Historic MoU Signed Between Patanjali Yogpeeth and the Government of Russia

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• India and Russia are inseparable friends from spiritual, religious, economic, political, and social perspectives and will continue to remain so: Swami Ramdev

• A significant agreement with the Russian Government on key aspects such as expansion of wellness, yoga and Ayurveda in Russia, spiritual and cultural ties between Russia and India, and exchange of skilled labour

• We will strengthen our partnership with Patanjali: Sergey Cheremin

New Delhi: A significant Memorandum of Understanding (MoU) was signed in Delhi between the Patanjali Group and the Government of Russia. The MoU was signed on behalf of the Patanjali Group by Swami Ramdev ji, and on behalf of the Government of Moscow (Russia) by Mr. Sergey Cheremin, Chairman of the Indo-Russia Business Council and Minister of Commerce of Russia.

Addressing the programme, Swami Ramdev ji said that this MoU focuses on the promotion of health and wellness, health tourism, exchange of skilled human resources, and research-related initiatives. He stated that people in Russia appreciate and actively practice yoga, Ayurveda, and naturopathy. He further said that our foremost goal is to take this wellness science of the sages to nearly 200 countries across the world, with Russia serving as the entry point.

The first major objective of this MoU is to expand Patanjali’s wellness services in Russia. Together with Russia, in-depth research will be conducted on reversing ageing and enhancing longevity, enabling the early detection of serious illnesses years before they manifest in the human body. The second objective is to share India’s spiritual knowledge, culture, yoga, Ayurveda, and invaluable heritage with Russia. For this purpose, India’s cultural and sage traditions will be taken to Russia.

The third objective of the MoU is to provide Russia with skilled labour and trained yogis from India. Under the Prime Minister’s Skill Development Scheme, Patanjali has been the only private partner to have trained more than two lakh people. Patanjali will supply skilled yogis and trained workers to Russia. Additionally, under this MoU, leading Indian brands will be promoted in Russia and Russian brands in India. The world-class Patanjali brand will be taken to Russia, enabling Russian citizens to benefit from Patanjali’s high-quality products.

Swami Ramdev ji stated that India and Russia are friendly nations. India has had an emotional connection with Russia even before independence, which continues to this day. People in India recognize Russian President Mr. Vladimir Putin as a strong global leader, and the world is well aware of his courage, bravery, and valor. Some influential people are unhappy with the friendship between India and Russia, but under all circumstances, Russia was, is, and will remain India’s friend. From spiritual, religious, economic, political, and social perspectives, India and Russia are inseparable friends and will continue to be so.

On this occasion, Mr. Sergey Cheremin said that they will strengthen their partnership with Patanjali. He said that by adopting Patanjali’s yoga, Ayurveda, and naturopathy, they aim to transform the lifestyle of the people of Russia and make them healthier and disease-free.

दण्डक्रम परायण का आधुनिक विज्ञान के नजरिए से विश्लेषण

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गिरीश जोशी

वेद मंत्र

पूज्य स्वामी युक्तेश्वर गिरी जी ने अपनी पुस्तक साइंस ऑफ रिलीजन में लिखते है “सृष्टि का मूल कंपन (Vibration) है”और जब यह कंपन सुना जाता है तो इसे नाद कहा जाता है। सृष्टि रचना में सर्वप्रथम ईश्वर द्वारा सूक्ष्म कम्पन-इच्छा (स्पंदन)उत्पन्न होती है। इससे आकाश तत्त्व उत्पन्न होता है। आकाश का गुण शब्द है।

ब्रह्मांड में सभी तत्त्वों के अपने-अपने स्पन्दन (vibratory patterns) हैं। सूर्य, तारे, ग्रह, पंचमहाभूत, मानव शरीर एवं चक्र सब विशिष्ट आवृत्तियों पर स्पंदित हैं। ऋषि इन स्पन्दनों को “श्रुति” रूप में सुनते थे। वे ध्यान से मिली समाधि अवस्था में ब्रह्मांडीय कम्पन को आध्यात्मिक कान (divine inner hearing) से सुनते थे। यही सुने गए मंत्र “श्रुति” तथा आगे वेद मंत्र कहलाए। वेद मंत्र विशिष्ट ध्वनि, विशिष्ट आवृत्ति, विशिष्ट स्पन्दन का कुल योग है। स्वामीजी के अनुसार वेद मंत्र ब्रह्मांडीय स्पन्दनों की ध्वन्यात्मक संरचना हैं। आगे वे कहते है वेद-मंत्र ब्रह्मांडीय कंपन का ‘मानवीय शब्द-रूप’ है।

