हम दो हमारे दो के नारे ने एक खामोश क्रांति को अंजाम दिया

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हैदराबाद : सुबह की गुलाबी रोशनी में महाराष्ट्र के सातारा ज़िले के एक छोटे से गाँव की रूटीन ज़िंदगी जगने लगती है, मुर्गों की बाँग, पीतल के बर्तनों की खनक, और बरगद के पेड़ के नीचे बैठी आशा वर्कर संगीता, जिसने अपनी नीली दवाई-बक्शा खोलकर सामने फैला दी है। गन्ने के खेतों पर पड़ती धूप में वह औरतों के एक घेरे को समझा रही है कि जन्मों में फ़ासला रखना कैसे माँ और बच्चे दोनों की ज़िंदगी बचाता है। कुछ औरतें बच्चों को गोद में लिए हैं, कुछ संकोच में ऐसे सवाल पूछ रही हैं जो शायद वे अपने शौहर के सामने कभी न पूछ पातीं। इस सादे से सुबह के दृश्य में भारत की असली आबादी-क्रांति दर्ज है, न फ़ाइलों में, न नारेबाज़ी में, बल्कि एक-एक आशा की सब्र, मोहब्बत, और इख़्तियार देने की कोशिश में।

आज़ादी के तुरंत बाद भारत एक बड़ी जनसंख्या चुनौती से घिरा था। तेज़ आबादी बढ़ोतरी ने अनाज, सरकारी सेवाओं, और विकास योजनाओं पर भारी दबाव डाला। 1952 में भारत ने दुनिया का पहला राष्ट्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम शुरू किया, एक बेहद दूरअंदेश कदम। मक़सद था: छोटे परिवार, बेहतर सेहत और बेहतर ज़िंदगी।

शुरुआती कोशिशों में उम्मीद थी, पर रफ़्तार धीमी। अनपढ़ी, परंपराएँ, और कमज़ोर स्वास्थ्य सेवाओं ने प्रयासों को सीमित रखा।
1960 के दशक के आख़िरी तक सरकार पर बढ़ती जनसंख्या का ख़ौफ़ हावी होने लगा। नसबंदी कैंप बढ़ाए गए; कई जगह दबाव और लक्ष्य थोपे जाने लगे। इमरजेंसी के दौरान (1975–77) यह अंधेरा चरम पर पहुँचा, संजय गांधी की बदनाम नसबंदी मुहिम में एक साल में 60 लाख से अधिक मर्दों की ज़बरन नसबंदी कराई गई। “फ़ैमिली प्लानिंग” एक डरावना जुमला बन गया।

सियासी प्रतिक्रिया भयंकर थी। सरकार को यह तीखा सच स्वीकारना पड़ा कि आबादी पर क़ाबू ज़बरदस्ती से नहीं, यक़ीन और भरोसे से होता है।
इमरजेंसी के बाद सरकार ने रास्ता बदला। 1977 में कार्यक्रम का नाम बदलकर ‘फ़ैमिली वेलफ़ेयर’ कर दिया गया, सारा ज़ोर सहमति, जागरूकता और भलाई पर रखा गया। औरतों को नीति की केन्द्र-बिंदु बनाया गया, क्योंकि सिर्फ़ उनके रुख से ही बदलाव संभव था।

1980 और 1990 के दशकों में धीरे-धीरे लक्ष्य-आधारित रवैया छोड़ा गया। 1994 की “टारगेट-फ्री” नीति ने पहली बार कमान समुदाय को सौंप दी। नारा बदला: “बच्चे हों पसंद से, मजबूरी से नहीं।”

2000 की राष्ट्रीय जनसंख्या नीति ने स्पष्ट दिशा दी, सबको गर्भनिरोधक उपलब्ध कराना, महिलाओं के प्रजनन अधिकार मजबूत करना, मर्दों की भागीदारी बढ़ाना, और कुल प्रजनन दर (TFR) को 2.1 तक लाना।

