सरकारी कर्मचारियों की impunity: सस्पेंशन की आड़ में न्याय की हत्या

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दिल्ली। स्वतंत्र भारत में भी ब्रिटिश काल की एक खतरनाक परंपरा जीवित है—अपने कर्मचारियों को बचाना। सरकार इसे अपनी जिम्मेवारी समझती है। बड़े से बड़ा अपराध हो, सरकारी कर्मचारी पर उंगली उठाना मुश्किल। सस्पेंड कर दिया जाता है, वेतन आधा मिलता रहता है और जांच की आड़ में पूरा मामला ठंडा पड़ जाता है। जबकि आम आदमी के लिए वही अपराध जेल, जुर्माना और सामाजिक कलंक बन जाता है। यह दोहरा मापदंड न केवल न्याय की हत्या है, बल्कि लोकतंत्र की नींव को भी कमजोर करता है।

उदाहरण लें एक एसएचओ का। हत्या के मामले को दबाने के लिए रिश्वत लेता है और पकड़ा जाता है। उसे मात्र सस्पेंड कर दिया जाता है। सवाल उठता है—जिसने हत्यारे को बचाने में मदद की, उसे हत्या का साथी क्यों नहीं माना जाना चाहिए? उसकी नौकरी क्यों नहीं जाती? कानून की नजर में वह accessory to murder है, लेकिन विभागीय नियमों की दुनिया में वह केवल ‘विभागीय कार्यवाही’ का शिकार है। दुर्भाग्य यह कि इस अधिकारी ने पहले भी न जाने कितने मुकदमों में सच को झूठ और झूठ को सच बनाया होगा। उन पुराने मामलों की फिर कभी जांच नहीं होती। एक बार भ्रष्टाचारी पकड़ा गया तो उसके सारे पुराने फैसले संदिग्ध हो जाते हैं, लेकिन व्यवस्था इस सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं।

यह समस्या ब्रिटिश विरासत है। अंग्रेज अपने अफसरों को बचाते थे क्योंकि वे साम्राज्य की रीढ़ थे। भारतीय Penal Code और पुलिस व्यवस्था उसी मानसिकता पर खड़ी हुई। Article 311 of the Constitution सिविल सेवकों को सुरक्षा देता है। उद्देश्य अच्छा था—arbitrary सजा से बचाना। लेकिन आज यह corrupt अधिकारियों के लिए ढाल बन गया है। सस्पेंशन temporary उपाय है, न कि सजा। जांच लंबी खिंचती है, आरोपी रिटायर हो जाता है या केस दबा दिया जाता है। Prevention of Corruption Act के तहत सजा का प्रावधान है, लेकिन conviction rate निराशाजनक है और मुकदमे दशकों चलते हैं।

परिणामस्वरूप impunity की संस्कृति पनपी है। पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका के बीच nexus मजबूत होता जा रहा है। शक्तिशाली अधिकारी जानते हैं कि worst case scenario में सस्पेंड होना पड़ेगा, लेकिन पद, पेंशन और प्रतिष्ठा बरकरार रहेगी।

न्याय की मूल भावना है—equality before law। Constitution के Article 14 में सभी नागरिक समान हैं। फिर सरकारी कर्मचारी को extra protection क्यों? वह जनता की सेवा के लिए है, जनता का मालिक नहीं। चूंकि उसके पास सत्ता और संसाधन हैं, उसकी जिम्मेवारी भी अधिक होनी चाहिए। भ्रष्टाचार या गंभीर अपराध में उसकी सजा आम आदमी से कड़ी होनी चाहिए। रिश्वत लेकर केस दबाने वाले एसएचओ को नौकरी से बर्खास्तगी के साथ आपराधिक मुकदमे में कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