महर्षि महेश योगी के अनुसार वेद मंत्र पूर्णतः वैज्ञानिक और प्राकृतिक नियमों (Laws of Nature) का शुद्ध स्वरूप है । वे कहते हैं कि जैसे गुरुत्वाकर्षण प्रकृति का नियम है, वैसे ही वेद के मंत्र भी प्रकृति की आंतरिक संरचना का वर्णन हैं।

वेद प्रकृति की परिपूर्ण कार्यप्रणाली का सूक्ष्म गणित है। वे वेद मंत्रों को science of natural law कहते थे। वे अक्सर कहते थे कि वेद प्रकृति के नियमों का पूर्ण कोड (complete code) है।

वेद मंत्रों का प्रभाव

प्रत्येक वेद मंत्र एक विशिष्ट कम्पन (vibration) उत्पन्न करता है।ये कम्पन मानव शरीर, मन और पूरे परिवेश पर प्रभाव डालते हैं।
इन मंत्रों का सही मंत्र-उच्चारण, प्राण, मन, नाड़ी, चक्र को विशेष कम्पन-मिलन (resonance) में लाता है।

ॐ ब्रह्मांड की मूल आवृत्ति (Cosmic Frequency) है।
सभी वेद मंत्र इसी मूल-आवृत्ति से जुड़े उप-तरंग (sub-harmonics) हैं।मानव शरीर एक “ब्रह्मांडीय रिसीवर” है।शरीर में 72,000 नाड़ियाँ, 7 चक्र है।
सब ध्वनि-आधारित कंपन-संवेदी प्रणाली की तरह काम करते हैं।
इसलिए मंत्र और नाद शरीर को नाड़ी-स्तर पर प्रभावित करते हैं ।
जैसे कोई ट्यूनिंग फोर्क एक विशेष आवृत्ति पर ट्यून हो जाता है।

वैदिक मंत्रों की मात्राएँ, स्वर, दीर्घ-ह्रस्व, विराम, लय, एक fixed vibratory pattern हैं । मंत्र का प्रभाव कंपन द्वारा होता है, शब्दार्थ से नहीं। वे कहते हैं कि “मंत्र का फल अर्थ से नहीं, स्पन्दन से उत्पन्न होता है।” मंत्र ऊर्जा-केन्द्र (चक्र) को सक्रिय करते हैं

दण्ड पारायण

“दण्ड” का अर्थ है खंड , अनुच्छेद या स्टेप, किसी मंत्र, सूक्त, या स्तोत्र को निश्चित छोटे-छोटे खंडों (दण्डों) में विभाजित करके पढ़ने को दण्डक्रम कहा जाता है। मंत्र के हर शब्द / वाक्यांश को सम्पूर्ण स्वर-वर्ण, मात्रा, उच्चारण के साथ व्यवस्थित क्रम में पढ़ा जाता है। दण्डक्रम में एक मंत्र या श्लोक को कई विन्यासों/खंडों में पढ़ा जाता है।ध्वनि-तरंगें हर विन्यास में अलग पैटर्न बनाती हैं।

उदाहरण के लिए
मंत्र A B C D E F है, तो दण्डक्रम में इसे इस प्रकार पढ़ा जाएगा:
दण्ड 1: A, दण्ड 2: A B, दण्ड 3: B C, दण्ड 4: C D, दण्ड 5: D E
, दण्ड 6: E F, दण्ड 7: F
यानी हर पाठ में कंपन का आरम्भ, मध्य, और समाप्ति बदल जाती है, जिससे मंत्र के पूरा स्पंदन-क्षेत्र (vibration field) सक्रिय होता है। यह वैदिक ध्वनि-विज्ञान का अत्यंत वैज्ञानिक पक्ष है।प्राचीन वैदिक ध्वनि-विज्ञान को आधुनिक विज्ञान की शब्दावली जैसे एकोस्टिक्स, न्यूरोसाइंस, और रिज़ोनेंस (अनुनाद) के सिद्धांतों से जोड़कर समझा जा सकता है। दण्डक्रम संरचित(Structured) ध्वनि-कंपन तकनीक है।

