भारतीयों की मौत पर सन्नाटा क्यों? ईरान के लिए मुखर रहने वालों से देश पूछ रहा है सवाल ?

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । भारत और ईरान के संबंध सदियों पुराने रहे हैं। सांस्कृतिक विरासत, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, चाबहार बंदरगाह और सामरिक सहयोग जैसे अनेक क्षेत्रों में दोनों देशों ने एक-दूसरे का साथ दिया है। हालांकि यह भी सामने आया है कि इस्‍लाम के नाम पर ईरान ने हमेशा पाकिस्‍तान का साथ निभाया है, लेकिन अपने व्‍यापारिक हितों को देखते हुए वह आर्थ‍िक मामलों में भारत के साथ खड़ा दिखा है।

यही कारण भी रहा जो भारत ने हमेशा यह साबित किया कि वह अपने मित्र देशों का संकट की घड़ी में भी साथ देता है। आज जब ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ में भारतीय नाविकों की मौत और कई भारतीयों के घायल होने की घटना सामने आई है, तब यह प्रश्न पूरे देश के सामने खड़ा है कि क्या भारत के इस मित्रता पूर्ण व्‍यवहार एवं सम्मान का मान ईरान ने भी रखा है?

विदेश मंत्रालय ने स्वयं स्वीकार किया है कि पश्चिम एशिया में समुद्री जहाजों पर हाल में हुए हमलों में सबसे अधिक भारतीय नागरिक प्रभावित हुए हैं। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस सप्‍ताह हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे दो व्यापारी जहाज, ‘एमटी अल बहियाह’ और ‘एमटी मोम्बासा’ हमले का शिकार बने। इन दोनों जहाजों पर कुल 46 चालक दल के सदस्य थे, जिनमें 30 भारतीय नाविक शामिल थे।

‘एमटी अल बहियाह’ पर सवार 12 भारतीयों में से एक भारतीय नागरिक की मृत्यु हो गई, जबकि एक अन्य घायल हुआ। ‘एमटी मोम्बासा’ पर सवार 18 भारतीयों में से 9 भारतीय घायल हुए, जिनमें दो की स्थिति गंभीर बनी हुई है, वह जीवित भी बचेंगे, इसमें संदेह है। हालांकि भारत सरकार ने तत्काल नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास के मिशन उप प्रमुख को विदेश मंत्रालय तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया और इन हमलों की तीखी निंदा की।

यदि भारत जैसा संतुलित कूटनीतिक देश किसी मित्र राष्ट्र के राजनयिक को तलब करता है, तो यह अत्यंत गंभीर संदेश होता है। पर क्‍या इससे भारत की वह जनता समझेगी, जो कल तक ईरान के समर्थन में सड़कों पर उतर रही थी, चंदा इकट्ठा कर मदद के नाम पर ईरान भेज रही थी?

हकीकत में तो आज यह सभी के लिए याद करना आवश्यक है कि भारत ने ईरान के लिए क्या किया। जब ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, युद्ध और आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब भारत ने सिर्फ उसके पक्ष में जहां संभव रहा, अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर बयान जारी किए, साथ ही मानवीय सहायता का बड़ा अभियान भी चलाया।

जीवनरक्षक दवाइयाँ, चिकित्सा उपकरण और आवश्यक मेडिकल सामग्री, वैध और कानूनी माध्यमों से ईरानी रेड क्रिसेंट सोसाइटी तक पहुँचाई गईं। जिसके परिणाम में ईरान सरकार और उसके राजदूत ने सार्वजनिक रूप से भारत सरकार तथा भारतीय जनता के इस सहयोग के लिए आभार भी व्यक्त किया। यानी भारत ने सहानुभूति का प्रदर्शन करने के स्‍थान पर संकट की घड़ी में ईरान की वास्तविक मदद की।

