बांग्लादेश के हिंदुओं की हुंकार

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– प्रशांत पोळ

नागपुर : कल शुक्रवार 19 जून को, बांग्लादेश में एक अभूतपूर्व दृश्य देखने मिला। ढाका के नेशनल प्रेस क्लब के सामने, एक विशाल मानव श्रृंखला बनाई गई। फिर दोपहर तक ढाका के विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र शाहाबाद क्षेत्र में एकत्र हुए। उनकी संख्या इतनी ज्यादा थी, कि समूचा शाहाबाद परिसर ठप्प हो गया। तब तक शाम हो गई थी। इन विद्यार्थियों ने भव्य और प्रभावी मशाल जुलूस निकाला। इस जुलूस को देखकर, मानो महानगर ढाका ठिठक गया..!

ढाका के लिए यह ऐसे दृश्य आम बात हैं। फिर कल 19 जून के इन प्रदर्शनों में ऐसी क्या विशेषता थी, की मात्रा ढाका ही नहीं, तो सारा बांग्लादेश सहम गया..?

*कारण, यह सारे छात्र हिंदू थे। मानव श्रृंखला बनाने वाले सारे कार्यकर्ता हिंदू थे। वह ‘हिंदू महजोट’ (Bangladesh National Hindu Grand Alliance) के अंतर्गत भगवान श्रीराम के अपमान के विरोध में प्रदर्शन कर रहे थे।*

*फर्क था। बहुत ज्यादा अंतर था। कल तक मार खाने वाला हिंदू, आज आत्मविश्वास से लबालब होकर, अपने आराध्य की विडंबना का विरोध प्रकट कर रहा था। बांग्लादेश की सरकार को अल्टीमेटम दे रहा था।*

बांग्लादेश के मानचित्र की, यदि हम एक कुर्ता पहने हुए व्यक्ति के रूप में कल्पना करते हैं, तो उस व्यक्ति के गले के स्थान पर हैं, ‘गायबांधा’ जिला। इस गायबांधा जिले का पलाशबाड़ी गांव, इस समय समूचे बांग्लादेश में छाया हुआ हैं। इस पलाशबाड़ी में, हिंदू समुदाय द्वारा भगवान श्रीराम की 81 फीट की मूर्ति का निर्माण किया जा रहा हैं। श्री श्री राधा गोविंद और काली मंदिर परिसर में निर्माणाधीन इस मूर्ति का 80% काम पूरा हो चुका हैं। राधा गोविंद मंदिर समिति के अध्यक्ष हरिदास चंद्रदास के नेतृत्व में यह कार्य चल रहा हैं।

_(गायबांधा के बारे में कहा जाता हैं, कि यहां महाभारत काल में सम्राट विराट राज करते थे। उन्होंने सैकड़ो की संख्या में गायें पाल रखी थी। जहां पर यह शहर हैं, वहां पर गायें बांधी जाती थी। इसलिए इस स्थान को गायबांधा कहते हैं)_

विगत कुछ दिनों से इमाम-उलेमा परिषद तथा अन्य कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों के विरोध के कारण इस मूर्ति के निर्माण का कार्य पूरी तरह से रुका हैं। कट्टरपंथियों ने इस मूर्ति को ध्वस्त करने की धमकी दी हैं। इसी कडी में, इस हफ्ते कुछ उपद्रवी लोगों ने, निर्माणाधीन मूर्ति पर जूते – चप्पलों का ढेर लगा दिया। इस धार्मिक विडंबना के विरोध में बांग्लादेश के हिंदू आक्रामक हुए। ढाका के दक्षिणी हिस्से में स्थित, ‘जगन्नाथ विश्वविद्यालय’ के हिंदू विद्यार्थी सर्वप्रथम इस धार्मिक अवमानना के विरोध में सड़कों पर उतर आए। इस आंदोलन से जो चिंगारी सुलगी, उससे बांग्लादेश के हिंदू जागृत हुए। उसी कड़ी में कल ढाका में हिंदू विद्यार्थियों का अभूतपूर्व प्रदर्शन हुआ

बांग्लादेश में इस समय मात्र 9% से 10% हिंदू बचा हुआ हैं। गायबांधा में तो मात्र 7% हिंदू हैं। इससे पहले भी, इसी प्रकार का हिंदुओं का दमन होते आया हैं। बांग्लादेश में अनेकों बार हिंदुओं के मंदिर तोड़े गए। आराध्या देवताओं के विग्रह ध्वस्त किए गए। कभी हिंदुओं ने छुटपुट विरोध किया, तो अधिकतम समय, मन मसोस कर रह गए।

