धुरंधर :कराची से दिल्ली तक, नकली नोटों का साम्राज्य कैसे ध्वस्त हुआ!

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हाल ही में रिलीज हुई बॉलीवुड फिल्म धुरंधर ने एक बार फिर उस छिपी हुई आर्थिक जंग को सुर्खियों में ला दिया है, जो वर्षों से भारत और पाकिस्तान के बीच चल रही है। फिल्म में अंकित सागर द्वारा निभाया गया किरदार जावेद खनानी पाकिस्तान के उस कुख्यात हवाला सरगना पर आधारित है, जिसने दाऊद इब्राहिम, लश्कर-ए-तैयबा और ISI के लिए अरबों रुपये की नकली भारतीय मुद्रा भारत में पहुंचाई। फिल्म में यह कहानी आधी-अधूरी दिखाई गई है, लेकिन असल जीवन में इसका अंत और भी नाटकीय और प्रभावशाली था – भारत की 2016 की नोटबंदी ने इस पूरे नेटवर्क को रातोंरात कचरे के ढेर में बदल दिया।

जावेद खनानी और उसके जुड़वां भाई अल्ताफ खनानी ने 1980 के दशक में कराची में Khanani & Kalia International (KKI) की स्थापना की। शुरुआत में यह एक सामान्य मुद्रा विनिमय कंपनी थी, लेकिन जल्द ही यह वैश्विक हवाला नेटवर्क का केंद्र बन गई। अमेरिकी ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने 2015 में इसे “ट्रांसनेशनल क्रिमिनल ऑर्गेनाइजेशन” घोषित किया। रिपोर्ट्स के अनुसार, KKI ने मेक्सिकन ड्रग कार्टेल्स, अफगान हेरोइन तस्करों, अल-कायदा, हिजबुल्लाह और दाऊद इब्राहिम के D-कंपनी के लिए अरबों डॉलर लॉन्डर किए। सबसे खतरनाक हिस्सा था नकली भारतीय नोटों (FICN) का उत्पादन और सप्लाई।

भारतीय खुफिया एजेंसियों और अमेरिकी रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान की सरकारी प्रिंटिंग प्रेसें – जैसे क्वेटा और कराची की सिक्योरिटी प्रेस – ISI के इशारे पर उच्च गुणवत्ता वाली नकली भारतीय मुद्रा छापती थीं। ये नोट नेपाल, बांग्लादेश और खाड़ी देशों के रास्ते भारत में घुसाए जाते थे। इसका मकसद दोहरा था: भारत की अर्थव्यवस्था को कमजोर करना और आतंकी गतिविधियों के लिए फंडिंग। 2010-2015 के बीच भारत में सर्कुलेशन में FICN की अनुमानित वैल्यू हजारों करोड़ रुपये थी। जावेद खनानी इस नेटवर्क का मुख्य ऑपरेटर था, जो दाऊद के लिए नकली नोट भारत पहुंचाता और हवाला से पैसे ट्रांसफर करता।

8 नवंबर 2016 की रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब 500 और 1000 रुपये के नोटों को अमान्य घोषित किया, तो यह सिर्फ काले धन पर वार नहीं था – यह पाकिस्तान प्रायोजित आर्थिक युद्ध पर सीधा हमला था। नोटबंदी के तुरंत बाद पाकिस्तान में छपी नकली मुद्रा बेकार हो गई। रिपोर्ट्स के अनुसार, ISI के पास भारत में सर्कुलेट हो रही मुद्रा से 150% ज्यादा नकली नोटों का स्टॉक था, जो रातोंरात कागज के टुकड़े बन गया। अनुमान है कि जावेद खनानी ने दाऊद के नेटवर्क के जरिए पहले ही 40,000 करोड़ रुपये की नकली मुद्रा भारत में डाल दी थी, और उसके पास 20,000 करोड़ की अतिरिक्त स्टॉक थी। यह सब व्यर्थ हो गया।

