आर्यावर्त की अगली कड़ी वैवस्वत मनु 

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प्रमोद भार्गव

भोपाल। वैवस्त मनु मेरा नया उपन्यास है,जो अभी लिखा जा रहा है। इसे मेरे पूर्व में लिखे उपन्यास आर्यावर्त की अगली कड़ी के रूप में लें,यह आर्य और अनार्यों के सभ्यतागत विकास की प्रलय के बाद की कथा है…। क्रमशः प्रकाशित किए जा रहे इस उपन्यास की तीसरी कड़ी…..,

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3-आहार में वायु

आसमान खुल गया है। लंबे समय बाद सूर्योदय और सूर्यास्त दृष्टिगोचर होने लगे हैं। दीर्घकाल तक व्याप्त रहे प्रलय को अंधेरे से ढके रहने वाला कोहरा छट गया है। अतएव सूर्य,प्रकाश और उसकी आंच का प्रभाव धरती पर उतरने लगा है। मनु सूर्य ऊर्जा के इस अजस्त्र स्रोत का अनुभव करके प्रफुल्लित हैं। वे सोचने लगे हैं कि वैदिक ऋषियों ने वास्तव में सच ही कहा था कि सूर्य ऊर्जा का अक्षुण्ण स्रोत है। मनु देख रहे हैं, सूर्य किरणों के नियमित फूटने के क्रम के चलते,जल से रिक्त हुई मुलायम धरती की कोख से अनेक वनस्पतियों के अंकुरण का सिलसिला चल पड़ा है। कोपलें फूटने लगी हैं। कीट पतंगे भी अस्तित्व में आ रहे हैं। तब क्या इनके बीजों के सूक्ष्म कण पृथ्वी के गर्भ और धरती से अंतरिक्ष तक फैले वायुमंडल में सुशुप्त अवस्था में पड़े रहते हैं। उनका आनुवंशकीय सूक्ष्मजीवी पारिस्थितिकी-तंत्र और प्राकृतिक पोषण संरचना वायुमंडल में बनी रहती है ? उपरोक्त प्रश्नों के उत्तर के सूत्र खोजने के लिए मनु ने अपने स्मृति-तंतुओं को बलपूर्वक सक्रिय किया। तब उन्हें ध्यान आया, ” अरे ! यही तो ऋषि हिरण्यगर्भ अपने एक मंत्र में कह गए है…,”

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक असीत।

स दाधार पृथिवीं धामुतेमां कस्मै देवाय हविशा विधेम।

ऋग्वेदः10-12-1 (हिरण्यगर्भ सूक्त)

मनु इस मंत्र को उच्चारित करके एकाएक चैतन्य हुए। किसी व्यक्ति के समक्ष नहीं होने पर भी बोल पड़े, ”प्राकृतिक अवस्थाओं को अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से ज्ञात कर लेने वाले ऋषि हिरण्यगर्भ आप अवश्य दृष्टा थे। आपके रचित मंत्र का अर्थ मैं यर्थात रूप में पृथ्वी और वायुमंडल में प्रत्यक्ष देख रहा हूं। आपने ठीक ही कहा था कि इस सृष्टि के निर्माण से पहले इसके आदि स्रोत के रूप में ‘हिरण्यगर्भ’ अत्यंत सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहा है। इसी सूक्ष्म से सृष्टि का विस्तार हुआ है। इस विराट महाकाव्य सृष्टि के आधारभूत मूल में प्रकृति अत्यंत सूक्ष्म है, जिसे केवल अनुमान से ही जाना जा सकता है। आपने निश्चित ही, कितना सटीक कहा है कि हिरण्यगर्भ में ‘हिरण्य’ स्वर्ण भी चमकने वाली ऊर्जा का प्रकाशपुंज है। ‘गर्भ’ से आशय कोख या अंडे से है। यही, वह प्राकृतिक अवयव, अंग, बीज या उपकरण हैं, जिनसे समस्त जीव-जगत उत्पन्न होता है।”

