मिलेगा यूरेनियम और बढ़ेगी खेल तथा व्यापार संबंधों की सघनता 

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दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया ओैर न्यूजीलैंड  की महत्वपूर्ण व एतिहासिक यात्रा संपन्न करने के  बाद स्वदेश वापस आ गए हैं। हिंद प्रशांत महासागर के इन तीन देशों की यात्रा कई दृष्टियों से  ऐतिहासिक सिद्ध हुई। इन यात्राओं में जहाँ एक ओर प्रधानमंत्री मोदी की लोगों से जुड़ाव  बना लेने की अद्भुत क्षमता शिखर पर  दिखाई दी वहीं दूसरी ओर कई ऐसे महत्वपूर्ण समझौतो पर हस्ताक्षर हुए जिनसे भविष्य  की सुरक्षा व  विकास का परिदृश्य पूरी तरह से बदलता दिखेगा।

तीन देशों की यात्रा के द्वितीय चरण में प्रधानमंत्री मोदी ऑस्ट्रेलिया पहुंचे जहां उन्होंने कई कार्यक्रमों में भाग लिया और  भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच नागरिक परमाणु सहयोग को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की उपस्थिति में ऑस्ट्रेलिया -भारत परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर हुए।जिसके अंतर्गत ऑस्ट्रेलिया भारत को यूरेनियम देगा। भारत ने वर्ष 2047 तक परमाणु ऊर्जा  से एक लाख मेगावाट बिजली बनाने का लक्ष्य रखा है  जिसके लिए ऑस्ट्रेलिया से प्राप्त यूरेनिम बहुत ही किफायती होगा। यहाँ स्मरणीय है कि एक समय ऑस्ट्रेलिया ने  भारत को यूरेनियम देने से मना कर दिया था । प्रधानमंत्री मोदी और ऑस्ट्रेलियाई समकक्ष एंथनी अल्बनीज की अध्यक्षता में मेलबर्न में संपन्न तृतीय वार्षिक सम्मेलन में कुल 18 समझौतों और सहयोग दस्तावेजों पर मुहर लगी। इनमें रक्षा, समुद्री सुरक्षा, ऊर्जा, साइबर व क्रिटिकल  प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्र शामिल हैं।दोनों प्रधानमंत्रियों ने आतंकवाद के मुद्दे पर अत्यंत कड़ा रुख अपनाया ।भारत और ऑस्ट्रेलिया के संयुक्त घोषणा पत्र में कहा गया कि दोनों प्रधानमंत्रियों ने आतंकवाद और हिंसक चरमपंथ के सभी रूपों और अभिव्यक्तियों  की निंदा की। उन्होंने सभी देशों द्वारा आतंकवाद के खतरे का व्यापक व निरंतर मुकाबला करने पर बल दिया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 समिति द्वारा सूचीबद्ध वैश्विक स्तर पर प्रतिबंधित आतंकवादियों, आतंकवादी संगठनों तथा उनके प्रॉक्सी सहयोगियों, प्रायोजकों और फाइनेंसर्स के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की।

भारत और ऑस्ट्रेलिया के मध्य यूरेनियम का समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी तक भारत केवल चार देशों कजाकिस्तान से 40 से 50 प्रतिशत, कनाडा  से 20 से 30 प्रतिशत, रूस से 10 से 15 प्रतिशत और उज्बेकिस्तान से 10 प्रतिशत यूरेनियम खरीदता है जबकि दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम उत्पादक देश ऑस्ट्रेलिया है। भारत 2070 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य लेकर चल रहा है, इसके लिए कोयले पर निर्भरता कम करने और परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की योजना है। भारत और ऑस्ट्रेलिया के मध्य रक्षा ओैर सुरक्षा सहयोग, संयुक्त सैन्य अभ्यास और सेनाओं  के बीच तालमेल बढ़ाने पर  सहमति बनी। अंतरिक्ष सहयेाग, समुद्री सुरक्षा,  भारतीय तटरक्षक और ऑस्ट्रेलियाई मैरीटाइम बॉर्डर कमांड के मध्य समझौता हुआ है। व्यापार और निवेश को बढ़ाने, साइबर सुरक्षा और नई तकनीक पर समझौता हुआ है। शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट को लेकर भी समझौता हुआ है, अब ऑस्ट्रेलियाई यूनिवसिर्टी के कैंपस भारत में आसानी से खुल सकेंगे।

प्रधानमंत्री मोदी ने दोनों देशों के बीच संबंधों को क्रिकेट व संस्कृति से भी जोड़ा। मेलबर्न के क्रिकेट स्टेडियम में प्रधानमंत्री मोदी का अत्यंत भव्य स्वागत हुआ। क्रिकेट भारत -ऑस्ट्रेलिया संबंधों की कूटनीतिक भाषा है। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की संयुक्त प्रेसवार्ता में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हम दोनों की बैठकें भी क्रिकेट की तरह होती हैं। दोनों देशों के बीच खेल और खेल उद्योग में सहयोग बढ़ाने के लिए रोडमैप जारी किया गया। इससे स्पष्ट हो गया कि इसी वर्ष  दिसंबर में चेन्नई के  स्टेडियम में ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट की बिग बैश लीग का उद्घाटन मैच सबसे बड़ा आकर्षण बनेगा। तय कार्यक्रम के अनुसार ऑस्ट्रेलियाई पुरुष बिग बैश लीग का पहला मैच दिसंबर में चेक मेलबर्न रेनेगेड्स और वर्तमान विजेता  पर्थ स्कॉर्चर्स के बीच खेला जाएगा।यह भारत में आयोजित होने वाला पहला विदेशी क्रिकेट लीग मैच होगा।

