बिहार में प्रेस क्लब कब तक, दिल्ली पीसीआई ध्यान दे

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अंजान

दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की कमान संगीता बरुआ को मिली और बिहार के पड़ोसी राज्य झारखंड में रांची प्रेस क्लब का अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार शंभुनाथ चौधरी निर्वाचित हुए। दोनों खबरें सामान्य लग सकती हैं, लेकिन बिहार के पत्रकारों को आईना भी दिखा रही हैं, जिनकी पीठ पर पटना प्रेस क्लब से जुड़ी असफलताओं की बड़ी गठरी है।

बिहार का दुर्भाग्य है कि आज़ादी से पहले और बाद में देश को दिशा देने वाली पत्रकारिता के बावजूद आज तक राज्य का अपना कोई प्रेस क्लब नहीं है। यह तकलीफ तब और गहरी हो जाती है जब याद आता है कि 2019 में नीतीश कुमार की सरकार ने पटना के गोलघर के पीछे डेढ़ एकड़ जमीन पर आधुनिक प्रेस क्लब भवन बनाकर पत्रकारों को सौंपा था। यह बिहार और खासकर पटना के पत्रकारों के लिए ऐतिहासिक अवसर था। भवन पर कब्जा हो गया, चुनाव की तैयारी शुरू हुई और छह सौ से अधिक सदस्य भी बना लिए गए। सदस्यता फीस के रूप में छह लाख रुपये जमा हो गए और राज्य सरकार ने भी मोटी रकम आवंटित कर दी।

लेकिन दुर्भाग्य ने यहीं करवट ली। चुनाव से पहले ही कुछ मठाधीश पत्रकारों की खींचतान, अहंकार और लालच ने प्रेस क्लब को राजनीति की भेंट चढ़ा दिया। नतीजा हुआ कि बहुप्रतीक्षित पटना प्रेस क्लब धरातल पर आने से पहले ही बिखर गया। हालात से आजिज आकर कुछ ही महीने बाद राज्य सरकार ने वह भवन वापस ले लिया और बिजली विभाग को सौंप दिया। यह केवल एक भवन का खोना नहीं था, बल्कि बिहार के पत्रकारों की सामूहिक साख और अवसर की भी भारी क्षति थी।

इसके ठीक उलट तस्वीर रांची में दिखाई देती है। अपेक्षाकृत नवोदित राज्य झारखंड के पत्रकारों ने रघुवर दास सरकार के समय न सिर्फ अपना प्रेस क्लब खड़ा किया, बल्कि पिछले सात वर्षों से वहां नियमित, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक चुनाव भी हो रहे हैं। रांची प्रेस क्लब के पहले अध्यक्ष राजेश सिंह बने और इस बार यह जिम्मेदारी शंभुनाथ चौधरी को मिली है। उपाध्यक्ष विपिन उपाध्याय, सचिव अभिषेक सिन्हा और कोषाध्यक्ष कुबेर सिंह निर्वाचित हुए हैं। यह निरंतरता और संस्थागत मजबूती का प्रमाण है।

रांची प्रेस क्लब के पूर्व सचिव अमरकांत द्वारा अपने कार्यकाल की उपलब्धियों का दिया गया ब्योरा पटना के पत्रकारों के लिए सबक है। उनके कार्यकाल में रांची प्रेस क्लब ने वरिष्ठ पत्रकारों को मतदान अधिकार देकर उनका सम्मान लौटाया, क्लब का फंड आठ लाख से बढ़ाकर 28 लाख रुपये किया, ढाई दशक की पत्रकारिता कर चुके साथियों को आजीवन निःशुल्क सदस्यता दिलाई। सदस्यता शुल्क भी छह सौ से घटाकर 250 रुपये किया। सरकारी मदद से 48 लाख रुपये में क्लब का जीर्णोद्धार कराया। जाहिर है, यह उपलब्धि बताती है कि रांची का मीडिया समूह उत्कर्ष की ओर अग्रसर है।

