बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया और गांधी से डरता समाज

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निलेश देसाई

झाबुआ (मप्र) : आज की दुनिया एक अजीब और डरावनी विडंबना से गुजर रही है। एक तरफ हमारे पास कृत्रिम मेधा (AI) और अंतरिक्ष फतह करने वाली तकनीक है, तो दूसरी तरफ हमारे विचार पाषाण युग की हिंसक प्रवृत्तियों की ओर लौट रहे हैं। रूस की सीमाओं से लेकर मध्य-पूर्व के मलबों तक, और दक्षिण चीन सागर की लहरों से लेकर हमारे अपने भीतर पनपती नफरत तक—पूरी मानवता आज बारूद के ढेर पर बैठी है। ऐसे समय में जब मिसाइलों की गर्जना और ड्रोनों की भिनभिनाहट को ‘राष्ट्रीय गौरव’ का संगीत मान लिया गया हो, महात्मा गांधी की याद आना कई लोगों को एक पुरानी पड़ चुकी रस्म लग सकता है।

लेकिन हकीकत इससे कहीं अधिक गहरी और कड़वी है। गांधी आज अप्रासंगिक नहीं हुए हैं, बल्कि वे आज के समाज और सत्ता के लिए पहले से कहीं अधिक ‘असुविधाजनक’ और ‘असहज’ हो गए हैं। सच तो यह है कि आज का वैश्विक समाज गांधी से डरता है, क्योंकि गांधी केवल शांति की बात नहीं करते, वे उस ‘नैतिक साहस’ की मांग करते हैं जो आज की दुनिया में लगभग विलुप्त हो चुका है।

युद्ध का उत्सव और शांति का डर
आज युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जा रहे; वे हमारे ड्राइंग रूम और मोबाइल स्क्रीन तक पहुँच चुके हैं। टेलीविज़न स्क्रीन युद्ध को एक ‘लाइव तमाशा’ बना रही हैं और सोशल मीडिया हिंसा को एक सामान्य, यहाँ तक कि गौरवशाली घटना की तरह परोस रहा है। युद्ध की इस मानसिकता में सबसे पहली बलि ‘संवाद’ की चढ़ती है। गांधी का डर यहीं से शुरू होता है।

गांधी हमें एक ऐसी जगह ले जाकर खड़ा कर देते हैं जहाँ ‘दुश्मन’ की कोई सरल और इकहरी परिभाषा नहीं है। आज की राजनीति और सार्वजनिक विमर्श को ‘स्पष्ट दुश्मन’ चाहिए ताकि वे अपनी हिंसा को जायज ठहरा सकें। लेकिन गांधी याद दिलाते हैं कि अन्याय कहीं भी हो, आत्मचिंतन की जिम्मेदारी दोनों पक्षों की है। वे याद दिलाते हैं कि “आंख के बदले आंख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी।” आज की सत्ताएँ और युद्धोन्मादी समाज इस वाक्य से इसलिए डरते हैं क्योंकि यह उनके प्रतिशोध (Revenge) के तर्क को कमजोर कर देता है।

बाइनरी का जाल और गांधी की जटिलता
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जो ‘बाइनरी’ (या तो आप हमारे साथ हैं या दुश्मन के साथ) पर टिका है। सोशल मीडिया ने हमारी सुनने की क्षमता घटा दी है और चीखने की ताकत बढ़ा दी है। इस शोर के बीच गांधी की आवाज़ धीमी, संयमित और सबसे बढ़कर ‘प्रश्नवाचक’ है।

आज जब युद्धों को ‘न्यायपूर्ण’ और ‘अपरिहार्य’ बताकर प्रचारित किया जाता है, तब गांधी का यह प्रश्न कि “क्या आपका साधन आपके साध्य को ही नष्ट तो नहीं कर रहा?” सत्ता और समाज दोनों को असहज कर देता है। गांधी सत्ता के लिए असहज थे और आज भी हैं, क्योंकि वे केवल विरोध में नहीं, बल्कि समर्थन में भी नैतिक सवाल खड़े करते थे। वे अपने अनुयायियों से भी पूछते थे कि क्या उनका क्रोध उचित है? क्या उनकी शांति केवल कायरता का आवरण तो नहीं? आज की ‘कैंसिल कल्चर’ वाली दुनिया में, जहाँ असहमति का उत्तर केवल नफरत और बहिष्कार है, गांधी का संवाद का आग्रह एक ‘बौद्धिक खतरे’ की तरह देखा जाता है।

अहिंसा: कायरता नहीं, सर्वोच्च साहस
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि आज के तानाशाह और विस्तारवादी ताकतें गांधी की भाषा नहीं समझतीं। यह दलील देकर हम गांधी को एक तरफ हटा देते हैं ताकि हम अपनी हिंसा को ‘व्यावहारिकता’ (Practicality) का नाम दे सकें। लेकिन क्या वास्तव में युद्ध व्यावहारिक हैं? इतिहास गवाह है कि अधिकांश युद्धों ने तात्कालिक विजय तो दी, लेकिन स्थायी शांति कभी नहीं। उन्होंने केवल अगले युद्ध के बीज बोए।

गांधी की अहिंसा कायरों का अस्त्र नहीं थी। वह दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य के सामने निहत्थे खड़े होने का साहस थी। आज समाज इसलिए डरता है क्योंकि अहिंसा में जवाबदेही अपने ऊपर लेनी पड़ती है। हिंसा में दोष हथियारों, हालातों और इतिहास पर मढ़ा जा सकता है, लेकिन अहिंसा में दोष अपने भीतर खोजना पड़ता है। यह एक ‘नैतिक ऑडिट’ है, जिससे गुजरने की हिम्मत आज के ‘पोस्ट-ट्रुथ’ युग में कम ही दिखती है। हम गांधी को नोटों पर छाप सकते हैं, उनकी मूर्तियों पर माला चढ़ा सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने जीवन में उतारने का मतलब होगा—अपनी सुख-सुविधाओं और अहंकार का त्याग करना। और यही वह बिंदु है जहाँ समाज गांधी से किनारा कर लेता है।