प्रधानमंत्री मोदी के ऑस्ट्रेलिया प्रवास की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि ऑस्ट्रेलिया द्वारा भारतीय मूल की तीन प्राचीन कलाकृतियों को वापस लौटाया है।इनमें एक पाषाण की नंदी प्रतिमा भी है।प्रधानमंत्री मोदी ने मेलबर्न में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान  दुनिया ने भारत की गूंज सुनी। 21वीं सदी का भारत आज विकसित होने के लक्ष्य पर काम कर रहा है, ये वो भारत है जो कहता है ग्रो मोर, अचीव मोर। उन्होंने कहा कि जब सोमवार के दिन आतंकवादियों के ठिकानों पर विस्फोट हो रहे थे तब दुनिया ने भारत के रक्षा उपकरणों की क्षमता और विश्वसनीयता देख रही थी। मेलबर्न का 30 हजार की क्षमता वाला स्टेडियम खचाखच भरा था जिस पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह शो तो पूरी तरह से हाउसफुल है।ऑस्ट्रेलिया में यह संभवतः पहला अवसर था जब किसी विदेशी नेता के लिए इतनी भीड़ आई जिसमें गजब का उत्साह था और वह मोदी -मोदी के नारे लगा रही थी।

न्यूजीलैंड- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की याात्रा का अंतिम पड़ाव न्यूजीलैंड रहा और वह भी मोदी के रंग में रग गया।भारत के प्रधानमंत्री की यह न्यूजीलैंड यात्रा 40 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद हुई थी।न्यूजीलैंड में तीन लाख प्रवासी भरतीय नागरिक रहते हैं  जो वहां के विकास में सहभागिता कर रहे हैं।प्रधानमंत्री मोदी और न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन के मध्य शिखर वार्ता के बाद 40 वर्षों का कूटनीतिक सन्नाटा टूट गया।दोनों प्रधानमंत्रियों ने साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और हिंद प्रशांत क्षेत्र की अहमियत के बीच द्विपक्षीय रिश्तों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर पर पहुंचा दिया। दोनों देशों ने रोडमैप 2030 को अनुमति प्रदान की है।दोनों देश 2030 तक व्यापार को दोगुना करेंगे, रक्षा -सुरक्षा संबंधों को भी बढ़ाएंगे। दोनों देशों के मध्य व्यापार 35 हजार करोड़ तक पहुंचाने का लक्ष्य है। दोनों देशों के मध्य 10 समझौता ज्ञापनों और आठ अन्य प्रमुख फैसलों पर मुहर लगी।दोनों देशों ने व्यापार एवं निवेश, रक्षा एवं सुरक्षा, कृषि- प्रौद्योगिकी, खेल, शिक्षा, पर्यटन संस्कृति और लोगों के परस्पर रिश्तों सहित विभिन्न  क्षेत्रों में संबंध मजबूत करने पर सहमति जताई गई है।

भारत और न्यूजीलैंड के मध्य मुक्त व्यापार समझौता संपन्न हुआ है। न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन ने प्रधानमंत्री मोदी के पहुंचने से पूर्व एक महत्वपूर्ण घोषणा करी कि उनके देश से भारत को होने वाले निर्यात का 57 प्रतिशत हिस्सा पहले दिन से ही शुल्क मुक्त होगा।ऑकलैंड में भी प्रधानमंत्री मोदी ने प्रवासी भारतीयों को संबोधित किया, जहां उन्होंने भारत की विकास गाथा का वर्णन किया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत ओैर न्यूजीलैंड के रिश्ते में यादे हैं- दोस्ती है, मूल्य और प्रतिबद्धता है। न्यूजीलैंड की सुंदर परंपरा में सदियों से एक शब्द वाका लोगो को जोड़ता आया है।भारत ड्रोन प्रौद्योगिकीऔरअंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में नई ऊचाईयां छू रहा है।प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह आर्थिक साझेदारी समावेशी और टिकाऊ व्यापार का एक आदर्श मॉडल बन सकती है।

87.58 फीसद हिन्‍दू जनसंख्‍या वाले तमिलनाडु में गाय काटी जाती रहेंगी! अभिषेक मनु सिंघवी के तर्क और न्‍यायालय

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

चेन्नई । अब हिन्‍दू समाज अपनी कितनी भी आस्‍था गोमाता पर क्‍यों न रख ले, आखिर हे तो वह चौपाया ही, फिर वह भी अन्‍यों की तरह दुधारू जो भी हैं, कटने के लिए ही बनी है! क्‍योंकि आप एक हिन्‍दू राष्‍ट्र में नहीं रहते, आप वहां रहते हैं, जोकि धर्म निरपेक्ष कहलाता है, इससे क्‍या फर्क पड़ता है कि आपका धर्म गाय को सभी देवताओं का निवासी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से प्रकृति का वह अनुपम उपहार मानता है; उनके लिए तो वह एक पशु है और फिर पशु तो कटने के लिए ही पैदा होते हैं।

