आईजीएनसीए में ‘भारतीय जनजातीय समाज’ पुस्तक का हुआ लोकार्पण

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नई दिल्ली: इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के जनपद सम्पदा विभाग ने ‘ज्ञानपथ शृंखला’ के अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘भारतीय जनजातीय समाज (शिक्षित एवं सशक्त भूमिका में आत्मनिर्भरता की ओर)’ के लोकार्पण एवं चर्चा सत्र का आयोजन किया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि केन्द्रीय संसदीय कार्य एवं अल्पसंख्यक कार्य मंत्री श्री किरन रिजिजू थे। वहीं विशिष्ट अतिथि थे राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग के अध्यक्ष श्री अंतर सिंह आर्य। उन्होंने जनजातीय समाज से जुड़े समकालीन विमर्श, नीतिगत प्रयासों तथा सांस्कृतिक संरक्षण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। विशेष अतिथि के रूप में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजातीय आयोग की सदस्य डॉ. आशा लकड़ा उपस्थित रहीं, जिन्होंने पुस्तक की विषयवस्तु को सामाजिक न्याय और समावेशी विकास के व्यापक परिप्रेक्ष्य में रेखांकित किया। पुस्तक की लेखिका हैं समाजशास्त्री एवं शिक्षिका डॉ. स्वीटी तिवारी। कार्यक्रम का स्वागत वक्तव्य आईजीएनसीए के जनपद सम्पदा विभाग के अध्यक्ष प्रो. के. अनिल कुमार ने दिया। उन्होंने ‘ज्ञानपथ शृंखला’ की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए इसे समकालीन बौद्धिक संवाद का एक सशक्त मंच बताया। इस अवसर वनवासी कल्याण आश्रम के श्री सुरेश कुलकर्णी की भी गरिमामय उपस्थिति रही।
मुख्य अतिथि किरन रिजिजू ने कहा कि जनजातीय समुदायों को जो सम्मान मिलना चाहिए था, आज़ादी के 60-70 सालों तक नहीं मिला। बस उनका प्रतिनिधित्व सांकेतिक ही रहा। जब मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ता था तो मुझे लगा कि आदिवासी क्षेत्र में काम करने वाले और आदिवासियों को समझने वाले कुछ लोग और कुछ संगठन ही हैं। जैसे वनवासी कल्याण आश्रम और कुछ दूसरे संगठन हैं। वे सेवा भाव के साथ, उनके बीच में रहकर काम करते हैं। उन्होंने कहा कि अगर आप आदिवासियों के बीच में जाकर उनकी सेवा का नाम पर उनका धर्मांतरण करेंगे, तो उनका आइडेंटिटी बदल जाएगी। उनके सशक्तिकरण के नाम पर आप उनके कल्चर को डाइल्यूट कर देंगे। मूल रूप से, आदिवासी की पहचान अगर आप खत्म कर देंगे तो फिर सेवा का कोई मतलब नहीं होता है। आदिवासियों के लिए उनकी पहचान, उनका सम्मान दोनों बहुत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनजातीय समुदायों के सशक्तिकरण के लिए महत्त्वपूर्ण काम किया है। उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में जनजातीय समुदाय के तीन लोगों को मंत्री बनाया। पहली बार किसी सरकार में जनजातीय समुदाय से तीन लोगों को मंत्री बनाया गया है। उन्होंने अपने मंत्रियों से कहा कि जनजातीय समुदाय के लोगों के स्वतंत्रता संग्राम में योगदान को रेखांकित कीजिए। प्रधानमंत्री ने भगवान बिरसा मुंडा के जन्मदिन 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत की। यह बिरसा मुंडा का जन्म दिवस ही नहीं, बल्कि पूरे आदिवासियों को सम्मान देने का कार्यक्रम है।

उन्होंने कहा, भारत में जनजातीय समुदाय का बहुत बड़ा योगदान है। लेकिन हम जनजातीय लोग खुद नहीं जानते कि हमारा योगदान क्या है। अपनी क्षमता को नहीं पहचानते कि हम क्या कर सकते हैं! ऐसे समय में एकेडमिक सेक्टर में इस तरह की पुस्तक आना बहुत महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने लेखिका की प्रशंसा करते हुए कहा, मैं भी अपनी तरफ से किताब को आगे बढ़ाने, इसके प्रचार-प्रसार की कोशिश करूंगा।

