क्या सनातन का विरोध और अपमान ही सेक्युलर राजनीति है ?

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दिल्ली । भारत विभाजन के साथ मिली स्वाधीनता से कोई सबक न लेते हुए भारत की राजनीति आज तक तुष्टिकरण के आधार पर चलती रही है। मुस्लिम वोट बैंक को प्रसन्न करने के लिए तथाकथित समाजवादी लालू ने सम्मानित नेता आडवाणी जी को जेल में डाल दिया और एक कदम आगे बढ़ते हुए मुलायम सिंह ने निहत्थे रामभक्तों को गोलियों से भुनवा दिया, कांग्रेस साम्प्रदायिक हिंसा बिल ले आई वो तो भला हो उस समय विपक्ष में होने के बाद भी भाजपा ने इसे पारित होने से बचा लिया। मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण ही पाकिस्तान को सटीक उत्तर देने की जगह अमन का तमाशा किया जाता रहा। मात्र इतना ही नहीं मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए भारत की सनातन संस्कृति को अनेकानेक प्रकार से चोट पहुंचाई जाती रही । वर्ष 2014 में केन्द्रीय नेतृत्व प्रदान करते हुए नरेन्द्र मोदी जी ने तुष्टिकरण के कारण सनातन संस्कृति को हुई क्षति की भरपाई करने के प्रयास किए हैं।

बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद एक बार फिर मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले दल और अधिक कटु होकर सनातन हिंदू धर्म पर प्रहार कर रहे हैं । रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन को उनकी दो दिवसीय भारत यात्रा के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने श्रीमद्भगवद्गीता का रूसी अनुवाद भेंट किया। इसको देखकर कांग्रेस और वामपंथी दलों ने न केवल प्रधानमंत्री वरन श्रीमद्भगवद्गीता के प्रति आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग करते हुए इसका विरोध किया। कांग्रेसियों ने गीता के लिए माल शब्द का प्रयोग किया जो एक अक्षम्य अपराध है ।

वर्ष 2026 में पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव हैं अतः इन दो प्रान्तों में सनातन प्रतीकों तथा हिन्दू समाज को अपमानित करने का कार्य भी सबसे अधिक और सबसे तेजी से हो रहा है। पश्चिम बंगाल में वहां के तृणमूल विधायक हुमायूं कबीर ने गुलामी की मानसिकता से ग्रसित होकर बाबर के नाम की एक मस्जिद की आधारशिला रखी और प्रशासन चुपचाप खड़ा रहा क्योंकि इस हरकत को मुख्यमंत्री का मौन समर्थन था। उसकी देखादेखी बिहार और तेलंगना में भी कुछ कट्टरपंथी मौलानाओं ने बाबरी नाम की मस्जिद व स्मारक बनाने का ऐलान करके साप्रंदायिक तनाव बढ़ाने का काम आरम्भ कर दिया है। इस बाबरी भूत को वह सभी दल प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से समर्थन दे रहे हैं जिनकी राजनीति मुस्लिम तुष्टिकरण से चलती है और जो संविधान की किताब हाथ में लेकर घूमते हैं ।

उत्तर प्रदेश में सपा मुखिया सपरिवार शौर्य दिवस को सलीम चिश्ती की दरगाह पर चादर चढ़ाकर हिन्दुओं को चिढ़ाते दिखे । सपा मुखिया का तुष्टिकरण में संलिप्त यह कृत्य जनता समझ रही है। सपा मुखिया समय समय पर ऐसे बयान देते रहते हैं जिससे सनातन हिन्दू समाज आहत हो। महाकुंभ से लेकर लेकर अयोध्या के दीपोत्सव तक उन्होंने हिन्दू परम्पराओं का उपहास करते हुए उन्हें ढोंग बताया।

वहीं कांग्रेस ने तो हिदू सनातन आस्था के सभी केन्द्रों का अपमान करने की सुपारी ही ले रखी है। कर्नाटक में तो मुस्लिम तुष्टिकरण का खुला खेल चल ही रहा है। हिमाचंल प्रदेश कि कांग्रेस सरकार मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह “सुक्खू “ को हिंदू बच्चों के राधे -राधे बोलने पर आपत्ति है। तेलंगाना के कांग्रेस मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी लगातार सनातन और हिंदुओं के विरुद्ध आग उगल रहे हैं। रेवंत रेड्डी ने हिंदुओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि हर व्यक्ति और हर काम के लिए एक अलग भगवान होता है। एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा हिंदू कितने भगवानों को मानते हैं ? तीन करोड़ हैं, इतने सारे क्यों हैं? जो लोग अविवाहित हैं उनके लिए एक भगवाण है हनुमान, जो लोग दो शादी करते हैं उनके लिए अलग भगवान हैं और जो लोग शराब पीते हैं व मुर्गी खाते हैं उनके लिए अलग भगवान हैं। हर ग्रुप का अलग भगवान है। रेड्डी के बयान से हिंदुओं की भावनाओं का आहत होना स्वाभाविक था । हिंदू संगठनों ने मुख्यमंत्री से माफी मांगने को कहा किंतु मुस्लिम परस्त रेवंत रेड्डी अपने बयान पर कायम हैं ।

