ट्रक से ट्रेन तक, थाने से दफ्तर तक: वसूली का सिस्टम

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दिल्ली। यह तो पूरे 140 करोड़ देशवासियों को मालूम है कि बिना आग के धूंआ नहीं निकलता। चाहे ट्रैफिक पुलिस वाला हो, जो सिग्नल पर बड़े चालान का डर दिखाकर, छोटी रकम ले लेता है। या ट्रेन का टीटी, जो ‘सीट खाली नहीं है’ बोलकर पॉकेट में हजार रुपये ठूंस लेता है। रात के अंधेरे में हाईवे पर ट्रक रोककर पुलिस वालों की वसूली तो देखी होगी आपने भी, या जिलाधिकारी कार्यालय का क्लर्क, जो फाइल पर लक्ष्मी के वजन के बिना हिलता तक नहीं।

मजेदार बात यह है कि जो आज मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद या विधायक बनकर कुर्सी पर विराजमान हैं, उन्हें इस ‘परंपरा’ की भनक तक नहीं है। अरे वाह! भनक होती तो लगाम लगाने का प्रयास विधानसभा या लोकसभा के माध्मय से करते। वहां इन मुद्दों की गूंज सुनाई देती।

कितनी मासूमियत! दिन भर ‘जनसेवा’ के भाषण देते हैं, रात को नींद आती होगी। यह सोचकर कि ‘सब कुछ ठीक है’। ट्रक ड्राइवर रात में ठंडे में खड़ा होकर घूस देता है, यात्री टीटी को नोट थमाता है, आम आदमी थाने में ‘केस’ दर्ज कराने के लिए साहब के घर में कूलर लगवाने से लेकर उनके बच्चे के एडमिशन का खर्चा तक उठाता है।

लेकिन सड़कों पर प्रदर्शन? वो तो सिर्फ महंगाई, आरक्षण या राजनीतिक मुद्दों पर ही होते हैं। भ्रष्टाचार की इस लूट पर कोई ‘आंदोलन’ नहीं। क्योंकि आंदोलन का एजेन्डा नेता और उनकी पार्टी तय करती है। जनता नहीं।

इस लापरवाही की वजह से यह ‘व्यवस्था’ इतनी गहरी जड़ पकड़ चुकी है कि इसे ‘भ्रष्टाचार’ कहना भी अब अपराध लगता है।

थाने तो ऐसे हैं जहाँ ‘प्रोटेक्शन’ का मतलब ही ‘प्रोटेक्शन मनी’ हो गया है। पुलिस भर्ती सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि ‘कमाई’ के लिए होती है। वहाँ बैठे सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक का चेहरा देखकर लगता है – ‘बोले तो, कितना देना है?’ यह ‘सेवा भाव’ पूरे देश में फैला हुआ है। केंद्र हो या प्रदेश, हर सरकार इसे ‘छोटा मुद्दा’ समझकर नजरअंदाज करती है। क्योंकि अगर इस पर लगाम लगाई तो ‘सिस्टम’ का इंजन ही बंद हो जाएगा ना!

हुजूर, केन्द्र और प्रदेश की सरकारों से विनम्र अपील है – थोड़ा इस ‘सार्वजनिक भ्रष्टाचार’ पर भी ध्यान दीजिए। कैमरे लगाइए, सख्त निगरानी रखिए, शिकायत के लिए ऑनलाइन पोर्टल बनाइए और सबसे जरूरी – अपने मंत्रियों-विधायकों को समझाइए कि ‘जनता सब जानती है’।

व्यंग्य मत समझिए, यह तंज है। अगर आप सच में ‘अमृत काल’ लाना चाहते हैं तो इन छोटी-छोटी लूटों को रोकिए, वरना 140 करोड़ लोग यह सब चुपचाप सहने को मजबूर रहेंगे। सब मिलकर ऐसे मुद्दे पर आवाज उठाएंगे लगता नहीं। जबकि यहां जिस तरह के भ्रष्टाचार का उल्लेख किया गया है, उससे भारतीय समाज इतना यूज टू हो चुका है कि अब उसे भ्रष्टाचार की श्रेणी में गिनना भी बंद कर चुका है।

