International Day of Yoga: Isha Foundation To Conduct 1,000 Free Yoga Sessions Across India

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–          50,000 people from corporates, education, medical, government, defence institutions and community spaces to join yoga sessions by Isha

–          Yoga sessions in Sadhguru Sannidhi Bengaluru and Isha Yoga Center will be conducted for the NCC cadets, BSF Jawans, students, villagers.

–          Apart from existing 6 languages, 6 new languages – Gujarati, Kannada, Malayalam, Bangla, Italian and Nepali, will be added to Sadhguru’s free meditation app “Miracle of Mind” on the occasion of International Day of Yoga.

Bengaluru: Marking the International Day of Yoga, Isha Foundation is conducting nearly 1,000 yoga and meditation sessions across the country, with an estimated participation of 50,000 people from corporates, education, medical, government, defence institutions and community spaces.

Speaking about the deeper significance of yoga, Sadhguru has said, “Yoga is not just an exercise. It is a process and system through which human beings can find their highest possible potential.”

Reflecting this understanding, the sessions are designed to offer participants an experiential introduction to yoga as a holistic science for wellbeing and inner transformation. The sessions are being facilitated by trained volunteers and teachers from Isha Foundation. As part of the initiative, participants are being guided to simple yet powerful yogic practices that can be easily incorporated into daily life to enhance physical health, mental wellbeing and quality of life.

Alongside these sessions, participants are also being introduced to Miracle of Mind, Sadhguru’s free seven-minute guided meditation that enables anyone to effortlessly make meditation a part of their daily routine. Offered through the Miracle of Mind app, the meditation has reached over 3.5 million active users globally and is currently available in six languages — English, Hindi, Tamil, Telugu, Spanish and Russian. On the occasion of International Day of Yoga, six additional languages — Gujarati, Kannada, Malayalam, Bangla, Italian and Nepali — will be added to the app, making the meditation accessible to an even wider audience in their native languages. Requiring no prior knowledge or experience of yoga, the meditation is accessible to people from all walks of life. The app is available free for life at isha.sadhguru.org/in/en/miracle-of-mind.

Complementing the nationwide outreach, special International Day of Yoga celebrations will also be held at Isha centers. At Sadhguru Sannidhi Bengaluru, a large-scale gathering will take place in the presence of Adiyogi, bringing together more than 2,300 participants, including NCC cadets, Border Security Force (BSF) personnel, students, villagers, volunteers and members of the public. Meanwhile, at the Isha Yoga Center Coimbatore, over 700 participants, including 500 students from the Young Indians Coimbatore Chapter and 200 personnel from the Central Reserve Police Force (CRPF), will take part in the yoga and meditation sessions.

Over the past year alone, more than seven lakh visitors have benefited from the free yoga and meditation sessions offered at the Isha Yoga Center Coimbatore, reflecting the growing interest in these transformative practices.

About Isha Foundation

Guided by Sadhguru, Isha Foundation has been offering the ancient science of yoga in its purest form for over 30 years. Supported by over 17 million volunteers across more than 400 centres worldwide, the Foundation is committed to human wellbeing through initiatives that address the physical, mental, emotional and spiritual dimensions of life. Through powerful yoga and meditation programs, Isha offers transformative tools for inner wellbeing, enabling millions of people around the world to lead healthier, more joyful and fulfilling lives.

पहले योगी फिर मोदी -ये वन लाइनर टारगेट हैं

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श्रीरामन्मभूमि अयोध्या मंदिर में चढ़ावा चोरी वाले प्रकरण के जो भी अपराधी हों, उन्हें कठोर दंड मिलना चाहिए।

