राजदीप सरदेसाई: पिता का नाम, चैनल की आईडी और ‘पत्रकारिता’ का ढोंग

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दिल्ली। 27 फरवरी 2020 को जब दिल्ली दंगों की आग भड़क रही थी, तब राजदीप सरदेसाई ने इंडिया टुडे पर एक ‘ब्रेकिंग’ प्रसारित की। ताहिर हुसैन, जिसके घर की छत से पेट्रोल बमों की बौछार हो रही थी, ने दावा किया- “मैं घर में नहीं था, भीड़ घर में घुसने की कोशिश कर रही थी, पुलिस ने बचाया!” और राजदीप जी ने इसे ‘इंटरव्यू’ का नाम देकर हवा दी। वीडियो दिखाया, भावुक स्वर में पूछा, जैसे कोई निर्दोष शिकार पुलिस की क्रूरता का शिकार हो रहा हो।

अरे वाह! क्या पत्रकारिता है! एक ऐसे शख्स को, जिसकी छत से हिंसा हो रही थी, विक्टिम कार्ड थमा दिया। बाद में पता चला कि ताहिर हुसैन आप काउंसलर था, जिन पर आगजनी, हत्या और दंगे भड़काने के आरोप लगे। जुलाई 2026 में दिल्ली कोर्ट ने उन्हें आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में दोषी ठहराया- रीओटिंग, प्रमोटिंग एनिमिटी, मर्डर। घर की छत से पत्थर और बम फेंके गए, भीड़ को उकसाया गया, फिर भी राजदीप जी की नजर में ताहिर ‘पीड़ित’ थे।

ताहिर के घर के आस पास के लोगों से बातचीत का अवसर मिला था। वहां लोग पुरी कहानी सुना रहे थे लेकिन कैमरे पर बातचीत से डर जाते थे। यहीं रहना है। घर, दुकान, परिवार सब यहीं हैं, जान का खतरा हो सकता है, कुछ बोला तो। इतना खौफ था ताहिर का अपने आस पास के लोगों पर। राजदीप जैसे लोग जिन्होंने बड़े बड़े नेताओं के आगे पीछे करके अपनी पत्रकारिता चमकाई और उनकी बीवी ने तो अपनी चाटुकारिता का ईनाम भी तृणमूल से हासिल कर लिया। जब इन जैसे गिरे हुए पत्रकार किसी को गोदी मीडिया कहते हैं तो लगता है कि ये दोनों अपने मुंह पर ही आसमान की तरफ देखकर थूक रहे हैं।

यह वही राजदीप सरदेसाई हैं, जिन्हें ‘पत्रकार’ कहने से पहले ‘सर्देसाई पुत्र’ और ‘इंग्लिश स्पीकिंग एंकर’ जोड़ना पड़ता है। पिता का नाम, अच्छी अंग्रेजी और चैनल की आईडी- बस, यही क्वालिफिकेशन। असली जमीन पर उतरकर रिपोर्टिंग? नहीं, सिर्फ बड़े-बड़े लीडरों के सामने ‘सर’ बोलकर इंटरव्यू लेना और टीआरपी के लिए नाटक। किसान आंदोलन में देश-विरोधी ताकतों को ‘आंदोलनकारी’ बताना, सीएए-एनआरसी पर सांप्रदायिक एंगल थोपना, और दिल्ली दंगों में पुलिस-बीजेपी को दोषी ठहराने का पुराना खेल।

ताहिर हुसैन जैसे आरोपी को स्क्रीन पर लाकर ‘मॉब अटैक’ का ड्रामा रचना क्या है? सिस्टम को बदनाम करने की साजिश। जबकि तथ्य चीख-चीखकर कह रहे थे- ताहिर का घर दंगे का ‘कमांड सेंटर’ था। गवाहों ने कहा, भीड़ को उकसाया गया, हिंदू टारगेट किए गए। लेकिन राजदीप जी की ‘न्यूट्रल’ पत्रकारिता में ये सब ‘एकतरफा’ था। पुलिस पर सवाल, भीड़ पर संदेह, आरोपी पर सहानुभूति।

यह बेशर्मी नहीं तो क्या है? जब देश में दंगे हो रहे थे, तब कुछ ‘सेकुलर’ एंकरों ने ताहिर को ‘पीड़ित’ बनाकर नैरेटिव सेट करने की कोशिश की। आज जब कोर्ट ने सजा सुनाई है, तब इनके मुंह पर ताला क्यों? क्योंकि सच्चाई उनके ‘लिबरल’ एजेंडे के खिलाफ है। राजदीप सरदेसाई जैसे लोग पत्रकारिता को धंधा बना चुके हैं- जहां तथ्य नहीं, ‘नैरेटिव’ बिकता है। पिता का नाम, अच्छी अंग्रेजी और चैनल का माइक- यही उनका असली ‘क्रेडेंशियल’ है।

देश देख रहा है। ऐसे ‘पत्रकार’ जब ताहिर हुसैन जैसे दोषियों को बचाने की कोशिश करते हैं, तो असली पीड़ित- दिल्ली के दंगे में मारे गए निर्दोष- न्याय की आस में तरसते रहते हैं। राजदीप जी, शर्म करो। या फिर शर्म भी बिक चुकी है बाजार में?

