सत्ता की स्तुति नहीं, सत्ता से सवाल चाहिए

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लखनऊ। अच्छा पत्रकार वह नहीं जो बड़े नेताओं के साथ तस्वीर खिंचा कर फेसबुक पर पोस्ट करे, बल्कि वह है जो बड़े नेताओं की अच्छी से खिंचाई करती हुई रिपोर्ट को पोस्ट करे — यह एक वाक्य आज की पत्रकारिता की सबसे बड़ी और सबसे कड़वी सच्चाई बन गया है। फेसबुक खोलिए तो पत्रकार कम और दरबारी ज्यादा दिखते हैं। हर प्रोफाइल पर एक ही दृश्य, किसी मंत्री के साथ मुस्कुराती हुई सेल्फी, किसी विधायक के कंधे पर हाथ, किसी बड़े नेता से सम्मान लेते हुए फोटो और नीचे लिखा होता है आत्मीय भेंट, मार्गदर्शन प्राप्त हुआ, धन्य हो गया। लाइक और वाह-वाह की बौछार में यह सवाल कहीं दब जाता है कि आखिर पत्रकार का काम क्या है, नेता के बगल में खड़े होकर अपनी पहुँच दिखाना या नेता के सामने खड़े होकर जनता के सवाल पूछना। यह फोटो अब याद नहीं रही, यह एक सर्टिफिकेट बन गई है, एक धौंस बन गई है जो थानेदार को, लेखपाल को, ठेकेदार को दिखाने के काम आती है कि देखो मेरी पहुँच कितनी ऊपर तक है। और जिस दिन पत्रकार खबर की साख की जगह संपर्क की धाक से काम चलाने लगे, उसी दिन वह पत्रकार नहीं रह जाता, वह जनसंपर्क अधिकारी बन जाता है। उसकी कलम में स्याही नहीं रहती, सत्ता का डर रहता है और वह सवाल पूछना भूल जाता है।

पत्रकारिता का जन्म ही सत्ता की आरती उतारने के लिए नहीं, सत्ता की आँख में आँख डालकर सवाल पूछने के लिए हुआ था। पंडित नेहरू ने कहा था कि मैं चाहता हूँ प्रेस मेरी आलोचना करे, यह उदारता नहीं थी, यह लोकतंत्र की समझ थी। अगर प्रेस सत्ता का भजन गाएगा तो सत्ता बहरी और अंधी हो जाएगी। अमेरिका का वाटरगेट कांड याद कीजिए, दो पत्रकारों ने दुनिया के सबसे ताकतवर राष्ट्रपति को कुर्सी छोड़ने पर मजबूर कर दिया था, वह नेता के साथ फोटो खिंचवाकर नहीं हुआ था, बल्कि नेता की फाइलों की फोटो खींचकर हुआ था। भारत में भी बोफोर्स से लेकर कॉमनवेल्थ तक, चारा घोटाला से लेकर व्यापमं तक हर बड़ी खबर एक असहज करने वाली रिपोर्ट थी, एक असुविधाजनक सवाल था। किसी ने घोटालेबाज के साथ सेल्फी डालकर इतिहास नहीं बनाया। अच्छा पत्रकार वह है जो प्रेस कॉन्फ्रेंस में हाथ हिलाने के लिए नहीं, हाथ उठाकर कहने के लिए जाता है कि सर, आपके आंकड़े और जमीन की हकीकत में अंतर है। खिंचाई का मतलब गाली या ट्रोलिंग नहीं है, खिंचाई का मतलब है तथ्य, तर्क और सबूत के साथ जवाबदेही तय करना। अगर सरकार कहती है हमने सौ स्कूल बनाए, तो पत्रकार का काम पोस्टर छापना नहीं, जाकर गिनना है कि कितने बने, कितनों में शिक्षक हैं, कितनों की छत टपकती है। अगर कहा जाता है अपराध खत्म हो गया, तो थाने के रजिस्टर, पीड़ित के आंसू और एनसीआरबी के आंकड़े सामने रखना ही पत्रकारिता है। यह खिंचाई नफरत से नहीं, जिम्मेदारी से पैदा होती है क्योंकि पत्रकार का बॉस नेता नहीं, जनता है।