रांची प्रेस क्लब की यह उपलब्धि गाथा बिहार के हर पत्रकार को पढ़नी चाहिए। साथ ही उन चंद मठाधीशों पर आत्ममंथन भी होना चाहिए, जिनके स्वार्थ और दंभ ने पटना प्रेस क्लब के सपने तोड़ दिए। जब तक बिहार के वरिष्ठ पत्रकार व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर सामूहिक हित को नहीं समझेंगे, तब तक रांची प्रेस क्लब जैसे उदाहरण उन्हें आईना दिखाते रहेंगे।

(लेखक का नाम उपलब्ध नहीं)

दुनिया को डरा रहा है इस्‍लाम का जिहाद

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । दुनिया एक बार फिर ऐसे प्रश्नों के सामने खड़ी है, जिनसे मुँह मोड़ना अब संभव नहीं। 14 दिसंबर को ऑस्ट्रेलिया की राजधानी सिडनी के बॉन्डी बीच पर हनुक्का उत्सव मना रहे यहूदियों पर हुआ घातक हमला सिर्फ एक आतंकी घटना नहीं कहा जा सकता है । यह तो उस वैचारिक संकट का प्रतीक है जो बीते दशकों से लगातार गहराता जा रहा है। साजिद और उसके बेटे नवीद द्वारा की गई इस अंधाधुंध गोलीबारी में 15 निर्दोष लोगों की मौत और कई के घायल होने के बाद यह सवाल फिर उभरा है कि आखिर वह कौन-सी सोच है जो धार्मिक पहचान के आधार पर हिंसा को सही ठहराती है। जिसमें कि यह घटना ऐसे देश में घटी है , जहाँ न मुसलमानों पर कोई अत्याचार हो रहा था और न ही धार्मिक स्वतंत्रता पर कोई संकट है। इसके बावजूद गैर-मुसलमानों को निशाना बनाया गया।

ऑस्ट्रेलिया की इस घटना के बाद नवीद अकरम का छह वर्ष पुराना एक वीडियो सामने आया है जो उसकी मानसिक संरचना को समझने में मदद करता है। वीडियो में वह कहता है कि “अल्लाह का कानून हर पढ़ाई और हर काम से ऊपर है और उसे हर किसी तक पहुँचाया जाना चाहिए।” यह वाक्य साधारण नहीं है। यह उस सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें सांसारिक शिक्षा, आधुनिक कानून और नागरिक कर्तव्यों से ऊपर एक धार्मिक (मजहबी) कानून को स्थापित किया जाता है। यही वह बिंदु है, जहाँ समस्या केवल व्यक्ति की नहीं रह जाती है, वह विचारधारा की बन जाती है।

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि “अल्लाह का कानून” आखिर है क्या। इस्लाम में इसे व्यापक रूप से शरिया के रूप में जाना जाता है। मुसलमानों के लिए यह धार्मिक आस्था से अधिक जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति मानी जाती है। इसी क्रम में सीरा, यानी पैगंबर मुहम्मद की जीवनी को आदर्श जीवन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस्लामी ग्रंथों की कुछ व्याख्याएँ ऐसी भी हैं, जिनमें दुनिया को मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच स्पष्ट रूप से विभाजित किया गया है। गैर-मुस्लिम क्षेत्रों को ‘दारुल-हरब’ कहा गया है, यानी युद्ध का क्षेत्र। ऐसी व्याख्या में प्रमुखता से जिहाद शामिल है, जिसमें यह मान लिया गया है कि जो इस्लाम को स्वीकार नहीं करता, वह ‘शिर्क’ और ‘बुतपरस्ती’ के ज़ुल्म में लिप्त है और उस ज़ुल्म को समाप्त करना हर मुसलमान का मजहबी कर्तव्य है। इस दृष्टिकोण में हिंसा आत्मरक्षा नहीं रहती, वह आक्रामक मजहबी अभियान बन जाती है।

