क्या सचमुच आसमान युद्ध का फैसला लिख रहा है? या फिर इतिहास अब भी ट्रंप के हाथों में है?

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दिल्ली । आसमान अशांत है। आग लगी हुई है। चीन और रूस ऐसे खामोश हैं जैसे कुछ हुआ ही न हो। जबकि ज़मीन पर धुआँ है, बारूद है और बेचैनी है।
बेचारा ट्रंप क्या करे। ग्रह-नक्षत्र उसे चैन से रहने नहीं दे रहे। ज्योतिषियों का दावा है कि ऊपर ग्रहों की चाल ही नीचे युद्ध की दिशा तय कर रही है। अमेरिका और इज़राइल की अगुवाई में ईरान के खिलाफ छिड़ा संघर्ष छह दिनों की जगह अब छठे हफ्ते में प्रवेश कर चुका है। शुरुआत का पलड़ा साफ तौर पर एक तरफ झुका दिखता है। लेकिन अंत अब भी धुंध में लिपटा है ; लंबा, उलझा हुआ, थकाने वाला।

“इतिहास की सबसे बड़ी लड़ाइयाँ पहले आसमान में लड़ी जाती हैं, धरती तो सिर्फ उसका मंच बनती है,” एक पश्चिमी ज्योतिषी की यह टिप्पणी इन दिनों खूब दोहराई जा रही है।
कहानी 28 फरवरी की उस रात अचानक रफ्तार पकड़ती है। मिसाइलें आसमान चीरती हैं। ठिकाने ढहते हैं। और ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत इस संघर्ष को एक नए मोड़ पर ला खड़ा करती है। सैन्य ढांचे को गहरी चोट लगती है। दुनिया सन्न रह जाती है।

ज्योतिषी इसे महज संयोग नहीं मानते। मंगल और यूरेनस का टकराव। राहु और मंगल की युति। यही विस्फोटक संयोजन है जिसे शास्त्रों में उथल-पुथल का संकेत माना गया है।
“जब मंगल उग्र होता है, तो तलवारें खुद रास्ता खोज लेती हैं,” एक वैदिक ज्योतिषी का कहना है।

शुरुआती दौर में यह युद्ध एकतरफा दिखता है। अमेरिकी वायु शक्ति का दबदबा साफ नजर आता है। सटीक हमले। सीमित नुकसान। मजबूत पकड़। लेकिन यही वह क्षण है जहाँ कहानी पलटने को बेकरार है।

कुंडलियाँ इशारा कर रही हैं कि यह संघर्ष जल्द थमने वाला नहीं। अप्रैल और मई आग से भरे महीने बताए जा रहे हैं। शनि और मंगल की युति तनाव को लंबा खींचेगी।
“शनि सिखाता है, मंगल सज़ा देता है। दोनों साथ हों तो समय कठोर हो जाता है,” यह पुरानी ज्योतिषीय कहावत फिर प्रासंगिक लगने लगी है।

आगे क्या? जवाब बेचैन करने वाला है। ड्रोन हमले बढ़ेंगे। मिसाइलों की बरसात होगी। प्रॉक्सी युद्ध गहराएंगे। होरमुज़ जलडमरूमध्य पर खतरे मंडराएंगे। पूरा पश्चिम एशिया इस आग की तपिश महसूस करेगा।

लेकिन हर भविष्यवाणी सिर्फ अंधेरा नहीं दिखाती। नास्त्रेदमस के लंबे सात महीनों के युद्ध का भी हवाला दिया जा रहा है।

कुछ ज्योतिषी दावा कर रहे हैं कि यह संकट अपने भीतर एक बदलाव का बीज भी लिए हुए है। गर्मियों के आखिर तक ईरान के लिए “मुक्ति” और एक तरह का पुनर्जन्म संभव है।
“हर विनाश अपने भीतर सृजन का बीज छुपाए होता है,” यह कथन जैसे इस पूरे परिदृश्य पर फिट बैठता है।

वैदिक ज्योतिष के कई चेहरे इसे सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि एक गहरे राजनीतिक और सांस्कृतिक भूकंप की शुरुआत मानते हैं। उनके मुताबिक दबाव बढ़ेगा, सत्ता डगमगाएगी और अंततः एक नई पहचान उभरेगी। शायद “प्राचीन पर्शिया” की स्मृति फिर सिर उठाए।

