आलोचना लोकतंत्र का पोषण है

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मुंबई । बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार की आलोचना और शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का मूल अधिकार है, अपराध नहीं। अदालत ने केवल विरोध के आधार पर एफआईआर और निर्वासन को असंवैधानिक बताया। फैसले ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया, हालांकि ऐसे संरक्षण का लाभ अभी सभी असहमत नागरिकों को समान रूप से नहीं मिल रहा।

ज़रा एक पल के लिए ऐसे भारत की कल्पना कीजिए, जहाँ हर नागरिक सरकार की हर बात पर “जी हुज़ूर” कहे। संसद की बहसें कुछ मिनटों में खत्म हो जाएँ। टीवी चैनलों पर बहस की जगह केवल सरकारी प्रेस नोट पढ़े जाएँ। अख़बारों के संपादकों का काम सिर्फ़ अल्पविराम और पूर्णविराम ठीक करना रह जाए। सोशल मीडिया पर हर तरफ़ एक ही नारा गूँजे; “वाह सरकार, कमाल कर दिया!”

सब कुछ शांत दिखाई देगा। कोई विवाद नहीं, कोई बहस नहीं, कोई सवाल नहीं। लेकिन उसी ख़ामोशी में लोकतंत्र धीरे-धीरे पिछले दरवाज़े से बाहर निकल जाएगा।
ख़ुशकिस्मती से भारत कभी अंधी आज्ञाकारिता पर नहीं बना। भारत बहस, तर्क और मतभेद की ज़मीन पर खड़ा हुआ है।
यूरोप में ज्ञानोदय की हवा चलने से बहुत पहले भारत में जंगलों, आश्रमों, मंदिरों, बौद्ध विहारों और गाँव की चौपालों में विचारों की खुली बहस होती थी। यहाँ तलवारें कम, विचार ज़्यादा टकराते थे।
गौतम बुद्ध ने कर्मकांड, ऊँच-नीच और अंधविश्वास पर सवाल उठाए। महावीर ने अहिंसा और समानता का रास्ता दिखाया। चार्वाक ने वेदों की सत्ता तक को चुनौती दे दी। उन्होंने कहा कि बिना प्रमाण किसी बात को मत मानो। उनके अपने ग्रंथ भले न बचे हों, लेकिन उनके विरोधियों ने भी उनके विचारों को दर्ज किया। यही किसी आत्मविश्वासी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान है कि वह अपने विरोधी की आवाज़ भी मिटाती नहीं।
बाद में कबीर ने मंदिर और मस्जिद दोनों में फैले पाखंड पर बराबर चोट की। रैदास ने जाति के घमंड को ललकारा। गुरु नानक ने इंसानों की बराबरी का संदेश दिया। मीराबाई ने राजसत्ता के आगे अपनी अंतरात्मा नहीं बेची। तुकाराम ने सामाजिक अन्याय के खिलाफ़ आवाज़ उठाई।
आधुनिक भारत में राजा राममोहन राय ने सती प्रथा का विरोध किया। ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले ने लड़कियों और वंचित समाज की शिक्षा का बिगुल बजाया। पेरियार ने अंधविश्वास और जातीय वर्चस्व पर करारा हमला किया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सदियों पुरानी भेदभाव की दीवारों को चुनौती दी और हमें ऐसा संविधान दिया जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की रक्षा करता है।
इनमें से कोई भी अपने समय की सत्ता का लाड़ला नहीं था। कई लोगों का मज़ाक उड़ाया गया। उन्हें समाज से अलग किया गया। जेल भेजा गया। देशद्रोही, विधर्मी या ख़तरनाक तक कहा गया। लेकिन इतिहास ने आख़िरकार सम्मान उन्हीं लोगों को दिया जिन्होंने सवाल पूछे, न कि उन्हें जिन्होंने सवाल दबाए।