थोड़ा तो इस ‘अनदेखी महामारी’ पर लगाम लगाने की जरूरत है, हुजूर।

रील्स के दौर में खोता संवाद

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सुबह उठते ही मोबाइल हाथ में आता है। व्हाट्सएप स्टेटस देखते हैं, फेसबुक स्क्रॉल करते हैं, इंस्टाग्राम पर रील्स चलने लगती हैं। कुछ हीमिनटों में हम दर्जनों लोगों की निजी ज़िंदगी का हिस्सा बन जाते हैं।किसने क्या खाया, कौन कहाँ घूमने गया, किसने नई कार खरीदी, किसनेकिस बात पर प्रतिक्रिया दी—यह सब हमारी दिनचर्या का हिस्सा बनचुका है। दूसरी ओर, हम स्वयं भी अपने जीवन के छोटे-छोटे क्षणों कोतस्वीरों, वीडियो और स्टेटस के रूप में दुनिया के सामने रखने लगे हैं।प्रश्न यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या यह केवल तकनीक काप्रभाव है या समाज की बदलती मानसिकता का संकेत?

सोशल मीडिया ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है। अब विचारव्यक्त करने के लिए किसी समाचारपत्र, टीवी चैनल या बड़े मंच कीआवश्यकता नहीं है। हर व्यक्ति के हाथ में एक ऐसा माध्यम है, जिसकेजरिए वह हजारों-लाखों लोगों तक पहुँच सकता है। यह आधुनिक संचारव्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। लेकिन इसी उपलब्धि नेएक नई चुनौती भी पैदा की है—संवाद की जगह प्रदर्शन ने ले ली है। आजव्यक्ति केवल जीना नहीं चाहता, वह अपने जीवन को लगातार दिखाना भीचाहता है। दूसरी ओर, समाज केवल जानकारी प्राप्त नहीं करना चाहता, बल्कि दूसरों के जीवन में झाँकने की एक निरंतर जिज्ञासा भी विकसित होचुकी है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को अभूतपूर्व गति दी है। ‘लाइक’, ‘कॉमेंट’ और ‘शेयर’ अब केवल तकनीकी सुविधाएँ नहीं रह गई हैं, बल्किसामाजिक स्वीकृति के नए प्रतीक बन चुके हैं।

मीडिया अध्ययन बताता है कि मनुष्य केवल सूचना का उपभोक्ता नहींहोता, वह सामाजिक मान्यता की भी तलाश करता है। पहले यह मान्यतापरिवार, मित्रों और समाज से मिलती थी, आज उसका बड़ा हिस्साडिजिटल मंचों पर मिलने लगा है। जितने अधिक लाइक, उतनी अधिकलोकप्रियता; जितने अधिक फ़ॉलोअर, उतनी अधिक सामाजिक प्रतिष्ठा।धीरे-धीरे हमारी डिजिटल पहचान ही हमारी सामाजिक पहचान काविस्तार बनती जा रही है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्णपात्र न तो उपयोगकर्ता है और न ही कंटेंट क्रिएटर, बल्कि वह एल्गोरिदमहै, जो यह तय करता है कि हमें क्या देखना है। हम जिस प्रकार कीसामग्री देखते हैं, उसी प्रकार की सामग्री हमें बार-बार दिखाई जाती है।परिणामस्वरूप हम ऐसे डिजिटल वातावरण में पहुँच जाते हैं जहाँ हमें वहीविचार, वही समाचार और वही दृष्टिकोण अधिक दिखाई देते हैं, जिनसेहम पहले से सहमत होते हैं। इसे ही ‘इको चैंबर’ कहा जाता है।

यहीं से लोकतंत्र के सामने नई चुनौती खड़ी होती है। लोकतंत्र केवलचुनावों का नाम नहीं है। लोकतंत्र का आधार नागरिकों के बीच संवाद, असहमति का सम्मान और सार्वजनिक हित के प्रश्नों पर विचार-विमर्श है।जर्मन दार्शनिक युर्गेन हैबरमास ने सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sphere) कीकल्पना ऐसे स्थान के रूप में की थी, जहाँ नागरिक तर्कपूर्ण संवाद केमाध्यम से समाज और लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं। उनका मानना थाकि स्वस्थ लोकतंत्र वही है जहाँ लोग एक-दूसरे को सुनें, तर्क दें औरसमझने का प्रयास करें।