आस्था को लांछित करने का कुचक्र 

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आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण

अयोध्या । संस्कृतियाँ स्मृतियों से अपना परिष्कार करती हैं। ये स्मृतियाँ अनुभवों के साथ चलती हैं। संकल्प के-सिद्धि के, संघर्ष के-सफलता के अगणित कथानक मनुष्यता के स्मृति-कोष में अनादि काल से संरक्षित हैं। हमारी आस्था इन्हीं स्मृतियों से जीवनी शक्ति प्राप्त करती है। मनुष्यता के विरुद्ध चला आता अमानवीय संघर्ष शताब्दियों से इन स्मृतियों के अमृतत्व को क्षीण करने में यत्नशील रहा है। कद्रू-विनता का द्वन्द्व, देवासुर-संग्राम, श्रीराम का वनवास और कौरवों द्वारा पाण्डवों की वञ्चना जैसे प्रसंग हमारे सांस्कृतिक स्मृति-कोष के ही पाठ हैं। किन्तु यह भारतभूमि आत्मोपासक ऋषियों की है, इसकी तत्त्वज्ञ ऋषि-परम्परा ने भारतीयों को अमृत-पुत्र होने का आत्मविश्वास दिया है। हम पीढ़ियों से ‘अमृतस्य पुत्राः वयम्’ का वेदमन्त्र दुहराते आये हैं। इसलिए जब युवराज बनाने का आमन्त्रण देकर श्रीराम को वनवास दिया गया तो माता कौशल्या ने उनके लिए स्वस्तिवाचन करते हुए कहा कि- ‘ हे पुत्र ! जो मांगल्य अमृत लाने जाते सुपर्ण के लिए विनता ने किया था, वही तुम्हारे लिए भी हो।’ यह हमारी चेतना का वह पक्ष है, जिसने भारत को असंख्य प्रतिकूलताओं में भारत बनाये रखा है।

तथापि, घात-प्रतिघात की ये कथाएँ कहीं समाप्त नहीं होतीं। देवासुर के संघर्ष का कोई युद्ध अन्तिम नहीं होता। युग बदलते हैं, कथाएँ बदलती हैं पर चरित्र नहीं बदलता, असुर सदा रहते हैं, उनका उपद्रव रहता है। ऐसा ही एक अवसर अभी देश के सम्मुख उपस्थित हो गया है। श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर में चढ़ावे की राशि के प्रबन्धन में सामने आये एक अवाञ्छित प्रसंग को आसुरी शक्ति ने व्यवस्था से उठाकर आस्था पर डाल दिया है। श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर में भगवान् श्रीरामलला की प्रतिष्ठा से हतप्रभ होकर मुरझाए खल-दल ने खरगोश की भाँति दौड़ लगाते हुए इस प्रसंग से आसमान गिरने जैसा दृश्य बना दिया है। राजनैतिक खरगोशों की इस पुकार से मीडिया के अन्य जीव-जन्तु भी घोर आर्त्तनाद करते हुए भागने लगे हैं। जिनका शरीर, सामर्थ्य और अनुभव सब खरगोश से कहीं अधिक था वे भी चीखने लगे हैं। एक त्रासदी जैसी उपस्थित कर दी गयी है। देश भर में दुःख, ग्लानि, पछतावा, अविश्वास, आरोप-प्रत्यारोप का क्रम चल पड़ा है। लगता है कि जैसे हम अपना स्वरूप, अपना अमृतत्व ही भूल से गये हैं। अपना स्वरूप का स्मरण ही न रहा हो। जबकि, उचित यह है कि हम किसी डर फैलाते खरगोश के पीछे भागना बन्द करें। जरा ठहरकर सोचें कि क्या सच में आसमान गिर रहा है, और यदि गिर ही रहा हो तो ये खरगोश हमें भगाकर आसमान के नीचे से निकालकर ले कहाँ जायेगा भला। ये एक रूपक है, हम खरगोश नहीं हैं। प्रत्येक भयावने स्वर से भीत होकर भागना हमारा कार्य नहीं होना चाहिए। हममें स्वरों की सच्चाई पहचानने की, अपने डर को समझने की योग्यता होनी चाहिये। यही योग्यता भय का समाधान देती है।