लेखिका स्वीटी तिवारी ने पुस्तक के बारे में बताते हुए जनजातीय समुदायों की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक यात्रा पर विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि घोर अंधकार में भी जनजातीय समाज की लौ क्षीण नहीं हुई। जनजातीय समाज के प्रति उपेक्षा के भाव को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि हम ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ की बात करते हैं, लेकिन ‘गंगा-दामोदर तहज़ीब’ बात नहीं करते। ग़ौरतलब है कि दामोदर जनजातीय बहुलता वाले राज्य झारखंड की एक प्रमुख नदी है। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा केवल साक्षरता नहीं है, बल्कि अधिकार बोध है।

यह कार्यक्रम विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा संस्कृति-अध्ययन से जुड़े प्रबुद्ध श्रोताओं की उल्लेखनीय उपस्थिति के बीच सम्पन्न हुआ। यह आयोजन भारतीय जनजातीय समाज की बहुआयामी समझ को गहराई प्रदान करने वाला तथा अकादमिक दृष्टि से अत्यंत सार्थक सिद्ध हुआ।

नेहरू ने ‘विदेशी महिला के पुत्र’ को इंदौर का राजा बनने से मना करके राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के प्रधानमंत्री पद पर बैठना भी रोक दिया

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सुभाष चन्द्र

इंदौर: लोकसभा के 2004 चुनाव के बाद डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने राष्ट्रपति के सामने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने को चुनौती दी थी और कई आपत्तियां दर्ज करा कर उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था – लेकिन सोनिया की संतानों राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा के प्रधानमंत्री पद पर बैठने पर तो नेहरू के एक फैसले रोक लगी हुई है –

इंदौर के महाराजा यशवंत राव होलकर-II ने अपने उत्तराधिकारियों में अपनी बड़ी बेटी उषा राजे होलकर और शिवाजी राव होलकर का नाम लिखा था लेकिन विदेशी पत्नी से उत्पन्न पुत्र शिवाजी राव होलकर को नेहरू ने उत्तराधिकारी मानने से मना कर दिया –
नेहरू, सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद ने आपत्ति जताई कि a son with “foreign blood” could not inherit the princely title after India’s independence और इसलिए यशवंत राव होलकर -II की पहली पत्नी से बड़ी बेटी उषा राव होलकर को “औपचारिक अध्यक्ष) मतलब यशवंत राव का उत्तराधिकारी नियुक्त किया गया –

यशवंत राव होलकर की 3 पत्नियां थी –
-संयोगिता बाई (1924 में शादी – 1937 में मृत्यु)
उनकी और यशवंत राव की बेटी थी उषा राजे होलकर;
-Marguerite Lawler, अमेरिकन पत्नी (शादी 1938 और तलाक़ 1943)
उषा राजे को उन्होंने संयोगिता की मृत्यु के बाद गोद लिया था;
-Euphemia “Fay” Watt (शादी 1943, तलाक़ 1960) – ये भी अमेरिकन थी –
उनका और यशवंत राव होलकर का पुत्र था शिवाजी राव होलकर, उन्हें उनकी माँ ने nickname दिया था Richard)

यशवंत राव होलकर के इंदौर राज्य का 1947 में भारत में विलय हो गया लेकिन 1 जनवरी, 1950 को उन्होंने विलय पत्र पर हस्ताक्षर किए और 1961 में उनकी मृत्यु के बाद उषा राजे को उनका औपचारिक उत्तराधिकारी बनाया गया जिससे राज्य की संपत्तियों का रख रखाव किया जा सके जो वे अभी भी कर रही हैं –