2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (NRHM) सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ। माँ-बच्चे की सेहत, टीकाकरण और परिवार नियोजन को पहली बार एक ही ढाँचे में जोड़ा गया। इसके केंद्र में थीं आशा (ASHA) कार्यकर्ता, गाँव-गाँव की वह भरोसेमंद दूत, जो घर-घर जाकर न सिर्फ़ दवाइयाँ देती है बल्कि एक भरोसेमंद मित्र की तरह खुलकर बात करने का हौसला देती है। परिवार नियोजन अब ‘हुक्म’ नहीं, बल्कि ‘हक़’ बन गया।

2010 के बाद भारत में परिवर्तन साफ़ दिखने लगा। मिशन परिवार विकास, अंतरा इंजेक्शन, छाया गोली, प्रसवोत्तर IUD और नो-स्कैल्पल नसबंदी जैसी योजनाओं ने विकल्प बढ़ाए।

नतीजे हैरतअंगेज़ हैं। 1960 के दशक में 6 की TFR अब 2025 में 1.9—यानि replacement level से भी नीचे। आबादी की वृद्धि दर 1% से कम। अनुमान है कि 2047 तक जनसंख्या स्थिर हो जाएगी। मातृ मृत्यु आधी रह गई, शिशु मृत्यु दर 1950 के 146 से घटकर 27 (2020) पर पहुँच गई।

छोटे परिवारों ने सामाजिक ढाँचे को भी बदला, ज़्यादा पढ़े-लिखे बच्चे, महिलाओं की शिक्षा और रोज़गार में बढ़त, और घरेलू निर्णयों में उनकी मज़बूत भूमिका।

तस्वीर पूरी तरह चमकदार नहीं। बिहार (TFR 3.0) और उत्तर प्रदेश (2.4) अब भी पिछड़ रहे हैं, जबकि दक्षिण भारत का TFR 1.8 से भी नीचे है। लगभग 10% महिलाओं की परिवार नियोजन की ज़रूरतें अब भी अधूरी हैं। बाल विवाह आज भी कई जगह गर्भधारण और ग़रीबी के चक्र को बनाए रखता है।

साथ ही, “जनसंख्या momentum”—भारत की बड़ी युवा आबादी—2050 तक लगभग 30 करोड़ और लोग जोड़ देगी। दूसरी तरफ़ घटती प्रजनन दर बुढ़ापे की नई चुनौतियाँ भी लाएगी, देखभाल, पेंशन, और सामाजिक सुरक्षा।

भारत की आबादी की कहानी अब ज़बरदस्ती की नहीं, बल्कि यक़ीन, और बुनियादी इंसानी गरिमा की है। यह इंक़लाब सरकारी दफ़्तरों में नहीं, बल्कि गाँव की चौपालों में, चाय की दुकानों में, और छोटी क्लीनिकों में हुआ, एक-एक बातचीत के ज़रिए।

आज परिवार नियोजन सिर्फ़ आंकड़ों का मसला नहीं, बल्कि बराबरी, सेहत और सम्मान का पैमाना है। दुनिया के सबसे बड़े मुल्क ने साबित कर दिया कि जब नीति लोगों के अधिकारों से मेल खाए, तो बदलाव खामोशी से भी आ सकता है, खूबसूरती से, अमन के साथ।

यह निस्संदेह आज़ाद भारत की सबसे बड़ी और सबसे ख़ामोश क्रांतियों में से एक है, जो घर-घर में, एक-एक औरत के फ़ैसले से आगे बढ़ी।

विकसित भारत का मूल मंत्र बनेगा- वंदे मातरम

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दिल्ली । जिससे स्वतंत्रा का मूल मंत्र, “वंदेमातरम” उद्भासित हुआ, जिसे गाते हुए हज़ारों की संख्या क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर झूल गए, जीवन जेलों की क्रूर यातनाओं में काट दिया, जिस गीत ने माँ भारती के प्रति प्रेम और समर्पण को परिभाषित किया, जिस गीत ने स्वाधीनता की अलख संपूर्ण भारत में जगा दी वह गीत है राष्ट्रगीत वंदेमतारम। भारत विभाजन के पूर्वाभ्यास के रूप में बंग -भंग करने के अंग्रेजी षड्यंत्र को पहचानकर सम्पूर्ण राष्ट्र बंगाल विभाजन के विरुद्ध खड़ा हो गया । इस आंदोलन के दो हथियार थे स्वदेशी का स्वीकार और विदेशी का बहिष्कार और रणघोष बना था वंदेमातरम। इस गीत के रचनाकार थे बंगाल में जन्मे माँ भारती के महान सपूत श्री बंकिम चंद्र चटटोपाध्याय। आज वंदेमातरम अपनी रचना का 150 वां वर्ष मना रहा है।
इस अवसर पर वंदेमातरम गीत के माध्यम से एक बार पुनः राष्ट्र में ”स्व” की भावना की अलख जगाने का आह्वान प्रधानमंत्री मोदी जी ने किया है ।

वंदेमातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर देशभर में अनेकानेक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हें। इसी श्रृंखला में संसद के दोनों सदनों में वंदेमातरम पर व्यापक चर्चा हुई। लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तथा राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने चर्चा की शुरुआत की। सत्तापक्ष के वक्ताओं ने जहां वंदेमातरम गीत के इतिहास और उसकी महत्ता पर प्रकाश डालते हुए वंदेमातरम के प्रति कांग्रेस व वामपंथी दलों की विचारधारा और सोच को बेनकाब किया। विपक्ष ने इसके पीछे बंगाल चुनावों को ध्यान में रखते हुए की गई चर्चा बताया। कुछ विपक्षी सांसदो न कहा कि वंदेमतारम पर बहस गैरजरूरी और मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए की जा रही है। इतने गम्भीर व ऐतिहासिक विषय की बहस के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी सदन से गायब रहे। संसद में वंदेमातरम पर हुई व्यापक चर्चा सिर्फ एक गीत पर विमर्श नहीं वरन भारत की सांस्कृतिक चेतना, स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा और राष्ट्रीय एकता के मूल्यों को दोबारा केंद्र में लाने का प्रयास भी है।

चर्चा का आरम्भ करते हुए लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उसके बाद रक्षामंत्री राजनाथ सिंह तथा राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने वंदेमातरम के प्रति कांग्रेस व उनके नेताओं की सोच को बेनकाब कर दिया। सरकार ने वंदेमातरम गीत की प्रेरणा से संकल्प लेकर वर्ष 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के साथ राष्ट्रगीत को जीवंत बनाने का संकल्प लिया। वंदेमातरम गीत की महानता पर बोलते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जो वंदे मातरम 1905 में महात्मा गांधी को राष्ट्रगान के रूप मे दिखता था, देश के हर कोने में हर व्यक्ति के जीवन में जो भी देश के लिए जीता जागता था उन सबके लिए वंदेमातरम की ताकत बहुत बड़ी थी।वंदेमातरम इतना महान था, उसकी भावना इतनी महान थी तो फिर पिछली सदी में इसके साथ इतना बड़ा अन्याय क्यों हुआ? वंदे मातरम के साथ विश्वासघात क्यों हुआ ? वह कौन सी ताकत थी जो पूज्य बापू की भावनाओं पर भी भारी पड़ गई ? किसने वंदेमातरम जैसी पवित्र भावना को भी विवादों में घसीट दिया। सदन को बताया गया कि जब वंदे मातरम को 50 वर्ष हुए तब देश गुलामी में जीने को मजबूर था और जब वंदेमातरम के 100 वर्ष पूर्ण हुए तब देश आपातकाल की जंजीरो में जकड़ा हुआ था जिस वंदे मातरम ने देश को आजादी की नई ऊर्जा दी थी जब उसके 100 वर्ष हुए तो दुर्भाग्य से एक काला इतिहास हमारे कालखंड में उजागर हो गया।

