SP के लिए रेट लिस्ट भेजने वाले ‘इंडिपेंडेंट’ जर्नलिस्ट्स और इन्फ्लुएंसर्स                                                            

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दिल्ली। विशाल माहेश्वरी (@vishalPosts) के स्टिंग में कई स्व-घोषित ‘इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट’ और इन्फ्लुएंसर्स ने समाजवादी पार्टी (SP) के लिए पेड पॉलिटिकल कंटेंट बनाने के ऑफर पर रेट लिस्ट भेजी या बातचीत जारी रखने की सहमति जताई।

फैक्ट-चेकर और द फैक्ट मिथ्स से जुड़े विशाल माहेश्वरी ने एक ईमेल आईडी से 2027 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले SP के लिए Instagram रील्स बनाने का प्रपोजल भेजा। कई ऐसे लोगों ने, जो दिल्ली में चल रहे विरोध-प्रदर्शनों (विशेष रूप से SIR/मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों) को कवर कर रहे थे, प्रेस कार्ड और माइक के साथ ‘इंडिपेंडेंट’ छवि बना रहे थे और अक्सर पुलिस या अन्य मीडिया से टकराव दिखा रहे थे, जवाब में रेट और वर्क सैंपल्स भेज दिए। कुछ ने मोबाइल नंबर साझा किया। विशाल ने ईमेल स्क्रीनशॉट्स के साथ दो थ्रेड्स (14 और 15 अक्टूबर 2026) में यह खुलासा किया।

इस घटनाक्रम ने इन्फ्लुएंसर (Influencer) बनकर राजनीतिक कन्टेंट के लिए सौदा करने वालों की सच्चाई उजागर की है, यह कुछ नाम है जो माहेश्वरी के प्रयास से सामने आए। यह सूची बहुत लंबी हो सकती है। इसमें चैनलों के मैनेजिंग एडिटर स्तर के कई पत्रकार जो यू ट्यूब पर उतर आए है। उनका monetary management समझने में मदद मिल सकती हे।

इनमें कई लोग ‘गोदी मीडिया’ कहकर मुख्यधारा के पत्रकारों को चिढ़ाते या घेरते दिखे, लेकिन खुद राजनीतिक पार्टी के प्रचार के लिए पैसे मांगने या बातचीत करने से नहीं हिचकिचाए। उनका काम बड़ी हद तक पेड या पार्टी-फ्रेंडली कंटेंट पर निर्भर प्रतीत होता है, जिसे वे ‘इंडिपेंडेंट जर्नलिज्म’ के नाम से छुपाते हैं।

विशाल के अनुसार, इनमें से कई राहुल गांधी के कार्यक्रमों (जैसे छात्रों की गूंज) में मीडिया पास लेकर जाते और उनकी तारीफ वाले वीडियो बनाते दिखे।

नीचे विशाल के थ्रेड्स और रिपोर्टेड डिटेल्स के आधार पर एक-एक नाम, संक्षिप्त परिचय और डिमांडेड रेट दिए गए हैं। ये विशाल द्वारा साझा ईमेल जवाबों पर आधारित हैं।

