जगन्नाथ रथ यात्रा : उतार चढ़ाव, विध्वंस और पुनर्निर्माण से भरा इतिहास

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भुवनेश्वर : उड़ीसा प्राँत के पुरी में विश्व प्रसिद्ध रथोत्सव और जगन्नाथ रथयात्रा इस वर्ष 16 जुलाई से आरंभ हो रही है जो 24 जुलाई तक चलेगी जबकि रथोत्सव का समापन 27 जुलाई को होगा। यह रथोत्सव संपूर्ण भारत के एकत्व, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण भारत राष्ट्र के एकत्व और कुटुम्ब समन्वय का अद्भुत प्रतीक है।

उड़ीसा प्राँत के अंतर्गत पुरी का जगन्नाथ मंदिर ऐतिहासिक सांस्कृतिक, सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है। यहाँ प्रतिवर्ष जगन्नाथ रथ यात्रा और रथोत्सव का आयोजन होता है। इसमें देशभर से लाखों श्रृद्धालु दर्शन केलिये आते हैं। इस वर्ष यह रथयात्रा से 16 जुलाई से आरंभ हो रही है जो 24 जुलाई तक रहेगी। 25 जुलाई को भगवान जगन्नाथ जी की नीलाद्री बीजे मुख्य मंदिर में वापसी होगी और 27 जुलाई से दर्शन आरंभ होंगे

माना जाता है कि पुरी मंदिर का निर्माण दो सौ वर्ष ईसा पूर्व हुआ था। आदि शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित चार धर्म पीठों में एक पीठ पुरी में भी स्थापित है। यह ऋग्वेदी पीठ है और गोवर्धन मठ के नाम से जानी जाती है। यहाँ विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ जी मंदिर स्थापित है और रथयात्रा का केन्द्र भी। इस मंदिर में जगन्नाथजी के रूप में भगवान कृष्ण, उनके बड़े भ्राता बलभद्रजी और बहन सुभद्रा जी की प्रतिमा स्थापित हैं। भगवान जगन्नाथजी, बलभद्रजी और सुभद्राजी प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया को तीन रथों में सवार होकर गुन्डिचा मंदिर जाते हैं। यह मंदिर यहाँ से तीन किलोमीटर दूर है। वहाँ कुछ दिन रुककर आषाढ़ शुक्ल पक्ष दसवीं को लौटते हैं। इस वर्ष यह तिथि सोलह जुलाई है। यात्रा केलिए भगवान जगन्नाथ जी नंदीघोष नामक रथ में विराजमान होंगे । उनकी ध्वजा का नाम त्रैलोक्य मोहिनी है। इस रथ का रंग हल्का लाल पीला होता है । इसमें 16 पहिए होते हैं। रथ की ऊंचाई 44.2 फीट होती है । बलभद्र जी के रथ की ध्वजा ताल ध्वज है। इस रथ की ऊंचाई 43.2 फीट होती है। इसमें 14 पहिये होते हैं। सुभद्रा जी का रथ 42 फीट ऊंचा होता है। इस रथकी ध्वजा का नाम दर्प दलन है। सबसे आगे बलभद्र जी का रथ, उनके पीछे सुभद्रा जी का रथ और फिर भगवान जगन्नाथ जी का रथ होता है। रथ के सारथी दारूक और द्वारपाल जय विजय होते हैं जबकि संरक्षक गरुढ़ जी हैं। इन रथों को 50 मीटर लंबी रस्सियों द्वारा हाथ से खींचा जाता है । रथ खींचने केलिये मानों स्पर्धा हो जाती है । वहाँ उपस्थित लाखों श्रृद्धालुओं में सभी रथ खींचकर पुण्य लाभ लेना चाहते हैं। सबसे पहले बलराम जी का रथ खींचा जाता है, फिर देवी सुभद्रा का और फिर भगवान जगन्नाथ का रथ होता है ।

पर्यावरण संरक्षण और लोक कला की महत्ता

रथोत्सव और रथ यात्रा में एक सबसे बड़ी विशेषता पर्यावरण संरक्षण और लोक कला की महत्ता का है। रथयात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया से आरंभ होती है। यात्रा केलिये प्रतिवर्ष नये रथ बनाये जाते हैं इसके लिये नरियल और नीम की लकड़ी का उपयोग होता है। इन रथों के निर्माण केलिये आधुनिक मशीनों का उपयोग नहीं होता। इसका निर्माण स्थानीय लोक कलाकार अपनी परंपरागत कला शैली से तैयार करते हैं। रथ लकड़ी के बनाये जाते हैं। इसके लिये लकड़ियाँ पेड़ से नहीं काटी जाती बल्कि संग्रहीत की जाती हैं। विशेषकर वे लकड़ियाँ संग्रहीत की जातीं हैं जो समुद्र से बहकर आती हैं अथवा सूख जाने पर पेड़ों से गिर जाती हैं। रथों का निर्माण में धातु का कोई उपयोग नहीं होता। केवल संग्रहीत लकड़ियों का ही होता है। यह पर्यावरण की सुरक्षा का अद्भुत संदेश है। इसी प्रकार मशीनों के बजाय स्थानीय कारीगर और कलाकारों की सहभागिता भारतीय लोक परंपरा को सजीव रखने का अद्भुत प्रयास है। यात्रा आरंभ होने से पहले रथ के आगे राजा झाड़ू लगाते हैं। उनके साथ राजपुरोहित और सबर जनजाति समाज के मुखिया होते हैं। अर्थात झाड़ू लगाने में राजा, राजपुरोहित और जनजातीय समाज सम्मिलित है तो सामाजिक समरसता का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा।

पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार यह सबर भील जनजाति बाहुल्य क्षेत्र रहा है। प्राचीनकाल में उसके मुखिया विश्ववसु थे । वे भगवान नील माधव के उपासक थे। प्रतिदिन भक्तिभाव से उपासना करते थे । भगवान नील माधव ने एक रात राजा इन्द्रधुन्म को स्वप्न में मंदिर बनाने को कहा। राजा ने अपने पुरोहित विद्यापति को मूर्ति लाने को कहा। पुरोहित विद्यापति ने सबर जनजाति के मुखिया विश्ववसु की पुत्री से विवाह कर लिया । परिवार का विश्वास जीतकर मूर्ति ले जाकर राजा को दे दी । भगवान की मूर्ति चोरी हो जाने से विश्ववसु बहुत दुखी हुआ। उसने अन्न त्याग दिया। भगवान स्वयं चलकर वापस आ गये। तब भगवान जी ने राजा को दोबारा स्वप्न दिया और समुद्र में द्वारिका से बहकर आने वाली लकड़ी से बनवाने को कहा। उन्होंने पुरी के समन्दर लकड़ी संग्रहीत की। विश्वकर्मा जी स्वयं मूर्ति बनाने आये। वे द्वार बंद करके मूर्ति बनाने लगे। उन्होंने इक्कीस दिन तक कार्य किया और अंतर्ध्यान हो गये। तब वे मूर्तियाँ उसी रूप में स्थापित कर दी गईं। रथयात्रा से पूर्व भगवान जगन्नाथ जी पन्द्रह दिन अज्ञातवास में रहते हैं। यह माना जाता है कि वे अस्वस्थ्य हो गये थे और उपचार करा रहे थे। स्वस्थ होकर ही भगवान जगन्नाथ जी यात्रा पर निकलते हैं। यह यात्रा में सहभागी होने केलिये देश विदेश से लाखों लोग एकत्र होते हैं। यह यात्रा पूरे राजसी वैभव से निकाली जाती है ।

परिवार, समाज और राष्ट्रीय एकत्व की प्रतीक

भारत के समस्त तीज त्यौहार और उत्सव परंपराओं व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र निर्माण का संकेत होता है । पुरी में आयोजित भगवान जगन्नाथ जी की रथयात्रा में भी यही संदेश है। पुरी के राजा, पुरोहित और सबर जनजातीय समाज के लोग इस यात्रा का शुभारंभ करते हैं। राजा स्वयं रथ के आगे झाड़ू लगाते हैं। राजा का झाड़ू लगाना और उनके साथ पुरोहित एवं सबर भील जनजातीय मुखिया का साथ होना भारतीय समाज की समरसता का प्रतीक है । भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर में सबर भील जनजातीय समाज के पुजारी भी होते हैं। मंदिर की दूसरी विशेषता है कि इसके सेवादारों में सभी प्रांतों और भाषा भाषी लोग हैं। भगवान श्रीकृष्ण ही यहाँ नीलमाधव और जगन्नाथजी के रूप में विराजे हैं। उनका जन्मस्थान मथुरा और उनकी नगरी द्वारिका है । मान्यता है कि पहली बार जब भगवान जगन्नाथ जी की काष्ठ प्रतिमा बनाई गई थी वह द्वारिका से ही समुद्र में बहकर आई थी। यदि पुरी भारत के एक छोर पर है तो द्वारिका बिल्कुल दूसरे छोर पर। मंदिर में देवि सुभद्रा की प्रतिमा भी है। सुभद्राजी भगवान श्रीकृष्ण जी बहन हैं जो हस्तिनापुर ब्याही हैं। हस्तिनापुर आज का दिल्ली महानगर है। तीसरी यहाँ विभीषण द्वारा भगवान जगन्नाथजी की आराधना करने का स्थल भी है। विभीषण श्रीलंका के राजा थे। दिल्ली एक ओर एवं श्रीलंका भारत के दूसरे छोर पर है। यह स्थिति द्वारिका और पुरी में है। अर्थात जगन्नाथ पुरी मंदिर और रथोत्सव में जहाँ समाज के सभी समूहों की सहभागिता है उसी प्रकार पूरे भारत का दर्शन है। मंदिर में भगवान जगन्नाथ जी के बड़े भ्राता बलभद्र जी और बहन सुभद्रा जी हैं। यह परिवार समन्वय का संदेश है।