भारत की आज़ादी की लड़ाई भी असहमति की मिसाल है। भगत सिंह ने कहा कि क्रांति विचारों से आती है। सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेज़ी हुकूमत को सीधी चुनौती दी। टीपू सुल्तान और छत्रपति शिवाजी महाराज ने विदेशी और दमनकारी सत्ता के सामने झुकने से इनकार किया। इन सबका संदेश एक था; अन्याय के सामने ख़ामोश रहना सबसे बड़ी ग़लती है।
आज लोकतंत्र उसी विरासत को आगे बढ़ाता है। सरकारें आती-जाती रहती हैं, लेकिन संविधान स्थायी है। इसी कारण संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक को अभिव्यक्ति की आज़ादी देता है। लोकतंत्र में नागरिक प्रजा नहीं होता और सरकार कोई ऐसी संस्था नहीं, जिससे सवाल न पूछा जा सके।
सर्वोच्च न्यायालय भी बार-बार यही बात दोहराता रहा है। केदारनाथ सिंह मामले में अदालत ने साफ़ कहा कि सरकार की आलोचना तब तक देशद्रोह नहीं है, जब तक वह हिंसा भड़काने की कोशिश न करे। श्रेय सिंघल मामले में अदालत ने इंटरनेट पर अभिव्यक्ति को दबाने वाले कानून को रद्द करते हुए कहा कि केवल चर्चा करना या किसी विचार का समर्थन करना अपराध नहीं हो सकता। हाल के वर्षों में भी सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि असहमति लोकतंत्र का सेफ़्टी वाल्व है। यदि यह वाल्व बंद कर दिया जाए तो एक दिन पूरा तंत्र फट सकता है।
यह बात हर सरकारी दफ़्तर की दीवार पर लिखी जानी चाहिए।
फिर भी हर कुछ साल बाद कुछ लोग यह खोज निकालते हैं कि सरकार से सवाल पूछना देशविरोध है। मानो सवाल पूछने से देश कमज़ोर हो जाता है और बिना सोचे-समझे ताली बजाने से देश मज़बूत हो जाता है।
अगर यही तर्क सही है, तो सबसे अच्छा डॉक्टर वह होगा जो कभी बीमारी न बताए। सबसे अच्छा पत्रकार वह होगा जो कभी बुरी ख़बर न छापे। और सबसे अच्छा न्यायाधीश वह होगा जो हर मुक़दमे में सरकार के पक्ष में फ़ैसला सुना दे।
सच्ची देशभक्ति ताली बजाने में नहीं, बल्कि चौकन्ना रहने में है। जो नागरिक ग़लत नीतियों पर सवाल उठाते हैं, वे अक्सर लोकतंत्र की रक्षा कर रहे होते हैं। लोकतंत्र आलोचना से बेहतर होता है, जबकि तानाशाही सिर्फ़ तारीफ़ पर पलती है।
भारत में व्यंग्य और हास्य भी हमेशा सत्ता को आईना दिखाने का ज़रिया रहे हैं। पुराने राजाओं के दरबार में विदूषक वह सच कह देता था, जिसे मंत्री भी कहने से डरते थे। जब विदूषक ख़ामोश हो जाए, तब राजा को हर ताली सच्ची लगने लगती है।
भारत की सबसे बड़ी ताक़त एक जैसी सोच नहीं, बल्कि विविधता है। यहाँ आस्तिक भी रहे, नास्तिक भी। संत भी हुए, संशयवादी भी। कवि भी हुए, क्रांतिकारी भी। तीन हज़ार साल से हम बहस करते आए हैं, फिर भी एक सभ्यता बने हुए हैं। यही हमारी असली पहचान है।
शांतिपूर्ण असहमति को दबाने से देश मज़बूत नहीं होता। केवल इतना होता है कि ग़लतियाँ समय पर दिखाई नहीं देतीं। आत्मविश्वास से भरी सरकार सवालों का जवाब तथ्यों से देती है। असुरक्षित सरकार कानून का डर दिखाती है।
इतिहास का फ़ैसला हमेशा दिलचस्प रहा है। हर पीढ़ी पहले अपने असहमत लोगों को गालियाँ देती है, फिर कुछ दशक बाद उन्हीं की मूर्तियाँ बनवाती है।
शायद समझदारी इसी में है कि मूर्ति बनाने से पहले उनकी बात सुन ली जाए।
असहमति ज़िंदाबाद।
क्योंकि असहमति लोकतंत्र की दुश्मन नहीं, उसकी सबसे पुरानी, सबसे बहादुर और सबसे वफ़ादार साथी है।
याद रहे: ” कमजोर लोकतंत्र शक्तिशाली तानाशाही से बेहतर होता है।”