प्रधानमंत्री ने बताया कि वंदे मातरम के प्रति मुस्लिम लीग के विरोध की राजनीति तेज होती जा रही थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ से 15 अक्तूबर 1937 को वंदे मातरम के विरुद्ध नारा बुलंद किया। कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू को अपना सिंहासन डोलता दिखा तो उन्होंने मुस्लिम लीग के आधारहीन बयानों को तगड़ा जवाब देने के बजाय वंदे मातरम की ही पड़ताल शुरू कर दी और कहा कि कांग्रेस कार्यकारिणी में वंदेमातरम की उपयोगिता पर चर्चा होगी। इससे पूरा देश हतप्रभ रह गया। देशभक्तों ने कांग्रेस के उस प्रस्ताव के खिलाफ देश के कोने -कोने में प्रभात फेरियां निकालीं और वंदेमातरम गीत गाया किन्तु देशभक्तों को अनसुना करते हुए 26 अक्तूबर 1937 को कोलकाता अधिवेशन में कांग्रेस ने वंदेमातरम पर समझौता कर लिया।

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने वंदे मातरम को राष्ट्रगान जैसा सम्मान मिलने की बात कही। राजनाथ सिंह ने यह धारणा तोड़ने का प्रयास किया कि वंदे मातरम किसी सांप्रदायिक विचार का परिचायक है। उन्होंने कहा कि कुछ कट्टरपंथियों ने जानबूझकर इसे धर्म के चश्मे से देखने की कोशिश की जबकि यह गीत भारत माता के प्रति समर्पण और स्वतंत्रता की पुकार का प्रतीक है।

राज्यसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के 1937 के अधिवेशन में वंदे मातरम के अंतिम चार छंदों का गायन रोके जाने के प्रस्ताव पर बात की ओैर पंडित नेहरू के भूमिका पर प्रश्न उठाए। गृहमंत्री ने आरोप लगाया कि संसद में जब भी वंदेमातरम का गायन होता है तब कई विपक्षी सदस्य सदन से बाहर चले जाते हैं। वंदे मातरम पर चर्चा की आवश्यकता पर उत्तर देते हुए अमित शाह ने कहा कि वंदे मातरम पर चर्चा की आवश्यकता जब वंदे मातरम रचा गया था तब भी थी, आजादी के समय मे भी थी, आज भी है और 2047 में जब आधुनिक भारत होगा तब भी रहेगी क्योकि वंदे मातरम में कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति की भावना है । गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट रूप से कहा कि जिस पार्टी के अधिवेशन की शुरुआत गुरुवर रवींद्र नाथ टैगोर वंदे मातरम गाकर कराते थे उस पर जब लोकसभा में चर्चा हुई तो गांधी परिवार के सदस्य सदन में नहीं थे।नेहरू से लेकर आज तक कांग्रेस ने वंदेमातरम गान का विरोध किया है। भविष्य में वंदेमातरम देश को विकसित और महान बनाने का उद्घोष बनेगा।

वंदेमातरम गीत ने राष्ट्र की सोई हुई को चेतना को जाग्रृत किया और देशवासियों ने विदेशी वस्तुओं का प्रयोग पूरी तरह से बंद कर दिया। आज आत्मनिर्भर भारत विकसित बनाने के लिए उसी वंदेमातरम के भाव का आह्वान प्रधानमंत्री जी ने किया है। वंदेमातरम कोटि कोटि भारत वासियों के ह्रदय के तारों को झंकृत करे और प्रत्येक भारतीय प्राणप्रण से भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के यज्ञ में कूद पड़े यही वंदेमातरम की 150 वीं वर्षगांठ मनाने की सार्थकता होगी।

बच्चों से छिनता बचपन

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डॉ. देवेन्द्र नाथ तिवारी

ऑस्ट्रेलिया ने 10 दिसंबर से अपने यहाँ 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर ताला जड़ दिया है। दुनिया भर की नज़र इस छोटे-से महाद्वीप पर है, जैसे कोई नई दवा पहली बार किसी मरीज पर आज़माई जा रही हो और सब साँस रोके नतीजा देख रहे हों। सवाल यह नहीं कि क़ानून कितना सख़्त है; सवाल यह है कि इस सख़्ती के पीछे जो डर, दर्द और दुविधा है, वह किसका है? बच्चों का, माता-पिता का या उन समाजों का, जिन्होंने अपने ही बच्चों को एल्गोरिद्म के हवाले कर दिया है।