नोटबंदी का असर तत्काल दिखा। कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं 60% कम हो गईं, क्योंकि आतंकी संगठनों के पास पैसे खत्म हो गए। हवाला ऑपरेटर्स की कॉल ट्रैफिक 50% गिरी। पाकिस्तान में दो मुख्य FICN प्रेसें बंद हो गईं। अमेरिकी और भारतीय रिपोर्ट्स में इसे “आर्थिक काउंटरस्ट्राइक” कहा गया।

इस झटके से जावेद खनानी टूट गया। उसके भाई अल्ताफ को 2015 में अमेरिका ने गिरफ्तार किया और 68 महीने की सजा दी। जावेद पर दाऊद और अन्य क्लाइंट्स का दबाव बढ़ गया। 4 दिसंबर 2016 को कराची के एक अंडर-कंस्ट्रक्शन बिल्डिंग (साइना टावर या इसी तरह की इमारत) से वह गिरा। पाकिस्तानी पुलिस ने इसे आत्महत्या बताया – कराची के एडिशनल IG मुश्ताक महेर ने कहा कि वह बिजली के तारों में फंसकर नीचे गिरा। परिवार ने एक्सीडेंट बताया, लेकिन समय की संयोगता ने कई सवाल उठाए। कुछ रिपोर्ट्स में इसे ‘लिक्विडेशन’ कहा गया – नेटवर्क के रहस्यों को दफन करने का तरीका।

भारत में भी इस नेटवर्क की गूंज सुनाई दी। नोटबंदी के दौरान मुंबई के एक परिवार – अब्दुल रज्जाक मोहम्मद सईद और उनके परिजनों – ने 2 लाख करोड़ रुपये की अघोषित आय दिखाई। यह राशि पूरे इनकम डिस्क्लोजर स्कीम की कुल घोषणा से तीन गुना थी। आयकर विभाग ने इसे संदिग्ध मानकर अस्वीकार कर दिया और जब्त कर लिया। जांच में पता चला कि परिवार का पता फर्जी था और PAN अजमेर से मुंबई ट्रांसफर हुए थे। कुछ अनौपचारिक रिपोर्ट्स में इसे दाऊद के नेटवर्क से जोड़ा गया, जहां खनानी जैसे ऑपरेटर्स काले धन को वैध दिखाने की कोशिश कर रहे थे। जांच जारी है, लेकिन यह मामला नोटबंदी के उस बड़े प्रभाव को दिखाता है जो काले धन और नकली मुद्रा के सिंडिकेट पर पड़ा।

पाकिस्तानी एजेंसियां जावेद की मौत की जांच से बचती रहीं, क्योंकि पूरा खुलासा होने पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की और बदनामी होती। FATF की ग्रे लिस्ट में पहले से फंसा पाकिस्तान इस आर्थिक युद्ध के सबूतों से बचना चाहता था।

नोटबंदी के नौ साल बाद भी इसके प्रभाव बाकी हैं। नए नोटों की सिक्योरिटी फीचर्स इतनी उन्नत हैं कि पाकिस्तान अब उच्च गुणवत्ता वाली नकली मुद्रा नहीं छाप पाता। आतंकी फंडिंग सूखी, हवाला कमजोर हुआ। फिल्म धुरंधर में जावेद खनानी को कॉमिक विलेन दिखाया गया, लेकिन असलियत में वह एक छिपा हुआ बैंक था – ISI का शैडो बैंकर।

प्रधानंत्री मोदी ने तब कहा था, “थोड़ा धैर्य रखें… 30 दिसंबर दूर नहीं… केंचुए मरे हैं, अब बड़े अजगरों का नंबर है।” आज देखें तो नोटबंदी ने न सिर्फ काले धन पर चोट की, बल्कि सीमा पार के दुश्मनों की आर्थिक रीढ़ तोड़ दी। यह कहानी बताती है कि कभी-कभी सबसे बड़ा युद्ध बैंक / नोटों से लड़ना पड़ता है।