इस अंधेरे में एक हल्की रोशनी भी है।
जब बृहस्पति कर्क राशि में प्रवेश करेगा, तब संवाद के दरवाजे खुल सकते हैं। कुछ ज्योतिषी जुलाई के अंतिम सप्ताह की ओर इशारा कर रहे हैं। कुछ सितंबर और अक्टूबर में चरणबद्ध समझौते की संभावना देखते हैं। लेकिन इतिहास बार-बार साबित कर चुका है : “शांति कभी सीधे रास्ते से नहीं आती, वह संघर्ष के काँटों से होकर गुजरती है।”
भविष्यवक्ताओं की मानें तो एक और संकेत चिंता बढ़ाता है। यूरेनस का मिथुन राशि में प्रवेश। इतिहास गवाह है ; जब-जब ऐसा हुआ, अमेरिका बड़े युद्धों में उलझा है। आशंका है कि यह संघर्ष सीमाओं से बाहर फैल सकता है। तेल की कीमतें उछल सकती हैं। दूसरी शक्तियां परोक्ष रूप से मैदान में उतर सकती हैं।

ज्योतिषियों की भाषा अलग है, लेकिन निष्कर्ष एक सा है। फिलहाल युद्ध का मैदान अमेरिका और इज़राइल के पक्ष में झुका हुआ दिखता है। लेकिन जीत का ताज अभी दूर है। यह लड़ाई सिर्फ गोलियों और बमों से तय नहीं होगी। इसका असली हिसाब वक्त करेगा।

एक वरिष्ठ ज्योतिषी के शब्दों में गूंजती सच्चाई है:
“युद्ध मैदान में जीते जाते हैं, लेकिन उनका अर्थ समय तय करता है।”
नीचे धरती पर सैनिक आगे बढ़ रहे हैं। मोर्चा संभाले खड़े हैं। ऊपर आसमान में ग्रह अपनी चाल चल रहे हैं। और दुनिया ठहरी हुई सांसों के साथ देख रही है।
आखिर फैसला कौन करेगा?
सितारे?
या इंसान की जिद, उसकी बुद्धि और उसका साहस?
“ग्रह दिशा देते हैं, लेकिन मंज़िल इंसान खुद चुनता है।”

Forever Grateful to Prime Minister Modi and Central Leadership for Their Constant Guidance and Support: Dileep Sanghani

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Delhi: IFFCO Chairman Dileep Sanghani stated that the financial year 2025-26 has emerged as a milestone in the history of the Indian cooperative movement. IFFCO’s journey, which began in 1967 with just 57 cooperative societies, has today become a symbol of trust for over 36,000 societies and millions of farmers. Establishing itself as the second-largest cooperative institution globally is not merely an achievement, but a living testament to the power of India’s cooperative spirit. In this golden year, IFFCO achieved an all-time record pre-tax profit of over ₹4,106 crore.

IFFCO also set new benchmarks in production and sales. A record sale of 118.75 lakh metric tonnes of fertilizers, coupled with a nationwide supply of 119.68 lakh metric tonnes, stands as proof that the institution accords the highest priority to farmers’ needs. The rising sales of urea and DAP have further solidified IFFCO’s pivotal role in the agricultural sector.

In FY 2025-26, the popularity of nano-fertilizers witnessed rapid growth, with sales exceeding 30.1 lakh bottles. Products such as Nano Urea Plus, Nano DAP, Nano Zinc, Nano Copper, and ‘Dharamrut’ have emerged as highly effective, eco-friendly, and cost-efficient alternatives for farmers. Furthermore, Nano NPK Liquid (8-8-10) and Nano NPK Granular (20-10-10) have been notified under the Fertilizer Control Order—these are the first products of their kind in the world. They can be utilized through both foliar spraying and soil application, enhancing nutrient use efficiency and creating a positive environmental impact.

To expand the reach of nano technology, IFFCO inaugurated its fourth nano-fertilizer plant in Devanahalli, Bengaluru, bringing the total production capacity to approximately 950,000 bottles per day. Meanwhile, the Nano Innovation Centre in Coimbatore is emerging as a pivotal platform for research and technological development, with work underway on new technologies focused on the future of agriculture.