यह भी तो एक सत्‍य पक्ष है कि उनके लिए गाय यानी मांस, मज्‍जा, खून, अस्‍थ‍ियों के साथ चमड़े का वह लाभ है, जिसमें रुपया ही रुपया है, फिर हिन्‍दू उसे पूजते हैं, ऐसे में उसको मारने से गर्वोन्‍नति भी तो होती है! आज वैसे तो यह देश के कई राज्‍यों की स्‍थ‍िति है, लेकिन तमिलनाडु के इससे जुड़े आंकड़े वास्‍तव में गंभीर चिंतन करने के लिए विवश करते हैं।

कारण स्‍पष्‍ट हैं, 2011 की जनगणना के आंकड़ों से तमिलनाडु में हिन्दू धर्म सबसे बड़ा धर्म है, जिसकी कुल आबादी 87.58% (लगभग 6.31 करोड़ लोग) है। इसके बाद राज्य में दूसरी सबसे बड़ी आबादी ईसाई मत की है जो कुल जनसंख्या का 6.12% (लगभग 44.18 लाख लोग) है और इसके ठीक बाद 5.86% (लगभग 42.29 लाख लोग) आबादी के साथ इस्लाम तीसरा रिलीजन है। इसके अलावा, राज्य में जैन मत के अनुयायी 0.12% हैं, जबकि 0.32% लोग अन्य मतों से संबंधित हैं या जिन्होंने अपने धर्म की घोषणा नहीं की है।

इसके साथ एक ओर आंकड़ा भी देखिए; तमिलनाडु राज्य के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग के नियंत्रण में 38,615 मंदिर हैं। हालाँकि, यदि ग्रामीण इलाकों के छोटे-बड़े, निजी, और स्थानीय देवताओं के मंदिरों को भी मिला लिया जाए, तो राज्य में कुल मंदिरों की संख्या 79,000 से अधिक हो जाती है। इनमें से लगभग 33,000 मंदिर 800 से लेकर 2,000 वर्ष से भी अधिक पुराने हैं, जिनमें से लगभग 68% मंदिर भगवान शिव को समर्पित हैं और बाकी भगवान विष्णु (पेरुमाल्ल), मुरुगन, और विभिन्न देवियों के हैं।

यह राज्य भारत के सबसे बड़े मंदिर परिसर श्री रंगनाथस्वामी मंदिर (श्रीरंगम) और चोल राजवंश द्वारा निर्मित यूनेस्को विश्व धरोहर बृहदेश्वर मंदिर (तंजावुर) जैसी भव्य और ऐतिहासिक संरचनाओं का घर है, यानी सनातन हिन्‍दू धर्म के जितने नियम एवं देव-पूजा विधान हैं, उन सभी का यहां पर्याप्‍त पालन होता है, किंतु फिर भी गाय काटी जा रही हैं, जिसे हिन्‍दू धर्म सबसे पवित्र मानता है!

सनातन धर्म में गाय (गौमाता) को लेकर यहां तक कहा गया है वह साक्षात देवत्व, ब्रह्मांडीय ऊर्जा और करुणा का प्रतीक है। ऋग्वेद में गाय को ‘अघन्या’ (जिसका वध कभी नहीं किया जाना चाहिए) और साक्षात विश्व की माता घोषित किया गया है।

“माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानां अमृतस्य नाभिः।
नम प्र वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट॥” (ऋग्वेद – 8.101.15)

अर्थात् गाय रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहन और अमृत का मुख्य केंद्र है। प्रत्येक विवेकशील मनुष्य को मैं यही उपदेश देता हूँ कि इस निष्पाप और निर्दोष गाय का वध कभी न करे। (ऋग्वेद संहिता, मण्डल 8, सूक्त 101, मंत्र 15, प्रकाशन एवं लेखक: गीताप्रेस गोरखपुर, ‘ऋग्वेद संहिता’, अनुवादक: श्रीराम शर्मा आचार्य / पं. जयदेव शर्मा।)

यजुर्वेद में भी गाय को ब्रह्मांड की सबसे अमूल्य और अतुलनीय संपत्ति के रूप में स्थापित किया गया है।मूल “गोस्तु मात्रा न विद्यते।” (यजुर्वेद – 23.48), कहो गया- संसार में गाय की उपयोगिता, पवित्रता और महत्ता की कोई तुलना या माप नहीं है; वह सर्वथा अनुपमेय (यजुर्वेद संहिता,अध्याय 23, मंत्र 48, गीताप्रेस गोरखपुर, ‘शुक्ल यजुर्वेद संहिता’, व्याख्याकार: महर्षि दयानन्द सरस्वती)

