जंतर मंतर पर कोकरोचों का मेला

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दिल्ली। अरे भाई, जंतर मंतर पर NEET के नाम पर neat वाले इकट्ठे हो गए हैं। बिहार में चुहे पी गए, दिल्ली में कोकरोच पी रहे हैं। परीक्षा की बात? अरे छोड़ो ना! वहाँ तो सस्ता माल फूंक के दीदी लोग नाच रही हैं। वो माल मिलता कहाँ से है, दीदी बताती नहीं। शायद किसी खास दुकान का सीक्रेट फॉर्मूला हो, जो आंदोलन को “ऊर्जा” देता है।

कोकरोचों का पूरा कथित आंदोलन रास्ते से भटक चुका है। एजेंडा? अरे भाई, एजेंडा तो ढूंढो तो मिले! कभी पेपर लीक, कभी आरक्षण, कभी “सिस्टम”। लेकिन असल में टाइम पास चल रहा है। या फिर किसी के इशारे पर कोई खतरनाक प्लान? हल्का-फुल्का माहौल है, लेकिन गंभीर बात यह कि ये लोग क्या कर रहे हैं? सुबह—शाम गाने गा रहे हैं – “नाम रहेगा अल्लाह का”। वाह!

अगर नाम अल्लाह का ही रखना था तो हिंदूओं को पहले बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखा दिया? मंच पर प्रवक्ता विजेता दहिया माँ पार्वती, महादेव और पूरे हिंदू धर्म का मजाक उड़ाता फिर रहा है। फिर वही मंच, वही कोकरोच, और गाना “नाम रहेगा अल्लाह का”। हाइब्रिड आंदोलन है भाई – आधा इस्लामिक, आधा “सेकुलर” मजाक।


देश भर से एक से बढ़कर एक नमूने जमा हो गए हैं। कुछ तो वो भी हैं जो कश्मीर को भारत का हिस्सा मानते ही नहीं। देश बांटने वाले, नफरत फैलाने वाले, सब इकट्ठे। एक तरफ NEET का रोना, दूसरी तरफ ‘भारत माता की जय’ बोलने में भी दिक्कत। यह सब पब्लिक देख रही है।

कोई कहता है छात्र हैं, कोई कहता है राजनीतिक गिरोह। सस्ता माल, गाने, नाच-गाना, मजाक-मजाक में हिंदू देवी-देवताओं पर तंज। और बीच में NEET का नाम भी ले लिया जाता है, ताकि लगे कुछ तो मुद्दा है। असल में ये टाइम पास का महोत्सव है, जिसमें कुछ लोग अपना एजेंडा भी घुसा रहे हैं।

अब सवाल यह है – ये कोकरोच आगे क्या प्लान कर रहे हैं? क्या सच में परीक्षा सुधारना चाहते हैं या बस माहौल गर्म रखना है? हल्के अंदाज में कहें तो, जंतर मंतर आजकल सर्कस का नया अड्डा बन गया है। टिकट फ्री, माल फ्री, बिरयानी फ्री, गाने फ्री। बस दर्शक आते रहो।

देश देख रहा है। और सोच रहा है – ये आंदोलन है या मेला?

आर्थिक कूटनीति का नया भारत और प्रधानमंत्री मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा ऐसे समय हुई है, जब पूरी दुनिया नई आर्थिक साझेदारियों की तलाश में है। चार दशक बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री का यह न्यूजीलैंड दौरा है, जिसे हम कम से कम सामान्य राजनयिक घटना नहीं मान सकते हैं। वस्‍तुत: यह भारत की बदलती आर्थिक कूटनीति का सशक्त संकेत बनकर सामने आया है। यह यात्रा बताती है कि भारत अब अपनी विदेश नीति को सीधे आर्थिक विकास, निवेश, प्रौद्योगिकी, व्यापार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जोड़ रहा है। वास्तव में यह उस नए भारत की विदेश नीति है, जिसमें हर राजनयिक पहल का अंतिम लक्ष्य देश की आर्थिक शक्ति को बढ़ाना है।

कहना होगा कि भारत ने बीते एक दशक में भारत ने अपनी विदेश नीति की प्राथमिकताओं में उल्लेखनीय परिवर्तन किया है। पहले जहां राजनीतिक संवाद और रणनीतिक सहयोग प्रमुख विषय हुआ करते थे, वहीं अब व्यापार, निवेश, स्टार्टअप, डिजिटल अर्थव्यवस्था, सेमीकंडक्टर, स्वच्छ ऊर्जा और सप्लाई चेन साझेदारी हर उच्चस्तरीय वार्ता का केंद्रीय हिस्सा बन चुके हैं।