लेकिन डिजिटल युग में स्थिति तेजी से बदल रही है। अब सार्वजनिकसंवाद का बड़ा हिस्सा एल्गोरिदम द्वारा नियंत्रित मंचों पर हो रहा है। वहाँहमारी मुलाकात अक्सर उन लोगों से कम होती है, जो हमसे असहमत हों।परिणामस्वरूप संवाद की जगह पुष्टि (Confirmation) और बहस कीजगह प्रतिक्रियाएँ (Reactions) लेने लगती हैं। व्यक्ति धीरे-धीरे यहमानने लगता है कि उसका दृष्टिकोण ही अंतिम सत्य है, क्योंकि उसकेडिजिटल संसार में उसे उसी विचार की बार-बार प्रतिध्वनि सुनाई देती है।

भारत जैसे बहुलतावादी समाज में यह स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।यहाँ विभिन्न धर्म, भाषाएँ, संस्कृतियाँ और सामाजिक समूह सदियों सेसाथ रहते आए हैं। इस विविधता को बनाए रखने के लिए संवाद सबसेबड़ी आवश्यकता है। यदि विभिन्न समुदायों के बीच प्रत्यक्ष संवाद कमहोता जाए और उनकी समझ केवल सोशल मीडिया पर प्रसारितसूचनाओं, वायरल वीडियो और भावनात्मक रील्स के आधार पर बननेलगे, तो गलतफहमियाँ और सामाजिक दूरियाँ बढ़ सकती हैं। यह कहनाउचित नहीं होगा कि हर सामाजिक तनाव का कारण सोशल मीडिया है, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया कई बार उनतनावों को तेज़ी से फैलाने और गहरा करने का माध्यम बन जाता है।

आज रील्स की दुनिया में जटिल सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों कोतीस या साठ सेकंड में समेट देने की कोशिश होती है। विचारों की जगहदृश्य प्रभाव, तथ्यों की जगह भावनाएँ और तर्क की जगह त्वरितप्रतिक्रियाएँ अधिक प्रभावशाली हो जाती हैं। जो सामग्री सबसे अधिकउत्तेजना पैदा करती है, वही सबसे अधिक वायरल होती है। ऐसे वातावरणमें संवाद का स्थान शोर लेने लगता है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इस पूरी व्यवस्था से सबसे अधिक लाभकिसे हो रहा है? पहली दृष्टि में लगता है कि लाभ कंटेंट बनाने वाले कोमिलता है। उसे लोकप्रियता, पहचान और कभी-कभी आर्थिक लाभ भीमिलता है। देखने वाले को मनोरंजन और सूचना प्राप्त होती है। लेकिनयदि व्यापक दृष्टि से देखें तो सबसे बड़ा लाभ सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मको होता है। आज की डिजिटल अर्थव्यवस्था में सबसे मूल्यवान वस्तुहमारा समय और हमारा ध्यान है। जितनी देर हम स्क्रीन पर रहते हैं, उतनाअधिक लाभ डिजिटल कंपनियों को मिलता है। इसलिए उनका उद्देश्यसंवाद को गहरा बनाना नहीं, बल्कि उपयोगकर्ता को अधिक से अधिकसमय तक प्लेटफ़ॉर्म पर बनाए रखना होता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि सोशल मीडिया केवल नकारात्मक है। इसनेअनेक सामाजिक आंदोलनों को नई ऊर्जा दी है, आम नागरिक को आवाज़दी है और ज्ञान तथा सूचना तक पहुँच आसान बनाई है। समस्या तकनीकमें नहीं, बल्कि उसके उपयोग और उसके व्यावसायिक मॉडल में है।

आज आवश्यकता सोशल मीडिया से दूरी बनाने की नहीं, बल्कि संवादकी संस्कृति को पुनर्जीवित करने की है। हमें अपने विचारों से भिन्न विचारोंको भी सुनने की आदत विकसित करनी होगी। डिजिटल साक्षरता, तथ्य-जाँच और तर्कपूर्ण बहस को सामाजिक संस्कृति का हिस्सा बनानाहोगा। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब नागरिक केवल बोलते नहीं, बल्कि सुनते भी हैं; केवल प्रतिक्रिया नहीं देते, बल्कि समझने का प्रयासभी करते हैं।

शायद आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि हम सोशल मीडिया परकितना समय बिताते हैं। असली प्रश्न यह है कि क्या हम डिजिटलमाध्यमों का उपयोग संवाद के लिए कर रहे हैं या केवल अपनी हीप्रतिध्वनि सुनने के लिए? यदि हम इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर खोजसकें, तो शायद हम न केवल सोशल मीडिया को बेहतर बना सकेंगे, बल्किअपने लोकतंत्र को भी अधिक संवादशील, सहिष्णु और जीवंत बनापाएँगे।