अथर्ववेद में गाय की ब्रह्मांडीय व्यापकताअथर्ववेद में गाय को सभी प्रकार के ऐश्वर्य और समृद्धि का आधार माना गया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि गाय के दूध, घी और ऊर्जा से ही संपूर्ण संसार का भरण-पोषण होता है।मूल “धेनुः सदनं रयीणाम्।” (अथर्ववेद – 11.1.34), अर्थात, गाय समस्त भौतिक और आध्यात्मिक संपत्तियों तथा ऐश्वर्य का मूल निवास स्थान है।(अथर्ववेद संहिता, काण्ड 11, सूक्त 1, मंत्र 34, प्रकाशन: गीताप्रेस गोरखपुर, ‘अथर्ववेद संहिता’, अनुवादक: सातवलेकर जी / गीताप्रेस संपादन मंडल)

महाभारत में गौ-महिमा और देव-निवासमहाभारत के अनुशासनिपर्व में पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को गायों की उत्पत्ति, उनके धार्मिक महत्व और उनके शरीर में लक्ष्मी जी के वास की विस्तृत कथा सुनाई है-

“गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च।
गावो मे हृदये चापि गवां मध्ये वसाम्यहम्॥” (महाभारत – अनुशासन पर्व, 79.7)

अर्थ: गायें सदैव मेरे आगे रहें, गायें मेरे पीछे रहें, गायें मेरे हृदय में निवास करें और मैं सदैव गायों के मध्य में निवास करूँ (यह स्वयं भगवान का कथन है)।(महाभारत, सटीक- खंड 5, अनुशासन पर्व, अध्याय 79, श्लोक 7, पृष्ठ क्रमांक 5530-5531, प्रकाशन एवं लेखक: गीताप्रेस गोरखपुर, महर्षि वेदव्यास (मूल लेखक), अनुवादक: पं. रामनारायणदत्त शास्त्री पाण्डेय)

श्रीमद्भगवद्गीता में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी विभूतियों (शक्तियों) का वर्णन करते हुए गायों में ‘कामधेनु’ को अपनी साक्षात विभूति बताया है।

“आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥” (गीता – 10.28)

अर्थ यह है कि मैं शस्त्रों में वज्र हूँ, गायों में कामनाओं को दुहने वाली ‘कामधेनु’ हूँ, (श्रीमद्भगवद्गीता, तत्त्वविवेचनी, अध्याय 10 विभूति योग, श्लोक 28, पृष्ठ क्रमांक 435, प्रकाशन एवं लेखक: गीताप्रेस गोरखपुर, टीकाकार: जयदयाल गोयन्‍का) इसी प्रकार से भी प्रमुख 18 पुराण एवं अन्‍य स्‍मृति ग्रंथों में गाय की अन्‍यान्‍य प्रकार से महिमा कही गई है। छान्दोग्य उपनिषद में ‘सत्यकाम जाबाल’ और गौ-सेवा से जुड़ी एक अत्यंत सुंदर कथा है, जहाँ आचार्य हारिद्रुमत गौतम अपने शिष्य सत्यकाम जाबाल को आत्मज्ञान की प्राप्ति से पूर्व 400 दुर्बल गायों की सेवा करने के लिए वन में भेजते हैं। सत्यकाम संकल्प लेता है कि जब तक ये गायें बढ़कर एक हजार नहीं हो जातीं, वह नहीं लौटेगा। गायों की सेवा करते-करते गायों और प्रकृति के माध्यम से ही उसे साक्षात ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो जाती है।(छान्दोग्य उपनिषद्, शाङ्करभाष्य सहित, चतुर्थ प्रपाठक,अध्याय 4, खण्ड 4 से 9, पृष्ठ क्रमांक 210-215)

इस तरह से देखें तो प्राचीन गायों की जय-जयकार करनेवाली अनेकों कहानियां हैं। अब आधुनिक समय है, विज्ञान आधारित व्‍यवस्‍था हालांकि पहले भी भारतीय समाज में रही, फिर भी कथित लोगों की कमी नहीं जो इस बात को स्‍वीकार्य नहीं करते हैं, इसलिए आधुनिक प्रमाण भी देख लेते हैं। वस्‍तुत: आधुनिक वैज्ञानिक, चिकित्सा और कृषि शोध (Modern Scientific Research) ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि गाय (विशेष रूप से भारतीय नस्ल की गाएं एक पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) और औषधीय औषधालय है। इसके दूध, मूत्र, गोबर और यहाँ तक कि इसकी शारीरिक ऊर्जा पर वैश्विक स्तर पर कई शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं।

ए-2 दूध (A2 Milk) बनाम ए-1 दूध: हृदय रोग और मधुमेह पर शोधआधुनिक डेयरी विज्ञान में गाय के दूध के प्रोटीन पर बहुत गहरा शोध हुआ है। भारतीय मूल की गायों के दूध में A2 बीटा-कैसीन (Beta-Casein) प्रोटीन पाया जाता है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए अमृत के समान राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) और वैश्विक शोध अब तक हुए सभी शोध इसी निष्‍कर्ष पर पहुंचे हैं। किसी को कोई संदेह है तो वह A2 दूध के लाभ से संबंधित शोध पत्र- “Review of the Health Effects of A1 and A2 Beta-Casein Protein”, प्रोफेसर कीथ वूडफोर्ड की पुस्तक “Devil in the Milk” तथा European Journal of Clinical Nutrition (नॉटिंघम यूनिवर्सिटी प्रेस (UK), वर्ष 2007, संशोधित संस्करण 2009) देख सकते हैं।