एक बच्चे की मौत और एक समाज का अपराधबोध
साल की शुरुआत में मियाँ बेनिस्टर के चौदह बरस के बेटे ओली ने अपने कमरे में फाँसी लगा ली। कुछ महीनों पहले तक 74 किलो वज़न वाला यह लड़का दिसंबर आते-आते 50 किलो से नीचे उतर गया था; टिकटॉक पर बॉडी और मसल्स के वीडियो देखते-देखते उसे अपने ही शरीर से घृणा होने लगी, खाने से डर लगने लगा, और अस्पताल से घर लौटकर वह हर निवाले को “सज़ा” के तौर पर अपने ही शरीर पर उतारने लगा। स्नैपचैट पर दोस्तों ने उसके लाल बालों का मज़ाक उड़ाया। उसे मोटा कहा। किसी ने सीधे लिखा—“तुम्हें अपनी जान ले लेनी चाहिए”; अकेली माँ रोज़गार में उलझी रही और एल्गोरिद्म ने चुपचाप बच्चे का दिमाग़ अपने क़ब्ज़े में ले लिया।

ओली की मौत के बाद जब ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ ने 16 साल से कम उम्र वालों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध का ऐलान किया, तो मंच पर उनके साथ यही मियाँ बेनिस्टर खड़ी थीं। उन्होंने कहा, अब परिवार अपना कंट्रोल वापस ले रहे हैं। टेक्नोलॉजी ज़िंदगी आसान करती है। पर, लगाम इंसानों के हाथ में रहनी चाहिए। यह वाक्य दरअसल उस सामूहिक अपराधबोध की गवाही है, जिसमें पूरा समाज स्वीकार कर रहा है कि उसने अपने बच्चों की परवरिश का काम चुपचाप बाज़ार और स्क्रीन को ठेके पर दे दिया था।

एल्गोरिद्म बनाम बचपन

ऑस्ट्रेलिया की सरकारी स्टडी बताती है। 10 से 15 साल के 96 प्रतिशत बच्चे सोशल मीडिया पर हैं। हर दस में से सात ने माना कि उन्होंने हिंसा, औरतों के खिलाफ नफरत, ईटिंग डिसऑर्डर और आत्महत्या को उकसाने वाला कंटेंट देखा है। सात में से एक बच्चे ने कहा कि किसी बड़े ने ऑनलाइन उन्हें फुसलाने की कोशिश की। इसे ‘ग्रूमिंग’ कहा जाता है। आधे से ज़्यादा ने साइबर बुलिंग झेली है। सवाल यह है कि यह सिर्फ़ आंकड़े हैं या उन अनगिनत बच्चों का अदृश्य रुदन, जो दिन भर रील्स और स्टोरीज़ में जीते हैं। रात में मोबाइल की रोशनी के नीचे अकेले सोते हैं।

डॉक्टरों का एक बड़ा वर्ग साफ़ कह रहा है कि सोशल मीडिया ने किशोरों की भावनात्मक सेहत को गहरी चोट पहुँचा दी है। बच्चों का ध्यान बिखर रहा है। क्रोध बढ़ रहा है। धैर्य घट रहा है। तुलना की बीमारी इतनी फैल चुकी है कि हर चेहरा दूसरे चेहरे से ही अपनी कीमत नापता है। वे मानते हैं कि बैन से शायद बच्चों का बचपन लौट सके। घर में बातचीत बढ़े। परिवार उनकी दुनिया में फिर से दाख़िल हो सके। लेकिन दूसरी तरफ़ मनोचिकित्सक चेतावनी देते हैं कि जो पीढ़ी अपने लगभग पूरे किशोर जीवन को स्क्रीन पर जी चुकी है, उसके लिए यह अचानक झटका ट्रॉमा, घबराहट और दवाइयों की ज़रूरत तक भी ले जा सकता है, अगर साथ में भावनात्मक सहारा और संवाद न दिया जाए।