उधर तमिलनाडु में भगवान मुरुगन के मंदिर में दीप जलाने को लेकर द्रमुक सरकार मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए न्यायालय की भी अवहेलना कर रही है। तमिलनाडु से ही हिन्दू और सनातन समाज को डेंगू -मलेरिया जैसे रोगों की संज्ञा दी जाती रही है।

आश्चर्य की बात ये है कि सनातन हिन्दू धर्म का अपमान करने वाली इस राजनीति को “सेक्युलर” कहा जाता है। छद्म धर्मनिरपेक्षता का ये खेल लम्बा चल चुका है अब इसे समाप्त होना ही होगा।

घर वापसी: इतिहास और प्रक्रिया

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विनोद बंसल

दिल्ली । “घर वापसी”, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है किसी व्यक्ति या समूह का अपने घर में पुनः आगमन। यह केवल धार्मिक आंदोलन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक महत्त्वपूर्ण धारा है। यह उन व्यक्तियों या समुदायों की अपने मूल स्वधर्म में वापसी की सात्विक प्रक्रिया है, जो ऐतिहासिक कारणों, लोभ-लालच, जोर-जबरदस्ती या सामाजिक परिस्थितियों के चलते अन्य मत, मजहबों को अपनाने के लिए विवश हुए थे।
*ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:*
भारत में हजारों वर्षों से बहुलतावादी संस्कृति रही है, लेकिन मध्यकालीन आक्रमणों के दौर में, विशेषकर मुगल और इस्लामी आक्रांताओं द्वारा बड़े पैमाने पर हिन्दुओं का बलपूर्वक या प्रलोभन द्वारा धर्मान्तरण हुआ। यही स्थिति अंग्रेजी शासन के औपनिवेशिक काल में भी रही, जब मिशनरियों ने लालच और सामाजिक सेवा की आड़ में लाखों हिन्दुओं, विशेषकर अनुसूचित जातियों, जनजातियों व अन्य पिछड़े वर्ग का धर्मान्तरण करवाया।

19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के प्रारंभ में जब राष्ट्र प्रेम की भावना जोर पकड़ रही थी, तब आर्य समाज के मूर्धन्य सन्त पूज्य स्वामी श्रद्धानन्द और अन्य हिन्दू संगठनों ने ‘शुद्धि आंदोलन’ की शुरुआत की, जिसे आज ‘घर वापसी’ का मूल कहा जा सकता है। हालांकि घर वापसी की प्रक्रिया बहुत पुरातन काल से चली आ रही है।

स्वामी श्रद्धानन्द ने विशेष रूप से उत्तर भारत में जबरन मुसलमान बनाए गए मेवाती और अन्य जनजातीय समुदायों को पुनः हिन्दू धर्म में लौटाने का पुनीत कार्य किया। उन्होंने इसे सामाजिक पुनरुद्धार मानकर “राष्ट्रीय कर्तव्य” की संज्ञा दी। इसी शुद्धि आंदोलन के कारण 1926 में उनकी हत्या अब्दुल रशीद नामक मुसलमान ने धोखे से कर दी।

वर्ष 1964 में विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना की पृष्ठभूमि में भी धर्मान्तरण के अभिशाप से मुक्ति ही थी। मध्यप्रदेश में ईसाई मिशनरियों के द्वारा किए जा रहे धर्मान्तरण मामले में आई नियोगी कमीशन की रिपोर्ट ने 70 के दशक में देशव्यापी बहस व नव चेतना को जन्म दिया।

हिन्दू की परिभाषा करते हुए विहिप के संविधान में कहा गया कि “जो व्यक्ति भारत में विकसित हुए जीवन मूल्यों में आस्था रखता है या जो व्यक्ति स्वयं को हिन्दू कहता है वह हिन्दू है”। अपनी स्थापना के दूसरे ही वर्ष में 22 से 24 जनवरी, 1966 को कुम्भ के अवसर पर 12 देशों के 25 हज़ार प्रतिनिधियों की सहभागिता के साथ संगठन का प्रथम विश्व हिंदू सम्मेलन तीर्थराज प्रयागराज में सम्पन्न हुआ। इसमें 300 प्रमुख सन्तों के साथ पहली बार प्रमुख शंकराचार्य भी एक साथ आए और धर्मान्तरण पर रोक व परावर्तन (घर वापसी) का बड़ा सार्वजनिक संकल्प लिया गया। इसी सम्मेलन में परावर्तन यानी घर वापसी को मान्यता देने का ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित हुआ, वहीं विहिप के बोध वाक्य “धर्मो रक्षति रक्षितः” और बोध चिह्न “अक्षय वटवृक्ष” भी तय हुआ।