यही कारण है कि इतिहास से लेकर वर्तमान तक, जिहाद शब्द का प्रयोग अक्सर हथियारबंद संघर्ष के अर्थ में हुआ है। कुरान का नौवां अध्याय, जो जिहाद पर केंद्रित माना जाता है, युद्ध और संघर्ष के संदर्भों से भरा है। कुरान (9:111) में ‘अल्लाह के काम’ के लिए ‘कत्ल करना और कत्ल होना’ का उल्लेख मिलता है। इसी अध्याय की आयतें—9:5, 9:29, 9:41, 9:73, 9:123 आक्रामक संघर्ष के आह्वान के रूप में उद्धृत की जाती रही हैं। हदीस-साहित्य में भी ऐसे कथन मिलते हैं, जिनका उपयोग वर्चस्ववादी दृष्टि को पुष्ट करने में किया गया है। उदाहरण के तौर पर सहीह बुखारी (4:53:392) में उद्धृत कथन, “तुम सुरक्षित रहोगे, अगर इस्लाम कबूल कर लो। यह पूरी दुनिया अल्लाह की और मेरी है” को इतिहास में यहूदियों और अन्य गैर-मुसलमानों पर दबाव के औचित्य के रूप में पढ़ा गया है।

इसी प्रकार कुरान के दूसरे अध्याय की कुछ आयतों की व्याख्याएँ गैर-मुसलमानों को अधीन करने, धर्मांतरण या जजिया के लिए मजबूर करने के रूप में प्रस्तुत की गई हैं। यही कारण है कि सदियों के इस्लामी इतिहास में ‘हथियारबंद लड़ाई’ और ‘जिहाद’ को अक्सर समानार्थी की तरह समझा गया। इन आयतों की व्याख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद हो सकते हैं, किंतु यह तथ्य नकारा नहीं जा सकता कि कट्टरपंथी समूह इन्हीं व्याख्याओं को आधार बनाकर हिंसा को धार्मिक वैधता प्रदान करते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में भारत में जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी द्वारा दिए गए हालिया जिहाद संबंधी वक्तव्य को जरूर देखना चाहिए, उनका कहना है कि “जब-जब ज़ुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा” और यह कि जिहाद का मूल अर्थ आत्मसंघर्ष, बुराइयों से मुक्ति और अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध है। वे इसे एक पवित्र शब्द बताते हैं और यहां तक प्रस्ताव रखते हैं कि जिहाद के वास्तविक अर्थ को स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। सिद्धांत रूप में यह बात आकर्षक लग सकती है, किंतु व्यवहार की धरातल पर जो हो रहा है, वह इन दावों से मेल नहीं खाता। न भारत में और न ही ऑस्ट्रेलिया में ऐसी कोई स्थिति थी, जिसे जुल्म कहकर हिंसा को जायज ठहराया जा सके। फिर भी निर्दोष गैर-मुसलमानों की हत्या का सिलसिला पूरी दुनिया में चल रहा है!