क़ानून की सख़्ती, कंपनियों की जवाबदेही
यह दुनिया का पहला ऐसा क़ानून है जो सीधे बच्चों पर नहीं, कंपनियों पर शिकंजा कसता है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, टिकटॉक, एक्स, यूट्यूब, रेडिट, किक, ट्वीच और थ्रेड जैसे दस बड़े प्लेटफ़ॉर्म अब 16 साल से कम उम्र वालों के अकाउंट बंद करेंगे। नए अकाउंट खोलने नहीं देंगे; अगर वे नाकाम रहे, तो 49.5 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक का जुर्माना भरना पड़ेगा। बच्चे चोरी-छिपे लॉगइन कर भी लें, तो न पुलिस उनके घर जाएगी, न माता-पिता पर केस होगा। पूरा बोझ प्लेटफ़ॉर्म्स पर डाल दिया गया है कि वे “उचित कदम” उठाएँ और उम्र की जाँच करें।

लेकिन उम्र की जाँच कैसे होगी? कंपनियाँ “वॉटरफॉल सिस्टम” की तरफ़ जा रही हैं। पहले एआई सेल्फ़ी से चेहरे और त्वचा देखकर उम्र का अंदाज़ा लगाएगा, ज़रूरत पड़ी तो सरकारी आईडी जैसे पासपोर्ट या ड्राइविंग लाइसेंस माँगा जाएगा; कुछ मॉडल तो बैंक डाटा या ऑनलाइन व्यवहार से भी उम्र का अनुमान लगाने की राय दे रहे हैं। निजता के पक्षधर इसे ‘हनीपॉट’ बता रहे हैं। एक ऐसा डाटा-खज़ाना, जिस पर हैकर्स ललचाई निगाहों से देखते हैं। उनका डर यह है कि बच्चों को बचाते-बचाते हम पूरी आबादी को स्थायी निगरानी और पहचान-प्रमाण के जाल में फँसा देंगे, जहाँ इंटरनेट पर गुमनामी नाम की कोई चीज़ नहीं बचेगी।

विरोध की आवाज़ें और अकेलेपन का डर
ऑस्ट्रेलियाई ह्यूमन राइट्स कमीशन और मानसिक स्वास्थ्य संस्थाएँ इस क़ानून पर गंभीर आपत्ति जता रही हैं। दो पंद्रह वर्षीय बच्चों ने तो सरकार के खिलाफ़ संवैधानिक मुकदमा दायर कर दिया है। उनका कहना है कि यह क़ानून अभिव्यक्ति की आज़ादी छीनता है और उन्हें राजनीतिक बहस और सामाजिक भागीदारी से बाहर करता है। कई विशेषज्ञ याद दिला रहे हैं कि LGBTQ समुदाय के किशोर हों या दूरदराज़ कस्बों और गाँवों में अकेले रहने वाले बच्चे—सोशल मीडिया ही उनके लिए दुनिया से जुड़ने, सहारा खोजने और मदद माँगने का एकमात्र रास्ता है; इससे उन्हें काट देने का अर्थ है उनके अकेलेपन में एक दीवार और जोड़ देना।

इसी बीच सरकारी चैनल के सर्वे में 9 से 16 साल के बच्चों की बहुमत राय यह निकली कि बैन काम नहीं करेगा; तीन-चौथाई बच्चों ने खुलेआम कहा कि वे सोशल मीडिया नहीं छोड़ेंगे, चाहे सरकार कुछ भी कर ले। बैन की घोषणा से पहले ही बच्चों ने वैकल्पिक ऐप्स ढूँढना शुरू कर दिया। ऐसे प्लेटफॉर्म जिनका स्वरूप तो फोटो-शेयरिंग और मैसेजिंग जैसा ही है, लेकिन वे अभी प्रतिबंधित सूची में नहीं हैं। यह साफ़ संकेत है कि यदि समाज बच्चों को भरोसे और संवाद से नहीं, बल्कि केवल क़ानून और निगरानी से साधना चाहेगा, तो बच्चे रास्ता बदलेंगे, मंज़िल नहीं।