न्यूजीलैंड यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को “रणनीतिक साझेदारी” तक पहुंचाने का निर्णय लिया। पहली नजर में यह एक कूटनीतिक घोषणा लग सकती है, लेकिन इसके पीछे आर्थिक सोच कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना कर सात अरब न्यूज़ीलैंड डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। यह दोनों अर्थव्यवस्थाओं को दीर्घकालिक रूप से जोड़ने की रणनीति है। भारत यह संदेश भी दे रहा है कि वह निवेश, नवाचार और वैश्विक उत्पादन नेटवर्क का विश्वसनीय साझेदार बनना चाहता है।

एफटीए का अर्थ केवल व्यापार नहीं, नई आर्थिक संरचना भी

भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर बनी सहमति इस यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में है। भारत अब उन देशों के साथ एफटीए को प्राथमिकता दे रहा है, जहां घरेलू उद्योगों के हित सुरक्षित रहते हुए नए अवसर प्राप्त किए जा सकें। इस समझौते का लाभ निर्यात बढ़ाने के साथ ही बहुत व्‍यापक है।
वस्‍तुत: यह डेयरी विज्ञान, कृषि अनुसंधान, खाद्य प्रसंस्करण, बागवानी, वानिकी, डिजिटल सेवाएं, शिक्षा, पर्यटन और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में परस्‍पर सहयोग के साथ दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को नई दिशा देगा। भारत की विशाल उपभोक्ता क्षमता और न्यूजीलैंड की तकनीकी विशेषज्ञता मिलकर ऐसी मूल्य शृंखला तैयार कर सकती है, जिसका लाभ दोनों देशों को मिलेगा।

‘मेक इन इंडिया’ से आगे बढ़कर ‘पार्टनर विद इंडिया’ की नीति

प्रधानमंत्री मोदी ने न्यूजीलैंड के उद्योग जगत को जिन क्षेत्रों में निवेश का निमंत्रण दिया, वे सभी अति महत्‍व रखते हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वच्छ ऊर्जा, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल इकॉनमी, शहरी गतिशीलता, विमानन, जल प्रबंधन और कचरा प्रबंधन जैसे क्षेत्र आने वाले दशक की भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास इंजन माने जा रहे हैं।

दरअसल, भारत अब विदेशी कंपनियों को सिर्फ अपने बाजार तक पहुंच नहीं दे रहा, वह उन्हें भारत के विकास अभियान का सहभागी बनने का आमंत्रण दे रहा है। यही कारण है कि “मेक इन इंडिया” की अवधारणा अब “पार्टनर विद इंडिया” के रूप में विकसित होती दिखाई दे रही है।

सप्लाई चेन का नया केंद्र बनने की दिशा में भारत

विश्व अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा परिवर्तन पिछले पांच वर्षों में सप्लाई चेन के पुनर्गठन के रूप में सामने आया है। एक देश पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों को वैकल्पिक उत्पादन केंद्र खोजने के लिए प्रेरित किया है। “चाइना प्लस वन” रणनीति ने भारत को अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया है। भारत इस अवसर का लाभ कम लागत वाले उत्पादन केंद्र के रूप में उठाने के साथ एक ऐसे लोकतांत्रिक, स्थिर और विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहा है, जहां उत्पादन, नवाचार, अनुसंधान और वैश्विक वितरण एक साथ विकसित हो सकें। ऐसे में कहना यही होगा कि न्यूजीलैंड के साथ कृषि मूल्य शृंखला, खाद्य प्रसंस्करण, लॉजिस्टिक्स और समुद्री सहयोग पर दिया गया जोर इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

कृषि और तकनीक का नया आर्थिक समीकरण

भारत और न्यूजीलैंड की अर्थव्यवस्थाएं भले अलग प्रकृति की हों, लेकिन उनकी ताकतें एक-दूसरे की पूरक हैं। न्यूजीलैंड कृषि अनुसंधान, डेयरी, पशुपालन और खाद्य गुणवत्ता में अग्रणी है, जबकि भारत के पास विशाल कृषि बाजार, कृषि स्टार्टअप, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग और दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता आधार है। यदि यह सहयोग व्यवहारिक स्तर तक पहुंचता है, तो भारतीय कृषि उत्पादन आधारित होने के साथ उच्च मूल्य वाली कृषि अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ेगी। इससे किसानों की आय, निर्यात क्षमता और ग्रामीण रोजगार इन तीनों को नई गति मिल सकती है।