आगरा में 61.88 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य, पर्यावरणविदों ने मांगा स्वतंत्र सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट

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आगरा । बारिश की पहली फुहार पड़ते ही सरकारी दफ्तरों में हलचल बढ़ जाती है। पौधों से भरे ट्रक निकल पड़ते हैं। अफसर हाथ में फावड़ा लेकर कैमरों के सामने मुस्कुराते हैं। नेता पौधे लगाते हैं। रिकॉर्ड बनते हैं। प्रेस विज्ञप्तियां जारी होती हैं। हर साल करोड़ों पौधे लगाने के नए दावे किए जाते हैं।

लेकिन कुछ महीने बाद वही धरती फिर सूनी दिखाई देती है। धूप पहले से ज्यादा चुभती है। सड़कों पर छांव कम होती जाती है। तब एक सवाल हर बार हवा में तैरता है, अगर हर साल करोड़ों पौधे लगाए जा रहे हैं, तो हरियाली आखिर गायब कहां हो रही है? क्या पेड़ धरती पर उग रहे हैं या सिर्फ सरकारी फाइलों में?

उत्तर प्रदेश सरकार ने 12 जुलाई को महावृक्षारोपण अभियान के तहत 35 करोड़ से अधिक पौधे लगाने का लक्ष्य रखा है। लगभग 30 सरकारी विभाग इसमें भाग लेंगे। उपमुख्यमंत्री ने प्रदेश के सभी जिलों में 150 हाईटेक नर्सरियां स्थापित करने की घोषणा की है, जिन पर करीब 150 करोड़ रुपये खर्च होंगे। सरकार का दावा है कि इस अभियान से नया गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनेगा।

आगरा भी इस मुहिम का बड़ा हिस्सा है। जिलाधिकारी मनीष बंसल ने सभी विभागों को इसे जन आंदोलन बनाने के निर्देश दिए हैं। 12 जुलाई को सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक पूरे जिले में वृक्षारोपण होगा। स्कूलों, कॉलेजों, ग्राम पंचायतों और कॉलोनियों में “एक स्कूल-एक गांव” थीम पर पौधे लगाए जाएंगे। स्वयंसेवी संस्थाएं, एनएसएस, रोटरी क्लब, लायंस क्लब, महिला समूह और हजारों विद्यार्थी भी इसमें शामिल होंगे।

इस वर्ष आगरा को 61 लाख 88 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य मिला है। इनमें वन विभाग 19.68 लाख और अन्य विभाग 42.20 लाख पौधे लगाएंगे। इससे पहले 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस पर भी लगभग 7.94 लाख पौधे लगाने का दावा किया गया था।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आगरा में 2018 में 20 लाख, 2019 में 28 लाख, 2020 में 38 लाख और 2021 में 45 लाख पौधे लगाए गए। वन विभाग का दावा है कि इनमें लगभग 70 प्रतिशत पौधे जीवित हैं।

यहीं से सवाल शुरू होता है।

अगर इतने पौधे सचमुच जीवित हैं, तो आगरा पहले से ज्यादा हरा-भरा क्यों नहीं दिखता? शहर का तापमान लगातार क्यों बढ़ रहा है? सड़कों के किनारे छायादार पेड़ क्यों कम होते जा रहे हैं? हर मानसून के बाद नया अभियान शुरू करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ती है?