लेकिन नेहरू, पटेल और राजेंद्र प्रसाद का यह कहना कि (” Son of foreign blood” could not inherit the princely title after India’s independence) अपने आप में बहुत कुछ कह देता है – वह विचार अगर उस समय उपयुक्त थे तो वो आज भी उपयुक्त हैं – सोनिया गांधी भले ही भारतीय नागरिक हो गई हैं लेकिन मूल तो उनका विदेश का ही है – उस समय यशवंत राव की पत्नियों के लिए भारतीय नागरिक बनने का कोई नियम था ही नहीं –

नेहरू, पटेल और राजेंद्र प्रसाद का कथन बिलकुल आचार्य चाणक्य के विचार से लिया हुआ लगता है, कि विदेशी महिला से उत्पन्न संतान कभी देश के लिए निष्ठावान नहीं हो सकती और यह राहुल गांधी सही साबित कर भी रहा है -नेहरू पटेल और राजेंद्र प्रसाद तीनो के जो नाम इस कथन के साथ दिए गए है, वो नेहरू के ही माने जाने चाहिए क्योंकि नेहरू को विदेश का अनुभव ज्यादा था और पटेल की तो 1950 में ही मृत्यु हो चुकी थी जब उषा राजे को यशवंत राव को उत्तराधिकारी बनाया गया –

इसलिए नेहरू के बनाए हुए नियमों के अनुसार ही राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा प्रधानमंत्री पद पर बैठने योग्य नहीं हैं – जब नेहरू ने अमेरिका महिला के उत्पन्न पुत्र को इंदौर जैसे छोटे से राज्य का महाराजा नहीं बनने दिया तो राहुल और प्रियंका को देश का प्रधानमंत्री कैसे बनाया जा सकता है!

कन्वर्जन के विरोध में सर्व समाज का 24 दिसंबर को प्रदेशव्यापी बंद

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रायपुर : छत्तीसगढ़ में लगातार बढ़ती कन्वर्जन की घटनाओं से सर्व समाज में आक्रोश व्याप्त है. सर्व समाज ने इस मुद्दे पर प्रदेश व्यापी बंद का ऐलान किया है. मंगलवार को सर्व समाज ने प्रेस वार्ता कर 24 दिसंबर को होने वाले प्रदेशव्यापी बंद की जानकारी दी. सर्व समाज के पदाधिकारीयों ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा, सर्व समाज, छत्तीसगढ़ यह स्पष्ट रूप से अवगत कराता है कि प्रदेश में लगातार उत्पन्न हो रही सामाजिक अशांति, जनजातीय आस्था पर आघात तथा संगठित रूप से पैदा किए जा रहे सांस्कृतिक टकराव के विरोध में दिनांक 24 दिसंबर 2025 को प्रदेशव्यापी छत्तीसगढ़ बंद का आह्वान किया गया है। यह बंद पूर्णतः शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक दायरे में आयोजित किया जाएगा, जिसमें सर्व समाज के विभिन्न सामाजिक, जनजातीय एवं नागरिक संगठन सहभागिता करेंगे. सर्व समाज का कहना है, कांकेर जिले के आमाबेड़ा क्षेत्र में हाल ही में घटित घटना कोई पहली या एकमात्र घटना नहीं है। इस प्रकार की घटनाएं इससे पूर्व भी छत्तीसगढ़ के ना सिर्फ जनजातीय एवं ग्रामीण अंचलों में सामने आती रही हैं, बल्कि कई बार मैदानी क्षेत्रों में भी विवाद की स्थिति बनी है. एक निश्चित पैटर्न के अंतर्गत ईसाई मिशनरियों एवं उनसे जुड़े कन्वर्जन-प्रेरित समूहों द्वारा सुनियोजित ढंग से ऐसे हालात निर्मित किए जा रहे हैं, जिनसे समाज में तनाव, टकराव और सामाजिक वैमनस्य फैल रहा है। दुर्भाग्यवश, इन घटनाओं का सीधा दुष्परिणाम सर्व समाज, विशेषकर जनजातीय समुदायों को भुगतना पड़ रहा है.