*तो फिर इस बार बांग्लादेश के हिंदुओं में यह साहस कहां से आया..?*

*इसका उत्तर हैं, पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम !*

*जी, हां। पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम से निकली हिंदुत्व की लहर से बांग्लादेश के हिंदुओं को हिम्मत मिली। साहस मिला। उनका आत्मविश्वास जागृत हुआ, और कल का अभूतपूर्व आंदोलन संपन्न हुआ।*

हम हमेशा यह समाचार सुनते आए हैं, कि पाकिस्तान में हिंदुओं पर दुर्दांत अत्याचार हुए। उनका बलात धर्म परिवर्तन कराया गया। अनेक हिंदू लड़कियों को भगाया गया… आदि। ऐसे ही समाचार बांग्लादेश से भी आते हैं। 1947 से 1975 तक पूर्व पाकिस्तान में, और 1975 से आज तक बांग्लादेश में, अनेक हिंदू मंदिर समय-समय पर तोड़े गए। 1975 में पश्चिमी पाकिस्तानी सेना ने बांग्लादेश के हिंदुओं का नरसंहार (genocide) किया। 2024 के अराजक वातावरण में पुनः यही हुआ। सैकड़ो हिंदू मारे गए। भीड के द्वारा पीट – पीट कर (Mob Lynching) तो अनेकों बार हिंदुओं की हत्या की गई।

इन सभी अवसरों पर, ह्यूमन राइट्स की बातें करने वाले, मानवता का उपदेश देने वाले, सेकुलरिज्म का पाठ पढ़ने वाले हमेशा खामोश रहे। चुप्पी साध कर बैठे रहे।

ऐसा क्यों..?

भारत में भी लगभग 10% से 12% मुसलमान हैं। किंतु यहां अपवाद स्वरुप एक छोटी भी घटना हो जाती हैं, तो यह तमाम मानवाधिकार के पैरोकार, दुनिया में शोर मचाते हैं। अनेकों बार कुछ हुआ नहीं तो भी, ‘भारत में मुसलमान असुरक्षित’ का नारा घुमता हैं; जैसे कोरोना के समय गुंजा था।

फिर वही प्रश्न। बांग्लादेश और पाकिस्तान में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों की कोई बराबरी ही नहीं हैं। फिर भी, भारत में छोटी-मोटी घटना होने या ना होने पर भी, विश्व के माध्यम जगत में वह बड़ा समाचार बनता हैं, किंतु बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू नरसंहार का सादा समाचार भी प्रमुखता से नहीं छपता।

ऐसा क्यों..?

इसका कारण हैं – संगठन। भारत का मुस्लिम समुदाय संगठित हैं, भले ही अलग-अलग टुकड़ों में, या संगठनों में हो, किंतु संगठित हैं।

दुर्भाग्य से पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदुओं के बारे में ऐसा नहीं कह सकते। 1947 के पहले मुसलमानों का राजनीतिक दल था, ‘मुस्लिम लीग’। विभाजन के पश्चात भारत में मुस्लिम लीग की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई। किंतु फिर भी मुस्लिम लीग जिंदा रही। उसने ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ यह नया नामकरण कर लिया। केरलम में अपनी शक्ति बढ़ाते गए। उनके संसद सदस्य चुनकर आते गए। यूपीए का वह एक हिस्सा रहे। यूपीए के 10 वर्षों के शासनकाल में, उनका मंत्री, कांग्रेस के साथ मंत्रिमंडल का सदस्य था। आज भी केरलम में कांग्रेस का मुख्यमंत्री, इस मुस्लिम लीग की सहमति से और उसकी दम पर ही टिका हैं। एमआईएम जैसे अन्य मुस्लिम संगठन भी मुस्लिम राजनीति दमखम के साथ करते हैं।

विभाजन के पहले हिंदुओं का एकमात्र राजनीतिक दल था, ‘हिंदू महासभा’। दुर्भाग्य से, हिंदुस्तान के हिंदू उसे अपना दल नहीं मानते थे। अंग्रेज और मुसलमान, कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी समझते थे। जबकि कांग्रेस अपने आप को हिंदुओं की पार्टी नहीं मानती थी। कांग्रेस की सारी नीतियां मुस्लिम परस्त थी।

विभाजन के बाद क्या हुआ? पश्चिम पाकिस्तान में हिंदू महासभा का थोड़ा बहुत कार्य था। उसके अनेक कार्यकर्ता भारत आ गए। जो वहीं पर डटे रहे, उनका भी मनोबल टूटा हुआ था। इसलिए 1950 के आते-आते, पश्चिम पाकिस्तान से हिंदू महासभा का अस्तित्व समाप्त हो गया था।