IFFCO remains equally committed to employee welfare. With this objective in mind—and under the leadership of Chairman Shri Dileep Sanghani—the organization implemented a guaranteed minimum wage of ₹20,000 per month for contract employees, effective November 1, 2025. This decision has directly benefited thousands of employees, incurring an additional expenditure of approximately ₹140 crore.
Today, IFFCO’s presence extends beyond India; it delivers services and products to over 40 countries. Efforts are also underway to establish a joint venture for nano-fertilizer production in Brazil, giving Indian nano technology a distinct identity on the global stage.

As a cooperative leader, it has always been my firm conviction that farmers’ prosperity forms the foundation of the nation’s prosperity. Inspired by this ethos—and despite global challenges—IFFCO ensured the uninterrupted availability of fertilizers for farmers. Creating alternative supply chains and timely stock management played a pivotal role in this achievement.

The path ahead is clear: Through nano technology, organic practices, and harmonizing fertilizers with modern agriculture—via IFFCO—we are united in our collective endeavor to realize Prime Minister Shri Narendra Modi’s vision of “Viksit Bharat @ 2047” (Developed India @ 2047).

On this occasion, IFFCO Chairman Shri Dileep Sanghani expresses heartfelt gratitude to Prime Minister Shri Narendra Modi; Union Minister of Home Affairs and Cooperation Shri Amit Shah; Union Minister of Fertilizers Shri J.P. Nadda; and Union Minister of Agriculture Shri Shivraj Singh Chouhan for their invaluable guidance and support. He also thanks all members of the IFFCO Board of Directors for their unwavering cooperation, and offers sincere congratulations to the Managing Director, officers, and employees for their dedication and tireless efforts.

यह उपलब्धी केवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्किकिसानकी मेहनत, कर्मचारीयों के समर्पण और सहकारिता केमूल्यों की विजय गाथा है : दिलीप संधाणी

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११८.७५ लाख मेट्रिक टन उर्वरक बिक्री

दिल्ली । इफ्को के अध्यक्ष दिलीप संधाणी ने कहा की, भारतीयसहकारिता आंदोलन के इतिहास में वित्तीय वर्ष २०२५-२६ एक मिलका पत्थर बनाकर उभरा है। सं १९६७ में मात्र ५७ सहकारीसमित्तियों के साथ शुरू हुई इफ्को की यात्रा आज ३६,००० से अधिकसमितियों और करोडो किसानो के विश्वास की पहचान बन चुकी है। विश्व स्तर पर दूसरी सबसे बड़ी सहकारी संस्था के रूप में स्थापितहोना केवल एक उपलब्धी नहीं, बल्कि भारत की सहकारिता शक्तिका जीवंत प्रमाण है। इस स्वर्णिम वर्ष में इफ्को ने रु. ४,१०६ करोड़से अधिक का सर्वकालिक रिकॉर्ड लाभ अर्जित किया। यह उपलब्धीकेवल आंकड़ों की कहानी नहीं, बल्कि उन किसानो की मेहनत, कर्मचारीयों के समर्पण और सहकारिता के मूल्यों की विजय गाथाहै।

उत्पादन और बिक्री के क्षेत्र में भी इफ्को ने नए कीर्तिमानस्थापित किए। ११८.७५ लाख मेट्रिक टन उर्वरक की रिकॉर्ड बिक्रीऔर देशभर में ११९.६८ लाख मेट्रिक टन की आपूर्ति इस बात काप्रमाण है की संस्था किसानो की आवश्यकताओं को सर्वोच्चप्राथमिकता देती है। यूरिया और डी. ए. पी. की बढ़ती बिक्री ने कृषिक्षेत्र में इफ्को की निर्णायक भूमिका को और सुदृढ़ किया है।

वित्तीय वर्ष २०२५-२६ में ३०१ लाख से अधिक बोटलो की बिक्रीके साथ नैनो उर्वरको की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है। नैनो यूरियाप्लस, नैनो डीएपी, नैनो जिंक और नैनो कॉपर, धरामृत जैसे उत्पादकिसानो के लिए अधिक प्रभावी, पर्यावरण अनुकूल और लागतप्रभावी विकल्प के रूप में सामने आए है। इसके साथ ही नैनोएनपीके लिक्विड (८-८-१०) और नैनो एनपीके ग्रेन्यूलर (२०-१०-१०) को उर्वरक नियंत्रण आदेश के अंतर्गत अधिसूचित किया गया है, जोविश्व में अपनी तरह के पहले उत्पाद है। उन उत्पादो का उपयोगपत्तीयो पर छिड़काव और मिट्टी दोनों तरीको से किया जा शकता है , जिससे पोषक तत्वों की दक्षता बढ़ती है और पर्यावरण पर भीसकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