दीर्घस्वाँस लेकर मनु फिर बोले, ,”वास्तव में किसी भी सूक्ष्मजीव की सुषुप्त अवस्था एक गहरी नींद है। सुषुप्त एक अस्थायी स्थिति है। बीज की इस अवस्था का ज्ञान कश्यप की पत्नी दिति से उत्पन्न पुत्र हिरण्यकश्यप को भी थी। उन्होंने अपनी मेधा और अनुसंधानमयी साधना से अनेक चमत्कारिक वैज्ञानिक उपलब्धियां प्राप्त की हुई थीं। उन्होंने जान लिया था कि प्रकृति में उपलब्ध प्रत्येक जीव या पदार्थ के सूक्ष्म कण स्वमेव संयोजित होकर मात्र नव-सृजन ही नहीं करते हैं, अपितु उन्हें संयोजित और वियोजित (विघटित) भी करते हैं। इसी कारण इस अनंत ब्रह्मांड में दृश्यमान एवं अदृश्यमान संपूर्ण पदार्थों के जीवनदायी तत्व उपलब्ध हैं। सूर्य की किरणों में भी सभी पदार्थों को उत्सर्जित करने वाले तत्वों की उपस्थिति मानी जाती है। हिरण्यकश्यप वायुमंडल में विचरण कर रहे जीवन के इन मूलभूत तत्वों पर नियंत्रण की विज्ञान-सम्मत व्यावहारिक विधि में निपुण थे। इसीलिए ऋषियों ने उनके लिए कहा था..,

अकृश्यपच्या तस्यासीत सप्त द्वीपवतीमही।

तथा कामुधाद्यौस्तु नानाष्चर्य पदं नभः।।

श्रीमद् भागवत महापुराण स्कंध 1-4

यानी दैत्यराज हिरण्यकश्यप अपने तप और योग से इतने तेजस्वी हो गए थे कि पृथ्वी के सातों द्वीपों पर उनका एकछत्र राज्य था। वसुंधरा को बिना जोते-बोए ही सभी प्रकार के अन्न उत्पन्न हो जाया करते थे। अकृशयपच्या का अर्थ ही, भूमि को बिना जोते-बोए फसल पैदा करने की विधि कहा जाता है। अर्थात वे अंतरिक्ष में बीज अंकुरित कर लिया करते थे या प्राकृतिक रूप में उन्हें प्राप्त कर लिया जाता था। क्योंकि उनके उत्सर्जन के सूक्ष्म जीव वायुमंडल में निरंतर विचरते रहते हैं।

प्रलय में बचने के बाद मनु ने इतना लंबा एकांगी संवाद प्रकृति से पहली बार किया था। प्रकृति कह लें या ब्रह्म से किए संवाद के उपरांत मनु उत्साहित हैं। उन्होंने निश्चित कर लिया कि जब तक शाकाहार की सहज उपलब्धता नहीं हो पाती है, वे वायु से ही सीधे आहार श्वांस के माध्यम से लेंगे। मनु जानते हैं, पेड़-पौधे एवं वनस्पतियां वायु से ही भोजन ग्रहण करते हैं। प्रकृति में नैसर्गिक रूप से उपलब्ध तत्वों से ही अपना पोषण करके जीवित रहते हैं। अनेक ऋषि -मुनियों ने भी वायु और सूर्य किरणों से सीधे पोषण ग्रहण कर ब्रह्मांड को खंगाला और ग्रह-नक्षत्रों व निहारिकाओं को जाना। उन्होंने भोजन की यह प्रेरणा वृक्षों से ली थी। जल, वायु और प्रकाश से अवशोषण पेड़ के जड, तना,शाखाएं और फूल-पत्तियां करते हैं। प्रकृति से सीधे आहार ग्रहण करने की इस विधि के स्मरण से मनु की इंद्रियों में जीवन की लालसा का आवेग बढ़ गया। उन्होंने जीवन निर्वाह की इस कठिन परिस्थिति में जैसे जीवन निर्वाह की सरलता से आसान डोर पकड़ ली। इस आभासी स्थिति में एकाएक स्मृतियों के इन डोरों को उन्होंने जैसे कसकर मुट्ठियों में भींच लिया और वे अतीत की चेतनामयी सीख के इस स्मरण से जुगनुओं की तरह जगमगाने का अनुभव करने लगे। उन्हें लगा कि इन यादों ने जैसे जीवन के कष्ट को संजीवनी दे दी है। ये स्मृतियां मात्र स्वप्न नहीं थीं, अपितु जीवन की इच्छा में रंग, गंध, स्वर और स्पर्श का ऐसा आत्मीय अनुभव थीं, जो शरीर के जीवनरस को ऊर्जा की तरह भाव-विभोर कर रही थीं। इस उत्साह से चैतन्य होते हुए मनु उगते सूर्य की दिशा में एकाग्राचित खड़े हुए और लंबी-लंबी साँसें लेते हुए वायुग्रहण करने लगे। आहार ग्रहण की इस प्रक्रिया के पूर्ण होने के उपरांत मनु को असहाय अहल्या की याद आ गई। स्मृति श्रृंखला का जैसे एक अध्याय खुलता चला गया…।