बांग्लादेश में प्रेस फ्रीडम पर संकट: नाज़नीन मुन्नी को हटाने की धमकी, मीडिया हाउसों पर हमले

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ढाका। बांग्लादेश में पत्रकारिता के गले घोंटे जाने का एक और मामला सामने आया है। ग्लोबल टीवी बांग्लादेश की हेड ऑफ न्यूज़ और प्रमुख एंकर नाज़नीन मुन्नी को कुछ युवकों ने हटाने की धमकी दी है। 21 दिसंबर को ढाका के तेजगांव स्थित चैनल ऑफिस पहुंचे इन युवकों ने आरोप लगाया कि मुन्नी पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की समर्थक हैं और आवामी लीग से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने चैनल के मैनेजिंग डायरेक्टर से मुन्नी को तुरंत हटाने की मांग की, वरना ऑफिस को प्रथम आलो और डेली स्टार की तरह जला देने की धमकी दी।

युवकों ने पहले शरीफ ओसमान हादी की मौत की कवरेज पर सवाल उठाए, जिसे अपर्याप्त बताया। हादी, जो 2024 के छात्र आंदोलन के प्रमुख नेता थे और अंतरिम सरकार के आलोचक, की सिंगापुर में इलाज के दौरान मौत हो गई थी। उनकी मौत के बाद देशभर में हिंसा भड़की, जिसमें प्रथम आलो और डेली स्टार के ऑफिसों पर हमला कर आग लगा दी गई। कई पत्रकार घंटों तक इमारतों में फंसकर जान जोखिम में डालकर बचाए गए।

नाज़नीन मुन्नी ने फेसबुक पोस्ट में इस धमकी की पुष्टि की और कहा कि यह मीडिया पर लगातार हमलों का हिस्सा है। उन्होंने किसी राजनीतिक दल से जुड़े होने से इनकार किया। चैनल प्रबंधन ने सुरक्षा कारणों से उन्हें कुछ दिनों तक ऑफिस न आने की सलाह दी है। मुन्नी ने इंडिया टुडे को बताया कि पिछले 15 दिनों में धमकियां बढ़ गई हैं।

एंटी-डिस्क्रिमिनेशन स्टूडेंट मूवमेंट ने खुद को इस घटना से अलग कर लिया है। उनका कहना है कि एक सदस्य ने बिना निर्देश के मेमोरैंडम दिया था, जिसमें आग लगाने का जिक्र नहीं था।

मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के कार्यकाल में मीडिया पर हमले बढ़े हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे ह्यूमन राइट्स वॉच और सीपीजे ने इन हमलों की निंदा की है। प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में बांग्लादेश पहले से ही निचले पायदान पर है। फरवरी 2026 के चुनाव से पहले यह हिंसा लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रही है। दुनिया भर में मीडिया पर दबाव की निंदा होती है, बांग्लादेश में हो रहे ये कृत्य भी निंदनीय हैं।

मिथिला पाग का अपमान और सांस्कृतिक लाचारी

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पटना। बिहार की राजनीति में सांस्कृतिक प्रतीकों का उपयोग हमेशा से चुनावी हथियार रहा है। हाल के दिनों में मिथिला की पहचान माने जाने वाले ‘पाग’ को लेकर एक नया विवाद सामने आया है। मिथिला क्षेत्र में पाग सिर्फ एक सिर ढकने वाली वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान, गौरव और अस्मिता का प्रतीक है। इसे विशेष अवसरों पर मेहमानों का स्वागत करने या सम्मानित करने के लिए पहनाया जाता है। हर किसी को पाग नहीं पहनाई जाती; यह परंपरा सदियों पुरानी है और मैथिल समाज की सामाजिक गरिमा से जुड़ी हुई है।