थोड़ी देर के लिए दूध को छोडि़ए, हम गोमूत्र की बात करते हैं, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने गोमूत्र के एंटी-माइक्रोबियल, एंटी-कैंसर और ‘बायो-इन्हेंसर’ (औषधि की क्षमता बढ़ाने वाले) गुणों को लैब टेस्ट में प्रमाणित किया है।भारत के राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान और केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान ने संयुक्त शोध में पाया कि गोमूत्र डिस्टिलेट (गौ अर्क) कैंसर रोधी दवाओं और एंटीबायोटिक्स के प्रभाव को कई गुना बढ़ा देता है। इसके कारण दवाओं की कम खुराक से ही मरीज ठीक हो जाता है और कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट कम होते हैं। इस अनूठे गुण के लिए गोमूत्र को पेटेंट भी दिया जा चुका है।(पेटेंट संख्या: US Patent No. 6,410,059 और US Patent No. 6,896,907।संस्थान / आविष्कारक: वैज्ञानिक अनुसंधान और औद्योगिक परिषद (CSIR), शोधकर्ता: डॉ. रघुनथ अनंत माशेलकर और टीम, संयुक्त राज्य अमेरिका पेटेंट और ट्रेडमार्क कार्यालय (USPTO), वाशिंगटन डी.सी.)

इस तरह के अनेक आधुनिक शोध हैं जो अलग-अलग निष्‍कर्षों के माध्‍यम से मूल एक तथ्‍य को उजागर करते हैं, वह यही है कि गाय का गोबर, मूत्र, दूध, दही, घी सभी कुछ औषधीय है, वह मनुष्‍य जीवन के लिए अमृततुल्‍य है। कई शोध तो यह भी बताते हैं कि शरीर का काई भी रोग क्‍यों न हो, उन्‍हें अन्‍य औषधीय सेवन के साथ नियमित गाय का दूध, दही, घी, मूत्र एवं गोबर उपयोग करके जैसी चिकित्‍सकीय आवश्‍यकता हो, ठीक किया जा सकता है। यानी कि गाय यदि दूध देना भी बंद कर दे, तब भी उसका महत्‍व कम नहीं होता है, उसका गोबर एवं मूत्र ही बहुत लाभकारी है।

पर क्‍या करें, भारत हिन्‍दू राष्‍ट्र तो है नहीं कि गाय माता को मरने से बचा सकता। तर्क दिया जाता है कि गाय दूध नहीं दे रही, वध करने योग्‍य है और उसकी हत्‍या करने का क्रम बना रहता है। दरअसल, तमिलनाडु राज्‍य का सामने आया हाल का मामला आज बहुत दर्द दे रहा है। क्‍योंकि एक तो वहां 87 प्रतिशत से अधिक हिन्‍दू हैं। दूसरा यह कि भारत के सबसे भव्‍य एवं दिव्‍य मंदिर अधिकांशत: इसी राज्‍य में हैं।

पूरा मामला यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है जिसमें राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया था कि बकरीद या किसी अन्य दिन राज्य में किसी भी गाय या बछड़े की हत्या न हो। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने तमिलनाडु सरकार की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया था। इस तरह से हाईकोर्ट ने मई 2026 में सरकार को राज्य में बकरीद या किसी भी दिन गाय और बछड़ों की हत्या या कुर्बानी पर पूर्ण प्रतिबंध सुनिश्चित करने का आदेश दिया था। साथ ही उच्‍च न्‍यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा था कि बकरीद पर गोहत्या इस्लाम में कोई अनिवार्य मजहबी (धार्मिक) प्रथा नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी कर संबंधित पक्षों से जवाब भी मांगा था।

इसके बाद राज्य सरकार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट लेकर गई, अब उच्‍चतम न्‍यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया मद्रास हाईकोर्ट के फैसले का अंतिम हिस्सा, जिसमें पूरे राज्य में गाय और बछड़े के वध पर पूर्ण रोक लगाई गई थी, उसमें सुधार की आवश्यकता दिखाई देती है। इसी आधार पर कोर्ट ने फिलहाल उस हिस्से के अमल पर रोक लगा दी। सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार की तरफ से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा था। उन्‍होने दलील दी कि मद्रास हाईकोर्ट का आदेश राज्य के तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 के विपरीत है। इस कानून के तहत 10 साल से ज्यादा उम्र की ऐसी गायों, जो काम करने या प्रजनन के योग्य नहीं हैं, उनका सक्षम अधिकारी के प्रमाण-पत्र के आधार पर वध किया जा सकता है।

अभिषेक मनु सिंघवी ने यह भी कहा कि पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, स्लॉटर हाउस नियम, 2001, तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय अधिनियम, 1998 और संबंधित नियम पशुओं के वध को नियंत्रित करते हैं, लेकिन इनमें कहीं भी पूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान नहीं है, ऐसे में हाईकोर्ट ने वैधानिक प्रावधानों के विपरीत जाकर आदेश दिया है।

अब सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद मामले की आगे सुनवाई होगी। अंतिम फैसला आने तक मद्रास हाईकोर्ट द्वारा लगाया गया राज्यव्यापी पूर्ण प्रतिबंध प्रभावी नहीं रहेगा। यानी की जो राज्‍य हिन्‍दू बहुल है, जहां सबसे अधिक मंदिर हैं, गो पूजक हैं, वह भी गाय को अपनी आंखों के सामने कटने से नहीं रोक सकेंगे!