विहिप द्वारा आयोजित 1969 की उडुपी धर्म संसद में पूज्य सन्तों का यह उदघोष कि ‘हिन्दाव: सोदरा सर्वे, ना हिन्दू पतित भवेत्’, ने भी देश भर में नई बहस को जन्म दिया और कहा कि हिन्दू कभी पतित या नीचा नहीं होता। सभी हिन्दू भाई-भाई हैं। जिन्होंने दबाव, लालच या किसी विवशतावश हिन्दू धर्म छोड़ा, वे भी स्वेच्छा से स्वधर्म में पुनः वापस आ सकते हैं। ऐसे अपने सभी बिछड़े बन्धु भगिनियों का हम मिलकर हृदय से स्वागत करेंगे। यह बात पूजनीय श्री गुरुजी की उपस्थिति में सभी पूजनीय जगतगुरू शंकराचार्यों व देश के वरिष्ठ हिन्दू नेतृत्व से उद्घोषित की। इससे पूर्व समाज का एक वर्ग घर वापसी को ठीक नहीं मानता था। वह कहता था कि मुसलमान बनने से वह अपवित्र हो गया और ऐसे पथ भ्रष्ट व्यक्तियों के साथ हम कैसे सम्बन्ध बना सकते हैं।

वास्तव में धर्मान्तरण ने ही ‘घर वापसी’ को संगठित आन्दोलन का रूप दिया। विहिप का मानना है कि धर्मान्तरण भारतीय समाज को विभाजित कर राष्ट्रान्तरण का कारक बन, न सिर्फ देश की सांस्कृतिक अस्मिता को खतरे में डालता है, अपितु अपने ही पूर्व स्वधर्मियों का शोषण कर अमानवीय रूप धारण कर लेता है। भारत से अलग हुए पाकिस्तान, बांग्लादेश व अफगानिस्तान की वर्तमान स्थिति इसका जीता जागता उदाहरण है। इसीलिए, घर वापसी को ‘धर्मान्तरण’ नहीं बल्कि, ‘स्वधर्म की पुनर्प्राप्ति’ माना जाता है।

विहिप समेत अनेक पूज्य सन्त व हिंदू संगठन, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में अधिक चौकन्ने रहते हैं, जहां हिन्दू समाज के अनुसूचित जाति, जनजातियों या अन्य सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लोग अधिक संख्या में पहले हिन्दू थे और बाद में ईसाई बन गए या इस्लाम में चले गए।

*घर वापसी की प्रक्रिया:*
हालांकि घर वापसी की कोई निश्चित प्रक्रिया नहीं बताई जा सकती, यह देश, काल व परिस्थिति के अनुसार बदली रहती है किन्तु, सामान्य तौर पर यह निम्नलिखित चरणों में होती है:
1. *सम्पर्क एवं सम्वाद:* पहले उन व्यक्तियों या परिवारों से सम्पर्क किया जाता है जो अपने पूर्वजों के धर्म में लौटने को स्वयं इच्छुक होते हैं।
2. *सत्यापन* : जांच की जाती है कि सम्बन्धित व्यक्ति या उनके पूर्वज वास्तव में कभी हिन्दू थे। यह पहचान व्यक्तियों के ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक व पारिवारिक परिवेश के आधार पर होती है।
3. *धार्मिक अनुष्ठान:* घर वापसी की प्रक्रिया एक पवित्र वैदिक विधान के अन्तर्गत ‘शुद्धि यज्ञ’, ‘संकल्प’, ‘हवन’, और ‘गंगा जल स्नान’ इत्यादि धार्मिक अनुष्ठान के द्वारा सम्पन्न होती है।
4. *सामाजिक पुनः स्वीकार:* स्थानीय समाज के वरिष्ठ जन और पुरोहित वर्ग उस व्यक्ति या पारिवारिक समूह को पुनः हिन्दू समाज में अभिनन्दन पूर्वक स्वीकार कर उन्हें उनका मूल गोत्र प्रदान करते हैं।
5. *सामाजिक समरसता:* उनके पुनः हिन्दू समाज में आने के बाद उनके साथ भेदभाव, विशेषकर जाति या वर्ग के आधार पर न हो, यह शेष समाज द्वारा सुनिश्चित किया जाता है। साथ ही उनके साथ रोटी-बेटी का सम्बन्ध बना कर एकता और एकात्मकता का संकल्प भी लिया जाता है।