सोशल मीडिया ने एक नया भ्रम और नया लालच पैदा कर दिया है। अब हर पत्रकार खुद एक छोटा नेता बनना चाहता है, उसे भी फॉलोअर चाहिए, लाइक चाहिए, शेयर चाहिए और सबसे आसान शॉर्टकट है बड़े नेता के साथ फोटो। एल्गोरिदम भी खुश, अहंकार भी खुश। लेकिन इस सौदे में पत्रकार अपना सबसे बड़ा हथियार गंवा देता है, वह है विश्वसनीयता। पाठक अब बेवकूफ नहीं रहा, वह सब देखता और समझता है। वह जानता है कि जो पत्रकार हर दिन किसी न किसी नेता की गोद में बैठा दिख रहा है, वह उसी नेता के खिलाफ खबर कैसे लिखेगा। वह आपकी फोटो पर वाह करेगा, लेकिन आपकी खबर पर भरोसा नहीं करेगा। नेता भी यह खेल खूब समझता है, वह जानता है कि पत्रकार को फोटो का टुकड़ा फेंको, वह सवाल भूल जाएगा। इसलिए वह फोटो देता है और खबर ले लेता है। यह पत्रकारिता नहीं, एक सौदा है। और इस सौदे में अंत में लोकतंत्र हारता है। आज की तारीख में सत्ता के पास अपना आईटी सेल है, अपनी प्रचार मशीनरी है, उसे आपके प्रचार की जरूरत नहीं है। उसे जरूरत है आपके सवाल की, ताकि वह सुधर सके।

तो अच्छा पत्रकार कैसा दिखता है, वह फेसबुक पर कम चमकता है, फील्ड में ज्यादा खटता है। उसकी वॉल पर नेता के साथ दस फोटो नहीं, बल्कि दस ऐसी रिपोर्ट होती हैं जिसने किसी मजदूर का राशन कार्ड बनवाया, किसी गाँव के नाले की सफाई करवाई, किसी अस्पताल में डॉक्टर की नियुक्ति करवाई। वह सम्मान समारोह में मंच पर बैठने के लिए नहीं दौड़ता, वह उस समारोह के खर्च का आरटीआई लगाता है। वह प्रेस विज्ञप्ति को जस का तस कॉपी-पेस्ट नहीं करता, वह उसे तीन फोन करके क्रॉस-चेक करता है। वह डरता है, क्योंकि सत्ता से टकराना आसान नहीं है, उसे धमकी भी मिलती है, विज्ञापन भी रुकता है, सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी भी पीछे पड़ती है, लेकिन फिर भी वह लिखता है क्योंकि उसे पता है कि अगर वह नहीं लिखेगा तो कोई नहीं लिखेगा। नेता आते-जाते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी, फेसबुक की टाइमलाइन हर दो घंटे में बदल जाती है, आज जिसके साथ आपने गर्व से फोटो खिंचवाई है कल वह विपक्ष में होगा, तब क्या आप वह फोटो डिलीट कर देंगे। लेकिन एक ईमानदार रिपोर्ट, एक साहसी सवाल, एक गरीब के हक में लिखी गई खबर वह इतिहास में रहती है, लोग उसे सालों तक याद रखते हैं। इसलिए युवा पत्रकारों से, खासकर उन साथियों से जो अभी इस पेशे में आए हैं, एक ही निवेदन है, कैमरा नेता की ओर नहीं, जनता की ओर घुमाओ। फोटो नेता के साथ नहीं, उस टूटी सड़क, उस सूखे नल, उस खाली क्लासरूम के साथ खिंचवाओ जिसके लिए तुमने लिखा है। फेसबुक पर लाइक नेता की फोटो से मिलेंगे, लेकिन इज्जत नेता की खिंचाई करने वाली रिपोर्ट से मिलेगी और इस पेशे में अंत में इज्जत ही बचती है, लाइक नहीं। लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता की बारात में नाचना नहीं है, बारात में हो रही बिजली चोरी पकड़ना है।

 

तानाशाही के लक्षण दिखाता भारतीयलोकतंत्र?