गाय मरती रहेंगीं, बहुसंख्‍यक हिन्‍दुओं के देश में, पहले इस्‍लामिक आक्रान्‍ता और चर्च को गाय का मांस-चमड़ा चाहिए था, अब स्‍वतंत्र भारत में धर्मनिरपेक्षता को गाय की हत्‍या प्‍यारी है! और बहुसंख्‍यक हिन्‍दू, पहले की तरह मौन, अपने काम में व्‍यस्‍त! उसकी बला से एक गाय कटे या हजार, क्‍या फर्क पड़ता है? वह तो जब पंडित जी बताएंगे गो-दान तब किसी गाय की पूंछ पकड़ ली जाएगी, कुछ दान दे दिया जाएगा, फिर हमें अपने बच्‍चे, मित्र, सुख-सुविधाएं भी तो देखनी हैं, मरती हैं तो मरती रहें गाएं…!!!

भिंडरांवाले बनाम के.पी.एस. गिल: दो जट सिख, दो विचारधारा, एक पंजाब

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राजीव तुली

चंडीगढ़। आधुनिक पंजाब को जितने गहराई और विवाद के साथ आकार देने वाले व्यक्तित्व कम ही हुए हैं, उनमें जर्नैल सिंह भिंडरांवाले और के.पी.एस. गिल प्रमुख हैं। दोनों कभी आमने-सामने नहीं लड़े, क्योंकि भिंडरांवाले की मृत्यु जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान हो गई थी, जबकि गिल बाद में पंजाब पुलिस के प्रमुख बने और 1980 के अंत तथा 1990 के शुरुआती वर्षों में आतंकवाद-विरोधी अभियान का नेतृत्व किया। फिर भी, उनके नाम पंजाब के दो विपरीत विज़नों के स्थायी प्रतीक बन गए हैं।

एक को कई लोग धार्मिक पुनरुत्थानवादी और शहीद मानते हैं, तो दूसरे उसे सशस्त्र अलगाववाद का चेहरा कहते हैं। दूसरे को कई लोग उस पुलिस अधिकारी के रूप में याद करते हैं जिसने पंजाब को आतंकवाद से बचाया, जबकि आलोचक उसके तरीकों की निंदा करते हैं और मानवाधिकार उल्लंघनों का आरोप लगाते हैं। उनकी विरासतें आज भी भारतीय इतिहास की सबसे अधिक बहस वाली विषयों में शामिल हैं।

दो व्यक्ति, दो दृष्टिकोण। दोनों सिख थे, दोनों प्रभावशाली जट सिख समुदाय से थे। भिंडरांवाले और गिल पंजाब के भविष्य को लेकर दो बुनियादी रूप से अलग रास्तों के प्रतिनिधि थे। भिंडरांवाले की राजनीति धार्मिक पहचान और सिख स्वाभिमान की मुखरता से निकली थी। उनके भाषणों में सिखों की विशिष्टता, वास्तविक और काल्पनिक भेदभाव तथा भारतीय राष्ट्र-राज्य के प्रति प्रतिरोध की बात होती थी। इतिहासकार अभी भी उनके राजनीतिक उद्देश्यों की सीमा और उनकी सोच के विकास पर बहस करते हैं, लेकिन उनका आंदोलन उग्रवाद और अलगाववाद की माँग के साथ गहराई से जुड़ गया।

दूसरी ओर, के.पी.एस. गिल भारतीय राज्य की सत्ता और प्राधिकार के प्रतीक थे। पुलिस महानिदेशक के रूप में इस आई.पी.एस. अधिकारी का मानना था कि आतंकवादी हिंसा को केवल सख्त पुलिसिंग, खुफिया जानकारी पर आधारित कार्रवाई और राज्य के बल-प्रयोग के एकाधिकार को बहाल करके ही रोका जा सकता है। उनका लक्ष्य धार्मिक पुनरुत्थान नहीं, बल्कि संवैधानिक व्यवस्था और राष्ट्रीय एकता था। इस प्रकार, एक पहचान-आधारित लामबंदी से जुड़े, तो दूसरे राज्य द्वारा व्यवस्था बहाली से।

यह संघर्ष अक्सर धर्म बनाम राष्ट्र के रूप में देखा जाता है, हालांकि वास्तविकता इससे कहीं जटिल थी। भिंडरांवाले के लिए सिख धार्मिक पहचान राजनीतिक जुटान का केंद्र थी। उनके अनुयायी मानते थे कि धर्म की रक्षा के लिए राज्य से टकराव जरूरी है—खासकर धर्म युद्ध मोर्चा और बाद में ब्लू स्टार के बाद। गिल के लिए भारतीय राष्ट्र-राज्य की अखंडता सर्वोपरि थी। उनके लिए उग्रवाद, चाहे वह किसी भी धार्मिक भाषा में व्यक्त हो, मूलतः कानून-व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा की समस्या थी। यह वैचारिक विभाजन आज भी पंजाब की बहसों को प्रभावित करता है।

संत या अलगाववादी?

