खाजा और खाते ही जा

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सच्चिदानंद जोशी

दिल्ली। जब नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल का कर्टेन रेजर IIC दिल्ली में हुआ था उस दिन किसी ने मज़ाक में आयोजक गंगा कुमार जी से कहा था ” खाजा तो खिलाएंगे न!” उस दिन बहुत आश्चर्य हुआ था। भला खाजा में ऐसी कौन सी बात है कि साहित्य उत्सव की चर्चा में भी उसका जिक्र हो। ये बात तब समझ में आई जब नालंदा होते हुए राजगीर पहुंचे और रास्ते में ” खाजा तीर्थ सिलाव” के दर्शन हुए।

वैसे खाजा हमारे जीवन में कभी न कभी आ ही जाता है। ग्वालियर मेले में बचपन में खाया खाजा याद है। छतरपुर में थे तो मेला जलविहार के प्रवेश द्वार पर स्वागत ही खाजा की दुकानों से होता था। तब एक जाते समय और एक आते समय खाजा लेना अनिवार्य था। तब ऑइली, फैटी, ऐसा कुछ भी नहीं लगता था। फिर बंगाल का खाजा , ओडिशा का खाजा ,छत्तीसगढ़ का खाजा सभी तरह का खाजा खाने का सौभाग्य मिला। जिन लोगों को ये सौभाग्य न मिला हो वो जगन्नाथ जी का प्रसाद खाते हुए खाजा का भक्षण कर ही लेते हैं।

खाजा के इन्हीं संदर्भों का स्मरण करते हुए जब सिलाव में उतरे तो चकित रह गए। एक लाइन से खाजा की ही दुकानें थी। अलग अलग नाम और ब्रांड के साथ मीठा और नमकीन खाजा मिल रहा था । और तो और चाट के ठेलों पर भी गोलगप्पों के साथ खाजा के ढेर भी बराबरी से थे।

अकेले जाते तो किसी भी दुकान से खरीद लेते। लेकिन साथ में अनंत आशुतोष जी थे जो है तो पुरातत्वविद लेकिन खाजा में विशेषज्ञता रखते दिखाई दिए।

” हम लोग काली साह का खाजा लेंगे । वो जी आई टैग प्राप्त है। ” उन्होंने बताया और हम आश्चर्यचकित हो गए।खाजा को जी आई टैग मिला इसकी तो जानकारी भी नहीं थी। फिर वो बोले ” बिहार में इस एक ही मिठाई को मिला है।”

खोजबीन करने पर जानकारी मिली कि खाजा का इतिहास पुराना है और मौर्यकाल में भी इसका संदर्भ मिलता है। भगवान बुद्ध के काल में भी संदर्भ मिलता है। यानी खाजा का इतिहास पंद्रह सौ वर्ष पुराना है।इतिहास में और उलझते इससे पहले अनंत आशुतोष जी ने उबार लिया और बताया कि हमें रास्ते के दूसरी तरफ जाना है। जी आई टैग वाली असली दुकान उधर अंदर तरफ है। तब सामने देखा तो मजा ही आ गया ।अधिकांश दुकानों पर काली साह ही लिखा था। मुझे शेगांव की कचौरी की याद हो आई। पहले शर्मा जी की कचौरी प्रसिद्ध थी जिनका बोर्ड नीले रंग का होता था। अब शेगांव में अधिकतर दुकानों के बोर्ड नीले हैं और सब पर शर्मा जी का नाम लिखा है।


सामने गली के अंदर एक भव्य बिल्डिंग थी जिसके द्वार पर खाजा मॉल लिखा था। अंदर गए तो एक भी टुकड़ा खाजा का दिखाई नहीं दिया। अनंत जी ने दुकान के मालिक संजीव जी से बात की और उन्होंने कहा कि वे अंदर से माल निकलवाते हैं। यहां रखने से ठंड के कारण सीरा जम जाता था।