किन्तु- मैं भी जिस मीडिया का हिस्सा हूं। वो मीडिया— भाजपा, संघ को लेकर अभी भी कैसी मानसिकता रखता है? कांग्रेस और वामपंथियों की लाइन में ये मीडिया कैसे नैरेटिव गढ़ता है? अगर उसके मूल चरित्र को बारीकी से समझना है तो अयोध्या प्रकरण में ‘निष्पक्षता’ के चोले, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर RSS को टारगेट करने के कुंठित फुटप्रिंट और पंच से आसानी से समझा जा सकता है। आप कंटेट एनालिसिस कीजिए तो समझ आएगा कि—ये पूरा विमर्श ही सत्ता के खेल के इर्द-गिर्द रचा जा रहा है।

इसके साथ ही आरएसएस को लेकर कर्नाटक का प्रियंक खरगे प्रसंग और 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी के चरणों में नतमस्तक होने के दृश्यों को देखिए। वो भी तब जब राहुल और कांग्रेस दिन रात मीडिया को गाली देते हैं।‌ आज भी भाजपा की सत्ता के विज्ञापन से पोषित होने वाले चैनलों में शीर्ष पर नीति नियंता के तौर पर थोक के भाव वामपंथी और कांग्रेसी बैठे हुए हैं। जो मोदी को हिटलर कहते हैं, सभी सांविधानिक संस्थाओं को लेकर अविश्वास का वातावरण निर्मित कर रहे हैं। ये कह रहे हैं कि सारी एजेंसियां सब मोदी और भाजपा के इशारे पर चल रही हैं। कुछ नहीं होगा।— ये नैरेटिव किसका है? स्पष्ट है सोरोस गैंग और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों में मुस्लिम लीगी माओवादी कांग्रेस का…किन्तु क्या इस ओर क्या किसी का ध्यान है?

श्रीराम मंदिर प्रकरण से लेकर ये सारे नैरेटिव हमारे भारतीय स्वाभिमान, हिन्दू अस्मिता और मानबिंदुओं को आघात करने के लिए गढ़े जा रहे हैं। हिन्दुत्व के उत्कर्ष की चमक को फीकी करने के सुनियोजित कृत्य हैं। स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में — भारतीय मन सबसे पहले धार्मिक है,उसके बाद कुछ और’ ; इस पर प्रहार प्रहार जारी हैं।

पहले योगी फिर मोदी -ये वन लाइनर टारगेट हैं। बाक़ी सब टूलकिट हैं। अगर समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो समाज के मानस को ये कालनेमि सशंकित बना देंगे।

वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार डॉ. शैलेश शुक्ला को ‘पत्रकार रत्न सम्मान’ से अलंकृत

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लखनऊ। हिंदी पत्रकारिता, साहित्य, जनसंचार और वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले वरिष्ठ पत्रकार, प्रख्यात साहित्यकार, शोधकर्ता और अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त मीडिया विशेषज्ञ डॉशैलेश शुक्ला को अखिल भारतीय काव्य, कथा एवं कला परिषद, महू (इंदौर), मध्य प्रदेश द्वारा प्रतिष्ठित पत्रकार रत्न सम्मान से अलंकृत किया गया है। यह सम्मान उन्हें पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में उनके बहुआयामी, दीर्घकालिक और उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रदान किया गया।

देश की प्रतिष्ठित साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्था अखिल भारतीय काव्य, कथा एवं कला परिषद द्वारा प्रदान किया जाने वाला यह सम्मान उन व्यक्तित्वों को समर्पित है, जिन्होंने अपने लेखन, चिंतन और रचनात्मक कर्म के माध्यम से समाज, संस्कृति और राष्ट्र जीवन को नई दिशा प्रदान की है। डॉ. शैलेश शुक्ला का चयन इस सम्मान के लिए किया जाना न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि समूचे हिंदी जगत के लिए गौरव का विषय माना जा रहा है।

डॉ. शैलेश शुक्ला हिंदी और जनसंचार के क्षेत्र का एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने पत्रकारिता, साहित्य, शोध, अध्यापन, संपादन और भाषा प्रौद्योगिकी जैसे विविध क्षेत्रों में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। पत्रकारिता एवं जनसंचार में पीएच.डी. उपाधिधारक डॉ. शुक्ला हिंदी और जनसंचार में स्नातकोत्तर होने के साथ-साथ मानव संसाधन प्रबंधन एवं विपणन में एमबीए की उपाधि भी प्राप्त कर चुके हैं।