  1. ममता सिंह (News Capsule)
    News Capsule से जुड़ी जर्नलिस्ट, Instagram पर 3 लाख से अधिक फॉलोअर्स। दिल्ली विरोधों में सक्रिय। विशाल के ऑफर पर उन्होंने एक रील के लिए ₹40,000 की मांग की और वर्क सैंपल्स भेजे। News Capsule की रिपोर्टिंग अक्सर एक पक्ष की आलोचना करती दिखती है।
  1. प्रिया सिंह (News Capsule)
    ममता के साथ ही News Capsule से जुड़ी। Instagram पर 2.5 लाख से अधिक फॉलोअर्स। प्रति Instagram रील ₹30,000–₹35,000 की रेट बताई। बल्क पैकेज के लिए ₹25,000–₹30,000 का जिक्र भी हुआ। विशाल के अनुसार, उनकी शादी अनुराग सिंह से है, जो रणविजय सिंह (कांग्रेस आईटी सेल से जुड़े) के करीबी बताए जाते हैं।
  1. शिवानी गौतम
    स्वयं को इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट बताती हैं। Instagram ~95K। विरोधों में पुलिस से बहस करती दिखीं। उन्होंने दावा किया था कि भाजपा आईटी सेल ने उन्हें पेड वीडियो का ऑफर दिया था, जिसे उन्होंने एक्सपोज किया। लेकिन SP के ऑफर पर उन्होंने रुचि जताई और मोबाइल नंबर साझा कर दिया।
  1. जैश मलिक
    माइक और प्रेस कार्ड के साथ विरोध कवर करते। Instagram ~205K। “इंडिपेंडेंट वॉयस” की छवि। SP ऑफर पर बातचीत करने को तैयार रहे। उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग के सैंपल्स (उर्दू कविता सहित) भी साझा किए।
  1. प्रिशा यादव
    विरोधों में सक्रिय, सुरक्षा कर्मियों को टारगेट करने वाली। एक रील ₹13,000, पांच के लिए ₹50,000 और दस के लिए ₹85,000 तक का पैकेज कोट किया। अंतिम ब्रीफिंग के बाद बदलाव संभव बताया।
  1. मनीष राजपूत
    Aaj Tak के जर्नलिस्ट को घेरकर “गोदी मीडिया” चिल्लाते हुए वीडियो में दिखे। Instagram ~191K। SP रील्स के लिए ₹15,000 प्रति रील (बल्क में डिस्काउंट) की रेट दी। फेसबुक प्रमोशन और लॉन्ग-टर्म पार्टनरशिप की बात की। श्याम मीरा सिंह जैसे राहुल समर्थक के साथ भी फोटो में देखे गए।
  1. गोविंद गुर्जर
    अन्य पत्रकारों को “गोदी मीडिया” कहते हुए विरोध कवर करते। Instagram ~103K। दो बार ईमेल पर उन्होंने प्रपोजल को जर्नलिस्टिक आधार पर रिजेक्ट नहीं किया। व्यस्त होने का कहकर नंबर और वर्क सैंपल्स साझा किए।
  1. वंदना मीना
    कंटेंट क्रिएटर, दिल्ली विरोधों में वीडियो बनाती। कांग्रेस से राहुल गांधी के कार्यक्रमों के मीडिया पास मिलते हैं। पैकेज: ₹15,000 प्रति रील से लेकर ₹1.6 लाख तक (20 रील्स या मंथली पैकेज)। Instagram ~122K।
  1. मिलन सर (अनिल कुमार)
    जर्नलिस्ट के रूप में दिल्ली विरोधों और राहुल गांधी के कार्यक्रमों में नजर आए। Instagram ~517K। Instagram रील्स के लिए ₹20,000–₹50,000, फेसबुक ₹40,000 और YouTube Shorts ₹20,000 की रेट बताई।
  1. खोटा सिक्का (अकाउंट)
    पॉलिटिकल और सोशल मुद्दों पर रैप बनाते। दिल्ली विरोधों में माइक के साथ और राहुल के छत्रों की गूंज में मीडिया पास के साथ दिखे। Instagram रील ₹25,000, फेसबुक ₹30,000 और पॉलिटिकल सॉन्ग ₹50,000। महत्वपूर्ण फॉलोइंग बेस (YouTube, IG, FB)।
  1. नेहा शर्मा (That’s Her Podcast)
    “इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट” की छवि, विरोध कवर करतीं। Instagram ~156K, YouTube ~203K। प्रति रील ₹25,000–₹35,000 (वॉल्यूम के हिसाब से), अनलिमिटेड के लिए मंथली रिटेनर ₹5 लाख से अधिक, ऑन-ग्राउंड रिपोर्टिंग ₹50,000 प्रति दिन। NCR बाहर ट्रैवल आदि अलग।
  1. विशाल काद्यान
    प्रेस कार्ड और माइक के साथ विरोध कवर करते, राहुल गांधी इवेंट्स के मीडिया पास मिलते हैं। Instagram ~195K। SP प्रोजेक्ट पर बातचीत करने को तैयार रहे और प्राइस पर कॉल की बात की।

पार्ट 2 के नाम:

  1. गरिमा सिंह (Human Online)