तुलना में पूर्व पाकिस्तान में हिंदू महासभा की कुछ ताकत थी। अविभाजित बंगाल में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी और निर्मल चंद्र चटर्जी जैसे ताकतवर नेता, हिंदू महासभा के पास थे। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के कारण ही बंगाल का विभाजन होकर, पश्चिम बंगाल भारत में आ सका। अन्यथा पूरा बंगाल पाकिस्तान में मिलाने की बात हो रही थी।

किंतु पूर्वी पाकिस्तान बनने के बाद, वहां पर हिंदू महासभा का कोई खास अस्तित्व नहीं रहा। 1950 में ढाका, बारिसाल, खुलना और अन्य क्षेत्रों में हिंदू विरोधी दंगे हुए। इन दंगों के कारण, या तो हिंदू समाज ने पलायन किया, या वह दबकर रह गया।

*अर्थात, पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान, दोनों में अच्छी खासी संख्या होने के बावजूद भी हिंदू समाज राजनीतिक ताकत के रूप में सामने नहीं आया। दुनिया में शक्ति को ही सब प्रणाम करते हैं। हिंदू यह राजनीतिक या सामाजिक शक्ति के रूप में नहीं रहा, तो स्वाभाविक था, उन पर अत्याचार बढ़ते गए।*

आज बांग्लादेश में हिंदुओं के कुछ सामाजिक संगठन है। सन 2006 में कुछ हिंदू संगठनों ने मिलकर, ‘हिंदू महजोट’ बनाया। किंतु इसकी गतिविधियां सीमित थी। राजनीतिक शक्ति नहीं थी। अधिकतम हिंदू, शेख हसीना सरकार की अवामी लीग को समर्थन देते थे। 2024 में अवामी लीग का तख्तापलट होने के बाद, हिंदुओं पर जबरदस्त अत्याचार हुए। किंतु ‘हिंदू महजोट’ ने प्रारंभ में उन्हें राजनीतिक प्रतिशोध माना। इसलिए हिंदू समाज से अपेक्षित प्रतिकार नहीं खड़ा हुआ।

किंतु कल का आंदोलन अपवाद था। बांग्लादेश का हिंदू अब जाग गया हैं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण था।

पश्चिम बंगाल के चुनाव ने बहुत कुछ बदला हैं। अब बांग्लादेश के हिंदू आत्मविश्वास के साथ, संगठित शक्ति का हुंकार भर रहे हैं। यह हिंदुओं के लिए अत्यंत सकारात्मक दृश्य हैं।

सनातन व नारी सम्मान पर बड़ी लकीर खींचते योगी

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राजनीति से ऊपर उठकर सनातन धर्म तथा स्त्री गरिमा तथा सम्मान के हित में बड़ी रेखाएं खींच रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने सपा मुखिया अखिलेश यादव की बेटी के प्रति सोशल मीडिया के माध्यम से आपत्तिजनक बयानबाजी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने केआदेश जारी किए हैं। मुख्यमंत्री के आदेश के बाद अपराधियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गयी है। मुख्यमंत्री ने सख्ती के साथ कहा है कि किसी भी  बेटी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए हर बेटी का सम्मान होना चाहिए। हम उन संस्कारों में पले -बढ़े हैं जहां गांव की बेटी -बहन को पूरे गांव की बेटी -बहन माना जाता है।

मुख्यमंत्री योगी बेटियों की सुरक्षा के लिए संकल्पवान हैं । वह कई जनसभाओं मे अपना मंतव्य स्पष्ट  कर चुके हैं कि अगर किसी ने बेटियों की सुरक्षा में सेंध लगाने का प्रयास किया तो अगले चैराहे पर उसका इंतजार यमराज कर रहा होगा। योगी जी के बयानों का असर धरातल पर भी दिखाई पड़ता है। बेटियों के साथ होने वाली अप्रिय घटनाओं पर त्वरित कार्यवाही हो रही है। आरोपियों  का हाफ एनकाउंटर हो रहा है तथा आवश्यकता पड़ने पर बुलडोजर एक्शन भी हो रहे हैं। प्रदेश में नारी समाज को सशक्त बनाने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। नवरात्रि के अवसर पर मिशन शक्ति जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं । केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं के माध्यम से नारी सशक्तीकरण का महाअभियान चलाया जा रहा है।