ईरान के पक्ष में जब भारत में रह रहे शिया मुसलमान धन इकट्ठा कर रहे थे, तब कश्मीर घाटी से लेकर मेरठ, लखनऊ, अमरोहा, हैदराबाद, मुंबई, कारगिल और अन्य क्षेत्रों से नकद राशि के साथ-साथ सोने के आभूषण, चांदी के बर्तन और अन्य मूल्यवान वस्तुएँ ईरान को आर्थ‍िक सहायता के रूप में उपलब्‍ध कराई गईं। यानी जो भी ईरान के पक्ष में संभव हो सकता था, वह सभी कुछ भारत सरकार ने अपने स्‍तर पर किया। जहां तक कि भारत के तमाम गैर मुसलमानों ने भी शियाओं के आह्वान पर यथासंभव मदद अपनी ओर से मुहैया कराई।

अमेरिकी प्रतिबंधों और वैश्विक दबाव के बावजूद भारत ने चाबहार बंदरगाह परियोजना को कभी नहीं छोड़ा। यह परियोजना ईरान की अर्थव्यवस्था और उसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। जब अनेक अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ ईरान से दूरी बना रही थीं, तब भारत ने निवेश जारी रखा। यह कदम भरोसे और रणनीतिक साझेदारी के आधार पर उठाया गया, किंतु आज सवाल जवाबदेही का है।

वस्‍तुत: जब भारतीय नागरिकों की जान जाती है, तब भारत को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि ऐसी घटनाएँ क्यों हुईं?यदि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती, यदि नागरिक जहाजों पर हमले होते हैं और उनमें सबसे अधिक भारतीय प्रभावित होते हैं, तो सिर्फ “दुख व्यक्त” कर देना पर्याप्त नहीं हो सकता। ऐसे में भारत के प्रत्‍येक नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ईरान क्या ठोस कदम उठा रहा है।

भारतीय नाविक किसी युद्ध का हिस्सा नहीं

यह भी ध्‍यान देने योग्‍य है कि भारत विश्व के सबसे बड़े समुद्री मानव संसाधन प्रदाताओं में शामिल है। हजारों भारतीय व्यापारी जहाजों पर कार्य करते हैं। वे किसी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं होते। वे वैश्विक व्यापार की रीढ़ हैं। ऐसे निर्दोष नागरिकों का किसी भी संघर्ष में शिकार बनना अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और मानवीय सिद्धांतों, दोनों के विपरीत है। यदि सबसे अधिक भारतीय नाविक ही प्रभावित हो रहे हैं, तो यह भारत के लिए स्‍वभावि‍क तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन गया है।

अब स्‍वभाविक है कि इस पूरे घटनाक्रम ने देश के भीतर भी एक गंभीर बहस छेड़ दी है। जैसा कि बताया गया, जब ईरान संकट में था, तब भारत में अनेक स्थानों पर उसके समर्थन में प्रदर्शन हुए। सोशल मीडिया पर अभियान चलाए गए। मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानून की दुहाई दी गई। करोड़ों रुपये का चंदा जुटाया गया। लोगों ने अपने आभूषण तक दान कर दिए, किंतु आज जब एक भारतीय नागरिक की मृत्यु हुई, अनेक भारतीय घायल हुए और भारत सरकार को स्वयं ईरानी राजनयिक को तलब कर विरोध दर्ज कराना पड़ा, तब वही मुखर आवाजें शांत हैं!

क्या भारतीय नागरिक का जीवन किसी अन्य देश के नागरिक से कम मूल्यवान है? क्या मानवाधिकारों की आवाज तब उठेगी, जब पीड़ित कोई दूसरा होगा? क्या संवेदना भी वैचारिक पसंद और नापसंद देखकर व्यक्त की जाएगी? वस्‍तुत: ये प्रश्न उन सभी लोगों के लिए हैं जो अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर नैतिकता और मानवाधिकार की बात करते हैं। उन्‍हें भी आज यह समझना चाहिए कि यदि सिद्धांत सार्वभौमिक हैं, तो भारतीय नागरिक के लिए भी वही संवेदना दिखाई देनी चाहिए।

