कांग्रेस का जवाहर भवन वाला ‘स्वतंत्र’ कमीशन:  चुनावी रोल पर कंगारू कोर्ट लगाने की कोशिश

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दिल्ली। कांग्रेस गठबंधन बारह साल से सत्ता से बाहर है। सत्ता खोने के बाद पार्टी संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने और अपनी समानांतर व्यवस्था खड़ी करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कॉन्स्टिट्यूशन (@lafcindia) ने पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज मदन लोकुर की अध्यक्षता में एक ‘स्वतंत्र कमीशन’ बनाया है। यह कमीशन चुनावी रोल के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर मतदाताओं की शिकायतें सुनने का दावा कर रहा है। 15 अक्टूबर को जवाहर भवन, नई दिल्ली में इसकी पहली सार्वजनिक सुनवाई होनी है। कमीशन मतदाताओं की गवाहियां रिकॉर्ड करेगा और इसने चुनाव आयोग को भी अधिकारी भेजने का न्योता दिया है।

यह ‘स्वतंत्रता’ का नाटक है। जवाहर भवन जवाहर भवन ट्रस्ट की संपत्ति है, जिस पर गांधी परिवार का नियंत्रण है। राजीव गांधी फाउंडेशन का मुख्यालय भी यहीं है। सोनिया गांधी इसकी चेयरपर्सन हैं, जबकि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ट्रस्टी हैं। यही वह जगह है जहां कांग्रेस का थिंक टैंक बैठता है।

कमीशन के सलाहकारों में कपिल सिब्बल, प्रशांत भूषण जैसे नाम शामिल हैं, जो कांग्रेस और उसके सहयोगियों के करीबी माने जाते हैं। मदन लोकुर ने 2019 में पाकिस्तान जाकर वहां के चीफ जस्टिस की शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लिया था और कुछ समय बेंच पर भी बैठे। ऐसी पृष्ठभूमि वाला व्यक्ति जब गांधी परिवार की इमारत में बैठकर चुनावी प्रक्रिया पर ‘न्याय’ करता है, तो इसे स्वतंत्र कैसे कहा जा सकता है? यह योजना कांग्रेस की पुरानी राजनीति का नया रूप है-संस्थाओं पर भरोसा न करके अपनी ही अदालतें खड़ी करना।

यह कमीशन किसी भी संवैधानिक प्राधिकरण से नहीं बना है। न इसका कोई कानूनी दर्जा है, न कोई जवाबदेही। यह पूरी तरह गैर-सरकारी, राजनीतिक रूप से प्रेरित निकाय है। चुनावी रोल की जिम्मेदारी संविधान के तहत चुनाव आयोग की है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही SIR को वैध ठहरा चुका है। फिर भी कांग्रेस समर्थक वकील और पूर्व जज मिलकर समानांतर सुनवाई कर रहे हैं। यह राज्य को दरकिनार कर अपनी व्यवस्था बनाने की कोशिश है। कल को कोई और समूह भी ऐसा कमीशन बनाकर अपने अपराधियों को निर्दोष घोषित कर सकता है।

देश में कानून का शासन तभी चलता है जब संस्थाएं अपनी जगह काम करें। जब राजनीतिक दल हारने के बाद कंगारू कोर्ट खड़े करने लगें, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। सुप्रीम कोर्ट को इसका संज्ञान लेना चाहिए और ऐसी गतिविधियों पर रोक लगानी चाहिए। बारह साल सत्ता से बाहर रहने के बाद कांग्रेस अगर संस्थागत रास्ते छोड़कर इस तरह के गैर-संवैधानिक रास्ते अपना रही है, तो यह न सिर्फ उसकी हताशा दिखाता है, बल्कि देश की स्थिरता के लिए भी खतरा बन जाता है। लोकतंत्र में शिकायतें अदालतों और संवैधानिक निकायों में सुनी जाती हैं, गांधी परिवार की इमारत में नहीं।

Congress’s ‘Independent’ Commission at Jawahar Bhawan: An Attempt to Set Up a Kangaroo Court on Electoral Rolls