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दिल्ली । लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि सत्तामें आने के बाद असहमति को स्वीकार करने में होती है। किसीसरकार को बहुमत मिलने से यह अधिकार नहीं मिल जाता किवह नागरिकों की आवाज दबा दे, आलोचकों को शत्रु समझे याप्रशासनिक शक्तियों का उपयोग विरोध समाप्त करने के लिएकरे। लोकतंत्र की आत्मा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्णसभा, निष्पक्ष चुनाव और सरकार की जवाबदेही में बसती है।जब इन अधिकारों पर प्रतिबंध सामान्य प्रशासनिक उपाय बननेलगें, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या लोकतांत्रिकव्यवस्था में तानाशाही की प्रवृत्तियां विकसित हो रही हैं। 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी केप्रस्तावित आंदोलन के विरुद्ध हुई व्यापक पुलिस कार्रवाई नेभारतीय लोकतंत्र के सामने ऐसा ही गंभीर प्रश्न खड़ा किया है।

कॉकरोच जनता पार्टी नामक युवा राजनीतिक समूह ने मुख्यनिर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकरदिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन आयोजित करने की घोषणाकी थी। आंदोलन का प्रमुख मुद्दा मतदाता सूचियों के विशेषगहन पुनरीक्षण से जुड़ा था। आंदोलनकारियों ने आरोप लगायाकि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गएहैं और इससे चुनावी निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। लेकिनमतदाता सूची की शुद्धता और निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षतापर प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, जिसका उत्तरपारदर्शिता और प्रमाणों से दिया जाना चाहिए।

रॉयटर्स की 10 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने दिल्लीमें 2,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया।राजधानी के कुछ हिस्सों में भारी सुरक्षा बल तैनात किए गए, मोबाइल इंटरनेट सेवाएं निलंबित हुईं और कई मेट्रो स्टेशन तथाबाजार बंद किए गए। पुलिस ने जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शनकी अनुमति नहीं दी थी। फिर भी, प्रदर्शन को रोकने के लिएकिए गए व्यापक उपायों ने नागरिक अधिकारों और सार्वजनिकव्यवस्था के बीच संतुलन पर गंभीर बहस पैदा की। हिरासत मेंलिए गए लोगों की संख्या के बारे में विभिन्न रिपोर्टों में अंतररहा, इसलिए किसी एक संख्या को अंतिम आंकड़ा मानने केबजाय उपलब्ध स्रोतों का उल्लेख करना अधिक उचित है।

इस घटनाक्रम का सबसे उल्लेखनीय पक्ष आंदोलन के नेताओंको प्रदर्शन स्थल तक पहुंचने से पहले हिरासत में लिया जानाथा। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कॉकरोच जनतापार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके और सह-समन्वयक सौरवदास तथा आशुतोष रांका को मुंबई से दिल्ली पहुंची उड़ान केउतरने के बाद हवाई अड्डे पर पुलिस ने हिरासत में लिया। वेजंतर-मंतर पर प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे थे। बाद मेंन्यायिक प्रक्रिया के बाद उनकी रिहाई की खबर आई। इसकार्रवाई ने निवारक हिरासत की आवश्यकता, प्रक्रिया औरसीमाओं पर प्रश्न खड़े किए।

रेलवे स्टेशनों पर भी दिल्ली जा रहे कुछ प्रदर्शनकारियों को रोकेजाने की खबरें प्रकाशित हुईं। इंडियन एक्सप्रेस ने भोपाल, इटारसी और ग्वालियर जैसे स्टेशनों पर लोगों को हिरासत मेंलिए जाने की सूचना दी। रॉयटर्स ने भी बताया कि पुलिस नेदिल्ली के प्रवेश मार्गों पर लोगों और वाहनों की जांच की तथाप्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए व्यापक सुरक्षा प्रबंध किए।इन रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि कार्रवाई केवल प्रदर्शन स्थलतक सीमित नहीं थी। हालांकि, प्रत्येक हिरासत का कानूनीआधार और परिस्थितियां अलग हो सकती हैं; इसलिए सभीकार्रवाइयों को एक साथ गैरकानूनी घोषित करना उचित नहींहोगा।