जब तक अंदर से माल आए संजीव जी चर्चा की और अपना खाजा ज्ञान बढ़ाया। मालूम पड़ा कि दिन में तीन से चार सौ किलो का माल जाता होगा। और ये सिर्फ भारत में ही नहीं विदेशों में जाता है। ऑनलाइन भी मंगवाया जा सकता है। एक दो पीस टेस्ट करवाए जो मुंह में रखते ही घुल गए। देखा कई परतों वाला खाजा खाने में एकदम हल्का था। पफ बिस्किट से भी ज्यादा हल्का और खस्ता। मालूम पड़ा कि इसका कच्चा माल बनाने की खास विधि है। सबसे बड़ी बात की सिलाव के पानी में खास विशेषता है। ये स्वाद कही और नहीं आएगा। बात करते करते देख तो संजीव की प्रतिकृति उनके जुड़वां भाई भी अवतरित हो गए। फिर दोनों भाइयों ने मिलकर खाजा से जुड़े कई मजेदार किस्से सुनाए।

हमने लालच में तीन डिब्बे पैक करवा लिए । सोचा कई दिन तक खाते रहेंगे। लेकिन खाजा खाने से स्पीड इतनी ज्यादा है कि उन्हें बच्चों के लिए , जो तीन दिन के लिए वाराणसी गए है , बचाना मुश्किल हो रहा है। बच्चे छोटे थे तो उन्हें डांट कर कहते थे जरा दूसरों के लिए भी बचाया करो। खाजा को लेकर ऐसी ही डांट खुद को लगाने की इच्छा हो रही है।

सोचा था ऑनलाइन खाजा मंगवाना सिर्फ एक रूमानी ख्वाब होगा लेकिन ये तो बहुत जल्दी हकीकत में तब्दील होता नज़र आ रहा है।

आज ही के दिन 140 साल पहले कांग्रेस का जन्म हुआ था…

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विष्णु शर्मा

दिल्ली: दिसम्बर 28, 2025: कांग्रेस बनाने का आइडिया जिस अंग्रेज के दिमाग में आया, उसको सभी जानते हैं-ए ओ ह्यूम, एक अंग्रेजी सिविल सर्विस ऑफिसर. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उसने 1857 की क्रांति के 215 सिपाहियों को मारा था और कइयों को फांसी पर चढ़ा दिया था. वह यूपी के इटावा का तो डीएम रहा ही था, आधुनिक भारत में पक्षियों की प्रजातियों पर सबसे बड़ा और सबसे पहला काम ह्यूम ने ही किया था. ह्यूम के पिता इंगलैंड के सांसद थे और संसद में भारत को लेकर ब्रिटिश सरकार की आलोचनाओं के लिए जाने जाते थे. लॉर्ड लिटन की जब ह्यूम ने आलोचना की, तो ह्यूम को भुगतना पड़ा और ह्यूम को सचिवालय से हटा दिया गया. अब ह्यूम ने सोचा कि अपने दूसरे शौक यानी पक्षियों की प्रजातियों की गणना को समय दिया जाए. शिमला के अपने घर में वो इसी काम में व्यस्त हो गया.

कहानी यही प्रचलित है कि अचानक जब कई मैन्युस्क्रिप्ट्स खो गईं तो ह्यूम का मन उचट गया और उसे अपने अब तक के काम को नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम, लंदन को दे दिया. अब तक ह्यूम ने इस्तीफा नहीं दिया था, वरना तीन चार साल बिना नौकरी के भारत में खर्च कैसे चलता, 1882 में ह्यूम को सेवा से मुक्त कर दिया गया. कहीं ना कहीं ह्यूम के मन में मौजूदा ब्रिटिश सरकार और उसके अधिकारियों के खिलाफ नाराजगी थी, ऐसे में ह्यूम ने अपने गुस्से को दूसरी तरफ मोड़ा. 1 मार्च 1983 को ह्यूम ने कलकत्ता यूनीवर्सिटी के छात्रों को पत्र लिखा और आव्हान किया कि भारत के लोगों का अपना कोई राष्ट्रीय संगठन होना चाहिए.