भारत की विदेश नीति को स्पष्ट संदेश देना होगा

यहां केंद्र की मोदी सरकार से भी ईरान के प्रति कड़ा रुख अपनाने का आग्रह है। बेशक; भारत की विदेश नीति संतुलित है। भारत अमेरिका से भी संबंध रखता है, रूस से भी, इजराइल से भी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह किसी देश को ये छूट दे कि वह उसके नागरिकों की हत्‍या करेगा या उसके यहां हिंसा एवं हत्‍या होंगी ।

अब यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि ईरान भी उसी स्पष्टता से भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे, इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच कराए, जिम्मेदारी तय करे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस एवं विश्वसनीय कदम उठाए। इसके साथ ही भारत में रह रहे सभी श‍िया मुसलमानों एवं उन सभी से जो कल तक ईरान के साथ खड़े दिखे, उन सभी से अपील है कि वह भारतीयों पर ईरान के समुद्री क्षेत्र में हो रही हिंसात्‍मक कार्रवाइयों का मुखर विरोध करें।

केंद्र सरकार भी ध्‍यान रखे, किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का अंतिम उद्देश्य उसके नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान होता है। यदि भारतीय नागरिकों का रक्त बहता है, तो भारत का कठोर प्रश्न पूछना उसका अधिकार से अधिक उसका कर्तव्य भी है। मित्रता सम्मान पर टिकी होती है और सम्मान की पहली शर्त आज भारत-ईरान संबंधों के बीच यही है कि हर देशवासी, भारतवासी का जीवन सर्वोपरि है।

Ukraine would have been reduced to smoke in a nuclear attack had PM Modi not intervened!

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– Dr. Mayank Chaturvedi

– Poland’s major revelation boosts India’s diplomatic stature; PM Modi cited as one of the few world leaders capable of influencing Putin.

Delhi : A significant statement from Poland amidst the Russia-Ukraine war has sparked a new discussion regarding India’s role in global diplomacy. Speaking at a press conference in New Delhi, Polish Deputy Foreign Minister Władysław Teofil Bartoszewski claimed that had Prime Minister Narendra Modi not intervened in late 2022, Russia might have taken the drastic step of using tactical nuclear weapons against Ukraine.

According to him, Prime Minister Narendra Modi is among the select few world leaders whose words Russian President Vladimir Putin takes seriously and whose advice carries weight with him. If this claim holds true, it highlights a pivotal role played by India in averting a potential nuclear crisis.

https://x.com/RealBababanaras/status/2077258734569758959?s=20

Poland’s major claim: Modi averted a nuclear crisis

Elaborating on this, Polish Deputy Foreign Minister Bartoszewski explained that the Russia-Ukraine war had reached a critical and dangerous juncture in late 2022. At that time, there were persistent fears regarding Russia’s potential use of tactical nuclear weapons. He stated that Prime Minister Narendra Modi played a crucial role in dissuading President Vladimir Putin from taking such a step by leveraging his personal influence and the decades-old strategic ties between India and Russia.

In his words, “Prime Minister Narendra Modi is one of the few world leaders who can genuinely influence Putin. President Putin gives serious consideration to what Prime Minister Modi says.”

Modi among the few leaders with access to Putin

The Polish Deputy Foreign Minister noted that India and Russia share a relationship built on decades of trust. This partnership, which dates back to the Soviet era, remains robust between the two nations to this day. This is why Prime Minister Modi’s words resonate effectively with President Putin. It was also noted that if any country can exert genuine moral and political pressure on Russia to halt the war, India is among the most pivotal nations capable of doing so.

https://x.com/Vijayjnr/status/2077066598930956385?s=20

India Gains Support at the UN Security Council

During the press briefing, Poland openly supported India’s bid for permanent membership in the United Nations Security Council. Furthermore, India’s balanced approach regarding the Middle East, particularly concerning Iran and the Gulf region, was commended. The Polish minister stated that just as India advocates for regional stability through dialogue, Poland also supports resolving all disputes, including those involving Iran, through diplomatic negotiations.