रिवर कनेक्ट कैंपेन से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पेड़ जमीन पर कम और सरकारी कागजों में ज्यादा दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि वृक्षारोपण की सफलता पौधे लगाने से नहीं, बल्कि तीन-चार साल बाद उनके जीवित रहने से मापी जानी चाहिए।

कुछ वर्ष पूर्व यमुना किनारे हुई घटना आज भी लोगों को याद है। तत्कालीन महापौर नवीन जैन ने नदी की तलहटी में लगभग 12 हजार पौधे लगवाए थे। अगस्त में यमुना का जलस्तर बढ़ा और सभी पौधे बह गए। करोड़ों रुपये की मेहनत कुछ दिनों में पानी में समा गई। इस मामले की जांच आज तक पूरी नहीं हो सकी।

रिवर कनेक्ट कैंपेन की पद्मिनी अय्यर कहती हैं कि पौधे लगाना आसान है, लेकिन उन्हें बचाना मुश्किल। तीन वर्षों तक नियमित सिंचाई, सुरक्षा, खाद और निगरानी के बिना अधिकांश पौधे शुरुआती दौर में ही नष्ट हो जाते हैं। पौधे लगाने के बाद उनकी देखभाल अक्सर भगवान भरोसे छोड़ दी जाती है।

वरिष्ठ पर्यावरणविद् डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य कहते हैं कि ताज ट्रेपेजियम जोन में विकास के नाम पर हरियाली लगातार घटती गई है। यमुना एक्सप्रेसवे, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे, रिंग रोड, फ्लाईओवर, राष्ट्रीय राजमार्गों का चौड़ीकरण और नई कॉलोनियों ने हजारों पेड़ों की बलि ले ली। इसका असर केवल पर्यावरण पर नहीं, बल्कि ताजमहल की सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। राजस्थान की ओर से आने वाली धूल भरी हवाओं को रोकने वाली प्राकृतिक हरित पट्टी कमजोर होती जा रही है।

विडंबना यह है कि ताज ट्रेपेजियम जोन का गठन ही ताजमहल और पर्यावरण की रक्षा के लिए किया गया था। 1996 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद टीटीजेड में प्रदूषण रोकने, उद्योगों को स्थानांतरित करने और बड़े पैमाने पर ग्रीन बेल्ट विकसित करने की योजना बनी। राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) ने भी हरित क्षेत्र बढ़ाने की सिफारिश की थी। उस समय उम्मीद जगी थी कि आगरा फिर से हरियाली की चादर ओढ़ेगा।

लेकिन तीन दशक बाद तस्वीर निराशाजनक है। टीटीजेड में वन और हरित आवरण घटकर लगभग छह प्रतिशत या उससे भी कम रह गया है, जबकि राष्ट्रीय लक्ष्य 33 प्रतिशत है। 2021 की रिपोर्ट के अनुसार 2017 से 2019 के बीच वन क्षेत्र सिकुड़कर केवल 657.71 वर्ग किलोमीटर रह गया। कई तालाब और जलाशय सूख गए या प्रदूषण की चपेट में आ गए।

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को पेड़ लगाने के बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावों पर फटकार भी लगाई थी। दूसरी ओर अवैध पेड़ कटाई लगातार जारी रही। कई मामलों में अदालतों ने प्रति पेड़ 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया। इसके बावजूद विकास परियोजनाओं ने हरियाली को लगातार निगल लिया। इसी वर्ष राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भी टीटीजेड में पर्यावरणीय उल्लंघनों पर नोटिस जारी किया। हवा की गुणवत्ता में अपेक्षित सुधार नहीं आया। नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और सूक्ष्म धूल कणों का स्तर बढ़ता गया। कई पर्यावरण विशेषज्ञ अब टीटीजेड प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।

