भारतीयों की मौत पर सन्नाटा क्यों? ईरान के लिए मुखर रहने वालों से देश पूछ रहा है सवाल ?

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मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । भारत और ईरान के संबंध सदियों पुराने रहे हैं। सांस्कृतिक विरासत, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, चाबहार बंदरगाह और सामरिक सहयोग जैसे अनेक क्षेत्रों में दोनों देशों ने एक-दूसरे का साथ दिया है। हालांकि यह भी सामने आया है कि इस्‍लाम के नाम पर ईरान ने हमेशा पाकिस्‍तान का साथ निभाया है, लेकिन अपने व्‍यापारिक हितों को देखते हुए वह आर्थ‍िक मामलों में भारत के साथ खड़ा दिखा है।

यही कारण भी रहा जो भारत ने हमेशा यह साबित किया कि वह अपने मित्र देशों का संकट की घड़ी में भी साथ देता है। आज जब ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ में भारतीय नाविकों की मौत और कई भारतीयों के घायल होने की घटना सामने आई है, तब यह प्रश्न पूरे देश के सामने खड़ा है कि क्या भारत के इस मित्रता पूर्ण व्‍यवहार एवं सम्मान का मान ईरान ने भी रखा है?

विदेश मंत्रालय ने स्वयं स्वीकार किया है कि पश्चिम एशिया में समुद्री जहाजों पर हाल में हुए हमलों में सबसे अधिक भारतीय नागरिक प्रभावित हुए हैं। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस सप्‍ताह हॉर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे दो व्यापारी जहाज, ‘एमटी अल बहियाह’ और ‘एमटी मोम्बासा’ हमले का शिकार बने। इन दोनों जहाजों पर कुल 46 चालक दल के सदस्य थे, जिनमें 30 भारतीय नाविक शामिल थे।

‘एमटी अल बहियाह’ पर सवार 12 भारतीयों में से एक भारतीय नागरिक की मृत्यु हो गई, जबकि एक अन्य घायल हुआ। ‘एमटी मोम्बासा’ पर सवार 18 भारतीयों में से 9 भारतीय घायल हुए, जिनमें दो की स्थिति गंभीर बनी हुई है, वह जीवित भी बचेंगे, इसमें संदेह है। हालांकि भारत सरकार ने तत्काल नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास के मिशन उप प्रमुख को विदेश मंत्रालय तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया और इन हमलों की तीखी निंदा की।

यदि भारत जैसा संतुलित कूटनीतिक देश किसी मित्र राष्ट्र के राजनयिक को तलब करता है, तो यह अत्यंत गंभीर संदेश होता है। पर क्‍या इससे भारत की वह जनता समझेगी, जो कल तक ईरान के समर्थन में सड़कों पर उतर रही थी, चंदा इकट्ठा कर मदद के नाम पर ईरान भेज रही थी?

हकीकत में तो आज यह सभी के लिए याद करना आवश्यक है कि भारत ने ईरान के लिए क्या किया। जब ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों, युद्ध और आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब भारत ने सिर्फ उसके पक्ष में जहां संभव रहा, अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर बयान जारी किए, साथ ही मानवीय सहायता का बड़ा अभियान भी चलाया।

जीवनरक्षक दवाइयाँ, चिकित्सा उपकरण और आवश्यक मेडिकल सामग्री, वैध और कानूनी माध्यमों से ईरानी रेड क्रिसेंट सोसाइटी तक पहुँचाई गईं। जिसके परिणाम में ईरान सरकार और उसके राजदूत ने सार्वजनिक रूप से भारत सरकार तथा भारतीय जनता के इस सहयोग के लिए आभार भी व्यक्त किया। यानी भारत ने सहानुभूति का प्रदर्शन करने के स्‍थान पर संकट की घड़ी में ईरान की वास्तविक मदद की।