आमाबेड़ा की घटना ने इस वास्तविकता को और अधिक उजागर किया है कि पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत अधिसूचित जनजातीय क्षेत्रों में ग्राम सभा की भूमिका, जनजातीय आस्था एवं परंपराओं की संवैधानिक सुरक्षा को गंभीर रूप से नजरअंदाज किया गया. स्थानीय विरोध और संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद जिस प्रकार जिला पुलिस-प्रशासन की निष्क्रियता, भीम आर्मी जैसे बाहरी संगठनों की संगठित भूमिका तथा पक्षपातपूर्ण कार्रवाइयां सामने आई, उसने जिला पुलिस-प्रशासन की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं.

*सामाजिक तथा आर्थिक संगठनों का समर्थन*
सर्व समाज के इस महाबंद को प्रदेश भर के सामाजिक एवं व्यावसायिक तथा छतीसगढ़ चैबर ऑफ़ कॉमर्स जैसे संगठनों का समर्थन मिला है. महाबंद के दौरान जिला प्रशासन को ज्ञापन दिया जाएगा. इस महा बंद को लेकर प्रत्येक जिले में सर्व समाज द्वारा बैठक आयोजित की जाएगी.

*सर्व समाज की मांग*

1. राज्य में धर्म स्वातंत्र्य विधेयक को यथाशीघ्र प्रभावी एवं सख्ती के साथ लागू किया जाए, जिससे प्रलोभन, दबाव अथवा षड्यंत्रपूर्वक किए जा रहे धर्मातरण पर नियंत्रण स्थापित हो सके। साथ ही पूरे प्रदेश में कन्वर्जन के माध्यम से उत्पन्न की ना रही सामाजिक वैमनस्य की परिस्थितियों को गम्भीरता से लेते हुए शासन-प्रशासन सख्ती बरतें, एवं दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करे.

2. कांकेर जिले में जनजातीय समाज पर हुए संगठित हमले के लिए जिम्मेदार भीम आर्मी से जुड़े तत्वों एवं कन्वर्टेड ईसाई समूहों के सभी आरोपियों के विरुद्ध कठोरतम धाराओं के अंतर्गत तत्काल कार्रवाई की जाए.

3. जनजातीय समाज के लोगों के साथ पक्षपातपूर्ण व्यवहार करने तथा शांतिपूर्ण ग्रामीणों पर असंगत एवं अत्यधिक पुलिस बल का प्रयोग करने के गंभीर आरोपों को देखते हुए— जिला पुलिस अधीक्षक, कांकेर इंदिरा कल्याण एलेसेला का शासन द्वारा किया गया स्थानांतरण पर्याप्त नहीं है। हमारी मांग है कि उन्हें तत्काल निलंबित किया जाए तथा उनकी संदिग्ध भूमिका की स्वतंत्र , निष्पक्ष एवं उच्च स्तरीय जांच कराई जाए।

4. शव दफन की प्रक्रिया के दौरान पक्षपातपूर्ण प्रशासनिक रवैया अपनाने तथा हिंदू समाज पर दुर्भावनापूर्ण एवं असत्य आरोप लगाने वाले एसडीएम, ए. एस. पैकरा एवं तहसीलदार सुधीर खलखो को निलंबित कर उनकी संदिग्ध भूमिका की निश्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए।

5. जनजातीय ग्रामीणों के विरुद्ध पक्षपातपूर्ण ढंग से की गई पुलिस एवं प्रशासनिक कार्रवाइयों को तत्काल निरस्त किया जाए, उन पर लगाए गए आपराधिक प्रकरणों एवं धाराओं को वापस लिया जाए, तथा हिंसा एवं बल प्रयोग से पीड़ित ग्रामीणों को समुचित मुआवजा प्रदान किया जाए।

सर्व समाज, छत्तीसगढ़ यह स्पष्ट करना चाहता है कि यह आंदोलन किसी धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों, जनजातीय आस्था, सामाजिक समरसता और प्रदेश में कानून के शासन की रक्षा के लिए है। यदि शासन-प्रशासन समय रहते निष्पक्ष एवं ठोस निर्णय लेने में विफल रहता है, तो सर्व समाज को लोकतांत्रिक एवं कानूनी दायरे में अपने आंदोलन को और व्यापक करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

