पत्रकारिता में किस जाति के लोग सबसे ज्यादा है

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रवि मिश्रा

फिल्म सिटी (नोएडा)। इस कुतर्क का कोई उत्तर नहीं कि पत्रकारिता में फलां लोग क्यों हैं, फलां लोग क्यों नहीं …पत्रकारिता की पढ़ाई को चुनने का अवसर 12वीं के बाद से सबके लिए खुल जाता है। भारत के सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों में दाखिले कि जो प्रक्रिया है यहां भी वैसी ही है। मेरा अपना अनुभव एक छात्र के रूप में ये कहता है कि दाखिला लेने से लेकर पढ़ाई तक इस पेशे को अपने जीवन के रूप में चुनने वाले किसी भी छात्र के दिमाग में कम से कम ये बात कहीं नहीं आती कि वो पत्रकारिता की पढ़ाई इसलिए करेगा क्योंकि उसकी जाति, या धर्म, या राज्य या समाज के लोग इसमें ज्यादा हैं । मुझे नहीं पता कि ये किसी और पेशे में होता है या नहीं पर जर्नलिज्म के चुनाव में कोई भी छात्र ये बात तो कहीं से भी नहीं सोचता ।

पढ़ाई के खत्म होते होते सबको पता चल जाता है कि ये पेशा निर्दयता की हद तक मेहनत करवाने वाला, लगातार सीखने की कभी न खत्म होने वाली यात्रा से भरा , भारी शारीरिक जोखिम, आर्थिक जोखिम, अनपेड से शुरू होकर अंडर पेड रह जाने , ऑफिस और ऑफिस से बाहर की जटिल राजनीति में सदा उलझे रहने और उसपर हर दिन नौकरी के आखिरी दिन की तरह एक्यूरेसी को मैच करने की टाइम के खिलाफ एक अनवरत रेस है ।
नींद, भूख, प्यास परिवार, त्योहार को जो कुर्बान करने में सबसे पहले हाथ उठा कर आगे आता है वही पत्रकार बना रह पाता है। विश्वास कीजिए कि इस हालात को भांप लेने वाले, व्यावहारिक ज्ञान वाले कई छात्र शुरू में ही ये पेशा छोड़ देते हैं।

फिर भी कुछ हम जैसे लोग आगे बढ़ते हैं इसलिए नहीं कि हमारी जाति या धर्म या समाज के लोग यहां हमें हाथों हाथ लेने को तैयार बैठे हैं। बल्कि इसलिए कि हम इन हालात में भी इस पेशे से प्यार करते हैं और बिना सैलेरी, आधी सैलेरी और कभी 18 तो कभी 20 घंटे या उससे भी ज्यादा देर तक दुनिया के सुख – दुख में डूबे रहने का एक पागलपन होता हैं जो इस करियर से शुरू होता है , जैसे – जैसे हम आगे बढ़ते हैं इसका दबाव खुद पर बढ़ता ही जाता है। छोटी शुरुआत से एक अच्छे संस्थान तक पहुंचना सपना होता तो है पर हमारे काम के प्रेशर वाला नेचर कभी और कहीं नहीं बदलता। ये हम सभी जानते भी है और मनाते भी है।

ये कहने में मुझे गर्व है कि करियर शुरू करने से लेकर आजतक मै या मेरे सभी साथी, जितने लोग काम करते रहे हैं किसी को व्यक्तिगत त्याग या मेहनत में कोई आरक्षण नहीं है। ये शायद इकलौता पेशा है जहाँ मेहनत हर विपरीत परिस्थिति में आपको मजबूत बनाए रखती है।

हम में से न जाने कितने पत्रकारों ने अपने सिद्धांतों, आदर्श और उसूल की वजह से नौकरियां छोड़ी, इस्तीफे दिये, लम्बी नाइट शिफ्ट सजा के रूप में काटी, सस्पेंड हुए और अपमानित भी हुए । अगर किसी को लगता है कि जाति या धर्म देखकर ये सब होता होगा तो मुझे ये सोचने वालों पर तरस आता है क्योंकि 90 प्रतिशत लोग वही हैं जो आपके लिए स्टैंड लेने की वजह नौकरियों से इस्तीफा दे रहे होते हैं या संस्थान में संघर्ष कर रहे होते हैं।
जमीन से लेकर स्टूडियो तक खड़ा हर पेशेवर पत्रकार जो बरसों से यहां कठिन हालात में टिका हुआ है कम से कम उसकी तपस्या का उपहास मत कीजिए । आपकी पसंद या नापसंद वाला कोई एक या दो anchor या पत्रकार इन हजारों पत्रकारों की मेहनत , बलिदान और सेवा के उपहास का कारण नहीं बनने चाहिए । अगर आप ये कर रहे हैं तो आप आपके लिए ही देश के कोने कोने में खड़े सिपाहियों को खत्म कर रहे हैं।