पूज्य सन्तों के आशीर्वाद व हिन्दू समाज के जागरूक लोगों व समूहों के साथ विश्व हिन्दू परिषद के गत छह दशकों में किए गए विविध प्रयासों ने इस सम्बन्ध में सम्पूर्ण देश में नव चेतना का संचार किया है। विहिप ने अवैध धर्मान्तरण पर रोक तथा धर्मान्तरित हिन्दू भाई-बहनों को अपनी जड़ों से पुन: जोड़ने की दिशा में भी बड़ा कार्य किया है। अभी तक लगभग 40 लाख हिन्दुओं के धर्मान्तरण को रोका गया है। साथ-साथ लगभग नौ लाख लोगों की घर वापसी भी कराई जा चुकी है। अनुसूचित जाति, जन जाति, वनवासी व गिरिवासी समाज के बीच सेवा, समर्पण व स्वावलन्बन के मन्त्र के साथ अनेक राज्यों में छल-बल पूर्वक धर्मान्तरण के विरुद्ध कठोर दंड की व्यवस्था वाले कानून विहिप के सतत प्रयासों के कारण ही बन पाए हैं।

अभी तक लगभग 25 हजार बहनों को लव जिहाद के षडयन्त्र से बचाया गया है। इतना ही नहीं, गत एक दशक में देश के दर्जन भर राज्यों में अवैध धर्मान्तरण के विरुद्ध कठोर कानून बनवाकर धर्मद्रोही चर्च, जिहादी और कम्युनिस्टों को जेल पहुंचाया गया है। कुछ वर्ष पूर्व तक लव जिहाद व धर्मान्तरण की घटनाओं को जो लोग सिरे से नकारकर भारतीय परम्पराओं और मान्यताओं का उपहास उड़ाते थे, वे अब स्वयं उसे मानने को मजबूर हुए हैं। समाज में घर वापसी के प्रति नई लहर चल पड़ी है। यूपी में छांगुर जैसे जिहादी जमालुद्दीनों के अनगिनत देश विरोधी व धर्मान्तरण के अड्डों को अब समाज स्वयं अग्रणी होकर ध्वस्त कर रहा है। विहिप समेत अब सम्पूर्ण भारत का यह संकल्प है कि देश को हम धर्मान्तरण की इस विभीषिका से मुक्ति दिला कर ही रहेंगे।

(लेखक विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं)

इन दिनों कहां हैं, शिवानंद द्विवेदी सहर

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दिल्ली। शिवानंद द्विवेदी सहर इन दिनों कहां हैं, सप्ताह में कोई ना कोई यह सवाल पूछ ही लेता है। निश्चित तौर पर यह प्रश्न पूछने वाले सभी सहर के मित्र और परिचित ही होंगे। जिनके नेटवर्क से अचानक शिवानंद बाहर चले गए हैं। उनका नाम पिछले दिनों भाजपा के आईटी सेल प्रमुख के लिए प्रमुखता से चला लेकिन अमितजी मालवीय गए नहीं, इसीलिए शिवानंदजी आए नहीं। ऐसा उनके जानने वाले ही बताते हैं।

कहां चले गए शिवानंद, इस प्रश्न के तलाश के लिए उंगलबाज.कॉम की टीम ने अपने अध्ययन से यह जानकारी निकाली है।

शिवानंद द्विवेदी भाजपा से जुड़े एक प्रमुख लेखक, संकलक और बौद्धिक कार्यकर्ता हैं। वे पार्टी की विचारधारा को जनता तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनकी सक्रियता मुख्य रूप से किताबों के लेखन, संकलन और मोदी सरकार की उपलब्धियों को दस्तावेजीकृत करने में देखी जाती है। उदाहरण के लिए, उन्होंने अनिर्बान गांगुली के साथ मिलकर ‘अमित शाह और भाजपा की यात्रा’ (Journey of Amit Shah and BJP) नामक पुस्तक का सह-लेखन किया। यह किताब भाजपा के संगठनात्मक विकास और अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी की सफलता की यात्रा को विस्तार से बताती है। यह पुस्तक भाजपा की रणनीतिक मजबूती और चुनावी विजयों के पीछे की विचारधारा को समझने में मदद करती है।