Today’s Era is Not an Era of War- A Global Message

One of Prime Minister Narendra Modi’s most significant statements during the Russia-Ukraine conflict was made at the Shanghai Cooperation Organisation (SCO) summit held in Samarkand, Uzbekistan, in September 2022. Prime Minister Modi explicitly told President Putin, “Today’s era is not an era of war.” This statement was received positively by the United States, Europe, and numerous Western nations. It was viewed as a reflection of India’s balanced, independent and peace-oriented foreign policy.

India Chooses the Path of Dialogue

It is noteworthy that the Russia-Ukraine war began on February 24, 2022, when Russia announced a “special military operation” in Ukraine and launched military actions from multiple directions. The conflict has continued unabated since then. Millions of people have been displaced, thousands of soldiers and civilians have lost their lives, and Europe’s security architecture has been profoundly impacted. Throughout this conflict, India neither openly sided with any party nor joined any military alliance. India consistently reiterated that a lasting solution to any dispute is possible only through dialogue and diplomacy, not on the battlefield.

https://x.com/IndiaStrikes_/status/2077106096775540968?s=20

Maintaining Ties with Both Russia and Ukraine

A key feature of India’s foreign policy has been its ability to maintain a dialogue with both Russia and Ukraine. While India upheld its traditional strategic ties with Russia, it simultaneously maintained continuous high-level contact with Ukraine. In 2024, Prime Minister Narendra Modi undertook a historic visit to Kyiv and met with Ukrainian President Volodymyr Zelenskyy. During the visit, he clearly stated that war is not the solution to any problem and affirmed that India stands firmly for peace, dialogue, and humanity.

Prime Minister Modi and President Zelenskyy also held detailed discussions recently during the G-7 summit. The two leaders deliberated on bilateral cooperation, trade impacted by the conflict and the strengthening of future ties. Prime Minister Modi reiterated that India would continue to accord the highest priority to peace and humanity under all circumstances.

https://x.com/HarshSharma24/status/2077273234341576756?s=20

India’s Growing Global Acceptance

The Russia-Ukraine conflict has elevated India’s role in international politics to a new level. India is a traditional strategic partner of Russia, yet its relations with Western nations have also steadily strengthened. This balance establishes India as a nation that believes in the politics of finding solutions rather than conflict. The statement by Poland’s Deputy Foreign Minister is also seen as an indication of this growing global acceptance of India. Indeed, among the few world leaders capable of influencing President Putin, Prime Minister Narendra Modi stands out as a prominent figure.

मनोज श्रीवास्तव जी का लोकमंथन पर अति सुंदर विश्लेषण……

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भोपाल। अभी दो दिनों पहले दिल्ली के एक विश्वविद्यालय से दो बच्चे ‘लोकमंथन’ पर मेरा साक्षात्कार करने आए थे। वे कोई शोध कर रहे हैं।

‘लोकमंथन’ 2016 में भोपाल से शुरू हुआ था और अब उसका एक दशक हो गया है। उसके बाद बिहार में राँची, असम में गौहाटी और आंध्र में हैदराबाद में यह आयोजित हो चुका है। इस वर्ष राजस्थान के जयपुर में यह आयोजन होना है।

बच्चों ने ‘लोकमंथन’ की अवधारणा पर मेरी दृष्टि पूछी। मैंने कहा दो कारण थे- एक तो लोक और शास्त्र को आपस में लड़ाने वालों के एजेंडे का मुक़ाबला करना। दूसरे लोक और राज्य के बीच की दूरी के किलोमीटर कम करना।

लोकमंथन ने जिस एक प्रश्न को सबसे अधिक तीव्रता से उठाया है, वह है — शास्त्र और लोक के बीच खड़ी की गई वह दीवार, जो वस्तुतः कभी थी ही नहीं, किंतु समय के प्रवाह में, विशेषतः औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा के अधीन, निर्मित कर दी गई।