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The Congress-led alliance has been out of power for twelve years. After losing power, the party has been moving towards weakening constitutional institutions and establishing its own parallel system.
The Lawyers Association for Constitution has constituted an ‘independent commission’ under the chairmanship of former Supreme Court judge Madan Lokur. This commission claims to hear voters’ complaints regarding the Special Intensive Revision (SIR) of electoral rolls. Its first public hearing is scheduled for 15 October at Jawahar Bhawan in New Delhi. The commission will record voters’ testimonies and has also invited officials from the Election Commission.
This is a drama of ‘independence’. Jawahar Bhawan is the property of the Jawahar Bhawan Trust, which is controlled by the Gandhi family. The headquarters of the Rajiv Gandhi Foundation is also located here. Sonia Gandhi is its chairperson, while Rahul Gandhi and Priyanka Gandhi Vadra are trustees. This is the very place where the Congress think tank meets.
Among the commission’s advisors are names such as Kapil Sibal and Prashant Bhushan, who are considered close to the Congress and its allies. Madan Lokur went to Pakistan in 2019, participated in the oath-taking ceremony of the Chief Justice there, and even sat on the bench for some time. When a person with such a background sits in a building belonging to the Gandhi family and dispenses ‘justice’ on the electoral process, how can it be called independent? This plan is a new form of the Congress’s old politics-distrusting institutions and setting up its own courts.
This commission has not been created by any constitutional authority. It has neither any legal status nor any accountability. It is entirely a non-governmental, politically motivated body. Under the Constitution, the responsibility for electoral rolls lies with the Election Commission. The Supreme Court has already upheld the validity of the SIR. Yet, Congress-supporting lawyers and a former judge are conducting parallel hearings. This is an attempt to create their own system by bypassing the state. Tomorrow, any other group could also form such a commission and declare its criminals innocent.
The rule of law functions in the country only when institutions do their job in their proper place. When political parties, after losing, start setting up kangaroo courts, democracy is weakened. The Supreme Court should take cognizance of this and put a stop to such activities. After remaining out of power for twelve years, if the Congress is abandoning institutional paths and adopting such non-constitutional routes, it not only shows its desperation but also becomes a threat to the country’s stability. In a democracy, complaints are heard in courts and constitutional bodies, not in a building belonging to the Gandhi family.

बृहत्तर भारत परिषद् की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजन  

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अनुराग पुनेठा

दिल्ली । भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के स्वायत्त संस्थान इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) द्वारा ‘बृहत्तर भारत’ योजना के अंतर्गत ‘विश्व भर में भारत के सांस्कृतिक सम्बंध’ विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किया। 14 से 16 अक्टूबर 2026 तक विज्ञान भवन, नई दिल्ली में आयोजित हो रहे इस सम्मेलन को प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अपनी शुभकानाएं प्रेषित की। प्रधानमंत्री का संदेश केन्द्रीय संस्कृति सचिव श्री विवेक अग्रवाल ने पढ़कर सुनाया। श्री विवेक अग्रवाल ने परिचयात्मक संबोधन भी दिया। आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने स्वागत भाषण दिया और केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के संयुक्त सचिव डॉ. अरविंद कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन किया। इस अवसर पर आईजीएनसीए के बृहत्तर भारत विभाग के अध्यक्ष प्रो. धर्मचंद चौबे भी उपस्थित थे। सम्मेलन के दौरान ‘एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत’ शीर्षक से एक प्रदर्शनी भी आयोजित की गई, जिसका अवलोकन श्री गजेंद्र सिंह शेखावत, श्री विवेक अग्रवाल व अन्य गणमान्य अतिथियों ने किया। इस प्रदर्शनी में भारत और एशिया के अन्य देशों के बीच साझा विरासत तथा ऐतिहासिक सांस्कृतिक सम्बंधों को प्रदर्शित किया गया है।