इसी पृष्ठभूमि में बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का मिथिला पाग पहनना कई लोगों को खटक रहा है। तेजस्वी यादव राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के पुत्र हैं, और कुछ मैथिल कार्यकर्ता उन्हें उस विचारधारा का प्रतिनिधि मानते हैं जिसने मैथिली संस्कृति को नुकसान पहुंचाया। लोग सवाल उठा रहे हैं कि जिस परिवार पर मैथिली भाषा और संस्कृति की उपेक्षा के आरोप हैं, उसके वारिस को पाग पहनाने का हक किसने दिया? क्या यह वोट बैंक की राजनीति है या सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने की कोशिश?

दरअसल, मिथिला आज भारत की सांस्कृतिक धरोहर बन चुका है। मधुबनी पेंटिंग विश्व प्रसिद्ध है, मैथिली साहित्य विद्यापति जैसे कवियों से समृद्ध है, और पुनौरा धाम जैसे प्रोजेक्ट इसे नई ऊंचाई देने वाले हैं। लेकिन स्थानीय नेता चुनावी लाभ के लिए इन प्रतीकों का उपयोग कर रहे हैं। एक तरफ एनडीए इसे विकास से जोड़ रहा है, तो दूसरी तरफ महागठबंधन इसे भावनात्मक मुद्दा बना रहा है। यह बिहार के नेताओं की नई लाचारी है- अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने की लड़ाई में वे खुद ही उसे राजनीतिक औजार बना रहे हैं।

मिथिला की जनता अब जागरूक है। वह जानती है कि पाग का सम्मान सिर्फ पहनने से नहीं, बल्कि संस्कृति की रक्षा से होता है। आने वाले समय में पुनौरा धाम बिहार की नई पहचान बनेगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या नेता इसे सच्चे मन से अपनाएंगे या सिर्फ चुनावी स्वार्थ के लिए?

चुनावी विसात पर प्रभावी होता बेदख़ली अभियान

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आचार्य श्रीहरि
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गुवाहाटी: असम दोरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस असम को घुसपैठियों का राज्य बनाना चाहती है और घसुपैठियों को संरक्षण देती है। असम की भाजपा सरकार घुसपैठियों को नियंत्रित करने के लिए मियां मुस्लिम बेदखली अभियान चला रही है। मियां मुस्लिम उन लोगों को कहा जाता है जो बाग्लादेशी मूल के हैं और अवैध रूप से भारत में आकर बसे हुए हैं। ऐसे इस तरह के लोगों को अन्य नाम से भी पुकारा जाता है, पहचान किया जाता है, अन्य नामों में बांग्लादेशी, रोहिंग्या शामिल है। खासकर असम में मियां मुस्लिम एक अपमानजनक पदवि है और पहचान है। मियां मुस्लिम‘ समूह पर आरोप है कि इन लोगों ने बांग्लादेश, म्यांमार और पाकिस्तान से आकर असम की डेमोग्राफी को बदला है, सरकारी जमीन को कब्जा किया है, जंगलांें का सफाया किया है, पहाडों को तोडा है, इस प्रकार से इन लोगों ने असमियां समाज के संतुलन रेखा बिगाडी है और असम के पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाया है, दफन किया है। आमतौर पर यह धारणा असम के अंदर मजबूत है और इसी के ईद-गिर्द असम की राजनीति भी धूमती-फिरती है, सतारूढ दल की भी सोच यही है, सत्ता रूढ दल जहां मियां मुस्लिम बेदखली अभियान से लाभार्थी होने की रणनीतियां बिछाता है वहीं विपक्ष कांग्रेस और अन्य मुस्लिम राजनीतिक पार्टियां मियां मुस्लिम बेदखली अभियान को मुसलमानों को अपमानित करने और मुसलमानों को प्रताड़ित करने के साथ ही साथ उन्हें घेर-बार से वंचित करने के तौर पर देखता है, प्रचालित करता है और अपना जनाधार विकसित करता है। इसलिए यह कहना कि फायदे की राजनीति, तनाव की राजनीति, नफरत की राजनीति सिर्फ सत्ताधारी पार्टी भाजपा ही करती है, पूरी तरह से सच नहीं है। मियां मुस्लिम, रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों के संरक्षण देकर बसाने और रोजगार उपलब्ध करा कर अपना जनाधार संरक्षित करने का काम कांग्रेस और मुस्लिम पार्टियां भी करती हैं। लेकिन सच को दबाया नहीं जा सकता है, छुपाया नहीं जा सकता है। मियां मुस्लिम,रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ एक सच है जो चाकचैबंद है और प्रमाणित है। मियां मुस्लिम, रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैइ के कारण न सिर्फ असम की डेमोग्राफी बदली हैं, खतरनाक हुई है, हिंसक हुई है बल्कि देश के अन्य भागों में इसकी एक झलक देखने को मिलती है। मियां मुस्लिम, रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ को राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रतीक और सनातन सहंार का विषय और कारण मान लिया गया है।