इसके अलावा, शिवानंद द्विवेदी ने ‘अमृत काल की ओर’ (Towards Amrit Kaal) नामक पुस्तक का संकलन किया, जिसमें के.के. उपाध्याय के साथ मिलकर मोदी सरकार के नौ वर्षों की उपलब्धियों को संकलित किया गया। यह पुस्तक 2023 में भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा द्वारा जारी की गई थी। इस आयोजन में नड्डा ने राहुल गांधी की आलोचना करते हुए कहा कि कांग्रेस नेता ‘नफरत का मेगा शॉपिंग मॉल’ खोल रहे हैं, जबकि भाजपा सकारात्मक विकास की बात करती है। इस पुस्तक के माध्यम से द्विवेदी ने मोदी सरकार की नीतियों – जैसे आर्थिक सुधार, विदेश नीति, कोविड प्रबंधन और आत्मनिर्भर भारत – को बौद्धिक रूप से प्रस्तुत किया। यह कार्य भाजपा के बौद्धिक प्रकोष्ठ की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें सरकार की उपलब्धियों को तथ्यपूर्ण और विचारधारा-सम्मत तरीके से प्रचारित किया जाता है।

शिवानंद द्विवेदी की सक्रियता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन (SPMRF) से भी जुड़ी हुई है। SPMRF भाजपा की विचारधारा पर शोध करने वाला प्रमुख थिंक टैंक है, जो नीति सुझाव देता है और राष्ट्रवादी दृष्टिकोण को मजबूत करता है। यहां द्विवेदी ने कई लेख और विश्लेषण लिखे हैं, जो पार्टी की संगठनात्मक ताकत, नेताओं की छवि और नए मतदाताओं से जुड़ाव पर केंद्रित होते हैं। उनके लेखों में भाजपा की चुनावी सफलताओं के पीछे की वजहों – जैसे करिश्माई नेतृत्व, स्वच्छ छवि और युवा जुड़ाव – को विस्तार से विश्लेषित किया जाता है। यह फाउंडेशन भाजपा के बौद्धिक कार्यों का केंद्र बिंदु है, जहां द्विवेदी जैसे कार्यकर्ता विचारधारा को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत करते हैं।

भाजपा में बौद्धिक कार्यों की परंपरा लंबी है। 1990 के दशक से पार्टी ने इंटेलेक्चुअल सेल, इकोनॉमिक सेल और मीडिया सेल जैसे प्रकोष्ठ बनाए, ताकि बुद्धिजीवियों को जोड़ा जा सके। डॉ. सौरभ मालवीय और संजीव सिन्हा के नेतृत्व में कई पत्रकार और बौद्धिक भाजपा से जुड़े। शिवानंद द्विवेदी इसी परंपरा के हिस्से हैं। उनकी किताबें और लेख पार्टी की विचारधारा – एकात्म मानववाद, अंत्योदय और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद – को मजबूत करते हैं। वे मोदी सरकार की नीतियों को ‘अमृत काल’ के संदर्भ में प्रस्तुत करते हैं, जो भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में है।

द्विवेदी की सक्रियता केवल लेखन तक सीमित नहीं है। वे भाजपा के बौद्धिक मंचों पर चर्चा और सेमिनारों में भाग लेते हैं, जहां पार्टी की नीतियों का बचाव और विपक्ष की आलोचना की जाती है। उनकी रचनाएं भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण सामग्री का हिस्सा बनती हैं। उदाहरणस्वरूप, अमित शाह की किताब में उन्होंने पार्टी के विस्तार – गुजरात से राष्ट्रीय स्तर तक – को दस्तावेजीकृत किया, जो कार्यकर्ताओं को प्रेरित करती है।

कुल मिलाकर, शिवानंद द्विवेदी भाजपा के बौद्धिक विंग के एक समर्पित सदस्य हैं। उनकी सक्रियता पार्टी को विचारधारा के स्तर पर मजबूत बनाती है। उनकी रचनाएं भाजपा की यात्रा को समझने का एक विश्वसनीय स्रोत हैं, जो पार्टी को एक विचार-आधारित संगठन के रूप में स्थापित करती हैं।

अवैध मतान्तरण को रोकने के लिए राष्ट्रव्यापी संकल्प की आवश्यकता

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डॉ सुरेन्द्र कुमार जैन,

दिल्ली । एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते समय माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध मतान्तरण के दुष्परिणामों पर चिन्ता व्यक्त करते हुए चेतावनी दी कि यह धार्मिक स्वतन्त्रता के मूलभूत अधिकार और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है। उन्होंने केवल चिन्ता ही व्यक्त नहीं की, अपितु केन्द्र सरकार को निर्देश भी दिए कि वह स्पष्ट रूप से बताए कि इस समस्या के समाधान के लिए क्या कदम उठाएंगे। पिछले काफी समय से अवैध मतान्तरण में संलग्न शक्तियों की आक्रामक रणनीतियां और उनके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।