कानून की दृष्टि से पुलिस द्वारा किसी व्यक्ति को हिरासत मेंलेना अपने आप में अपहरण सिद्ध नहीं करता। निवारक कार्रवाईकुछ परिस्थितियों में कानून के अंतर्गत संभव है। लेकिन यदिकिसी व्यक्ति को कानूनी आधार बताए बिना, आवश्यक प्रक्रियाका पालन किए बिना या वकील और परिवार से संपर्क काउचित अवसर दिए बिना उठाया जाता है, तो यह मनमानीहिरासत और गंभीर अधिकार-उल्लंघन का मामला बन सकताहै। इसलिए प्रत्येक मामले में हिरासत का आधार, अवधि, संबंधित आदेश और न्यायिक समीक्षा की उपलब्धता स्पष्ट होनीचाहिए। लोकतंत्र में पुलिस की शक्तियों पर भी कानून कानियंत्रण अनिवार्य है।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने 10 अक्टूबरको दिल्ली में प्रदर्शनकारियों, आंदोलन के नेताओं, नागरिकसमाज के सदस्यों, वकीलों और पत्रकारों की सामूहिक हिरासतकी खबरों पर चिंता जताई। संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक खबरके अनुसार, मानवाधिकार प्रवक्ता थामीन अल-खीतेन नेअधिकारियों से शांतिपूर्ण सभा के अधिकार का पूरा सम्मानकरने और मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गए लोगों को तत्कालतथा बिना शर्त रिहा करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा किशांतिपूर्ण प्रदर्शनों पर प्रतिबंध आवश्यकता और आनुपातिकताकी कसौटी पर खरे उतरने चाहिए।

यह प्रतिक्रिया भारत के विरुद्ध किसी न्यायालय के अंतिमनिर्णय के समान नहीं है और इससे हर गिरफ्तारी स्वतःगैरकानूनी सिद्ध नहीं होती। फिर भी, संयुक्त राष्ट्र की चिंता कोकेवल विदेशी हस्तक्षेप कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा।मानवाधिकारों के अंतरराष्ट्रीय मानक सरकारों को याद दिलातेहैं कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति का प्रयोगनागरिक स्वतंत्रताओं के सम्मान के साथ होना चाहिए। इंडियनएक्सप्रेस की 11 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकारने संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणी को अनुचित हस्तक्षेप बताया। इसमतभेद के बावजूद, सबसे उपयोगी रास्ता तथ्य सार्वजनिककरना, हिरासत की प्रक्रिया स्पष्ट करना और शिकायतों कीनिष्पक्ष जांच कराना है।

पत्रकारों की स्वतंत्रता का प्रश्न भी इस घटनाक्रम का महत्वपूर्णहिस्सा है। रॉयटर्स की 12 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शन की कवरेज कर रहे लगभग 3 दर्जन पत्रकारों कोहिरासत में लिए जाने, उनके उपकरण लिए जाने और रिपोर्टिंगमें बाधा पहुंचाने की शिकायतें सामने आईं। पत्रकार संगठनों नेइन घटनाओं की आलोचना की और जांच की मांग की। इनआरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अधिकारियों का पक्षमहत्वपूर्ण है, लेकिन यदि पत्रकारों को उनके पेशेवर काम केकारण रोका गया, तो यह प्रेस की स्वतंत्रता और नागरिकों केसूचना पाने के अधिकार के लिए गंभीर चिंता होगी।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को अभिव्यक्ति कीस्वतंत्रता और शांतिपूर्वक, बिना हथियार सभा करने काअधिकार देता है। इन अधिकारों पर संविधान में निर्धारितआधारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, लेकिन प्रतिबंधमनमाने नहीं होने चाहिए। सार्वजनिक सुरक्षा वास्तविक चिंता होसकती है, पर प्रशासन को यह बताना चाहिए कि कम कठोरउपाय पर्याप्त क्यों नहीं थे। संवाद, वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल, सीमित यातायात व्यवस्था और स्पष्ट शर्तें कई स्थितियों मेंव्यापक रोक की तुलना में बेहतर विकल्प हो सकते हैं। लोकतंत्रमें प्रशासनिक सुविधा नागरिक अधिकारों से ऊपर नहीं होसकती।

तानाशाही की प्रवृत्तियां हमेशा संविधान को औपचारिक रूप सेसमाप्त करके ही प्रकट नहीं होतीं। वे उस समय भी उभर सकतीहैं, जब चुनाव होते रहें और संस्थाएं मौजूद हों, लेकिन सरकारकी आलोचना करने वालों के लिए सार्वजनिक स्थान लगातारसंकुचित होते जाएं। विरोध को राष्ट्रविरोध से जोड़ना, आलोचकों को शत्रु समझना, पुलिस शक्तियों का जरूरत सेअधिक उपयोग करना और स्वतंत्र पत्रकारिता को बाधित करनालोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर कर सकता है। इन प्रवृत्तियोंका मूल्यांकन राजनीतिक पसंद से नहीं, बल्कि संस्थाओं केव्यवहार, कानून के पालन और नागरिक अधिकारों की वास्तविकस्थिति से होना चाहिए।