लेकिन सच्चाई एओ ह्यूम के जीवनीकार विलियम वेडरबर्न ने ह्यूम की आत्मकथा में लिखी, जो ह्यूम ने खुद उन्हें बताई थी, दिलचस्प बात है कि विलियम बेडरबर्न बाद में कांग्रेस अध्यक्ष भी बने थे. वेडरबर्न के मुताबिक ह्यूम के सूत्रों ने उन्हें अहम जानकारी दी थी, ये सूत्र थे देश भर में फैले फकीर, साधु, बैरागी जो देश भर में घूमते रहते थे, ऐसे में उन्हें देश के माहौल का पता होता था. उन्होंने बताया कि कैसे देश के आम जनमानस में 1857 से भी बड़ी क्रांति की योजना बन रही है. ह्यूम के शब्दों में, “The evidence that convinced me at the time, (about fifteen months, I think before Lord Lytton left) that we were in imminent danger of a terrible , was this. I was shown seven large volumes (corresponding to a certain mode of dividing the country, excluding Burmah, Assam, and some minor tracts) containing a vast number of entries; English abstracts or translations- longer or shorter- of vernacular report of communication of one kind or another, all arrange according to districts (not identical with ours), Sub-districts, sub-divisions, and the cities, towns and villages included in these”. ह्यूम का दावा था कि इस रिपोर्ट में 30,000 लोगों से भी अधिक से मिली सूचनाएं हैं.

ह्यूम ने आगे जो लिखा है, वो हिंदी में समझिए, उन्होंने लिखा कि, “गुप्त रूप से पुरानी तलवारें, भाले और तोड़ेदार बंदूकें एकत्र की जा रही हैं जो आवश्यकता पड़ने पर तैयार मिलेंगी. ऐसा कहा गया है कि अचानक हिंसा भड़केगी, चारों और अपराधों का बाजार गर्म हो जाएगा, अवांछित व्यक्तियों की हत्याएं होंगी, महजनों और बाजारों को दिन दहाड़े लूटा जाएगा, लोग तो इस समय अधनंगे, अधभूखे हैं हीं. ऐसी स्थिति में शुरूआती अपराध तो बड़े अपराधों के लिए संकेत मात्र होंगे. हो सकता है कि अराजकता फैल जाए और अधिकारियों व अभिजात्य वर्ग के लोगों का जीना ही दूभर हो जाए”. वो आगे लिखते हैं, “फिर इस शिक्षित समुदाय का एक छोटा सा वर्ग, जो इस समय शायद अकारण ही ब्रिटिश सरकार का विरोधी है, इस विद्रोह से जुड़ेगा, इसका नेतृत्व संभालेगा, आंदोलन में समन्वय स्थापित करेगा और राष्ट्रीय विद्रोह के रूप में उसका संचालन करेगा’.

ह्यूम को इन रिपोर्ट्स पर पूरा भरोसा था कि क्योंकि ये रिपोर्ट्स चेलों (शिष्यों) ने अपने गुरू को दी हैं, जो झूठ नहीं हो सकतीं. दरअसल अलग-अलग जगह से शिष्य अपने गुरूओं को उन क्षेत्रों की जानकारियां भेजते रहते थे, जहां का वो भ्रमण करते थे. इटावा का कलेक्टर रहते ह्यूम को संप्रेषण के इस साधन के बारे में जानकारी हुई थी, तभी वो ऐसे कई लोगों से सम्पर्क में रहता था. वेडरबर्न ने ह्यूम के हवाले से लिखा है कि, “All chelas are bound by vows and conditions, over and above those of ordinary initiates of low grade. No Chela would, I may almost say can deceive his Guru, in whom center all his hopes of advancement, no teacher will take on the chela cast off by another”. इससे साफ लगता है कि ह्यूम ने उस वक्त के सांधू, संन्यासी या बैरागियों की व्यवस्था को अच्छे से समझ लिया था.