नैनो तकनीक के विस्तार के लिए इफ्को ने बेंगलुरु केदेवनहल्ली में चौथे नैनो उर्वरक संयंत्र का उद्धाटन किया है, जिससेइफ्को की कुल उत्पादन क्षमता लगभग ९.५ लाख बॉटल प्रतिदिन होगई है। वही कोयंबतूर में स्थापित नैनो नवाचार केंद्र अनुसंधान औरतकनीकी विकास के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बन रहा है, जहा कृषिके भविष्य को ध्यान में रखते हुए नई तकनीको पर कार्य किया जारहा है।

इफ्को अपने कर्मचारीयो के कल्याण के प्रति भी समान रूप सेप्रतिबद्ध है। इसी दृष्टी से इफ्को के अध्यक्ष श्री संधाणी के नेतृत्व मेंसंस्था से जुड़े संविदा कर्मचारीयो के लिए रु. २०,००० प्रति माहन्यूनत्तम वेतन की गारंटी लागू की गई है, जो १ नवम्बर २०२५ सेप्रभावी है। इस निर्णय से हजारो कर्मचारीयो को सीधा लाभ मिला हैऔर संस्था ने इसके लिए लगभग रु. १४० करोड़ का अतिरिक्त व्ययवहां किया है।

आज इफ्को की उपस्थिति केवल भारत तक सिमित नहीं है। हम ४० से अधिक देशो में अपनी सेवाएँ और उत्पादक पहुंचा रहे है। ब्राजील में नैनो उर्वरक उत्पादन के लिए संयुक्त उदयम की स्थापनाकी दिशा में भी कार्य किया जा रहा है, जिससे भारतीय नैनो तकनीकको वैश्विक मंच पर नई पहचान मिलेगी।
एक सहकारी नेता के रुप में मेरा दृढ विश्वास रहा है की किसानकी समृध्धी ही राष्ट्र की समृद्धि का आधार है। इसी भावना से प्रेरितहोकर इफ्को ने वैश्विक चुनौतियों के बावजुद किसानो के लिएउर्वरको की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित की। वैकल्पिक आपूर्तिश्रृंखलाओं का निर्माण और समय पर स्टॉक प्रबंधन इस दिशा मेंमहत्वपूर्ण रहे।

आगे की राह स्पष्ट है – नैनो तकनीक, जैविक उर्वरक औरआधुनिक कृषि पद्धतियों’ के समन्वय से इफ्को के माध्यम से हम सबसंयुक्त प्रयास कर लोकप्रिय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई मोदी जी के”विकसित भारत @२०४७” के लक्ष्य को साकार करने के लिएसंकल्पित है।

इस अवसर पर इफ्को के अध्यक्ष श्री दिलीप संधाणी ने देश केयशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रभाई मोदी, केंद्रीय गृह एवं सहकारितामंत्री श्री अमितभाई शाह, केंद्रीय उर्वरक मंत्री श्री जे.पी. नड्डा तथाकेंद्रीय कृषि मंत्री श्री शिवराजसिंह चौहान के मार्गदर्शन और सहयोगके लिए हदय से आभार व्यक्त करता हूँ। साथ ही इफ्को निर्देशकमंडल के सभी सदस्यों का भी धन्यवाद जिन्होंने सदैव सहयोग किया। साथ-साथ प्रबंध निर्देशक, अधिकारीयो एवं कर्मचारीयो के समर्पणऔर अथक प्रयासों के लिए उन्हें हार्दिक बधाई और धन्यवाद देता हूँ।

न्यायपालिका पर हमला: क्या अब ‘मजहबी भीड़’ चलाएगी पश्चिम बंगाल?