विध्वंस और पुनर्निर्माण का इतिहास

मंदिर यदि ऐतिहासिक है तो इसपर हमलों और इसके विध्वंस का इतिहास भी बहुत लंबा है । संभवतः अयोध्या में विध्वंस और पुनर्निर्माण के संघर्ष केशबाद दूसरा बड़ा संघर्ष पुरी में ही हुआ । भगवान जगन्नाथ मंदिर पर पहला हमला 1340 में हुआ । तब उड़ीसा का नाम उत्कल प्रदेश था । तब बंगाल के सुल्तान इलियास शाह ने भारी सेना के साथ जोरदार हमला बोला । राजा नरसिंह देव तृतीय ने हमले का मुकाबला तो किया पर मंदिर की रक्षा न हो सकी । आक्रमणकारियों ने मंदिर परिसर में सामूहिक नरसंहार किया और विध्वंस भी । राजा नरसिंह देव, और पुरोहितों ने जगन्नाथ की मूर्तियों को छुपा दिया था। इसलिये मूर्तियाँ सुरक्षित रहीं। लूटपाट करके हमलावरों के लौट जाने के बाद मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ और मूर्तियाँ पुनर्प्रतिठित कर दी गई।

मंदिर पर दूसरा हमला 1360 में दिल्ली के सुल्तान फिरोज शाह तुगलक ने किया। तीसरा हमला वर्ष 1509 में बंगाल के सुल्तान अलाउद्दीन हुसैन शाह के कमांडर इस्माइल गाजी ने किया। तब ओडिशा में राजा रुद्रदेव प्रताप का शासन था। इस बार पुजारियों ने मंदार की मूर्तियों को बंगाल की खाड़ी में चिल्का झील क्षेत्र में छुपा दिया था। जगन्नाथ मंदिर पर चौथा हमला अफगानी लुटेरे काला पहाड़ ने किया था । यह भीषण हमला वर्ष 1568 में हुआ था और जगन्नाथ मंदिर के विध्वस्त के साथ मूर्तियों को भी जलाकर नष्ट कर दिया था। इस युद्ध के बाद ओडिशा सीधे इस्लामिक शासन के अंतर्गत आ गया था। पांचवां हमला 1592 में हुआ। ये हमला सुल्तान की ओर से कुथू खान और सुलेमान खान ने किया था। भक्तों और पुजारियों ने मंदिर की रक्षा करने का संघर्ष किया पर मंदिर ध्वस्त हुआ ।

 

सामूहिक नरसंहार हुआ और मूर्तियों को खंडित कर लूटपाट हुई। छठा हमला 1601 में बंगाल के नवाब इस्लाम खान के कमांडर मिर्जा खुर्रम द्वारा, सातवां हमला सूबेदार हाशिम खान द्वारा हुआ। इसके बाद चार बार स्थानीय शासक सेनापतियों ने मंदिर के पुनर्निर्माण कार्य को ध्वस्त किया। मंदिर पर एक बड़ा हमला 1611 में मुगल बादशाह अकबर की सेना ने किया। इसमें अकबर के दरबारी राजा टोडरमल के बेटा कल्याणमल भी शामिल था।1617 में दिल्ली के बादशाह जहांगीर के सेनापति मुकर्रम खान ने, वर्ष 1621 में मुगल गवर्नर मिर्जा अहमद बेग ने किया। मुगल बादशाह शाहजहां ने एक बार ओडिशा का दौरा किया था तब भी पुजारियों ने मूर्तियों को छुपा दिया था। वर्ष 1641 में ओडिशा के मुगल गवर्नर मिर्जा मक्की ने मंदिर परिसर पर धावा बोला और और पुनर्निर्माण के कार्यों को ध्वस्त किया। मिर्जा मक्की ने दो बार मंदिर पुनर्निर्माण कार्य को ध्वस्त किया था। अगला हमला भी फतेह खान ने किया था । मंदिर पर काला पहाड़ की भाँति सबसे भीषण हमला बादशाह औरंगजेब के आदेश पर वर्ष 1692 में हुआ। औरंगजेब ने मंदिर को पूरी तरह ध्वस्त करके इसे सैन्य छावनी बनाने का आदेश दिया ।

 

तब मुगलों की ओर से ओडिशा इकराम खान किलेदार था । मुगलों के तुकी खान ने 1699 में मंदिर परिसर के सभी सनातन चिन्हों को नष्ट किया या उन्हें रूपांतरित करके पूर्ण रूप से सैन्य छावनी में बदल दिया था । मुगलो के पतन और मराठा शक्ति के उदय के बाद मंदिर का पुनर्निर्माण आरंभ हुआ । समय के साथ परिसर खाली हुआ और मंदिर पुनः अपने अस्तित्व में आया । वर्तमान मंदिर को उसका स्वरूप देने का कार्य इंदौर की रानी अहिल्याबाई ने आरंभ किया और समय के साथ अपना आकार ले सका ।