प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में संस्कृति मंत्रालय और इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र को शुभकामना देते हुए कहा, इस महत्त्वपूर्ण सम्मेलन में भाग ले रहे भारत और विदेशों के विद्वानों, शोधकर्ताओं, राजनयिकों तथा अन्य प्रतिष्ठित प्रतिभागियों का मैं हार्दिक स्वागत करता हूं। सदियों से भारत की सभ्यतागत यात्रा सांस्कृतिक आदान-प्रदान की कहानी रही है। नालंदा जैसे ज्ञान केंद्रों ने भारत और एशिया के अन्य क्षेत्रों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान को मजबूत किया। बौद्ध भिक्षुओं, विद्वानों, व्यापारियों और यात्रियों ने स्थल मार्गों तथा समुद्री मार्गों के माध्यम से भारत के विचारों को दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाया। यह सांस्कृतिक संवाद आज भी निरंतर आगे बढ़ रहा है। भारतीय दर्शन, संगीत, नृत्य, साहित्य, सिनेमा और खान-पान की परम्पराएं दुनिया भर के समाजों को भारत से जोड़ती हैं। अनेक देशों में भारतीय त्योहार और परम्पराएं भी उत्साह के साथ मनाई जाती हैं। दुनिया भर में योग का प्रसार इस बात का उदाहरण है कि भारत की प्राचीन ज्ञान परम्पराएं आज भी विभिन्न देशों और संस्कृतियों के लोगों को जोड़ रही हैं। भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर भी लगातार अधिक पहचान मिल रही है। यह सम्मेलन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसके माध्यम से बृहत्तर भारत (ग्रेटर इंडिया सोसाइटी) की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने का अवसर मनाया जा रहा है। इस संस्था ने भारत के सांस्कृतिक और बौद्धिक सम्बंधों तथा एशिया और दुनिया के अन्य हिस्सों के साथ उसके जुड़ाव के अध्ययन और समझ को बढ़ावा देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

मेरी कामना है कि इस सम्मेलन में होने वाला विचार-विमर्श भारत और दुनिया के बीच ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक सम्बंधों के बारे में हमारी समझ को और मजबूत करे तथा अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सहयोग को आगे बढ़ाए।

मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा, आज हम यहां केवल इतिहास पर चर्चा करने के लिए एकत्र नहीं हुए हैं, बल्कि यह समझने का प्रयास भी कर रहे हैं कि अतीत का ज्ञान हमारे भविष्य की संभावनाओं को किस तरह दिशा दे सकता है। हम एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर विचार कर रहे हैं – जब विभिन्न सभ्यताएं एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं, तो क्या होता है? विचार एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचते हैं, ज्ञान सीमाओं को पार करता है, कला को नए रूप मिलते हैं और समाज यह समझते हैं कि अपनी भिन्नताओं के बावजूद उनकी विरासत में बहुत कुछ साझा है।

यही भारत की सांस्कृतिक विरासत का गहरा अर्थ है। यह सम्मेलन विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि हम बृहत्तर भारत परिषद् (ग्रेटर इंडिया सोसाइटी) की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने का अवसर पर यह सम्मेलन आयोजित कर रहे हैं। इस संस्था की स्थापना 14 अक्टूबर, 1926 को कलकत्ता में हुई थी। सौ वर्ष पहले ही विद्वानों ने यह समझ लिया था कि दुनिया के अन्य देशों के साथ भारत के सांस्कृतिक सम्बंधों का अध्ययन करना आवश्यक है। उनके प्रयासों से इस ऐतिहासिक तथ्य को अकादमिक पहचान मिली कि भारत की बौद्धिक, आध्यात्मिक और कलात्मक परम्पराएं भारतीय उपमहाद्वीप की सीमाओं से बहुत दूर तक पहुंची थीं। इसलिए, बृहत्तर भारत को किसी राजनीतिक या क्षेत्रीय दावे के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक सम्बंधों के व्यापक क्षेत्र के रूप में समझा जाना चाहिए। अपनी सभ्यतागत विरासत पर हमारा गर्व दूसरों के योगदान को कमतर करने पर आधारित नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, अपनी विरासत को जितनी गहराई से समझेंगे, दुनिया की विरासत को समझने और उसका सम्मान करने की हमारी क्षमता भी उतनी ही बढ़ेगी। जैसा कि हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा है, संस्कृति को दुनिया को जोड़ना चाहिए, बांटना नहीं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ हमारे सम्बंधों का आधार यही विचार होना चाहिए।

केन्द्रीय संस्कृति सचिव श्री विवेक अग्रवाल ने कहा, मंत्रालय के लिए यह अत्यंत गर्व और सौभाग्य की बात है कि माननीय प्रधानमंत्री जी ने हमें यह जिम्मेदारी सौंपी है कि हम दुनिया के अन्य देशों के साथ भारत के प्राचीन सम्बंधों को सामने लाएं। इन सम्बंधों को प्रमाणों के आधार पर स्थापित करने के लिए हमें शोध करना है और उन देशों के विद्वानों के साथ मिलकर काम करना है, जिनके साथ भारत के प्राचीन सम्बंध रहे हैं।