वृंदावन के पर्यावरण कार्यकर्ता जगन्नाथ पोद्दार कहते हैं कि कभी पूरे ब्रज में बारह बड़े वन हुआ करते थे। आज उनकी पहचान केवल धार्मिक ग्रंथों और स्थानों के नाम तक सीमित रह गई है। जंगलों की जगह अब सीमेंट और कंक्रीट का जंगल खड़ा हो गया है।

पर्यावरण प्रेमी एक और अहम सवाल उठाते हैं। जब हर साल एक्सप्रेसवे, नई सड़कें, हवाई अड्डे, टाउनशिप, मॉल और औद्योगिक परियोजनाएं हजारों एकड़ जमीन घेर रही हैं, तब हर साल करोड़ों नए पौधे लगाने के लिए इतनी खाली जमीन आखिर आती कहां से है?

एक और मुश्किल बंदरों की है। शहर और गांवों में लगाए गए हजारों पौधे बंदर उखाड़ देते हैं। कई जगह पशु भी पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं। पौधों के चारों ओर सुरक्षा जाली, नियमित सिंचाई और निगरानी के बिना उनकी जिंदगी ज्यादा लंबी नहीं होती।

ब्रज मंडल के पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने अब तक हुए सभी वृक्षारोपण अभियानों का स्वतंत्र सामाजिक और वैज्ञानिक ऑडिट कराने की मांग की है। उनका कहना है कि केवल पौधे लगाने की संख्या गिनना काफी नहीं है। हर पौधे को जियो-टैग किया जाए, उसकी तीन साल तक निगरानी हो और जीवित पौधों की सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाए। तभी जनता को असली तस्वीर मालूम होगी।
पेड़ लगाना आसान है। पेड़ बनाना मुश्किल। एक पौधे को विशाल वृक्ष बनने में वर्षों लगते हैं। उसे पानी, सुरक्षा और देखभाल चाहिए। यही जिम्मेदारी सबसे ज्यादा नदारद दिखाई देती है।
इस मानसून भी लाखों पौधे धरती में रोपे जाएंगे। कैमरे फिर चमकेंगे। रिकॉर्ड फिर बनेंगे। भाषण फिर होंगे। लेकिन असली परीक्षा अगले मानसून में होगी।

तब देश फिर वही सवाल पूछेगा; क्या इस बार पौधे सचमुच पेड़ बनेंगे, या हरियाली एक बार फिर सरकारी फाइलों की हरी स्याही तक ही महदूद रह जाएगी?

यमुना किनारे बैठा शहर पानी-पानी होने से पहले प्यासा क्यों हो रहा है?

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कानपुर । अगर कोई कहे कि नदी किनारे बसा शहर प्यासा मर सकता है, तो शायद लोग हंस पड़ें। लेकिन आगरा की कहानी मज़ाक नहीं, एक कड़वी हक़ीक़त है।

जुलाई आ चुकी है। मगर बादल जैसे रास्ता भूल गए हैं। न बिजली की गड़गड़ाहट, न बारिश की फुहार। खेतों में किसान रोज़ आसमान निहारते हैं। घरों में पानी की बाल्टियां गिनी जा रही हैं। ट्यूबवेल पहले से ज़्यादा गहराई तक सांसें खींच रहे हैं। हर दिन बेचैनी बढ़ रही है।

यमुना ताजमहल के कदम चूमती हुई बहती है। लेकिन उसी शहर के लाखों लोग पानी के लिए परेशान हैं। कभी जीवन देने वाली नदी आज सीवर, फैक्ट्रियों के कचरे और सरकारी लापरवाही का बोझ ढो रही है। गर्मियों में उसका हाल किसी थके हुए मुसाफ़िर जैसा हो जाता है।

बारिश ने इस बार साथ नहीं दिया। लेकिन सारा इल्ज़ाम मौसम पर डाल देना भी अपनी ग़लती से आंखें चुराना होगा।