प्राचीन ग्रंथों के अनुसार नाद का अर्थ सिर्फ “सुनाई देने वाली ध्वनि” नहीं है होती है। वह तो sound, energy, vibration, resonance का संयुक्त रूप है।

आधुनिक विज्ञान की परिभाषिक शब्दावली के अनुसार नाद यानी निर्दिष्ट आवृत्ति (frequency),स्वर अर्थात ध्वनि का आयाम (amplitude), उच्चारण का मतलब तरंग आकृति (waveform) और मात्रा का अर्थ समय-लय (time domain) है।दण्डक्रम में इन सबका संयोजन अत्यंत सटीक रूप से किया जाता है।

पतंजलि योग सूत्र के अनुसार मूलाधार से सहस्त्रार तक सात चक्रों में कुंडलनी शक्ति का प्रवास निर्बाध तरीके से हो इसके लिए इन चक्रों का शुद्धिकरण आवश्यक होता है। चक्रों के शुद्धिकरण के लिए अनेक प्रविधियों की खोज हमारे ऋषि मुनियों ने की थी। उसी का एक प्रकार दण्डक्रम है। इसमें वेद मंत्रो के स्वरों की पुनरावृत्ति से आज्ञा चक्र कंपन-दृष्टि (inner clarity), अनाहत –भाव और करुणा का विस्तार, विशुद्धि – वाणी/ध्वनि का शुद्धिकरण,मूलाधार – स्थिरता, मणिपुर से ऊर्जा संतुलित होते हैं।

दण्डक्रम पारायण का उद्देश्य

मंत्र के कंपन और स्वर-शुद्धि को स्थापित करना है। दण्डक्रम से स्वर, उच्चारण, मात्रा, नाद, अनुप्रास सब पूर्ण रूप से शुद्ध होते हैं। मंत्र-शुद्धि, मन-प्राण की स्थिरता,आध्यात्मिक उन्नति, ध्वनि-ऊर्जा का अधिकतम लाभ प्राप्त होता है।

एकाग्रता में वृद्धि

दण्डक्रम में एकाग्रता बहुत अधिक लगती है। इससे मन स्थिर होता है, प्राण (life-force) संतुलित होता है,चेतना परिष्कृत होती है।

स्मरण-शक्ति का परिष्कार होता है क्योंकि एक ही मंत्र को अलग-अलग विन्यासों में पढ़ना होता है, इससे स्मरण-शक्ति (memory) बढ़ती है, भाषिक परिशुद्धि आती है,पाठक की क्षमता बढ़ जाती है। यह प्राचीन गुरुकुलों में अनिवार्य विद्या थी।

दंडक्रम के प्रकार

दण्डक्रम पारायण कई स्थानों पर किया जाता है जैसे रुद्रम दण्डक्रम(शिवोपासना में), चमक दण्डक्रम, वेदिक सूक्त दण्डक्रम,श्रीसूक्त दण्डक्रम,नारायणसूक्त दण्डक्रम
महानारायणोपनिषद् पारायण आदि।

दण्डक्रम वैज्ञानिक इसलिए है क्योंकि इसमें मंत्र की हर ध्वनि को ‘रोटेशनल कम्पन’ मिलता है।पहली बार मंत्र शुरुआत से कंपन भेजता है,फिर मध्य से,फिर अंत से,फिर आधार से ऊर्ध्वगामी यानी ऊपर ,फिर ऊर्ध्व से आधारगामी यानी नीचे। इससे एक ही मंत्र की वाइब्रेशन की ऊर्जा अनेक कोणों से शरीर में प्रवेश करती है।इसे भारतीय नाद-विज्ञान में “बहुदिशात्मक कंपन (multi-directional resonance)” कहते हैं।