कहना होगा कि इस वैचारिक ढांचे का परिणाम आज पूरी दुनिया झेल रही है। जम्मू-कश्मीर में लगातार हिंदू यात्रियों और सुरक्षा बलों पर हमले हों, यूरोप में चर्चों, यहूदी केंद्रों और स्कूलों को निशाना बनाया जाए, रूस के मॉस्को कॉन्सर्ट हॉल में सामूहिक हत्या हो या अफ्रीका में गैर-मुस्लिम गांवों पर धावा बोलना रहा है, हर जगह देख सकते हैं कि आतंकियों की धार्मिक (मजहबी) पहचान अक्सर एक जैसी ही रही है। यह कहना अब कठिन हो गया है कि ये सब अलग-थलग घटनाएँ हैं।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस आलोचना का उद्देश्य पूरे मुस्लिम समाज को कटघरे में खड़ा करना नहीं है। दुनिया भर में करोड़ों मुसलमान शांति से रहते हैं और हिंसा के विरोधी हैं। किंतु यह भी उतना ही सच है कि जब तक इस्लाम के भीतर मौजूद कट्टर और आक्रामक व्याख्याओं पर खुली बहस और आत्मालोचना नहीं होगी, तब तक यह समस्या समाप्त नहीं होगी। हर हिंसक घटना के बाद सिर्फ यह कह देना कि “इस्लाम शांति का धर्म (मजहब) है” अब पर्याप्त नहीं है, क्योंकि सवाल धर्म के मूल संदेश का नहीं, उसकी राजनीतिक और हिंसक व्याख्या का है। इसलिए वास्तविक संकट हथियारों से कहीं अधिक आगे उस सोच का है जो यह मानती है कि पूरी दुनिया किसी एक धार्मिक (मजहबी) पहचान के अधीन होनी चाहिए। यही सोच युवाओं को यह सिखाती है कि हिंसा पुण्य (सवाब) या अमल-ए-सालिह है और हत्या मजहबी कर्तव्य। यदि इस मानसिकता की जड़ों पर प्रहार नहीं किया गया तो कोई भी सुरक्षा तंत्र, कोई भी कानून और कोई भी सैन्य कार्रवाई स्थायी समाधान नहीं दे सकती है।

अब निर्णय दुनिया के धार्मिक नेताओं, सरकारों और बौद्धिक वर्ग को लेना है। आखिर वे क्‍या चाहते हैं ? क्या वे इस समस्या को कानून-व्यवस्था का मामला मानते रहेंगे या उस वैचारिक खाद को भी चिन्हित करेंगे, जिससे यह हिंसा जन्म लेती है। गैर-मुसलमानों पर हिंसा हर हाल में रुकनी चाहिए। यह किसी एक देश या एक समुदाय तक सीमित समस्‍या नहीं है, आज प्रश्‍न संपूर्ण मानवता का है। यदि आज भी इस पर गंभीर, ईमानदार और साहसी हस्तक्षेप नहीं हुआ तो तय मानिए कल इसकी कीमत और अधिक निर्दोष लोगों को जान एवं हिंसा से चुकानी पड़ेगी।

नितिन नवीन: भाजपा की नई पीढ़ी का प्रतीक और सामान्य कार्यकर्ता से शीर्ष पद तक का सफर