सपा मुखिया अखिलेश यादव की बेटी पर टिप्पणी करने वालों के खिलाफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़ा रवैया दिखाकर सपा मुखिया अखिलेश  यादव द्वारा बुने जा रहे चक्रव्यूह को एक ही झटके में ध्वस्त कर दिया है। सपा मुखिया अखिलेश की बेटी अदिति पर सोशल मीडियापर अभद्र टिप्प्णी के बाद मुख्यमंत्री योगी ने जो एक्शन लिया है उसने इस दुखद घटना पर बनाए जा रहे सपा के राजनैतिक नैरेटिव को ध्वस्त  कर दिया है। जब सोशल मीडिया के माध्यम से यह विवाद बड़े राजनीतिक तूफान में बदल रहा था और सपा योगी जी व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह कहकर घेरने का प्रयास  कर रही थी कि, “जिनका खुद का परिवार नहीं वो परिवार का दर्द क्या समझेंगे“ तब योगी जी इस घटना के जिम्मेदार लोगों को ढूंढ रहे थे। योगी जी ने अपराधियों पर  तुरंत एफआईआर कराने के निर्देश जारी करते हुए कहा कि वह किसी भी बेटी क्यों न हो  बेटी पर अभद्र टिप्पणी बर्दाश्त नहीं है।

यूपी चुनाव से पहले योगी आदित्यनाथ ने अपने इस कदम से सिद्ध कर दिया है कि महिला सुरक्षा और सम्मान के मामले में उनकी सरकार बिना किसी भेदभाव  के काम करती है। इससे सपा मुखिया रक्षात्मक रुख अपनाने को बाध्य हो गए हैं । अब भाजपा सपा के पुराने बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट्स को लेकर उस पर हमलावर  है। जो मुद्दा सरकार को घेरने के लिए तैयार किया जा रहा था उस पर योगी जी की प्रशासनिक और राजनीतिक सूझबूझ का बुलडोजर चल गया है। समाजवादी पूर्व में कई बार नारी सम्मान व उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली बयानबाजी करते रहे हैं । स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव ने एक बार कहा था कि “लड़के हैं गलतियां हो जाती हैं। सपा के कद्दावर नेता माने जाने वाले आजम खां जैसे नेता तो कई बार महिलाओं की गरिमा के खिलाफ अभद्र टिप्पणी कर चुके हैं । मायावती जी पर तो सपाइयों ने हमला ही बोल दिया था। सपा राज में महिला सुरक्षा की कितनी बुरी स्थिति थी यह हर कोई जानता है।

योगी की पाती दे रही सनातन विचार – विश्व वृद्धजन दुर्व्यवहार जागरुकता दिवस पर योगी जी ने एक पाती जारी की है।  इस पाती में उन्होंने वृद्धजनों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए लिखा है कि उम्र के अमृतकाल में वृद्धजनों को अपनत्व की सर्वाधिक आवश्यकता होती है, दुर्भाग्य से समाज ऐसे समय का साक्षी बन रहा है जब वृद्धजनों को अपनों का दुर्व्यवहार सहना पड़ता है।

योगी जी ने आगे लिखा है  कि सनातन संस्कृति में माता- पिता और गुरु को साक्षात  ईश्वर माना जाता है। पाती में योगी ने एक प्राचीन कथा के माध्यम से इस विषय को समझाया। भगवान शिव- पार्वती ने पुत्र गणेश जी और कार्तिकेय के समक्ष  समस्त जगत की परिक्रमा की चुनौती रखी। भगवान गणेश ने माता -पिता को ही संपूर्ण सृष्टि  मानकर उनकी परिक्रमा कर ली। उन्होंने भगवान श्रीराम का भी उदाहरण दिया। योगी जी का स्पष्ट कहना है कि सनातन,  धार्मिक तथा सामाजिक परंपराओें, पारिवारिक संबंधों एवं मूल्यों पर आधारित जीवन शैली है। सनातन में बड़ों  का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने की परंपरा है ऐसा इसलिए क्योंकि वे हमारी संस्कृति और जीवन मूल्यों के धरोहर हैं ।वृद्धजनों का सम्मान केवल संस्कर नहीं बल्कि हमारी गौरवशाली सभ्यता की पहचान है। अपनी पाती मे वह बता रहे हैं कि वृद्धजन व  निराश्रित महिलाओं  के लिए प्रदेश सरकार ने 1500 रुपए प्रति माह पेंशन देने का निर्णय लिया है।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार सनातन संस्कृति के विचारों पर चलते हुए उन्हें आगे बढ़ा रही है और सनातन संस्कृति को पुष्ट करने वाले निर्णय ले रही है।