दिल्ली विरोधों की कवरेज के लिए प्रशंसा मिली। एक रील के लिए ₹12,000 की रेट दी। उन्होंने स्वीकार किया कि पहले तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए वीडियो बना चुकी हैं।

  1. तनु बलियान
    स्व-घोषित इंडिपेंडेंट, विरोधों में सक्रिय। सुरक्षा कर्मियों से बातचीत का वीडियो वायरल। प्रति रील ₹12,000 और मंथली ₹3 लाख की मांग की।
  1. फिजा जमीरुद्दीन (4PM)
    4PM से जुड़ी। द फैक्ट मिथ्स ने पहले उन्हें फेक न्यूज फैलाने पर पकड़ा था। प्रति रील ₹40,000–₹50,000 और मंथली ₹4–5 लाख बताया, नंबर साझा किया। लगभग एक घंटे बाद दूसरा ईमेल भेजकर मना कर दिया। विशाल ने मजाक में “शक हो गया” लिखा।
  1. अलका मौर्या
    कंटेंट क्रिएटर, कई वीडियो भाजपा के खिलाफ। राहुल गांधी के छत्रों की गूंज में जर्नलिस्ट रोल और मीडिया पास। एक रील के लिए ₹50,000 की रेट।
  1. प्रतीक तन्मय
    जर्नलिस्ट। SP ऑफर पर कॉन्टैक्ट डिटेल्स साझा किए और प्रोजेक्ट में शामिल होने की इच्छा जताई।
  1. गजेंद्र सिंह (News Diggy)
    News Diggy के फाउंडर। दिल्ली पुलिस को धमकी देते वीडियो में दिखे। ऑफर पर मना नहीं किया, मोबाइल नंबर मांगकर आगे चर्चा की बात की। सहयोगी रोजी भी CJP विरोधों और राहुल इवेंट में सक्रिय।
  1. आलोक त्रिपाठी
    दिल्ली विरोधों में माइक के साथ घूमते। एक वीडियो में अनुराग मिश्रा को “गोदी मीडिया” कहते दिखे। प्रति रील ₹30,000 की रेट बताई।
  1. पारस
    CJP विरोधों में देखी गईं कंटेंट क्रिएटर। एक रील ₹30,000। उन्होंने बताया कि पहले एक रील के लिए ₹25,000 लिया था, जो राहुल गांधी के छत्रों की गूंज से संबंधित थी।

विशाल ने कहा कि कुछ और ईमेल्स बाकी हैं और जल्द शेयर करेंगे।

विडंबना और व्यापक संदर्भ

इनमें से कई लोग “गोदी मीडिया” का आरोप लगाकर अन्य पत्रकारों को घेरते, पुलिस से टकराव दिखाते या “क्रांतिकारी” जर्नलिज्म का दावा करते हैं। लेकिन जब SP (विपक्षी गठबंधन का हिस्सा) के लिए पेड प्रचार का ऑफर आया तो नैतिक या जर्नलिस्टिक आधार पर रिजेक्शन कम ही दिखा। इसके बजाय रेट लिस्ट, सैंपल्स, नंबर या चर्चा की सहमति मिली। यह दर्शाता है कि उनकी “इंडिपेंडेंस” अक्सर चुनिंदा है-एक पक्ष के खिलाफ आक्रामक और दूसरे के लिए उपलब्ध।

दिल्ली के विरोध-प्रदर्शनों में ये लोग सक्रिय थे, जहां मुख्यधारा मीडिया की आलोचना होती थी। लेकिन विशाल के स्टिंग से पता चलता है कि कई बार उनकी उपस्थिति और कंटेंट राजनीतिक इवेंट्स (राहुल गांधी कार्यक्रम) से जुड़ा होता है, जहां मीडिया पास मिलते हैं और कंटेंट अक्सर प्रशंसात्मक होता है। यह पत्रकारिता और इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग की सीमा को धुंधला करता है। छोटे क्रिएटर्स और तथाकथित जर्नलिस्टों के लिए ₹12,000 से ₹50,000 प्रति रील और लाखों मासिक रिटेनर सामान्य व्यावसायिक दरें हो सकती हैं, लेकिन “इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट” और प्रेस कार्ड का इस्तेमाल करते हुए राजनीतिक पार्टी के लिए चुपचाप उपलब्ध होना नैतिक सवाल खड़े करता है।