युवाओं की दूरी और औपचारिक गांधी
युवाओं में गांधी के प्रति बढ़ती दूरी को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। आज का युवा त्वरित परिणाम और ‘इंस्टेंट’ जीत का आकांक्षी है। गांधी धैर्य, आत्मसंयम और दीर्घकालिक नैतिक संघर्ष की बात करते हैं। हमने गांधी को शिक्षा और राजनीति के माध्यम से एक ‘नीरस पाठ’ बना दिया है। हमने उन्हें केवल स्वच्छता और चरखे तक सीमित कर दिया, जबकि वे सत्ता की निरंकुशता और समाज की जड़ता के खिलाफ सबसे बड़े बागी थे।

आज जब दुनिया भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संकट में है, तब गांधी की वह ‘सत्याग्रही’ छवि डराती है जो कहती थी कि “अन्यायी कानून को न मानना हमारा कर्तव्य है।” व्यवस्था को गांधी के ‘भजन’ पसंद हैं, उनका ‘सत्याग्रह’ नहीं। समाज को गांधी की ‘पूजा’ पसंद है, उनका ‘प्रश्न’ नहीं।

आज की वैश्विक विभीषिका के दौर में गांधी कोई ‘क्विक फिक्स’ या तुरंत मिलने वाला समाधान नहीं हैं। वे एक दिशा हैं, एक नैतिक कंपास हैं। जब चारों ओर युद्ध का शोर हो, तब एक शांत आवाज़ ही हमें भटकाव से बचा सकती है। गांधी इसलिए प्रासंगिक नहीं हैं कि वे सब कुछ ठीक कर देंगे, बल्कि इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि वे हमें आईना दिखाते हैं।

वे याद दिलाते हैं कि हर युद्ध अंततः एक मानवीय विफलता है। वे याद दिलाते हैं कि जब तक हम दूसरे को ‘मनुष्य’ मानना बंद नहीं करेंगे, तब तक शांति केवल दो युद्धों के बीच का अंतराल बनी रहेगी।

सच तो यह है कि हम गांधी से इसलिए दूर नहीं हो रहे कि वे हमें कुछ देना बंद कर चुके हैं, बल्कि इसलिए कि वे हमसे बहुत कुछ मांगते हैं—कठोर ईमानदारी, गहरी करुणा और खुद की गलतियों को स्वीकार करने का साहस। ये तीनों गुण आज की दुनिया में सबसे बड़ी कमी बन गए हैं। अब समय आ गया है कि हम गांधी को याद करने की औपचारिकता छोड़कर उनसे संवाद शुरू करें। सवाल यह नहीं है कि “क्या गांधी आज प्रासंगिक हैं?”, सवाल यह है कि “क्या हम आज इतने साहसी बचे हैं कि गांधी के उस असहज करने वाले सच को सुन सकें?”

(श्री देसाई एक प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता हैं और झाबुआ (मप्र) में ‘सम्पर्क’ संस्था के माध्यम से दशकों से गांधीवादी मूल्यों पर आधारित ग्रामीण विकास और प्राकृतिक खेती के कार्यों में संलग्न हैं। उन्हें 2022 में रचनात्मक कार्यों के लिए ‘जमनालाल बजाज पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया है)

औपनिवेशिक नीतियों का जाल: कैसे ब्रिटिश शासन ने भारत को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से विभाजित किया

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भोपाल । भारतीय इतिहास का औपनिवेशिक काल सिर्फ राजनीतिक दासता का अध्याय नहीं है, यह तो उस सुनियोजित योजना का भी प्रतीक है जिसके माध्यम से ब्रिटिश साम्राज्य ने भारत की सामाजिक एकता, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक निरंतरता को व्यवस्थित रूप से कमजोर करने का प्रयास किया। हम सभी जानते हैं कि यह प्रक्रिया अचानक नहीं हुई, अनेक प्रशासनिक निर्णयों, आर्थिक नीतियों, सामाजिक प्रयोगों और वैचारिक सिद्धांतों के माध्यम से धीरे-धीरे विकसित की गई। स्थायी बंदोबस्त से लेकर जाति-आधारित जनगणना और तथाकथित आर्य सिद्धांत तक, हर कदम एक बड़े औपनिवेशिक लक्ष्य का हिस्सा था, भारत को भीतर से विभाजित कर उस पर दीर्घकालिक नियंत्रण बनाए रखना।

यदि हम औपनिवेशिक नीतियों की शुरुआत पर दृष्टि डालें, तो ईस्ट इंडिया कंपनी के शासनकाल में लागू किया गया स्थायी बंदोबस्त एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इस व्यवस्था ने भारतीय कृषि संरचना को जड़ से बदल दिया। जमींदारों को भूमि का स्वामित्व देकर किसानों को उनके पारंपरिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया। आर. सी. मजूमदार ने अपनी पुस्तक भारत का इतिहास (भारतीय विद्या भवन, पृष्ठ 321) में स्पष्ट किया है कि इस व्यवस्था ने ग्रामीण समाज में असमानता को स्थायी रूप दे दिया। परिणामस्वरूप किसान ऋणग्रस्तता, शोषण और निर्धनता के दुष्चक्र में फंस गए। यह केवल एक आर्थिक नीति नहीं थी, बल्कि ग्रामीण भारत को कमजोर करने की एक दीर्घकालिक रणनीति थी।

इसी प्रकार ब्रिटिश शासन ने भारतीय उद्योगों को भी योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया। भारत, जो कभी विश्व का प्रमुख वस्त्र-निर्माता था, उसे कच्चे माल का आपूर्तिकर्ता बना दिया गया। आर. सी. दत्त ने भारत का आर्थिक इतिहास (लोकभारती प्रकाशन, पृष्ठ 145) में लिखा है कि ब्रिटिश नीतियों ने भारतीय कुटीर उद्योगों को समाप्त कर दिया। ब्रिटेन में निर्मित वस्त्रों को भारत में खुले रूप से बेचा गया, जबकि भारतीय उत्पादों पर भारी कर लगाए गए। इससे न केवल आर्थिक ढांचा कमजोर हुआ, बल्कि लाखों कारीगर बेरोजगार हो गए।