जिसे भी लगता है कि ये काम बहुत सरल, प्रभुत्व, एकाधिकार, बहुत पैसे वाला और बहुत सुरक्षित है , मेरी तरफ से उनका स्वागत है कि वो आएं और सिर्फ एक महीने एक पेशेवर माहौल में अपने उसी ज्ञान के साथ काम कर के दिखाएं जो दिन रात फ्री के सोशल मीडिया पर फ्री में देते रहते हैं ।

और जब मैं आप सभी मित्रों और समाज के लोगों को ये बात कह रहा हूं तो मेरा आशय न तो अभिमान का है, न किसी को कमतर बताने जताने का है और न ही खुद को महान बताने का । मेरा आग्रह ये है मेरे हजारों पत्रकार भाई और साथी बहुत मेहनत करते हैं आपके लिए । कुछ कम या कुछ ज्यादा , कुछ सहमति और असहमति के साथ। पर उनकी इस संघर्ष की यात्रा को ये कह कर अपमानित न किया जाए कि जाति, धर्म या समाज को देखकर लोग यहां भीड़ लगा रहे हैं। इस काम में एक ही जाति सबसे ज्यादा और बड़ी है वो है कड़ी मेहनत। जो धैर्य के साथ, लगन के साथ , विपरीत हालत में मान और अपमान सहते हुए जनता के लिए मेहनत करता है वो यहां लंबा चलता है।

आपकी पसंद या नापसंद के एक दो लोगों से ये मेहनती लोग परिभाषित नहीं होने चाहिए। पत्रकारिता में एक ही जाति के लोग सबसे ज्यादा हैं, और ये वही हैं जिनके अंदर कॉलेज में कदम रखने के समय से ही ये आग घर कर जाती है कि आराम नहीं , हमें मेहनत का रास्ता चुनना है ताकि हम किसी की आवाज बन सके ।

हमारी जाति कठिन मेहनत की जाति है और इस जाति में सबका स्वागत है।

डॉ. कमलकांत बुधकर के नाम पर, ‘बुधकर भवन’ कहलाएगा प्रेस क्लब सभागार

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अजित वडनेरकर

हरिद्वार: प्रेस क्लब हरिद्वार एवं भारतीय संवाद परिषद के संयुक्त तत्त्वावधान में एक भावपूर्ण समारोह का आयोजन किया गया। इस दौरान प्रेस क्लब सभागार में 1986 से 2025 तक के सभी पूर्व अध्यक्षों के चित्रों का लोकार्पण किया गया।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. शिवशंकर जायसवाल, कौशल सिखौला एवं गोपाल रावत ने संयुक्त रूप से इन चित्रों का अनावरण किया। यह पहल प्रेस क्लब की कार्यकारिणी द्वारा पत्रकारिता के इतिहास को संरक्षित करने और पूर्वजों के योगदान को याद रखने के उद्देश्य से की गई है।


समारोह में एक और महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने अनुकरणीय योगदान के लिए प्रसिद्ध स्वर्गीय वरिष्ठ पत्रकार डॉ. कमलकांत बुधकर की स्मृति में प्रेस क्लब सभागार का नामकरण “बुधकर भवन” के रूप में किया जाएगा। डॉ. बुधकर हरिद्वार प्रेस क्लब के संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
उन्होंने पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य, कविता एवं शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वे गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय में हिन्दी पत्रकारिता के प्राध्यापक रह चुके थे और कुम्भ मेले जैसे बड़े आयोजनों में सक्रिय पत्रकार के रूप में जाने जाते थे।

प्रेस क्लब के वर्तमान अध्यक्ष धर्मेंद्र चौधरी एवं महामंत्री दीपक मिश्रा ने कहा, “स्वर्गीय डॉ. कमलकांत बुधकर के आदर्शों और योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनकी स्मृति में सभागार का नाम ‘बुधकर भवन’ रखना हमारे लिए गौरव की बात है। हम सभी पत्रकार उनके दिखाए मार्ग पर चलकर पत्रकारिता के मिशन को ईमानदारी से निभाएंगे।”