कश्मीर में दो सिख लड़कियों का जबरन मतान्तरण, पंजाब में मिशनरियों द्वारा किए जा रहे मतान्तरण पर अकाल तख्त द्वारा चिन्ता व्यक्त करना, गुरुग्राम व लोनी में मूक-बधिर बच्चों का भी मतान्तरण करना, सम्पूर्ण देश में हिन्दू देवी-देवताओं व आस्थाओं के अपमान की सामग्री प्रकाशित होना या सोशल मीडिया पर अपलोड करना, कोरोना काल में भी चर्च का अप्रत्याशित व आक्रामक रूप से प्रसार होना आदि घटनाएं सम्पूर्ण देश को उद्वेलित कर रही हैं। अवैध मतान्तरण के ही एक वीभत्स रूप लव जिहाद शब्दों के उपयोग पर मजाक उड़ाने वाले भी दिल्ली में आफताब द्वारा श्रद्धा का कत्ल कर उसके शव को 35 टुकड़ों में जिस तरह बांटा गया, उससे स्तब्ध रह गए। अभी इस क्रूर हत्याकांड पर आक्रोश व्यक्त करने की समाज तैयारी कर ही रहा था कि लखनऊ में सूफियान ने अपनी प्रेमिका निधि गुप्ता को चौथी मन्जिल से धक्का देकर सिर्फ इसलिए मार दिया, क्योंकि उसने इस्लाम स्वीकार करने से मना कर दिया था।

अवैध मतान्तरण की यह विभीषिका भारत 13 सौ वर्षों से झेल रहा है। इसी कारण भारत में 10 करोड़ हिन्दुओं का नरसंहार हुआ। लगभग इतनों का ही जबरन मतान्तरण हुआ। भारत का दुर्भाग्यजनक विभाजन हुआ और कश्मीर की त्रासदी हुई। आतंकवाद और कई नरसंहारों की विभीषिका अवैध मतान्तरण के कारण ही भारत को झेलनी पड़ रही है। स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, महात्मा गांधी, डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर आदि कई महापुरुषों ने समय-समय पर इस मानवता विरोधी त्रासदी पर नियन्त्रण करने की आवश्यकता व्यक्त की है। पहले मतान्तरण बल प्रयोग या लालच से ही होता था, परन्तु अब तकनीक का उपयोग कर कई कुटिल तरीकों से मतान्तरण किया जाता है। विदेशों से मिल रही अकूत धन राशि और निजी स्वार्थों के कारण विशेष वर्ग का समर्थन इस समस्या को और जटिल बना देता है। इसके नए-नए स्वरूप देश के लिए नए-नए खतरों का निर्माण कर रहे हैं। इनका सामना करने के लिए केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों व देश के साधु-सन्तों और राष्ट्रभक्त समाज को मिलकर समन्वित योजना के अन्तर्गत काम करना होगा।

अवैध मतान्तरण के राष्ट्रव्यापी षड्यंत्र को रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण दायित्व केन्द्र सरकार का बनता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी उससे ही अपेक्षा की है। वर्ष 1995 में सरला मुद्गल मामले में भी माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इसे रोकने के लिए केन्द्रीय कानून बनाने की आवश्यकता प्रकट की थी। संविधान सभा में इस विषय पर चर्चा के समय सरदार पटेल ने आश्वासन दिया था कि अगर संविधान के अनुच्छेद 25 का दुरुपयोग हुआ, तो उसे रोकने के लिए केन्द्रीय कानून लाया जाएगा।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कुछ राज्य सरकारों ने इस दिशा में कदम उठाए परन्तु वोट बैंक की राजनीति ने राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा कर दी। कई केन्द्र सरकारें इसे राज्य का विषय बताकर पल्ला झाड़ती रहीं। संविधान के अनुच्छेद 25 के अन्तर्गत मतान्तरण के अधिकार की बात करने वाले जानबूझकर इस अनुच्छेद के प्रतिबन्धात्मक प्रावधानों की चर्चा नहीं करते। सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता के कानून केन्द्र सरकार के अन्तर्गत ही आते हैं। यह ठीक है कि भारत के आठ राज्यों में तत्सम्बन्धी कानून बने हैं परन्तु इस समस्या की भीषणता, व्यापकता और विदेशी शक्तियों के समर्थन को देखकर ऐसा महसूस होता है कि राष्ट्रव्यापी प्रभाव वाला सबल कानून बनना चाहिए। एक पृथक कानून बने या भारतीय दंड संहिता में कुछ संशोधन कर व्यवस्था बनाई जाए, इस पर चर्चा हो सकती है। 75 वर्षों से इस आवश्यकता की अनदेखी की जा रही है। समाज को विश्वास है कि स्वतन्त्रता के अमृत महोत्सव वर्ष में वर्तमान संकल्पवान सरकार, जो राष्ट्र को चुनौती देने वाले विषयों पर जीरो टॉलरेंस की नीति रखती है, इस दिशा में सबल कानून अवश्य बनाएगी।