सामाजिक समरसता का उत्सव जगन्नाथ रथयात्रा

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आचार्य ललित मुनि

भुवनेश्वर : भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में ऐसे अनेक पर्व हैं जो केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं हैं, बल्कि समाज को जोड़ने वाले जीवंत लोक उत्सव भी हैं। भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा ऐसा ही एक महापर्व है, जिसने सदियों से सामाजिक समरसता, लोक सहभागिता और सांस्कृतिक एकात्मता का संदेश दिया है। यह उत्सव केवल ओडिशा के पुरी तक सीमित नहीं है, बल्कि महानदी के उद्गम क्षेत्र से लेकर उसके महोदधि में विलय तक फैले विस्तृत भूभाग में लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा के अनेक नगरों और ग्रामों में निकलने वाली रथयात्राएं इस साझा सांस्कृतिक विरासत की सशक्त अभिव्यक्ति हैं।

भगवान जगन्नाथ की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सर्वसमावेशी अवधारणा है। जगन्नाथ किसी एक वर्ग, जाति अथवा संप्रदाय के देवता नहीं हैं। उनके मंदिर और उनकी परंपराएं भारतीय समाज की विविधता को एक सूत्र में बांधती हैं। यही कारण है कि रथयात्रा के अवसर पर समाज के सभी वर्ग बिना किसी भेदभाव के एक साथ उपस्थित होते हैं। रथ की रस्सी खींचना केवल धार्मिक कार्य नहीं माना जाता, बल्कि यह समानता और सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। राजा से लेकर सामान्य नागरिक तक सभी एक ही रस्सी को पकड़कर भगवान के रथ को आगे बढ़ाते हैं। यह दृश्य भारतीय समाज में समानता के आदर्श का सजीव उदाहरण प्रस्तुत करता है।

पुरी की रथयात्रा का उल्लेख अनेक ऐतिहासिक स्रोतों और यात्रावृत्तांतों में मिलता है। इतिहासकारों के अनुसार बारहवीं शताब्दी में गंग वंश के शासनकाल में वर्तमान श्रीमंदिर का निर्माण हुआ और इसके साथ रथयात्रा की परंपरा अधिक व्यवस्थित स्वरूप में विकसित हुई। हालांकि भगवान जगन्नाथ की उपासना इससे भी प्राचीन मानी जाती है तथा इसमें आदिवासी, लोक और वैदिक परंपराओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। विद्वान हरमन कुल्के तथा गोपीनाथ महापात्र ने अपने शोध कार्यों में जगन्नाथ परंपरा को भारतीय सांस्कृतिक समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण बताया है।

रथयात्रा की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक विशेषता यह है कि इस दिन भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों के बीच आते हैं। सामान्यतः मंदिरों में श्रद्धालु देवदर्शन के लिए जाते हैं, किंतु इस उत्सव में भगवान नगर भ्रमण करते हैं। यह परंपरा इस विचार को पुष्ट करती है कि ईश्वर केवल मंदिर की सीमाओं में नहीं, बल्कि समस्त समाज के हैं। जो लोग किसी कारणवश मंदिर नहीं पहुंच सकते, वे भी भगवान के दर्शन कर सकते हैं। इस दृष्टि से रथयात्रा सामाजिक समावेशन का अनूठा प्रतीक है।

इस महापर्व की एक अन्य महत्वपूर्ण परंपरा “छेरा पहरा” है। इसमें गजपति महाराज स्वर्ण झाड़ू से भगवान के रथ के चारों ओर सफाई करते हैं। भारतीय राजसत्ता के इतिहास में यह परंपरा अत्यंत विशिष्ट है क्योंकि यहां राजा स्वयं को भगवान का सेवक घोषित करता है। इससे समाज में यह संदेश जाता है कि सेवा सबसे बड़ा धर्म है और पद अथवा प्रतिष्ठा से ऊपर मानवता का मूल्य है। सामाजिक समरसता की दृष्टि से यह परंपरा अत्यंत प्रेरणादायक है।

महानदी के प्रवाह क्षेत्र में रथयात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं रही, बल्कि सांस्कृतिक आदान प्रदान का माध्यम भी बनी। छत्तीसगढ़ के रायपुर, महासमुंद, धमतरी, आरंग, सिरपुर, राजिम, जांजगीर, चांपा, रायगढ़, सरायपाली तथा अनेक कस्बों और गांवों में वर्षों से रथयात्रा का आयोजन होता आ रहा है। इन आयोजनों में स्थानीय लोककलाएं, भजन मंडलियां, लोकनृत्य, पारंपरिक वाद्य यंत्र और सामुदायिक सहभागिता इस उत्सव को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि जगन्नाथ संस्कृति ने स्थानीय परंपराओं को आत्मसात करते हुए समाज में सांस्कृतिक एकता को मजबूत किया है।