उन्होंने यह भी जानकारी दी कि प्रेस क्लब में होली मिलन कार्यक्रम भी उत्साह के साथ मनाया जाएगा, जिसमें सदस्यों और अतिथियों की भागीदारी रहेगी।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. शिवशंकर जायसवाल एवं आदेश त्यागी ने पूर्व अध्यक्षों के चित्र स्थापित करने और सभागार के नामकरण के निर्णय का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि प्रेस क्लब हमेशा से पत्रकारों के हितों के लिए निर्णायक भूमिका निभाता रहा है और यह कदम इतिहास को जीवंत रखने की दिशा में सराहनीय है।
कार्यक्रम में कोषाध्यक्ष काशीराम सैनी, कौशल सिखौला, गोपाल रावत, रमेश खन्ना, रजनीकांत शुक्ला, सुभाष कपिल, बालकृष्ण शास्त्री, अविक्षित रमन, प्रदीप गर्ग, आदेश त्यागी, दीपक नौटियाल, संजय आर्य, अमित शर्मा, अमित गुप्ता सहित अन्य गणमान्य पत्रकार और सदस्य उपस्थित रहे।
यह समारोह हरिद्वार की पत्रकारिता जगत में सम्मान और स्मृति को जीवित रखने की एक खूबसूरत मिसाल पेश करता है।
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पत्रकारिता और साहित्य की दुनिया से परिचय कराने और इन विधाओं का संस्कार देने वाले एकमेव मार्गदर्शक व गुरु मेरे पूज्य मामा की स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए हरिद्वार के पत्रकार बन्धुओं व साहित्य समाज के सभी महानुभावों के प्रति सादर विनत हूँ।

सम्मेलन का उद्देश्य साम्राज्यवाद स्थापित करना नहीं, बल्कि समावेशिता को बढ़ावा देना है – डॉ. सच्चिदानंद जोशी

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नई दिल्ली : संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के बृहत्तर भारत एवं क्षेत्र अध्ययन विभाग द्वारा आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “भारत और मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक अंतःप्रवाह” का समापन गरिमामय समारोह के साथ सम्पन्न हुआ। 18–19 फरवरी को आयोजित इस सम्मेलन में भारत और मंगोलिया के विद्वानों, शोधकर्ताओं, सांस्कृतिक विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं ने भाग लेकर दोनों देशों के बहुआयामी सांस्कृतिक संबंधों पर व्यापक विचार-विमर्श किया।

समापन सत्र की अध्यक्षता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की। उन्होंने सम्मेलन में सहभागिता के लिए सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि हम इस संवाद की शुरुआत करना चाहते थे, ताकि भारत और उन देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर चर्चा हो सके, जो ‘बृहत्तर भारत’ की परिधि में आते हैं। इसका उद्देश्य किसी प्रकार का साम्राज्यवाद स्थापित करना नहीं है, बल्कि समावेशिता को बढ़ावा देना है। हम केवल यह जानना चाहते हैं कि भारत की सांस्कृतिक छाप किन-किन देशों में दिखाई देती है और विभिन्न देशों के बीच कौन-कौन से साझा तत्व हैं, जो किसी न किसी रूप में भारत से जुड़े हुए हैं। ऐसा महत्वपूर्ण प्रकल्प तभी सशक्त रूप से आगे बढ़ सकता है, जब इस प्रकार का सम्मेलन आयोजित हो।

जैसा कि इस सम्मेलन में हम सबने बात की, कि मंगोलिया में भारत की गहरी उपस्थिति दिखाई देती है। हम यह भी जानना चाहते थे कि भारत में मंगोलिया कितनी मात्रा में विद्यमान है। दुर्भाग्यवश, हमारी शिक्षा-प्रणाली और अकादमिक आवश्यकताओं के दबाव के कारण हम अपने पड़ोसी देशों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाए, जबकि उनके साथ हमारे सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। हमारा प्रमुख ध्यान हमेशा पश्चिम और यूरोप-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर रहा है। यूरोप और अमेरिका को समझने में हम अधिक रुचि लेते रहे, जबकि अपने पड़ोसी देशों के साथ साझा सांस्कृतिक तत्वों को समझने की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही।