डिजिटल इंडिया अब वैश्विक आर्थिक ब्रांड

दुनिया आज भारत को बड़ी आबादी वाले देश के रूप में देखने के साथ उसे डिजिटल परिवर्तन के मॉडल के रूप में भी पहचान रही है। यूपीआई, डिजिटल भुगतान प्रणाली, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्टार्टअप संस्कृति और फिनटेक ने भारत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दी है, इसीलिए प्रधान मंत्री मोदी ने अपनी इस न्यूजीलैंड यात्रा के दौरान नवाचार, उभरती प्रौद्योगिकी और फिनटेक सहयोग पर विशेष बल दिया गया।

प्रवासी भारतीय : आर्थिक कूटनीति के मौन राजदूत

यहां यह भी ध्‍यान देने योग्‍य है कि न्यूजीलैंड में भारतीय समुदाय की जो भूमिका है, वह व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक और उद्यमिता में दोनों देशों के बीच भरोसे का आधार तैयार करती है। आज प्रवासी भारतीय निवेश, नवाचार, स्टार्टअप सहयोग और बाजार विस्तार के सबसे प्रभावी माध्यम बन चुके हैं। यही कारण है जो न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन द्वारा भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक, महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक शक्ति और हिंद-प्रशांत का प्रमुख साझेदार बताया जा रहा है। वे देख रहे हैं कि भारत भविष्य की आर्थिक वृद्धि के केंद्र के रूप में है।

वास्तव में भारत भू-अर्थनीति का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। उसकी विदेश नीति का लक्ष्य स्पष्ट है; विश्वसनीय साझेदारी, सुरक्षित सप्लाई चेन, तकनीकी सहयोग, मुक्त व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और निवेश प्रवाह के माध्यम से भारत की आर्थिक क्षमता का अधिकतम विस्तार।

प्रधानमंत्री मोदी की न्यूजीलैंड यात्रा इसी व्यापक दृष्टि का सशक्त उदाहरण है। यह यात्रा बताती है कि आने वाले वर्षों में भी भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा उद्देश्य अपने अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को आर्थिक समृद्धि में बदलते रहना होगा। यदि यही नीति निरंतरता के साथ आगे बढ़ती है, तो भारत निश्‍चित ही वैश्विक निवेश, नवाचार, उत्पादन और विश्वसनीय सप्लाई चेन का केंद्रीय स्तंभ बनने की दिशा में भी निर्णायक बढ़त हासिल करेगा। यही इस यात्रा का सबसे बड़ा लक्ष्‍य है और यही भारत की नई आर्थिक कूटनीति की वास्तविक पहचान भी आज के वक्‍त में हमें नजर आती है।

(साक्षात्कार) : भारत में हो धर्म-परिषद की स्थापना, मंदिर व्यवस्था के लिए बने ‘सनातन बोर्ड’: शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती महाराज

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । भारत की महान धार्मिक संस्थाएं केवल प्रशासनिक निकाय नहीं हैं; वे करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और सनातन परम्परा की प्रतिनिधि हैं, इसलिए ऐसी संस्थाओं में समय-समय पर धर्म, शास्त्र और परम्परा के आलोक में मार्गदर्शन देने के लिए देश के चारों आम्नाय पीठों के शंकराचार्य, पीठों के प्रमुख वैष्णव आचार्य, अन्य मान्य एवं प्रतिष्ठित आचार्य तथा प्रमुख संतों की एक मार्गदर्शक धर्म-परिषद का होना अत्यन्त हितकारी होगा। इसके साथ ही देश के मंदिरों की व्यवस्था के लिए ‘सनातन धर्म संरक्षण समिति’, अर्थात् ‘सनातन बोर्ड’ का गठन किया जाए। यह बातें श्रीद्वारका शारदा पीठ के पीठाधीश्वर, जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती महाराज ने विशेष बातचीत में कहीं।