दण्डक्रम, नाड़ियों में ‘Standing Waves’ उत्पन्न करता है।ध्वनि के बार-बार दोहराव से शरीर की नाड़ियों और चक्रों में Standing Wave Patterns
(स्थिर तरंगें), Constructive Interference(ध्वनियों का सहयोग), Resonance Peaks(उच्चतम अनुनाद) बनते हैं।इससे नाड़ियाँ खुलती हैं, प्राण का प्रवाह संतुलित होता है, चित्त स्थिर होता है।

दण्डक्रम की संरचना ऐसी है कि
मस्तिष्क की तरंगें (brain waves) मंत्र के पैटर्न के साथ सिंक्रोनाइज़ होने लगती हैं।पहले बीटा →vअल्फ़ा,
फिर अल्फ़ा → थीटा, गहरे अभ्यास में थीटा→ गामा में परिवर्तन होता है। यह वही अवस्था है जो ध्यान के उच्च स्तर एवं समाधि की दहलीज मानी जाती है।

ईश्वर का प्रथम ‘स्पन्दन’

परमहंस योगानंद जी लिखते हैं कि जब निराकार ईश्वर इच्छा करता है कि “मैं अनेक बनूँ” (“एकोऽहं बहुस्याम”) तभी उसमें एक सूक्ष्म आत्मिक कंपित स्पन्दन उत्पन्न होता है। यह स्पन्दन ही प्रकृति (Cosmic Nature), प्राण (CosmicEnergy), सृष्टि के तत्त्व का मूल बनता है।समस्त ब्रह्मांड इसी स्पन्दन से बना है।

वे कहते हैं कि परमाणुओं का नृत्य, तारों का जन्म, मन की गति, कर्म का प्रवाह, सब उसी एक कॉस्मिक स्पन्दन के विविध रूप हैं।

स्पन्दन का अंत ईश्वरानुभूति

जब साधक अपने मन, प्राण, इन्द्रियों को योग के द्वारा स्थिर कर लेता है, तो वह स्पन्दन के क्षय का अनुभव करता है। स्पन्दन मिटते ही साधक, निराकार, चिदानन्द ब्रह्म को अनुभव करता है जिसे योगानंद जी “God beyond creation vibration” कहते हैं।

योगानंद जी के अनुसार “जहाँ नाद है वहाँ ईश्वर-शक्ति है और जहाँ स्पन्दन का अंत है वहाँ ईश्वर स्वयं है।”

इसलिए दण्डक्रम पारायण भी वेद मंत्रों को विशिष्ट क्रम में पढ़ने,अपने सप्त चक्र को शुद्ध करने, ईश्वर को जानने और उसी के साथ एकाकार होने की अब तक खोजी गई पद्धतियों में से एक महत्त्वपूर्ण पद्धति है। जिसे देवव्रत महेश रेखे ने अपने गुरु के मार्गदर्शन में अपनी कड़ी लगन और कठिन परिश्रम से 200 वर्षों के बाद पुनः इस विश्व को स्मरण करवाया है।

नवोत्थान के क्षितिज पर गहन मंथन : प्रेरणा विमर्श 2025 की प्रेस वार्ता सम्पन्न

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नोएडा | 7 जनवरी 2025| प्रेरणा विमर्श 2025 के संदर्भ में आज प्रेरणा भवन, सेक्टर 62, नोएडा में एक प्रभावी प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रेरणा विमर्श 2025 के अध्यक्ष श्री अनिल त्यागी जी ने की।

विमर्श की सचिव श्रीमती मोनिका चौहान जी ने 12 दिसंबर को आयोजित होने वाले ‘नारी शक्ति राष्ट्र वंदना यज्ञ’ की रूपरेखा विस्तार से प्रस्तुत की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, मेरठ प्रांत के सह-प्रचार प्रमुख श्री अनिल त्यागी जी ने अब तक सम्पन्न हुए पाँच विमर्शों की महत्वपूर्ण जानकारी साझा की।

विमर्श 2025 के संयोजक श्री श्याम किशोर जी ने इस वर्ष के विमर्श की संकल्पना और उद्देश्य का विस्तृत परिचय देते हुए बताया कि संघ के शताब्दी वर्ष में विमर्श का केंद्रीय विषय ‘नवोत्थान के नए क्षितिज’ रखा गया है। उन्होंने कहा कि भारत एक नए युग में प्रवेश कर चुका है—आकांक्षी भारत, आत्मविश्वासी भारत और विकसित भारत की दिशा में तेज़ी से बढ़ता हुआ भारत।