13 सौ वर्ष पुरानी इस विकट समस्या का समाधान केवल कानून बनाकर नहीं हो सकता। जब भी देश के सामने इस प्रकार की चुनौतियां आती हैं, भारत के सन्त, महात्मा और चिन्तक प्रेरक व मार्गदर्शक के रुप में सामने आते हैं। देवल ऋषि, स्वामी विद्यारण्य, रामानुजाचार्य, रामानंद, चैतन्य महाप्रभु, गुरु तेग बहादुर गुरु गोविंद सिंह, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, स्वामी चिन्मयानन्द, महात्मा गांधी, डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर आदि कई सन्तों, महापुरुषों ने न केवल इस सम्बन्ध में जन-जागरण किया है, मतान्तरण की आंधी को रोकने का प्रयास किया है, अपितु भटके हुए बन्धुओं को अपनी जड़ों के साथ जोड़ने का प्रयास भी किया है।

आज कई पूज्य साधु-सन्त और चिंतक इस दिशा में सार्थक कदम उठा रहे हैं। देश के पूज्य साधु-सन्तों ने जिन उद्देश्यों को लेकर विहिप की स्थापना की थी, उनमें एक प्रमुख उद्देश्य मतान्तरण को रोकना और घर वापसी कराना था। इससे साधु-सन्तों की पीड़ा और प्राथमिकता स्पष्ट होती है। आज देश में लाखों साधु-सन्त हैं, जो इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि देश और हिन्दू बचेगा, तो ही उनका सम्मान और अस्तित्व सुनिश्चित रहेगा। चाणक्य ने जिस प्रकार विदेशी आक्रमणकारियों के संकट का सामना करने के लिए समन्वित अभियान चलाया था, आज समाज पूज्य सन्तों से वैसी ही अपेक्षा कर रहा है। अपनी कथाओं और प्रवचनों के माध्यम से जन जागरण, एक-एक जिले को दत्तक लेकर मतान्तरण के षडयंत्रों पर रोक लगाना और भटके बन्धुओं को अपने साथ जोड़ने का महा अभियान इस समय की आवश्यकता है। ऐसी हर चुनौती पर समाज ने पूज्य सन्तों के मार्गदर्शन में ही विजय प्राप्त की है और इस समय भी करेंगे, ऐसा विश्वास है।

सर्वविदित तथ्य है कि समाज के सहयोग के बिना कोई भी कानून फलीभूत नहीं हो सकता। दहेज विरोधी कानून का हश्र सबसे प्रबल उदाहरण है। इसलिए समाज को प्रेरित करने और व्याप्त जन जागरण हेतु सभी महापुरुषों और संगठनों को समन्वित अभियान चलाने की आवश्यकता है। परिवार के मुखिया परिवार की सदस्यों को अपने पूर्वजों के गौरव व परम्पराओं के सम्बन्ध में अवश्य बताते हैं। अपने परिवारों की परम्परा और समाज का गौरव जिस धर्म के कारण है, उसके प्रति स्वाभिमान निर्माण करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सर्व पन्थ समादर हिन्दू समाज की विशेषता है। यह विशेषता हमारी कमजोरी नहीं बननी चाहिए। जो हमारे धर्म का आदर न करें, मतान्तरित करने के लिए हमारे श्रेष्ठ धर्म को अपमानित करें, उन पन्थों का आदर करते रहना आत्मघाती सद्गुण विकृति है, कुछ और नहीं। हमारी इस सद्गुण विकृति का दुरुपयोग कर हमारे समाज और धर्म को नष्ट करने का षड्यंत्र सफल नहीं होनी चाहिए। यह जागृति आज के समय की आवश्यकता है।

आज सम्पूर्ण विश्व के मतान्तरित समाजों में अपनी जड़ों से जुड़ने का स्वयं स्फूर्त अभियान चल रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। परन्तु समाज की हिचक इसमें बाधा बनती है। अपने घर में वापस आने वाले बांधवों का शेष समाज के साथ रोटी-बेटी का सम्बन्ध जल्दी स्थापित नहीं हो पाता है। कुछ वर्ष पूर्व हरियाणा के रोहतक में आयोजित सर्व खाप पंचायत ने यह निर्णय लिया था कि जिनके पूर्वज जिस गोत्र से गए थे, वापस आने पर उनका वही जाति गोत्र माना जाएगा। उसके अनुसार ही उनका रोटी-बेटी का सम्बन्ध स्थापित होगा। इस प्रकार का जागरण अब समय की मांग है।