जगन्नाथ संस्कृति का एक अनूठा और जीवंत स्वरूप बस्तर के गोंचा पर्व में भी दिखाई देता है। आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से प्रारंभ होने वाला यह महोत्सव भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का स्थानीय रूप है, जिसने बस्तर की जनजातीय संस्कृति के साथ अद्भुत समन्वय स्थापित किया है। जगदलपुर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की रथयात्रा के साथ आरंभ होने वाले इस पर्व की सबसे विशिष्ट पहचान तुपकी और गोंचा है। तुपकी बांस से निर्मित पारंपरिक खिलौना बंदूक होती है, जिससे गोंचा नामक वनफल को प्रतीकात्मक रूप से चलाया जाता है।

यह परंपरा उत्सव, उल्लास और लोक सहभागिता का प्रतीक है। इस पर्व में जनजातीय समाज, राजपरिवार, ग्रामीण और शहरी समुदाय सहित सभी वर्गों के लोग समान उत्साह से भाग लेते हैं। सामाजिक भेदभाव से परे सामूहिक सहभागिता, लोककला, लोकसंगीत और पारंपरिक खेलों का यह संगम गोंचा पर्व को सामाजिक समरसता का अद्वितीय उदाहरण बनाता है। यह पर्व इस बात का प्रमाण है कि जगन्नाथ संस्कृति ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में स्थानीय परंपराओं को आत्मसात करते हुए अपनी मूल भावना, समानता, सेवा और सामाजिक एकता को अक्षुण्ण बनाए रखा है।

रथयात्रा का आर्थिक और सामाजिक पक्ष भी उल्लेखनीय है। इस अवसर पर स्थानीय कारीगर, बढ़ई, चित्रकार, वस्त्र निर्माता, मृद्भांड शिल्पी, प्रसाद बनाने वाले परिवार तथा लोक कलाकार सभी इस उत्सव से जुड़े रहते हैं। रथ निर्माण में विशिष्ट प्रकार की लकड़ी, पारंपरिक शिल्पकला और सामूहिक श्रम का उपयोग होता है। इससे परंपरागत ज्ञान का संरक्षण भी होता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिलती है। यह उत्सव केवल आस्था का नहीं, बल्कि लोकजीवन की आर्थिक संरचना का भी महत्वपूर्ण आधार है।

रथयात्रा सामाजिक समरसता का संदेश इसलिए भी देती है क्योंकि इसमें जातीय और सामाजिक विभाजनों का प्रभाव नगण्य दिखाई देता है। भगवान के महाप्रसाद को सभी लोग समान रूप से ग्रहण करते हैं। पुरी की आनंद बाजार परंपरा इस समावेशी दृष्टिकोण का उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां महाप्रसाद को किसी भी प्रकार के सामाजिक भेदभाव से परे माना जाता है। भारतीय समाज में समान भोजन और समान सहभागिता सदैव सामाजिक समरसता के महत्वपूर्ण आधार रहे हैं।

वर्तमान समय में जब समाज अनेक प्रकार के वैचारिक, सामाजिक और आर्थिक विभाजनों का सामना कर रहा है, तब रथयात्रा का संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है। यह पर्व बताता है कि समाज की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। अलग अलग भाषाएं, लोक परंपराएं, रीति रिवाज और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां मिलकर ही भारत की समृद्ध सांस्कृतिक पहचान का निर्माण करती हैं। महानदी से महोदधि तक फैली जगन्नाथ परंपरा इस सांस्कृतिक एकात्मता का जीवंत उदाहरण है।

रथयात्रा हमें यह भी सिखाती है कि परंपराएं तभी जीवित रहती हैं जब उनमें समाज की सक्रिय भागीदारी बनी रहे। यही कारण है कि यह उत्सव सदियों बाद भी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जन जन का उत्सव बना हुआ है। इसमें आस्था है, लोकजीवन है, सेवा है, समानता है और सांस्कृतिक निरंतरता का अद्भुत भाव है। यही विशेषताएं इसे सामाजिक समरसता के सबसे महत्वपूर्ण भारतीय उत्सवों में स्थान दिलाती हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं)

From Joint Families to Nuclear Families: Is India Losing Its Cultural Strength?

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Kailash Chandra

Raipur: One of the greatest strengths of the Indian family system is that children do not grow up only with their parents but also with grandparents, siblings, cousins, uncles, aunts, and other family members. In a joint family, children learn the art of living together long before they enter the outside world. When three or four children eat together, play together, share their toys, take care of one another, quarrel, reconcile, and celebrate together, they naturally acquire the values of social living without any formal instruction. They learn that life is not merely about fulfilling personal desires but also about respecting the feelings, needs, and aspirations of others. The family becomes their first classroom, teaching cooperation, tolerance, sacrifice, patience, discipline, responsibility, and mutual dependence.

In such an environment, affection, emotional bonding, belongingness, and the joy of sharing develop naturally. Living together, working together, sharing meals, and standing beside one another during happiness and adversity become everyday habits rather than moral lessons. These experiences gradually shape an individual’s character and lay the foundation of social harmony, mutual trust, peaceful coexistence, and national integration. In this sense, the family is not merely a biological institution but the first school where responsible citizens and compassionate human beings are nurtured.