मतदाता सूची पर उठे प्रश्नों का समाधान भी पारदर्शिता से होनाचाहिए। निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी है कि मतदाता सूचीशुद्ध और अद्यतन रहे, पात्र मतदाता वंचित न हों और शिकायतोंका समयबद्ध निस्तारण हो। नाम हटाए जाने के आरोपों कीजांच संबंधित अभिलेखों और मतदाताओं की अपीलों के आधारपर की जानी चाहिए। प्रमाण के बिना चुनावी हेराफेरी कानिष्कर्ष निकालना अनुचित है, लेकिन गंभीर शिकायतों कोकेवल राजनीतिक आरोप बताकर खारिज करना भी उचित नहीं।

सरकार के लिए अब आवश्यक है कि वह हिरासत में लिए गएलोगों की संख्या, उनके विरुद्ध लगाए गए प्रावधानों, रिहाई कीस्थिति और पुलिस आदेशों का विवरण उपलब्ध कराए। यदिकिसी व्यक्ति को केवल शांतिपूर्ण प्रदर्शन में भाग लेने कीआशंका के कारण रोका गया, तो प्रशासन को यह स्पष्ट करनाचाहिए कि ऐसी कार्रवाई किस कानूनी आधार पर आवश्यकथी। इसी तरह, पत्रकारों के उपकरण लिए जाने या उन्हेंरिपोर्टिंग से रोकने की शिकायतों पर स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।किसी भी जांच का उद्देश्य पहले से दोष तय करना नहीं, बल्कितथ्य सामने लाना और जिम्मेदारी निर्धारित करना होना चाहिए।नागरिकों को शिकायत दर्ज कराने, वकील से सहायता लेने औरअदालत में चुनौती देने का वास्तविक अवसर मिलना चाहिए।पारदर्शी प्रक्रिया से पुलिस की वैध कार्रवाई पर भरोसा बढ़ेगाऔर अनुचित कार्रवाई होने पर सुधार का रास्ता खुलेगा।लोकतांत्रिक शासन में जवाबदेही केवल संकट के बाद जारीबयान तक सीमित नहीं हो सकती; उसे आदेश, कार्रवाई औरपरिणाम के स्तर पर दिखाई देना चाहिए।

10 अक्टूबर की घटनाओं को भारतीय लोकतंत्र के लिएचेतावनी के रूप में देखना चाहिए। यह कहना जल्दबाजी होगीकि भारत तानाशाही बन चुका है, लेकिन व्यापक हिरासत, यात्रामें बाधा और पत्रकारों की रिपोर्टिंग रोकने की शिकायतों कोसामान्य प्रशासनिक कार्रवाई मानकर अनदेखा भी नहीं किया जासकता। जनता का संस्थाओं पर भरोसा मजबूत होगा।

भारत का स्वतंत्रता आंदोलन नागरिक स्वतंत्रता, प्रतिनिधित्व औरजवाबदेह शासन की आकांक्षाओं से प्रेरित था। उन आदर्शों कीरक्षा के लिए जरूरी है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को अपराधीन माना जाए, पुलिस की शक्तियों पर प्रभावी निगरानी हो, पत्रकार स्वतंत्र रूप से काम कर सकें और चुनावी प्रक्रिया सेजुड़े प्रश्नों का उत्तर प्रमाणों के आधार पर दिया जाए। लोकतंत्रकी वास्तविक शक्ति विरोध की आवाज दबाने में नहीं, बल्किउसे सुनने और उचित प्रश्नों का उत्तर देने में निहित है। यदि सत्ताइस कसौटी पर खरी नहीं उतरती, तो लोकतंत्र का औपचारिकढांचा कायम रहते हुए भी उसकी आत्मा कमजोर हो सकती है।यही भारतीय लोकतंत्र के सामने सबसे गंभीर चुनौती है।लोकतंत्र की यही मूल कसौटी है।