अयोध्या श्रीराम मंदिर दान प्रकरण के बीच देशभर में उठ रहे प्रश्नों, शंकाओं तथा भक्तों के मन के भावों में आ रहे अनेक नकारात्मक विचारों के बीच जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती का कहना है कि धर्माचार्यों का कार्य प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और शास्त्रसम्मत दिशा प्रदान करना है। यदि ऐसी मार्गदर्शक परिषद समय-समय पर अपने सुझाव दे, तो इससे न केवल मंदिर की गरिमा और परम्परा सुरक्षित रहेगी, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं का विश्वास भी और अधिक दृढ़ होगा। श्रीराम का मंदिर सम्पूर्ण हिन्दू समाज की आस्था का केन्द्र है; इसलिए उसके संचालन में धर्म का प्रकाश निरन्तर बना रहना चाहिए।

‘सनातन बोर्ड’ के माध्यम से हो मंदिरों का व्यवस्थापन

उन्होंने कहा, “मंदिरों का संचालन धर्माचार्यों, वेदविद् विद्वानों तथा समाज के श्रद्धालु, योग्य और निष्कलंक व्यक्तियों के मार्गदर्शन में होना चाहिए। सरकार यदि सहयोग करे तो स्वागत योग्य है, किन्तु धार्मिक नियंत्रण उसका कार्य नहीं है। हम चाहते हैं कि पूरे देश के मंदिरों की व्यवस्था के लिए ‘सनातन धर्म संरक्षण समिति’, अर्थात् ‘सनातन बोर्ड’ का गठन किया जाए। इस बोर्ड में देश के चारों आम्नाय पीठों के शंकराचार्य, पाँचों प्रमुख वैष्णव आचार्य तथा अन्य मान्य एवं प्रतिष्ठित धर्माचार्यों को सम्मिलित किया जाए और समस्त मंदिरों का धार्मिक व्यवस्थापन उनके मार्गदर्शन एवं संरक्षण में हो।”

जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती का कहना है, “ऐसा करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि सरकार के पास न तो शास्त्रीय ज्ञान होता है, न आध्यात्मिक अनुभूति; और धर्मनिरपेक्ष शासन-व्यवस्था होने के कारण मंदिरों के धार्मिक संचालन का नैतिक अधिकार भी उसके पास नहीं है।” वे कहते हैं, “यह बोर्ड मंदिरों की धार्मिक मर्यादा, परम्परा, देवद्रव्य की पारदर्शिता, धर्मप्रचार, वेद-रक्षा, गोसंरक्षण, संस्कृत-प्रचार तथा लोककल्याण के कार्यों का मार्गदर्शन करे। इससे मंदिर राजनीति का नहीं, धर्म का केन्द्र बने रहेंगे और समाज का विश्वास भी अधिक दृढ़ होगा।”

मंदिरों में प्राप्त देवद्रव्य का शास्त्रोक्त सदुपयोग हो

उन्होंने कहा, “हम यह भी चाहते हैं कि मंदिरों में प्राप्त देवद्रव्य का उपयोग मुख्यतः उसी जनपद एवं क्षेत्र के धार्मिक, शैक्षिक और सामाजिक उत्थान के लिए किया जाए, जहाँ वह मंदिर स्थित है। जैसे कि पाठशालाएँ, गुरुकुल, वेद विद्यालय, गोशालाएँ, चिकित्सालय, अन्नक्षेत्र, धर्मशालाएँ तथा निर्धन, असहाय एवं पीड़ित जनों की सेवा जैसे लोककल्याणकारी कार्यों में किया जाए। यही सनातन धर्म की परम्परा भी है और यही देवद्रव्य का शास्त्रोक्त सदुपयोग भी है।”

मंदिरों का धार्मिक संचालन सरकार के हाथ में नहीं होना चाहिए

जगद्गुरु शंकराचार्य यहां जोर देकर यह भी कहते हैं, “मेरा स्पष्ट मत है कि मंदिरों का धार्मिक संचालन सरकार के हाथ में नहीं होना चाहिए। शासन का कार्य प्रशासन, सुरक्षा, न्याय और जनकल्याण है; जबकि मंदिर आध्यात्मिक, धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना के केन्द्र हैं। सरकार के पास न शास्त्रज्ञान है, न धार्मिक परम्पराओं का अनुभव और न ही आध्यात्मिक उत्तरदायित्व। धर्मनिरपेक्ष शासन व्यवस्था में राज्य को किसी भी धर्म के धार्मिक कार्यों का संचालक नहीं बनना चाहिए।”