सप्त सिंधु क्षेत्र में प्रलय से ठीक पहले राजा वघ्रयश्व का प्रभुत्व था। इस पूरे क्षेत्र में भरत संख्याबल में सर्वाधिक थे। उनके प्रधान थे वघ्रयश्व। वघ्रयश्व की दो पत्नियां थीं, पौरवी और मेनका। पौरवी की कोख से दिवोदास जन्मे थे। वघ्रयश्व की वीरगति होने के बाद इन्हीं दिवोदास को राजपाट भारद्वाज, वशिष्ठ और विश्वामित्र की उपस्थिति में सौंपा गया था। वघ्रयश्व की दूसरी पत्नी थीं, मेनका! यह मेनका इंद्र की वह अप्सरा नहीं थी, जिसने विश्वामित्र का तप इंद्र के कहने पर भंग किया था। वघ्रयश्व और मेनका की पुत्री थी, अहल्या! यही गौतम ऋषि से विवाहित वह अहल्या है, जो सप्तसिंधु क्षेत्र में आर्य और अनार्यों के बीच छिड़े भीषण युद्ध के समय इंद्र के वैभव से आकर्षित होकर उनकी अंकशायिनी बन गई थी।

भरतों के प्रमुख वघ्रयश्व, दिवोदास और सुदास ये तीनों पितामह, पिता और पुत्र थे। दिवोदास एवं सुदास को प्रलय से पहले वैदिक कालखंड में पुरु-भरत भी कहा जाता रहा है। यही तृत्सुओं के भी प्रधान रहे हैं। परंतु दासराज्ञ युद्ध में पुरुओं ने भरतों का साथ नहीं दिया था। भरत उस समय परुष्णी (रावी) नदी के तटों पर रहते थे। इस युद्ध में वशिष्ठ और विश्वामित्र के बीच इतना उग्र विवाद हुआ कि दोनों परस्पर मरपीट पर उतारू हो गए थे। तब राजा दिवोदास ने दोनों के बीच आकर हस्तक्षेप किया और पुरोहित विश्वामित्र को राजऋषि के पद से निष्काषित कर दिया था। तब विश्वामित्र ने प्रतिकार की भावना से दासराज्ञ युद्ध में अनार्यों का नेतृत्व किया, किंतु दिवोदास-सुदास के साथ इंद्र अपने शस्त्र व सैन्य बल के साथ सहायता करने आ गए। फलतः जिन दस राज घरानों ने दिवोदास के साथ सप्त-सिंधु क्षेत्र में युद्ध की स्थिति निर्मित की थी,उनसे इंद्र व वशिष्ठ के नेतृत्व में दिवोदास एवं सुदास के साथ आर्यों के पांच राज घराने भी लड़े थे। दस घरानों का नेतृत्व शंबर ने किया था। परंतु सुदास को इंद्र की शक्ति मिल जाने से अनार्य पराजित हो गए, जो बचे उनमें से बड़ी संख्या में भलान के संकीर्ण मार्ग (वर्तमान में बोलन दर्रा) से आर्याना की ओर पलायन कर गए। इन्हीं लोगों ने वहां वैदिक संस्कृति की नींव रखी।