India’s civilization can never be understood merely through its geography, political institutions, or economic achievements. At its heart lies a unique civilizational framework built upon family, tradition, values, and the continuity of generations. For centuries, the Indian family has been far more than a household consisting of parents and children. It has served as an institution where moral values, discipline, social responsibility, respect for relationships, and cultural traditions are transmitted from one generation to another. This is why the Indian family has always been regarded as the living foundation of Indian civilization.

Today, however, this foundation is passing through a period of profound transition. Joint families are steadily giving way to nuclear families. Urbanization, employment-driven migration, consumerism, individual aspirations, and changing lifestyles have transformed the structure of family life. This transformation is not merely a change in living arrangements; it has far-reaching implications for India’s cultural continuity and the emotional bonds that connect generations. Therefore, the real question is not whether joint families are superior to nuclear families, but whether India is gradually losing one of its greatest civilizational strengths.

Traditionally, a joint family represented much more than several people living under one roof. It was a way of life rooted in collective responsibility and shared existence. Grandparents contributed wisdom, parents provided leadership and care, uncles and aunts offered support, and children grew up amidst affection, guidance, and security. Difficulties were shared, responsibilities were distributed, and decisions benefited from collective experience. Children naturally learned cooperation, empathy, patience, and the importance of community. The joint family taught that life is not merely about rights, but equally about duties, discipline, and coexistence.
The emergence of the nuclear family, on the other hand, is largely a consequence of modern economic realities. Professional mobility, urban living, limited housing, and the desire for privacy have made nuclear families increasingly common. Undoubtedly, they offer several practical advantages, including greater independence, quicker decision-making, financial flexibility, and personal privacy. Yet, when detached from India’s cultural ethos, the nuclear family often risks becoming merely an efficient living arrangement rather than a centre of value formation. As a result, parents experience increasing psychological and financial pressure, children often receive limited exposure to intergenerational relationships, and elderly family members frequently face loneliness and neglect.

This is where the cultural strength of the Indian family becomes particularly significant. Its true strength has never depended upon its size but upon its value system. It is within the family that children first learn respect for elders, care for younger members, hospitality toward guests, reverence for food, celebration of festivals, patience during adversity, and the ability to place collective welfare above personal interest.

Schools may impart knowledge, governments may guarantee rights, and markets may provide material comforts, but it is the family that shapes character, emotional intelligence, and moral responsibility.
Another remarkable feature of the Indian family system has been its ability to maintain meaningful relationships across generations. Grandparents are not merely elderly relatives; they are living repositories of experience, cultural memory, ethical wisdom, and spiritual traditions. Parents represent responsibility and productive engagement with society, while children symbolize hope and the future. When these three generations remain connected, the family becomes much more than a place of residence—it becomes a living tradition that preserves and renews civilization itself.

One of the greatest challenges of contemporary India is the gradual weakening of intergenerational dialogue. Children increasingly inhabit the digital world, young adults remain overwhelmed by professional competition, and many elderly people feel marginalized even within the homes they helped build. Shared meals are becoming less frequent, family conversations are diminishing, storytelling traditions are disappearing, and cultural memory is fading. The consequences extend far beyond loneliness among senior citizens; younger generations risk losing their connection with their civilizational roots, inherited values, and collective identity.

At the same time, it would be simplistic to romanticize every joint family or dismiss every nuclear family. Not every joint family has been harmonious, nor is every nuclear family deficient. Joint families have also experienced conflicts related to property, authority, and interpersonal tensions. Likewise, many nuclear families successfully preserve strong moral values, emotional warmth, and close ties with their extended relatives. Therefore, the essential issue is not the external structure of the family but its inner spirit. A joint family without affection, respect, dialogue, and responsibility becomes merely a crowd. Conversely, a nuclear family that nurtures respect for elders, meaningful relationships, cultural traditions, and regular interaction with the extended family can preserve the essence of Indian family values.

The real concern arises when excessive individualism transforms the family into a purely utilitarian arrangement. When “I” replaces “we” as the centre of life, relationships gradually become transactional, consumption replaces companionship, and personal convenience outweighs collective responsibility. Such a shift weakens not only the family but also society itself. A nation with fragile families ultimately faces weakened communities, growing isolation, declining social trust, and cultural insecurity.

The need of the present time is not to engage endlessly in debates over joint versus nuclear families, but to preserve the enduring values that have always defined the Indian family. Families must revive meaningful conversations, shared meals, respect for elders, value-based upbringing of children, and strong emotional connections across generations. Even if modern realities make traditional joint families less practical, nuclear families can still preserve the civilizational spirit that has long distinguished Indian society.

India’s true strength lies not merely in its demographic size, technological advancement, or economic growth. Its greatest strength lies in its family system—a system that connects individuals to their roots, nurtures character, instills responsibility, and binds generations into a continuous cultural tradition. If this institution weakens, India will face not only social challenges but also a gradual erosion of its civilizational identity.