सृजनशील सोच, समाधानकारी संस्कार और समर्थ भारत

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लखनऊ।  भारत की शिक्षा व्यवस्था एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है जहाँ उसे यह तय करना है कि वह विद्यार्थियों को केवल जानकारी का भंडार बनाएगी या उन्हें भविष्य का निर्माता बनाएगी। सदियों से चली आ रही परीक्षा-केंद्रित मानसिकता ने शिक्षा को ज्ञानार्जन की प्रक्रिया से अधिक अंक प्राप्त करने की प्रतियोगिता में बदल दिया है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में लाखों विद्यार्थी प्रतिवर्ष असंख्य तथ्यों, परिभाषाओं और उत्तरों को याद करके परीक्षाएँ उत्तीर्ण करते हैं, किंतु जब वास्तविक जीवन की समस्याओं का सामना करने का अवसर आता है तो उनमें से बड़ी संख्या स्वयं को असहाय पाती है। इसका कारण प्रतिभा का अभाव नहीं, बल्कि ऐसी शैक्षिक संरचना है जो जिज्ञासा से अधिक स्मरणशक्ति को, प्रश्नों से अधिक उत्तरों को और सृजन से अधिक पुनरुत्पादन को महत्व देती रही है। आज जब विश्व ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर नवाचार-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर है, तब भारत के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वह अपनी शिक्षा को रटने की संस्कृति से मुक्त कर रचनात्मकता, समस्या-समाधान और नवोन्मेष की संस्कृति से जोड़े।

वर्तमान युग में ज्ञान का स्वरूप बदल चुका है। कभी पुस्तकालयों और ग्रंथों में सीमित रहने वाली जानकारी आज कुछ क्षणों में उपलब्ध हो जाती है। ऐसे समय में किसी विद्यार्थी का मूल्य इस बात से नहीं आँका जाएगा कि उसे कितने तथ्य कंठस्थ हैं, बल्कि इस बात से आँका जाएगा कि वह उपलब्ध ज्ञान का उपयोग करके क्या नया सोच सकता है, क्या नया बना सकता है और समाज की चुनौतियों के समाधान में कितना योगदान दे सकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन, रोबोटिकी, जैव प्रौद्योगिकी और डिजिटल प्रौद्योगिकियों के विस्तार ने कार्यक्षेत्र की प्रकृति को बदल दिया है। जो कार्य केवल स्मृति और दोहराव पर आधारित हैं, वे तेजी से मशीनों के दायरे में जा रहे हैं। मनुष्य की विशिष्टता अब उसकी रचनात्मकता, कल्पनाशक्ति, संवेदनशीलता और जटिल समस्याओं को समझकर उनका समाधान खोजने की क्षमता में निहित है। यदि हमारी शिक्षा इन गुणों का विकास नहीं कर रही है, तो वह भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं कही जा सकती।

दुर्भाग्यवश भारतीय शिक्षा व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अभी भी उस औपनिवेशिक सोच की छाया में दिखाई देता है जिसका उद्देश्य स्वतंत्र चिंतन करने वाले नागरिक नहीं, बल्कि निर्देशों का पालन करने वाले कर्मचारी तैयार करना था। पाठ्यपुस्तक के निश्चित उत्तर, परीक्षा में अपेक्षित भाषा और अंक प्राप्ति की निरंतर चिंता ने विद्यार्थियों के भीतर से प्रश्न पूछने का साहस कम किया है। अनेक बार कक्षा में सबसे अधिक अंक प्राप्त करने वाला विद्यार्थी भी किसी वास्तविक समस्या पर स्वतंत्र रूप से विचार करने में कठिनाई अनुभव करता है। यह स्थिति केवल व्यक्ति के विकास को ही बाधित नहीं करती, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक सृजनात्मक क्षमता को भी सीमित कर देती है। एक ऐसा देश जो विश्वगुरु बनने का स्वप्न देखता है, उसे केवल ज्ञान का उपभोक्ता नहीं, बल्कि ज्ञान का उत्पादक बनना होगा।