इसी भाव को केंद्र में रखते हुए 13–14 दिसंबर को सेक्टर 62 स्थित एनआईओएस के क्षेत्रीय कार्यालय, कल्याण सिंह सभागार में दो दिनों का गहन मंथन आयोजित किया जाएगा। इसके लिए छह सत्र निर्धारित किए गए हैं—
वैचारिक, सांस्कृतिक, रक्षा, आर्थिक, वैश्विक और सामाजिक क्षेत्र। इन सभी क्षेत्रों में उभरते नए विचारों, परिवर्तनों और दृष्टि-बिंदुओं पर विशिष्ट वक्ता गहन विमर्श करेंगे।

विमर्श में भाग लेने वाले प्रमुख वक्ताओं में—
प्रख्यात अभिनेता एवं रंगकर्मी श्री मनोज जोशी जी, अंतरराष्ट्रीय शिल्पकार श्री नरेश कुमावत जी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य श्री रुपेश कुमार जी, सह-प्रचार प्रमुख श्री प्रदीप जोशी जी, राज्यसभा सांसद डॉ. मीनाक्षी जैन जी, संघ के सह सेवा प्रमुख श्री राजकुमार मटाले जी, प्रचार टोली सदस्य श्री राजीव तुली जी, नेटवर्क 18 के एंकर श्री आनंद नरसिम्हन जी, इंडिया टीवी की एंकर श्रीमती मीनाक्षी जोशी जी, वरिष्ठ पत्रकार श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी जी, श्री हरीष वर्णवाल जी, रक्षा विशेषज्ञ श्री राजीव नयन जी, संसद टीवी के लोकप्रिय एंकर श्री प्रतिबिम्ब शर्मा जी, श्री रामवीर श्रेष्ठ जी एवं अनेक अन्य विशिष्ट व्यक्तित्व शामिल होंगे।

विमर्श के साथ इस विषय से संबंधित एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी। साथ ही, गत वर्ष के ‘पंच परिवर्तन’ विषयक विमर्श पर आधारित पुस्तक का विमोचन भी किया जाएगा। कार्यक्रम में पत्रकार, मीडिया शिक्षाविद, मीडिया विद्यार्थी, शोधार्थी, प्रबुद्ध नारी शक्ति, विश्वविद्यालयों के शिक्षक एवं ‘पंच परिवर्तन’ के योद्धा बड़ी संख्या में सहभागी होंगे।

ज्ञात हो कि चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण तथा मीडिया व पत्रकारिता के क्षेत्र में राष्ट्रवादी और सामाजिक मूल्यों को विकसित करने के लिए सूचना में शिक्षा प्रचार प्रसार के उद्देश्य से प्रेरणा शोध संस्थान का गठन सन 1917 में किया गया। संस्थान के तत्वाधान में वर्ष 2020 से प्रतिवर्ष अलग-अलग विषयों पर अबतक पांच प्रेरणा विमर्श कार्यक्रम आयोजित हो चुके हैं। अब आयोजित हो रहा यह छठा प्रेरणा विमर्श है।

प्रेस वार्ता के अंत में उपस्थित मीडिया प्रतिनिधियों से राष्ट्र निर्माण के इस महत्त्वपूर्ण अभियान में सहयोग करने और विमर्श को सफल बनाने का आह्वान किया गया।
अंततः विमर्श 2025 के अध्यक्ष श्री अनिल त्यागी जी ने सभी उपस्थित अतिथियों और पत्रकारों का हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित किया।