शताब्दियों के संघर्ष का सुफल है कि श्रीरामजन्मभूमि का पुनर्निमाण हुआ। प्रायः सम्पूर्ण देश ने इसका महोत्सव मनाया। परन्तु, कुछ लोग इस उत्सव का आनन्द नहीं ले सके। स्वाभाविक भी था गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा ही है – ‘चोरहिं चाँदिनि राति न भावा’ अर्थात् चोरों को चाँदनी रात अच्छी नहीं लगती। अस्तु, वे व्याकुल हुए लोग संशय के, षडयन्त्र के चमगादड़ उड़ाते रहे। मुहूर्त्त सही नहीं है, वास्तु सही नहीं है, अमुक को क्यों बुलाया, अमुक को क्यों नहीं बुलाया। पूरे देश ने ये तमाशा भी देखा। परन्तु श्रीराम से इस देश का सम्बन्ध सभी भौतिक विचारों की अपेक्षा अधिक प्रगाढ़ है। असंख्य-असंख्य श्रद्धालुजन देश-दुनिया से उमड़ पड़े। श्रीराम मन्दिर ने आस्था के, आह्लाद के और भारत-भाव के नये प्रतिमान गढ़ दिए।

अयोध्या के श्रीराममन्दिर का जो प्रसंग आज हमारे सम्मुख है, आइये उसकी वस्तुस्थिति समझते हैं। श्रीरामजन्मभूमि का निर्माण केवल उत्सव ही नहीं था, यह एक अवस्थापना थी। एक ऐसी अवस्थापना जिसका कोई प्रारूप पहले से हमारे पास नहीं था। संस्थागत रूप से अथवा व्यवस्थागत रूप से श्रीरामजन्मभूमि मन्दिर जिन दायित्वों का निर्वाह करने जा रहा था, वे अभूतपूर्व थीं। उनका कोई अनुभवपरक उदहारण नहीं था। इतने दर्शनार्थी, इतनी दानराशि, इतना आवागमन और यह सब कुछ मन्दिर-निर्माण के ही मध्य चल रहा था। अभी मन्दिर-निर्माण पूर्ण होकर, व्यवस्था अपने अन्तिम रूप को स्थिर नहीं कर सकी थी तब तक एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना संज्ञान में आ गयी। मन्दिर में दर्शानार्थियों द्वारा दानपेटियों में डाली जाने वाली भेंटराशि का संग्रह-संगणन करने वाले समूह में कुछ कर्मचारियों द्वारा धनराशि की चोरी के संकेत मिले। व्यवस्था ने इसे लक्ष्य किया, प्रशासन का सहयोग लिया गया और लोग पकड़े गये, चोरी की गयी धनराशि भी वापस लौटायी गयी। इस पूरे प्रसंग का प्रचार करने के स्थान पर व्यवस्था ने इसका समाधान करने पर ध्यान एकाग्र किया। तीर्थक्षेत्र के पदाधिकारयों समेत प्रशासन के यथापेक्षित सहयोग से पूरे प्रकरण का निस्तारण होने के पूर्व यह विषय किन्हीं राहु-केतु द्वारा, जो असुर होकर देवताओं की पंक्ति में आ मिले थे, इसका राजनैतिक विस्तार हो गया।

मन्दिर-प्रबन्ध स्वाभाविक रूप से राजनैतिक प्रपञ्चों के प्रति उत्तरदायी नहीं है, इसलिए उसने प्रतिक्रिया नहीं दी। उस शालीनता को भय और आशंका के रूप में परिभाषित किया गया। श्रीराम-मन्दिर प्रतिष्ठा से जिनकी अपनी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गयी थी, वे मैदान में कूद पड़े और चन्दा चोरी, चढ़ावा-चोरी जैसे जुमले मीडिया-ट्रायल में आ गये। यह देखना आश्चर्यजनक ही नहीं अत्यन्त त्रासद भी था कि मुख्य धारा के समाचार संस्थान वर्षों तक श्रीराममन्दिर का माहात्म्य-गान करके अपना बाजार-चमकाने के बाद उसी श्रीराम मन्दिर के विषय में उपजे प्रवाद का यथार्थ जानने का धैर्य नहीं रख सके। अपनी भाषा की मर्यादा तक बचाने का ध्यान उन्हें नहीं रहा। अनुप्रास गढ़ी हुई पंक्तियों वाली पत्रकारिता ने एक विरूपित सच को पूरे आस्थावान् समाज के माथे पर मढ़ दिया। कल्पित मनगढन्त आंकिक विवरण, लाखों-करोड़ों की चोरी, लूट, डकैती, गबन और घोटाले जैसे शब्द बाढ़ के पानी में मल के समान तैरने लगे। देश भर से दान-दाताओं की कतार खड़ी हो गयी, अपनी-अपनी दान की गयी वस्तुओं का विवरण माँगती हुई। यह अत्यन्त लज्जास्पद था। कुछ कर्मचारियों की चोरी, उनका अपराध, उनकी हीनता समझ में आती है। पर श्रीरामलला को लाखों-करोड़ों का चढ़ावा चढ़ाने वाला समाज जिस आतुरता से आक्षेप के साथ सामने आया उसे देखकर लगा कि नैरेटिव कैसे किसी भी पुण्य को पाप में बदल देता है। यद्यपि सद्भावशील लोग भी थे पर वे या तो मौन रहे या मीडिया उन्हे सामने लाने से बचा। इस प्रकार एक प्रवाद देशभर में चल पड़ा।