कहने का तात्पर्य यह है कि शासन के पास न तो शास्त्रीय ज्ञान है और न ही धर्म को जीने वाले धर्मानुभवी अधिकारी। धर्मनिरपेक्ष शासन का कार्य जन-सुविधाएँ देना है, न कि आध्यात्मिक अनुष्ठानों का संचालन करना। अतः शासन धार्मिक प्रबन्धन में कभी न्याय नहीं कर सकता। मर्यादा का ह्रास करने वाले सरकारी अधिकारी मंदिरों को “पर्यटन केन्द्र” मानते हैं, तपोभूमि नहीं। इससे गर्भगृह की पवित्रता और परम्परागत पूजन-पद्धति में बाधा आती है।

भगवान को समर्पित द्रव्य है देवद्रव्य

एक प्रश्न के उत्तर में जगद्गुरु शंकराचार्य शास्त्रों का हवाला देते हुए कहते हैं कि “देवद्रव्यं न हर्तव्यं नोपभोग्यं कदाचन।” यानी कि भगवान को समर्पित द्रव्य देवद्रव्य बन जाता है। यदि वास्तव में उसमें चोरी हुई है, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, अपितु भगवान श्रीराम और करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के साथ विश्वासघात है। इसकी निष्पक्ष, शीघ्र और निर्भीक जाँच होनी चाहिए तथा दोषियों को कठोर दण्ड मिलना चाहिए।

मेरी केवल यही अपेक्षा है कि जाँच किसी पद, प्रभाव, प्रतिष्ठा या राजनीतिक दबाव से प्रभावित न हो। सत्य जहाँ तक ले जाए, वहीं तक जाँच पहुँचे; निर्दोष की रक्षा हो और दोषी, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, न्याय के समक्ष उत्तरदायी बने। यही धर्म है, यही न्याय है और यही भगवान श्रीराम की मर्यादा के अनुरूप भी है।

उन्होंने कहा, सनातन धर्म में देवद्रव्य को भगवान का स्वरूप माना गया है। उस पर किसी व्यक्ति का अधिकार नहीं होता। इसलिए देवद्रव्य का अपहरण या दुरुपयोग केवल चोरी नहीं, अपितु धर्म का भी गंभीर अपराध है। प्रश्न तो यह उठता है कि अयोध्या धर्मनगरी है, संस्कारों की नगरी है और भगवान श्रीराम की पावन जन्मभूमि है। ऐसे पवित्र स्थान पर ऐसा कुकृत्य कैसे संभव हुआ? यह तो वैसा ही है जैसे चन्दन के वन में विषवृक्ष का निवास हो।

पुराणों में कहा गया है, “देवद्रव्यं ब्राह्मणस्वं च लोभेनोपहिनस्ति यः। स पापात्मा निरये घोरे ब्रह्महत्यासमं व्रजेत्॥” अर्थात् जो लोभवश देवद्रव्य का अपहरण करता है, वह अत्यन्त पाप का भागी होता है। अतः यदि भगवान श्रीराम के चरणों में अर्पित दान के साथ छल हुआ है, तो यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर भी आघात है।

श्रीराम का मंदिर व्यवस्था सभी के लिए आदर्श और अनुकरणीय हो

राम मंदिर ट्रस्ट के ढाँचे को बदलने से संबंधित प्रश्न के उत्तर में जगद्गुरु शंकराचार्य का स्पष्ट कहना है, “मेरा आग्रह व्यक्तियों को बदलने का नहीं, बल्कि नियम बदलने की जरूरत है, व्यवस्था तंत्र को आदर्श बनाने का है। अर्थात् योग्य व्यक्तियों को व्यवस्थापन सौंपना चाहिए। कोई भी संस्था व्यक्तियों से नहीं, उसके सिद्धान्तों और पारदर्शी व्यवस्था से महान बनती है। यदि कहीं प्रशासनिक या संरचनात्मक कमियाँ हैं, तो उनका साहसपूर्वक परिमार्जन होना चाहिए। साथ ही ऐसी व्यवस्था बने, जिसमें धर्माचार्यों का मार्गदर्शन, वित्तीय पारदर्शिता, नियमित लेखा परीक्षा तथा जन-उत्तरदायित्व, ये सभी स्थायी रूप से सुनिश्चित हों। श्रीराम का मंदिर सम्पूर्ण हिन्दू समाज का है; इसलिए उसकी व्यवस्था भी आदर्श और अनुकरणीय होनी चाहिए।