‘बृहत्तर भारत’ की मूल भावना यही है कि हम अपने पड़ोसी देशों में उन जड़ों को तलाशें, जिनमें संस्कृति, समाजशास्त्र, दर्शन, मनोविज्ञान और यहां तक कि राजनीति के स्तर पर भी समानताएं मौजूद हैं। इस दृष्टि से यह सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब इस सम्मेलन की अंतिम प्रकाशन सामग्री सामने आएगी, तो वह निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक दस्तावेज़ सिद्ध होगी। यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भारत-मंगोलिया सम्बंधों के अध्ययन का मार्ग प्रशस्त करेगी।

हम एक ठोस कार्य-योजना भी तैयार करना चाहते हैं, जिससे यह तय हो सके कि इन अध्ययनों को आगे कैसे बढ़ाया जाए, हमारे विभिन्न विश्वविद्यालयों, संस्थानों और महाविद्यालयों में किस प्रकार के शोध किए जाएं, किस प्रकार की कार्यशालाएं और प्रदर्शनी आयोजित की जाएं, और शिलालेखों, पाण्डुलिपियों तथा अन्य दस्तावेज़ों के अध्ययन को किस प्रकार प्रोत्साहित किया जाए। इन सभी पहलुओं को इस सम्मेलन की सिफारिशों के आधार पर आगे बढ़ाया जा सकता है। मैं उम्मीद करता हूं कि इस सम्मेलन के दौरान जो सम्बंध और आपसी जुड़ाव स्थापित हुए हैं, वे आने वाले वर्षों में और अधिक सुदृढ़ होंगे।

आईजीएनसीए की ट्रस्टी और सम्मेलन की संयोजक प्रो. निर्मला शर्मा ने सम्मेलन के समापन उद्बोधन में दो दिवसीय सत्रों के निष्कर्षों को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत और मंगोलिया के बीच सांस्कृतिक सम्बंधों का आधार आध्यात्मिक निकटता और ऐतिहासिक संवाद रहा है। उन्होंने पाण्डुलिपि संरक्षण, बौद्ध अध्ययन, सांस्कृतिक अनुसंधान और शैक्षिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में संयुक्त परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर बल दिया।

सम्मेलन के दौरान विभिन्न सत्रों में भारत–मंगोलिया के ऐतिहासिक सांस्कृतिक एवं सभ्यतागत सम्बंध, बौद्ध धर्म और आध्यात्मिक परम्पराओं का साझा विरासत, पांडुलिपि एवं ग्रंथ परम्परा का संरक्षण, कला एवं प्रदर्शनकारी परम्पराएं, लोक-संस्कृति, शिक्षा और अकादमिक आदान-प्रदान, सांस्कृतिक कूटनीति तथा समकालीन सहयोग की संभावनाओं जैसे विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। विद्वानों ने इस बात पर विशेष बल दिया कि दोनों देशों की साझा सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को संरक्षित करते हुए युवा पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है।

समापन सत्र में मंगोलिया और अन्य देशों से आए कई प्रतिनिधियों तथा भारत की प्रो. सुनीता द्विवेदी ने भी अपना अनुभव बयां किया। इस अवसर पर, भारत में मंगोलिया के पूर्व राजदूत और भारतीय अध्ययन केंद्र (सीआईएस) के निदेशक प्रो. ओ. न्यामदाव्वा ने भी भारत-मंगोलिया के सम्बंधों पर बात की। कार्यक्रम के अंत में, आईजीएनसीए के बृहत्तर भारत एवं क्षेत्र अध्ययन विभाग के प्रमुख प्रो. धर्म चंद चौबे ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी विशिष्ट अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह सम्मेलन भारत–मंगोलिया सम्बंधों को और अधिक सुदृढ़ बनाने तथा भविष्य में संयुक्त शोध एवं सांस्कृतिक परियोजनाओं के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा।