पाणिनीय व्याकरण की दृष्टि से देखें तो “शास्त्र” शब्द “शासु अनुशिष्टौ” धातु से “ष्ट्रन्” प्रत्यय द्वारा निष्पन्न होता है — जिसका अर्थ है अनुशासन देना, मार्गदर्शन करना, व्यवस्थित करना। ध्यातव्य है कि यह धातु स्वयं में कोई स्वतःसिद्ध सामग्री नहीं रचती, वह केवल पहले से विद्यमान अनुभव-राशि को अनुशासित करती है, उसे सूत्रबद्ध करती है। दूसरी ओर “लोक” शब्द “लोकृ दर्शने” धातु से बनता है — देखना, अवलोकन करना, प्रत्यक्ष अनुभव करना। यहीं से यह भेद स्पष्ट होता है कि लोक अनुभव का प्रथम स्रोत है और शास्त्र उस अनुभव का अनुशासित, सूत्रबद्ध, संप्रेषणीय रूप। अर्थात् व्युत्पत्ति के स्तर पर ही शास्त्र लोक का शत्रु नहीं, उसका परिष्कार है — जैसे नदी का जल और उसका तट एक-दूसरे के विरोधी नहीं, अपितु तट जल को दिशा और मर्यादा देता है, जल के अस्तित्व को नकारता नहीं।

पाणिनि स्वयं इस बात के सबसे बड़े प्रमाण हैं। अष्टाध्यायी में “लोकतः” एक स्वतंत्र प्रमाण के रूप में स्वीकृत है — अर्थात् जहाँ शास्त्रीय नियम मौन हों अथवा लोक-व्यवहार से टकराते हों, वहाँ लोक-प्रयोग को ही अंतिम प्रमाण माना गया है। पतंजलि के महाभाष्य में यह सिद्धांत बारंबार दुहराया गया है कि “लोकतः अर्थप्रत्यायनम्” — अर्थ का निर्णय अंततः लोक-व्यवहार से ही होता है, शास्त्र केवल उस व्यवहार को संहिताबद्ध करने का साधन है। यह अत्यंत मार्मिक तथ्य है कि भारत के सर्वाधिक कठोर व्याकरण-शास्त्र ने भी अपने प्रमाणों के शिखर पर लोक को ही प्रतिष्ठित किया, शास्त्र को नहीं। जो परंपरा स्वयं अपनी सर्वाधिक तकनीकी अनुशासन-पद्धति में लोक को अंतिम न्यायाधीश मानती हो, उस परंपरा में शास्त्र और लोक का शत्रुभाव कल्पना करना ही मूल स्रोत से विचलन है। पर लोक के नाम पर मनचाही कहानियाँ गढ़कर उससे शास्त्र को टकराने का मि श न भी चल रहा है। उसके प्रति सावधान रहना होगा। नहीं तो बिहार की असुर जनजाति की एक कन्वर्टेड युवती के कथन के आधार पर दिल्ली के विश्वविद्यालय महिषासुरमर्दिनी को सेक्स वर्कर कहने लगेंगे।

वेद को यदि हम “अपौरुषेय श्रुति” कहकर उसकी शास्त्रीयता पर बल दें, तब भी यह विस्मृत नहीं करना चाहिए कि ऋचाएँ मूलतः मौखिक परंपरा में गीत के रूप में जीवित थीं। ऋग्वेद की अनेक ऋचाएँ — विशेषतः विवाह-सूक्त, अक्षसूक्त (जुआरी का विलाप), संवाद-सूक्त (यम-यमी, पुरूरवा-उर्वशी) — अपनी संरचना में लोक-गीतों की स्मृति सुरक्षित रखती हैं। अक्षसूक्त तो प्रत्यक्षतः एक जुआरी के आत्मकथन जैसा है, जिसकी वेदना और पश्चाताप किसी भी लोक-गाथा के नायक के समान है। यह तथ्य दर्शाता है कि श्रुति-परंपरा ने लोक-अनुभव को बहिष्कृत नहीं किया, अपितु उसे अपने भीतर समाहित करके उसे शाश्वत प्रतिष्ठा दी।