एक सशक्त कवि, लेखक, संपादक और चिंतक के रूप में डॉ. शुक्ला की एक हजार से अधिक रचनाएँ देश-विदेश के लगभग दो सौ समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, शोध जर्नलों और डिजिटल मंचों पर प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें कविताएँ, गीत, लेख, शोध-पत्र, साक्षात्कार, कहानियाँ और सामयिक टिप्पणियाँ शामिल हैं। वे पाँच पुस्तकों के लेखक, बीस से अधिक पुस्तकों एवं पत्रिकाओं के संपादक तथा विभिन्न प्रतिष्ठित प्रकाशनों में प्रकाशित चालीस से अधिक पुस्तक अध्यायों के रचनाकार हैं।

शोध और अकादमिक क्षेत्र में भी उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उनके पचास से अधिक शोध-पत्र प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। डिजिटल मीडिया के युग में हिंदी साहित्य की उभरती प्रवृत्तियों पर किया गया उनका शोध कार्य विशेष रूप से चर्चित रहा है। वर्तमान में वे सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के वैश्विक समूह संपादक के रूप में कार्य करते हुए हिंदी भाषा और साहित्य को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

डॉ. शुक्ला ने पत्रकारिता और अध्यापन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय सेवाएँ प्रदान की हैं। वे सिक्किम केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रथम हिंदी अधिकारी रहे हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालय में संचार विषय तथा सिक्किम विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर हिंदी के विद्यार्थियों को अध्यापन कार्य किया है। गृह मंत्रालय, भारत सरकार के राजभाषा विभाग के अंतर्गत हिंदी शिक्षण योजना, गंगटोक में अधिकारी-प्रभारी के रूप में भी उन्होंने महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया।

हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति के वैश्विक संवर्धन में भी डॉ. शैलेश शुक्ला की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों, साहित्यिक संस्थाओं और सांस्कृतिक संगठनों के सहयोग से सैकड़ों राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों, कवि सम्मेलनों, वेबिनारों और साहित्यिक आयोजनों का सफल संचालन और संयोजन किया है। उनके प्रयासों से मॉरीशस, नेपाल, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, सिंगापुर, मलेशिया, कुवैत, कतर, बेल्जियम, नीदरलैंड और अनेक अन्य देशों में हिंदी और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार को नई ऊर्जा मिली है।

डॉ. शुक्ला की प्रतिभा और योगदान को समय-समय पर अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जाता रहा है। उन्हें भारत सरकार के गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा राजभाषा गौरव पुरस्कार 2019-20’ तथा हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा नवोदित लेखक पुरस्कार 2003-04’ सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। हाल ही में उनका चयन अमेरिका स्थित Knowledge Networks द्वारा आयोजित प्रतिष्ठित ERAI Fellowship 2026 के लिए भी किया गया है, जो कृत्रिम मेधा (Artificial Intelligence) की नैतिकता, शासन और उत्तरदायी उपयोग से जुड़े वैश्विक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच माना जाता है।

साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े विद्वानों, लेखकों, पत्रकारों और शुभचिंतकों ने डॉ. शैलेश शुक्ला को प्राप्त इस सम्मान पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा है कि यह सम्मान उनके चार दशकों से अधिक समय से निरंतर जारी रचनात्मक, बौद्धिक और सामाजिक योगदान की स्वाभाविक पहचान है। उनके लेखन और विचारों ने न केवल हिंदी पत्रकारिता और साहित्य को समृद्ध किया है, बल्कि नई पीढ़ी के लेखकों, शोधार्थियों और पत्रकारों को भी प्रेरणा प्रदान की है।