औपनिवेशिक दमन का एक और कठोर रूप 1857 का स्वतंत्रता संग्राम के बाद देखने को मिला। इस महान विद्रोह ने ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी थी, जिसके परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने भारतीयों के प्रति अविश्वास और दमन की नीति अपनाई। वी. डी. सावरकर ने 1857 का स्वातंत्र्य समर (प्रभात प्रकाशन, पृष्ठ 402) में उल्लेख किया है कि विद्रोह के बाद भारतीयों को प्रशासन और सेना में सीमित कर दिया गया तथा नस्लीय भेदभाव को बढ़ावा दिया गया। यह स्पष्ट संकेत था कि ब्रिटिश शासन अब केवल नियंत्रण बनाए रखने के लिए कठोर उपायों पर निर्भर था।

बीसवीं सदी के प्रारंभ में बंगाल विभाजन ने “फूट डालो और राज करो” की नीति को खुलकर सामने ला दिया। लॉर्ड कर्जन द्वारा किया गया यह विभाजन प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक उद्देश्य से प्रेरित था। बिपिन चंद्र पाल ने राष्ट्रवाद के विचार (सरस्वती प्रकाशन, पृष्ठ 210) में इसे राष्ट्रीय एकता को तोड़ने का प्रयास बताया है। इस घटना ने भारतीय समाज में सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा दिया और इसके विरोध में स्वदेशी आंदोलन का उदय हुआ।

इसी क्रम में रोलेट एक्ट और जलियांवाला बाग हत्याकांड जैसे घटनाक्रम ब्रिटिश शासन की दमनकारी प्रवृत्ति को उजागर करते हैं। महात्मा गांधी ने सत्य के प्रयोग (नवजीवन प्रकाशन, पृष्ठ 278) में रोलेट एक्ट को न्याय के विरुद्ध बताया, जबकि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जलियांवाला बाग की घटना को मानवता पर कलंक कहा। इन घटनाओं ने भारतीय जनमानस को झकझोर दिया और स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक समर्थन मिला, परंतु ब्रिटिश रणनीति केवल दमन तक सीमित नहीं थी; उन्होंने भारतीय समाज की आंतरिक संरचना को भी प्रभावित करने का प्रयास किया।

भारत की जनगणना 1871 से प्रारंभ होकर 1901 की जनगणना तक जाति-आधारित वर्गीकरण को संस्थागत रूप दिया गया। हर्बर्ट रिस्ले ने दि पीपल ऑफ इंडिया (केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, पृष्ठ 51) में जाति को वैज्ञानिक रूप से वर्गीकृत करने की बात कही। इस प्रक्रिया ने भारतीय समाज की लचीली संरचना को कठोर बना दिया और जातीय पहचान को स्थायी रूप दे दिया। अंग्रेजों का उद्देश्‍य था कि जाति भाव भड़का कर भारतीय हिन्‍दुओं में आपसी वैमन्‍यता पैदा की जा सके और देखो! वे सफल भी हो गए।

जी. एस. घुर्ये ने कास्ट एंड रेस इन इंडिया (पॉपुलर प्रकाशन, पृष्ठ 23) में लिखा है कि ब्रिटिश जनगणना ने समाज की जटिलता को स्थिर रूप में बदल दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि विभिन्न समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा और विभाजन की भावना बढ़ी, जिसे ब्रिटिश शासन ने अपने हित में उपयोग किया। इसका दुष्‍परिणाम आज भी हम झेल रहे हैं।

इसी प्रकार तथाकथित आर्य सिद्धांत का प्रयोग भी सामाजिक विभाजन को गहरा करने के लिए किया गया। मैक्स मूलर ने लेक्चर्स ऑन द साइंस ऑफ लैंग्वेज (लॉन्गमैन प्रकाशन, पृष्ठ 120) में स्पष्ट किया कि “आर्य” कोई नस्ल नहीं, बल्कि भाषा-समूह है। इसके बावजूद औपनिवेशिक व्याख्याओं में इसे नस्लीय रूप देकर भारतीय समाज को आर्य और अनार्य, उत्तर और दक्षिण जैसे विभाजनों में बांटने का प्रयास किया गया। स्‍वयं मैक्स मूलर भी इसमें अप्रत्‍यक्ष रूप से सहयोगी रहे, जिसके अनेक प्रमाण मौजूद हैं। जिसमें कि आगे वामपंथी इतिहासकारों ने जो किया, सो आज सभी के सामने आ ही चुका है।

बी. बी. लाल ने द सरस्वती फ्लोज ऑन (आर्यन बुक्स इंटरनेशनल, पृष्ठ 87) में उल्लेख किया है कि इस सिद्धांत का उपयोग यह दिखाने के लिए किया गया कि भारत सदैव बाहरी आक्रमणों से प्रभावित रहा है। इससे भारतीयों के बीच ऐतिहासिक अविश्वास की भावना को बढ़ावा मिला। अंततः, भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश शासन का दमन यह स्पष्ट कर देता है कि यह शासन किसी भी प्रकार से भारतीय हितों के अनुकूल नहीं था। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने आत्मकथा (भारतीय ज्ञानपीठ, पृष्ठ 456) में लिखा है कि इस समय व्यापक गिरफ्तारियाँ कर जनता की आवाज को दबाने का प्रयास किया गया।

समग्र रूप से देखा जाए तो ब्रिटिश शासन की नीतियाँ एक सुविचारित औपनिवेशिक ढांचे का हिस्सा थीं, जिनका उद्देश्य भारत को आर्थिक रूप से निर्भर, सामाजिक रूप से विभाजित और राजनीतिक रूप से कमजोर बनाए रखना था। भूमि व्यवस्था, औद्योगिक विनाश, दमनकारी कानून, जातीय वर्गीकरण और वैचारिक सिद्धांत, ये सभी उसी रणनीति के विभिन्न आयाम थे।

इस ऐतिहासिक विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भारत की स्वतंत्रता सिर्फ राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं थी, यह सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना की भी विजय थी। औपनिवेशिक नीतियों ने जहाँ एक ओर भारत को गहरे संकट में डाला, वहीं दूसरी ओर उन्होंने भारतीय समाज को अपनी पहचान और एकता के महत्व को समझने का अवसर भी दिया। यही कारण है कि आज भी इन घटनाओं का अध्ययन इतिहास को समझने के साथ ही वर्तमान और भविष्य की दिशा तय करने के लिए भी अत्यंत आवश्यक माना जाता है।