ईरान के पक्ष में जब भारत में रह रहे शिया मुसलमान धन इकट्ठा कर रहे थे, तब कश्मीर घाटी से लेकर मेरठ, लखनऊ, अमरोहा, हैदराबाद, मुंबई, कारगिल और अन्य क्षेत्रों से नकद राशि के साथ-साथ सोने के आभूषण, चांदी के बर्तन और अन्य मूल्यवान वस्तुएँ ईरान को आर्थ‍िक सहायता के रूप में उपलब्‍ध कराई गईं। यानी जो भी ईरान के पक्ष में संभव हो सकता था, वह सभी कुछ भारत सरकार ने अपने स्‍तर पर किया। जहां तक कि भारत के तमाम गैर मुसलमानों ने भी शियाओं के आह्वान पर यथासंभव मदद अपनी ओर से मुहैया कराई।

अमेरिकी प्रतिबंधों और वैश्विक दबाव के बावजूद भारत ने चाबहार बंदरगाह परियोजना को कभी नहीं छोड़ा। यह परियोजना ईरान की अर्थव्यवस्था और उसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। जब अनेक अंतरराष्ट्रीय कंपनियाँ ईरान से दूरी बना रही थीं, तब भारत ने निवेश जारी रखा। यह कदम भरोसे और रणनीतिक साझेदारी के आधार पर उठाया गया, किंतु आज सवाल जवाबदेही का है।

वस्‍तुत: जब भारतीय नागरिकों की जान जाती है, तब भारत को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि ऐसी घटनाएँ क्यों हुईं?यदि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जा सकती, यदि नागरिक जहाजों पर हमले होते हैं और उनमें सबसे अधिक भारतीय प्रभावित होते हैं, तो सिर्फ “दुख व्यक्त” कर देना पर्याप्त नहीं हो सकता। ऐसे में भारत के प्रत्‍येक नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ईरान क्या ठोस कदम उठा रहा है।

भारतीय नाविक किसी युद्ध का हिस्सा नहीं

यह भी ध्‍यान देने योग्‍य है कि भारत विश्व के सबसे बड़े समुद्री मानव संसाधन प्रदाताओं में शामिल है। हजारों भारतीय व्यापारी जहाजों पर कार्य करते हैं। वे किसी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं होते। वे वैश्विक व्यापार की रीढ़ हैं। ऐसे निर्दोष नागरिकों का किसी भी संघर्ष में शिकार बनना अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और मानवीय सिद्धांतों, दोनों के विपरीत है। यदि सबसे अधिक भारतीय नाविक ही प्रभावित हो रहे हैं, तो यह भारत के लिए स्‍वभावि‍क तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन गया है।

अब स्‍वभाविक है कि इस पूरे घटनाक्रम ने देश के भीतर भी एक गंभीर बहस छेड़ दी है। जैसा कि बताया गया, जब ईरान संकट में था, तब भारत में अनेक स्थानों पर उसके समर्थन में प्रदर्शन हुए। सोशल मीडिया पर अभियान चलाए गए। मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानून की दुहाई दी गई। करोड़ों रुपये का चंदा जुटाया गया। लोगों ने अपने आभूषण तक दान कर दिए, किंतु आज जब एक भारतीय नागरिक की मृत्यु हुई, अनेक भारतीय घायल हुए और भारत सरकार को स्वयं ईरानी राजनयिक को तलब कर विरोध दर्ज कराना पड़ा, तब वही मुखर आवाजें शांत हैं!

क्या भारतीय नागरिक का जीवन किसी अन्य देश के नागरिक से कम मूल्यवान है? क्या मानवाधिकारों की आवाज तब उठेगी, जब पीड़ित कोई दूसरा होगा? क्या संवेदना भी वैचारिक पसंद और नापसंद देखकर व्यक्त की जाएगी? वस्‍तुत: ये प्रश्न उन सभी लोगों के लिए हैं जो अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर नैतिकता और मानवाधिकार की बात करते हैं। उन्‍हें भी आज यह समझना चाहिए कि यदि सिद्धांत सार्वभौमिक हैं, तो भारतीय नागरिक के लिए भी वही संवेदना दिखाई देनी चाहिए।

भारत की विदेश नीति को स्पष्ट संदेश देना होगा

यहां केंद्र की मोदी सरकार से भी ईरान के प्रति कड़ा रुख अपनाने का आग्रह है। बेशक; भारत की विदेश नीति संतुलित है। भारत अमेरिका से भी संबंध रखता है, रूस से भी, इजराइल से भी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह किसी देश को ये छूट दे कि वह उसके नागरिकों की हत्‍या करेगा या उसके यहां हिंसा एवं हत्‍या होंगी ।