इंद्र जब दिवोदास के दुर्ग में रहकर अनार्यों से संग्राम की रणनीति बना रहे थे, तब अहल्या भी अपने भाई दिवोदास के घर में थी। अहल्या का ऋषि गौतम से पाणिग्रहण हो चुका था। किंतु जब विशाल दुर्ग के गलियारों में अहल्या का इंद्र से आमना-सामना हुआ तो दोनों के चक्षु परस्पर केंद्रित हो गए। इंद्र तो पूर्व से ही सोम और परस्त्री के भोग का तीव्रकांक्षी था, अहल्या भी इंद्र के सुगठित शरीर-सौष्ठव से प्रभावित हुए बिना रह न सकी। इंद्र के राजसी वैभव और प्रभावी व्यक्तित्व की चर्चाएं तो वह खूब सुन चुकी थी। यहां एक-दूसरे के चित्र आंखों में समाए तो प्रण्य मिलन की लालसाएं भी हिलोर उठीं। दोनों ने बिना कोई वार्तालाप किए, जैसे आंखों ही आंखों से संवाद स्थापित कर लिए। परस्पर देह मिलन की सहमति तय कर ली। तत्पश्चात अहल्या और इंद्र के बीच अनैतिक मिलन का संयोग बनने लगा। तथापि अभी तक ये संबंध मुखर लोकनिंदा का आधार तो नहीं बन पाए थे, परंतु दुर्ग के कुछ विशिष्ठ लोगों को दासियों और प्रहरियों के माध्यम से यह संदेश मिल गया कि अहल्या एवं इंद्र अनेक बार संदिग्घ स्थिति में देखे गए हैं। दिवोदास के संज्ञान में जब बहन अहल्या और इंद्र के बीच बन चुके अवैध काम-व्यवहार को लाया गया, तब इंद्र के सापेक्ष असहाय दिवोदास ने संयम से काम लेते हुए अहल्या को ससम्मान गौतम ऋषि के घर भेज दिया। तब भी दुर्ग के बाहर यह प्रसंग लोक-कलंक का पर्याय बनता चला गया था। आमजन कहने लगे कि अहल्या इंद्र की ‘अहल्यायै जार’ शतपथ ब्राह्मण) है। अर्थात इंद्र परस्त्री अहल्या से प्रेम करने वाला उप पति (प्रेमी) है। यही इंद्र दासराज्ञ युद्ध की समाप्ति के उपरांत कालांतर में ऋषि गौतम की अनुपस्थिति में उन्हीं के। आश्रम में अहल्या से संबंध बनाने के बाद पकड़े जाते हैं। ऋषि गौतम अहल्या को वायु का सेवन कर, राख के बिछौने पर जीवन व्यतीत करते हुए जीवित रहने का श्राप देते हैं। और अहल्या दंड भोगने को विवश हो जाती है। दंड भोगने के दिनों में अहल्या के संताने उनकी देख रेख करती हैं और वे भूख की चिंता से निश्चिंत हो गए।

प्रलय के बाद अब ज्ञात नहीं अहल्या के प्राण बच पाए या नहीं? बचें होंगे तो आज भी हवा को आहार बनाकर राख में पड़ी होगी। मनु का स्मृति-पाठ पूर्ण हुआ तो वे बोले, ‘हे ब्रह्म जब अहल्या वायु पीकर जीवित रह सकती है तो यह मनु क्यों नहीं ?’ जैसे मनु का आत्मिक चेतना तंत्र जागृत हो गया।

राम परीक्षा लेते सबकी, धैर्य धरो रे भाई

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इंदुशेखर तत्पुरुष

सौ सौ चूहे खाकर बिल्ली
हज करने को आई।
अपने संग घड़ियाली आँसू
का इक दरिया लाई।।
जिनके शोणित से उसने
जीवनभर उदर भरा,
उनको श्रद्धांजलि देने वह
शोकपत्र भी लाई।।

धर्मद्रोहरत पर मजहब से
जिसकी प्रीत पुरानी।
आज धर्म की कथा बाँचती
वह चोरों की रानी।।
सत्य, सादगी, न्याय, नीति का
भाषण पिला रही है,
बच्चे–बच्चे के मुख पर है
जिसकी कुटिल कहानी।।

राम काल्पनिक हैं, जो ऐसा
शपथपत्र में लिखते।
वे कपटी, पाखंडी देखो!
रामभक्त अब बनते।।
माना चूक बड़ी कर बैठा
था घर का इक बूढ़ा,
किन्तु शत्रु को क्या हक,
उसको गरियाते फिरते।।

अपराधी जो भी हो उसको
निश्चित दण्ड मिलेगा।
रामधाम जिसने लूटा
उसका सर्वस्व जलेगा।।
रामनिंदकों के भी अब
षड्यंत्र विफल सब होंगे,
रामआस्था ग्रसने वाला
यह खग्रास टलेगा।।

रामकाज में विघ्न बहुत हैं,
कपट, खोट अरु खाई।
कठिन धरम की गैल,
कुटिल है रपटीली काई।।
दानवदल से सतत सजग
चौकन्ना रहना है,
राम परीक्षा लेते सबकी,
धैर्य धरो रे भाई!!