समाधान क्या है? केंद्र और राज्य सरकारों को कानूनों की पुनर्व्याख्या करनी होगी। पहले, corruption और serious misconduct के मामलों में time-bound inquiry और trial सुनिश्चित करें—अधिकतम 6-12 महीने। दूसरे, convicted अधिकारी के पुराने फैसलों की अनिवार्य समीक्षा हो। तीसरे, Prevention of Corruption Act में संशोधन कर public servant के लिए enhanced punishment का प्रावधान लाएं। चौथे, पुलिस सुधारों को लागू करें—Prakash Singh दिशानिर्देशों के तहत पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त करें, fixed tenure दें और accountability commission बनाएं।

साथ ही, technology का इस्तेमाल बढ़ाएं—body cameras, digital FIR, e-governance। Whistleblower protection को मजबूत करें ताकि ईमानदार कर्मचारी भी आवाज उठा सकें। Singapore और Hong Kong के मॉडल से सीख लें जहां उच्च वेतन के साथ swift और severe punishment है, जिससे भ्रष्टाचार न्यूनतम स्तर पर है।

सरकारी कर्मचारी अगर अपराध करता है तो मात्र सस्पेंड नहीं, बल्कि दंडित होना चाहिए। उसकी सजा position के कारण और अधिक कड़ी होनी चाहिए। जब तक हम इस colonial mindset को नहीं छोड़ेंगे, आम आदमी का न्याय और विश्वास हासिल नहीं होगा। लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब कानून सबके लिए समान रूप से लागू हो—चाहे वह आम नागरिक हो या शक्तिशाली अधिकारी।

समय आ गया है कि हम सस्पेंशन की परंपरा को समाप्त करें और जवाबदेही की नई संस्कृति स्थापित करें। “सबका साथ, सबका विकास” तभी संभव है जब ‘सबका विश्वास’ भी हो।

challanpay.in पर भरोसा: सुविधा या जोखिम?

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दिल्ली। ट्रैफिक चालान का झंझट हर वाहन मालिक को परेशान करता है। ऐसे में ChallanPay.in जैसी सेवाएँ आकर्षक लगती हैं, जो Parivahan पोर्टल से चालान चेक करने, भुगतान करने और कोर्ट के मामलों को सुलझाने का वादा करती हैं। Lawyered स्टार्टअप का यह प्रोडक्ट फंडिंग हासिल कर चुका है और मीडिया में चर्चित रहा है, लेकिन यूजर्स के अनुभव ट्रस्ट के मुद्दों को उजागर करते हैं।

Lawyered (Gurugram-आधारित) ने 2025-26 में Rainmatter (Zerodha), Turbostart और अन्य से $2.5 मिलियन (लगभग ₹23 करोड़) की फंडिंग हासिल की। IdeaBaaz शो पर All-Titans डील भी मिली। कंपनी 30 लाख+ वाहनों की सुरक्षा और 2.5 लाख+ चालानों के समाधान का दावा करती है। वे कानूनी नेटवर्क के जरिए चालान रिजॉल्यूशन और कंटेस्ट करने की सुविधा देते हैं, जिसमें कन्वीनियंस फी शामिल है। वेबसाइट सुरक्षित लगती है और स्कैम अलर्ट भी जारी करती है।

फिर भी, विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। Instagram, Reddit और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर दर्जनों यूजर्स शिकायत करते हैं कि भुगतान के बाद भी सरकारी पोर्टल (echallan.parivahan.gov.in) पर स्टेटस अपडेट नहीं होता। सपोर्ट टीम कॉल डिसकनेक्ट कर देती है, रिफंड में देरी होती है और कई मामलों में चालान “Pending” ही रह जाता है। कुछ यूजर्स इसे “फ्रॉड” तक बता चुके हैं। Scam-Detector जैसी साइट्स पर इसका ट्रस्ट स्कोर मीडियम है।

मुख्य समस्याएँ:

भुगतान के बावजूद चालान क्लियर न होना
खराब कस्टमर सपोर्ट
रिफंड की देरी
थर्ड-पार्टी फीस के बावजूद कोई गारंटी नहीं