प्रेस वार्ता के दौरान केंद्रीय अध्यक्ष छत्तीसगढ़ मनवा कुर्मी क्षत्रिय समाज खेड़िस राम कश्यप, उमेश कच्छप उरांव समाज प्रमुख, कृष्ण कुमार खेलकर प्रदेश संरक्षक प्रगतिशील छत्तीसगढ़ सतनामी समाज, बंशीलाल कुर्रे (पूर्व एएसपी) राजमहंत छत्तीसगढ़ सतनामी समाज, प्रमोद कुमार नामदेव (श्री नामदेव समाज विकास परिषद), बसंत तारख धीवर समाज, प्रदीप साहू प्रदेश सयुक्त सचिव छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ, विकास चंद्र सिन्हा छत्तीसगढ़ कलार समाज, उमर कांत सिन्हा प्रांतीय कार्यकारिणी छत्तीसगढ़ कलार समाज समेत अनेक समाज के प्रतिनिधि उपस्थित रहे.

विश्व में शांति स्थापित करने हेतु भारतीय संस्कृति का उत्थान आवश्यक है

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ग्वालियर : कहा जाता है कि सतयुग में समाज पूर्णत: एकरस था और उस समय के समाज में भारतीय संस्कृति की झलक स्पष्टत: दिखाई देती थी। एक कहानी के माध्यम से इस बात को बहुत आसानी से समझा जा सकता है। सतयुग के खंडकाल में एक किसान ने अपनी जमीन बेची। जिस व्यक्ति ने वह जमीन खरीदी थी, उसे, उस जमीन की खुदाई के दौरान सोने के सिक्कों से भरा हुआ एक घड़ा मिला। उस घड़े को लेकर वह किसान जमीन के विक्रेता के पास पहुंचा और बोला कि आपकी जमीन में से यह सोने के सिक्कों से भरा हुआ घड़ा मिला है, चूंकि मैंने आपसे केवल जमीन खरीदी है अतः इन सोने के सिक्कों पर मेरा अधिकार नहीं है और आप यह घड़ा अपने पास रख लें, सोने के इन सिक्कों पर आपका अधिकार है। जमीन के विक्रेता ने सोने के सिक्कों से भरे उस घड़े को लेने से यह कहकर साफ इनकार कर दिया कि मैंने तो वह जमीन आपको बेच दी है, अतः बाद में उस जमीन से जो भी वस्तु आप प्राप्त करते हैं उस पर आपका ही अधिकार हैं। उस वस्तु पर मेरा अधिकार कैसे हो सकता है? जब उस जमीन के क्रेता एवं विक्रेता के बीच कोई समझौता नहीं हो सका तो वे सोने के सिक्कों से भरे उस घड़े को लेकर अपने राज्य के राजा के पास पहुंचे और दोनों ने राजा को पूरी बात बताई तथा राजा से आग्रह किया कि सोने के सिक्कों को राजा साहब राज्य के खजाने में जमा करा दें। राजा ने भी सोने के सिक्कों से भरे उस घड़े को राज्य के खजाने में जमा करने से यह कहकर इंकार कर दिया कि राज्य के नियमों में इस प्रकार का कोई प्रावधान नहीं है कि बगैर किसी उचित कारण के प्राप्त धन को राज्य के खजाने में जमा कर दिया जाय। इस सम्बंध में जो नियम निर्धारित हैं उन नियमों के आधार पर यह सोने के सिक्के राज्य के खजाने में जमा नहीं किये जा सकते हैं। ऐसा था, सतयुग का खंडकाल। जो वस्तु हमारी नहीं है उस वस्तु को हम कैसे अपने पास रख सकते हैं? प्रत्येक नागरिक इस भावना के साथ समाज में एकरस भाव से रहता था।