राजनैतिक घात-प्रतिघात वाली इस दुनिया में जो चीज मनुष्य को बचाकर रखती है वह है आस्था। जब वह आस्था इतनी दुर्बल हो जाये कि कोई भी आरोप हमें विचलित कर दे, तो हमें स्वयं पर चिन्तन करना चाहिये। अयोध्या के श्रीराममन्दिर में भेंट की धनराशि के चोरी का प्रसंग एक अनूठा प्रसंग है। यह वस्तुमात्र की चोरी नहीं है, यह एक भाव का तिरस्कार है, यह विश्वास-परम्परा का अपमान है। इसके दोषियों को कठोरतम दण्ड दिया जाना उचित है। परन्तु यह चोरी है, मानवीय दुर्बलता और व्यवस्था की त्रुटि का एक उदाहरण है। इसको एक सामुदायिक अपराध के रूप में चिह्नित करना, इससे श्रीराममन्दिर की व्यवस्था और उसके प्रबन्धन से देश के विश्वास को भंग करना, चोरों से भी बढ़कर दुष्कृत्य है। यह अपराध प्रायः मास भर से हो रहा है। देश भर में तथाकथित नेता, पत्रकार और स्वयम्भू प्रवक्ताओं ने इस प्रसंग को अपनी प्रचार सामग्री की भाँति उपयोग किया है, यह लज्जास्पद है। प्रत्येक व्यवसाय का अपना लाभ-लोभ होता है, इसके पश्चात् भी सबकी एक व्यावसायिक-नैतिक प्रतिबद्धता भी होती है। उसका अभाव देखकर खेद होता है। चोरी की इस घटना की विस्तृत जाँच के लिए तीर्थक्षेत्र की माँग पर उत्तर प्रदेश शासन ने एक विशेष जाँच दल गठित कर दिया है। उसकी विस्तृत आख्या आना शेष है। श्रीरामजन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ने अपनी बैठक करके सभी आवश्यक निर्णय लिये हैं। दाताओं की आशंकाओं का समाधान किया है। तीर्थक्षेत्र के दो सदस्यों के नैतिक आधार पर दिए गये त्यागपत्रों के उपरान्त नये सदस्य भी लिए गये हैं। यह पूरा प्रकरण एक व्यवस्था में हुई त्रुटि का है, जिसमें दोषियों को दण्ड एवं इस अव्यवस्था के कारकों को चिह्नित करने तथा ठीक करने का दायित्व है। परन्तु, इसे राजनैतिक लक्ष्यसिद्धि हेतु जिस दुष्प्रचार में धकेला गया और चरित्रहनन की जो कूटयोजना चलायी गयी वह व्यवस्था के बहाने आस्था को ही दमित करने का कुचक्र है। जो लोग लुटेरे तैमूर और बाबर को नायक मानते आये हैं, वे श्रीराममन्दिर के सेवादारों को चरित्र प्रमाणपत्र देने लग गये हैं। जिनके लिए श्रीराम और उनकी जन्मभूमि का ऐतिहासिक-सांस्कृतिक अस्तित्व ही नहीं था, वे मन्दिर की शुचिता तथा श्रीराम की सेवा की आचार-संहिता पर बात करने लगे हैं। कहना कठिन है कि यह पाखण्ड किस नये आघात की पूर्वयोजना है।