दुनिया भर में उठती दीवारें
ऑस्ट्रेलिया की प्रयोगशाला अकेली नहीं है। यूरोप, एशिया और अमेरिका के कई हिस्सों में सरकारें बच्चों की सोशल मीडिया पहुँच पर नकेल कसने में जुटी हैं। ब्रिटेन का ऑनलाइन सेफ्टी एक्ट हानिकारक कंटेंट रोकने का ढाँचा देता है लेकिन सोशल मीडिया के लिए स्पष्ट उम्र सीमा तय नहीं करता, जबकि फ्रांस ने 15 साल से कम उम्र वालों के लिए माता-पिता की अनुमति अनिवार्य की है और जर्मनी में 13 से 16 वर्ष के लिए गार्डियन की सहमति ज़रूरी है। इटली में यह सीमा 14 साल की है, पर वहाँ भी “जुगाड़” मौजूद है; यूरोपीय संसद अब पूरे संघ में 16 साल की न्यूनतम डिजिटल उम्र और नशीली डिज़ाइन प्रैक्टिसेज़ पर रोक की माँग कर रही है।

एशिया में चीन पहले ही ‘माइनर मोड’ के ज़रिए स्क्रीन टाइम सीमित कर चुका है, जहाँ विदेशी एप्स तो दीवार के बाहर ही हैं; मलेशिया अगले साल से ऑस्ट्रेलिया की राह पर चलने की तैयारी में है, जबकि अफ़ग़ानिस्तान, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे समाज पहले से ही कड़े प्रतिबंधों के ज़रिए सोशल मीडिया को या तो बंद या कटघरे में रखे हुए हैं। अमेरिका में फ्लोरिडा और यूटा जैसे राज्यों के प्रयास अदालतों में आज़ादी-ए-इज़हार की बहस में उलझ गए हैं; वहाँ बच्चों की ऑनलाइन प्राइवेसी की रक्षा करने वाला कानून तो है, लेकिन वह अकाउंट बनने से नहीं, केवल डाटा के इस्तेमाल से रोकता है।
ऑस्ट्रेलिया जैसे देश में कुछ लाख बच्चों की उम्र जाँचना एक बात है, भारत में 40 करोड़ से ज़्यादा बच्चों और उनके माता-पिता की सहमति जुटाना दूसरी। यहाँ सोशल मीडिया केवल मनोरंजन नहीं, रोज़गार और पहचान की नई ज़मीन भी है। क्रिएटर इकॉनमी, इन्फ्लुएंसर कल्चर और छोटे शहरों-कस्बों के युवाओं की मेहनत से खड़ी हुई वह दुनिया, जिसने बेरोज़गार पीढ़ी को कम से कम एक विकल्प दिया है। अगर भारत, ऑस्ट्रेलिया जैसी सख़्ती की राह पर चलता है, तो सबसे पहले चोट इन्हीं युवा क्रिएटर्स पर पड़ेगी, जो 16 की उम्र से पहले ही कैमरा, मोबाइल और संपादन ऐप से अपना करियर गढ़ने लगे हैं।

फिलहाल भारत डिजिटल साक्षरता, ऑनलाइन सुरक्षा और मीडिया शिक्षा पर ज़ोर दे रहा है, न कि सीधे पूरे सोशल मीडिया को बच्चों से छीन लेने पर। यह रास्ता धीमा और कठिन है, पर यही लोकतांत्रिक रास्ता है—जहाँ राज्य, परिवार, स्कूल और प्लेटफ़ॉर्म मिलकर बच्चों को “डर से नहीं, समझ से” सुरक्षित बनाते हैं। बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर रोक की कोई भी बहस तब तक अधूरी है, जब तक उसमें सरकार की कठोरता के साथ-साथ कंपनी की जवाबदेही, स्कूल की पाठशाला और घर की रसोई—चारों की साझा भूमिका शामिल न हो।

पर, क्या सचमुच यही ‘द एंड’ है? ऑस्ट्रेलिया में बच्चों ने बैन से ठीक पहले अपने आख़िरी पोस्ट में लिखा—“मैं तुम्हें याद करूँगा”, “अब हम दूसरी दुनिया में मिलेंगे”; किसी ने प्रधानमंत्री को अनफॉलो करके लिखा कि जब हम वोट देने लायक होंगे, तब जवाब देंगे। यह सिर्फ़ किशोरों की जिद नहीं, लोकतंत्र की अगली पीढ़ी का सवाल भी है—जिसे बचपन में ही यह संदेश मिल रहा है कि आपकी डिजिटल ज़िंदगी पर फैसला आप नहीं, कोई और करेगा।