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के भीतर निहित संभावनाओं का विकास करना है। जब किसी विद्यार्थी को किसी समस्या को समझने, उसके कारणों का विश्लेषण करने, विभिन्न विकल्पों पर विचार करने और अपने समाधान प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है, तभी उसकी बौद्धिक क्षमता का वास्तविक विस्तार होता है। यही प्रक्रिया वैज्ञानिक दृष्टिकोण को जन्म देती है, यही नवाचार की आधारशिला रखती है और यही लोकतांत्रिक समाज में सक्रिय नागरिकता का निर्माण करती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहाँ जल संकट से लेकर पर्यावरणीय चुनौतियों तक और ग्रामीण विकास से लेकर शहरी प्रबंधन तक अनेक जटिल प्रश्न उपस्थित हैं, वहाँ ऐसी शिक्षा की आवश्यकता और भी अधिक है जो विद्यार्थियों को समस्याओं की पहचान करने और उनके व्यावहारिक समाधान खोजने के लिए प्रेरित करे।

यह परिवर्तन केवल पाठ्यक्रम बदल देने से नहीं आएगा। इसके लिए शिक्षा के पूरे दर्शन में परिवर्तन आवश्यक है। विद्यालयों को ऐसी जगह बनना होगा जहाँ जिज्ञासा का सम्मान हो, जहाँ प्रश्न पूछना अनुशासनहीनता नहीं बल्कि सीखने का संकेत माना जाए, जहाँ गलती को दंड का नहीं बल्कि सुधार और खोज का अवसर समझा जाए, और जहाँ विद्यार्थी केवल सुनने वाले नहीं बल्कि सक्रिय भागीदार हों। शिक्षा को पुस्तकों की सीमाओं से निकालकर प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, समुदायों, खेतों, उद्योगों और जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से जोड़ना होगा। जब विद्यार्थी अपने आसपास की समस्याओं को समझेंगे और उन्हें हल करने का प्रयास करेंगे, तभी शिक्षा उनके लिए जीवंत अनुभव बन सकेगी।

इस परिवर्तन में शिक्षकों की भूमिका निर्णायक है। शिक्षक केवल जानकारी देने वाले नहीं, बल्कि प्रेरणा देने वाले मार्गदर्शक होने चाहिए। उन्हें विद्यार्थियों को तैयार उत्तर देने के बजाय सही प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करना होगा। शिक्षा का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहाँ शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर ज्ञान की खोज करें। इसके लिए शिक्षकों के सतत प्रशिक्षण, शैक्षणिक स्वतंत्रता और आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था भी उतनी ही आवश्यक है। यदि शिक्षक स्वयं सृजनात्मक और शोधपरक वातावरण में कार्य करेंगे, तभी वे विद्यार्थियों में इन गुणों का विकास कर पाएँगे।

परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार भी समय की मांग है। जब तक सफलता का निर्धारण मुख्यतः याद की गई सामग्री के आधार पर होगा, तब तक रटने की प्रवृत्ति समाप्त नहीं होगी। मूल्यांकन को इस प्रकार पुनर्गठित करना होगा कि वह विश्लेषणात्मक सोच, रचनात्मक अभिव्यक्ति, परियोजना-आधारित कार्य, सहयोगात्मक प्रयास और वास्तविक जीवन में ज्ञान के अनुप्रयोग को महत्व दे। विद्यार्थियों को यह अनुभव होना चाहिए कि शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक अर्जित करना नहीं, बल्कि जीवन को समझना और समाज को बेहतर बनाना है।

भारत के पास इस परिवर्तन के लिए मजबूत सांस्कृतिक आधार भी मौजूद है। हमारी प्राचीन ज्ञान परंपरा प्रश्न, संवाद और चिंतन पर आधारित रही है। उपनिषदों से लेकर प्राचीन विश्वविद्यालयों तक, भारतीय बौद्धिक परंपरा ने जिज्ञासा को ज्ञान का मूल माना है। आवश्यकता इस बात की है कि हम उस चिंतनशील विरासत को आधुनिक विज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के साथ जोड़ें। यह संयोजन भारत को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था प्रदान कर सकता है जो न केवल वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्षम हो, बल्कि मानवीय मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व से भी समृद्ध हो।