घटनाएं अनेक हैं, जिसमें कि सबसे बड़ा भारत का विभाजन है। कोई योजना नहीं रही भारत विभाजन की, हिन्‍दुओं को डारेक्‍ट एक्‍शन के दौरान मरने के लिए छोड़ दिया गया, रियासतों को स्‍वतंत्र रख एक नया संकट खड़ा किया गया, लाहौर जैसे हिन्‍दू बहुल्‍य अनेक क्षेत्र पाकिस्‍तान को सौंप दिए गए। कहां तक गिनाएं अंग्रेजों के अपराध जो उन्‍होंने भारतीयों के विरोध में किए हैं।

Kartikeya Vajpai Reflects on Presence and Selfhood at Kunzum Books

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Delhi : A thought provoking literary evening unfolded at Kunzum Books, where author Kartikeya Vajpai engaged in a deeply reflective conversation with celebrated author & Convener, Delhi/NCR, Prabha Khaitan Foundation Neelima Dalmia Adhar and Journalist, Critic & Historian Murtaza Ali Khan.

The session explored themes of awareness, presence and the relationship between thought and observation. Speaking to an intimate audience, Kartikeya reflected on how thought often links the present to the past through identification, taking us away from the living moment. He shared that observation and thought cannot coexist simultaneously. Observation keeps us rooted in the now, while thinking often removes us from it.

“To stay with the living present, we must simply observe it—without attaching to thoughts. Thinking and observing cannot happen at the same time: thought has no observation, and true observation has no thought. Observation keeps you with the moment; thinking takes you out of it,” said, Kartikeya Vajpai.

The session reflected Kartikeya’s quiet depth and contemplative writing style, particularly through his debut novel, The Unbecoming, which examines the space between performance and presence, between the self we construct and the self that slowly softens.

The conversation echoed the central philosophy of The Unbecoming, which Kartikeya has framed as a return to an authentic state of being, transcending the pursuit of success/ goal driven living, accomplishment and the contrast desire of approval/validation. The book questions conventional ideas of success and instead invites readers to reconnect with stillness, awareness and the self that already feels complete.

Talking about the book and Vajpai, Neelima Dalmia Adhar said, “His book The Unbecoming enters that space between performance and presence, between effort and erosion, between the self we construct and the self that quietly begins to soften. His voice shaped by narrative and the disciplined stillness he beautifully elucidates the question “what are we when we stop trying to deserve ourselves?”

Held in the warm and intimate setting of Kunzum Books, the session left audiences engaged in a larger reflection on identity, selfhood and what remains when we stop trying to become someone else. Among the distinguished guests present were Ajay Jain, author and founder of Kunzum Books; Manisha Chaudhry, publisher and Co-director of Jaipur BookMark; and Małgorzata Wejsis-Gołębiak, Minister Plenipotentiary and Director of the Polish Institute New Delhi, alongside several other well-known members of the community.

भारतीय प्राचीन सभ्यता और जैन धर्म

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दिल्ली। श्री महावीर का जन्म 599 ईसा पूर्व चैत्र शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन, वर्तमान पटना शहर के नजदीक वैशाली (बिहार) में राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिसाला के यहाँ हुआ था। उनके माता-पिता ने उनका नाम वर्धमान रखा।

वह जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर हैं। उनसे पहले 23 तीर्थंकर और हुए उनके नाम इस प्रकार हैं : श्री ऋषभदेव स्वामी, श्री अजीतनाथ स्वामी, श्री संभवननाथ स्वामी, श्री अभिनंदन स्वामी, श्री सुमतिनाथ स्वामी, श्री पद्मप्रभ स्वामी, श्री सुप्रश्वंरथ स्वामी, श्री चंद्रप्रभ स्वामी, श्री सुविदेव स्वामी, श्री शीतलनाथ स्वामी, श्री श्रेयांसनाथ स्वामी, श्री वासुपूज्य स्वामी, श्री विमलनाथ स्वामी, श्री अनंतनाथ स्वामी, श्री दरमनाथ स्वामी, श्री शत्रुनाथ स्वामी, श्री कुंतुनाथ स्वामी, श्री अराध्य स्वामी, श्री मल्लीनाथ स्वामी, श्री मुनिसुव्रत स्वामी, श्री नमिनाथ स्वामी, श्री नेमनाथ स्वामी, श्री पार्श्वनाथ स्वामी और श्री वर्धमान महावीर स्वामी।

जैन मत के अंतिम तीर्थंकर वर्धमान महावीर स्वामी हैं। महावीर स्वामी से पहले और उनके बाद भी जैन मत का भारतीय ज्ञान परंपरा के क्रमिक एवं सतत विकास सहित भारतीय संस्कृति के उद्भव में अभूतपूर्व योगदान रहा है।

सिंधु घाटी सभ्यता – योग और भगवान शिव

भारतीय प्राचीन सभ्यता ‘सिन्धु घाटी’ से भी तीर्थंकर ऋषभदेव (भगवान आदिनाथ) का संबंध मिलता है। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में जो प्रतीक प्राप्त हुए हैं, उनमें तीर्थंकर ऋषभदेव के संदर्भ प्रामाणिक रूप में मिले हैं। रामधारी सिंह दिनकर अपनी पुस्तक ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में इसी बात की पुष्टि करते हुए लिखते हैं, “मोहनजोदड़ो की खुदाई में योग के प्रमाण मिले हैं और आदि तीर्थंकर ऋषभदेव के साथ भी योग तथा वैराग्य की परंपरा जुड़ी हुई है।

दरअसल, मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मुहर का संबंध भगवान ऋषभदेव से माना जाता है। यह चित्र इस बात का द्योतक है कि आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व योग साधना भारत में प्रचलित थी और इसके प्रवर्तकों में से एक आदि तीर्थंकर ऋषभदेव भी शामिल थे।

सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में प्राप्त मुहर

अनेक इतिहासकारों और विद्वानों का मानना है कि भगवान शिव ही भगवान ऋषभदेव (भगवान आदिनाथ) हैं। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में प्राप्त उपरोक्त मुहर को पशुपति मुहर भी कहा जाता है। दोनों में अनेक समानताएं हैं जोकि इस बात को पुष्ट करती है। जैसे भगवान शिव का संबंध नंदी यानि बैल से है, वैसे ही भगवान ऋषभदेव का चिह्न भी नंदी है। दोनों का चरित्र एवं वेशभूषा भी समान है और दोनों को ही आदि यानि प्रथम माना गया है। योग और वैराग्य का संबंध भी भगवान शिव से जुड़ा है।

इसी तीर्थंकर परंपरा में आगे चलकर श्री महावीर स्वामी को केवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ था।

ऋग्वेद में तीर्थंकर ऋषभदेव

तीर्थंकर ऋषभदेव ने सर्वप्रथम इस सिद्धांत की घोषणा की थी कि “मनुष्य अपनी शक्ति का विकास कर आत्मा से परमात्मा बन सकता है। प्रत्येक आत्मा में परमात्मा विद्यमान है जो आत्मसाधना से अपने देवत्त्व को प्रकट कर लेता है वही परमात्मा बन जाता है।

“उनकी इस मान्यता की पुष्टि ऋग्वेद की ऋचा से होती है, “जिसके चार शृग – अनंतदर्शन, अनंतज्ञान, अनंतसुख और अनंतवीर्य है। तीन पाद हैं – सम्यकदर्शन, सम्यकज्ञान और सम्यकचरित्र। दो शीर्ष – केवलज्ञान और मुक्ति है तथा जो मन, वचन और कार्य इन तीनों योगों से बद्ध है उस ऋषभ ने घोषणा की कि महादेव (परमात्मा) मानव के भीतर ही आवास करता है।“

भारत के प्राचीन नगरों से संबंध

जैन मत के अधिकांश तीर्थकरों का जन्म भारत के प्राचीन शहरों में हुआ। ये प्राचीन शहर भारतीय ज्ञान परंपरा सहित सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक चेतना के केंद्र बिंदु माने जाते हैं। उदाहरण के लिए भगवान ऋषभदेव का जन्म अयोध्या में हुआ, भगवान पार्श्वनाथ का जन्म काशी में हुआ, श्री महावीर का जन्म वैशाली में हुआ, भगवान शांतिनाथ जोकि 16वें तीर्थंकर थे, उनका जन्म हस्तिनापुर में हुआ। 19वें तीर्थंकर भगवान मल्लिनाथ का जन्म मिथिला में हुआ।

श्रमण परंपरा

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है। भारतीय संस्कृति पावन गंगा के समान है, जिसमें दो महान नदियाँ आकर मिली हैं – श्रमण और वैदिक। इन दोनों के संगम से विशाल भारतीय संस्कृति की गंगा बनी है।

प्राचीन साहित्य में जैन धर्म के लिए ‘श्रमण’ शब्द का प्रयोग मिलता है। (जो श्रम करता है, कष्ट सहता है, तप करता है वह ‘श्रमण’ कहलाता है)।

श्रीमदभागवत में श्रमणों की प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि जो वातरशन श्रमण मुनि है, वे शांत, निर्मल, सम्पूर्ण परिग्रह से सन्यस्त ब्रह्म पद को प्राप्त करते हैं। भूषण टीका में श्रमण शब्द की व्याख्या इस रूप में की गई है – ‘श्रमणा दिगम्बराः श्रमणा वातरशनाः’।

श्रमण ‘दिगम्बर’ मुनि होते हैं। उन मुनियों को ही भागवतकार ने वातरशना, आत्मविद्या में विशारद बताया है। भारत में श्रमणों का अस्तित्व प्राचीन काल से है। सर्वप्रथम ऋग्वेद में श्रमणों का उल्लेख मिलता है। श्री वाल्मीकि रामायण में भी अनेक स्थानों पर श्रमणों का उल्लेख बड़े सम्मान के साथ किया गया है। भगवान राम ने जिन माता शबरी के आतिथ्य को ग्रहण किया था, वह श्रमणी थी। माता सीता के पिता, राजा जनक जिस तापसों को भोजन कराते थे, श्रमणों को भी वैसे ही कराते थे।

श्रमण आत्मविद्या में पारंगत थे। वैदिक ऋषि उनसे आत्मविद्या सीखते थे। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार “श्रमण परंपरा के कारण ब्राह्मण धर्म में वानप्रस्थ और संन्यास को प्रश्रय मिला।“ वस्तुतः प्राचीन काल में जैनों को ही श्रमण कहा जाता था।

वैदिक ग्रंथों में जैनधर्मानुयायियों को अनेक स्थलों पर ‘व्रात्य’ भी कहा गया है। व्रतों का आचरण करने के कारण वे व्रात्य कहे जाते थे। संहिता काल में व्रात्यों को बड़े सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। व्रात्यों की प्रशंसा ऋग्वेद काल से लेकर अथर्ववेद काल तक प्राप्त होती है। अथर्ववेद में तो स्वतंत्र ‘व्रात्य सूक्त’ की रचना भी मिलती है।

जैन मत में श्रमण और व्रात्य शब्दों के समान आर्हत शब्द का प्रयोग भी प्राचीन काल से होता आया है। श्रीमदभागवत में तो आर्हत शब्द का प्रयोग कई स्थानों पर हुआ है। एक स्थान पर भगवान ऋषभदेव के संदर्भ में लिखा है, “तपाग्नि से कर्मों को नष्टकर वे सर्वज्ञ ‘अर्हत’ हुए और उन्होंने आर्हत मत का प्रचार किया।“ मत्स्यपुराण में बताया है कि अहिंसा ही परम धर्म है, जिसे अर्हन्तों ने निरुपित किया है। वस्तुतः प्राचीन ज्ञान परंपरा में ‘आर्हतमत’ और ‘अर्हन्तों’ का उल्लेख मिलता है। ‘श्रमण’, ‘व्रात्य’ और ‘आर्हत’ इन तीनों शब्दों का प्रयोग जैन मत के लिए ही किया गया है। श्रमण परंपरा के प्रतिष्ठापकों में महावीर स्वामी का एक अन्यतम स्थान है।

