घरवापसी हिन्दू समाज का नैसर्गिक स्वभाव, पुरखों के घर लौट चलो

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मुरारी शरण शुक्ल

दिल्ली । पतितपावन सीताराम कहने का अर्थ ही है कि पतितों को पावन करने की व्यवस्था सनातन परिपाटी में थी। अग्नि, जल, वायु वस्तुओं को पवित्र कर देते हैं, तो तप का मार्ग मनुष्य की कलुषता और दूषण को नष्ट कर देता है। धर्म का मार्ग शोधन की क्षमता से युक्त होता है, इसीलिए यह धर्म धारण करने में समक्ष होता है। प्राचीनकाल के मानव-शोधन के अनेक प्रसंग शास्त्रों में उपलब्ध हैं, किन्तु आधुनिक काल में प्रथम प्रसंग चाणक्य द्वारा अपनाया गया प्रतीत होता है। सेल्यूकस अपनी यवन सेना की पराजय के उपरान्त अरस्तू की मानस विषकन्या कार्नेलिया को निहित यवन जय के उद्देश्य से युद्धक भेंट के रूप में चन्द्रगुप्त को सौंपता है। चाणक्य कार्नेलिया समेत उसके साथ आई उसकी सभी सहेलियों और सेवकों का शुद्धीकरण करते हैं, फिर राज्य में स्वीकार करते हैं। उन्होंने अल्पप्रमाण में बौद्धों का भी शोधन किया, जो बाद के काल में कुमारिल भट्ट जैसों के लिए पथप्रदर्शक बना।

जिस दिन प्रथम हिन्दू मतान्तरित हुआ, उसी दिन से हिन्दू अपने मतान्तरित बन्धुओं को वापस हिन्दू धर्म में लाने को सतत प्रयत्नशील हैं। तब न आर्य समाज था, न हिन्दू महासभा थी, न आरएसएस था, न विश्व हिन्दू परिषद की स्थापना हुई थी। जब कुमारिल भट्ट बौद्धों की हिन्दू धर्म में घर वापसी करा रहे थे, तब हिन्दू धर्म के उद्धार की पीड़ा से चीखती बनारस की बुजुर्ग महिला की हिन्दू बंधुओं के घर वापसी की करुण पुकार ही उनकी प्रेरणा थी। अर्थात् हमारा समाज तब भी घर वापसी को लेकर गम्भीर था। सामान्य नागरिक भी इन बातों को लेकर जागृत था। मार्ग ढूंढ रहा था।

आद्य शंकर के अभियानों के पीछे भी घर वापसी प्रमुख प्रेरणा थी। ईसा की द्वितीय, तृतीय शताब्दी से सन्तों द्वारा चलाए गए ग्रन्थ लेखन अभियान, ग्रन्थों का टीकाकरण अभियान, भक्ति जागरण अभियान मूलतः मतान्तरण रोकने और मतान्तरित हो चुके हिन्दुओं की घर वापसी के उपक्रम ही थे। ऋषि देवल सिन्ध में मुसलमान हो चुके हिन्दुओं की घर वापसी और मुसलामानों से अपवित्र हो चुके हिन्दुओं के शुद्धीकरण पर ग्रन्थ लिख रहे थे, तो हारीत मतान्तरण करने वालों को मुंहतोड़ प्रत्युत्तर देने के लिए बप्पा रावल को तैयार कर रहे थे। शस्त्र और शास्त्र, दोनों के मार्ग से निदान ढूंढा जा रहा था। यही सफलता दक्षिण में स्वामी विद्यारण्य भी प्राप्त करते हैं, जब मुसलमान हो चुके हरिहर और बुक्का को वापस हिन्दू बनाकर विजयनगर साम्राज्य की स्थापना करते हैं, जो यह कर्म उस सम्पूर्ण क्षेत्र में तीन सौ वर्षों तक मतान्तरण की संभावना समाप्त कर देता है।