नीति-निर्माताओं के सामने आज एक ऐतिहासिक अवसर है। यदि वे शिक्षा को स्मृति-केंद्रित ढाँचे से निकालकर सृजन-केंद्रित ढाँचे में परिवर्तित करने का साहसिक निर्णय लेते हैं, तो इसका प्रभाव केवल विद्यालयों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे अनुसंधान को नई गति मिलेगी, उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलेगा, सामाजिक समस्याओं के समाधान विकसित होंगे और भारत की आर्थिक तथा बौद्धिक शक्ति में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। विकसित भारत का सपना केवल नई इमारतों, राजमार्गों और डिजिटल प्रणालियों से पूरा नहीं होगा; वह तभी साकार होगा जब हमारे विद्यालय ऐसे युवाओं को तैयार करेंगे जो नई राहें बनाने का साहस रखते हों, जो चुनौतियों को अवसर में बदल सकें और जो ज्ञान को केवल ग्रहण ही नहीं, बल्कि उसका सृजन भी कर सकें। इसलिए आज की सबसे बड़ी शैक्षिक आवश्यकता यही है कि भारत अपने बच्चों को उत्तर याद करने के बजाय प्रश्न पूछना, समस्याओं से भागने के बजाय उनका समाधान खोजना और परंपरागत सीमाओं को स्वीकार करने के बजाय नए क्षितिजों का निर्माण करना सिखाए। यही शिक्षा भारत को आने वाले दशकों में ज्ञान, नवाचार और मानवीय प्रगति का अग्रदूत बना सकती है।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस : भारत की प्राचीन साधना से वैश्विक स्वास्थ्य आंदोलन तक

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लखनऊ। मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ ऐसी परंपराएँ होती हैं जो समय, भूगोल और संस्कृति की सीमाओं को पार कर पूरी मानवता की धरोहर बन जाती हैं। योग ऐसी ही एक विरासत है। हजारों वर्षों पूर्व भारतीय मनीषियों द्वारा विकसित यह जीवन-पद्धति आज विश्व के लगभग हर भाग में सम्मान और उत्साह के साथ अपनाई जा रही है। कभी आश्रमों, तपोवनों और साधना स्थलों तक सीमित रहने वाला योग आज विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, कार्यालयों, अस्पतालों, खेल संस्थानों और सामुदायिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष 21 June को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि स्वस्थ, संतुलित और जागरूक जीवन के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता का प्रतीक बन गया है।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का इतिहास अपेक्षाकृत नया है, लेकिन इसकी जड़ें अत्यंत गहरी हैं। वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के समक्ष योग को वैश्विक स्तर पर मान्यता देने का प्रस्ताव रखा गया। इस विचार को विश्व समुदाय का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ और 11 December 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 June को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित कर दिया। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस प्रस्ताव को रिकॉर्ड संख्या में सदस्य देशों का समर्थन प्राप्त हुआ, जो योग की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण था। इसके बाद 21 June 2015 को पहली बार विश्व स्तर पर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। तब से लेकर आज तक यह दिवस स्वास्थ्य, संतुलन और सामूहिक कल्याण का वैश्विक उत्सव बन चुका है।

21 June को योग दिवस के लिए चुना जाना भी विशेष महत्व रखता है। यह वर्ष का सबसे लंबा दिन माना जाता है और भारतीय परंपरा में इसे ऊर्जा, जागरूकता और आंतरिक विकास से जोड़कर देखा जाता है। प्रकृति के इस विशेष कालखंड को मानव जीवन में संतुलन और साधना के प्रतीक के रूप में भी समझा जाता है। इसलिए यह तिथि योग के सार्वभौमिक संदेश को प्रसारित करने के लिए उपयुक्त मानी गई।

यदि योग की उत्पत्ति की बात करें तो इसकी जड़ें भारतीय सभ्यता के अत्यंत प्राचीन काल तक पहुँचती हैं। वैदिक साहित्य, उपनिषद, महाभारत और अनेक दार्शनिक ग्रंथों में योग संबंधी विचारों का उल्लेख मिलता है। भारतीय चिंतन परंपरा में योग का विकास केवल शरीर को स्वस्थ रखने की तकनीक के रूप में नहीं हुआ, बल्कि जीवन के गहन प्रश्नों को समझने की प्रक्रिया के रूप में हुआ। भारतीय ऋषियों ने मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि और चेतना के संबंधों का सूक्ष्म अध्ययन किया और अनुभव के आधार पर ऐसी पद्धतियाँ विकसित कीं जो व्यक्ति को आत्मानुशासन तथा आत्मबोध की दिशा में ले जाती हैं।

योग की व्यवस्थित व्याख्या में महर्षि पतंजलि का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है। उन्होंने योग को एक संगठित दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। समय के साथ विभिन्न परंपराओं में योग के अनेक स्वरूप विकसित हुए। कहीं ध्यान को अधिक महत्व मिला, कहीं प्राणायाम को, तो कहीं शारीरिक आसनों को। किंतु इन सभी का मूल उद्देश्य मनुष्य के जीवन में संतुलन और सजगता स्थापित करना रहा।