अब यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि ईरान भी उसी स्पष्टता से भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे, इन घटनाओं की निष्पक्ष जांच कराए, जिम्मेदारी तय करे और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए ठोस एवं विश्वसनीय कदम उठाए। इसके साथ ही भारत में रह रहे सभी श‍िया मुसलमानों एवं उन सभी से जो कल तक ईरान के साथ खड़े दिखे, उन सभी से अपील है कि वह भारतीयों पर ईरान के समुद्री क्षेत्र में हो रही हिंसात्‍मक कार्रवाइयों का मुखर विरोध करें।

केंद्र सरकार भी ध्‍यान रखे, किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति का अंतिम उद्देश्य उसके नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान होता है। यदि भारतीय नागरिकों का रक्त बहता है, तो भारत का कठोर प्रश्न पूछना उसका अधिकार से अधिक उसका कर्तव्य भी है। मित्रता सम्मान पर टिकी होती है और सम्मान की पहली शर्त आज भारत-ईरान संबंधों के बीच यही है कि हर देशवासी, भारतवासी का जीवन सर्वोपरि है।

गांव के मोड़ से ग्लोबल दुनिया तक: अंग्रेज़ी बन रही नई ताक़त

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दिल्ली । सुबह के आठ बजे हैं। मथुरा ज़िले की गोवर्धन तहसील के एक गांव के मोड़ पर रंग-बिरंगे स्कूल बैग टांगे, टाई और साफ-सुथरी यूनिफॉर्म पहने लड़के और लड़कियों का एक झुंड बस का इंतज़ार कर रहा है। कोई कह रहा है, hi, how are you? दूसरा मुस्कुराकर जवाब देता है, “I am fine, thank you.” तीसरी बच्ची अपनी सहेली से पूछती है, “Where is your project ?” उनकी अंग्रेज़ी अभी बहुत साधारण है, मगर सपने बड़े हैं।

पास खड़े बुज़ुर्ग हैरानी और फ़ख्र से उन्हें देखते हैं। यही बच्चे कुछ साल पहले गांव के हिंदी स्कूल में जाते थे। आज रोज़ कई किलोमीटर दूर एक अंग्रेज़ी माध्यम के पब्लिक स्कूल की बस पकड़ते हैं। यह सिर्फ़ स्कूल बदलने की कहानी नहीं, बदलते भारत की तस्वीर है।

केरल, कर्नाटक, तमिल नाडु के अनेकों शहरों में और ग्रामीण अंचलों में प्राइवेट, मिशनरी अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की भरमार है। ऊटी के रास्ते में मसिनीगुडी कस्बे में एक स्कूली हेड मास्टर ने बताया , ” सरकारी स्कूलों में लोकल भाषा माध्यम है जहां अधिकांश गरीब बच्चे पढ़ते हैं, जिनके पास साधन हैं उनके बच्चे प्राइवेट में स्टडी करते हैं, अंग्रेजी सीखते हैं!” गांव गांव से प्राइवेट बसें बच्चों को स्कूलों तक ढोती हैं। दक्षिण भारत के ज्यादातर पेरेंट्स बच्चों को विदेश जाने के लिए पढ़ाते हैं, गल्फ कंट्रीज या अमेरिका!

लोग मानने लगे हैं कि भारत में अंग्रेज़ी अब किसी हुकूमत की छोड़ी हुई निशानी नहीं रही। यह रोज़गार, तरक्की और नए मौकों की ज़ुबान बन चुकी है। करोड़ों भारतीय इसे पढ़ते, समझते और बोलते हैं। अनुमान है कि करीब 26 करोड़ से अधिक लोगों को अंग्रेज़ी की बुनियादी समझ है। हर साल लाखों नए बच्चे इस सफ़र में शामिल हो रहे हैं।

एक दौर था जब अंग्रेज़ी सिर्फ़ बड़े शहरों और अमीर घरों तक सीमित मानी जाती थी। अब यह गांवों की गलियों तक पहुंच चुकी है। किसान, दुकानदार, मज़दूर और छोटे कारोबारी भी चाहते हैं कि उनके बच्चे अंग्रेज़ी सीखें। वे जानते हैं कि बदलती दुनिया में यह हुनर नई राहें खोल सकता है।