खुद ह्यूम ने अपने जीवनीकार को बताया कि हमारे एक्शन से जो ताकतें उभर रही हैं, बढ़ रही हैं, उनको रोकने के लिए, ब्रिटिश साम्राज्य की अखंडता को बचाए-बनाए रखने के लिए सेफ्टी वॉल्व के तौर पर कांग्रेस से बेहतर कोई और उपाय था ही नहीं. ह्यूम के शब्दों में, “I have always admitted that in certain provinces and from certain points of view the movement was premature, but from the most vital point of view, the future maintenance of the integrity of the British Empire, the real question when the Congress started was, not, is it premature but us is too late- will the country now accept it?… A safety valve for the escape of great end growing forces, generated by our own action, was urgently needed, and no more efficacious safety valve than our Congress movement could possibly be devised”.

बात आगे बढ़ाने के लिए भारत में अंग्रेजी अधिकारियों को भी संतुष्ट करना जरूरी थी. लॉर्ड रिपन जाने से पहले नए वायसराय लॉर्ड डफरिन को कहकर गए थे कि भारत की वर्तमान परिस्थितियों को समझने के लिए एओ ह्यूम से मिलना बेहतर रहेगा. तब डफरिन ह्यूम से मिला. आरसी मजमूदार ने लिखा है कि पहले ह्यूम का विचार केवल सामाजिक संस्थाओं का मिलना था, लेकिन डफरिन ने कहा कि, ‘’ As the interests of the ruled that Indian politicians should meet yearly and point out to the Government in what respects the administration was defective and how it could be improved, and he added that an assembly such as he proposed should not be presided over by the Local Governor, for in, his presence the people might not like to speak out their minds”.

पूरी कहानी और भी दिलचस्प है, उसके लिए आपको ‘कांग्रेस प्रेसीडेंट्स फाइल्स’ पढ़नी पड़ेगी।

संघी मंत्री और भ्रष्ट लॉबी

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प्रवीण बागी

पटना। बिहार में एक उपमुख्यमंत्री हैं विजय कुमार सिन्हा। पीएम मोदी के प्रिय माने जाते हैं। तीखे तेवर और कड़क अंदाज के लिए हमेशा चर्चा में रहते हैं। अभी वे राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के मंत्री हैं। कमाऊं विभाग माना जाता है। विभाग में भ्रष्टाचार की दरिया बहती है। कर्मचारी, अमीन से लेकर अंचल ऑफिस में बैठे सीओ और उनके ऊपर बैठे अधिकारी दरिया में गोते लगाते रहते हैं। वैसे बिहार में कौन सा विभाग भ्रष्टाचार से अछूता है, यह बताना कठिन है। हां, कमाई की रकम में फर्क हो सकता है।

अब विजय सिन्हा साहब ठहरे ठेठ संघी। संघ की शाखा में दक्ष: -आरमह: करते -करते यहां तक पहुंचे हैं। उन्हें यह सब रास नहीं आता। उन्होंने फरमान सुना दिया कि ‘लटकाओ, भटकाओ फिर खींचो’ (नगदी) का फार्मूला नहीं चलेगा। आप सेवक हैं, स्वामी बनने की कोशिश न करें। विभाग का स्वामी मंत्री होता है और मंत्री का स्वामी जनता होती है। हमें जनता को जवाब देना होता है। इसलिए काम तेजी से करना है। घूस नहीं लेना है। जनता मालिक है, उसे परेशान नहीं करना है। जनता परेशान होगी तो आप भी परेशान हो जाइएगा।