एक आँधी सी चल पड़ी है, धूल ने आकाश ढक लिया है। पर ऐसा सदा नहीं रह सकता। वर्षा होगी, धूल कीचड़ होकर वहीं जा रहेगी, जहाँ से उड़ी थी। आकाश की स्वच्छता को सदा ढककर नहीं रखा जा सकेगा। किन्तु, इस बीच जो आतुरता, जो अविश्वास आस्थावान् समाज में दिखाई पड़ा है वह चिन्ताजनक और लज्जास्पद है। कदाचित् यही बिन्दु है जहाँ से हिन्दू-समाज को अपनी परीक्षा करनी चाहिए। अपने शत्रुबोध को परिभाषित करना चाहिए। अपने प्रति अपनी संशयशीलता के अभिशाप से उबरना चाहिए। जिन्होंने शताब्दियों तक श्रीरामजन्मभूमि से अयोध्या को वञ्चित रखा, उनके राजनैतिक वंशधर, उनके विचारों के पोषक अयोध्या के पथ-प्रदर्शक नहीं हो सकते, यह बोध स्पष्ट होना चाहिए। साधु-सन्त, सद्गृहस्थ और समस्त श्रद्धालु समाज को अयोध्या के गौरव के प्रति अपनी प्रतिज्ञा को पहचानना चाहिए। श्रीराममन्दिर में चोरी की घटना आकाश के गिरने की घटना नहीं है। यह एक निर्मित होती व्यवस्था के नितान्त प्रारम्भिक चरण में सामने आयी त्रुटि मात्र है, जिसे वही सुधार सकते हैं, जिनका पक्ष श्रीरामजन्मभूमि है-अयोध्या है। वास्तव में देवताओं को अमृत पीने से पहले ही राहु को पहचानना होगा। अन्यथा हमारा भूगोल-खगोल कटे हुए मुण्डों वाले अशुभ ग्रहों से भर जायेगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी सहकारिता किसी के कुचक्र से भंग न हो जाय। तीर्थक्षेत्र के लिए भी यह घटना एक पाठ हो सकती है कि जो आपको अयोध्या के भूगोल में मन्दिर बनाने से नहीं रोक सके, वे भाव के भूगोल में इस मन्दिर के ध्वंस का यत्न करते रहेंगे। आपको पत्थर ही नहीं पवित्रता बचाए रखने का भी भार उठाना होगा। अन्ततः, यह एक आसुरी प्रवञ्चना है, जो शुचिता की कुछ कमी से इतनी सांघातिक हो गयी। अब यह न दुहराए ऐसी व्यवस्था से संस्था एवं आस्था दोनों के मान की रक्षा हो सकेगी।

(लेखक पीठाधीश्वर, सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास, अयोध्या हैं)