देश में अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों की संख्या तेज़ी से बढ़ी है। मिशनरी और कॉन्वेंट स्कूलों ने दशकों पहले इसकी बुनियाद रखी। बाद में निजी स्कूल, सीबीएसई और आईसीएसई संस्थान आगे आए। अब कई सरकारी स्कूल भी अंग्रेज़ी माध्यम की पढ़ाई शुरू कर चुके हैं। करोड़ों बच्चे इन स्कूलों में शिक्षा पा रहे हैं।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं,”इस बदलाव के पीछे कोई सियासी नारा नहीं, बल्कि ज़मीनी हक़ीक़त है। भारत जैसे बहुभाषी देश में अंग्रेज़ी अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले लोगों के बीच एक साझा पुल बन गई है। कश्मीर से केरल और गुजरात से असम तक, अलग-अलग प्रदेशों के लोग इसी भाषा के सहारे आसानी से संवाद कर लेते हैं।”

उच्च शिक्षा में भी अंग्रेज़ी की अहमियत लगातार बढ़ी है। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, विज्ञान, क़ानून, प्रबंधन और शोध की अधिकांश किताबें और अध्ययन सामग्री अंग्रेज़ी में उपलब्ध हैं। दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से जुड़ने में भी यही भाषा सबसे बड़ा सहारा बनती है।

भारत की आईटी क्रांति में अंग्रेज़ी की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, नोएडा और गुरुग्राम जैसे शहरों ने दुनिया भर की कंपनियों को आकर्षित किया। भारतीय युवाओं ने अपनी मेहनत के साथ अंग्रेज़ी की क्षमता के दम पर वैश्विक बाज़ार में पहचान बनाई। कॉल सेंटर, बीपीओ, सॉफ्टवेयर, डिजिटल सेवाएं और ऑनलाइन कारोबार लाखों लोगों को रोज़गार दे रहे हैं।

आज डिजिटल दुनिया में भी अंग्रेज़ी एक अहम चाबी है। इंटरनेट, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, ऑनलाइन कोर्स, रिसर्च और नई तकनीकों का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी में उपलब्ध है। जिसे अंग्रेज़ी आती है, उसके सामने सीखने के रास्ते कहीं ज़्यादा खुल जाते हैं।

लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि हिंदी या दूसरी भारतीय भाषाएं कमज़ोर हो जाएं। अपनी मातृभाषा इंसान की पहचान, संस्कृति और जड़ों से जुड़ी होती है। अंग्रेज़ी उस पहचान की जगह नहीं ले सकती। असली समझदारी दोनों को साथ लेकर चलने में है।

दुनिया के कई विकसित देशों के बच्चे अपनी मातृभाषा के साथ अंग्रेज़ी भी सीखते हैं। भारत में भी यही रास्ता सबसे बेहतर साबित हो सकता है। घर में अपनी भाषा, समाज में अपनी संस्कृति और दुनिया से जुड़ने के लिए अंग्रेज़ी; यही संतुलन भविष्य की ज़रूरत है।

सरकारी स्कूलों में बेहतर अंग्रेज़ी शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक तकनीक और अच्छी पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराना अब समय की मांग है। अंग्रेज़ी किसी वर्ग विशेष की जागीर नहीं रहनी चाहिए। गांव का बच्चा भी वही अवसर पाए जो महानगर के छात्र को मिलता है।

भारत को अंग्रेज़ी विरासत में मिली थी, लेकिन उसने इसे अपनी मेहनत और ज़रूरत के मुताबिक़ नया रूप दिया। आज यह विदेशी भाषा कम और भारतीय क्षमता का हिस्सा ज़्यादा बन चुकी है।

शायद इसी लिए गोवर्धन के उस गांव के चौराहे पर खड़े वे छोटे-छोटे बच्चे, जो हिचकिचाते हुए कहते हैं, “Good morning, teacher,” सिर्फ़ अंग्रेज़ी नहीं बोल रहे होते। वे अपने भविष्य के दरवाज़े पर दस्तक दे रहे होते हैं। उनके होंठों पर कुछ साधारण अंग्रेज़ी के शब्द हैं, लेकिन उनकी आंखों में पूरे हिंदुस्तान के बदलते कल का ख़्वाब चमक रहा होता है।

क्या इन्फ्लुएंसर्स पत्रकार होते हैं?