भारत की प्राचीन गौरवशाली विरासत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक पहुंचाने के इस पूरे प्रयास को एक परियोजना के रूप में संचालित किया जा रहा है। हम इसे बृहत्तर भारत परियोजना कहते हैं। यह सम्मेलन बृहत्तर भारत परिषद् (ग्रेटर इंडिया सोसाइटी) की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने का भी प्रतीक है। इस परियोजना की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसके अंतर्गत संयुक्त शोध किया जाएगा। यह केवल भारतीय विद्वानों द्वारा किया जाने वाला शोध नहीं होगा। हम उन विषयों और मुद्दों पर शोध करेंगे, जो भारत और अन्य देशों के विद्वानों के लिए समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। इसके बाद प्रमाणों पर आधारित चर्चा और विचार-विमर्श के माध्यम से शोधपत्र तैयार किए जाएंगे। यह केवल भारतीय विद्वानों द्वारा किया जाने वाला प्रयास नहीं होगा और न ही इसका उद्देश्य केवल भारत के दावों को प्रस्तुत करना होगा। यह भारतीय विद्वानों और दूसरे देशों के विद्वानों के बीच संयुक्त प्रयास होगा।

आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने अपने स्वागत भाषण में कहा, सभ्यताओं की पहचान केवल उनकी भौगोलिक सीमाओं से नहीं होती, बल्कि उनके विचारों की यात्राओं, लोगों के आवागमन और उनके द्वारा पीछे छोड़ी गई स्मृतियों से भी होती है। इतिहास में लोग ज्ञान, आस्था, अवसरों और नई खोजों की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते रहे हैं। व्यापारियों ने पहाड़ों और समुद्रों को पार किया, बौद्ध भिक्षुओं और तीर्थयात्रियों ने पवित्र स्थलों के बीच यात्राएं कीं, विद्वानों ने ग्रंथों का अनुवाद किया और विचारों का आदान-प्रदान किया। कारीगर अपने हुनर, तकनीकों और दूर-दराज के क्षेत्रों की कलात्मक परम्पराओं को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले गए। इन मुलाकातों में संस्कृतियां केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक नहीं पहुंचीं, बल्कि उन्होंने एक-दूसरे के साथ संवाद किया, एक-दूसरे से बहुत कुछ अपनाया और समय के साथ विकसित हुईं। इस प्रक्रिया से ऐसे सम्बंध बने, जो आज भी हमारी दुनिया को आकार दे रहे हैं। सांस्कृतिक आदान-प्रदान के इसी असाधारण इतिहास में बृहत्तर भारत की अवधारणा का मूल निहित है।

आज मैं बृहत्तर भारत की परिकल्पना के बारे में बात करना चाहता हूं। यह संस्कृति मंत्रालय के अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्बंध (आईसीआर) प्रभाग की एक योजना है, जिसका क्रियान्वयन इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) द्वारा किया जा रहा है। इसका उद्देश्य भारतीय सभ्यता और कुछ चयनित देशों की साझा सांस्कृतिक विरासत की पहचान करना, उसका दस्तावेजीकरण और संरक्षण करना तथा उसे लोगों के लिए सुलभ बनाना है। बृहत्तर भारत हमें भौगोलिक और राजनीतिक सीमाओं से आगे बढ़कर उन व्यापक क्षेत्रों को देखने के लिए प्रेरित करता है, जहां विभिन्न देशों के लोगों के बीच संपर्क और संवाद हुआ।

उद्घाटन सत्र से पहले, पूर्व विदेश सचिव, पूर्व राजदूत और अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद के पूर्व अध्यक्ष श्री शशांक की अध्यक्षता में एक पूर्ण सत्र आयोजित किया गया। इस सत्र में लिथुआनिया की भारत में राजदूत डायना मिकेविचिएने, भारत में फिजी के उच्चायुक्त राजदूत जगन्नाथ सामी, संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुश्री लिली पांडेय तथा पूर्व राजनयिक व लेखक श्री टी.सी.ए. राघवन ने वक्ता के रूप में भाग लिया। जगन्नाथ सामी ने कहा कि फिजी मेरी जन्मभूमि है और भारत मातृभूमि। वहीं डायना मिकेविचिएने ने कहा है कि भारत हमेशा से लिथुआनिया को प्रेरित करता रहा है। संस्कृति मंत्रालय के अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्बंध प्रभाग की निदेशक सुश्री प्रियंका चंद्रा ने सत्र का संचालन किया। सम्मेलन में भाग ले रहे विभिन्न देशों के राजदूत और अन्य प्रतिनिधि भी इस अवसर पर उपस्थित थे।