कुल मिलकर मंत्री जी उलटी गंगा बहाना चाहते हैं। बताइये भला, यह भी कोई बात हुई ? जब सरकारी सेवक कमाई नहीं करेंगे तो सरकारी सेवा में आने का फायदा क्या ? दरमाहा से ज्यादा कमाई तो पान -गुटका की गुमटी लगाकर कमा सकते हैं ! अब मंत्री जी को कौन समझाए कि वेतन से भला घर चलता है ! वेतन तो पूर्णमासी के चांद की तरह होता है जबकि ऑफिस की कमाई सदा बहार होती है। इसी से पटना समेत बड़े महानगरों में महंगे फ्लैट, प्लाट, पत्नी के नखरे और फैशन, भारी गहने, लक्जरी गाड़ी और संतानों की अय्याशी सब कुछ चलता है। एक -एक कर्मचारी, सीओ और रजिस्टार की कमाई सुन लीजियेगा तो गश खा कर गिर जाइएगा !

मंत्री जी इसी को बंद करना चाहते हैं। वे इसे पाप समझते हैं। अब उन्हें कौन समझाए कि संत विनोबा भावे बहुत पहले कह गए हैं कि इस देश में भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया है। विनोबा जी के कहने पर अपने जेपी ने भूदान के लिए जीवनदान दे दिया था। उनकी एक अपील पर हजारों बिहारियों ने अपनी लाखों एकड़ जमीन दान कर दी थी। सिन्हा जी जमीनों का हिसाब -किताब रखनेवाले विभाग के ही मंत्री हैं। इसके बाद भी वे विनोबा जी की बात मैंने को तैयार नहीं हैं। भ्रष्टाचार को शिष्टाचार मानने के लिए तैयार नहीं हैं। घूस की रकम को पाप कहते हैं।

उन पर ‘पूरे विभाग को बदल डालूंगा’ की सनक सवार हो गई है। जिले- जिले घूम कर भूमि सुधार जन कल्याण संवाद शिविर लगाकर लोगों की समस्याएं सुन उनका ऑन स्पॉट निपटारा कर रहे हैं। लोग खुश हैं कि घूस न देने के कारण वर्षों से लटकी उनकी समस्याओं का तुरत निपटारा हो रहा है। लेकिन बाबू और साहब लोगों को मंत्री जी फूटी आंख नहीं सुहा रहे। क्योंकि उनकी कमाई नहीं हो रही है। पहले रोज जेब भर कर घर आते थे, अब खाली जेब, मुंह सुखाये हुए आना पड़ रहा है। और तो और जिसे डांट कर भगा देते थे, उसी के सामने खड़ा कर मंत्री जी घिग्घी बंधवा दे रहे हैं। इससे बड़ा अपमान और क्या होगा ? कमाई भी गई और रुआब भी गया। एक पीड़ा यह भी है कि ब्लॉक स्टॉफ की डेली प्रैक्टिस जस की तस है जबकि उनके लिए बोहनी होना भी कठिन हो गया है।

राजस्व सेवा संघ ने इस मुद्दे को बड़े संसदीय तरीके से मुख्यमंत्री तक पहुंचाया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लिखे पत्र में संघ ने इसे ‘तमाशाई शासन शैली’ और औपनिवेशिक काल की याद दिलाने वाला बताया है, जहां दंड प्रदर्शन को संवाद पर प्राथमिकता दी जाती थी। पत्र में कहा है कि विभागीय मंत्री के द्वारा सार्वजनिक मंचों से राजस्व सेवा के अधिकारियों के विरूद्ध अपमानजनक टिप्पणी किए जाने से विभाग की गरिमा को ठेस पहुंच रही है। हाल के दिनों में उप मुख्यमंत्री की टिप्पणी से संपूर्ण विभाग का उपहास हो रहा है। मंत्री तत्काल तालियों को तरजीह दे रहे हैं और अधिकारियों को मौके पर निलंबित करने की धमकी दे रहे हैं। यदि यह मॉडल उचित है तो इसे सभी विभागों पर लागू किया जाए। आज के दौर में सीओ पर जिम्मेदारियों का भारी बोझ है।