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डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी

इंदौर। आजकल प्रेस वार्ताओं में पत्रकारों के अलावा इन्फ्लुएंसर्स को भी बुलाने का रिवाज चल पड़ा है। लेकिन कहाँ पत्रकार और कहाँ इन्फ्लुएंसर्स?

पत्रकार की सबसे बड़ी ताकत है—तथ्य। वह इतनी रिसर्च और फैक्ट-चेक करता है कि खबर छपते-छपते बासी हो जाए, पर ‘सत्य’ के नाम पर दाग नहीं लगने देता। जबकि इन्फ्लुएंसर्स लाइक्स और व्यूज़ की तलाश में भटकते जीव होते हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत उनका ‘कनेक्शन’ और ‘एंगेजमेंट’ होता है। वे ‘वाह-वाही’ और ‘लाइक्स’ की भाषा इतनी अच्छी तरह समझते हैं कि किसी गलत खबर को भी ‘इमोशनल टच’ के साथ इस तरह परोसते हैं कि जनता खुद-ब-खुद ‘शेयर’ का बटन दबा देती है। यह विश्वसनीयता बनाम वायरलिटी का मामला है।
भले ही ‘बीबी की वाइंस’ वाले भुवन बाम को करोड़ों व्यूज़ मिलते हों, अजय नागर उर्फ कैरी मिनाटी को लाखों लोग देखते हों, या ‘बीयरबाइसेप्स’ वाले रणवीर अल्लाहबादिया कितना भी बड़ा प्रभाव पैदा कर सकते हों, उनकी गंभीरता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न बना रहेगा।

इन जैसों की ‘जवाबदेही’ अक्सर ‘एल्गोरिदम’ के सामने दंडवत करती दिखाई देती है, क्योंकि उन्हें तो बस वायरल होना है। उनके लिए सच से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होता है कि आज का ‘ट्रेंड’ क्या है। बिना पुख्ता सबूत के राय बनाना और उसका प्रचार करना उनके बाएँ हाथ का खेल है।

दूसरी तरफ पत्रकार हैं, जो तथ्यों, दस्तावेजों, स्रोतों और जमीनी अनुभव के आधार पर अपनी साख बनाते हैं। उनकी एक खबर सरकारें हिला सकती है, नीतियाँ बदल सकती है और इतिहास का हिस्सा बन सकती है।
पत्रकार तथ्यों के भारी-भरकम बोझ तले दबे रहते हैं, जबकि दूसरी ओर इन्फ्लुएंसर्स की फौज बिना किसी फिल्टर के सीधे आपकी स्क्रीन में घुस जाती है।

पत्रकार अक्सर संस्थागत सीमाओं, संपादकीय दबावों, मालिकानों के हितों और सत्यापन की लंबी प्रक्रिया में बँधा रहता है। कई बार जब तक पत्रकार तथ्य जुटाता है, तब तक सोशल मीडिया पर कहानी कई रूप बदल चुकी होती है।
इन्फ्लुएंसर कितना भी बड़ा हो जाए, वह राजेन्द्र माथुर, प्रभाष जोशी, रघुवीर सहाय, मार्क टली, एस.पी. सिंह या विनोद दुआ जैसी विश्वसनीयता शायद ही कभी प्राप्त कर पाएगा। पत्रकार इतिहास लिखता है,  इन्फ्लुएंसर ट्रेंड बनाता है।
पत्रकार जिम्मेदार होते हैं। उन्हें समय रैना और रणवीर अल्लाहबादिया जैसे विवादों से सीख लेनी चाहिए, जिन पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणियाँ कीं और जुर्माना भी लगाया। ऐसी फटकारों को याद रखा जाना चाहिए।

(फेसबुक दीवार से साभार)

वेश्यावृत्ति के खिलाफ उठती एक आवाज जो बंद हो गई

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अवधेश चतुर्वेदी

पटना। आप दिल्ली के किसी भी सामान्य होटल में चले जाइए, दस मिनट के भीतर आप समझ जाएंगे कि यह स्थान वेश्यावृत्ति का अड्डा है। संभावना है कि कमरे के घुसने के कुछ ही देर में कोई कर्मी ऑफर लेकर आ जाय।