इसी क्रम में यास्क के निरुक्त में “लौकिक” और “वैदिक” प्रयोगों के बीच निरंतर तुलना की गई है, किंतु यह तुलना कहीं भी लौकिक को हेय सिद्ध करने के लिए नहीं, अपितु वैदिक अर्थ को स्पष्ट करने के लिए लौकिक दृष्टांत के सहारे की गई है। यह पद्धति स्वयं सिद्ध करती है कि प्राचीन आचार्यों के लिए लोक-व्यवहार अर्थनिर्णय का सहायक साधन था, तिरस्करणीय वस्तु नहीं।

पुराण-परंपरा तो और भी स्पष्ट उदाहरण है। पुराणों को परंपरागत रूप से “पञ्चमवेद” कहा गया, किंतु उनकी भाषा, शैली और श्रोतृवर्ग शुद्धतः लौकिक थे — सूत जैसे सूतवंशीय कथावाचकों के मुख से जनसाधारण तक पहुँचने वाला यह साहित्य श्रुति और लोक के बीच का सेतु है, कोई तीसरी पृथक् कोटि नहीं। पुराण यह प्रमाणित करते हैं कि भारतीय परंपरा ने ज्ञान के प्रवाह को कभी एकदिश नहीं माना — शास्त्र से लोक की ओर उतरता भी है, और लोक से शास्त्र की ओर उठता भी है।

नाट्यशास्त्र में भरत मुनि ने संगीत और नृत्य की दो धाराओं का उल्लेख किया — मार्गी और देशी। यह वर्गीकरण अत्यंत सूक्ष्म है और यहीं आधुनिक पाठक प्रायः भ्रमित होता है। “मार्गी” का अर्थ शास्त्रसम्मत, सार्वदेशिक, अनुष्ठान-संबद्ध शैली से है, जबकि “देशी” का अर्थ है क्षेत्रीय, लोकाश्रित, परिवर्तनशील शैली। किंतु भरत मुनि ने कहीं भी देशी को मार्गी से हीन घोषित नहीं किया — दोनों को नाट्यधर्म के दो अंग के रूप में स्वीकृति दी गई। अभिनवगुप्त जैसे परवर्ती आचार्यों ने भी इस भेद को गुणात्मक श्रेष्ठता का प्रश्न नहीं, अपितु प्रयोजन और संदर्भ का प्रश्न माना।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो अनेक रागों का उद्भव देशी संगीत से हुआ और कालांतर में वे मार्गी परंपरा में समाहित हो गए। ध्रुपद जैसी अत्यंत शास्त्रीय गायन-शैली की जड़ें भी लोक-अनुष्ठानों और मंदिर-परंपराओं में खोजी जा सकती हैं। यहाँ तक कि शास्त्रीय रागों के नामकरण में भी — मल्हार, भैरवी, बागेश्री — लोक-ऋतु, लोक-देवता और लोक-स्मृति की छाया स्पष्ट है। यह प्रवाह द्विदिश है — लोक शास्त्र को कच्चा माल देता है, शास्त्र उसे संस्कार देकर पुनः लोक को लौटाता है, और यह चक्र अनवरत चलता रहता है।

भरतमुनि और अभिनवगुप्त के रस-सिद्धांत की मूल भित्ति ही “लोक” है। नाट्यशास्त्र में स्पष्ट कहा गया है कि नाट्य “लोकवृत्तानुकरणम्” है — लोक की वृत्तियों का अनुकरण। यदि लोक-जीवन में स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव न हों, तो शास्त्र के पास रस-निष्पत्ति के लिए कोई सामग्री ही शेष नहीं रहती। अभिनवगुप्त का प्रसिद्ध “साधारणीकरण” सिद्धांत भी यही कहता है — कवि लोक-अनुभूति को इतना विशिष्ट और तादात्म्यमूलक बना देता है कि वह सामान्यीकृत होकर सहृदय तक पहुँचती है। यहाँ शास्त्र का कार्य लोक-अनुभूति को नकारना नहीं, उसे परिष्कृत, संप्रेषणीय और स्थायी बनाना है।