मतलब साफ़ है अधिकारी साफ साफ़ कह रहे हैं कि हमारी कमाई बंद होगी तो दूसरों की भी कमाई नहीं होनी चाहिए। यही मॉडल सभी विभागों पर लागू हो। उनकी बेशर्मी की हद देखिये कि काम के अधिक बोझ की दुहाई देकर वे रिश्वतखोरी को जायज ठहराने की चेष्टा कर रहे हैं।

मंत्री जी को यह समझना चाहिए कि साहब, बीबी और बच्चे दुखी होंगे तो उनकी आह निकलेगी। घूसखोरों की आह मजबूत से मजबूत सरकारों को भी बदल देती है। चारा घोटालेबाज अधिकारी मंत्री क्या मुख्यमंत्री तक को अपने इशारे पर नचाते थे। कांग्रेस काल में बिहार के एक अधिकारी एक्साइज किंग कहे जाते थे। एक्साइज विभाग के मंत्री उनकी राय से ही कोई काम करते थे। जो इधर उधर करते थे वे बदल दिए जाते थे।

विजय सिन्हा को यह इतिहास जान लेना चाहिए। उन्हें यह भी जान लेना चाहिए की बिहार के अधिकारी उनके मुख्यमंत्री के जिगर के टुकड़े की तरह हैं। जिगर के टुकड़ों के दर्द से कब उनका दिल द्रवित हो जाए और मंत्री जी का विभाग बदल दिया जाये यह कोई नहीं जनता।

बिहार में विवाहों में एक गीत गया जाता है -दूल्हा धीरे -धीरे चल ससुर गलिया। राजनीति में इस गीत के अलग मायने हैं। उन्हें समझ कर सतर्क रहने की जरुरत है। बहरहाल विजय सिन्हा ने ठोक कर कह दिया है कि वे गीदड़ भभकियों से डरनेवाले या किसी दबाव में आने वाले नहीं हैं। लड़ाई अभी जोर पकड़ेगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि भ्रष्टाचारियों की लॉबी जीतती है या मंत्री ?

मनरेगा की जगह ‘विकसित भारत-जी राम जी’ कानून सरकार क्यों चाहती है बदलाव, तार्किक वजहें और विवाद

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दिल्ली। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की आधारशिला रही महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) अब नए रूप में सामने आई है। राष्ट्रपति ने ‘विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025’ (जी राम जी कानून) को मंजूरी दे दी है। यह कानून मनरेगा की कमियों को दूर कर ग्रामीण विकास को नई दिशा देने वाला है।

ग्रामीण रोजगार योजनाओं का ऐतिहासिक सफर

स्वतंत्रता के बाद से ग्रामीण भारत में रोजगार और विकास के लिए कई योजनाएं आईं। 1960 के दशक में ग्रामीण श्रमशक्ति कार्यक्रम शुरू हुए। इसके बाद राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, जवाहर रोजगार योजना (1993), संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना और रोजगार आश्वासन योजना जैसी पहलें हुईं। 2005 में नरेगा लागू हुआ, जिसे 2009 में महात्मा गांधी का नाम जोड़कर मनरेगा बना दिया गया। हर 15-20 साल में इन योजनाओं की समीक्षा और बदलाव की परंपरा रही है, क्योंकि समाज, अर्थव्यवस्था और तकनीक बदलते रहते हैं।

मनरेगा की सफलताएं और सीमाएं

मनरेगा ने ग्रामीण गरीबी उन्मूलन, आय स्थिरता और बुनियादी ढांचा निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई। महिलाओं की भागीदारी 48% से बढ़कर 58% हुई, डिजिटल पेमेंट और जियो-टैगिंग से पारदर्शिता बढ़ी।
लेकिन समय के साथ कमियां उजागर हुईं-बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, मजदूरी भुगतान में देरी, फर्जी लाभार्थी, मशीनों का दुरुपयोग और टिकाऊ संपत्ति निर्माण की कमी। दस लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च होने के बावजूद अपेक्षित बुनियादी ढांचा नहीं बना।
महामारी के बाद कई परिवारों को पूरे 100 दिन काम भी नहीं मिला। योजना अल्पकालिक राहत तक सीमित रह गई, जबकि आज का ग्रामीण युवा विकसित भारत-2047 के बड़े सपनों से जुड़ा है।