कुछ वायरल अपराधों से यह मत मान लीजिए कि भारत में पितृसत्ता खत्म हो गई है

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मेरठ का नीला ड्रम, आगरा में फर्श के नीचे दफन पति, मुंबई-वसई में प्रेमी की हत्या और ऐसी ही कुछ दूसरी सनसनीखेज़ वारदातों ने पूरे देश को झकझोर दिया। टीवी स्टूडियो गरजे, सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई और एक नया निष्कर्ष गढ़ लिया गया: “क्या अब महिलाएँ पुरुषों पर भारी पड़ने लगी हैं?”
लेकिन क्या कुछ भयावह अपराध सचमुच भारत की सामाजिक हकीकत बदल देते हैं? क्या कुछ वायरल घटनाएँ सदियों पुरानी पितृसत्ता, असमानता और महिलाओं के खिलाफ हिंसा के पहाड़ को मिटा सकती हैं? जवाब भावनाओं में नहीं, आँकड़ों में छिपा है।
मेरठ: आज के दौर में सच से कहीं तेज़ दौड़ती है सनसनी।
किसी पत्नी पर पति की हत्या का आरोप लगता है। कहीं प्रेमी के साथ मिलकर हत्या की साज़िश रची जाती है। टीवी चैनलों पर दिन-रात वही दृश्य चलते हैं। सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ जाती है। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी फ़ौरन फैसला सुना देती है; “अब तो औरतें मर्दों पर भारी पड़ने लगी हैं।” कुछ लोग तो यह तक कहने लगते हैं कि अब पुरुष ही सबसे बड़े पीड़ित हैं।
ऐसी बातें सुनने में आकर्षक लगती हैं, लेकिन आंकड़ों की कसौटी पर टिकती नहीं हैं।
अपराध का कोई लिंग नहीं होता। हत्या करने वाला चाहे पुरुष हो या महिला, कानून की नज़र में दोनों बराबर हैं। दोषी को सज़ा मिलनी ही चाहिए। लेकिन कुछ सनसनीखेज़ घटनाओं के आधार पर पूरे समाज की तस्वीर बदल देना न्याय भी नहीं है और बुद्धिमानी भी नहीं।
कुछ अपराध सदियों की सामाजिक हकीकत को नहीं बदल सकते।
यह सच है कि भारत में महिलाओं की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। आज पहले की तुलना में कहीं अधिक लड़कियाँ स्कूल और कॉलेज पहुँच रही हैं। उच्च शिक्षा में महिलाओं का सकल नामांकन अनुपात अब पुरुषों से अधिक है। महिलाएँ लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, अंतरिक्ष अभियानों का नेतृत्व कर रही हैं, उद्योग चला रही हैं, न्यायपालिका और प्रशासन में महत्वपूर्ण पदों पर हैं। पंचायतों में लाखों महिलाएँ जनप्रतिनिधि हैं। मातृ मृत्यु दर घटी है, संस्थागत प्रसव बढ़े हैं और करोड़ों महिलाओं के बैंक खाते खुले हैं।
यह बदलाव स्वागत योग्य है।
लेकिन कुछ सफल महिलाओं की उपलब्धियों को पूरे देश की महिलाओं की वास्तविक स्थिति मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी।
असल सवाल यह है कि गाँवों, कस्बों और शहरों की आम महिला कैसी ज़िंदगी जी रही है?
यहीं तस्वीर बदल जाती है। सामाजिक कार्यकर्ता पद्मिनी अय्यर कहती हैं, “भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर बढ़ी जरूर है, लेकिन आज भी पुरुषों की तुलना में आधी से भी कम है। जो महिलाएँ काम करती भी हैं, उनमें अधिकांश असंगठित क्षेत्र में हैं, जहाँ न नौकरी की सुरक्षा है, न उचित वेतन और न सामाजिक सुरक्षा। इससे भी बड़ा सच है वह काम जिसका कोई वेतन नहीं मिलता।समय-उपयोग सर्वे बताते हैं कि भारतीय महिलाएँ पुरुषों की तुलना में रोज़ तीन घंटे से अधिक अतिरिक्त समय रसोई, सफाई, बच्चों की परवरिश और बुज़ुर्गों की देखभाल में लगाती हैं। यह श्रम देश की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है, लेकिन न इसका कोई वेतन है और न सम्मान।”
संपत्ति का बँटवारा भी बराबरी की कहानी नहीं कहता।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार केवल लगभग 13 प्रतिशत महिलाओं के नाम अकेले मकान है और मात्र 8 से 9 प्रतिशत महिलाओं के पास अपनी भूमि है। आर्थिक निर्भरता आज भी सामाजिक निर्भरता को जन्म देती है।
सोशल एक्टिविस्ट विद्या चौधरी के मुताबिक, “सबसे कठोर सच महिलाओं के खिलाफ हिंसा का है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2024 में महिलाओं के विरुद्ध 4.41 लाख से अधिक अपराध दर्ज हुए। यानी हर दिन लगभग 1,210 मामले और औसतन हर 71 सेकंड में एक महिला के खिलाफ अपराध। इनमें सबसे अधिक मामले पति और रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के हैं। इसके बाद दुष्कर्म, अपहरण, यौन उत्पीड़न और दहेज से जुड़े अपराध आते हैं।”
ये केवल दर्ज मामले हैं।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण बताता है कि भारत में लगभग हर तीन विवाहित महिलाओं में से एक ने अपने जीवन में पति या साथी द्वारा शारीरिक, मानसिक या यौन हिंसा झेली है। विशेषज्ञ मानते हैं कि असंख्य महिलाएँ सामाजिक बदनामी, आर्थिक निर्भरता और पारिवारिक दबाव के कारण शिकायत तक दर्ज नहीं करा पातीं।
यही भारत की असली तस्वीर है।
इसके मुकाबले हाल के वर्षों में पतियों की हत्या के कुछ चर्चित मामलों ने पूरे देश का ध्यान खींचा। ये घटनाएँ भयावह हैं और दोषियों को कठोर सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन ये अपवाद हैं, प्रवृत्ति नहीं।
सोशल मीडिया अपवाद को सामान्य बना देता है।
एक सनसनीखेज़ हत्या कई दिनों तक सुर्खियों में रहती है, जबकि घरेलू हिंसा झेल रही सैकड़ों महिलाएँ किसी समाचार की पात्र भी नहीं बनतीं। लगातार दिखाई जाने वाली असाधारण घटनाएँ धीरे-धीरे लोगों को यह भ्रम दे देती हैं कि अब सत्ता का संतुलन बदल गया है।
लेकिन आंकड़े इस भ्रम की पुष्टि नहीं करते।
हाँ, महिलाओं की सुरक्षा के लिए बने कुछ कानूनों के दुरुपयोग के मामले सामने आए हैं। लेकिन कुछ झूठे मामलों के कारण पूरे कानून को गलत नहीं ठहराया जा सकता।
एक और दुखद सच्चाई विधवाओं की है। भारत में करोड़ों विधवाएँ आज भी गरीबी, उपेक्षा, संपत्ति से वंचित किए जाने और सामाजिक तिरस्कार का जीवन जी रही हैं। वृंदावन जैसे शहर आज भी हजारों बेसहारा विधवाओं की पीड़ा के मौन गवाह हैं। उनका दर्द कभी वायरल नहीं होता, क्योंकि ख़ामोश पीड़ा टीआरपी नहीं देती।
एक सनसनीखेज़ हत्या एक सप्ताह तक सुर्खियाँ बना सकती है। लेकिन वह भारत की करोड़ों महिलाओं के हिस्से में आज भी दर्ज असमानता, हिंसा और भेदभाव की सदी पुरानी कहानी को नहीं बदल सकती।