दान की पारदर्शिता बनाए रखने के संबंध में पूछे गए प्रश्न के जवाब में जगद्गुरु शंकराचार्य का कहना था कि देवद्रव्य के प्रबन्धन के लिए पाँच सिद्धान्त अनिवार्य होने चाहिए, प्रत्येक दान का डिजिटल एवं लिखित अभिलेख। प्रतिवर्ष स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट। नियमित सार्वजनिक आय-व्यय विवरण (श्वेतपत्र)। धर्माचार्यों एवं वित्त विशेषज्ञों की संयुक्त निगरानी व्यवस्था। प्रत्येक व्यय का उद्देश्य स्पष्ट रूप से श्रद्धालुओं के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।

उन्होंने कहा, “धर्म में गोपनीयता नहीं, पवित्रता और पारदर्शिता ही विश्वास का आधार है। जहाँ लेखा स्पष्ट होता है, वहीं लोकश्रद्धा और भी प्रगाढ़ होती है।” जब उनसे पूछा गया कि इस बारे में आपकी क्या मांग है? जगद्गुरु शंकराचार्य ने कहा कि मेरी किसी व्यक्ति या दल के विरुद्ध कोई मांग नहीं है; मेरी मांग केवल धर्म, सत्य और लोकविश्वास की रक्षा के लिए है। भगवान श्रीराम के चरणों में समर्पित समस्त दान की आय-व्यय का प्रमाणिक एवं सार्वजनिक श्वेतपत्र समय-समय पर प्रकाशित किया जाए, जिससे श्रद्धालुओं का विश्वास और अधिक दृढ़ हो।

दान का उपयोग वेद-विद्या, गुरुकुल, गोसंरक्षण, संस्कृत, धर्मप्रचार, अन्नदान और लोककल्याण में हो

उन्होंने कहा, “मंदिरों में प्राप्त दान का यथाशक्ति उपयोग वेद-विद्या, गुरुकुल, गोसंरक्षण, संस्कृत, धर्मप्रचार, अन्नदान और लोककल्याण के कार्यों में हो, जिससे भगवान का प्रसाद सम्पूर्ण समाज तक पहुँचे। भगवान श्रीराम केवल एक ऐतिहासिक पुरुष नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, मर्यादा और लोकमंगल के शाश्वत आदर्श हैं। यदि हम वास्तव में श्रीराम के भक्त हैं, तो केवल मंदिर निर्माण ही नहीं, बल्कि राम के आदर्शों का भी निर्माण अपने जीवन में करें। धर्म की रक्षा केवल नारों से नहीं होती; सत्य, ईमानदारी, पारदर्शिता, सेवा, त्याग और मर्यादा से होती है।”

अंत में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती कहते हैं, “भगवान श्रीराम केवल मंदिरों में प्रतिष्ठित विग्रह नहीं हैं; वे भारत की आत्मा हैं। उनके जीवन का प्रत्येक प्रसंग सत्य, मर्यादा, करुणा, त्याग, न्याय और लोकमंगल का आदर्श प्रस्तुत करता है। इसलिए मैं समस्त देशवासियों से निवेदन करता हूँ कि भगवान श्रीराम के प्रति अपनी श्रद्धा को केवल उत्सव तक सीमित न रखें, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें। मंदिरों की पवित्रता, पारदर्शिता और मर्यादा की रक्षा को अपना सामूहिक दायित्व समझें। देवद्रव्य को ईश्वर की संपत्ति मानकर उसके सदुपयोग के प्रति सजग रहें। धर्म के नाम पर किसी प्रकार के भ्रष्टाचार, छल या स्वार्थ को कभी स्वीकार न करें। समाज में सत्य, सेवा, सदाचार, गोसंरक्षण, वेद-विद्या, संस्कृत तथा भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए सक्रिय योगदान दें।”

शास्त्रों में कहा गया है- धर्मो रक्षति रक्षितः। अर्थात् जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। भगवान श्रीराम सम्पूर्ण राष्ट्र को सत्य, मर्यादा, सद्बुद्धि और धर्मनिष्ठा प्रदान करें तथा भारत पुनः विश्व में धर्म, संस्कृति और आध्यात्मिक नेतृत्व का आलोक फैलाएं, यही मंगलकामना है।॥ श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु ॥