ऐसा फैलाते हैं झूठा नरेटीव…

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– प्रशांत पोळ
कोलकाता। यह कल का ‘दैनिक भास्कर’ हैं। इस आठ कॉलम के समाचार को पढ़कर आपके मन में सबसे पहले क्या विचार आएगा? ‘हिंदुत्व के नाम पर पश्चिम बंगाल में शानदार विजय प्राप्त करने वाली भाजपा सरकार का यह पहला नवरात्रि उत्सव, इस बार फीका हैं। और इस समय मुस्लिम कट्टरवाद की दिशा में बढ रहे बांग्लादेश में इस बार जबरदस्त उत्साह से नवरात्रि मनाई जा रही है’।
अगर यह विचार आपके मन में आ रहे हैं तो ‘दैनिक भास्कर’ का यह नरेटीव सफल हो रहा हैं, ऐसा मानकर चलिए। झूठा नरेटीव कैसे सेट किया जाता हैं, इसका यह प्रत्यक्ष उदाहरण हैं..!
क्या ‘दैनिक भास्कर’ का यह समाचार सही हैं?
जी नहीं। सरासर गलत हैं। तथ्यों को गलत पद्धति से तोड़ मरोड़ कर पेश किया गया हैं।
तो फिर वास्तविक चित्र क्या हैं?
वास्तविकता यह हैं कि अनेक दशकों के बाद, पहली बार पूरा पश्चिम बंगाल अत्यंत उत्साह से, जबरदस्त जोश के साथ यह उत्सव मना रहा हैं। महालय के दिन कोलकाता के ईडन गार्डन में नवरात्रि उत्सव का जो शुभारंभ हुआ, वह अद्भुत था। 3000 से ज्यादा ढांकिये, ढांक की थाप पर मां दुर्गा का आवाहन कर रहे थे, यह गिनीज रिकॉर्ड बन गया हैं। इसी कार्यक्रम में ड्रोन के माध्यम से कोलकाता के आकाश में मां दुर्गा / मां काली के जो दृश्य बनाए गए, वह अभूतपूर्व थे, ऐतिहासिक थे।
और एक महत्वपूर्ण बात जो ‘दैनिक भास्कर’ ने छुपाई हैं। इस वर्ष दुर्गा पूजा के पंडालों की संख्या पिछले वर्ष के 53,000 पंडालों की तुलना में, 28% बढी हैं। इस वर्ष 12,400 नए पंडालों के साथ 65,000 पंडाल बने हैं, जिनमें भव्यता के साथ मां की पूजा हो रही हैं।
लेकिन महत्व की बात यह है कि इस बार दुर्गा पूजा समितियोंने स्वतः होकर, बांग्ला परंपरा की दुर्गा मूर्ति और सनातन आधारित पंडाल बनाने का निर्णय लिया हैं। यह बहुत बड़ा बदलाव हैं। पिछले वर्ष तक इन पंडालोंमें टीएमसी का तथा मुस्लिम संगठनों का खौफ और प्रभाव होने के कारण नई शैली में, पाश्चात्य शैली में दुर्गा माता की प्रतिमाएं बन रही थी। यह उत्सव का विकृतिकरण था। पवित्रता की भावना रौंद दी गई थी। यह सारी गंदगी इस बार दूर हो रही हैं, और इसीलिए पंडालों के थीम बदल रहे हैं।
एक और मुद्दा हैं, पंडालों को मिलने वाली सरकारी सहायता का। ममता सरकार ने हिंदुओं को बैलेंस करने के लिए, बंदरबांट जैसे पैसे बांटे थे। इस बार भाजपा सरकार ने छोटे-बड़े पंडालोंके अनुसार सहायता दी हैं। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने बड़े पंडालों से अपील की थी कि ‘चुंकि आपके पास धन के अनेक स्रोत हैं, श्रद्धालु भी बड़ी संख्या में चढावा चढा रहे हैं, अतः आप सरकारी सहायता छोड़ दीजिए’। इस अपील का असर हुआ हैं। अभी तक 200 से ज्यादा बड़े पंडालों ने यह सहायता छोड़ दी हैं।
तीन और बड़े बदलाव इस वर्ष हुए हैं –
1. इससे पहले, ममता सरकार के समय, दुर्गा पूजा के पवित्र दिनों में भी शराब की बिक्री चलती थी। कुछ पंडालोंके तो बगल में ही शराब बेची जाती थी। किंतु इस बार नहीं। इस बार महाअष्टमी के दिन पूरे पश्चिम बंगाल में शराब की बिक्री और वितरण प्रतिबंधित हैं।
2. इस वर्ष पूरे प्रदेश में उत्सव के समय डीजे पूर्णतः प्रतिबंधित है। ‘ढांक’ जैसे पारंपरिक वाद्य को बढ़ावा दिया जा रहा हैं।
3. ममता बनर्जी ने विसर्जन शोभायात्रा को ‘कार्निवल’ बना दिया था। यह उत्सव की पवित्रता के साथ भद्दा मजाक था। वर्ष 2016 से चल रहा ‘रेड रोज विसर्जन कार्निवल’ इस वर्ष नहीं होगा। इस विसर्जन शोभायात्रा को पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार नए स्वरूप में लाया जाएगा।
बंगाल अपनी जड़ों की ओर लौट रहा हैं। उत्सव की पवित्रता को, मां दुर्गा के सम्मान को पुनः प्रस्थापित कर रहा हैं। सारा बंगाल अपूर्व उत्साह से यह दुर्गा पूजा, पिछले वर्षों की तुलना में अधिक भव्य, अनुशासित और धार्मिक परंपराओं के साथ मना रहा हैं..!
किंतु ‘दैनिक भास्कर’ को शायद यह सहन नहीं हो रहा हैं। इसलिए ऐसा नकारात्मक और झूठा नरेटीव गढने का प्रयास हो रहा हैं।