शांति के नाम पर निर्दोषों का खून और पानी एक साथ नहीं बहेगा

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लखनऊ । जम्मू कश्मीर के पहलगाम हमले के जब से भारत ने पाकिस्तान के साथ सिन्धु जल समझौता रद्द किया है तभी से पाकिस्तान लगातर पूरी दुनिया के समक्ष पीड़ित देश होने का नाटक कर रहा है और हाथ पांव मार रहा है कि किसी तरह दबाव में आकर भारत सिंधु जल समझौता बहाल कर दे ।इसके साथ ही उसके पूर्व विदेश मंत्री और पीपीपी नेता विलावल भुटटो भारत को परमाणु युद्ध की धमकियां भी देने लग गए गये है। भारत के कड़े तेवरों के कारण सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान की बैचेनी अब काफी व्यग्र हो उठी है। इस्लामाबाद में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी आयेाजित किया गया जिसमें पाकिस्तानी मंत्रियों और सांसदों ने भारत को धमकी देने का प्रयास किया। पाक उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा कि सिंधु जलसंधि सिर्फ पानी बांटने का समझौता नहीं अपितु दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और सहयोग की मजबूत नीव है।
वहीं दूसरी ओर संयुक्तराष्ट्र महासभा की बैठकों में भारत एक माह में ही चार बार पाकिस्तान को आईना दिख चुका है। बिलावल ने धमकी देते हुए बयान दिया कि अगर पाकिस्तान के पानी को रोकने का प्रयास हुआ तो यह पाकिस्तान के अस्तित्व पर हमला माना जाएगा और यह परमाणु प्रतिक्रिया जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। आज पाकिस्तान सिंधु जल के लिए तरस रहा है और उसका असर वहां की आम जनजीवन पर दिखलाई भी पड़ने लग गया है । इतना होने पर भी पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों से बाज आने को तैयार नहीं है। वह लगातार भारत के विरुद्ध आतंकवादी गतिविधियों को चला रहा है और आतंकियों को संरक्षण दे रहा है।अतः हमारे रक्षामंत्री श्री राजनाथ सिंह ने भी पाकिस्तान को स्पष्ट सन्देश दे दिया है कि अब वह सिंधु जल समझौता पूरी तरह से भूल जाए क्योंकि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकता।
निकल पड़े शांतिदूत – इस बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह हुआ है कि भारत और पाकिस्तान की तथाकथित 116 बुद्धिजीवी हस्तियों ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाक प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को पत्र लिखकर शांतिवार्त पुनः शुरू करने की वकालत की है जिसे भारत सरकार ने स्पष्ट रूप से ठुकरा दिया है और एक बार फिर बता दिया है कि अब खून और पानी एक साथ नहीं बह सकता, नही बह सकता।
सेंटर फार पीस एंड प्रोगेस के अध्यक्ष ओ पी शाह की तरफ से 116 प्रमुख हस्तियों ने हस्ताक्षर किए हैं जिसमें 60भारत व 56 पाकिस्तान से है। अब इन हस्तियो में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का नाम भी जुड़ गया है।इस प्रकार ब्याह संख्या 117 हो गई है।आज भारत की जिन 61 हस्तियों ने इस पत्र में हस्ताक्षर किए हैं उनमें अधिकतर वही लोग शामिल हैं जिन्होंने भारत पर हुए अब तक के किसी भी आतंकवादी हमले की ना तो निंदा की और न पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त की। कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की सदा से ही पाकिस्तान के प्रति ही संवेदनाएं रही हैं , उन्हें पाकिस्तान के प्रति प्रेम रहा है ,उनके बयान पाकिस्तानी मीडिया में छाए रहते है। जम्मू कश्मीर से धारा 370 का पटाक्षेप होने के बाद से महबूबा मुफ़्ती सईद और फारुख अब्दुल्ला परिवार