ऐलानिया तौर पर असम में मियां मुस्लिम बेदखली अभियान जोरों पर है। इसको लेकर असम की भाजपा सरकार भी गंभीर है और सक्रिय है तथा आक्रामक है। असम भाजपा सरकार कोई कोताही बरतने के लिए तैयार नहीं है। अभियान को जोरशोर से चलाया जा रहा है। अभी तक हजारो घरों को दफन कर दिया गया, उस पर बुलडोजर चला दिया गया, खेती की जमीन पर अतिक्रमण हटा दिया गया। बुलडोजर किस आधार पर चलता है? बुलडोजर चलने का आधार यह है कि सरकारी जमीन है जिस पर अवैध कब्जा है। सरकारी जमीन पर कभी जंगल था, सरकारी जमीन पर कभी पहाड था, कभी पेड-पौधे थे जिसे काटकर घर बनाये गये और खेती के लिए जमीन बनायी गयी। यह बात सही है कि निजी संपत्ति पर इस तरह के कब्जे नहीं होते हैं। इस तरह के अवैध कब्जे सरकारी जमीन पर होते हैं, जंगल की जमीन और पहाड की जमीन के साथ ही साथ नदियों के किनारे की जमीन ही निशाने पर होती है। अवैध घूसपैठियों के पास धन-दौलत तो होता नहीं, उनके पास सिर्फ और सिर्फ लक्ष्य होता है। लक्ष्य भी हिंसक और खतरनाक होता है और नफरत भरा होता है। लक्ष्य इनका इस्लाम के प्रचार-प्रसार और विस्तार होता है, सनातन का संहार और भारत को मुस्लिम राष्ट्र के रूप में तब्दील करने की इनकी मानसिकता भी होती है। अगर इनकी ऐसी मानसिकता और लक्ष्य नहीं होते तो फिर इनकी घुसपैठ के खिलाफ इतना आक्रोश भी नहीं होते और बेदखली अभियान भी मानवीय अवधारणा से प्रेरित होते। अवैध घुसपैठिये अपनी गुंडागर्दी और हिंसा पर कुछ ज्यादा ही निर्भर रहते हैं और स्थानीय मुस्लिम विसात भी उन्हें हिंसक और खतरनाक बनाने की भूमिका निभाते हैं और डरने की बात को खारिज करने की सीख देते हैं। इसलिए मूल निवासियों और घुसपैठियों के बीच में नफरत की एक दीवार खींच जाती है, एक हिंसक लक्ष्मण रेखा भी खींच होती है।