ग़ौरतलब है कि इस सम्मेलन का उद्घाटन 18 फरवरी को केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने किया था। उन्होंने इस सम्मेलन को केवल अकादमिक अभ्यास भर नहीं, बल्कि साझा आध्यात्मिक और कलात्मक परम्पराओं तथा निरंतर सांस्कृतिक प्रवाह से प्रेरित बताया। उन्होंने भारत और मंगोलिया के बीच ऐतिहासिक आदान–प्रदान के बारे में बताते हुए कहा कि है कि दोनों सभ्यताओं के बीच आध्यात्मिक आदान–प्रदान के साथ–साथ वैज्ञानिक ज्ञान भी प्रवाहित हुआ। मंगोलियाई कंजूर को उन्होंने दोनों देशों के लोगों के बीच एक पवित्र सेतु बताया।

इस प्रकार, यह दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भारत–मंगोलिया के प्राचीन सांस्कृतिक संबंधों को नई ऊर्जा प्रदान कर गया।

क्या नक्सलवाद की बारूद भरी राह पुलिस की गोलियों से थमी, या विकास की रोशनी से?

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दिल्ली । सच शायद इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है।
सख्त सुरक्षा अभियान चले। खुफिया तंत्र मजबूत हुआ। राज्यों के बीच बेहतर तालमेल बना। जंगलों में सिर्फ बंदूक नहीं, रणनीति भी उतरी।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
राजनैतिक संकल्प ने दिशा दी। “विकास” कागज़ से निकलकर ज़मीन पर उतरा। सड़कें पहुँचीं। मोबाइल टॉवर खड़े हुए। राशन, पेंशन, उजाला और रोज़गार की योजनाएँ उन इलाकों तक पहुँचीं, जिन्हें बरसों से “लाल गलियारा” कहा जाता था।
नतीजा?
नक्सलवाद का नशा उतरने लगा।
पिछले कुछ वर्षों में हजारों बंदूकधारियों ने हथियार डाल दिए। कई बड़े, इनामी लीडर मारे गए। संगठन की कमर टूटी। वैचारिक जज़्बा हकीकत की ज़मीन पर बिखरने लगा।
यह सिर्फ पुलिस की जीत नहीं थी।
यह सिर्फ विकास की कहानी भी नहीं।
यह उस संयुक्त रणनीति का असर था, जिसमें सुरक्षा, संवाद और कल्याणकारी योजनाएँ एक साथ आगे बढ़ीं। बंदूक की धमक के साथ-साथ भरोसे की दस्तक भी सुनाई दी।
और जब उम्मीद लौटती है, तो बंदूक अक्सर झुक जाता है।
जो जंगल कभी गोलियों की गूंज से कांपते थे। आज वहीं सड़कों पर बसें चल रही हैं। जहाँ बारूदी सुरंगें बिछती थीं, वहाँ अब मोबाइल टावर खड़े हैं।समय बदल गया है। और उसके साथ बदल गई है हिंसा की सियासत।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नारा “सबका साथ, सबका विकास” महज़ जुमला नहीं रहा। यह हुकूमत की नई ज़बान बना। योजनाएँ काग़ज़ से निकलकर आख़िरी गांव तक पहुँचीं। बैंक खाते खुले। दलालों की चेन टूटी। सड़कें जंगलों तक आईं। और यहीं से माओवादी असर की ज़मीन दरकने लगी।
नक्सलवाद की कहानी 1967 के नक्सलबाड़ी से शुरू हुई। ज़मीन विवाद भड़का। किसानों ने बगावत की। बंदूक को इंसाफ़ का रास्ता बताया गया। नेताओं ने इसे वर्ग संघर्ष कहा। आदिवासियों को क्रांति का चेहरा बनाया गया।
चारु मजूमदार और कानू सान्याल जैसे नाम प्रतीक बने। पर बंदूक की राह लंबी थी। और खून से सनी हुई।
1972 में मजूमदार की मौत के बाद आंदोलन बिखरा। कई गुट बने। अंततः 2004 में अलग-अलग धड़े मिलकर Communist Party of India (Maoist) बने। तब तक तथाकथित “रेड कॉरिडोर” फैल चुका था। बिहार। झारखंड। छत्तीसगढ़। ओडिशा। आंध्र प्रदेश। महाराष्ट्र। तेलंगाना। एक लंबी लाल पट्टी।