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पटना। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 14 दिसंबर 2025 को एक ऐतिहासिक फैसला लिया, जब बिहार सरकार के मंत्री और पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट से पांच बार के विधायक नितिन नवीन को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति न केवल पार्टी में युवा नेतृत्व की नई लहर का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि भाजपा में कोई भी समर्पित कार्यकर्ता शीर्ष पद तक पहुंच सकता है। 45 वर्षीय नितिन नवीन अब देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के सबसे युवा कार्यकारी अध्यक्ष हैं। उनकी इस नियुक्ति ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है और हर तरफ चर्चा है कि भाजपा की संगठनात्मक ताकत का राज क्या है।प्रारंभिक जीवन और राजनीति में प्रवेशनितिन नवीन का जन्म पटना में एक राजनीतिक परिवार में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक थे। 2006 में पिता के निधन के बाद मात्र 26 वर्ष की आयु में नितिन नवीन ने राजनीति में कदम रखा। बांकीपुर (तब पटना पश्चिम) सीट से उपचुनाव में उन्होंने जीत हासिल की और तब से लगातार 2010, 2015, 2020 और 2025 के चुनावों में इस सीट को जीतते आ रहे हैं। यह उनके जमीनी जुड़ाव और जनता के बीच लोकप्रियता का प्रमाण है।शुरुआत से ही नितिन नवीन ने खुद को एक मेहनती कार्यकर्ता के रूप में स्थापित किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से छात्र राजनीति की शुरुआत करने वाले नितिन ने भाजपा युवा मोर्चा (भाजयुमो) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वे बिहार भाजयुमो के प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं। इस दौरान उन्होंने युवाओं को पार्टी से जोड़ने में अहम योगदान दिया।संगठनात्मक अनुभव और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियांनितिन नवीन की राजनीतिक यात्रा संगठन की मजबूती पर टिकी है। उन्होंने सिक्किम और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में चुनाव प्रभारी के रूप में काम किया। विशेष रूप से 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में भाजपा की निर्णायक जीत में उनकी भूमिका सराहनीय रही। बिहार में भी वे पार्टी के शहरी और बूथ स्तर के संगठन को मजबूत करने में सक्रिय रहे।बिहार सरकार में वे पथ निर्माण मंत्री के रूप में कार्यरत हैं और पहले कानून मंत्रालय भी संभाला है। प्रशासनिक अनुभव के साथ-साथ उनकी सादगी और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद उन्हें अलग बनाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी नियुक्ति पर कहा कि नितिन नवीन एक समर्पित कार्यकर्ता हैं, जिनकी ऊर्जा और निष्ठा पार्टी को नई मजबूती देगी। गृह मंत्री अमित शाह ने भी इसे युवा कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा बताया।वह वायरल तस्वीर: विनम्रता का प्रतीकनितिन नवीन की एक पुरानी तस्वीर इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। इस तस्वीर में वे ट्रेन यात्रा के दौरान खड़े हैं, जबकि उनके पीछे बैठे हैं वरिष्ठ नेता स्वर्गीय सुशील कुमार मोदी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंद किशोर यादव। नितिन नवीन उन दोनों के साथ सेल्फी ले रहे हैं।
यह तस्वीर उनकी शुरुआती दिनों की है, जब वे एक युवा कार्यकर्ता थे। यह दर्शाती है कि नितिन नवीन ने कभी पद की गरिमा नहीं देखी, बल्कि वरिष्ठों का सम्मान और पार्टी की सेवा को प्राथमिकता दी। ऐसी विनम्रता ही उन्हें आज इस मुकाम तक ले आई है। यह तस्वीर भाजपा की उस संस्कृति का प्रतीक है, जहां कार्यकर्ता की मेहनत को सम्मान मिलता है।भाजपा की नीति: सामान्य कार्यकर्ता को शीर्ष पद देने की परंपराभाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसकी संगठनात्मक संरचना है। पार्टी की नीति रही है कि कोई भी सामान्य कार्यकर्ता, यदि समर्पित और मेहनती है, तो वह शीर्ष पद तक पहुंच सकता है। नितिन नवीन इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। वे न तो किसी बड़े राजवंश से हैं, न ही दिल्ली के पावर सर्कल से, बल्कि जमीनी स्तर से उठकर आए हैं।पार्टी के इतिहास में देखें तो जनसंघ के समय से ही यह परंपरा चली आ रही है। लाल कृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक – सभी ने कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत की। जेपी नड्डा भी कार्यकारी अध्यक्ष से पूर्ण अध्यक्ष बने थे। अब नितिन नवीन की नियुक्ति इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। यह संदेश देती है कि भाजपा में जाति, क्षेत्र या परिवारवाद नहीं, बल्कि कार्य और निष्ठा मायने रखती है।यह नीति पार्टी को युवा और ऊर्जावान बनाती है।
नितिन नवीन की नियुक्ति से पार्टी में नई पीढ़ी को प्रोत्साहन मिलेगा। बिहार जैसे राज्य से एक युवा नेता का उदय पार्टी की राष्ट्रीय छवि को भी मजबूत करता है।निष्कर्ष: नई ऊर्जा और मजबूत भाजपा का भविष्यनितिन नवीन की नियुक्ति भाजपा के लिए एक नया अध्याय है। उनकी युवा ऊर्जा, संगठनात्मक कुशलता और प्रशासनिक अनुभव पार्टी को आगामी चुनौतियों के लिए तैयार करेंगे। यह साबित करता है कि भाजपा एक जीवंत संगठन है, जहां सामान्य कार्यकर्ता भी असाधारण ऊंचाइयों को छू सकता है। नितिन नवीन की यात्रा लाखों कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा है और भाजपा की उस नीति की तारीफ का विषय है, जो मेहनत को सर्वोच्च सम्मान देती है।भविष्य में नितिन नवीन के नेतृत्व में भाजपा और मजबूत होगी, यह निश्चित है। उनकी विनम्रता और समर्पण पार्टी की विचारधारा को नई पीढ़ी तक पहुंचाएगा।