राजनीति और पत्रकारिता का गिरता स्तर: सत्ता और ‘यूट्यूबर मीडिया’ का अनैतिक गठजोड़

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पटना। आज की राजनीति और मीडिया के बीच का रिश्ता तेजी से बदल रहा है। जहां पहले बड़े नेता पत्रकारिता की गरिमा बनाए रखने के लिए सतर्क रहते थे, वहीं अब सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे लोग बिना किसी संकोच के उन यूट्यूबर ‘पत्रकारों’ के साथ खुलकर तस्वीरें खिंचवा रहे हैं, जिनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल राजनीतिक नैतिकता को कमजोर कर रही है, बल्कि स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता की नींव को भी हिला रही है।

समस्या केवल एक या दो व्यक्तियों की नहीं है। पूरे राजनीतिक वर्ग-सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों-ऐसे माध्यमों की ओर आकर्षित हो रहे हैं जिन पर ब्लैकमेलिंग, पैसे लेकर खबर चलाने और ‘प्लांटेड’ कंटेंट तैयार करने के आरोप लगते हैं। पटना में लाइव सिटीज मीडिया प्राइवेट लिमिटेड चलाने वाले यूट्यूबर ज्ञानेश्वर इसका एक उदाहरण हैं। उनके यहां मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी सहित कई बड़े नेता पहुंचते दिख रहे हैं। ऐसी तस्वीरें जनता के बीच यह संदेश देती हैं कि अब सत्ता और ‘मीडिया’ के बीच पारदर्शिता की कोई दीवार नहीं बची। एक मुख्यमंत्री का ऐसे यू ट्यूबर के पास जाना, जिसकी पहचान बिहार में पत्रकारिता को लेकर नहीं बल्कि लेने देन के लिए है। ना सिर्फ मुख्यमंत्री के पद की गरिमा को घटाता है, बल्कि उनकी पूरी राजनीति को संदेह के घेरे में डाल देता है।

इसी तरह विपक्ष के नेता भी इस रास्ते पर चल रहे हैं। तेजस्वी यादव जैसे नेता भी ऐसे प्लेटफॉर्म्स को समय दे रहे हैं जहां गुणवत्ता से ज्यादा ‘ट्रैफिक’ और ‘निगोशिएशन’ की सुविधा महत्वपूर्ण हो गई है। कारण स्पष्ट है। पारंपरिक, सिद्धांतवादी पत्रकारों के साथ बातचीत जटिल होती है। वे सवाल पूछते हैं, जवाबदेही मांगते हैं और अपनी स्वतंत्रता बनाए रखते हैं। वहीं, जिनकी आय का मुख्य स्रोत ‘डील’ और ‘सेटलमेंट’ हो, उनके साथ समझौता आसान होता है। सरकार या विपक्षी दल उन्हें नियंत्रित कर सकते हैं, उनकी ‘फाइल’ तैयार रख सकते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें अपनी तरफ मोड़ सकते हैं।

उत्तर प्रदेश में संजय शर्मा (फोर पीएम वाले) का उदाहरण भी इसी प्रवृत्ति को दर्शाता है। समाजवादी पार्टी से जुड़े माने जाने वाले और कपिल सिब्बल जैसे नामों के सहारे चलने वाले इस यूट्यूबर पर भी पत्रकारिता के नाम पर अनेक सवाल उठते रहे हैं। कल्पना कीजिए, अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनके साथ केक काटते हुए दिख जाए तो वह तस्वीर कितनी अशोभनीय लगेगी। यह मात्र व्यक्तिगत उदाहरण नहीं, बल्कि एक बड़े पैटर्न का हिस्सा है।

इस श्रृंखला में ‘न्यूज लॉन्ड्री’ जैसे पोर्टल भी शामिल हो गए हैं, जिन पर पैसे लेकर खबर लगाने और अच्छी ‘ऑफर’ मिलने पर खबर हटाने के आरोप लगते रहे हैं। ये सभी मामले दर्शाते हैं कि मीडिया का डिजिटल स्वरूप अब सूचना प्रसार से ज्यादा ‘ट्रांजेक्शनल’ हो गया है। जहां पहले संपादकीय स्वतंत्रता और तथ्यों की जांच होती थी, वहां अब ‘स्पॉन्सर्ड कंटेंट’ और ‘ब्लैकमेल’ की संस्कृति हावी हो रही है।