अंतिम श्वाँस तक युद्ध करके शिवाजी महाराज को सुरक्षित विशालगढ़ पहुँचाया

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दिल्ली । दासत्व की लंबी अंधेरी रात के बाद भी यदि आज भारतीय सँस्कृति का दीप प्रज्वलित है तो इसके पीछे उन वीरों का बलिदान हैं जिन्होंने अंतिम श्वाँस तक संघर्ष करके इसकी ज्योति ठंडी नहीं होने दी । ऐसे ही बलिदानी हैं बाजी प्रभुजी देशपाँडे। जिन्होंने अपनी छोटी सी टोली के साथ आदिलशाही सेना को रोका और शिवाजी महाराज सुरक्षित विशालगढ़ पहुँचाया ।

ऐसे वीर बलिदानी बाजी प्रभुजी देशपांडे की जन्म की तिथि का उल्लेख नहीं मिलता । इतिहासकारों ने उनका जन्म वर्ष 1615 निर्धारित किया है । वे महाराष्ट्र के मावल क्षेत्र के रहने वाले थे । उनका गाँव आजकल कोल्हापुर के अंतर्गत है । तब यह बीजापुर की आदिलशाही के अंतर्गत आता था । बाजीप्रभु बचपन से बहुत वीर और स्वाभिमानी थे । दासत्व से मुक्ति का भाव उनके मन में बचपन से था । वे जीजाबाई के साथ पुणे आये थे । वे शिवाजी महाराज से आयु में बड़े थे । उनकी वीरता और शस्त्र संचालन में कुशलता देखकर जीजाबाई ने उन्हे शिवाजी महाराज की निजी सुरक्षा टोली में सम्मिलित किया । समय के साथ बड़े हुये और शिवाजी महाराज के हर युद्ध में भाग लिया और अपनी वीरता से शिवाजी महाराज की सेना में उच्चपद प्राप्त किया । विशेषकर 1648 और 1649 में पुरन्दर, कोण्ढाणा और राजापुर के किले जीतने उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही । इससे पूरे मावला क्षेत्र में उनका प्रभाव बढ़ा। 1655 के जावली मोर्चे और जीतने में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही । शिवाजी महाराज ने जीत के बाद किले की मरम्मत और सुरक्षित करने का काम भी बाजी प्रभुजी को सौंपा । 1659 में शिवाजी महाराज द्वारा अफजल खाँ का वध करने की रणनीति में पूरा सुरक्षा घेरा बाजी प्रभुजी ने ही बनाया था । अफ़जल खाँ के वध के बाद पार के वन क्षेत्र में आदिलशाही छावनी को बाजी प्रभु ने ध्वस्त किया था ।

अफजल खाँ की मौत के बाद आदिलशाही बौखला गई। आदिलशाही ने दक्षिणी रियासतों के सिद्दीकी, मोगल आदि अन्य अन्य शासकों से सैन्य सहायता ली और तोपखाने के साथ तीस हजार सैनिकों की एक बड़ी फौज शिवाजी महाराज का दमन करने केलिये भेजी । यह जून 1660 की बात है । शिवाजी महाराज पन्हाला किले में थे । इस सेना ने किले को चारों ओर से घेर लिया । यह सेना सिद्धी जौहर और अफजल खाँ के बेटे फाजिल खाँ की कमान में थी । फाजिल खाँ अपने पिता की मौत का बदला लेना चाहता था । किले के भीतर शिवाजी महाराज के साथ सैन्य शक्ति बहुत कम थी । मुश्किल से बारह सौ मराठा सैनिक रहे होंगे। किले में खाद्य सामग्री भी कम थी । जिस विशालगढ़ किले में मराठा सेना थी । वह यहाँ से लगभग चालीस मील दूर था । लेकिन शिवाजी महाराज का पन्हाला किले से निकलकर विशालगढ़ पहुँचना सरल न था । पन्हाला किला चारों ओर से घिरा हुआ था और तोपखाना भी गरज रहा था । शिवाजी महाराज को सुरक्षित निकालने की रणनीति बनी । किले के भीतर मराठा सेना को दो भागों में बांटा गया । लगभग 600 सैनिकों एक टुकड़ी ने बाजी प्रभु देशपाँडे के नेतृत्व में शिवाजी महाराज को सुरक्षित निकालने का दायित्व लिया और शेष सेना ने किले के बाहर मोर्चा लेने की रणनीति बनाई । रणनीति के अंतर्गत 12 जुलाई को एक पत्र सिद्दी जौहर को भेजा गया ।