पत्रकार रत्न सम्मान से अलंकृत होकर डॉ. शैलेश शुक्ला ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि समर्पित पत्रकारिता, सृजनशील साहित्य और समाज के प्रति प्रतिबद्ध बौद्धिक दृष्टि के माध्यम से राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विशिष्ट पहचान स्थापित की जा सकती है। यह सम्मान निस्संदेह हिंदी पत्रकारिता और साहित्य जगत के लिए गर्व और प्रसन्नता का विषय है।

अयोध्या मंदिर में चढ़ावा चोरी : यह मंदिर निर्माण विरोधियों का नया शोर या चोरी का कुचक्र भी

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अयोध्या (उप्र): विश्व प्रसिद्ध रामजन्म मंदिर अयोध्या में चढ़ावा चोरी के नित नये आरोप सामने आ रहे हैं, चार ट्रस्टियों के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट भी थाने में की है। ट्रस्ट की पहल पर उत्तर प्रदेश सरकार ने जाँच केलिये एसआईटी गठित कर दी है। जांच के बाद पता चलेगा कि क्या वाकई चढ़ावे में चोरी हुई अथवा यह श्रृद्धाओं की आस्था पर आघात करने का कोई कुचक्र है। इस चढ़ावा चोरी का आरोप लगाने वालों में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी के वे नेता सबसे मुखर हैं जो मंदिर निर्माण अभियान के कभी सहमत नहीं रहे।