पाकिस्तान प्रेम मेंअत्यंत छटपटा रहा है। राजद सांसद मनोज झा जिनकी भारत में कोई राजनैतिक हैसियत नहीं है ऐसे ही पाकिस्तान प्रेमी 61 लोगों की सूची देखने के बाद इन सभी की मंशा एकदम स्पष्ट हो रही है कि ये लोग वास्तव में शांति के नकली नायक बनकर भारतीयों और दुनिया के तमाम लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाह रहे हैं और अपनी उपस्थिति का एहसास बिल्कुल उसी तरह कराना चाह रहे हैं और जिस प्रकार अमेरिका -ईरान युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना प्रमुख मुनीर और शाहबाज शरीफ अमेरिकी गुलाम या कठपुतली बनकर या फिर मध्यस्थ बनकर शांति का ढिंढोरा पीट रहा था।
यह अत्यंत दुर्भाग्य की बात है शांति का ढिंढोरा पीटने वाले यह लोग 1970 से लेकर अब पहलगाम तक जितने भी आंतकी हमले हुए उन्हें भूल चुके हैं . भारत ने पाकिस्तान को शांति वार्ता करने के कई अवसर दिए और बारंबार दिए। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी तो बस लेकर पाकिस्तान गए थे उसके बाद भारत को कारगिल का युद्ध लड़ना पड गया.
पाकिस्तान भारत के खिलाफ न केवल आंतकवाद की समस्या ही पैदा कर रहा है अपितु भारत में शाति भंग करने व विकास कार्यों में बाधा पहुँचाने के लिए हर प्रकार की घृणित व विकृत साजिशों को लगातार अंजाम दे रहा है ।बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ही साजिशें रच रही थी।
आज जिन लोगों ने भारत और पाकिस्तान के साथ शांतिवार्ता शुरू करने की जो वकालत की है वे लोग तब कहाँ चले गए थे जब बांग्लादेश में हिंदुओं का कत्ले-आम हो रहा था, हिन्दू बहिन -बेटियों पर क्रूर और शर्मनाक अत्याचार किये जा रहे थे. इन लोगो ने अपना पत्र ऐसे समय में लिखा है जब पाकिस्तान पाक अधिकृत कश्मीर में अपना दमनचक्र चला रहा है . पूरा पीओजेके पाकिस्तान के वर्चस्व से स्वतन्त्र होना चाह रहा है. अतः इन हस्तियो को ऐसे समय में पीओजेके के आंदोलनकारियों के समर्थन में आना चाहिए था और पाकिस्तान से कहना चाहिए था वह पाक अधिकृत कश्मीर को पूरी तरह से स्वतंत्र करें और बलूचिस्तान को भी आजादी दे। किंतु इन लोगों’ ने ऐसा कोई मुददा अपने पत्र में नहीं उठाया है जिससे इन लोगों की मंशा पर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है। सबसे बडा दुर्भाग्य यह है कि इन लोगों ने अपने पत्र के माघ्यम से पुलवामा में 40 जवानों की शहादत से लेकर पहलगाम हमलों की घटना की निंदा तक नहीं की और उसे इतनी आसानी से भूल गए। वास्तविकता यह है कि आज जो लोग पत्र लिख रहे हैं उनके लिए पाकिस्तान से गोश्त आना -जाना बंद हो गया है यह सभी लोग इसीलिए पाकिस्तान से वार्ता की वकालत करने लग गए हैं। इन्हें न भारत देश से कोई प्रेम है और न भारत की जनता से, ये राजनैतिक और आर्थिक स्वार्थ के लिए नाटक कर रहे हैं .
भारत तो हमेशा से ही वार्ता की वकालत करता रहा है और आज भी कर रहा है । वह कई बार हर मंच पर स्पष्ट भी कर चुका है कि अब पाकिस्तान के साथ वार्ता केवल आतंकवाद पर ही होगी बिना किसी मध्यस्थ के होगी और पाकिस्तान को पाक अधिकृत कश्मीर तत्काल प्रभाव से खाली करना ही होगा।
ताजा घटनाक्रम में , भारत के विरुद्ध षड्यंत्रों में शामिल रहने वाला चीन भी अब सिन्धु जल संधि के मुद्दे को लेकर पाकिस्तान के समर्थन में खड़ा होने का प्रयास कर रहा है। देश को अपने वर्त्तमान नेतृत्व, रणनीति कारकों और सेना पर विश्वास रखना चाहिए कि वे इन षड़यंत्रकारी पड़ोसीदेशों के षड़यंत्र को कभी सफल नहीं होने देंगे तथा भारत को एक सशक्त और सबल राष्ट्र के रूप में स्थापित करेंगे ।