सच यह है कि हमने धरती के नीचे का पानी ऐसे लुटाया, जैसे वह कभी खत्म ही नहीं होगा। जहां नई कॉलोनी बनी, वहां नया बोरवेल खोद दिया गया। होटल बने, लॉन हरे हुए, फव्वारे चले, स्विमिंग पूल भर गए। किसी ने यह नहीं पूछा कि इतना पानी आएगा कहां से।

भूजल किसी खानदानी जायदाद की तरह नहीं होता। वह बैंक खाते की तरह होता है। निकासी करते रहिए, लेकिन जमा मत कीजिए। एक दिन खाता खाली हो ही जाएगा। आगरा आज उसी दिन के दरवाज़े पर खड़ा है।

शहर की आबादी पचास लाख के करीब पहुंच गई है। हर साल लाखों सैलानी भी आते हैं। उद्योग बढ़ रहे हैं। अस्पताल, स्कूल और नई कॉलोनियां फैल रही हैं। पानी की मांग रोज़ बढ़ रही है।
हमारे दादा-दादी मिट्टी के घड़े भरते थे। आज हम ओवरहेड टैंक, वॉशिंग मशीन, कार वॉश, कूलर और स्विमिंग पूल भरते हैं। आराम बढ़ा है। लेकिन पानी की कीमत भी बढ़ गई है।

खेती भी बदल गई है। कम पानी वाली फसलों की जगह ज़्यादा पानी पीने वाली फसलें आ गई हैं। मौसम बेवफ़ा हो रहा है। लागत बढ़ रही है। किसान मजबूरी में और गहरे बोरवेल खोद रहा है। धरती देती जा रही है। इंसान लेता जा रहा है। यह सौदा ज़्यादा दिन नहीं चलेगा।

शहर भी अब बारिश का दुश्मन बन गया है। जहां कभी मिट्टी पानी सोख लेती थी, वहां अब कंक्रीट बिछी है। सड़कें हैं, मॉल हैं, पार्किंग हैं। बारिश होती है तो पानी नालों में भाग जाता है। एक हफ्ते बाढ़ का शोर मचता है। अगले हफ्ते पानी की कमी का रोना शुरू हो जाता है।

सबसे बड़ा नुकसान हमने अपने तालाबों का किया।

कभी आगरा के आसपास लगभग हर गांव का अपना तालाब होता था। वही बारिश का पानी रोकता था। वही कुओं को जिंदा रखता था। वही मवेशियों की प्यास बुझाता था। आज कई तालाब नक्शों से तो नहीं, लेकिन ज़मीन से गायब हो चुके हैं। उन पर इमारतें खड़ी हैं या कूड़े के पहाड़।

हमने सिर्फ़ तालाब नहीं खोए। हमने सूखे से लड़ने की अपनी सदियों पुरानी अक्ल भी दफ़ना दी।

यमुना की सहायक नदियों का हाल भी कम दर्दनाक नहीं है। कहीं उन पर कब्ज़ा है, कहीं वे नाले बन चुकी हैं। नदी अकेले नहीं जीती। उसकी सहायक धाराएं उसकी सांस होती हैं। सांसें बंद हों तो सबसे ताकतवर इंसान भी नहीं बचता। यही हाल नदियों का भी है।

उधर शहर रोज़ लगभग 286 मिलियन लीटर सीवेज पैदा करता है। शोधन संयंत्र बढ़े हैं, लेकिन अभी भी बड़ी मात्रा में गंदा पानी यमुना में गिर रहा है। हम एक तरफ़ नदी से पानी मांगते हैं, दूसरी तरफ़ उसी में ज़हर घोलते हैं। इससे बड़ा विरोधाभास और क्या होगा?