सामान्यता ग्रहणकाल कुछ घंटों का होता है। शनिदेव की महादशा अधिकतम साढ़े सात साल और राहु की महादशा अठारह वर्ष तक चलती है। लेकिन अयोध्या में श्रीराम जन्मस्थान मंदिर पर जो ग्रहण लगभग नौ सौ वर्ष पहले लगा था उसकी मुक्ति अभी तक नहीं हो पा रही। युग बदला, सत्ताएँ बदली, सल्तनत और अंग्रेजीकाल भी चला गया लेकिन अयोध्या जन्मस्थान मंदिर को निशाने पर लेने की मानसिकता नहीं बदली। पहले सतत सैन्य आक्रमण हुये, लूटने, तोड़ने के बाद पुनर्निमाण का संघर्ष चला। पीढ़ियाँ बीतीं लेकिन रामभक्तों की जिजीविषा बनी रही। समय के साथ संघर्ष की शैली तो बदली लेकिन रामजन्म स्थान मुक्ति का संघर्ष कभी रुका नहीं। 1949 में संघर्ष का में नया अध्याय जुड़ा। अपने जन्मस्थान में रामलला स्वयं प्रकट हो गये। लेकिन दिल्ली सरकार का दृष्टि प्रतिकूल रही और मंदार में विधिवत प्राण प्रतिष्ठा न हो सकी। संघर्ष भी नये स्वरूप में बदला। न्यायालय में याचिकाओं के साथ देशभर से श्रृद्धालु कारसेवक के रूप में अयोध्या पहुँचने लगे, गोलियाँ चलीं, रामसेवकों के बलिदान हुये। ढाँचा ढहा। अंततः। 9 नवम्बर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय आया। 5 फरवरी 2020 को संसद की अनुमति से भारत सरकार द्वारा स्वतंत्र श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास का गठन किया गया। 5 अगस्त 2020 को प्रधानमंत्री श्रीनरेन्द्रजी मोदी की उपस्थिति में भूमिपूजन हुआ और 22 जनवरी 2024 को श्रीरामलला अपने जन्मस्थान पर विराजमान हो गये।
जिन दिनों यह प्रकरण न्यायालय में था तब सभी पक्षों ने न्यायालय के निर्णय को मानने की घोषणा की थी। रामभक्तों को आशा थी कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद स्थिति सामान्य होगी और संपूर्ण देश अपने आराध्य के निर्विवाद दर्शन कर सकेंगे। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जिस प्रकार रामजी का जीवन वनवास काटने के बाद भी निरापद नहीं ठीक वही स्थिति इस जन्मस्थान मंदिर की रही। सर्वोच्च न्यायलय में भी कयी पेशियों पर नये नये विन्दु उठाए गये। जिससे प्रकरण को निर्णय तक आने में वर्षों लगे। संभवतः भारत के न्यायालयीन इतिहास में यह पहला प्रकरण था जिसमें निर्णय को विलंब से देने की याचिका भी लगी। बात यहाँ भी निरंतर रुकी। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय आने के बाद राम मंदिर निर्माण की प्रक्रिया विवाद उठाये गये। इसमें ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया तथा चयनित नामों पर भी विवाद उठाने का प्रयास हुआ। फिर मंदिर निर्माण के लिये भूमि पूजन की विधि और मुख्य यजमान पर विवाद उठाया गया। एक ओर पूजन चल रही थी और दूसरी ओर मीडिया में इस भूमि पूजन मुहुर्त से लेकर मुख्य यजमान तक पर प्रश्न खड़े किये जा रहे थे। विवाद का अगला मुद्दा श्रीरामलला के विराजमान होने के दिन शंकराचार्य की अनुपस्थिति के साथ तिथि मुहूर्त का भी मुद्दा उछाला गया। इसके बाद ट्रस्ट द्वारा क्रय की गई भूमि के मूल्य को उछाला गया। लेकिन इन सब बातों और विवादों का रामभक्तों की श्रृद्धा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। देश विदेश से भक्तों का तांता लग गया। प्रतिदिन लाखों लोग अयोध्या आते। अब तक 45 करोड़ से अधिक श्रद्धालु अयोध्या जाकर श्रीरामलला के दर्शन कर चुके हैं।
लेकिन कथित चढ़ावा चोरी का यह हमला द्वितरफा है। एक ओर मंदिर प्रबंधन की साख पर और दूसरा श्रृद्धालुओं की भावनाओं पर। आरोप है कि मंदिर में आने वाले चढ़ावे और श्रृद्धालुओं की दान राशि में करोड़ों रुपये की चोरी हुई है। आरोप चढ़ावे में आये आभूषणों में भी चोरी के आरोप लगाये गये हैं। चोरी के केवल आरोप ही नहीं लगे राम मंदिर न्यास के महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा, राम मंदिर की व्यवस्थापक गोपाल राव और चंपत राय के ड्राइवर रहे राम शंकर दयाल उर्फ टिन्नू यादव के विरुद्ध थाने में नामजद रिपोर्ट भी की गई। आरोप पर प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मैदी ने भी संज्ञान लिया और मंदिर प्रबंधन ने भी। मंदिर प्रशासन की पहल पर उत्तर प्रदेश सरकार ने तीन सदस्यीय एसआईटी का गठन कर दिया। एसआईटी की टीम ने मंदिर परिसर में दान पेटियों के प्रबंधन, कर्मचारियों की आवाजाही, चढ़ावा प्रक्रिया, दान के बही-खातों आदि की लगातार तीन दिन तक जांच की। एसआईटी अब नोट गिनने वाले उन पचास कर्मचारियों की संपत्ति की जांच कर रही है जिनपर नोट चोरी का आरोप है। एसआईटी को सात दिन में प्रारंभिक और पन्द्रह दिन में फाइनल रिपोर्ट देना है। यदि आरोप सही पाये गये तो चढ़ावे की चोरी के चेहरे सामने आयेंगे और एसआईटी का प्रतिवेदन एफआईआर में बदल जायेगा।