The task before contemporary India is therefore not to preserve the external form of the joint family at all costs, but to revive its foundational values—mutual affection, shared responsibility, intergenerational solidarity, cultural continuity, and collective well-being. Only by preserving these timeless principles can India ensure that its families continue to remain the strongest pillars of its civilization in the twenty-first century.

भारतीयों की मौत पर सन्नाटा क्यों? ईरान के लिए मुखर रहने वालों से देश पूछ रहा है सवाल ?

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । भारत और ईरान के संबंध सदियों पुराने रहे हैं। सांस्कृतिक विरासत, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, चाबहार बंदरगाह और सामरिक सहयोग जैसे अनेक क्षेत्रों में दोनों देशों ने एक-दूसरे का साथ दिया है। हालांकि यह भी सामने आया है कि इस्‍लाम के नाम पर ईरान ने हमेशा पाकिस्‍तान का साथ निभाया है, लेकिन अपने व्‍यापारिक हितों को देखते हुए वह आर्थ‍िक मामलों में भारत के साथ खड़ा दिखा है।

यही कारण भी रहा जो भारत ने हमेशा यह साबित किया कि वह अपने मित्र देशों का संकट की घड़ी में भी साथ देता है। आज जब ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ में भारतीय नाविकों की मौत और कई भारतीयों के घायल होने की घटना सामने आई है, तब यह प्रश्न पूरे देश के सामने खड़ा है कि क्या भारत के इस मित्रता पूर्ण व्‍यवहार एवं सम्मान का मान ईरान ने भी रखा है?

विदेश मंत्रालय ने स्वयं स्वीकार किया है कि पश्चिम एशिया में समुद्री जहाजों पर हाल में हुए हमलों में सबसे अधिक भारतीय नागरिक प्रभावित हुए हैं। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस सप्‍ताह हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे दो व्यापारी जहाज, ‘एमटी अल बहियाह’ और ‘एमटी मोम्बासा’ हमले का शिकार बने। इन दोनों जहाजों पर कुल 46 चालक दल के सदस्य थे, जिनमें 30 भारतीय नाविक शामिल थे।

‘एमटी अल बहियाह’ पर सवार 12 भारतीयों में से एक भारतीय नागरिक की मृत्यु हो गई, जबकि एक अन्य घायल हुआ। ‘एमटी मोम्बासा’ पर सवार 18 भारतीयों में से 9 भारतीय घायल हुए, जिनमें दो की स्थिति गंभीर बनी हुई है, वह जीवित भी बचेंगे, इसमें संदेह है। हालांकि भारत सरकार ने तत्काल नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास के मिशन उप प्रमुख को विदेश मंत्रालय तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया और इन हमलों की तीखी निंदा की।

यदि भारत जैसा संतुलित कूटनीतिक देश किसी मित्र राष्ट्र के राजनयिक को तलब करता है, तो यह अत्यंत गंभीर संदेश होता है। पर क्‍या इससे भारत की वह जनता समझेगी, जो कल तक ईरान के समर्थन में सड़कों पर उतर रही थी, चंदा इकट्ठा कर मदद के नाम पर ईरान भेज रही थी?

हकीकत में तो आज यह सभी के लिए याद करना आवश्यक है कि भारत ने ईरान के लिए क्या किया। जब ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, युद्ध और आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब भारत ने सिर्फ उसके पक्ष में जहां संभव रहा, अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर बयान जारी किए, साथ ही मानवीय सहायता का बड़ा अभियान भी चलाया।

जीवनरक्षक दवाइयाँ, चिकित्सा उपकरण और आवश्यक मेडिकल सामग्री, वैध और कानूनी माध्यमों से ईरानी रेड क्रिसेंट सोसाइटी तक पहुँचाई गईं। जिसके परिणाम में ईरान सरकार और उसके राजदूत ने सार्वजनिक रूप से भारत सरकार तथा भारतीय जनता के इस सहयोग के लिए आभार भी व्यक्त किया। यानी भारत ने सहानुभूति का प्रदर्शन करने के स्‍थान पर संकट की घड़ी में ईरान की वास्तविक मदद की।

ईरान के पक्ष में जब भारत में रह रहे शिया मुसलमान धन इकट्ठा कर रहे थे, तब कश्मीर घाटी से लेकर मेरठ, लखनऊ, अमरोहा, हैदराबाद, मुंबई, कारगिल और अन्य क्षेत्रों से नकद राशि के साथ-साथ सोने के आभूषण, चांदी के बर्तन और अन्य मूल्यवान वस्तुएँ ईरान को आर्थ‍िक सहायता के रूप में उपलब्‍ध कराई गईं। यानी जो भी ईरान के पक्ष में संभव हो सकता था, वह सभी कुछ भारत सरकार ने अपने स्‍तर पर किया। जहां तक कि भारत के तमाम गैर मुसलमानों ने भी शियाओं के आह्वान पर यथासंभव मदद अपनी ओर से मुहैया कराई।