मेघातिथि मनुस्मृति का भाष्य करते हुए आचार्य चाणक्य के विजय अभियानों के सूत्रों के तारतम्य मनु के प्रबन्धों से बैठाते हैं और घर वापसी का मार्ग हिन्दू समाज को बताते हैं। मलिन हो चुका हिन्दू, पतित हो चुका हिन्दू, अपवित्र हो चुका हिन्दू, म्लेच्छों के सन्सर्ग में आ चुका हिन्दू अनेक उपक्रमों से पवित्र हो सकता है। हिन्दू समाज ने पवित्रीकरण, शुद्धीकरण के अनेक मार्ग तलाश किए हैं, जिनके सहारे हिन्दुओं की घर वापसी सहज सम्भव है। हिन्दुओं की हर पूजा, कर्मकांड और साधना शुद्धीकरण के ही उपक्रम हैं, शुद्ध से शुद्धतम होते जाने के हेतु से। आधुनिक काल में स्वामी श्रद्धानन्द, सावरकर इत्यादि महापुरुषों ने भी इसका सत्यापन किया है। घर वापसी और शुद्धीकरण की तत्कालीन संकल्पना का ही प्रभाव था कि बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर अत्यन्त खिन्न होने के पश्चात् भी मुसलमान या ईसाई नहीं बने, बौद्ध धर्म अपनाया।

आयुर्वेद में मनुष्य की काया शुद्धि के न जाने कितने प्रकारों का वर्णन उपलब्ध है। आहार शुद्धि से काया शुद्धि तक की बात की गई है। कायाकल्प से लेकर कल्पवास तक का विवरण उपलब्ध है। उपवास और व्रत के अनेकानेक विवरण उपलब्ध हैं। चन्द्रायण व्रत से लेकर एकादशी तथा पूर्ण और अर्द्धदिवसीय उपवासों का भी विवरण उपलब्ध है। कफ, पित्त, वायु विकारों के शमन-शोधन, सप्तधातु और सप्तरसों के शोधन के प्रकार का भी विवरण है, तो नाड़ी शोधन की विधि का विवरण भी उपलब्ध है। मन की शुद्धि का विवरण तो शास्त्रों में भरा पड़ा है। मन की शुद्धि सभी पवित्रीकरण के प्रकारों में सर्वोत्तम माना गया है। कबीर ने भी संकेत किया है कि मन न रंगाये, रंगाये जोगी कपड़ा। पवित्रीकरण के बिना तो कोई यज्ञ या कर्मकांड आरम्भ ही नहीं होता। गंगाजल, पंचगव्य, शंखपानी, इत्यादि भी शुद्धीकरण के मार्ग हैं। तुलसी पत्ता भी संसर्ग मात्र से शुद्धि कर देता है। यज्ञ का धूम्र तो सहज शोधक है। तीर्थयात्रा और पवित्र नदियों में स्नान भी शुद्धीकरण के मार्ग हैं।

जल की शोधक क्षमता का वर्णन मिलता है। शंखपानी तो विवाह का महत्वपूर्ण शोधनकर्म है। उबटन और लेपन से भी शोधन होता है। अग्नि भी बहुत बड़ा शोधक है। अग्नि में दिव्य औषधियों को जलाकर उनका ताप और धूम्र लेने से भी सहज शोधन होता है। साधना के सभी प्रकार शोधन की ही विधियां हैं। वायु की शोधन क्षमता का व्यापक विमर्श साधना के क्रम में प्राणवायु के शोधन के अर्थ में किया जाता है। श्वास के साथ बीज मंत्रों का जप प्राण वायु को विस्तारित करता है, एक-एक चक्र खोलता है, कुंडलिनी जागृत करता है, ब्रह्मरंध्र का स्फोट करता है, सहस्त्रार भेदन करता है, तब कुछ भी शोधन शेष नहीं रहता। ध्वनि से भी शोधन होता है। शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म में मतान्तरित हिन्दुओं को जिन विद्याओं की ओर प्रवृत्त होकर समाजिक कलुषित व दूषित होता हुआ देखा, तो शंखध्वनि से समाज के शुद्धीकरण का विधान प्रस्तुत किया। आद्य शंकर ने कहा कि जहां तक शंख ध्वनि जाएगी, वहां तक के हिन्दुओं का स्वतः शुद्धीकरण हो जाएगा। मंत्रध्वनि, शंखध्वनि, ढोल, नगाड़े, वाद्ययंत्रों व शास्त्रीय संगीत का स्वर, मंदिर के घन्टे का नाद, निनाद तथा प्रणव नाद में समान शोधन क्षमता है।