इस गिरावट का सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को हो रहा है। जब राजनीतिक नेता और मीडिया दोनों ही नैतिकता की सीमा लांघने लगें, तो जनता का विश्वास दोनों पर से उठ जाता है। जो कुछ स्तरीय नेता और पत्रकार अब भी बचे हैं, वे अपने दम पर टिके हुए हैं। न समाज उन्हें पर्याप्त समर्थन दे रहा है, न कोई विचारधारा। वे अपवाद बनकर रह गए हैं।

समाधान सरल लेकिन कठिन है। राजनीतिक दलों को अपनी गरिमा समझनी होगी। उन्हें ऐसे माध्यमों से दूरी बनानी चाहिए जिनकी क्रेडिबिलिटी संदिग्ध हो। साथ ही, यूट्यूब और डिजिटल मीडिया को भी पारदर्शी विनियमन की जरूरत है-ताकि ब्लैकमेल और पेड न्यूज की संस्कृति पर अंकुश लग सके।

पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। अगर यह स्तंभ कमजोर और लचीला हो जाएगा, तो पूरा ढांचा खतरे में पड़ जाएगा। समय आ गया है कि सत्ता और मीडिया दोनों अपनी जिम्मेदारी समझें। जनता अब केवल ‘सनसनी’ नहीं, बल्कि सच्चाई और नैतिकता भी चाहती है।

नासिक के टीसीएस केस में न्यायिक भाषा पर उठते सवाल

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– डॉ. मयंक चतुर्वेदीमुंबई : महाराष्ट्र के नासिक में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) के बीपीओ से जुड़े कथित यौन शोषण, धार्मिक दबाव और जबरन धर्मांतरण मामले में आरोपी ‘निदा खान’ को गर्भावस्था के आधार पर मिली जमानत में अब न्‍यायालयीन निर्णय के साथ चर्चा उस टिप्पणी की भी हो रही है, जिसमें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश केजी जोशी ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उल्लेख करते हुए कहा कि जेल में बच्चे को जन्म देने का मानसिक आघात और उससे जुड़ा सामाजिक कलंक किसी भी मां और बच्चे के लिए पीड़ादायक हो सकता है।

दरअसल, पांच माह की गर्भवती निदा खान की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए न्‍यायालय का कहना रहा कि नवजात शिशु के बेहतर भविष्य और आरोपी महिला की स्थिति को देखते हुए न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करना उचित होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है, इसलिए आरोपी को लगातार हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, इस आदेश की एक पंक्ति ने पूरे मामले को कानूनी दायरे से निकालकर सामाजिक और सांस्कृतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।

‘निदा खान’ की नजर में हिन्‍दू होने का मतलब ‘काफिर’ होना है!

सवाल उठ रहा है कि क्या न्यायिक संवेदना व्यक्त करने के लिए हिन्‍दुओं के देवता “भगवान श्रीकृष्ण” के जन्म प्रसंग का उदाहरण देना आवश्यक था? इस बात की यदि गंभीरता से जांच करें तो प्रश्‍न उठना इसलिए भी लाजमी है, क्‍योंकि ये वही निदा खान है, जिसे हिन्‍दू देवी-देवताओं से नफरत है! जिसका विश्‍वास किसी भी हिन्‍दू परंपरा और धर्म के किसी भी कर्म पर नहीं है।

उस पर जो आरोप लगे हैं, वह धार्म‍िक उत्‍पीड़न के हैं, जिसमें कि पीड़ितों ने अपनी आपबीती में साफ बताया है कि कैसे ‘निदा खान’ उन्‍हें उनके हिन्‍दू देवी-देवताओं को लेकर अपमानित करती थी! उसके लिए क्‍या “भगवान श्रीकृष्‍ण” के जीवन से जुड़ा कोई उदाहरण दिया जा सकता है? या यही देना इतना जरूरी था। एक नजर में देखा जाए तो यह विषय इसलिए भी महत्‍वपूर्ण है, क्‍योंकि ‘निदा खान’ की नजर में हिन्‍दू होना यानी ‘काफिर’ होना है, जिसमें कि कथि‍त ‘इस्‍लाम’ काफिरों के लिए बहुत कुछ कहता है!