फ़िरोज़ गांधी सिर्फ सरोजनी नायडू की बेटी के अलावा लखनऊ की एक और औरत पर फ़िदा हुए

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दयानंद पांडेय
लखनऊ। इंदिरा गांधी और फिरोज गांधी के आपसी झगड़े जब बहुत बढ़ गए तो नेहरु ने फिरोज गांधी और इंदिरा को लखनऊ भेज दिया । लखनऊ में रहने के लिए फिरोज गांधी को नेशनल हेराल्ड का काम धाम थमा दिया । लखनऊ के शाहनज़फ़ रोड पर एक बंगले में फिरोज और इंदिरा गांधी रहने लगे थे। लेकिन झगड़े खत्म होने के बजाय बढ़ने लगे । फिरोज इंदिरा गांधी को किक कर ज्यादा समय सरोजनी नायडू की बेटी के साथ राजभवन में बिताने लगे । सरोजनी नायडू उन दिनों उत्तर प्रदेश की राज्यपाल थीं । फिर फ़िरोज़ गांधी सिर्फ सरोजनी नायडू की बेटी के अलावा लखनऊ की एक और औरत पर फ़िदा हुए । वह औरत तब कविताएं लिखती थी । महत्वाकांक्षी बहुत थी । बाद के दिनों में राजनीति में भी आई । ताकतवर मंत्री रहीं ।
फिरोज गांधी के निधन के बाद भी इंदिरा गांधी उस औरत को हमेशा सिर पर बिठा कर रखती रहीं । कि वह कहीं कोई निजी बात न बोल दे । सो मुख्यमंत्री कोई हो , सरकार में ताकतवर मंत्री बन कर यह औरत हमेशा रही , जब तक उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार रही । मंत्री रहते एक से एक अजब-गज़ब फैसले लिए । जैसे एक बार जब छात्र संघ आंदोलन पूरे उत्तर प्रदेश में सरकार की सांसत का सबब बन गया तो बतौर शिक्षा मंत्री सभी वाईस चांसलर की मीटिंग बुला कर कह दिया कि सभी जगह सेशन अनियमित कर दिए जाएं । कहीं जुलाई में सेशन शुरू हो तो कहीं जनवरी में । सेशन अनियमित रहेंगे तो छात्र एकजुट नहीं हो पाएंगे और आंदोलन टूट जाएगा । यही हुआ भी । इस चक्कर में कई जगह सेशन दो-दो साल पीछे हो गए , रद्द हो गए । छात्रों का जो नुकसान हुआ सो हुआ , सरकार सांसत से बच गई । ऐसे और भी कई सारे फ़ैसले और घटनाएं हैं ।
एक बार एक दारोगा का ट्रांसफर रोकने के लिए वह एस एस पी , लखनऊ पर बहुत दबाव बनाती रहीं । एस एस पी ने हाथ खड़े कर दिए । कहा कि बात डी जी पी तक पहुंच गई है , उन्हीं से बात करें । डी जी पी से भी कहा । डी जी पी ने भी उस दारोगा का ट्रांसफर नही रोका तो एक दिन सारा प्रोटोकाल तोड़ कर वह डी जी पी के आफिस पहुंच गईं । डी जी पी पर बरसने लगीं । एक चतुर्वेदी जी तब डी जी पी थे । जब बहुत हो गया तो उन्हों ने कमरे में टंगी अपनी फ़ोटोदिखाते हुए कहा , मैडम यह फ़ोटो यहां टंग गई है , अब उतरेगी नहीं । बोर्ड पर डी जी पी की सूची में लिखा अपना नाम दिखाया और कहा कि अब यह मिटेगा नहीं । बाकी आप माननीय मिनिस्टर हैं , जो चाहें कर सकती हैं । लेकिन इस दारोगा का ट्रांसफर मेरी कलम से नहीं रद्द होने वाला । वह जैसे भड़भड़ाती हुई आई थीं , वैसे ही भड़भड़ाती हुई चलीं गईं । संयोग से तब मैं चतुर्वेदी जी के साथ ही बैठा था , एक ख़बर के सिलसिले में । मैं ने पूरा विवरण लिख दिया । खबर उछाल कर छपी अख़बार में ।