असम में मियां मुस्लिम बेदखली अभियान के खिलाफ आक्रोश भी कम नहीं है, राजनीतिक तनाव भी कम नहीं है और आमने-सामने की स्थिति भी उत्पन्न हुई है। मानवाधिकार कार्यकर्ता और प्रसिद्ध वकील एआर भुइयां कहते हैं कि कब और कौन कहां से आया है? इसका निर्धारण करना मुश्किल है, रंग रूप और कपडों का आधार बना कर किसी को मियां मुस्लिम घोषित कर देना अन्याय है, जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर और डेमोग्राफी चेंज का हौवा खडा कर हम एक बडे समूह को बेदखल नहीं कर सकते हैं, उन्हें हाशिये पर खडा नहीं कर सकते हैं। हम कानून के राज में गतिशील होते हैं जबकि भावनाओं के आधार पर पूरा बेदखली अभियान जारी है, भावनाओं का राज बनाना लोकतंत्र की हत्या है। भुइयां की यह बात तो सही है कि मानवाधिकारी अवधारणा की जरूरत होनी चाहिए। पर कानून की बात को भी हमें भूलना चाहिए या नहीं? इस पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए। अब यहां प्रश्न यह उठता है कि बेदखली अभियान को लेकर असम के नियम-कानून क्या कहते हैं?े वन कानून 1891 और 1995 बेदखली अभियान को मजबूत बनाते हैं। ये कानून सरकार को वन विभाग और सरकारी जमीन को वापस लेने के अधिकार सरकार को देते हैं। बेदखली के लिए सुनावाई और नोटिस की अनिवार्यता होती है। इस साल के अगस्त महीने में गुवाहाटी हाई कोर्ट का फैसला भी उल्लेखनीय है। हाईकोर्ट ने एक याचिका पर फैसला देकर बेदखली अभियान को सही ठहराया था और सात्त दिनों के अंदर कब्जाधारियों को जमीन मुक्त करने का आदेश दिया था। लेकिन आदिवासी समूह को बेदखली अभियान से मुक्त रखा गया है। आखिर क्यों? इसलिए कि वन अधिकार कानून 2006 के अनुसार उन्हें सुरक्षा मिली हुई है। मूल आदिवासियों को जंगल पर परमपरागत अधिकार हासिल हैं।

अगले वर्ष असम में चुनाव है। चुनाव के दृष्टिकोण से ही बेदखली अभियान प्रभावी है। पर भाजपा का आरोप और भी है। भाजपा का आरोप है कि मियां मुस्लिम ग्रेटर राज के लिए घुसपैठ जारी है। हिन्दुओं को बलपूर्वक भयभीत किया जा रहा है और उन्हें अपने मूल स्थान से भागने के लिए विवश किया जा रहा है। सही तो यही है कि असम के कई जिले देखते-देखते मुस्लिम बहुल हो गये, कई विघान सभा क्षेत्र मुस्लिम बहुल हो गये, जहां पर मुस्लिम उम्मीदवार की ही जीत अनिवार्य हो गयी है। असम में मुसलमानों की एक नयी पार्टी भी बन गयी है जो न केवल प्रभावी है बल्कि अपना दखल भी विशेष रखती है। असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट नाम की मुस्लिम पार्टी पर विदेशी घुसपैठियों को संरक्षण देने के आरोप लगते रहे हैं। असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फं्रट का मुखिया मौलाना बदरूउदीन हैं जो मुसलमानों के नेता के तौर पर स्थापित हैं और अपने मुस्लिम भडकाउ बयानों के लिए कुख्यात है। असम यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फंट का कांग्रेस के साथ समझौता है। कांग्रेस स्वयं के बल पर असम में सरकार नहीं बना सकती है, कांग्रेस के लिए मुस्लिम समर्थन की अनिवार्यता होगी। इसी कारण कांग्रेस मौलाना बदरूउदीन के शर्तो के सामने झुकती रही है। बदखली अभियान से भाजपा अपने हिन्दुत्व वोटों को संतुष्ट रखना चाहती है और असम में लगातार तीसरी बार सरकार बनाना चाहती है। असम में भाजपा सरकार का मियां मुस्लिम बेदखली अभियान का अर्थ और लक्ष्य यही है।

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