अपने हक़ के लिए लड़ती औरत की लड़ाई है ‘हक़’ मूवी

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ऋषभ कुमार

दिल्ली । तलाक़ तलाक़ तलाक़,
क्या है ये? ये मात्र शब्द हैं या कुछ और?
कोई इसे तीन तलाक़ कहता है, तो कोई कहता है, ‘तलाक-ए-बिद्दत’। फिर आसान भाषा में कहें तो तलाक़ है तो एक शब्द और जो तीन बार बोल दिया तो एक औरत का बसा बसाया घर एकदम से उजाड़ हो जाता है। अब वैसे कहें तो इस देश में नियम ओ कानून का शासन है और पूरी आजादी भी है कि आप किसी के भी साथ रह सकते हैं पर आपकी आजादी किसी और की आज़ादी से जो टकराई तो फिर यह आपकी मनमानी बन जाती है। और इस मनमानी का ही एक रूप तीन तलाक़ की शक्ल में निकल के आता है। न जाने कितनी ही खबरें हमें और आपको सुनने को मिलती रहीं हैं कि किसी से खाने से थोड़ा नमक ज्यादा हो गया तो दे दिया तीन तलाक़, किसी को लड़का नहीं हो रहा तो दे दिया तीन तलाक़, किसी को दूसरी बेगम से इश्क़ फरमाना है तो दे दिया तीन तलाक़ छोटी से छोटी बातों पर तीन तलाक़ दे दिया जाता रहा है। और ऐसे में इसका शिकार बनती हैं मुस्लिम समाज की न जाने कितनी ही औरतें। अब अगर तीन तलाक़ के बाद अपने शौहर को फिर से पाना है तो हलाला होगा। एक और प्रक्रिया जो किसी भी औरत की आत्मा पर एक नासूर छोड़ जाता है। तो ऐसे में उनके पास क्या रास्ता है? अगर कहूं तो किसी भी सभ्य समाज में इस तरह की चीजें नहीं होनी चाहिए पर होती रहीं हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर। और उन सारी औरतों का क्या जिन पर यह बीतती है? उन में से न जाने कितनी तो सिसक कर रह जाती होंगी, शायद कुछ चीखतीं भी होंगी और किसी-किसी ने गुस्से में अपने हाथ भी भींचे होंगे। इन्हीं में से एक औरत निकली और उसने न्याय के उन सारे मंदिरों पर दस्तक दी। ताकि वो अपना ‘हक़’ पा सके। और उसने इस देश के कानून निर्माताओं और न्यायमूर्तिओं को इस विषय पर सोचने के लिए मजबुर किया। अब तीन तलाक़ के मुद्दे को आधार बनाकर एक फिल्म आई है, ‘हक़’। फिल्म आधारित है, शाहबानो के फेमस केस पर जिसने फिर एकबार इस देश की दिशा निर्धारित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