फिर भी तस्वीर पूरी तरह मायूस करने वाली नहीं है।

आगरा ने शोधित जल के दोबारा इस्तेमाल की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। नौ सीवेज शोधन संयंत्र 220 एमएलडी से अधिक क्षमता के साथ काम कर रहे हैं। तीन और बन रहे हैं। अब शोधित पानी खेतों, रेलवे, मेट्रो स्टेशनों, पार्कों और कीठम झील तक पहुंचाने की योजना आकार ले रही है।

जगनपुर-दयालबाग संयंत्र से किसान सिंचाई कर रहे हैं। पीलाखार का पानी वेस्ट-टू-एनर्जी परियोजना में इस्तेमाल हो रहा है। धांधूपुरा, जगनपुर और बिचपुरी संयंत्रों से शोधित जल रेलवे, मेट्रो और कीठम झील तक पहुंचेगा। लगभग 93 करोड़ रुपये की इन परियोजनाओं से रोज़ 42 एमएलडी पानी दोबारा काम आएगा।

गंगा जल परियोजना ने भी कुछ राहत दी है। लेकिन सच यही है कि कोई भी पाइपलाइन इंसानी लापरवाही की भरपाई नहीं कर सकती।

सरकार अपनी जगह है। योजनाएं अपनी जगह हैं। लेकिन पानी बचाने का असली आंदोलन घर से शुरू होगा।

हर छत पर वर्षा जल संचयन होना चाहिए। हर तालाब को दोबारा ज़िंदा करना होगा। भूजल की अंधाधुंध निकासी रोकनी होगी। खेतों में कम पानी वाली खेती को बढ़ावा देना होगा। रिसती पाइपलाइनें ठीक करनी होंगी। यमुना के बाढ़ क्षेत्र और आर्द्रभूमियों को बचाना होगा।

इतिहास ने आगरा को ताजमहल दिया। यमुना ने उसे जीवन दिया। सवाल यह है कि क्या हम इस विरासत को बचा पाएंगे?

कमज़ोर मानसून असली मुसीबत नहीं है। वह तो सिर्फ़ ख़तरे की घंटी है। मुसीबत तब होगी, जब घंटी बजती रहे और हम यह सोचकर बैठे रहें कि अगला बादल आएगा और सारी परेशानियां अपने साथ बहा ले जाएगा।

बादल शायद फिर लौट आएं। लेकिन अगर पानी बचाने की अक्ल नहीं लौटी, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ़ नहीं करेंगी।

अंजीर का पत्ता: क्या हम अपने इतिहास से शर्मिंदा हैं?

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दिल्ली । देश इस समय महंगाई, बेरोजगारी, प्रदूषण और बुनियादी ढांचे जैसी बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है। लेकिन इसी बीच की कक्षा 9 की कला शिक्षा की पुस्तक मधुरिमा ने एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया, जिसने शिक्षा, इतिहास और संस्कृति पर नई बहस छेड़ दी।

मामला मोहनजोदड़ो की विश्वप्रसिद्ध “डांसिंग गर्ल” कांस्य प्रतिमा का है। यह साढ़े चार हजार वर्ष पुरानी कलाकृति भारतीय पुरातत्व की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में से एक है। वर्षों से यह अपने मूल स्वरूप में पाठ्यपुस्तकों में प्रकाशित होती रही, लेकिन इस बार इसके धड़ पर डिजिटल छाया डालकर उसे ढक दिया गया। इतिहासकारों और शिक्षाविदों ने इसे ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ बताया। बढ़ते विवाद के बाद एनसीईआरटी ने मूल चित्र बहाल करने का फैसला लिया।

इतिहासकार ने कहा, “यह एक काल्पनिक कलाकृति बनाने जैसा है। माइकलएंजेलो की डेविड प्रतिमा पर गिरजाघर द्वारा अंजीर का पत्ता चिपकाने जैसा।” यह टिप्पणी केवल एक उपमा नहीं थी। उसने पूरे विवाद का सार सामने रख दिया।