इतना सब कुछ जानने वाला हिन्दू समाज मतान्तरित बन्धुओं को कभी भी घर वापसी सहज रूप में कराने में सक्षम है। मनुष्य कभी अपवित्र होता नहीं और दुर्योगवश यदि अपवित्र हो ही गया, तो स्थाई अपवित्रता कभी आती नहीं। डीएनए तक के शोधन का विज्ञान भारत के शास्त्रों में उपलब्ध है। कोशिका-अणु-परमाणु स्तर तक का शोधन सम्भव है। ऐसे में हिन्दू बन्धु-भगिनी की घर वापसी किसी भी क्षण, कभी भी संभव है। हमने भूमि शोधन किया है, जल शुद्धि, वायु शुद्धि, प्रकृति शुद्धि, जीव शुद्धि, यहां तक कि ब्रह्म तक की शुद्धि का विधान हिन्दू जानता है।

आवश्यकता है ज्ञात बातों के तार जोड़ने की। उनके सम्यक सदुपयोग की। इन्हीं बातों को समझकर हिन्दू समाज ने आरम्भ से अब तक सदा शुद्धीकरण अभियान चलाया है और अपने हिन्दू बन्धुओं की घर वापसी का प्रयत्न किया है। प्रयत्न कालान्तर में विभ्रम के कारण धीमा हो गया था। किन्तु समय-समय पर सन्तों, विद्वानों ने मार्गदर्शन किया, घर वापसी सुनिश्चित की। आज आवश्यकता है व्यापक घर वापसी के अभियानों की। घर वापसी के सन्दर्भों की जागरूकता आवश्यक है। इसके मार्ग का व्यापक ज्ञान सर्व समाज को होना आवश्यक है। साधारणतः ये बातें सब ओर प्रसारित होने से समाज अपना हल स्वतः निकाल लेगा।

जो मुसलमान या ईसाई बन गए हैं, उनका शोधन कर उन्हें कभी भी हिन्दू समाज में वापस लाया जा सकता है। उनकी शुद्धि की प्रक्रिया बहुत सहज, सरल व सर्वसुलभ है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के कालान्तर में मतान्तरित हो चुके ऐतिहासिक हिन्दू बंधुओं के व्यापक शुद्धीकरण की बात हिन्दू बन्धुओं को अब अवश्य सोचनी चाहिए।

पुरखों के बारे में जानने की जिज्ञासा आज पश्चिम एशिया और यूरोप के देशों में भी जागृत होने लगी है। उनकी यह जिज्ञासा उन्हें उनके सनातन मूल की ओर ले जा रही है। इससे कई देशों में ऑसम विदाउट अल्लाह और एथीस्ट होने, विदाउट फेथ, एक्स मुस्लिम इत्यादि के आन्दोलन चल पड़े हैं। नैसर्गिक धर्म का भान होते ही व्यक्ति सनातन धर्म की ओर मुड़ता है। बस आवश्यकता है सनातन मत के लोग अपनी धर्म धारणा के प्रति आग्रही बनें और अपनी विलक्षणताओं को जगत में प्रस्तुत करने की प्रयत्न श्रृंखला चलाएं। सबको सत्य-धर्म से अवगत कराकर आह्वान करें- आओ भारतवंशियों, पुरखों के घर लौट चलो। स्वधर्मे निधनं श्रेयः पर धर्मों भयावहः। पुरखों के धर्म में मरना भी श्रेष्ठकर्म है। अतः अपने पुरखों के धर्म में वापस आ जाओ।

(लेखक विश्व हिंदू के सहसम्पादक हैं)

एक आंदोलन है, एडिटर्स क्लब ऑफ इंडिया अमिताभ अग्निहोत्री

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नोएडा। एडिटर्स क्लब ऑफ इंडिया न केवल एक संगठन है, बल्कि एक मिशन है – एक आंदोलन है, जो मीडिया के सर्वोत्तम मानकों को फिर से स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। इस क्लब का हिस्सा होना केवल सम्मान की बात नहीं है, यह एक गहरी जिम्मेदारी है। और हम यह जिम्मेदारी पूरी सच्चाई और समर्पण के साथ निभाएंगे।