सुबह-सुबह चतुर्वेदी जी का फोन मेरे पास आया । वह बहुत नाराज थे । बोले , कम से कम यह ख़बर आप को नहीं लिखनी चाहिए थी । एक बार मुझ से पूछ तो लिया होता । दिन में जब आफिस पहुंचा था मंत्री जी का खंडन और फोन दोनों आ चुका था । मंत्री जी ने लिखा था , खबर पूरी तरह मनगढ़ंत है । मैं कभी डी जी आफिस नहीं गई थी । न ऐसे किसी दारोगा को वह जानती हैं ।
प्रोटोकाल के मुताबिक उन्हें डी जी पी आफिस जाना भी नहीं चाहिए था । मैं ने फोन कर चतुर्वेदी जी को बताया कि आप की मैडम का खंडन आ गया है जिस में उन्हों ने लिखा है कि वह आप के पास कभी गई ही नहीं । न ऐसे किसी दारोगा को जानती हैं । अमूमन संजीदा और गंभीर रहने वाले चतुर्वेदी जी हंसे और बोले , फिर आप भी भूल जाईए और कोई फालोअप न ही लिखें तो अच्छा रहेगा । इन मंत्री मैडम के ऐसे और भी बहुत किस्से हैं जो फिर कभी । वह घोड़े पर सर्वदा इस लिए सवार रहती थीं कि फ़िरोज़ गांधी की सूची में वह कभी रही थीं और कि इंदिरा गांधी उन्हें सिर पर बिठाए रखती थीं ।
एक बार एक सेक्सलाजिस्ट के खिलाफ मैं ने खबर लिखी । इन मंत्री जी ने उस खबर को रोकने की जी तोड़ कोशिश की । खबर रुक भी गई तब । मालिकान ही रोक दिए उस खबर को । लेकिन संपादक की दिलचस्पी के चलते कुछ दिन बाद वह खबर छप गई । मंत्री मैडम धड़धड़ाती हुई संपादक की केबिन में पहुंची । और जो-जो नहीं कहना चाहिए था , कहा । संपादक ने हंसते हुए पूछ लिया कि , मैडम इस डाक्टर से आप भी अपना इलाज करवाती हैं क्या ? वह बिलकुल चुप हो गईं और चुपचाप चली गईं ।
एक पुराने राजनीतिज्ञ कान में फुसफुसा कर बताते थे कि जब यह औरत फ़िरोज़ से मिलने जाती थी , तो जाने के पहले बाथटब में शराब भर कर कुछ देर उस में लेट जाती थी। अजब नुस्खा था यह भी । इंदिरा गांधी भी खाली नहीं रहीं । तब के उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के साथ उन का समय गुजरने लगा था । शाहनज़फ़ रोड पर इन सब चीजों को ले कर इंदिरा और फ़िरोज़ के बीच झगड़े जब बहुत बढ़ गए , झगड़े का शोर सड़क तक सुनाई देने लगा तो नेहरु ने दोनों को लखनऊ से वापस दिल्ली बुला लिया ।
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