सतयुग के बाद आया त्रेतायुग, इस युग में समाज में समरसता के भाव में कुछ कमी दिखाई दी थी। जैसे एक समाज (दानव) के राजा रावण ने दूसरे समाज (देव) की माता सीता का अपहरण किया और अपने राज्य में कैद कर लिया। प्रभु श्रीराम ने आदिवासियों और वानरों के समूह को एक कर, इन सभी में समरसता का भाव जागृत करते हुए, रावण के राज्य पर आक्रमण किया एवं माता सीता को उस राज्य के चंगुल से छुड़ाकर सकुशल अयोध्या लाने में सफल हुए। प्रभु श्रीराम ने त्रेतायुग में यह संदेश दिया कि सर्व समाज यदि संगठित रहता है तो किसी भी बुराई से पार पाया जा सकता है। अतः त्रेतायुग में संगठन की महत्ता सिद्ध हुई थी।

त्रेतायुग के बाद द्वापर युग आया, इस खंडकाल में तो समाज क्या, बल्कि दो परिवारों के बीच की एकता भी समाप्त हो चुकी थी। कौरव परिवार ने अपने ही पांडव भाईयों को केवल 5 गांव देने से साफ इंकार कर दिया। जिसके कारण आगे चलकर कौरव एवं पांडवों की बीच महाभारत युद्ध हुआ। आज के खंडकाल कलयुग की तो बात ही निराली है। आज पश्चिमी जगत में प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने सुख के लिए ही कार्य करता हुआ दिखाई देता है। परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति जैसे उसकी कोई जिम्मेदारी ही नहीं है। आज कलयुग में नागरिक अपने आप में केंद्रित हो गए हैं एवं उन्हें परिवार, समाज, राष्ट्र आदि के प्रति किसी जिम्मेदारी का भाव जागृत ही नहीं होता।

भारतीय संस्कृति में सामाजिक समरसता को अति महत्व दिया गया है। अतः स्वयं के साथ, परिवार, समाज, नगर, राष्ट्र एवं पूरे विश्व को समता के भाव के साथ देखा जाता है। पूरी सृष्टि ही हमारा परिवार है, इस भावना को “वसुधैव कुटुंबकम”; “सर्वे भवंतु सुखिन:”; “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” के माध्यम से झलकाया जाता है। पूरे विश्व में आज अशांति का माहौल है, कई देश आपस में लड़ रहे हैं तथा कई देशों के अंदर विभिन्न मत पंथों को मानने वाले नागरिक आपस में मार काट मचाए हुए हैं। ऐसे गम्भीर समय में केवल और केवल भारतीय संस्कृति ही इस पूरे विश्व में शांति का माहौल पुनः स्थापित कर सकती है।

विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारी में सेवा कार्य में संलग्न आदरणीय दीदी निवेदिता रघुनाथ भिड़े ने “भारतीय संस्कृति – चुनौतियां एवं सम्भावनाएं” नामक पुस्तक में भारतीय संस्कृति के बारे में जीवन दर्शन की व्याख्या करते हुए बताया है कि “जिस ज्ञान के द्वारा साधक विभक्त प्राणियों में विभाग रहित एक अविनाशी भाव को देखता है, उस ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहा गया है। भारतीय संस्कृति का जीवन दर्शन या जीवन दृष्टि सात्विक ज्ञान से निर्धारित हुई है। ईश्वर, मानव, सृष्टि अलग अलग नहीं है। अतः भारतीय संस्कृति का जीवन दर्शन एकात्म है।” इसके विपरीत, जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियों में अलग अलग अनेक भावों को अलग अलग रूप से जानता है, इस ज्ञान को राजस ज्ञान कहा गया है। क्रिशिचियन एवं इस्लाम पंथ इसी ज्ञान से प्रेरित है। साथ ही, जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य एक कार्य (शरीर) में ही आसक्त हो जाता है, मानों वह (कार्य ही) सब कुछ हो तथा जो (ज्ञान) हेतुरहित (आयुक्तिक), तत्तवार्थ से रहित तथा संकुचित (अल्प) है, वह (ज्ञान) तामस है। पूंजीवाद, कम्युनिजम, नक्सलवाद, साम्यवाद, मार्कस्वाद और माओवाद का जीवन दर्शन तामसिक ज्ञान से प्रेरित है।