जितना संभव हो, सरकारी वेबसाइट https://echallan.parivahan.gov.in/ का इस्तेमाल करें। ChallanPay जैसी सेवाएँ केवल जटिल कोर्ट केस में छोटी राशि से ट्राई करें और भुगतान के तुरंत बाद खुद स्टेटस वेरिफाई करें। हमेशा .gov.in वाले ऑफिशियल लिंक्स इस्तेमाल करें और अनऑफिशियल SMS/WhatsApp से बचें।

ChallanPay पूरी तरह स्कैम नहीं है, लेकिन इसकी सर्विस अभी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं है। सुविधा की चकाचौंध में पैसे गँवाने से बेहतर है खुद सरकारी पोर्टल पर चेक करना। ट्रस्ट कमाने के लिए कंपनी को अपनी सपोर्ट और रिजॉल्यूशन रेट में सुधार करना होगा। सावधानी ही सबसे अच्छी नीति है।

मानसिक विक्षिप्त नही था भरत तिवारी, वह बलिदानी था

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शतरुद्र प्रताप सिंह

पटना। भरत तिवारी मानसिक विक्षिप्त नही था वह बहुत ज्यादा संवेदनशील युवा था , बहुत ही ज्यादा भावुक और ऐसा व्यक्ति अगर हिम्मतवाला भी हो जाये जिसे गांवों में कहते हैं शेरदिल कलेजा वाला , जिगरा वाला , तो ऐसा व्यक्ति शेर की मांद में , सांपो के बिल में हाथ डालने वाला हद दर्जे का हिम्मती होता है। ऐसा व्यक्ति जब भी कोई काम करेगा तो बहुत दिल से करेगा और जिस काम को करने का मन नही तो उससे ब्रम्हा भी वह कार्य नहीं करवा सकते… और यही इनकी कमज़ोरी बन जाती है, दिल से लगा लेना जबकि दिल के साथ दिमाग भी लगाना चाहिए आखिर भगवान ने दिमाग क्यों दिया है यह भी सोचना चाहिए।

इतिहास में जितने भी दिलवाले हुए हैं वह ऐसे ही मारे गए हैं …आप जिसके लिए लड़ते हैं वही दिमाग का इतना ज्यादा प्रयोग करता है कि वह पीछे हट जाता है जबकि थोड़ा सा भी दिल गांव वाले लगाए होते जिनके लिए भरत लड़ रहा था तो आज भरत तिवारी जिंदा होता।

नेता और व्यापारी को आप कितना भी गाली दीजिये लेकिन सत्ता और समाज की कमान इन्ही के हाथों रहेगी , जानते हैं क्यों ? क्योंकि ये दिमाग ज्यादा और दिल थोड़ा सा ही प्रयोग करते हैं…

भरत तिवारी लंबे समय से शासन ,सत्ता से अपने बाढ़ग्रस्त गांव के लिए गुहार लगा रहा था । वह लचर सिस्टम से परेशान हो चुका था और इतना ज्यादा भावुक हो उठा कि हथियार उठा लिया… यही पर उसने बड़ी गलती कर दिया…

बिहार राज्य के भोजपुर जिले का जवनियाँ गांव जो गंगा जी के बाढ़ से पूरा गांव ही जलमग्न होकर गंगा जी मे समा गया… विस्थापितों के पुनर्वास के लिए नेताओ और अधिकारियों के ही दौड़ लगा रहा था उसे मिलता था तो सिर्फ आस्वासन । शासन के अधिकारी और नेता मंन्त्री भी क्या करे?? ये सभी एक भ्रष्ट और अत्याचारी व्यवस्था के अधीन नौकरी और नेतागिरी करते है …