सभी उत्पादों पर हो राजभाषा हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं की अनिवार्यता 

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प्रवीण कुमार जैन
सेवा में,
माननीय प्रधानमंत्री महोदय,
भारत सरकार,
नई दिल्ली।

विषय: सभी उत्पादों पर राजभाषा हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं की अनिवार्यता एवं भाषाई भेदभाव को समाप्त करने के संबंध में।

महोदय,
एक उपभोक्ता होने के नाते इस पत्र के माध्यम से आपका ध्यान एक अत्यंत गंभीर एवं राष्ट्रव्यापी समस्या की ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ। यह विषय सीधे तौर पर देश के करोड़ों नागरिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा, उपभोक्ता अधिकारों और उनके आत्मसम्मान से जुड़ा है।

भारत में लगभग ९5 प्रतिशत नागरिक अंग्रेजी भाषा में पारंगत नहीं हैं। इसके उपरांत भी, देश में बिकने वाले सभी उत्पादों, जीवनरक्षक औषधियों, दैनिक उपयोग की वस्तुओं और भोजन सामग्रियों के विवरण पर पूर्ण रूप से आंग्ल भाषा का ही वर्चस्व है। उत्पादों में प्रयुक्त सामग्री, उसके उपयोग की विधि, वैधानिक चेतावनियों और दुष्प्रभावों की जानकारी केवल अंग्रेजी में छपी होती है जिसे देश के 95 प्रतिशत नागरिक समझ नहीं पाते हैं जिससे ऐसे उपभोक्ताओं का स्वास्थ्य और जीवन सदैव संकट में रहता है। *भारत में कार्यरत बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ या बड़ी कम्पनियाँ अपने उत्पादों अथवा दवाओं के लेबल, चेतावनी व उपयोग विधि केवल अंग्रेजी मे छापती हैं क्योंकि सरकारी नियम कहते हैं कि अंग्रेजी में छापो, यदि देश के करोड़ों ग्राहक व उपभोक्ता अंग्रेजी नहीं समझते हैं तो यह सरकार या कंपनियों की समस्या नहीं है बल्कि उन करोड़ों ग्राहकों व उपभोक्ताओं की है जो अंग्रेजी सीख नहीं पा रहे हैं।* जिनको अंग्रेजी नहीं आते हैं उन्हें किसी उत्पाद या दवाई के बारे में जानने का कोई अधिकार नहीं है और आगे भी यह अधिकार नहीं मिलेगा क्योंकि भारतीय भाषाओं के आने से उपभोक्ताओं के जागरुक निर्णय लेने का अधिकार सुरक्षित होता है जबकि सरकार जनता के ऐसे किसी अधिकार को सुरक्षित करने के झमेले में नहीं पड़ना चाहती है।

यह स्थिति न केवल नागरिकों और उपभोक्ताओं के मौलिक अधिकारों का खुला हनन है, अपितु यह देश की बहुसंख्यक जनता के साथ घोर भाषाई भेदभाव भी है।

यदि हम विश्व के विकसित देशों और अत्यंत कम जनसंख्या वाले छोटे देशों के वैधानिक प्रावधानों का अवलोकन करें, तो स्थिति सर्वथा भिन्न है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी उन देशों में व्यापार करने के लिए वहाँ के स्थानीय भाषाई नियमों का अनिवार्य रूप से पालन करती हैं। *विश्व के १० प्रमुख देशों और उनके कानूनों के उदाहरण निम्नलिखित हैं: *

१. फ़्रांस: यहाँ ‘तूबों विधि’ लागू है। इस कानून के अंतर्गत यह अनिवार्य है कि किसी भी उत्पाद के लेबल, उपयोग के दिशा-निर्देश, और चेतावनी पूर्ण रूप से फ़्रांसीसी भाषा में ही मुद्रित हों।
२. जर्मनी: ‘जर्मन औषधि अधिनियम’ और ‘खाद्य सूचना विनियमन’ के अनुसार प्रत्येक उत्पाद और औषधि पर अनिवार्य रूप से जर्मन भाषा में जानकारी देना वैधानिक रूप से आवश्यक है, ताकि कोई भी उपभोक्ता जानकारी से वंचित न रहे।

३. जापान: ‘खाद्य स्वच्छता अधिनियम’ तथा ‘औषधि एवं चिकित्सा उपकरण अधिनियम’ के अंतर्गत यह कड़ा नियम है कि सभी उपभोक्ता उत्पादों का विवरण जापानी भाषा में ही मुद्रित होना चाहिए।

४. दक्षिण कोरिया: ‘खाद्य स्वच्छता अधिनियम’ के तहत लेबलों का कोरियाई भाषा में मुद्रण अनिवार्य है। इसके बिना कोई भी विदेशी कंपनी अपना माल वहाँ नहीं बेच सकती।