यह केवल SP तक सीमित नहीं। कुछ ने TMC जैसे अन्य दलों के लिए पहले काम करने का जिक्र किया। सोशल मीडिया युग में पेड पॉलिटिकल कंटेंट आम हो गया है-पार्टियां, IT सेल्स और एजेंसियां इन्फ्लुएंसर्स को हायर करती हैं। समस्या तब पैदा होती है जब इसे छुपाकर “जनता की आवाज” या “निष्पक्ष पत्रकारिता” का मुखौटा पहना जाता है। विशाल का स्टिंग इसी मुखौटे को उतारने का प्रयास है।

आलोचक कहते हैं कि सभी मीडिया में पक्षपात हो सकता है और पेड कंटेंट पारदर्शी होना चाहिए। समर्थक तर्क देते हैं कि ऐसे खुलासे सत्ता पक्ष के लिए फायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन साक्ष्य (ईमेल स्क्रीनशॉट्स) के आधार पर दावे सत्यापित होने चाहिए। विशाल ने थ्रेड में स्पष्ट कहा कि ये जर्नलिस्ट प्रेस कार्ड और माइक वाले हैं, न कि साधारण इन्फ्लुएंसर्स।

यह घटना 2027 यूपी चुनावों से पहले राजनीतिक संचार के माहौल को रेखांकित करती है। मतदाता को पता होना चाहिए कि कौन सा “इंडिपेंडेंट” वॉयस वास्तव में पेड प्रमोशन या चुनिंदा पक्षधरता पर आधारित है। विशाल माहेश्वरी का यह काम पारदर्शिता की मांग करता है और गोदी मीडिया के आरोप लगाने वालों की अपनी गोद की जांच की जरूरत दिखाता है।

कॉकरोच की जिंदगी: जब विदेश का पैसा घरेलू अराजकता उगलने लगता है

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दिल्ली। मैरी मिलबेन ने भारत के युवा देशभक्तों से कहा कि चुप रहने का समय नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि अभिजीत दिपके और कॉकरोच पार्टी (@Cockroachisback) को अमेरिका के उन डोनर्स से फंडिंग मिल रही है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके नेतृत्व वाले भारत के भविष्य के खिलाफ हैं। उन्होंने भरोसा दिलाया कि मोदी, जिन्होंने 25 साल सेवा की है (12 साल प्रधानमंत्री के रूप में, तीन बार लगातार चुने गए), अपने देश से आने वाली इन विघटनकारी ताकतों के आगे नहीं झुकेंगे। उन्होंने वैश्विक पैटर्न का जिक्र किया—कंजर्वेटिव नेताओं को निशाना बनाकर अमेरिका में पढ़े-लिखे व्यक्ति को रेडिकलाइज कर अपने देश भेजकर अराजकता और विनाश फैलाना। ऐसे प्रयास सफल नहीं होते लेकिन विकास और शासन को प्रभावित जरूर करते हैं। अंत में उन्होंने भारत की मिट्टी पर जन्मे, पले-बढ़े और शिक्षित नए आवाज को संगठित होकर कॉकरोच पार्टी की विघटनकारी भावना के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध करने और लोकतंत्र व स्वतंत्रता की रक्षा के लिए काउंटर मूवमेंट चलाने का आह्वान किया—“उठो, युवा देशभक्तों!”
मैरी मिलबेन का यह संदेश भारत के राष्ट्रवादियों के लिए गंभीर चेतावनी है। यह सिर्फ एक गायिका की टिप्पणी नहीं, बल्कि विदेशी हस्तक्षेप के आरोप पर आधारित है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP), जो शुरू में एक व्यंग्यात्मक युवा आंदोलन थी और परीक्षा लीक, बेरोजगारी जैसी मुद्दों पर उठी, अब चुनाव आयोग समेत बड़े विरोधों में शामिल है। मिलबेन का दावा है कि अमेरिका आधारित डोनर्स, जो मोदी के खिलाफ हैं, ऐसे समूहों को फंडिंग दे रहे हैं। उन्होंने वैश्विक पैटर्न बताया—कंजर्वेटिव/राष्ट्रवादी नेताओं को टारगेट करना, यूएस-शिक्षित व्यक्ति को प्रभावित करना, वापस भेजकर अस्थिरता पैदा करना। इससे शासन बाधित होता है और विकास प्रभावित होता है, भले ही आंदोलन पूरी तरह सफल न हो।
इसका गहरा मतलब यह है कि राष्ट्रवादियों को सतर्क रहना चाहिए। बाहरी फंडिंग या प्रभाव वाले आंदोलन देश की स्थिरता और चुनावी मंडेट को कमजोर कर सकते हैं। उन्होंने “भारत की मिट्टी पर जन्मे, पाले-पोसे और शिक्षित” आवाज को उठने का आह्वान किया, जो शांतिपूर्ण और संगठित विरोध के जरिए लोकतंत्र की रक्षा करे। यह याद दिलाता है कि असली देशभक्ति स्थानीय जड़ों, स्थिर शासन और निरंतर विकास में है। मोदी की लंबी सेवा और तीन बार की जीत का जिक्र करके वे स्थिरता का समर्थन कर रही हैं। कुल मिलाकर, यह संदेश युवा राष्ट्रवादियों को जागरूक करता है कि अराजकता के बजाय स्वदेशी, रचनात्मक काउंटर-मूवमेंट चलाएं, ताकि विदेशी ताकतों के प्रभाव से देश की दिशा न भटके।

अमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन की ताज़ा टिप्पणी

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 “चुप रहने का समय नहीं रहा” – कॉकरोच जनता पार्टी और विदेशी फंडिंग का आरोप

    

अमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन भारतीय राष्ट्रगान और भजन गाकर भारत और भारतीय समुदाय के बीच जानी–पहचानी नाम बन चुकी हैं। सोशल मीडिया पर उन्होंने भारतीयों को संबोधित करते हुए कहा कि “चुप रहने का समय नहीं रहा।” उनका आरोप है कि अभिजीत दिपके और उनकी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को अमेरिका के उन डोनर्स से फंडिंग मिल रही है, जो प्रधानमंत्री मोदी और उनके नेतृत्व वाले भारत के भविष्य के खिलाफ हैं। 

नया नहीं है पैटर्न 

  • मिलबेन के अनुसार यह कोई नया पैटर्न नहीं है। प्रगतिशील/वामपंथी/सेकुलर विचार वाले, अमेरिका में पढ़े-लिखे व्यक्ति को रेडिकलाइज कर अपने देश वापस भेजा जाता है और फंडिंग देकर अराजकता खड़ी की जाती है। विकास रुक जाए, शासन बिखर जाए, युवा भ्रमित हो जाएं-यही लक्ष्य होता है। 
  • वे कहती हैं कि ऐसे प्रयास पूरी तरह सफल नहीं होते, लेकिन देश की रफ्तार जरूर धीमी कर देते हैं। ‘कॉकरोच’ का स्वभाव साफ जगह पर नहीं पनपना है। गंदगी, अंधेरा और अफरा-तफरी में ही उसे आराम मिलता है। एक व्यंग्य से शुरू हुआ आंदोलन अब बड़े विरोधों में बदल गया है। 
  • परीक्षा लीक, बेरोजगारी, चुनाव आयोग-जहां अस्थिरता का मौका दिखे, वहीं यह फैल जाता है। विदेश की पढ़ाई और पुराने राजनीतिक जुड़ाव वाले लोग जब अचानक ‘युवाओं की आवाज’ बन जाते हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि असली मकसद सुधार है या सिर्फ व्यवधान।