भरत को संघर्ष करना था तो रास्ता हथियार उठाने का नही था…. तुम्हे लड़ना था तो–

तुम लड़ते…
अनशन करते
चुनाव का बहिष्कार करते
समाज को अपने साथ खड़ा करते

और स्वयं चुनाव लड़ते …… भरत तिवारी हथियार न उठाकर ऐसी लड़ाई लड़ते जिसमे समाज अथवा जनता का सहयोग लेते तो निश्चित ही कुछ ही वर्षो में भरत तिवारी को पता चलता कि वह जिस जनता अथवा समाज के लिए लड़ रहा है उसी समाज और जनता ने ही भ्रष्ट अधिकारी , भ्रष्ट नेता और बेईमान व्यापारी को अपने वीर्य से पैदा किया है ( यही वीर्य का तात्पर्य पुरुषार्थ से है ) लेकिन भरत तिवारी ठहरे नितांत भावुक ,अति संवेदनशील और हद दर्जे के हिम्मती….

सारी गलती पुलिस की ही नही है , पुलिस का तो काम ही है सरकार के आदेशों का पालन करना और वह वही काम कर रही थी… कई दिनों से भरत हथियार उठा कर वीडियो बना कर अधिकारियों को मारने की धमकी दे रहे थे… पुलिस पकड़ने गयी तो अपने घर से पुलिस पर फायरिंग करने लगे … खुलेआम पुलिस को लड़ने की चुनौती देने लगे वह भी हथियार के साथ… समय समय पर अपने हथियार से फायरिंग भी करते… निश्चित रूप से यह दुस्साहसिक आपराधिक कृत्य था …

घेरा बंदी के बाद जब भरत तिवारी ने लाइव वीडियो बनाते हुए भ्रष्ट सत्ता शासन को ललकारते हुए अपने हथियार पुलिस के सामने फेंक कर समर्पण कर दिया और पुलिस कह भी रही कि तुम समर्पण करो हम कुछ नही करेंगे…जबकि पुलिस उसे मानसिक विक्षिप्त घोषित कर चुकी थी तो उसका इलाज करवाती लेकिन पुलिस ने आत्मसमर्पण करने के बाद भरत तिवारी को बंदूक के बट से मारा फिर कई गोली उसे मार दिया …… यह बिहार पुलिस का निहायत ही कायराना घटिया अपराध है जिसे भगवान कभी भी क्षमा नही करेंगे… भरत तिवारी कोई अपराधी नही था वह एक राष्ट्रवादी संवेदनशील भावुक युवा था…मोदी -योगी के गीत गाता था लेकिन उसे क्या पता कि ‘ नेता सिर्फ नेता होता है ‘ ,…..

मेरा देश के युवाओ से अपील है कि एक बार भरत तिवारी को पढ़ने की कोशिश करना…अत्यंत सामान्य परिवार का युवा एक ऐसे देश मे जीवन जी रहा था जहाँ जीवन के मुद्दे जाति आरक्षण बनाये गए है , देश का पढ़ा लिखा प्रोफेसर ,डॉक्टर इंजीनियर और नेता जाति आरक्षण को मुद्दा बनाता हो वहाँ भरत तिवारी गरीबो के जीवन जीने की लड़ाई लड़ रहा था…

मैं भरत तिवारी को मानसिक विक्षिप्त नही मानता मैं उसे बलिदानी मानता हूं …. अगर भरत तिवारी बलिदानी नही है तो फिर चंद्रशेखर आज़ाद ,भगतसिंह असफाक , बिस्मिल भी बलिदानी नही है…

भरत भूषण को गोली मारने वाले सस्पेंड होकर लौट आएंगे, नहीं लौटेगा कभी भरत भूषण

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सर्वेश

पटना। आरा में पुलिस की गोलियों से मारे गए भरत तिवारी की पुरानी तस्वीरें बता रही हैं कि लड़का सामाजिक कार्यों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेता रहा है। जनता की समस्याओं को लेकर अधिकारियों नेताओं तक पहुंचना, उनका निदान ढूंढना, कमजोरों की मदद करना ही मुख्य काम रहा है। आज से नहीं, लम्बे समय से…