आनंदवर्धन के ध्वनि-सिद्धांत में भी यही प्रक्रिया दिखाई देती है — व्यंजना लोक-भाषा के सहज सामर्थ्य से ही उपजती है, शास्त्र केवल उस सामर्थ्य का विश्लेषण और वर्गीकरण करता है। कवि कभी भी शास्त्र पढ़कर काव्य नहीं रचता, वह लोक-जीवन से रस ग्रहण करता है, और शास्त्र बाद में उस रचना का मीमांसक बनकर आता है। यही कारण है कि संस्कृत के महाकवि — कालिदास से लेकर भवभूति तक — अपनी उपमाओं, दृष्टांतों और बिंबों के लिए कृषि, वन, नदी, ऋतु-चक्र जैसे विशुद्ध लोक-अनुभवों की ओर ही मुड़ते हैं।

पूर्व मीमांसा दर्शन में “लोकवत्” तर्क अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। जैमिनि और शबरस्वामी की परंपरा में जहाँ शास्त्रीय विधि-वाक्यों की व्याख्या करनी होती है और शब्द का अर्थ संदिग्ध हो, वहाँ “लोके यथादृष्टं तथा शास्त्रेऽपि” — जैसा लोक में देखा जाता है, वैसा ही शास्त्र में भी ग्रहण किया जाए — यह सिद्धांत प्रतिष्ठित है। न्यायशास्त्र में भी प्रमाण-मीमांसा करते समय लोक-प्रसिद्ध अर्थ को ही आधारभूत माना गया, जब तक कि शास्त्र विशेष रूप से उससे भिन्न अर्थ का निर्देश न करे।

लोक कोई निर्वीर्य, निष्क्रिय पात्र नहीं जो शास्त्र से भरा जाना प्रतीक्षा करता हो, अपितु वह स्वयं चिंतन और दर्शन का उद्गम-स्रोत रहा है।

यदि मध्यकाल में कहीं यह देखना हो कि लोक ने पुनः शास्त्र को कैसे पुनर्जीवित किया, तो भक्ति-आंदोलन इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। कबीर, तुलसी, मीरा, सूरदास, नामदेव, तुकाराम — इन संतों में से अधिकांश संस्कृत के औपचारिक शास्त्रीय शिक्षा-तंत्र से बाहर थे, अनेक तो निरक्षर अथवा निम्न-सामाजिक स्तर से आए थे। किंतु उनकी रचनाओं ने न केवल जनमानस को झकझोरा, अपितु स्वयं शास्त्रीय वेदांत, भक्ति-मीमांसा और रस-सिद्धांत की परवर्ती व्याख्याओं को भी प्रभावित किया। तुलसीदास का रामचरितमानस अवधी लोकभाषा में रचित होकर भी आज शास्त्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है — यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि लोक और शास्त्र के बीच की सीमा-रेखा स्थिर नहीं, प्रवाहमान है। आज का लोक-काव्य कल का शास्त्र बन सकता है, और आज का शास्त्र कभी लोक-अनुभव ही था।

औपनिवेशिक ज्ञानमीमांसा ने पश्चिमी “High Culture” बनाम “Folk Culture” के द्वैतवादी ढाँचे को भारतीय सामग्री पर आरोपित किया। इस आरोपण में संस्कृत-निबद्ध साहित्य को “classical” और शेष भाषाओं तथा मौखिक परंपराओं को “folk” अथवा “vernacular” कहकर एक कृत्रिम पदानुक्रम रच दिया गया, जिसमें लोक स्वभावतः द्वितीयक और अपूर्ण सिद्ध होता चला गया।

लोकमंथन की मूल चुनौती इसी औपनिवेशिक वर्गीकरण के विरुद्ध है — वह पुनः उस मूल भारतीय दृष्टि की प्रतिष्ठा करना चाहता है, जहाँ लोक कोई अवशिष्ट श्रेणी नहीं, अपितु शास्त्र का सहोदर, उसका उद्गम और अंततः उसका गंतव्य भी है।