Al-Wala’ wal-Bara में काफिरों से दूरी बनाने को कहा गया

इस्लामिक अकीदे (आस्था) में एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत है जिसे “अल-वला वल-बरा” (Al-Wala’ wal-Bara’) कहा जाता है। इसका अर्थ होता है “अल्लाह के लिए प्रेम करना और अल्लाह के लिए ही घृणा या दूरी बनाना।” इसके तहत ‘काफिरों’ से दिली दोस्ती रखने को पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया है।पुस्तक ‘अल-वला वल-बरा फिल-इस्लाम’ के लेखक डॉ. मुहम्मद सईद अल-कहतनी का कहना है, “एक सच्चे मुसलमान के ईमान की पूर्णता तब तक नहीं हो सकती जब तक वह अल्लाह के दुश्मनों (काफिरों) से पूरी तरह नाता न तोड़े और अपने दिल में उनके प्रति ‘बरा’ (घृणा/अस्वीकार्यता) न रखे। काफिरों से वैचारिक या सामाजिक स्तर पर अत्यधिक घनिष्ठता रखना मुसलमान को इस्लाम के दायरे से बाहर कर सकता है।”(पृष्ठ संख्या: 112–115)।

इस सिद्धांत के अनुसार, एक मुसलमान सिर्फ दूसरे मुसलमान का ही भाई या मित्र हो सकता है। ‘काफिर’ चाहे कितना भी अच्छा व्यवहार करे, उसकी धार्मिक स्थिति के कारण एक मुसलमान को उससे आंतरिक रूप से दूरी बनाए रखनी होती है।

इसी तरह से एक अन्‍य किताब ‘तफसीर माआरिफुल कुरान (खंड 2)’ मे लेखक- ‘मुफ्ती मुहम्मद शफी उस्मानी’ पृष्ठ संख्या: 54-56 (सूरह आल-इमरान, आयत 28 की व्याख्या) में लिखते हैं, “ईमानवालों को चाहिए कि वे मोमिनों को छोड़कर काफिरों को अपना दिली दोस्त (औलिया) न बनाएं। और जो ऐसा करेगा, उसका अल्लाह से कोई संबंध नहीं।”

दिल की सच्ची दोस्ती और वफादारी किसी भी काफिर के साथ रखना सख्त हराम

वस्‍तुत: यहां मुफ्ती शफी लिखते हैं कि काफिरों के साथ सिर्फ तीन तरह के संबंध हो सकते हैं: ‘मुदारात’ (दिखावे की भलाई), ‘मुआसात’ (आर्थिक सहायता), और ‘मुवालात’ (दिल की दोस्ती)। इसमें से ‘मुवालात’ (दिल की सच्ची दोस्ती और वफादारी) किसी भी काफिर के साथ रखना सख्त हराम (वर्जित) है।

अन्‍य पुस्तक ‘तफसीर इब्न कसीर (खंड 4)’ में भी लेखक इमाम हाफिज़ इब्न कसीर के विचार इस संदर्भ में देखे जा सकते हैं, सूरह अत-तौबा (9:29) की व्याख्या में वे लिखते हैं, “उन लोगों से युद्ध करो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं और न अंतिम दिन पर… यहाँ तक कि वे अपने हाथों से जिज़्या दें और वे अपमानित (सागिरून) होकर रहें।”

इस तरह के कथित कई इस्‍लामिक ग्रंथ देखे जा सकते हैं, जिसमें कि ‘काफिर’ यानी गैर मुसलमानों को लेकर बहुत कुछ घृणित, नकारात्‍मक एवं उनके प्रति हिंसा को सही ठहरानेवाला, उक्‍साने के संदर्भ में लिखा गया है। यानी कि सीधे तौर पर कहें तो जिस मामले में ‘निदा खान’ आरोपी बनाई गई है, वह अपने स्‍तर पर जो टीसीएस कंपनी में रहकर कर हिन्‍दुओं के साथ व्‍यवहार कर रही थी, उसे आप ‘काफिरों’ के प्रति उसका किया जा रहा जिहाद कह सकते हैं!