बदलते भारत की नई जरूरतें

पिछले दो दशकों में ग्रामीण भारत बदल चुका है। निर्धनता दर 27.1% से घटकर 5.3% हो गई।
डिजिटल पहुंच, बेहतर कनेक्टिविटी और विविध आजीविका के अवसर बढ़े।
मिलेनियल्स, जेन जी और जेन अल्फा की नई पीढ़ी नई आकांक्षाएं रखती है।
2005 की मनरेगा अब 21वीं सदी के डिजिटल और एआई युग से पूरी तरह मेल नहीं खाती। पुरानी योजनाओं को आधुनिक परिवेश में ढालना जरूरी है।

जी राम जी कानून की मुख्य विशेषताएं

नया कानून रोजगार गारंटी को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करता है। कृषि चक्रों से तालमेल के लिए बोआई-कटाई के पीक सीजन में 60 दिनों की छुट्टी का प्रावधान है, जिससे मजदूर कृषि कार्य से अतिरिक्त आय कमा सकें।
कुल 185 दिन रोजगार की संभावना।
फोकस अल्पकालिक राहत से हटकर टिकाऊ विकास पर है।
चार स्पष्ट श्रेणियां तय की गईं: जल संरक्षण, आधारभूत संरचना, आजीविका और प्राकृतिक आपदा संबंधी कार्य।
सामग्री पर खर्च 40% से बढ़ाकर 50% किया गया। योजना निर्माण अब स्थानीय ग्राम समिति करेगी, न कि दिल्ली से।

भ्रष्टाचार और देरी पर लगाम

मनरेगा में भुगतान देरी और ठेकेदारों की शिकायतें आम थीं। जी राम जी में साप्ताहिक या पाक्षिक भुगतान अनिवार्य है, पूरी तरह डिजिटल माध्यम से।
बायोमीट्रिक अटेंडेंस, जियो-टैगिंग, रियल-टाइम डैशबोर्ड और एआई निगरानी से भ्रष्टाचार कम होगा।
प्रशासनिक खर्च 6% से बढ़ाकर 9% किया गया, ताकि बेहतर स्टाफिंग और ट्रेनिंग हो।
फंडिंग में पहाड़ी एवं पूर्वोत्तर राज्यों के लिए केंद्र का हिस्सा 90% और बाकी राज्यों में 60% रखा गया-जिससे राज्यों की जवाबदेही बढ़ेगी।

विवाद और विपक्ष के आरोप

विपक्ष इसे मनरेगा के अधिकार-आधारित ढांचे का अंत बता रहा है। कांग्रेस ने ‘राम’ नाम को राजनीतिक करार दिया और महात्मा गांधी की विरासत का अपमान बताया।
आरोप है कि बजट कैपिंग से योजना मांग-आधारित से सप्लाई-आधारित हो जाएगी, राज्य बोझ बढ़ने से लागू नहीं कर पाएंगे और पीक सीजन छुट्टी से मजदूरों की आय प्रभावित होगी।
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि संकट के समय मनरेगा लाइफलाइन थी, नया कानून उसकी ताकत कमजोर करता है।

नई ऊंचाइयों की ओर कदम?

जी राम जी कानून वित्तीय अनुशासन, तेज भुगतान, कृषि समन्वय और टिकाऊ विकास से ग्रामीण भारत को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।
यह विकसित भारत-2047 के विजन से जुड़ा है। नाम में ‘राम’ ईमानदारी और राम राज्य का प्रतीक है।
असली परीक्षा जमीनी कार्यान्वयन में होगी-क्या यह ग्रामीण युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा करेगा और मनरेगा से बेहतर साबित होगा? समय बताएगा।
फिलहाल, यह ग्रामीण नीति का बड़ा बदलाव है।

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