आरोपों की सच्चाई तो एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट में ही स्पष्ट होगी लेकिन आरोपों की शैली और शिकायत का विवरण बहुत आश्चर्यजनक है। सबसे पहले “चढ़ावा चोरी” शब्द। चोरी शब्द एक लंबे समय से राजनैतिक आरोप प्रत्यारोपण में प्रमुख बना। सबसे पहले “चौकीदार चोर” शब्द सामने आया। फिर “वोट चोरी” “सीट चोरी” “चुनाव चोरी” शब्द चर्चा में आये। और अब यह चढ़ावा चोरी शब्द आया। अब मंदिर में चढ़ावा चोरी शब्द ठीक उसी प्रकार उछाला जा रहा है जैसा कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आम आदमी जैसे राजनैतिक दल से वोट चोरी, चुनाव चोरी या सीट चोरी के आरोप उछालते रहे हैं। इन राजनैतिक दलों के लोग भी इस कथित चढ़ावा चोरी का आरोप लगाने वालों में भी मुखर हैं।
आरोपों में दो और विन्दु आश्चर्यजनक हैं। एक ट्रस्ट के महासचिव चंपतराय जी सहित चार पदाधिकारियों को निशाने पर लेना और दूसरा विन्दु आरोपों में कथित चोरी की अनुमानित राशि और चोरी के तरीके का विवरण भी देना।
आरोपों में महासचिव चंपत राय जी, ट्रस्टी गोपालराव, अनिल मिश्रा तथा व्यवस्थापक टिन्नू यादव के विरुद्ध नामजद रिपोर्ट होना भी आश्चर्यजनक है। । चंपतराय जी का संत जीवन है। उन्होंने रामजी की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया है। काँग्रेस और समाजवादी पार्टी सहित मंदिर निर्माण विरोधियों के निशाने पर चंपतराय सदैव रहे हैं। लेकिन उनकी संकल्पशीलता कभी वाधित नहीं हुई। वे करोड़ो रामभक्तों के आदर का केन्द्र हैं। उनको चढ़ावा चोरी में नामजद जोड़ना भी सामान्य नहीं माना जा सकता। एक आरोपों के विवरण का विन्दु भी आश्चर्यजनक है। इसमें चोरी किस प्रकार की गई यह भी विवरण दिया गया है।
आरोपों की सच्चाई बहुत शीघ्र सामने आने वाली है। चूंकि ट्रस्ट के पदाधिकारियों से लेकर मुख्यमंत्री योगी जी और प्रधानमंत्री भी इस शिकायत के बाद गंभीर हैं। यदि चढ़ावे में चोरी हुई है तो यह साधारण चोरी नहीं हो सकती। यह मंदिर के प्रति जन आस्था में आघात पहुँचाने का एक योजनापूर्वक कुचक्र हो सकता है।
नियमानुसार नोटों की गिनती कैमरे की निगरानी में होने का प्रावधान है। नोट गिनने वाले कर्मचारियों की आते और जाते समय तलाशी होने और बिना जेब के साधारण कपड़े पहने का नियम भी है। क्या इन नियमों में ढिलाई बरती गई? यदि ढिलाई बरती गई तो इसका सूत्र कहाँ है? नोट गिनने वालों में कुछ लोग ट्रस्ट के नियमित कर्मचारी नहीं हैं? उनके जुड़ने का मार्ग कौनसा है? क्या कुछ बाहरी तत्वों ने योजनापूर्वक प्रबंधकों का विश्वास अर्जित करके यह चोरी कांड किया है, ताकि मंदिर प्रबंधन की छवि बिगाड़ी जा सके? उत्तर प्रदेश से वेष बदलकर मंदिरों में प्रवेश करने के समाचार आते रहे हैं। सौ से अधिक तो ऐसे नकली पुजारी पकड़ाये हैं जिनका सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं था। इसी माह जून में एक नकली साधू गले में रुद्राक्ष की माला पहनकर उज्जैन के महाकाल मंदिर की भस्म आरती में प्रवेश करता हुआ पकड़ाया। यह वे घटनाएँ हैं जो मंदिर प्रबंधकों और संपूर्ण समाज को अतिरिक्त सावधानी बरतने का संदेश दे रहीं हैं। सनातन धर्म के आस्था केन्द्रों में घुसपैठ करके आस्था पर आघात करने की घटनाएँ देशभर में घट रहीं हैं। क्या कोई ऐसा षड्यंत्र राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण बनाने में तो नहीं है। कथित चढ़ावा चोरी के आरोपियों को कठोर दंड देने के साथ इन सब प्रश्नों पर भी विचार आवश्यक है।
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