अमेरिकी प्रतिबंधों और वैश्विक दबाव के बावजूद भारत ने चाबहार बंदरगाह परियोजना को कभी नहीं छोड़ा। यह परियोजना ईरान की अर्थव्यवस्था और उसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। जब अनेक अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ ईरान से दूरी बना रही थीं, तब भारत ने निवेश जारी रखा। यह कदम भरोसे और रणनीतिक साझेदारी के आधार पर उठाया गया, किंतु आज सवाल जवाबदेही का है।

वस्‍तुत: जब भारतीय नागरिकों की जान जाती है, तब भारत को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि ऐसी घटनाएँ क्यों हुईं?यदि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती, यदि नागरिक जहाजों पर हमले होते हैं और उनमें सबसे अधिक भारतीय प्रभावित होते हैं, तो सिर्फ “दुख व्यक्त” कर देना पर्याप्त नहीं हो सकता। ऐसे में भारत के प्रत्‍येक नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ईरान क्या ठोस कदम उठा रहा है।

भारतीय नाविक किसी युद्ध का हिस्सा नहीं

यह भी ध्‍यान देने योग्‍य है कि भारत विश्व के सबसे बड़े समुद्री मानव संसाधन प्रदाताओं में शामिल है। हजारों भारतीय व्यापारी जहाजों पर कार्य करते हैं। वे किसी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं होते। वे वैश्विक व्यापार की रीढ़ हैं। ऐसे निर्दोष नागरिकों का किसी भी संघर्ष में शिकार बनना अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और मानवीय सिद्धांतों, दोनों के विपरीत है। यदि सबसे अधिक भारतीय नाविक ही प्रभावित हो रहे हैं, तो यह भारत के लिए स्‍वभावि‍क तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन गया है।

अब स्‍वभाविक है कि इस पूरे घटनाक्रम ने देश के भीतर भी एक गंभीर बहस छेड़ दी है। जैसा कि बताया गया, जब ईरान संकट में था, तब भारत में अनेक स्थानों पर उसके समर्थन में प्रदर्शन हुए। सोशल मीडिया पर अभियान चलाए गए। मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानून की दुहाई दी गई। करोड़ों रुपये का चंदा जुटाया गया। लोगों ने अपने आभूषण तक दान कर दिए, किंतु आज जब एक भारतीय नागरिक की मृत्यु हुई, अनेक भारतीय घायल हुए और भारत सरकार को स्वयं ईरानी राजनयिक को तलब कर विरोध दर्ज कराना पड़ा, तब वही मुखर आवाजें शांत हैं!

क्या भारतीय नागरिक का जीवन किसी अन्य देश के नागरिक से कम मूल्यवान है? क्या मानवाधिकारों की आवाज तब उठेगी, जब पीड़ित कोई दूसरा होगा? क्या संवेदना भी वैचारिक पसंद और नापसंद देखकर व्यक्त की जाएगी? वस्‍तुत: ये प्रश्न उन सभी लोगों के लिए हैं जो अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर नैतिकता और मानवाधिकार की बात करते हैं। उन्‍हें भी आज यह समझना चाहिए कि यदि सिद्धांत सार्वभौमिक हैं, तो भारतीय नागरिक के लिए भी वही संवेदना दिखाई देनी चाहिए।

भारत की विदेश नीति को स्पष्ट संदेश देना होगा

यहां केंद्र की मोदी सरकार से भी ईरान के प्रति कड़ा रुख अपनाने का आग्रह है। बेशक; भारत की विदेश नीति संतुलित है। भारत अमेरिका से भी संबंध रखता है, रूस से भी, इजराइल से भी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह किसी देश को ये छूट दे कि वह उसके नागरिकों की हत्‍या करेगा या उसके यहां हिंसा एवं हत्‍या होंगी ।

अब यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि ईरान भी उसी स्पष्टता से भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे, इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच कराए, जिम्मेदारी तय करे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस एवं विश्वसनीय कदम उठाए। इसके साथ ही भारत में रह रहे सभी श‍िया मुसलमानों एवं उन सभी से जो कल तक ईरान के साथ खड़े दिखे, उन सभी से अपील है कि वह भारतीयों पर ईरान के समुद्री क्षेत्र में हो रही हिंसात्‍मक कार्रवाइयों का मुखर विरोध करें।

केंद्र सरकार भी ध्‍यान रखे, किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का अंतिम उद्देश्य उसके नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान होता है। यदि भारतीय नागरिकों का रक्त बहता है, तो भारत का कठोर प्रश्न पूछना उसका अधिकार से अधिक उसका कर्तव्य भी है। मित्रता सम्मान पर टिकी होती है और सम्मान की पहली शर्त आज भारत-ईरान संबंधों के बीच यही है कि हर देशवासी, भारतवासी का जीवन सर्वोपरि है।

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