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विप्लव विकास

कोलकाता: पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का मोथाबाड़ी क्षेत्र 1 अप्रैल को उस भयानक सच्चाई का गवाह बना जिसे ‘सेकुलर’ राजनीति का चश्मा पहनने वाले अक्सर अनदेखा कर देते हैं। न्यायपालिका के सात अधिकारियों को, जिनमें महिला अधिकारी भी शामिल थीं, 9 घंटों तक उन्मादी भीड़ के बीच बंधक बने रहना पड़ा। यह केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं है, बल्कि यह उस भीड़ तंत्र का भारतीय संवैधानिक प्रक्रिया और न्याय व्यवस्था पर आक्रमण था जिसने पश्चिम बंगाल में कानून के शासन की जगह भीड़ के शासन की सच्चाई सबके सामने ला दिया है। आज समय आ गया है कि इस मुद्दे पर बिना किसी लाग-लपेट के बात किया जाए, क्योंकि अब पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका है।

इस पूरे घटनाक्रम की जड़ में वह ‘अदृश्य जनसांख्यिकीय युद्ध’ है, जिसे पिछले कुछ दशकों से सुनियोजित तरीके से पश्चिम बंगाल की सीमावर्ती जिलों में लड़ा जा रहा है। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के शुद्धिकरण की प्रक्रिया के दौरान जब लाखों संदिग्ध नामों को हटाया गया, तो अचानक सड़कों पर उतरा यह आक्रोश स्वतःस्फूर्त नहीं था। यह उस वोट-बैंक की छटपटाहट थी जिसे पहले वामपंथियों तथा अब तृणमूल कांग्रेस ने अपने राजनीतिक अस्तित्व के लिए ढाल बनाया है। जब ‘घुसपैठियों’ और ‘संदिग्ध नागरिकों’ के हाथ से लोकतंत्र को हाईजैक करने का हथियार छीना जाने लगा, तो उन्होंने लोकतंत्र के रक्षक न्यायिक अधिकारियों पर ही हमला बोल दिया। यह सीधे तौर पर भारतीय गणराज्य की संप्रभुता को चुनौती है।

ममता बनर्जी की सरकार और उनके प्रशासन की भूमिका यहाँ संदेहास्पद ही नहीं, बल्कि स्पष्ट रूप से एक पक्षीय दिखाई देती है। टीएमसी का राजनैतिक संरक्षण इन तत्वों को यह एहसास दिलाता है कि वे कानून से ऊपर हैं। जब मुख्यमंत्री स्वयं ऐसे संवेदनशील समय पर संवैधानिक संस्थाओं जैसे चुनाव आयोग पर हमलावर होती हैं, तो जमीन पर बैठे दंगाइयों को यह स्पष्ट संदेश जाता है कि राज्य सत्ता उनके पीछे खड़ी है। यह ‘मौन समर्थन’ और प्रत्यक्ष उकसावा ही है जिसने मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिलों को ऐसे टापुओं में तब्दील कर दिया है जहाँ भारत का संविधान नहीं, बल्कि मजहबी और राजनीतिक गुंडागर्दी का राज चलता है।

यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न पश्चिम बंगाल के आम हिंदू मतदाता के विश्वास का है। 2021 के चुनाव के बाद जो वीभत्स रक्तपात हुआ, जिस तरह से हजारों हिंदू परिवारों को पलायन के लिए मजबूर किया गया और माताओं-बहनों की मर्यादा को तार-तार किया गया, उसकी टीस आज भी बाकी है। मोथाबाड़ी की घटना ने उस पुराने घाव को फिर से हरा कर दिया है। एक आम हिंदू मतदाता आज स्वयं से पूछ रहा है “अगर प्रशासन सात न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा नहीं दे सकती, तो क्या वह मुझे मेरे घर से बूथ तक जाने की सुरक्षा दे पाएगी? क्या मतदान के बाद इस जिहादी भीड़ से हमें बचाने हेतु ये शासन इच्छुक हैं?” यह डर ही वह हथियार है जिसका उपयोग तृणमूल और उसका ‘खास’ वोट बैंक करना चाहता है ताकि बहुसंख्यक समाज भयवश घरों में दुबका रहे और ‘डेमोग्राफिक इंजीनियरिंग’ और ‘सांइटिफिक रिगिंग’ के माध्यम से सत्ता पर कब्जा बरकरार रहे।