महिला तीर्थंकर

ऐसा माना जाता है कि तीर्थंकर मल्लिनाथ एक महिला थे। हालांकि दिगम्बर ऐसा नहीं मानतें हैं, जबकि श्वेताम्बर परंपरा में यह माना गया है। अगर यह तथ्य सटीक है तो यह इस ओर संकेत करता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं का भी विशेष योगदान रहा है। हजारों साल पहले भारत में एक महिला को तीर्थंकर का दर्जा देना इसी बात का प्रमाण है। भारतीय ज्ञान परंपरा में अनेक ऐसी विदुषी महिलाएं रही हैं जिन्होंने अपने ज्ञान के प्रमाण प्रस्तुत किए है।

महाभारत कालखंड

तीर्थंकर नेमिनाथ (अरिष्टनेमि) के विषय में एक ऐतिहासिक तथ्य है। वह भगवान श्रीकृष्ण के चचेरे भाई हैं। भगवान श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव और उनके बड़े भाई समुद्रविजय के पुत्र नेमिनाथ थे। उनकी माता का नाम शिवा देवी था। तीर्थंकर नेमिनाथ का उल्लेख सामवेद में भी प्राप्त होता है।

अहिंसा और जैन मत

जर्मन अध्येता डॉ. हरमन याकोबी ने तीर्थंकर पार्शवनाथ को अहिंसा के सफल प्रणेता के तौर पर माना है। धर्मानंद कौशांबी ने भगवान पार्श्वनाथा पर ‘पार्शवनाथा चा चारयाम’ पुस्तक लिखी है। उन्होंने भी तीर्थंकर पार्श्वनाथ को अहिंसा के प्रणेता के रूप में स्वीकार किया है। वह यह भी सिद्ध करते है कि भगवान बुद्ध ने भगवान पार्शवनाथ कि परंपरा से ही अहिंसा का पाठ ग्रहण किया था। उसी अहिंसा को पंचशील के नाम से विख्यात कर दिया अथवा उसका नाम अष्टांगयोग दिया।

इस तथ्य के अनुसार अहिंसा का मार्ग भारत में महात्मा बुद्ध से पहले भी प्रचलित था। भगवान बुद्ध को अहिंसा की शिक्षा भगवान पार्श्वनाथ से ही प्राप्त हुई है। भगवान पार्श्वनाथ ने भारत में अहिंसा का बहुत ही विस्तृत प्रचार-प्रसार किया था।

महावीर जी का मानना है कि विविध कर्म-बंधनों में बाँधकर दुख देनेवाली हिंसा की प्रवृति न करने वाला, अभय के स्वरूप को समझने वाला साधक सरल होता है। उसमें दम्भ नहीं होता। उसका यह दृढ़ विश्वास होता है कि अहिंसा संसार में सुख बढ़ाने वाली है इसलिए वह उसी के अनुसार आचरण करता है।

रामायण के रचयिता

श्री महावीर के निर्वाण के लगभग चार शताब्दियों के बाद राजा विक्रमादित्य के शासन में जैन विद्वान विमलसूरी ने प्राकृत भाषा में ‘पउमचरिउ’ (पदम्चरित –जैन रामायण) की रचना की। इससे प्रतीत होता है कि उस समय रामायण की कथा जनता में अत्यंत लोकप्रिय थी। विमलसूरी ने रामायण का जैन-संस्करण लिखा था।

संस्कृत साहित्य और जैनाचार्य

भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन में जैन मत का विशेष योगदान रहा है। इस बात के स्पष्ट प्रमाण पुराणों सहित अन्य भारतीय ग्रंथों में मौजूद हैं। ‘योगवशिष्ठ’, ‘श्रीमदभागवत’, ‘विष्णुपुराण’, ‘पदम्पुराण’, ‘मत्स्यपुराण’ आदि प्राचीन ग्रंथों में जैनमत का उल्लेख मिलता है।

भारतीय संस्कृत साहित्य का अधिकांश भाग जैन-ग्रन्थ भण्डारों में सुरक्षित है। जैसलमेर, नागौर एवं बीकानेर के ग्रन्थागार इस तथ्य के साक्षी हैं। इन ग्रन्थागारों के द्वारा संस्कृत साहित्य के इतिहास की कड़ियाँ प्रकाश में आ सकी हैं। संस्कृत के रचनाकारों के साथ-साथ हमें महामना जैन मुनियों का भी ऋणी होना चाहिए, जिन्होंने अपने संस्कृतानुराग के कारण कई दुर्लभ एवं विस्मत संस्कृत ग्रन्थों पर ध्यान केन्द्रित कर उन्हें काल के भयंकर थपेड़ों से और इतिहास की खूंखार तलवार से बचाये रखा। डॉ. सत्यव्रत ने ठीक ही कहा है, “यह सुखद आश्चर्य है कि जैन साधकों ने अपने दीक्षित जीवन तथा निश्चित दृष्टिकोण की परिधि में बद्ध होते हुए भी साहित्य के व्यापक क्षेत्र में झाँकने का साहस किया, जिसके फलस्वरूप वे साहित्य की विभिन्न विधाओं एवं उसकी विभिन्न शैलियों की रचनाओं से भारती के कोश को समृद्ध बनाने में सफल हुए हैं।”

महावीर स्वामी के बाद जैन परंपरा में आचार्य पादलिप्त का उल्लेख सामने आता है। उनका कालखंड ईसा पूर्व सम्राट विक्रमादित्य के आसपास माना गया है। उन्होंने प्राकृत भाषा में एक बहुत ही सुन्दर रचना ‘तरंगावली’ के नाम से लिखी है। गद्य और पद्य दोनों का ही विलक्षण समन्वय इसमें किया गया है। आचार्य वीरभद्र के शिष्य नेमनाथ ने इसे प्राकृत में ही 100 गाथा परिमाण का संक्षिप्त संस्करण तैयार किया है। इसके अतिरिक्त जैन नित्यकर्म, जैन दीक्षा, प्रतिष्ठा-पद्धति तथा शिल्प-निर्माण-कलिका नामक ग्रंथों को आचार्य देव ने संस्कृत भाषा में ही लिखा है। सम्राट विक्रमादित्य वैदिक परंपरा को मानते थे लेकिन उनके शासन में अन्य मतों को भी पूरा सम्मान मिलता था। उनके नवरत्नों में एक जैन संत सिद्धसेन दिवाकर भी शामिल थे।