पत्रकारिता का इतिहास हमेशा संघर्ष और सत्य की खोज का इतिहास रहा है। आज के समय में जब हर तरह की चुनौती सामने है – चाहे वह राजनीति का दबाव हो, समाज की बढ़ती बुराइयाँ हों, या फिर बदलते हुए मीडिया परिदृश्य की जटिलताएँ – हम संपादकों को अपनी भूमिका को और भी सशक्त बनाने की आवश्यकता है। हमें यह समझने की जरूरत है कि पत्रकारिता सिर्फ एक पेशा नहीं है, यह समाज को सही दिशा देने और उसकी समस्याओं को उजागर करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।

एडिटर्स क्लब ऑफ़ इंडिया का उद्देश्य यही है कि हम अपने सामूहिक प्रयासों से पत्रकारिता को न सिर्फ बचाएं, बल्कि उसे एक नए आयाम तक पहुंचाएं। हम न केवल सत्य बोलने की कोशिश करेंगे, बल्कि उस सत्य को जोर-शोर से और पूरी ताकत से प्रस्तुत करेंगे, जिसे समाज की नज़र से छुपा दिया जाता है। हम समाज के हर वर्ग की आवाज़ बनेंगे, उन मुद्दों पर काम करेंगे जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, और सबसे बढ़कर, हम यह सुनिश्चित करेंगे कि पत्रकारिता का यह शंखनाद कभी रुके नहीं, कभी थमे नहीं।

हमारा संगठन एक मंच के रूप में कार्य करेगा, जहां देशभर के संपादक और पत्रकार आपस में विचार-विमर्श करेंगे, एक-दूसरे से सीखेंगे और सबसे बढ़कर, एक-दूसरे को सशक्त बनाएंगे। यह क्लब केवल एक नेटवर्क नहीं है, बल्कि यह एक परिवार है, जो पत्रकारिता की रक्षा करने के लिए एकजुट है। हम एक ऐसी पत्रकारिता की दिशा में काम करेंगे, जो समाज के हर तबके के लिए न्यायपूर्ण हो, जो अपने मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हो, और जो मीडिया की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को सर्वोपरि रखे।

हमारा रास्ता कठिन हो सकता है, और हम पर कई बार दबाव डाला जाएगा, लेकिन हम यह कभी नहीं भूलेंगे कि हम जिस रास्ते पर चल रहे हैं, वह सत्य का मार्ग है। हमें यह याद रखना होगा कि कोई भी सच्चाई जितनी कठिन होती है, वह उतनी ही शक्तिशाली भी होती है। हम सब मिलकर इसे साबित करेंगे।

हमारे क्लब का उद्देश्य केवल पत्रकारिता के सशक्तिकरण तक सीमित नहीं है। हम चाहते हैं कि हर संपादक को अपनी शक्ति का अहसास हो, और वह अपने प्रभाव से समाज की दिशा को बदलने की ताकत रखता हो। जब हम एकजुट होंगे, तब हम किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं, क्योंकि यह क्लब सिर्फ एक संगठन नहीं, बल्कि एक सोच, एक आंदोलन है।

आइए, हम सब मिलकर पत्रकारिता को एक नई दिशा दें और एक ऐसी मीडिया का निर्माण करें जो न केवल समाज को जागरूक करे, बल्कि उसे सशक्त भी बनाए।
(लेखक एडिटर्स क्लब ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष हैं)

अकबरुद्दीन या औरंगजेब, नाम में क्या रखा है

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पटना/ मुम्बई। नाम में क्या रखा है? एक नाम ही तो है, जो जन्म से मृत्यु तक हमारे साथ चिपका रहता है, फिर भी हम उसे लेकर इतना हो-हल्ला क्यों मचाते हैं?