५. रूस: ‘उपभोक्ता अधिकार संरक्षण विधि’ के अनुच्छेद ८ के अनुसार, उपभोक्ताओं को रूसी भाषा में उत्पाद की संपूर्ण और स्पष्ट जानकारी देना प्रत्येक निर्माता और विक्रेता का वैधानिक दायित्व है।

६. स्पेन: ‘उपभोक्ता और उपयोगकर्ता रक्षा सामान्य अधिनियम’ यह सुनिश्चित करता है कि उत्पादों से जुड़ी सभी आवश्यक जानकारियाँ अनिवार्य रूप से स्पेनी भाषा में उपलब्ध हों।

७. इटली: ‘उपभोक्ता संहिता’ के वैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत यह अनिवार्य है कि उपभोक्ताओं के लिए सभी सुरक्षा चेतावनियाँ, संघटक और दिशा-निर्देश इतालवी भाषा में हों।

८. फ़िनलैंड: भारत के एक महानगर से भी कम जनसंख्या (लगभग ५५ लाख) वाले इस देश में ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम’ लागू है, जिसके अंतर्गत उत्पादों पर फ़िनिश और स्वीडिश भाषा का प्रयोग पूर्णतः अनिवार्य है।

९. नॉर्वे: मात्र ५५ लाख की जनसंख्या वाले नॉर्वे में ‘खाद्य सूचना विनियमन’ के अनुसार सभी उपभोक्ता उत्पादों और भोजन सामग्रियों पर नॉर्वेजियन भाषा में विवरण देना अनिवार्य है।

१०. आइसलैंड: मात्र ४ लाख की जनसंख्या वाले इस छोटे से देश ने भी अपने ‘उपभोक्ता अधिकार अधिनियम’ के अंतर्गत यह अनिवार्य किया है कि सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उत्पादों की जानकारी आइसलैंडिक भाषा में ही दें।

महोदय, जब कुछ लाख की जनसंख्या वाले देश अपनी भाषा और नागरिकों के उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए विदेशी कंपनियों को विवश कर सकते हैं, तो भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? भारत के प्रत्येक राज्य की जनसंख्या करोड़ों में है और हर भारतीय भाषा को बोलने व समझने वाले नागरिक करोड़ों में हैं। ऐसे में यहाँ राजभाषा हिन्दी तथा संबंधित राज्य (जिसमें कंपनी अपना उत्पाद बेचती है) की भाषा में उत्पाद का विवरण छापने का नियम क्यों नहीं बन सकता?

यह अत्यंत चिंतनीय और दुर्भाग्यपूर्ण है कि आंग्ल भाषा के वर्चस्व के समक्ष भारत सरकार इतनी असहाय है कि वह अपने ही नागरिकों के हितों व अधिकारों की निरंतर अनदेखी कर रही है। देश की बहुसंख्यक जनता पर एक विदेशी भाषा थोपकर उनके साथ जो भाषाई भेदभाव किया जा रहा है, वह किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र के लिए उचित नहीं है। पर, हम यह देखते हैं कि विश्व के किसी भी अन्य देश में आंग्ल भाषा की गुलामी इतनी गहरी नहीं है, जितनी हमारे देश में व्यवस्थाओं ने बना रखी है।

आप निरंतर देश को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने का आह्वान करते हैं। पर, यह कटु सत्य है कि यदि आप वास्तव में औपनिवेशिक मानसिकता से देश को मुक्त करना चाहते हैं, तो आंग्ल भाषा की गुलामी और इसके वर्चस्व को तोड़ना ही होगा। उसे तोड़े बिना औपनिवेशिक मानसिकता इस देश से कभी नहीं जाएगी।

अतः, आपसे सविनय निवेदन है कि भारत सरकार इस भाषाई विवशता को त्यागकर नागरिकों के अधिकारों की रक्षा हेतु कठोर कदम उठाए। देश में बिकने वाले प्रत्येक उत्पाद पर राजभाषा हिन्दी तथा उस राज्य, जहाँ माल बेचा जा रहा है, की क्षेत्रीय भाषा में संपूर्ण विवरण अनिवार्य करने हेतु तत्काल प्रभाव से वैधानिक नियम बनाए जाएँ। ऐसा करके ही हम सही अर्थों में एक सशक्त, सुरक्षित और भाषाई गुलामी से मुक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे।

सधन्यवाद।

भवदीय,
प्रवीण कुमार जैन,
(एमकॉम, एफसीएस व एलएलबी)
मुंबई, महाराष्ट्र (भारत)

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