भारत की आर्थिक विकास दर ने पूरे विश्व को चौंकाया

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ग्वालियर : वित्तीय वर्ष 2025-26 की द्वितीय तिमाही में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 8.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 5.6 प्रतिशत रही थी। विशेष रूप से विनिर्माण एवं सेवा के क्षेत्र में वृद्धि दर अतुलनीय रही है। विनिर्माण के क्षेत्र में वित्तीय वर्ष 2024-25 की द्वितीय तिमाही में 2.2 प्रतिशत की वृद्धि दर रही थी जो वर्ष 2025-26 की द्वितीय तिमाही में बढ़कर 9.1 प्रतिशत की हो गई है। इसी प्रकार, सेवा क्षेत्र में भी वृद्धि दर 9.2 प्रतिशत की रही है। वित्तीय, रियल एस्टेट एवं प्रोफेशनल सेवाओं में तो वृद्धि दर बढ़कर 10.2 प्रतिशत (पिछले वर्ष इसी अवधि में 7.2 प्रतिशत) एवं जन प्रशासन, डिफेंन्स एवं अन्य सेवाओं में वृद्धि दर 9.7 प्रतिशत (पिछले वर्ष 8.9 प्रतिशत) की रही है। व्यापार, होटल, यातायात एवं कम्यूनिकेशन में भी वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत (पिछले वर्ष 6.1 प्रतिशत)। केंद्र सरकार के उपक्रमों एवं डिफेन्स के क्षेत्र में भी 16 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है। कृषि क्षेत्र में जरूर वृद्धि पिछले वर्ष 4.1 प्रतिशत की तुलना में इस वर्ष घटकर 3.5 प्रतिशत हो गई है एवं कन्स्ट्रक्शन क्षेत्र में भी वृद्धि दर पिछले वर्ष 8.4 प्रतिशत की तुलना में इस वर्ष घटकर 7.2 प्रतिशत रही है।

जैसे ही वित्तीय वर्ष 2025-26 की द्वितीय तिमाही के सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़े जारी हुए कुछ मूर्धन्य पत्रकार तुरन्त अपने आंकलन के साथ मीडिया में उपस्थित हो गए एवं अपनी प्रतिक्रिया में यह बताने का प्रयास करने लगे कि भारत की आर्थिक विकास दर तो इतनी तेज गति से आगे बढ़ ही नहीं सकती। क्योंकि, वैश्विक स्तर पर इतनी विपरीत परिस्थितियों के बीच एवं विकसित देशों में विकास की धीमी दर एवं कुछ देशों में तो विकास दर के ऋणात्मक रहने के चलते (OECD देशों की आर्थिक विकास दर 2 प्रतिशत के भी नीचे है), भारत की आर्थिक विकास दर 8 प्रतिशत के ऊपर कैसे रह सकती है। साथ ही, विभिन्न वित्तीय संस्थानों यथा, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, एशियाई विकास बैंक, विश्व व्यापार संगठन के साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक ने भी वित्तीय वर्ष 2025-26 की द्वितीय तिमाही में भारत की आर्थिक विकास दर को 7 प्रतिशत के आसपास रहने का अनुमान जताया था। फिर, भारत की आर्थिक विकास इस अवधि में 8.2 प्रतिशत कैसे रह सकती है?

हाल ही के समय में केंद्र सरकार ने भारत में आर्थिक क्षेत्र को मजबूत बनाने के उद्देश्य से वित्तीय क्षेत्र में कई सुधार कार्यक्रम लागू किए हैं। इन सुधार कार्यक्रमों का असर अब भारत की आर्थिक विकास दर में तेजी के रूप में दिखाई देने लगा है। आयकर की सीमा को बढ़ाकर 12 लाख रुपए प्रति वर्ष कर दिया गया है और इसे वित्तीय वर्ष 2025-26 में लागू किया जा चुका है। भारत में 95 प्रतिशत से अधिक उत्पादों पर वस्तु एवं सेवा कर की दरों को (लगभग 10 प्रतिशत तक) कम कर दिया गया है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ब्याज दरों (रेपो दर) में एक प्रतिशत की कटौती की जा चुकी है एवं दिसम्बर 2025 माह में 25 आधार बिंदुओं की एक और कटौती की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। केंद्र सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा भारत की मातृशक्ति के बैंक खातों, किसानों के बैंक खातों एवं गरीब वर्ग के बैंक खातों में सीधे ही सहायता की राशि जमा की जा रही है। साथ ही, भारत के लगभग 65 करोड़ नागरिकों को मुफ्त अनाज प्रति माह उपलब्ध कराया जा रहा है। उक्त उपायों का स्पष्ट असर यह हो रहा है कि भारत के दूर दराज इलाकों में निवासरत गरीब वर्ग के हाथों में सीधे पैसा पहुंच रहा है, जिससे उनकी क्रय शक्ति बढ़ रही है एवं वे इस पैसे से कई प्रकार के उत्पादों का सेवन करने लगे हैं और जिससे अंततः देश में इन उत्पादों की मांग में भारी वृद्धि दृष्टिगोचर हुई है। भारत में निजी उपभोग भी वित्तीय वर्ष 2024-25 की द्वितीय तिमाही के 4.2 प्रतिशत की वृद्धि की तुलना में वित्तीय वर्ष 2025-26 की द्वितीय तिमाही में 8 प्रतिशत से बढ़ा है। साथ ही केंद्र सरकार के पूंजीगत खर्चों में भी 31 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज हुई है, जिससे रोजगार के नए अवसर निर्मित हुए हैं एवं उत्पादों की मांग में वृद्धि दर्ज हुई है।