अब समय आ गया है कि पश्चिम बंगाल की कानून-व्यवस्था को लोह-हस्त से नियंत्रित किया जाए। चुनाव आयोग, प्रशासन और केंद्र सरकार को यह समझना होगा कि पश्चिम बंगाल में अब ‘सॉफ्ट पावर’ या केवल शांति की अपीलों से काम नहीं चलने वाला। यहाँ ‘आपरेशन ब्लैक फारेस्ट’ जैसी प्रशासनिक दृढ़ता की आवश्यकता है। संदेश बिलकुल साफ होना चाहिए, जो हाथ कानून को चुनौती देंगे, उन्हें कानून की पूरी ताकत से कुचल दिया जाएगा। मोथाबाड़ी के गुनहगारों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो अन्यान्य असामाजिक तत्वों के लिए नजीर बने। जो भी दबंग, गुंडे या सुपारी लेकर जन-मन में भय का वातावरण बनाने, भयमुक्त वातावरण में मतदान प्रक्रिया पूर्ण होने में और मतगणना के पश्चात हत्या और लूट करने में सक्षम है और जिनका ऐसा रिकार्ड रहा है उन्हें पांच म‌ई तक थाने में बंद केंद्रीय बल की निगरानी में रखना चाहिए।

और पश्चिम बंगाल के हिंदू समाज को भी यह समझना होगा कि यह लड़ाई अब केवल बिजली, पानी या सड़क की नहीं है। यह लड़ाई हमारे अस्तित्व, हमारी संस्कृति और हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की है। शेष भारत के लोगों को भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि पश्चिम बंगाल पूरे भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों और आतंकियों के आवागमन का सुरक्षित द्वार बन गया है। इसलिए यहां की ममता सरकार सीमा पर बाड़ लगाने के काम को विलंबित करती रहती है।

मोथाबाड़ी की घटना यह चीख-चीख कर कह रही है कि यदि आज हिंदू समाज संगठित होकर अपने मताधिकार का प्रयोग करने बाहर नहीं निकला, तो कल शायद उनके पास अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार ही न बचे। पश्चिम बंगाल के जो भी मतदाता राज्य से बाहर हैं उन्हें अपने घर लौट कर आना चाहिए। अपना मतदान अपने मतदान केंद्र पर अवश्य करना चाहिए। यह पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं के अस्तित्व की लड़ाई का चुनाव है।

प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि राज्य के हर संवेदनशील बूथ पर केंद्रीय बलों की इतनी भारी तैनाती हो कि उपद्रवी घर से बाहर निकलने की हिम्मत न कर सकें। निर्वाचन आयोग को यह स्पष्ट करना होगा कि वह किसी भी दबाव या भ्रम में नहीं आएगा और मतदाता सूची से हर एक अवैध नाम को हटाकर ही दम लेगा। यह केवल ‘शुद्धिकरण’ नहीं, बल्कि बंगाल के लोकतंत्र का ‘सांस्कृतिक पुनरुत्थान’ है। यदि इस चुनाव के बाद भी राज्य की सत्ता ‘तुष्टिकरण’ के मोहपाश में बंधी रही और जनसांख्यिकीय आक्रमणकारियों को राजनैतिक सुरक्षा कवच प्रदान करती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब पश्चिम बंगाल के हिंदुओं को अपने ही आंगन में शरणार्थी बनकर रहना पड़ेगा। अब ‘प्रतीक्षा’ का समय समाप्त हो चुका है; अब ‘परिवर्तन हेतु पराक्रम’ का समय है। उन ताकतों पर लोकतांत्रिक प्रणाली से प्रहार करने का समय है जो भारत की अखंडता और पश्चिम बंगाल की अस्मिता को चुनौती दे रही हैं। शासन को ‘लोह-हस्त’ अपनाकर यह सिद्ध करना होगा कि लोकतंत्र की जड़ें किसी भीड़ की सनक से कहीं अधिक गहरी हैं। पश्चिम बंगाल के हिंदू मानस को भी अब भय की बेड़ियां तोड़कर, 2021 के जख्मों को अपनी शक्ति बनाकर बूथ तक पहुंचना होगा। याद रखिए, आपका एक वोट केवल एक विधायक नहीं चुनेगा, बल्कि यह तय करेगा कि आने वाली पीढ़ियां अपनी संस्कृति के साथ इस माटी पर जीवित रह पाएंगी या नहीं। अब और नहीं! अपराधियों को दंड मिले और न्याय की विजय हो, तभी बंगाल का वास्तविक ‘अमल धवल’ स्वरूप पुनः निखर पाएगा।

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