भरत की मानसिक दशा ठीक नहीं थी, यह तो स्पष्ट है। संभव है अधिकारियों, नेताओं के झूठे आश्वासनों से निराश होने के कारण उनकी मानसिक अवस्था खराब हुई हो, क्योंकि यह तो तय है कि लड़के को समाज सेवा के अतिरिक्त और कुछ सूझता नहीं था। ऐसे में उसने पिस्टल खरीदी और लहराते धमकाते हुए तीन दिन में उस मुद्दे को राष्ट्रीय फलक पर पहुंचा दिया जिसपर कोई बात नहीं कर रहा था।

कटाव के कारण नदी में विलीन हो चुके जमनिया गांव के लोगों को जिस जगह बसाया जा रहा था, वह जगह भी पानी में डूबी रहने वाली है। भरत लड़ रहा था कि इस जमीन को मिट्टी से भर कर कम से कम रहने लायक तो बना दिया जाय। यह सच है कि तब उसकी बात किसी ने नहीं सुनी।

आज उसके एनकाउंटर के विरोध में बहुत बड़ी संख्या सड़कों पर है। विपक्ष के सारे स्थानीय चेहरे उसे शहीद बता रहे हैं और सत्ता पक्ष के भी दर्जनों लोग फर्जी एनकाउंटर के विरुद्ध बोल चुके। पर इस तमाम विरोध प्रदर्शन से एक सत्य नहीं बदल सकता कि भरत मारे जा चुके हैं, उनकी माता को जीवन भर इस पीड़ा में जलना होगा।

हालांकि इसी बीच ऐसे लोगों की संख्या भी बहुत बड़ी है जो इस एनकाउंटर को सही ठहरा रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम माझी तो खुलेआम कह रहे हैं कि वह अपराधी था और उसे मारा जाना सही है। कुछ बड़े पत्रकार इसी बहाने उत्तर प्रदेश के अपराधियों के एनकाउंटर पर प्रश्न उठाने लगे हैं। वे ढके छुपे लहजे में हमेशा की तरह ब्राह्मणों को ट्रॉल करने में लगे हैं कि उत्तर प्रदेश के एनकाउंटर पर खुश हो रहे थे तो अब दुखी क्यों हो? आप चाहें भी तो ऐसे लोगों को नहीं समझा सकेंगे कि बीस बीस केसों में नामजद खूंखार अपराधियों और भरत भूषण में क्या अंतर है।

जिस टोले की लड़ाई लड़ रहे थे भरत भूषण, उस टोले के लोग मात्र छह महीने बाद उसी जीतन राम माझी को अपना बताएंगे, जो आज भरत के एनकाउंटर को जायज बता रहे हैं। अपने बिहार को इतना तो समझता ही हूं मैं…

कुछ पुलिस अधिकारी सस्पेंड हुए हैं। कुछ ही दिन में चुपचाप सस्पेंशन टूट जाएगा और वे ड्यूटी में लग जायेंगे। यही होता रहा है, यही होता रहेगा… पर भरत भूषण तिवारी अब अपने परिवार को नहीं मिलेंगे।

मैं जो कहना चाह रहा हूं शायद कह नहीं पा रहा, पर आप समझिएगा जरूर… आप भरत की हत्या करने वालों को दंडित करने की लड़ाई लड़िए, पर जनता की पीड़ा से विचलित हो कर हथियार उठाने वाले लड़के दिखें तो उन्हें समझाइए। उसकी तुलना जिन चंद्रशेखर आजाद से कर के प्रसन्न हो रहे हैं हम, उनका यज्ञोपवीत भी बहुतों की आंख में चुभता है… बिहार की राजनीति में आदमी आदमी बाद में है, जाति पहले है।

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