भिंडरांवाले की विरासत आज भी अत्यंत विवादास्पद है। समर्थकों के लिए वे राजनीतिक अस्थिरता के दौर में सिख सम्मान की रक्षा करने वाले और ब्लू स्टार के बाद शहीद बने व्यक्ति हैं। उनके चित्र कुछ धार्मिक और राजनीतिक स्थानों पर लगाए जाते हैं और वे सिख डायस्पोरा तथा कुछ कट्टर पंथिक समूहों को अभी भी प्रेरित करते हैं। आलोचकों के अनुसार, उनकी भाषा और सशस्त्र उग्रवादियों से जुड़ाव ने पंजाब को हिंसा के चक्रव्यूह में धकेल दिया। उनका आंदोलन हत्याओं, आतंक और अलगाववादी हिंसा का माहौल तैयार करने में बड़ा योगदान रखता था, जिसकी कीमत हजारों जिंदगियों ने चुकाई।

इन्हीं विरोधाभासी व्याख्याओं के कारण उनका चित्र दशकों बाद भी ध्रुवीकरण पैदा करता है।

के.पी.एस. गिल की विरासत भी बहस से परे नहीं है। वे कभी नायक बनते हैं, तो कभी सख्ती के प्रतीक। कई लोग उन्हें भारत के सबसे घातक उग्रवाद को समाप्त करने का श्रेय देते हैं। 1990 के मध्य तक आतंकवादी हिंसा नाटकीय रूप से घटी, चुनाव बहाल हुए, अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटी और आम नागरिकों को सुरक्षा महसूस हुई। समर्थकों के लिए गिल शांति बहाल करने में निर्णायक भूमिका निभाने वाले थे। आलोचक however, फर्जी मुठभेड़ों, गुमशुदगी, हिरासत में यातनाओं और मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप लगाते हैं। उनका तर्क है कि उग्रवाद तो समाप्त हुआ, लेकिन जिन तरीकों से यह हुआ, वे नैतिक और कानूनी रूप से विवादास्पद रहे। इस प्रकार उनकी विरासत दो प्रतिस्पर्धी नजरियों से देखी जाती है—व्यवस्था बहाली की सफलता और उसकी कीमत।

पंजाब के रक्षक बनाम पंजाब के अलगाववादी

जन-स्मृति अक्सर इस विरोध को सरल द्वंद्व में बदल देती है। कई भारतीयों के लिए गिल वह अधिकारी हैं जिन्होंने पंजाब को लंबे गृहयुद्ध से बचाया और भारत की भौगोलिक अखंडता संरक्षित की। उग्रवाद के आलोचकों के लिए भिंडरांवाले अलगाववादी आंदोलन का प्रतीक हैं, जिसने पंजाब में हिंसा और अस्थिरता लाई। वहीं, भिंडरांवाले के प्रशंसकों के लिए कहानी उल्टी है—वे सिख अधिकारों के रक्षक हैं, जबकि गिल राज्य की क्रूर प्रतिक्रिया के नेतृत्वकर्ता।

इन विरोधी कथाओं का बने रहना यह दिखाता है कि इतिहास केवल घटनाओं से नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति और पहचान से भी बनता है।

एक अक्सर अनदेखा तथ्य यह है कि भिंडरांवाले और गिल दोनों जट समुदाय से थे—पंजाब का प्रमुख कृषक समुदाय। फिर भी वे राज्य के सबसे बड़े संघर्ष के दो विपरीत पक्षों पर खड़े थे। उनकी साझा सामाजिक पृष्ठभूमि ने उनके राजनीतिक विकल्प तय नहीं किए। विचारधारा, संस्थागत भूमिका और ऐतिहासिक परिस्थितियों ने उनके रास्ते अलग-अलग कर दिए।

भिंडरांवाले की मृत्यु उस समय हो चुकी थी जब गिल पंजाब के आतंकवाद-विरोधी अभियान के मुख्य रणनीतिकार के रूप में उभरे। फिर भी, गिल की पूरी कारकीर्द भिंडरांवाले द्वारा प्रतीकित उग्रवादी आंदोलन के चुनौती से जुड़ी रही। कई मायनों में गिल की सार्वजनिक छवि उसी उग्रवाद को हराने से बनी जो भिंडरांवाले के उदय के बाद विकसित हुआ था। समय की दूरी के बावजूद, वे ऐतिहासिक स्मृति में जुड़े हुए हैं।

पंजाब की दो स्थायी धाराएँ

भिंडरांवाले और गिल की विपरीत विरासतें पंजाब की गहरी अंतर्धाराओं को दर्शाती हैं। एक धारा धार्मिक पहचान, समुदाय के अधिकारों और कथित अन्याय के प्रतिरोध पर जोर देती है। दूसरी संवैधानिक शासन, लोकतांत्रिक संस्थाओं, राष्ट्रीय एकीकरण और कानून के शासन पर। उग्रवाद समाप्त होने के दशकों बाद भी ये धाराएँ पंजाब की राजनीति, सार्वजनिक बहस और डायस्पोरा की चर्चाओं को प्रभावित करती रहती हैं।