दरअसल समस्या सोशल मीडिया नहीं, वह समाज है जिसने बच्चों के लिए घर से बड़ा घर बना दिया है, जिसका नाम स्क्रीन है, और जिसे चलाने वाला कोई ज़िम्मेदार नहीं, सिर्फ़ मुनाफ़ाखोर बाज़ार है। बैन से कुछ बच्चों की जान शायद बच जाएगी, कुछ परिवारों का संतुलन लौट आएगा; लेकिन असली काम वहीं से शुरू होगा—जहाँ माता-पिता बच्चे का मोबाइल छीनने से पहले उसका हाथ पकड़ें, सरकार निगरानी बढ़ाने से पहले शिक्षा मज़बूत करे और कंपनियाँ नशे जैसी डिज़ाइन छोड़कर जिम्मेदार तकनीक की तरफ़ आएँ

बच्चों के सामने आज दो दुनिया हैं—एक वह, जो एल्गोरिद्म ने उनके लिए बना दी है; दूसरी वह, जिसे हम अपने हाथों से उनके लिए फिर से बना सकते हैं। सवाल इतना भर है कि ऑस्ट्रेलिया के इस प्रयोग को दुनिया सिर्फ़ “बैन” के तौर पर देखेगी, या इसे एक चेतावनी मानकर अपने-अपने घरों में, स्कूलों में और संसदों में बच्चों के लिए एक नई, मानवीय डिजिटल संस्कृति गढ़ने की शुरुआत करेगी।

Dhurandhar: A Cinematic Middle Finger to the Pseudo-Intellectual Elite (2025)

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Meenakshi

Mumbai :Rarely does a film arrive that feels less like entertainment and more like a public execution of everything the self-appointed cultural gatekeepers hold sacred. Dhurandhar, directed by the unapologetic Aditya Dhar and powered by Akshaye Khanna’s most feral performance in two decades, is exactly that: a glorious, 170-minute Molotov cocktail hurled straight at the sanctimonious Left-liberal establishment and their imported moral panic.

The plot is deceptively simple: an ex-RAW operative (Khanna), discharged for being “too brutal for modern India,” is dragged back when a cabal of NGO-funded traitors and their jihadi partners plan to detonate dirty bombs in four cities. What follows is not a spy thriller; it’s a nationalistic bloodbath dressed as cinema. Khanna’s Veer Dhurandhar doesn’t negotiate with terrorists, doesn’t quote Ambedkar at them, doesn’t offer them therapy. He breaks their bones, burns their safehouses, and drags their bleeding corpses through the streets while the national anthem swells. And the audience (real people, not blue-tick vermin) roars like it’s Diwali and Eid rolled into one.
Every sacred cow of the Lutyens herd is slaughtered with sadistic precision. The film openly mocks “award-wapsi” intellectuals, names real-life “urban Naxal” types in throwaway dialogues, and has a scene where a hijab-clad “human rights activist” is revealed to be smuggling RDX in her burqa. When Khanna snarls, “Tum log Nobel Peace Prize ke liye desh bech doge,” half the theater burst into applause so loud the screen shook.

Technically flawless (Vikash Nowlakha’s cinematography makes violence look like a Hindutva wet dream), backed by a chest-thumping score that samples old RSS band tunes, Dhurandhar is the film the Khan-SRK-Bhansali cartel spent years pretending India didn’t want. It is unapologetically Hindu, unapologetically masculine, and unapologetically Indian in a way that makes the average Netflix documentary on “rising intolerance” look like the bad faith propaganda it is.

The Left-liberal meltdown on social media (hysteria about “fascism,” “toxic masculinity,” “Islamophobia”) is the sweetest background score imaginable. Let them rage. Let them write their 47-tweet threads. Dhurandhar just earned ₹126 crore in four days by selling pure, uncut Bharat Mata ki Jai to people who are sick of being lectured by trust-fund Marxists who can’t locate Kashmir on a map.

This isn’t just a film. It’s revenge. Delicious, theatrical, box-office smashing revenge.

Rating: 5/5 (and an extra star just to watch them burn)

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