11-12वीं शताब्दी में होने वाले आचार्य हेमचन्द्र संस्कृत के विद्वान् थे। संस्कृत वाङमय के क्षेत्र में आचार्य हेमचन्द्र का विस्मयकारी योगदान है। प्रमाणमीमांसा उनकी जैनन्याय की अनूठी रचना है। त्रिशष्टिशलाका पुरुषचरित प्रसिद्ध महाकाव्य है। सिद्धहेमशब्दानुशासन लोकप्रिय व्याकरणग्रंथ है।

जैनाचार्य ब्रह्म जिनदास ने हिन्दी के साथ संस्कृत भाषा में भी काव्य रचना की, जिनमें पद्मपुराण, जम्बूस्वामीचरित्र, हरिवंशपुराण मुख्य हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि संस्कृत साहित्य के सम्वर्धन में जैन मुनियों, आचार्यों एवं विद्वानों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

कन्नड भाषा से संबंध

कन्नड़ भाषा के जन्मदाता, उसके साहित्य को समृद्ध करने वाले और कन्नड़ को महानतम देन देने वाले जैन कवि ही थे। इस समस्त धार्मिक प्रचार, प्रभाव एवं सम्रद्धि का श्रेय महावीर स्वामी के बाद जैन धर्म के प्रमुख आचार्य भद्गबाहु स्वामी को है, जिन्होंने अनेक उपसर्ग सहन कर आहँती संस्कृति का प्रचार किया।

काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण

1206 में गौरी की मृत्यु के बाद दिल्ली का सुलतान कुतुबुद्दीन ऐबक बन गया। इसके बाद 1260 तक तुर्कों का काशी पर कब्जा बना रहा। हालाँकि, इसी समयाविधि में हिन्दुओं ने स्थानीय स्तर पर अपना दबदबा फिर से बना लिया था। इसका एक उदाहरण इल्तुतमिश के शासन में मिलता है। दरअसल, गुजरात के एक जैन दानकर्ता वास्तुपाल द्वारा विश्वनाथ मंदिर की पूजा के लिए धनराशि भेजने का उल्लेख मिलता है। यह पैसे उन्होंने विश्वनाथ मंदिर के पुनः स्थापना के लिए भेजे थे।

महावीर स्वामी – तपस्वी जीवन

श्री महावीर ने सत्य की खोज के लिए राजसी वैभव को त्यागकर बारह वर्ष तपस्वी के रूप में बिताए। उन्होंने अपना अधिकांश समय ध्यान करने और लोगों के बीच अहिंसा का प्रचार करने में बिताया और सभी प्राणियों के प्रति श्रद्धा भाव रखा। महावीर स्वामी ने एक अत्यंत तपस्वी जीवन चुना, तपस्या करते हुए उन्होंने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण किया।

महावीर ने अपनी इच्छाओं, भावनाओं और आसक्तियों पर विजय पाने के लिए अगले साढ़े बारह साल गहन मौन और ध्यान में बिताए। उन्होंने सावधानीपूर्वक जानवरों, पक्षियों और पौधों सहित अन्य जीवित प्राणियों को नुकसान पहुंचाने या परेशान करने से परहेज किया। वह लंबे समय तक बिना भोजन के भी रहे। वह सभी असहनीय कठिनाइयों के बावजूद शांत और शांतिपूर्ण थे, इसलिए उन्हें महावीर नाम दिया गया, जिसका अर्थ है बहुत बहादुर और साहसी। इस अवधि के दौरान, उन्हें आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त हुई और अंत में उन्हें पूर्णज्ञान, शक्ति और आनंद का एहसास हुआ। इस अनुभूति को केवलज्ञान या पूर्णज्ञान के रूप में जाना जाता है।

महावीर ने अगले तीस साल पूरे भारत में नंगे पैर यात्रा करते हुए लोगों को उस शाश्वत सत्य का प्रचार करते हुए बिताये जिसे उन्होंने महसूस किया था। उनकी शिक्षा का अंतिम उद्देश्य यह है कि कोई व्यक्ति जन्म, जीवन, दर्द, दुःख और मृत्यु के चक्र से पूर्ण स्वतंत्रता कैसे प्राप्त कर सकता है और स्वयं की स्थायी आनंदमय स्थिति प्राप्त कर सकता है। इसे मुक्ति, निर्वाण, पूर्ण स्वतंत्रता या मोक्ष के रूप में भी जाना जाता है।

जैन मत के श्वेतांबर संप्रदाय के अनुसार वर्द्धमान की मां को 14 सपने आए थे। ज्योतिषियों ने जब इन सपनों की व्याख्या की तो उन्होंने भविष्यवाणी की कि बच्चा या तो सम्राट बनेगा या तीर्थंकर। ज्योतिषियों की भविष्यवाणियां सच निकली और वह बाद में जैन मत के 24वें तीर्थंकर बन गए।

श्री महावीर स्वामी के उपदेश

महावीर स्वामी की शिक्षाओं के तीन प्रमुख बिन्दु सम्यक दर्शन, सम्यक्‌ ज्ञान एवं सम्यक्‌ चरित्र हैं जो कर्म-बन्धन को विनष्ट कर पूर्णत्व प्रदान करते हैं। सम्यक्‌ दर्शन के बिना सम्यक्‌ ज्ञान तथा सम्यक ज्ञान के बिना सम्यक्‌ चरित्र प्राप्त नहीं होता। सम्यक्‌ चरित्र के बिना कर्मों से मुक्ति प्राप्त नहीं होती और कर्म-मुक्ति के बिना निर्वाण-सिद्धपद की प्राप्ति संभव नहीं होती।

महावीर जी का मानना है कि धर्म सबसे श्रेष्ठ है। (कौन सा धर्म ?) अहिंसा, संयम और तप।

जिस मनुष्य का मन इस धर्म में सदा लगा रहता है, उसे देवता भी नमस्कार करते हैं।

महावीर ने अपने अनुयायियों को केवल तप और संयम के पालन का ही उपदेश नहीं दिया बल्कि सावधानीपूर्वक इनके आध्यात्मिक विकास को भी उन्होंने दृष्टिगत रखा था।