फिल्म की कहानी कुछ इस तरह है कि शाज़िया बानो का विवाह होता है, अब्बास खान से जो पेशे वकील हैं। शुरू में दोनों में खूब प्रेम रहता है। शेर ओ शायरी में बात होती है। शाज़िया बानो की हर बात अब्बास की सर आंखों पर रहती है। समय बीतता है परिवार बढ़ता है और साथ ही बढ़ती हैं जिम्मेदारियां। बातें खुशनुमा से जिम्मेदारी नुमा हो जाती हैं। अब्बास खीझने लगता है। जो बीवी उसे जान से प्यारी थी अब वो उसकी बातों पर भी ध्यान नहीं देता है। पाकिस्तान जाता है तो लौटते हुए दूसरी बीवी ले आता है, जिससे पानी शाज़िया बानो के सर से ऊपर चला जाता है। और तब बेगम से शुरू हुआ यह सफर बानो तक पहुंचता है और विवाद बढ़ते-बढ़ते सेशन कोर्ट, हाई कोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक जाता है। और एक औरत के हक़ की लड़ाई के विरोध में पूरी कौम खड़ी हो जाती है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड उसे गद्दार घोषित करने में लग जाता है, आस-पास के मुस्लिम उनका विरोध करते हैं, अपने बच्चों को उनके अब्बा मौलबी साहब के यहां पढ़ाने से मना कर देते हैं यहां तक कि कौम के नाम पर उनको मारने की कोशिशें भी होती हैं। इतना सब होने के बाद भी शाज़िया बानो के पिता हर क़दम पर उसका साथ देते हैं। तब लगता है कि मुस्लिम समाज को उन जैसे रेशनल मौलवी की आवश्यकता है।

फिल्म को लिखा है रेशू नाथ ने जो बोस: डेड/अलाइव और इल्लीगल जैसी बेहतरीन सीरीज का लेखन कर चुके हैं, यहां भी उनकी कहानी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग की तारीफ बनती है। वो संकेतों में अब्बास की मनोवृत्ति को समझाते हुए कहानी के प्लॉट को सेट करते हैं, चाहें वह एक कुकर के थोड़े से खराब हो जाने पर उसे सही करवाने की जगह दूसरा कुकर ले आना हो, शेर ओ शायरी से जब बातें जिम्मेदारी से भरी हो तो उनसे दूरी बनाना हो और तो और चाहे वह अपने मातहत के बड़े भाई की दूसरी शादी के जिक्र पर अब्बास की आंखों में चमक का आना हो। यह सभी दृश्य आगे की घटनाओं की ओर संकेतों में इशारा करते नज़र आते हैं। इल्लीगल जैसी उम्दा कोर्ट रूम ड्रामा सीरीज को उन्होंने जिस शानदार तरीके से अभिव्यक्त किया था तो यहां भी उनसे यही उम्मीद थी जिस पर वो पूरी तरह खरे उतरे हैं। फिल्म के डायलॉग की बात करें तो बहुत से डायलॉग फिल्म के प्रभाव को गाढ़ा करते हैं । जैसे
यामी जब बोलती हैं कि ‘बिरयानी या कोई सीर खोरमा नहीं है जो बांटकर सवाब का काम करूं शौहर हैं आप हमारे’ , ‘ कभी-कभी मोहब्बत पर्याप्त नहीं होती हमें अपनी इज़्ज़त भी चाहिए’ या फिर ‘ पैजामे का पैंगा चढ़ाकर और दाढ़ी बढ़ाकर आप लोगों को सिर्फ जहालियत ही बेंचते हैं’ या ‘ हम सिर्फ मुसलमान औरत नहीं हैं, हम हिंदुस्तान की मुसलमान औरत हैं।’ जैसे डायलॉग ने फिल्म में चार चांद लगाए हैं।

फिल्म के गीत कहानी को और मार्मिक बनाते हैं। फिल्म की शुरुआत में जब शादी का सीन आता है तो क़ुबूल है गीत आता है जो एक दूसरे का सभी गुण और दोषों के साथ कबूल करने की बात करता है। दूसरा गीत अब्बास के दूसरे निकाह के बाद आता है जिसके बोल हैं ‘ओ रब्बा दिल तोड़ गया तूं’ और अंत में बजत है ‘हक़ है मेरा’ जो दर्शकों के हृदय को कंपित कर देता है और उनकी आंखें गीली हो उडती है। कुल मिलाकर कहें तो गीतों ने फिल्म के प्रभाव को बढ़ाने का काम उम्दा तरीके से किया है।