शास्त्र और लोक के बीच जो सरिता प्रवाहित होती है, वह चेतना की ही सरिता है — भारतीय सभ्यता की सामूहिक स्मृति और अनुभव की अजस्र धारा। शास्त्र इस सरिता का वह तट है जो उसे मर्यादा, दिशा और स्थायित्व देता है; लोक वह तट है जो उसे नित नए जल-स्रोतों से सींचता है, उसे शुष्क होने से बचाता है। जिस दिन शास्त्र लोक से कट जाता है, वह शुष्क कर्मकांड और निर्जीव पांडित्य में बदल जाता है। जिस दिन लोक शास्त्र से कट जाता है, वह दिशाहीन, संस्कारहीन और विस्मृतिशील हो जाता है। भारतीय सभ्यता की जीवंतता ठीक इसी कारण रही है कि उसने इन दोनों तटों को कभी परस्पर-विरोधी नहीं होने दिया — पाणिनि ने लोक को प्रमाण माना, भरत ने लोक को नाट्य का उपादान बनाया, मीमांसकों ने लोक-व्यवहार को अर्थनिर्णय का आधार माना, और भक्ति-संतों ने लोक-भाषा में रचकर उसे स्वयं शास्त्र की प्रतिष्ठा दिला दी।

लोकमंथन का सांस्कृतिक अवदान इसी प्राचीन सत्य का पुनःस्मरण है – यह किसी नए सिद्धांत का प्रवर्तन नहीं, अपितु उस विस्मृत ज्ञानमीमांसा का पुनरुद्धार है, जिसमें शास्त्र और लोक कभी शत्रु नहीं, सदा सहचर रहे हैं। यह आयोजन इस अर्थ में सार्थक है कि यह भारत को स्मरण कराता है कि उसकी सभ्यता की समग्रता तभी सुरक्षित रह सकती है, जब लोक को शास्त्र से लड़ाने की कोशिशों को चुनौती दी जाए।

Why we cannot do it ? 

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Prof G D Yadav

Mumbai: This is an interesting infographic. Striking. I believe that the emergence of unicorns is closely linked to the policy environment in which they operate. If India wishes to create and retain a larger number of globally competitive unicorns, government policies must evolve to encourage innovation, entrepreneurship, risk-taking, and the scaling of technology-driven enterprises.

The success of many Indian-origin entrepreneurs in the United States, the United Kingdom, Canada, and other countries is particularly instructive. It demonstrates that Indian talent is among the best in the world. There are so many of them within the country who need encouragement through policy and removal of red tape. The question, therefore, is not whether India produces capable entrepreneurs, but whether the domestic ecosystem enables them to build and scale world-class companies.

There are two possible explanations. One is that many of India’s most talented individuals have migrated abroad, resulting in a concentration of entrepreneurial talent in other economies. The other, and perhaps more significant, is that these countries have created policy frameworks that better support innovation through easier access to capital, simpler regulations, stronger intellectual property protection, predictable taxation, world-class research universities, and a culture that rewards entrepreneurship.

India has made remarkable progress over the past decade through initiatives such as Startup India, Digital India, and improvements in the ease of doing business. We should be proud of it. Yet the next phase of growth will require policy reforms that reduce regulatory hurdles, facilitate technology commercialization, deepen venture capital and patient capital markets, strengthen university–industry collaboration, and make it easier for startups to scale globally while remaining headquartered in India.

The objective should not merely be to increase the number of unicorns, but to build enduring technology companies that generate high-value employment, create intellectual property, strengthen manufacturing and innovation ecosystems, and contribute significantly to India’s long-term economic growth. How academia should change the goal to be the real change makes for the realisation of Vikasit Bharat.

(Prof G D Yadav, Bhatnagar Fellow, Emeritus Professor of Eminence and former VC ICT Mumbai.)

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