विवाद का कारण है ‘भगवान श्रीकृष्ण’ जन्म का उदाहरण

न्‍यायालय की टिप्पणी पर सोशल मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कई लोगों ने सवाल उठाया कि भगवान श्रीकृष्ण और माता देवकी के प्रसंग की तुलना किसी आपराधिक मामले में आरोपी महिला की स्थिति से करना कितना उचित है? इस मामले में आलोचना कर रहे तमाम लोगों का तर्क है कि माता देवकी और वसुदेव किसी अपराध के कारण जेल में नहीं थे। उन्हें अत्याचारी राजा कंस ने सत्ता के दुरुपयोग के तहत कारागार में रखा था, इसलिए ‘भगवान श्रीकृष्ण’ जन्म की परिस्थिति को किसी आरोपी के जेल में बच्चे को जन्म देने की स्थिति से जोड़ना सांस्कृतिक रूप से दो अलग संदर्भों को एक साथ रखने जैसा है।

सोशल मीडिया में आज कई लोग इस बात को भी उठा रहे हैं कि भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना में ‘श्रीकृष्ण’ का जन्म अन्याय के विरुद्ध ‘धर्म’ की स्थापना का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में धार्मिक प्रतीकों का प्रयोग न्यायिक आदेशों में करते समय अतिरिक्त सावधानी की अपेक्षा की जाती है।

कानूनी विशेषज्ञ अधिवक्‍ता आशुतोष कुमार झा का मानना है, “न्यायालयों के पास पर्याप्त संवैधानिक आधार मौजूद हैं। महिला की गरिमा, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, बच्चे के हित और मानवीय आधार जैसे सिद्धांत अपने आप में जमानत देने के लिए पर्याप्त हो सकते हैं। ऐसे में धार्मिक संदर्भों की आवश्यकता नहीं थी।”

एडवोकेट झा कहते हैं, “न्यायिक भाषा सिर्फ आदेश का हिस्सा नहीं होती, वह समाज में न्यायपालिका की छवि को भी प्रभावित करती है। इसलिए न्यायिक शब्दों का चयन उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है जितना कि स्वयं फैसला।”

मामले की शुरुआत एक शिकायत से हुई

उल्‍लेखनीय है कि इस पूरे मामले की शुरुआत मार्च 2026 में हुई, जब टीसीएस बीपीओ में काम करने वाली एक महिला ने नासिक के देवलाली कैंप पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उसे शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाए गए और बाद में धार्मिक दबाव का सामना करना पड़ा। इसके बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और कंपनी से जुड़े अन्य कर्मचारियों से भी पूछताछ की।

पुलिस ने जांच के लिए महिला पुलिसकर्मियों को कर्मचारी के रूप में कंपनी में भेजा, ताकि वहां की गतिविधियों और आरोपों से जुड़े साक्ष्य जुटाए जा सकें। जांच आगे बढ़ने पर कई अन्य शिकायतें सामने आईं और कुल नौ एफआईआर दर्ज की गईं।

निदा खान पर गंभीर आरोप हैं

निदा खान इस मामले की मुख्य आरोपियों में शामिल हैं। नासिक पुलिस की विशेष जांच टीम टीसीएस बीपीओ से जुड़े नौ मामलों की जांच कर रही है। पुलिस के अनुसार, आरोप है कि कंपनी में काम करने वाली कुछ हिंदू महिला कर्मचारियों को धार्मिक परिवर्तन के लिए प्रभावित करने का प्रयास किया गया। आरोपों में कथित रूप से धार्मिक साहित्य साझा करना, धार्मिक गतिविधियों के लिए दबाव बनाना और पीड़िताओं के साथ मानसिक एवं सामाजिक दबाव बनाने जैसी बातें शामिल हैं। जांच एजेंसियों का दावा है कि कुछ मामलों में महिलाओं को धार्मिक पहचान बदलने और इस्लामी रीति-रिवाज अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।

अब अंत में यही कि न्यायपालिका से समाज की अपेक्षा निष्पक्ष फैसले की होने के साथ ही ऐसी भाषा की भी होती है जो संविधान की भावना और देश की विविध सांस्कृतिक संवेदनाओं के अनुरूप हो। क्योंकि अदालतों के फैसले मुकदमों का अंत नहीं करते, वे समाज में न्याय की समझ और विश्वास को भी आकार देते हैं, इसलिए निदा खान की जमानत पर न्‍यायालय द्वारा भगवान श्रीकृष्‍ण के जन्‍म को लेकर की गई टिप्‍पणी का आज जिक्र हो रहा है। सीधी और सटीक बात यही है कि जिसकी आस्‍था भगवान में है ही नहीं, उसके लिए आखिर क्‍यों हिन्‍दू देवी-देवताओं का उल्‍लेख न्‍यायालयीन भाषा में किया जाना चाहिए?

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