पत्र में अगले दिन दोपहर तक समर्पण का प्रस्ताव भेजा गया । पत्र देखकर आदिलशाही सेना में जश्न होने लगा । तोपखाना रोक दिया गया । हमलावर सेना के लापरवाह होते ही 12 जुलाई की देर रात शिवाजी महाराज सुरक्षा टोली के साथ गुप्त मार्ग से निकल लिये । इस सुरक्षा टोली का नेतृत्व बाजी प्रभु देशपाँडे कर रहे थे । निर्धारित रणनीति के अंतर्गत 13 जुलाई को कुछ सैनिकों के साथ डोला भेजा गया । इसमें शिवाजी महाराज के स्थान पर उनकी कदकाठी का मराठा सैनिक था । नकली शिवाजी को देखकर सिद्दी जौहर ने शिवाजी महाराज को पकड़ने केलिये चारों घोड़े दौड़ा दिये । शाम हो चुकी थी । तब तक शिवाजी महाराज लगभग तीस मील की यात्रा पूरी कर चुके थे और घाटी से गुजर रहे थे । फिर भी विशालगढ़ अभी दस मील दूर था । शत्रु की आहट मिलते ही पुनः रणनीति बनी । बाजी प्रभु अपनी सैन्य टोली के साथ घाटी के मुहाने पर रुके और शिवाजी महाराज को विशालगढ़ जाने का आग्रह किया । रणनीति बनी कि शिवाजी महाराज के सुरक्षित विशालगढ़ पहुँचने की सूचना तोप दागकर दे दी जायेगी। शिवाजी महाराज रवाना हुये और बाजी प्रभु ने घाटी के द्वार पर मोर्चा लगा लिया । कुछ ही देर में सिद्दी मसूद और फाजिल खाँ सैनिकों के आ पहुँचे। घाटी सकरी थी । मराठा सैनिकों ने घाटी के भीतर कतारबद्ध मोर्चा लगा लिया था । भयानक युद्ध आरंभ हो गया । मशालों के साथ रात भर युद्ध चला । बाजीप्रभु बुरी तरह घायल हो गये पर उन्होंने सिद्दी मसूद और फाजिल खाँ के सैनिकों को भीतर न घुसने दिया । सुबह का सूरज निकल आया । तभी तोप चलने की आवाज आई । जो शिवाजी महाराज के सुरक्षित विशाल गढ़ पहुँचने की सूचना दी । बाजीप्रभु या किसी भी सैनिक का जीवित बचना असंभव था । अंतिम युद्ध हुआ । 13 जुलाई 1660 को बाजीप्रभु सहित सभी सैनिक बलिदान हो गये ।

शिवाजी महाराज को जब बाजीप्रभु के बलिदान का समाचार मिला तो उन्हें बहुत दुख हुआ और उन्होंने बाजी प्रभु की स्मृति को अमर करने केलिये उस घाटी का नाम बाजी प्रभु के नाम पर रख दिया । यह बलिदानी घाटी खिण्ड घाटी कहलाती है। कुछ इतिहासकार बाजी प्रभु के बलिदान होने की तिथि 14 जुलाई मानते हैं। उनका मानना है कि घाटी में यह युद्ध 13 जुलाई को आरंभ हुआ और अगले दिन बलिदान । इनका तर्क है कि शिवाजी महाराज 12 जुलाई की रात किले से निकले थे और युद्ध 13 जुलाई की शाम आरंभ हुआ । एवं बलिदान 14 जुलाई को । बलिदान की तिथि 13 जुलाई हो या 14 । एक एक सिपाही के बलिदान ने ही शिवाजी महाराज को सुरक्षित विशालगढ़ पहुँचाया। हिन्दवी स्वराज्य स्थापना में ये बलिदानी मानों इमारत की मजबूत आधार हैं।
कोटिशः नमन इन सभी बलिदानियों को ।

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