श्रीनिवासन जैन: पत्रकार के वेश में जिहाद का शील्ड

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पवन विजय

दिल्ली। श्रीनिवासन जैन 30 साल तक NDTV के स्टूडियो में बैठकर जिस पत्रकारिता को सच बताते रहे, वो सच कभी था ही नहीं। वो एक नैरेटिव था – एक सोचा-समझा एजेंडा, जिसमें हिंदू समाज की हर चिंता को “फिक्शन” बता देना ही पत्रकारिता बन गया।

उनकी किताब लव जिहाद एंड अदर फिक्शन इसी एजेंडे का डॉक्यूमेंट है।

जैन कहते हैं लव जिहाद होता ही नहीं। तो फिर केरल हाई कोर्ट ने इस शब्द का इस्तेमाल क्यों किया? NIA ने सैकड़ों मामलों में धर्मांतरण और शोषण के पैटर्न की जांच क्यों की? यूपी, केरल, कर्नाटक में रोज़ जो लड़कियां कैमरे पर आकर कहती हैं कि नाम बदलकर फंसाया गया, फिर धर्म बदलने का दबाव बनाया गया, वो सब फिक्शन है? जमीनी हकीकत को डेटा के खेल से झुठलाना ही तो इनकी फैक्ट-चेकिंग है।

पॉपुलेशन जिहाद पर वो फर्टिलिटी रेट का गणित पढ़ाते हैं। गणित सही हो सकता है, लेकिन सवाल गणित का नहीं, मंशा का है। जब बंगाल और असम के बॉर्डर जिलों में डेमोग्राफी 20 साल में पलट जाती है, तो वो किस फिक्शन से होती है? आंकड़ों की आड़ में आंखों देखी सच्चाई को नकारना ही इनकी सेक्युलरिज्म है।

जबरन धर्मांतरण को भी वो फिक्शन बताते हैं। तो फिर छत्तीसगढ़, झारखंड के आदिवासी इलाकों में प्रलोभन और सेवा के नाम पर चलने वाले कन्वर्जन रैकेट पर FCRA क्यों रद्द होते हैं? कानून क्यों बनते हैं?

और तुष्टिकरण? जैन पूछते हैं कि ईद पर ज्यादा बिजली मिलती है इसका सबूत कहां है। अरे सबूत बिजली का नहीं, मानसिकता का है। हज सब्सिडी 2018 तक इस देश में थी या नहीं? मदरसों को सरकारी फंड मिलता था या नहीं? चार शादी की इजाजत कानून में थी या नहीं? सवाल बिजली का नहीं, बराबरी का है।

असली विवाद ये है कि श्रीनिवासन जैन पत्रकार कम, नैरेटिव मैनेजर ज्यादा हैं। इशरत जहां जो नरेंद्र मोदी को मारने आई थी, उसके लिए “छोटा-मोटा ब्लास्ट” शब्द इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति आपको बताएगा कि खतरा फिक्शन है। को वैक्सीन जैसी स्वदेशी वैक्सीन पर फेक खबर चलाकर माफी मांगने वाला व्यक्ति आपको सिखाएगा कि सच क्या है।

जैन की पूरी पत्रकारिता एक ही फॉर्मूले पर चलती है – हिंदू डरे तो उसे अफवाह बताओ, और जब हिंदू पर वार हो तो उसे छोटा-मोटा बताओ।
जैन जैसे लोग जिहादियों से भी खतरनाक हैं क्योंकि वे पत्रकार का मुखौटा लगाए हमारे आपके बीच में हैं।

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श्रीनिवासन जैन (Sreenivasan Jain) को लेकर मुख्य रूप से 10 बाते जिसको जानना जरूरी है ::