बात केवल दिल्ली की नहीं है, बात यूपी बिहार के छोटे शहरों तक आम हो चुकी है। मेरे ही शहर में दर्जनों बार पुलिस ने होटलों में छापा मार कर लड़के लड़कियों को गिरफ्तार किया होगा। वे जेल जाते हैं, कुछ दिनों में छूटते हैं और फिर वही धंधा शुरू…

शहर छोड़िए, देहात के छोटे कस्बों में ऑर्केस्टा पार्टी चलाने के नाम पर भी यही हो रहा है। पुलिस कितना पकड़ेगी? पुलिस के जिम्मे भी तो केवल यही एक काम नहीं। और यदि समाज के बाकी लोग इसका हिस्सा बनने में शर्म महसूस नहीं कर रहे तो पुलिस से उच्च नैतिकता की आशा कैसे की जा सकती है?
कौन हैं इस धंधे में लगी लड़कियां? उनमें सबसे बड़ी संख्या उन लड़कियों की है जो अपने प्रेमियों के साथ घर से भागी थीं। छः महीने, साल भर बाद प्रेमी/ पति ने छोड़ दिया, लज्जा और भय के कारण घर लौट नहीं सकीं और फिर भटकते भटकते इस धंधे में गिर गईं। कुछ वे हैं जो घर से हीरोइन, मॉडल बनने निकली थीं और अंत में यहां पहुंच गईं। अब कुछ ऐसी भी लड़कियां हैं जिन्हें उनकी अतिमहत्वाकांक्षा वहां ले गई है। सारी सुविधाएं पाने के लिए धन चाहिए और धन कमाने का सबसे आसान तरीका यही दिखा है उन्हें… कुल मिला कर एक बहुत बड़ा बाजार खड़ा हो गया है। ग्राहक भी है, बेचने वाले भी हैं…

ग्राहक रिक्शावाला भी है, ग्राहक तथाकथित बड़े लोग भी हैं। धंधे में गांव देहात से भागी मजबूर लड़कियां भी हैं और मॉडल्स और हीरोइन बनने निकली सम्पन्न परिवारों की लड़कियां भी हैं। पनीर पांच सौ रुपए किलो बिक रहा है, बैगन चालीस रुपए किलो। जिसके पास जितना धन है उस हिसाब से खरीद रहा है। हिसाब लगाइए तो देश में वेश्यावृत्ति का बाजार कई हजार करोड़ का होगा। बाजार है तो उसका पूरा इकोसिस्टम है। उनके पास ऐसे लोग भी हैं जो इस धंधे के विरुद्ध बोलने वालों को आसानी से चुप कराना जानते हैं। पटना के बंटी यादव को इसी तरह चुप कराया गया है।

बंटी यादव को नहीं जानते होंगे आप। पटना का युवक था, उसके पड़ोस में ही शुरू हो गया यह सब… किसी भी सभ्य व्यक्ति को इससे दिक्कत होगी, उसे भी हुई। उसने इसके विरुद्ध आवाज उठाई। फल यह मिला कि किडनैप हुआ और मार दिया गया। बस हफ्ते भर पुरानी खबर है।

क्या बंटी को न्याय मिलेगा? मेरा उत्तर है कि नहीं मिलेगा। कुछ लोग गिरफ्तार होंगे पर असली खिलाड़ियों का गिरेबान नहीं छुआ जा सकता। जो पकड़े जाएंगे वे भी छूट जाएंगे। धंधा चलता रहेगा।

इस बीमारी को केवल कानून के बल पर नहीं रोका जा सकता। सरकार और समाज दोनों इसके विरुद्ध मुखर हो तभी कुछ हो सकता है। पर क्या समाज मुखर है? क्या बंटी के साथ उसके मुहल्ले वाले भी मन से खड़े थे? उत्तर आपको भी पता है…

बंटी जैसे युवक नहीं के बराबर हैं। बंटी उदाहरण बन गए हैं कि बोलोगे तो मार दिए जाओगे। ऐसे में क्या सरकार जगेगी? क्या बंटी के पीछे कोई खड़ा होगा?

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