योगी सनातन को लेकर हुए आक्रामक 

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लखनऊ। अयोध्या में श्रीराम मंदिर का चढ़ावा चोरी विवाद की आड़ में सभी रामद्रोही, श्री राम को काल्पनिक मानने वाले, रामभक्तों पर गोलियां चलवाने वाले, श्रीराम जन्मभूमि पर अस्पताल और शौचालय बनवाने की बात करने वाले रामभक्त होनेम का स्वांग रच रहे हैं और सोच रहे हैं कि ऐसा करके वो 2027 के चुनावों में भाजपा को मात दे देंगे।

सपा मुखिया अखिलेश यादव ज्योतिषपीठाधीश्वर तथाकथित शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से आशीर्वाद लेकर गो संरक्षण, सनातन पंरपराओं, सामाजिक सरोकारों व समसामयिक राष्ट्रीय विषयों  पर चर्चा कर रहे हैं। शंकराचार्य जी से मिलने के बाद सपा मुखिया आक्रामक हो जाते हैं तथा कहते हैं कि जो लोग भाजपा के साथ हैं वह रामघाती हैं। सपा मुखिया अपने ही जाल में फंसते दिख रहे हैं। इस बार अपने आपको सनातनी दिखाने के लिए वो पत्नी सहित बड़े मंगल भंडारों में गए और हनुमान चालीसा का पाठ करते दिखाई दिए। यह उनके लिए दो नावों की सवारी जैसा है क्योंकि मुस्लिम तुष्टिकरण अभी भी उनकी प्रमुख रणनीति है। सपा मुखिया श्रीकृष्ण जन्मभूमि के प्रति मौन हो जाते हैं क्योंकि इससे मुस्लिम वोट बैंक छिटकने का डर है । उनका सनातन प्रेम हिन्दू समाज को बांटने की राजनीति ही है और इससे उनको अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करना है। सपा मुखिया अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव ने हिंदुओं की आस्था के साथ इतने अधिक घृणित पाप किए हैं कि वह तथाकथित शंकराचार्य के चरणों में बैठकर भी नहीं धुलेंगे।

अभी चुनावी रैलियां शुरू होने में समय है इसलिए अखिलेश यादव राम मंदिर में चढ़ावा कांड से लेकर बद्रीनाथ धाम और मां बगलामुखी मंदिर से प्राप्त  समाचारों को हवा देकर भाजपा  को दबाव मे लेना चाहते हैं । उधर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी तीखे तेवर अपनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि सनातन और हिंदुत्व की पिच उनकी अपनी है और यहाँ कोई उनको दबाव में नहीं ले सकता।

सपा ने हनुमागढ़ी में हनुमान चालीसा पढ़वाने का पाप किया – मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सनातन और हिंदुत्व को लेकर अत्यंत आक्रामक हैं इनके प्रति किए गए अखिलेश और सपा के पापों का पिटारा खोलकर हिंदू समाज को सावधान कर रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी ने अयोध्या में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि समाज के प्रत्येक तबके ने श्री रामजन्मभूमि की मुक्ति के लिए आंदोलन और संघर्ष किया जबकि सपा ओैर कांग्रेस के लोगों ने मंदिर निर्माण में बाधाएं खड़ी कीं। योगी ने सपा पर पलटवार करते हुए बड़ा खुलासा किया कि जो लोग आज आस्था की बात करते हैं याद करिए इन लोगों ने हमारे पवित्र हनुमानगढ़ी में नमाज पढ़वाने का काम किया था। आप कल्पना कीजिए कि क्या कोई जामा मस्जिद में हनुमान चालीसा का पाठ कर पाएगा क्या इनकी सरकारें करवा पाएंगी ?अगर नहीं तो अयोध्या में हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नामज पढ़वाने का पाप क्यों करवाया ?