योग को केवल व्यायाम समझ लेना उसकी व्यापकता को सीमित कर देना होगा। वास्तव में योग जीवन जीने की एक समग्र पद्धति है। यह व्यक्ति को अपने शरीर की आवश्यकताओं को समझना सिखाता है, अपने मन की चंचलता को नियंत्रित करना सिखाता है और जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने में सहायता करता है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता में मनुष्य अनेक प्रकार के दबावों से घिरा रहता है। काम का तनाव, समय की कमी, अनियमित दिनचर्या और डिजिटल उपकरणों पर बढ़ती निर्भरता मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। योग इन परिस्थितियों में संतुलन स्थापित करने का सरल और प्रभावी माध्यम बनकर सामने आता है।

योग का शारीरिक महत्व अत्यंत व्यापक है। नियमित अभ्यास से शरीर की लचक बढ़ती है, मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं और शरीर का संतुलन बेहतर होता है। श्वास संबंधी अभ्यास फेफड़ों की कार्यक्षमता को सुदृढ़ बनाने में सहायक माने जाते हैं। इसके साथ ही योग व्यक्ति को अपने शरीर के प्रति सजग बनाता है। यह सजगता स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा देती है, जो दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।

मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में योग की उपयोगिता और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। आज तनाव, चिंता और मानसिक असंतुलन विश्वव्यापी चुनौतियाँ बन चुके हैं। ऐसी स्थिति में ध्यान, श्वास नियंत्रण और एकाग्रता से जुड़ी योग पद्धतियाँ मन को शांत करने में सहायता करती हैं। योग व्यक्ति को वर्तमान क्षण में जीना सिखाता है। यह जीवन की कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने और भावनात्मक संतुलन विकसित करने में भी सहायक हो सकता है। इसी कारण विश्वभर में मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में भी योग को महत्व दिया जाने लगा है।

योग का महत्व केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसका सामाजिक आयाम भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। योग अनुशासन, संयम, सहिष्णुता और आत्मनियंत्रण जैसे गुणों को विकसित करता है। जब व्यक्ति स्वयं के भीतर संतुलन स्थापित करता है, तो उसके व्यवहार में भी सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देता है। इससे परिवार, समाज और कार्यस्थल पर बेहतर संबंधों का निर्माण होता है। योग का संदेश प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सामंजस्य का संदेश है। यही कारण है कि इसे शांति और सद्भाव की संस्कृति से भी जोड़ा जाता है।

योग का एक महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरणीय चेतना से भी जुड़ा हुआ है। भारतीय परंपरा में मनुष्य और प्रकृति को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। योग व्यक्ति को यह अनुभव कराता है कि उसका अस्तित्व प्रकृति से अलग नहीं है। जब मनुष्य अपने भीतर संतुलन विकसित करता है, तब वह जल, वायु, भूमि और जैव विविधता के प्रति भी अधिक संवेदनशील बनता है। इसलिए योग का दर्शन केवल व्यक्तिगत कल्याण तक सीमित नहीं है; यह पृथ्वी और समस्त जीव-जगत के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को भी प्रोत्साहित करता है।

आज विश्व के अनेक देशों में योग शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक कल्याण की योजनाओं का हिस्सा बन चुका है। लाखों लोग प्रतिदिन योगाभ्यास करते हैं और इसे अपने जीवन की दिनचर्या में शामिल कर चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर विभिन्न देशों में आयोजित सामूहिक कार्यक्रम यह दर्शाते हैं कि योग ने भाषाओं, संस्कृतियों और राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता को जोड़ने का कार्य किया है।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 हमें यह स्मरण कराता है कि आधुनिकता और परंपरा परस्पर विरोधी नहीं हैं। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है। योग इसी संतुलन का जीवंत उदाहरण है। यह हमें बताता है कि स्वस्थ जीवन केवल शारीरिक क्षमता का प्रश्न नहीं, बल्कि मानसिक स्पष्टता, भावनात्मक स्थिरता और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण का भी विषय है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि योग को केवल एक दिवस तक सीमित न रखा जाए। यदि इसे जीवन की नियमित आदत बनाया जाए, तो इसके लाभ अधिक व्यापक रूप में अनुभव किए जा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का वास्तविक उद्देश्य भी यही है कि योग जन-जन तक पहुँचे और स्वस्थ, जागरूक तथा संतुलित समाज के निर्माण में योगदान दे। भारत की इस प्राचीन धरोहर ने विश्व को स्वास्थ्य और सामंजस्य का जो मार्ग दिखाया है, वह आने वाले समय में भी मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

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