1.जैन की अब तक की कोई भी रिपोर्टिंग और डिबेट्स देख ले, उनमें अक्सर एक खास वैचारिक झुकाव होता है, जहाँ वे वामपंथी या उदारवादी एजेंडे को बढ़ावा देते हैं और बहुसंख्यक समाज या हिंदू संगठनों से जुड़े मुद्दों पर नकारात्मक दृष्टिकोण पेश करते हैं।
2.जैन हमेशा हिंदू त्योहारों और परंपराओं पर पूर्वाग्रह भरा रुख अपनाते है।अपनी पत्रकारिता में जैन हिंदू धार्मिक जुलूसों, त्योहारों या शोभायात्राओं के दौरान होने वाली घटनाओं की कवरेज में हमेशा एकतरफा रुख अपनाते हैं, जिससे हिंदू समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला होता है।

3.जैन की सबसे बड़ी कीर्ति या यश लव जिहाद को झूठ बता इसको क्लीन चीट देंना था।’उनके दऔर उनकी टीम द्वारा सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों (जैसे जनसांख्यिकीय बदलाव या कथित ‘लव जिहाद’) पर किए गए शोध और किताब फैक्ट को छुपा कर समाज में भ्रम फैलाने और वास्तविक धरातलीय सच्चाइयों को छिपाने का प्रयास हैं लेकिन सोशल मीडिया की सक्रियता से यह असफल हुआ।

4. जैन जो भी बोलते है या लिखते है उनकी रिपोर्टिंग का इस्तेमाल अक्सर पश्चिमी और विदेशी मीडिया संस्थानों द्वारा भारत में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न और ‘बढ़ती असहिष्णुता’ का नैरेटिव गढ़ने के लिए किया जाता है। इनके वक्ताब्यो पर ही भारत की थ्रू थ्रू होती है।
5. एनडीटीवी (NDTV) के दौर की संपादकीय शैली उनका जलवा गजब का रहा।जब वे यह सक्रिय थे तो वो रवीश+बरखा+राजदीप की तरह एक तरफा बैटिंग करते थे, उन पर हमेशा से एक विशेष राजनीतिक दल और विचारधारा के प्रति वैचारिक रूप से पूर्वाग्रह से ग्रसित होने का आरोप लगाया जाता रहा है।मुस्लिम वोट बैंक को थामे रहना,उसका बचाव करना उनकी पत्रकारिता की शैली रही।

6. जैन की कोई कार्यक्रम देख ले, वे देश में हिंदू राष्ट्रवाद या बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक आकांक्षाओं को हमेशा ‘असहष्णुता’ या ‘लोकतंत्र के पतन’ के रूप में चित्रित करते हैं, जबकि अन्य किसी वैचारिक धड़ों की तुष्टिकरण की राजनीति पर मौन साध लेते हैं।यह नैरेटिव उनकी विशेष शैली रही।

7.जैन किसी भी न्यूज को डेटा और तथ्यात्मक बयानों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने में माहिर रहे।उनके द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले आंकड़े अक्सर अकादमिक रूप से सतही होते हैं, जिनका उद्देश्य सरकार और राष्ट्रवादी संगठनों की छवि को नुकसान पहुंचाना होता है।

8.जैन हमेशा ऐसी रिपोर्टिंग करते कि भारत के संस्थाओं और न्यायपालिका पर दबाव बनाने वाले नैरेटिव खड़ा हो।जैन जैसे पत्रकार तब्लीगी जमात या पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे सभी सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों को समर्थन देते हैं जो देश की न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर वैचारिक दबाव बनाने का काम करते हैं।
9.जैन हमेशा भारतीय संस्कृति, सनातन परंपराओं और राष्ट्रवाद के पुनरुत्थान को आधुनिकता या प्रगतिशीलता के विरोधी के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं।उनकी रिपोर्ट में हिंदू धर्म के प्रति भय या वैमनस्य स्पष्टतः दिखता है।

10 जैन वास्तव में पत्रकारिता की आड़ में सक्रियता (Activism as Journalism)breaking india movement वाला अपना जाना माना एजेंडा चलाते है।वे निष्पक्ष पत्रकार की भूमिका निभाने के बजाय एक ‘वैचारिक एक्टिविस्ट’ की तरह व्यवहार करते हैं, जो एक तय एजेंडे के तहत समाज को विभाजित करने वाली बहसों को हवा देते हैं।

(भारत में वे लिबरल+लेफ्ट+एंटी हिंदू+सेकुलर लेखक जमात की सूची का ईकोसिस्टम में टॉप के 15 लोगों में शामिल है.बीबीसी, अल्जाजजिरा, CNN,trt, DW news इनके प्रमुखता से कवर कर भारत की लानत मानत करता है)

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