एक्टिंग में यामी गौतम से जिस तरह की एक्टिंग की उम्मीद होती है, उन्होंने बिल्कुल भी निराश नहीं किया है। उन्होंने शाज़िया बानो के दर्द को पर्दे पर ऐसे जिया है कि आप यामी को भूल जाते हैं और शाज़िया के लिए परेशान होने लगते हैं। और उसके हक़ की लड़ाई में आप अपने को उसके साथ खड़ा कर देते हैं। अब्बास का किरदार एक ऐसे व्यक्ति का है जो अपने फायदे और ईगो के लिए मज़हब का कैसे भी इस्तेमाल कर सकता है। अपने गुनाह को छिपाने के लिए कौम को आगे करता है ताकि अपनी लड़ाई को कौम की लड़ाई बना सके। इमरान ने भी अपने किरदार के इस काइयांपन को बखूबी साधा है, घाघ इतने कि कई बार मुस्लिमों को व्यवस्था का शिकार बहुत ही सफाई से बताते दिखे हैं जबकि वो स्वयं की पत्नी के साथ अन्याय कर रहे थे। बेला जैन बनी शीबा चढ्ढा हमें वकील के रूप में आस्वस्त करती हैं।

एक तरह से फिल्म में बढ़िया एक्टिंग देखने को ‌लगती है। पर यामी गौतम सब पर भारी पड़ती ही नज़र ‌आती हैं।
फिल्म आधारित है शाहबानो केस पर जो 1985 का एक ऐतिहासिक भारतीय कानूनी मामला था, जिसमें 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाह बानो को उनके पति द्वारा तलाक दिए जाने के बाद गुजारा भत्ता (भरण-पोषण) के लिए अपने अधिकारों की लड़ाई लड़नी पड़ी थी, और सुप्रीम कोर्ट ने धर्मनिरपेक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत उनके भरण-पोषण के अधिकार को बरकरार रखा था। यह मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला था। पर इससे मुस्लिम पर्सनल लॉ और संवैधानिक अधिकारों के बीच टकराव पैदा हो गया था। अब चूंकि संविधान इस राष्ट्र की सर्वोच्च विधि है तो जब भी कोई विधि संविधान से टकराती है तो वह अप्रभावी हो जाती है। पर पर उस समय की सरकार ने मुस्लिम पुरुषों का पक्ष लेते हुए मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित करके सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कमजोर कर दिया था। जिसके कारण मुस्लिम महिलाओं की स्थिति उन्हें 2019 तक का इंतजार करना पड़ा। तब जाकर मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 बना, जिससे भारत में ‘तलाक-ए-बिद्दत’ (एक बार में तीन तलाक) को गैरकानूनी और अमान्य घोषित कर दिया, इसे एक दंडनीय अपराध बनाया, जिसके तहत पति को 3 साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है, साथ ही पीड़ित पत्नी को भरण-पोषण और बच्चों की हिरासत का अधिकार भी दिया गया।
अगर हम देखें तो पहली मुस्लिम बेगम की स्थिति पर आज तक न तो कोई रिसर्च हुई और न ही इनकी स्थिति जानने समझने में किसी संस्था या सरकार ने कोई दिलचस्पी दिखाई। जबकि तीन तलाक़ के बाद बहुतों को दुनिया जहां के कष्ट सहने पड़ते हैं और हलाला जैसे अमानवीय अनुभवों से गुजरना पड़ता रहा था। फिर भी कोई महिला संगठन उनके पक्ष में कभी खड़ा नहीं हुआ जो इन सबके दोगलेपन को दर्शाता है।

फिल्म के हर विभाग पर कार्य किया गया है । कहानी, गाने, डायलॉग, एक्टिंग या डायरेक्शन सभी हिस्सों को साधा गया है और एक ऐसे मुद्दे को उठाया गया है जो एक समय तक एक समुदाय की महिलाओं के विरुद्ध अन्याय का अस्त्र रहा है। यह फिल्म सार्थक विमर्श को बढ़ावा देती नजर आती है। इस तरह की फिल्में निश्चय ही बनती रहनी चाहिए जो पीड़ितों की आवाजें उठाती हैं।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं)

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