यह केवल एक तस्वीर का विवाद नहीं, बल्कि उस सोच का सवाल है जो इतिहास को उसकी असल शक्ल में देखने से हिचकती है। अगर किसी ऐतिहासिक कलाकृति को आज के नैतिक चश्मे से बदलना शुरू कर दिया जाए, तो कल किसी मूर्ति का हाथ, किसी चित्र का चेहरा या किसी शिलालेख की पंक्तियां भी बदली जा सकती हैं। तब इतिहास तथ्य नहीं रहेगा, बल्कि हमारी सुविधानुसार गढ़ी गई कहानी बन जाएगा।

दुनिया का अनुभव भी यही बताता है। यूरोप में कभी अनेक मूर्तियों और चित्रों को नैतिकता के नाम पर ढक दिया गया था। बाद में विद्वानों ने माना कि इससे कला और इतिहास दोनों के साथ अन्याय हुआ। संग्रहालयों ने मूल स्वरूप को फिर से अपनाया और यह स्वीकार किया कि इतिहास को बदलने के बजाय उसे समझाना ही बेहतर रास्ता है।

स्कूल की किताबों में बच्चों की उम्र और संवेदनशीलता का ध्यान रखना निश्चित रूप से ज़रूरी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि प्रमाणिक ऐतिहासिक वस्तुओं को ही बदल दिया जाए। अगर किसी कलाकृति के बारे में अतिरिक्त व्याख्या की आवश्यकता है, तो वह पाठ, टिप्पणी या शिक्षक के माध्यम से दी जा सकती है। शिक्षा का उद्देश्य सच से परिचित कराना है, सच पर पर्दा डालना नहीं।

एक प्रमुख अखबार ने इस पूरे घटनाक्रम को “इतिहास पर फ़ोटोशॉप” कहा। यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि डिजिटल संपादन केवल तस्वीर नहीं बदलता, बल्कि देखने वाले की समझ भी बदल देता है। विद्यार्थी वही सच मानते हैं जो उनकी पाठ्यपुस्तक में छपा होता है। इसलिए पाठ्यपुस्तकों में तथ्य और प्रमाणिकता की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।

भारतीय सभ्यता ने मानव शरीर को कभी शर्म का विषय नहीं माना। और के मंदिर, और की भित्तिचित्र कला और मूर्तियां इसी सोच की गवाह हैं। इनमें शरीर को वासना नहीं, बल्कि जीवन, सौंदर्य, सृजन और प्रकृति के प्रतीक के रूप में देखा गया। यही हमारी सांस्कृतिक विरासत की सबसे बड़ी खूबी रही है।

विडंबना यह है कि हम दुनिया भर में योग, आयुर्वेद और अपनी प्राचीन सभ्यता पर फ़ख्र करते हैं, लेकिन उसी विरासत की कलात्मक अभिव्यक्तियों को देखकर असहज हो जाते हैं। यह विरोधाभास हमारी सांस्कृतिक समझ पर भी सवाल खड़ा करता है।

एक हिस्टोरियन ने सही कहा, “अगर नृत्यांगना को अपनी असली शक्ल में नहीं दिखाया जा सकता, तो भारतीय कला का अध्ययन कैसे होगा?” यह प्रश्न केवल एक प्रतिमा का नहीं, बल्कि पूरे इतिहास बोध का है।

पाठ्यपुस्तकें केवल परीक्षा पास कराने का साधन नहीं होतीं। वे आने वाली पीढ़ियों की सोच, समझ और दृष्टि का निर्माण करती हैं। अधूरा या संशोधित इतिहास अंततः अधूरी समझ ही पैदा करता है। हमारी सभ्यता हजारों वर्षों तक इसलिए जीवित रही क्योंकि उसमें आत्मविश्वास था, जिज्ञासा थी और सच का सामना करने का साहस था।

इसलिए इतिहास को अंजीर के पत्ते से ढकने के बजाय उसकी मूल गरिमा के साथ प्रस्तुत करना चाहिए। संवेदनशीलता आवश्यक है, लेकिन सत्य उससे भी अधिक आवश्यक है। सच से आँखें चुराने वाली शिक्षा कभी आत्मविश्वासी समाज का निर्माण नहीं कर सकती।

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