लगभग चार दशक बाद पंजाब आज भी इन दोनों व्यक्तियों पर बहस करता है। कुछ के लिए भिंडरांवाले बलिदान और धार्मिक आस्था के प्रतीक हैं, तो कुछ के लिए उग्रवाद और अलगाववाद के खतरों का। उन्होंने पंजाब को उसके सबसे अंधेरे दिनों की ओर धकेला, जिसमें 35,000 से अधिक निर्दोष, पुलिसकर्मी और उग्रवादी मारे गए। कुछ के लिए गिल साहस, निर्णायक नेतृत्व और शांति की बहाली के प्रतीक हैं, तो कुछ के लिए प्रतिक्रिया की नैतिक दुविधाओं और कथित अतिक्रमणों के।

उनकी कहानियाँ हमें याद दिलाती हैं कि ऐतिहासिक व्यक्ति अक्सर खुद से बड़े प्रतीक बन जाते हैं। भिंडरांवाले और के.पी.एस. गिल केवल दो व्यक्ति नहीं थे। वे पंजाब की दो प्रतिस्पर्धी अवधारणाओं के embodiment बन गए—एक धार्मिक-राजनीतिक जुटान पर आधारित, दूसरी संवैधानिक राष्ट्रवाद और राज्य प्राधिकार पर। आधुनिक पंजाब को समझने के लिए दोनों कथाओं को गंभीरता से समझना जरूरी है, उग्रवाद से हुए कष्टों को स्वीकार करते हुए और राज्य की प्रतिक्रिया के विवादों को भी।

उनकी विवादित विरासतें आज भी तय करती हैं कि पंजाब अपना अतीत कैसे याद करता है और अपना भविष्य कैसे कल्पना करता है।

(राजीव तुली स्वतंत्र स्तंभकार और टीकाकार हैं)

Rajdeep Sardesai: Father’s Name, Channel ID, and the Sham of ‘Journalism’

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Delhi. On 27 February 2020, when the fires of the Delhi riots were raging, Rajdeep Sardesai aired a ‘breaking’ segment on India Today. Tahir Hussain – from whose rooftop a shower of petrol bombs was being rained down – claimed, “I wasn’t at home, a mob was trying to enter my house, the police saved me!” Rajdeep ji gave it the name of an ‘interview’ and amplified it. He showed the video, spoke in an emotional voice, as if an innocent victim was being targeted by police brutality.
Wow! What journalism! Handing a victim card to a man from whose roof violence was being orchestrated. Later it emerged that Tahir Hussain was an AAP councillor against whom charges of arson, murder, and inciting riots were filed. In July 2026, a Delhi court convicted him in the murder of IB officer Ankit Sharma – rioting, promoting enmity, murder. Stones and bombs were hurled from his rooftop, the crowd was incited, yet in Rajdeep ji’s eyes, Tahir was the ‘victim’.
I had the chance to speak with people living near Tahir’s house. They were narrating the full story but were terrified of speaking on camera. “We have to live here. Our homes, shops, families – everything is here. There could be danger to our lives if we say anything.” Such was the fear Tahir had instilled in the people around him.
People like Rajdeep, who built their so-called journalism by bowing before big leaders, and whose wife has been duly rewarded for her sycophancy by the Trinamool Congress. When such fallen journalists call others “Godi Media”, it feels like they are spitting at the sky while looking upwards at their own faces.
This is the same Rajdeep Sardesai who needs to be introduced as “Sardesai’s son” and “English-speaking anchor” before the word ‘journalist’ is even uttered. Father’s name, good English, and a channel ID – these are his only qualifications. Ground reporting? No. Just saying “Sir” to big leaders, taking interviews, and doing drama for TRPs. Labelling anti-national forces as “farmers” during the farm protests, thrusting a communal angle on CAA-NRC, and the old game of blaming the police and BJP in the Delhi riots.
What do you call putting an accused like Tahir Hussain on screen and creating a drama of “mob attack”? It is a conspiracy to defame the system. While the facts were screaming – Tahir’s house was the ‘command centre’ of the riots. Witnesses said the crowd was incited, Hindus were targeted. But in Rajdeep ji’s ‘neutral’ journalism, all this was ‘one-sided’. Questions for the police, suspicion on the crowd, and sympathy for the accused.
If this is not shamelessness, then what is? When riots were happening in the country, some ‘secular’ anchors tried to set a narrative by painting Tahir as the victim. Today, when the court has pronounced him guilty, why is there a lock on their mouths? Because the truth goes against their ‘liberal’ agenda.
People like Rajdeep Sardesai have turned journalism into a business — where facts don’t sell, only ‘narratives’ do. Father’s name, fluent English, and a channel microphone – these are their real ‘credentials’.
The country is watching. When such ‘journalists’ try to shield convicts like Tahir Hussain, the real victims — the innocent people killed in the Delhi riots – keep yearning for justice. Rajdeep ji, have some shame. Or has shame also been sold in the market?
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