इकबाद और सोनाक्षी सिन्हा के घर नन्हा मेहमान आने वाला है। सोशल मीडिया पर तुरंत दंगल शुरू हो गया—बच्चे का नाम तैमूर 2.0 रखेंगे या जहांगीर? कोई बोला औरंगजेब भी अच्छा रहेगा, क्योंकि “ट्रेंड में है”। लोग अभी से बच्चे को इतिहास की किताब में घुसेड़ने पर तुले हैं, जबकि बच्चा अभी अल्ट्रासाउंड में भी शायद ठीक से पोज नहीं दे पा रहा होगा।

अरे भाई, थोड़ा ठहरो। सोनाक्षी के अपने घर में देख लो। उनके पिता महान शत्रुघ्न सिन्हा हैं। बड़े भाई हैं लव सिन्हा और कुश सिन्हा। यानी घर में रामायण का पूरा सेट—राम नहीं, सिर्फ लव-कुश। राम तो कहीं नजर ही नहीं आते। फिर भी किसी ने कभी नहीं पूछा कि “अरे, राम का अपमान कर रहे हो क्या?” कोई ट्रोल आर्मी नहीं उतरी होकर नहीं आई कि “लव-कुश रख लिया, राम को भुला दिया!” घर में रामायण चल रही है, पर बिना राम के भी चल रही है। कोई बवाल नहीं, कोई फतवा नहीं, कोई ट्रेंडिंग हैशटैग नहीं।

तो फिर हम दूसरों के बच्चे के नाम पर क्यों कुदाल लेकर कूद पड़ते हैं? तैमूर रखा तो सैफ-करीना को गाली पड़ी। अब इकबाल-सोनाक्षी को पहले से ही चेतावनी दी जा रही है—नाम “सही” रखना वरना देख लेंगे। सही से मतलब? जो हमारी विचारधारा को सूट करे वही सही, बाकी सब गलत।
नाम सिर्फ एक पहचान है। वो बच्चे का अपना है, माँ-बाप का अधिकार है। अगर सोनाक्षी चाहें तो अपने बच्चे का नाम “शॉटगन जूनियर” भी रख सकती हैं—उनके पिता को तो अच्छा ही लगेगा। या अगर इकबाल चाहें तो ‘अकबरुद्दीन’ भी रख सकते हैं। हमें क्या? हम तो बस ट्रोल करने के लिए जी रहे हैं।
जब तक बच्चा खुद बड़ा होकर न कहे कि “मम्मी-पापा, ये नाम मुझे पसंद नहीं”, तब तक हम अपनी कुंठा अपने पास रखें। लव-कुश वाले घर में कोई बवाल नहीं हुआ, तो तैमूर या जहांगीर वाले घर में क्यों होना चाहिए?

खामोश!

नाम में सचमुच कुछ नहीं रखा। रखा है तो सिर्फ हमारी छोटी सोच। बच्चे को आने दो, नाम बाद में देख लेंगे। अभी तो बस दुआ करें—स्वस्थ आए, खुश रहे।

एक साल से ठप प्रेस काउंसिल: क्या बिना पत्रकारों के ‘मीडिया वॉचडॉग’ चल सकता है?

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नव ठाकुरिया

गुवाहाटी: देश में प्रेस स्वतंत्रता की निगरानी करने वाली वैधानिक संस्था प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) पिछले एक वर्ष से लगभग निष्क्रिय पड़ी है। 14वीं परिषद का कार्यकाल 5 अक्टूबर 2024 को समाप्त होने के बाद 15वीं परिषद का गठन लगातार बाधाओं में उलझा है। यह स्थिति विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है। केवल पाँच सदस्य, जबकि आवश्यक हैं 28 ।
1966 में प्रेस की स्वतंत्रता और मीडिया मानकों की रक्षा हेतु गठित PCI में आज केवल अध्यक्ष, सचिव और पाँच सदस्य काम कर रहे हैं—ये राज्यसभा, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, बार काउंसिल ऑफ इंडिया और साहित्य अकादमी का प्रतिनिधित्व करते हैं। जबकि पूरी परिषद में 28 सदस्य होने चाहिए, जिनमें 6 संपादक और 7 कार्यरत पत्रकार शामिल होते हैं।

3 दिसंबर को PCI अध्यक्ष न्यायमूर्ति रंजन प्रकाश देसाई (जिन्होंने 17 जून 2022 को पदभार संभाला) के कार्यकाल और 15वीं परिषद से जुड़ी सूचनाएँ मांगी गईं, पर कोई जवाब नहीं मिला। PCI वेबसाइट के अनुसार वर्तमान पाँच सदस्य 20 दिसंबर 2024 को नियुक्त हुए थे और इनका कार्यकाल तीन वर्ष का है।