उक्तवर्णित पुस्तक में यह भी बताया गया गई कि उक्त जीवन दर्शन के आधार पर ही राष्ट्र में जीवन मूल्य एवं जीवन तत्व निर्मित होते हैं, जिनका अनुपालन उस राष्ट्र के नागरिक करते हैं। भारतीय संस्कृति के कुल 12 जीवन मूल्य बताए गए हैं – (1) सभी के प्रति आदर एवं सम्मान का भाव रखना; (2) प्रत्येक जीव को ईश्वर का रूप माना जाना; (3) इष्टदेव अर्थात ईश्वर अपने अंत:करण में खोज का विषय है, अतः ईश्वर को बाहर खोजने के स्थान पर अपने अंदर खोजा जाना; (4) विविधता में एकता मानी गई है, जिसके चलते ही सर्व समाज एकरस रहने का प्रयास करता है; (5) चतुर्विध पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, अर्थात काम एवं अर्थ सम्बंधी गतिविधियों को धर्म के आधार पर सम्पन्न किया जाता है एवं अंत में मोक्ष प्राप्ति की अपेक्षा की जाती है: (6) महिलाओं का सम्मान – भारतीय संस्कृति में मातृशक्ति को देवी का दर्जा दिया जाता है; (7) उदार एवं समावेशक – शक, हूण, कुषाण, पारसी, यहूदी आदि अन्य देशों से भारत में आए एवं भारत के ही होकर रह गए, भारतीय संस्कृति के संस्कारों को उन्होंने अपने आप में आत्मसात कर लिया। यह केवल भारत में ही सम्भव है; (8) कर्म सिद्धांत – इस मानव जन्म में किए गए कर्मों के आधार पर ही मोक्ष की प्राप्ति अथवा 84 लाख योनियों के चक्र में फिर से फंसने की सम्भावना के बारे में निर्णय होता है; (9) अवतार की संकल्पना – इस धरा पर जब जब पापों का घड़ा भर जाता है तब तब ईश्वर इस धरा पर अवतार लेकर अवतरित होते हैं; (10) आध्यात्म विश्वास में नहीं, अनुभूति में और होने में है; (11) यज्ञ का महत्व – समाज की सेवा के माध्यम से भी यज्ञ सम्पन्न किया जा सकता है, अन्य कई प्रकार के यज्ञों का वर्णन भी भारतीय संस्कृति में मिलता है; (12) आत्म संयम – अपना जीवन संयम के साथ जीने की कला भारतीय संस्कृति के जीवन मूल्यों में शामिल है, इसके अंतर्गत किसी अन्य प्राणी का अहित करने के बारे में तो कभी सोचा भी नहीं जाता है।

भारतीय संस्कृति में जीवन दर्शन के आधार पर जीवन मूल्य एवं जीवन तत्व निर्धारित होते हैं और इसके बाद समाज की जीवन व्यवस्था भी निर्धारित हो जाती है। भारत में समस्त सांस्कृतिक विधियां, प्रथाएं, पद्धतियां एवं परम्पराएं जीवन व्यवस्था के भाग मानी जाती हैं। कुलधर्म, जातिधर्म, समाजधर्म, पंच महायज्ञ, चार आश्रम, चार वर्ण, जाति व्यवस्था, भारतीय शिक्षा पद्धति भी भारतीय संस्कृति में जीवन व्यवस्था का भाग ही माने जाते हैं। मुगल काल एवं ब्रिटिश शासन काल में भारतीय संस्कृति को नष्ट करने का बहुत प्रयास किया गया था। इस खंडकाल में भारतीय नागरिक अपनी महान परम्पराएं भूल गए थे। इसी खंडकाल में वैश्विक स्तर पर ग्रीक, रोमन, फारसी, मिस्त्र जैसी कई संस्कृतियां विलुप्त हो गईं परंतु भारतीय संस्कृति अभी भी कायम है और मुगल काल एवं ब्रिटिश शासन काल में भारतीय संस्कृति को समाप्त नहीं किया जा सका है। इन्हीं कारणों के चलते अब यह कहा जा रहा है कि समस्त विश्व में शांति स्थापित करने के उद्देश्य से वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति का उत्थान अति आवश्यक है।

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