पिछले साल राहुल गांधी पर उनकी तीखी टिप्पणी

  • मिलबेन की यह हालिया टिप्पणी उनकी पहले की राय से मेल खाती है। पिछले साल अक्टूबर 2025 में, जब राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया था कि वे डोनाल्ड ट्रंप से “डरे” हुए हैं (ट्रंप के उस दावे के बाद कि भारत रूसी तेल खरीदना बंद कर देगा), तब मिलबेन ने सीधे राहुल गांधी को संबोधित करते हुए लिखा था:
  • “आप गलत हैं, राहुल गांधी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्रपति ट्रंप से नहीं डरते। पीएम मोदी विजनरी हैं और अमेरिका के साथ उनकी कूटनीति रणनीतिक है। जैसे डोनाल्ड ट्रंप हमेशा अमेरिका के हितों को पहले रखेंगे, वैसे ही पीएम मोदी भारत के लिए जो सबसे अच्छा है वही करेंगे। और मैं इसकी सराहना करती हूं। यही राष्ट्राध्यक्ष करते हैं। वे अपने देश के लिए जो सबसे अच्छा हो वही कहते और करते हैं।
  • मैं आपसे इस तरह की नेतृत्व क्षमता समझने की उम्मीद नहीं करती क्योंकि आपके पास भारत के प्रधानमंत्री बनने की समझ ही नहीं है। बेहतर होगा कि आप अपनी ‘आई हेट इंडिया’ टूर पर लौट जाएं, जिसका दर्शक सिर्फ एक है-आप खुद।”
  • यह टिप्पणी राहुल गांधी के उस पोस्ट के जवाब में आई थी जिसमें उन्होंने मोदी पर ट्रंप से डरने, बधाई संदेश भेजते रहने और ऑपरेशन सिंदूर जैसे मुद्दों पर चुप रहने के आरोप लगाए थे। मिलबेन ने साफ कहा कि राज्य प्रमुख अपने देश के हित में फैसले लेते हैं-यह समझना हर किसी के बस की बात नहीं।

मोदी नहीं झुकेंगे, युवा देशभक्तों को उठना होगा

  • मिलबेन अब भी वही बात दोहरा रही हैं। वे कहती हैं कि मोदी 25 साल की सेवा और तीन बार की चुनावी जीत के बाद इन विदेशी ताकतों के आगे नहीं झुकेंगे। अब जरूरत है भारत की मिट्टी पर जन्मे, पले-बढ़े और शिक्षित लोगों की। शांतिपूर्ण, संगठित और स्वदेशी काउंटर मूवमेंट की। लोकतंत्र की रक्षा सिर्फ नारे लगाने से नहीं होती। उसे उन ताकतों से बचाना पड़ता है जो बाहर से पैसा लेकर अंदर अराजकता बोती हैं।
  • कॉकरोच को कुचलने की जरूरत नहीं। उसे रोशनी में लाना पड़ता है। जब युवा देशभक्त खुद उठकर खड़े होंगे, तो विदेशी फंडिंग वाली विघटनकारी भावना खुद सिमट जाएगी। कॉकरोच की अंधेरी कोनों में घुसने की आदत है। उसे वहां से निकालने का काम हम सबका है।
  • मिलबेन की ये टिप्पणियां-चाहे राहुल गांधी पर पिछले साल की हो या अभिजीत दिपके और CJP पर अभी की गई-इनका सार एक ही है: भारत के नेतृत्व और युवाओं को बाहरी हस्तक्षेप और अस्थिरता फैलाने वाली ताकतों के प्रति सतर्क रहना चाहिए।

हरिश साल्वे का ताज़ा आरोप: दिपके और अन्य नाम

  • वरिष्ठ वकील और पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरिश साल्वे ने हाल में कहा कि भारत में कुछ विरोध प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग और बाहरी हस्तक्षेप है। उन्होंने अमेरिका को विशेष रूप से उल्लेख किया और नेपाल, श्रीलंका तथा बांग्लादेश में हुई उथल-पुथल का उदाहरण दिया।
  • साल्वे ने साफ नाम लिए-अभिजीत दिपके, सौरव दास और कुछ यूट्यूबर्स। उनका सवाल था कि ये लोग विरोध आयोजित करने के लिए धन कहां से लाते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बाहरी ताकतें भारत की प्रगति रोकने की कोशिश कर रही हैं। 
  • यह आरोप मिलबेन के पैटर्न वाले दावे से मेल खाता है। दिपके बोस्टन यूनिवर्सिटी से पढ़े-लिखे हैं और CJP के जरिए युवा आंदोलन खड़ा करने वाले चेहरे बन चुके हैं।
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