भारत में प्रतिदिन लव जिहाद की घटनाएं प्रकाश में आती रहती हैं। कोई न कोई श्रद्धा, निकिता, निधि, अंकिता, शिवानी आदि इन दरिन्दों का शिकार होती रहती है। इनमें वे भी मामले हैं, जिनके साथ जबर्दस्ती की जाती है। ऐसी घटनाएं मुस्लिम बहुल इलाकों में ज्यादा होती हैं। लव जिहाद के वे भी प्रकरण है, जिनमें हिन्दू लड़कियों को बहला-फुसलाकर षड्यंत्र के अन्तर्गत फंसाया जाता है। ऐसे में हिन्दू संगठनों व माता-पिता की भूमिका दोगनी हो जाती है। हमें अपनी लड़कियों की सुरक्षा करनी है, तो उन्हें स्वतन्त्रता और स्वच्छन्दता में अन्तर सिखाना पड़ेगा।

आज प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चों को अच्छा स्पर्श (good touch), बुरा स्पर्श (bad touch) का अन्तर सिखाते हैं। ऐसे में क्या यह सिखाना आवश्यक नहीं है कि मित्रता किससे करनी चाहिए और किससे नहीं? आधुनिक कहलाने या “अपने बच्चों को स्वयं निर्णय लेने की क्षमता निर्माण कर दी है” की मृग मरीचिका कितनी आत्मघाती बन चुकी है, यह लव जिहाद पीड़ित युवतियों के माता-पिता से अवश्य जानना चाहिए। इस मृग मरीचिका के कल्पना लोक का काल्पनिक आनन्द क्या हमारी बहन-बेटी के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण है? सभी सन्तों, प्रवचनकारों, शिक्षाविदों, समाजिक संगठनों व जनप्रतिनिधियों को इस सम्बन्ध में अपना दायित्व समझना होगा और इस जन-जागरण को सतत रूप से चलाना होगा।

मतान्तरण को अपना मिशन या देव प्रदत्त अधिकार मानने वाले मौलवी व मिशरियों को समझना होगा कि मतान्तरण का मिशन और शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व एक साथ नहीं चल सकते। अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, सीरिया, इराक, ईरान, नागालैंड, मिजोरम में इनकी जोर-जबर्दस्ती चलती है। वहां के अल्पसंख्यक समाज के सामने समर्पण या पलायन के अलावा जीवित रहने का कोई और विकल्प नहीं बचता है। वहां इनके इस चरित्र को किसी भी दृष्टि से मानवीय नहीं कहा जा सकता। परन्तु भारत में जहां ये अल्पसंख्यक हैं, वहां इनके अनुयायियों के अतिरिक्त कोई अन्य समाज इनकी पूजा-अर्चना में बाधा डालता है? क्या इनके चर्च या मस्जिद में जाने से इन्हें कोई रोकता है? क्या उनके धर्म प्रवर्तक या उनकी आस्थाओं के बारे में दुष्प्रचार करने में कोई पहल करता है? इसके विपरीत ईसाई व मुस्लिम नेताओं के द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं और आस्थाओं के अपमान से सम्बन्धित सामग्री सोशल मीडिया व लेखन जगत में भरी पड़ी है। क्या धार्मिक सहिष्णुता और शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का दायित्व एकपक्षीय हो सकता है?

अवैध मतान्तरण व उसके विभिन्न प्रकार न केवल दूसरों की आस्थाओं का अपमान करते हैं, अपितु सह-अस्तित्व के लिए भी खतरे का निर्माण करते हैं। सन्तों, महात्माओं से लेकर महात्मा गांधी, डॉ भीमराव आम्बेडकर आदि ने इस पर कई बार चिन्ता भी व्यक्त की है। नियोगी कमीशन, वेणुगोपाल कमीशन और वधवा कमीशन ने भी मतान्तरण के इस दुष्परिणाम पर स्पष्ट रूप से लिखा है। संविधान सभा में भी इन परिणामों पर आशंका व्यक्त की गई, तो संसद के दोनों सदनों में भी बार-बार ये मुद्दे उठाए जा चुके हैं।

मतान्तरण को अपना अधिकार मानने वाले समाजों को भी समझना पड़ेगा कि अवैध मतान्तरण दोधारी तलवार है। यह उनके समाज के लिए भी घातक है। यह उनके अनुभव में बार-बार आया भी है। उन्हें अपनी नई पीढ़ी को उज्जवल भविष्य निर्माण करने के लिए प्रेरित करना चाहिए न कि अवैध मतान्तरण और लव जिहाद के षड्यंत्रों की अंधेरी गलियों में जाने के लिए। इन गलियों की दिशा केवल विनाश की ओर ही जाती है, विकास की ओर नहीं। विहिप अवैध मतान्तरण के इन सब पक्षों पर कई वर्षों से काम कर रही है। अब चुनौतियां बढ़ रही हैं, तो दायित्व भी बढ़ रहे हैं। सन्तों के मार्गदर्शन में और सामाजिक धार्मिक संगठनों के सहयोग से इस चुनौती पर अवश्य विजय प्राप्त करेंगे।

(लेखक विहीप के संयुक्त महामंत्री हैं)

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