2010 इसका चरम था। करीब दो हज़ार हिंसक घटनाएँ। एक हज़ार से ज़्यादा मौतें। स्कूल उड़ाए गए। पुलिस पर घात लगाकर हमले हुए। जंगल खामोश नहीं, खौफ़ज़दा थे। कारण भी थे।
आदिवासियों की ज़मीन छीनी गई।खनन से विस्थापन हुआ। वन अफसरों की मनमानी चली। सरकारी लापरवाही ने नाराज़गी को हवा दी।
माओवादियों ने समानांतर “जन अदालतें” चलाईं। मुखबिर बताकर लोगों को मौत दी गई। ठेकेदारों से लेवी वसूली गई। युवा आकर्षित हुए। बंदूक ग्लैमर बनी। पर धीरे-धीरे क्रांति की चमक उतर गई। विचारधारा पर माफ़ियागीरी हावी हो गई। लेवी का पैसा नेतृत्व की ऐशो-आराम में बहने लगा। अंदरूनी सफ़ाये हुए। शक में अपने ही मारे गए। इधर देश बदल रहा था। समाजवाद से बाज़ार आधारित कल्याण की ओर। राज्य ने रणनीति बदली।
2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ। केंद्र में नई सरकार आई। गृह मंत्री Amit Shah ने साफ़ संदेश दिया , “सख़्ती भी, सरोकार भी।”
एक तरफ़ सुरक्षा अभियान तेज़ हुए।
दूसरी तरफ़ विकास की बारिश शुरू हुई। 2014 में 126 ज़िले प्रभावित थे।2025 तक घटकर 11 रह गए।
सबसे गंभीर 36 से घटकर सिर्फ़ 3।2010 में 1,936 घटनाएँ। 2025 में घटकर 141। मौतें 1,005 से गिरकर 87। 2025 में 390 माओवादी मारे गए। 860 ने आत्मसमर्पण किया।करीब 2,000 ने संगठन छोड़ा। फरवरी 2026 तक तस्वीर और साफ़।
सिर्फ़ 8 घटनाएँ। 2 नागरिक मौतें। 37 उग्रवादी ढेर। दंतेवाड़ा में 63 कैडर एक साथ आत्मसमर्पण।
अब “रेड कॉरिडोर” सिमटकर छत्तीसगढ़ के बस्तर और ओडिशा के कुछ हिस्सों तक रह गया है। पर असली कहानी आँकड़ों से आगे है।
12,000 किलोमीटर से अधिक सड़कें जंगलों में पहुँचीं। 8,500 मोबाइल टावर लगे। 300 से ज़्यादा सुरक्षात्मक बंकर बने। बैंक और डाकघर खुले।मनरेगा ने साल में 100 दिन का रोज़गार दिया। प्रधानमंत्री आवास योजना ने करोड़ों घर बनाए, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी परिवारों की।आयुष्मान भारत ने 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा से जोड़ा। एकलव्य स्कूलों ने आदिवासी बच्चों को नई राह दी। युवाओं के लिए आईटीआई और स्किल सेंटर खुले। रोज़गार की उम्मीद बढ़ी। अब सवाल बदला है।
युवा स्टेनगन नहीं, स्मार्टफोन चाहता है। वह खाड़ी देशों में नौकरी कर रहा है। वह वोट डाल रहा है। माओवादियों ने चुनाव का बहिष्कार किया। लोकतंत्र को “बुर्जुआ ढोंग” कहा। पर आदिवासी भारी संख्या में मतदान केंद्र पहुँचे। 2023 में छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन हुआ। जिन इलाकों को कभी गढ़ कहा जाता था, वहाँ भी नई राजनीति आई। हिंसा ने अपना ही नुकसान किया। टीकाकरण का बहिष्कार हुआ। बच्चे मरे। पुल उड़ाए गए। गांव कट गए। एक आत्मसमर्पण कर चुके कैडर ने कहा, “हम ज़मीन के लिए लड़े थे। उन्होंने हमें घर, शौचालय और नल दे दिए।
नक्सलवाद सैन्य रूप से असफल रहा। राजनीतिक रूप से शून्य। नैतिक रूप से भी सवालों में।
2000 के बाद 10,000 से अधिक नागरिक मारे गए। हिंसा ने सिर्फ़ ज़ख्म दिए। विकास ने विकल्प दिया।
1960 के दशक की उपेक्षा ने इसे जन्म दिया था। 21वीं सदी का कल्याणकारी मॉडल इसे दफना रहा है। लक्ष्य है , 31 मार्च 2026 तक नक्सल मुक्त भारत। लाल साया अब धुंधला है। बंदूक की गूंज फीकी है। रोटी और रोज़गार की मांग उठ रही है।
और शायद यही असली बदलाव है।

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