योगी जी ने जनमानस को याद दिलाया कि लंबे समय तक अयोध्या अविकसित रही। पिछड़ी रही। सड़क,  बिजली, पानी के लिए तरसती रही। अयोध्या आने वाले श्रद्धालु मां सरयू का आशीर्वाद नहीं ले पाते थे। अयोध्या की जनसभा में उन्होंने नगर पंचायत खिरौनी का नामकरण मां ज्वाला जी के नाम से जबकि भदरसा को भरत नगर करने की घोषणा की। अयोध्या से योगी ने सपा व अन्य कालनेमियों को स्पष्ट संदेश दिया है कि अब उन्हें, उन्हीं की भाषा में उत्तर दिया जाएगा। योगी जी अपनी जनसभा में कालनेमियों के पापों का खुलासा कर उन्हें असहज कर रहे हैं। योगी जी अब स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि सपा व कांग्रेस को हिंदुओं की कोई चिंता नहीं है। ये पहला हक मुस्लिमों को देना चाहती हैं।

दरअसल चढ़ावा विवाद के बाद सपा व कांग्रेस सहित इंडी गठबंधन के दल इसमें अपने लिए अवसर खेाज रहे हैं जबकि उनके पूर्व कर्म इतने हिन्दू द्रोही रहे हैं कि वह अपने ही जाल में फंस जाते हैं। जब उत्तर प्रदेश सहित भाजपा शासित अन्य राज्य सरकारें गौवध व तस्करी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना चाहती हैं तब यह लोग हल्ला मचाने हिन्दू

लगते हैं और इसके खिलाफ कोर्ट चले जाते हैं। वहीं आजकल स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के साथ मिलकर ये गौ माता की सुरक्षा व संरक्षा के प्रति चिंता जता रहे हैं। गौ माता को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग कर रहे हैं। विडंबना यह है की इन्हीं शंकराचार्य ने यूपी में बूचड़खानों के बंद होने का विरोध किया था। यदि शंकराचार्य जी व सपाईयों को गौमाता की वास्तविक चिंता है तो वह अपनी यात्रा दक्षिण भारत में क्यों नहीं निकालते, जहाँ   सबसे अधिक गौवध हो रहा है । भाजपा सरकार आने से पहले जब बंगाल से गौवध की वीभत्स  तस्वीरें आ रही थी तब यह शंकराचार्य और सपाई क्यों नहीं बोले थे ? शंकराचार्य जी को यदि गौ संरक्षण करना है तो उन्हें पंजाब और झारखंड में भी अपनी यात्रा निकालनी चाहिए और बूचड़खानों की बंदी का स्वागत करना चाहिए।

वक्फ बोर्ड के मुद्दे पर बोलते हुए योगी जी ने सभी विरोधी दलों पर हमला बोलते हुए कहा कि सनातन आस्था पर प्रहार कर रहे इन दोनों दलों की खामोशी से गिरगिट भी शरमा जाएगा। योगी जी ने कहा कि वक्फ के नाम पर प्रदेश में हजारों हेक्टेयर जमीन बेची गयी,  क्या उस पर सपा और कांग्रेस एक बार भी बोली? अभी जो सपा व कांग्रेस के लोग स्वयं को सनातनी साबित करने की होड़ मचाए हुए हैं,  क्या यह लोग आगामी दिनों में कांवड़ यात्रियों पर पुष्पवर्षा करेंगे? विकृत मानसिकता वाले तथाकथित सेक्युलर दल कभी सनातनी बन जाते हैं कभी अच्छे हिंदू और बुरे  हिन्दू का विचार लेकर आ जाते हैं । जब अहमदाबाद हाईकोर्ट ने 38 आतंकियों को फांसी की सजा सुनाई तब सपा ,कांग्रेस व ओवैसी को वह फैसला रास नहीं आया । जब दक्षिण भारत के राजनैतिक दल विशेषकर तमिलनाडु से स्टालिन परिवार की ओर से हिंदू सनातन समाज की तुलना डेंगू व मलेरिया आदि बताकर उनके उन्मूलन की बात की जाती है तब इन लोगों के मुंह में ताला लग जाता है।

हिंदू आस्था का अपमान करते-  करते सपा पीडीए की राजनीति से भी दूर होती चली जा रही है। वास्तविकता यह है कि बंगाल में हिंदुत्व के उभार और ममता दीदी की पराजय के बाद से सपा नेता बुरी तरह से घबरा गए हैं। विपक्ष को  2027 में ममता दीदी से बहुत आस थी वह आस ध्वस्त हो चुकी है। अब ममता की पार्टी  भी कंगाल हो चुकी है। यही कारण है कि अब सपा मुखिया अखिलेश यादव सनातनी चोला पहनकर अपनी चुनावी नैया पार लगाने की जुगत में हैं।

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