पत्रकारों की नियुक्ति अदालत में लंबित
केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने स्वीकार किया है कि 15वीं परिषद के गठन की प्रक्रिया प्रगति पर है, लेकिन कार्यरत पत्रकारों और संपादकों की नियुक्ति न्यायालय में विचाराधीन होने के कारण यह अधर में है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला तीन सदस्यों—सम्बित पात्रा, नरेश म्हास्के और कालीचरण मुंडा—को नामित कर चुके हैं।

सूत्रों के अनुसार PCI अध्यक्ष का कार्यकाल 16 दिसंबर 2025 को समाप्त होगा। इससे पहले 13 दिसंबर को परिषद की पहली बैठक बुलाने की कोशिश है—लेकिन पत्रकार और संपादक इसमें शामिल नहीं होंगे।

यह गंभीर प्रश्न उठता है: क्या बिना पत्रकारों और संपादकों के कोई प्रेस काउंसिल प्रभावी रूप से काम कर सकती है, या “प्रेस” शब्द को नाम से हटाना ही बेहतर होगा?

PCI का महत्व और ऐतिहासिक भूमिका

PCI पहली बार 1966 में प्रेस काउंसिल अधिनियम 1965 के तहत गठित हुआ था। बाद में इसे 1978 के नए कानून के तहत पुनर्गठित किया गया। इस संस्था का उद्देश्य है—
* प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा
* समाचार पत्रों और एजेंसियों के मानकों में सुधार
भारत में आज अंग्रेज़ी सहित अनेक भाषाओं में लगभग 1 लाख प्रकाशन, 400+ सैटेलाइट न्यूज़ चैनल और हजारों डिजिटल प्लेटफॉर्म (पोर्टल, व्हाट्सऐप चैनल आदि) चल रहे हैं।

कोविड-19 के बाद प्रिंट मीडिया की आय में भारी गिरावट आई, लेकिन विशेषज्ञों का अनुमान है कि digital fatigue के कारण पाठक फिर से विश्वसनीय जानकारी के लिए प्रिंट की ओर लौट रहे हैं, और 2030 तक प्रिंट पाठकसंख्या दोगुनी हो सकती है।
पत्रकार संगठनों का विरोध क्यों?

कई संगठनों ने PCI के उस विवादित बदलाव का विरोध किया है जिसमें कहा गया कि सदस्य अब राष्ट्रीय पत्रकार यूनियनों के बजाय प्रेस क्लबों से चुने जाएँगे।

उनके तर्क: प्रेस क्लब सामाजिक–मनोरंजक गतिविधियों के केंद्र होते हैं इनमें गैर-पत्रकार सदस्य भी शामिल हो जाते हैं इनका अखिल भारतीय प्रतिनिधित्व नहीं होता इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन और ऑल इंडिया वर्किंग न्यूज कैमरामेन एसोसिएशन ने इस मुद्दे पर अदालत में याचिका दायर की है।

PCI की सीमाएँ — और बढ़ती जरूरत

PCI को केवल अख़बार, पत्रिका, समाचार एजेंसी पर कार्रवाई करने का अधिकार है। टीवी चैनल, रेडियो और हजारों डिजिटल प्लेटफॉर्म अभी PCI के दायरे से बाहर हैं—जबकि आज सबसे अधिक खबरें इन्हीं माध्यमों से प्रसारित होती हैं।

निष्कर्ष: समय आ गया है PCI को सशक्त और सक्रिय बनाने का
मीडिया इस समय आर्थिक, नैतिक और संरचनात्मक संकट से गुजर रहा है। ऐसे में PCI का निष्क्रिय होना प्रेस स्वतंत्रता के लिए बड़ा खतरा है।
आवश्यक है कि—

* 15वीं परिषद का गठन तुरंत पूरा हो
* पत्रकारों व संपादकों को शामिल किया जाए
* PCI के अधिकार क्षेत्र को डिजिटल–टीवी मीडिया तक बढ़ाया जाए
* संस्था की स्वायत्तता को मूर्त रूप दिया जाए
यही कदम भारत में स्वतंत्र, निष्पक्ष और जिम्मेदार मीडिया की रक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।

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