अहिंसा – किसी भी जीवित प्राणी को नुकसान न पहुँचाना; सत्य – केवल हानिरहित सत्य बोलना; अस्तेय – जो कुछ भी ठीक से नहीं दिया गया है उसे न लें; ब्रह्मचर्य – (शुद्धता): कामुक आनंद न लेना; और अपरिग्रह : लोगों, स्थान और भौतिक चीजों से पूरी तरह से अलग होना।

कर्म प्रधान व्यक्तित्व

आज के परिवेश में हम जिस प्रकार की समस्याओं और जटिल परिस्थितियों में घिरे हैं, उन सभी का समाधान महावीर के सिद्धांतों और दर्शन में समाहित है। महावीर स्वामी कहा करते थे कि जिस जन्म में कोई भी जीव जैसा कर्म करेगा, भविष्य में उसे वैसा ही फल मिलेगा। वह कर्मानुसार ही देव, मनुष्य व पशु-पक्षी की योनि में भ्रमण करेगा। कर्म स्वयं प्रेरित होकर आत्मा को नहीं लगते बल्कि आत्मा कर्मों को आकृष्ट करती है।

वह कहते हैं कि रुग्णजनों की सेवा-सुश्रुषा करने का कार्य प्रभु की परिचर्या से भी बढ़कर है। अपने जीवनकाल में उन्होंने ऐसे अनेक उपदेश दिए, जिन्हें अपने जीवन तथा आचरण में अपनाकर कर हम अपने मानव जीवन को सार्थक बना सकते हैं।

जीओ व जीने दो

महावीर स्वामी का मानना है कि जो मनुष्य स्वयं प्राणियों की हिंसा करता है या दूसरों से हिंसा करवाता है अथवा हिंसा करने वालों का समर्थन करता है, वह जगत में अपने लिए बैर बढ़ाता है। उन्होंने अहिंसा की तुलना संसार के सबसे महान व्रत से की है और कहा है कि संसार के सभी प्राणी बराबर हैं, अतः हिंसा को त्यागिए और ‘जीओ व जीने दो’ का सिद्धांत अपनाइए। वह कहते हैं कि संसार में प्रत्येक जीव अवध्य है, अतः आवश्यक बताकर की जाने वाली हिंसा भी हिंसा ही है और वह जीवन की कमजोरी है।

महावीर स्वामी के अनुसार किसी भी प्राणी की हिंसा न करना ही ज्ञानी होने का एकमात्र सार है और यही अहिंसा का विज्ञान है। जिस प्रकार अणु से छोटी कोई वस्तु नहीं और आकाश से बड़ा कोई पदार्थ नहीं, उसी प्रकार अहिंसा के समान संसार में कोई महान व्रत नहीं। महावीर स्वामी के शब्दों में कहें तो ज्ञानी होने का यही एक सार है कि वह किसी भी प्राणी की हिंसा न करे और यही अहिंसा परम धर्म है।

भगवान् महावीर का मानना है कि प्रत्येक जीवित व्यक्ति के प्रति दया भाव रखो क्योंकि घृणा करने से स्वयं का विनाश होता है।

जाति – जन्म से नहीं कर्म से

धर्म को लेकर महावीर स्वामी का मत है कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है और अहिंसा, तप व संयम उसके प्रमुख लक्षण हैं। जिन व्यक्तियों का मन सदैव धर्म में रहता है, उन्हें देव भी नमस्कार करते हैं। अपने उपदेशों में वह कहते हैं कि ब्राह्मण कुल में पैदा होने के बाद यदि कर्म श्रेष्ठ हैं तो वही व्यक्ति ब्राह्मण है किन्तु ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाद भी यदि वह हिंसाजन्य कार्य करता है तो वह ब्राह्मण नहीं है जबकि नीच कुल में पैदा होने वाला व्यक्ति अगर सुआचरण, सुविचार एवं सुकृत्य करता है तो वह बाह्मण है।

पर्यावरण संरक्षण

महावीर स्वामी का मत है कि मानव और पशुओं के समान पेड़-पौधों, अग्नि, वायु में भी आत्मा वास करती है और पेड़-पौधों में भी मनुष्य के समान सुख-दुख अनुभव करने की शक्ति होती है।

विश्व के नाम श्री महावीर का सन्देश

श्री महावीर ने अहिंसा को मुक्ति का केंद्र माना है। प्रेम और अहिंसा का उनका दिव्य संदेश विश्व की संत्रस्त मानवता को शांति देता रहा है, लेकिन आज जब देश और विदेश की सीमाएं टूट रही हैं और मनुष्य ने समय और दूरी पर विजय प्राप्त कर ली है, उसकी समस्या और देश की सीमाएं बहुत वृहद् रूप ले चुकी हैं। संसार प्रतिपल संकटापन्न माहौल से घिरा हुआ है, क्योंकि भारत जैसे देशों की कमी है, और कतिपय देश युद्ध और हिंसा में ही मानव-जाति का कल्याण देखते हैं। लेकिन महावीर का मार्ग अपनाकार मानव जाति एक दिव्य शांति को प्राप्त करेगी, जो अहिंसा का सम्बल बनेगी, और अहिंसा, संतप्त संसार को अपने शासन में लाएगी। यह शासन आत्मशासन होगा और ऐसे शासन में मनुष्य अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जिएगा।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भगवान महावीर स्वामी के 2550वें निर्वाण वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित ‘कल्याणक महोत्सव’

12 फरवरी 2024 को भगवान महावीर स्वामी के 2550वें निर्वाण वर्ष के उपलक्ष्य में दिल्ली के विज्ञान भवन में कल्याणक महोत्सव का आयोजन किया गया जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी मुख्य वक्ता थे।

डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि महावीर स्वामी जी का विचार आज भी प्रासंगिक है। सभी अपने हैं। सुख जड़ पदार्थों में नहीं है। तुमको अकेले को एक व्यक्ति को जीना नहीं है, व्यक्तिवाद को छोड़ो। सबके साथ मिलजुल कर रहो। अहिंसा से चलो, संयम करो, चोरी मत करो, दूसरे के धन की इच्छा मत करो, यह सारी बातें, जीने का तरीका जो बताया गया है, वह शाश्वत है। इस अवसर पर जैन समाज के पूजनीय भगवंत साधु संत एवं साध्वी गण ने भी अपने विचार प्रकट किए।

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