उक्त कारणों के साथ ही, भारत में धार्मिक पर्यटन में भी भारी वृद्धि हुई है। अब, कई श्रद्धालु परिवार भारत के अयोध्या में प्रभु श्रीराम के नवनिर्मित मंदिर के दर्शन हेतु प्रति माह लाखों की संख्या में पहुंच रहे हैं। इसी प्रकार, वाराणसी स्थित भगवान भोलेनाथ मंदिर, उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर, जम्मू में माता वैष्णो देवी मंदिर, दक्षिण में भगवान तिरुपति बालाजी मंदिर, ओड़िसा के पुरी में स्थित मंदिर, उत्तराखंड स्थित गंगोत्री, यमुनोत्रि, केदारनाथ मंदिर, बद्रीनाथ मंदिर आदि मंदिरों में लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने हेतु पहुंच रहे हैं। हाल ही में प्रयागराज में सम्पन्न हुए कुम्भ के मेले में तो 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालु देश विदेश से पवित्र त्रिवेणी में स्नान करने हेतु पहुंचे थे। इसी प्रकार, भारत की एक और विशेषता है कि यहां विभिन्न त्यौहारों को बड़े ही उत्साह से भाई-चारे के साथ मनाया जाता है। दीपावली का पावन पर्व एवं दीपावली के आसपास के समय में कई त्यौहार श्रद्धापूर्वक मनाए जाते हैं एवं इन त्यौहारों पर समाज में परिवारों द्वारा लाखों करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं। इस वर्ष एक आकलन के अनुसार दीपावली के पावन पर्व एवं दीपावली के समय के आसपास के समय में मनाए गए विभिन्न त्यौहारों पर 6 लाख करोड़ रुपए के विभिन्न उत्पादों की बिक्री भारत में हुई है। फिर, शादियों का मौसम भी प्रारम्भ होता है जिसमें करोड़ों की संख्या में विवाह समारोह सम्पन्न होते हैं, इन विवाह समारोहों में भी लाखों करोड़ रुपए का खर्च भारतीय समाज द्वारा किया जाता है। इन कारणों के चलते भी भारत में हाल ही के समय में उत्पादों की मांग में भारी वृद्धि दर्ज हुई है। जिससे, अंततः इन उत्पादों का निर्माण भी भारत में होने लगा है तथा विनिर्माण के क्षेत्र में 9.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

दरअसल, विदेशी वित्तीय संस्थान भारत की संस्कृति से पूर्णत अनभिज्ञ हैं एवं पश्चिमी देशों की संस्कृति के अनुसार विकसित किए गए मॉडल से भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान लगा रहे हैं। इन मॉडल के अनुसार जहां, इन विभिन्न विदेशी वित्तीय संस्थानों द्वारा 6 से 7 प्रतिशत के बीच की आर्थिक विकास दर का अनुमान लगाया जाता है वहीं भारत की आर्थिक विकास दर अब 8 प्रतिशत की दर को भी पार करती हुई दिखाई दे रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के इन वित्तीय संस्थानों के आंकलन में इतना भारी अंतर सोच का विषय है। अब भारत के आर्थिक विकास के सम्बंध में अनुमानों को आंकने के लिए भारतीय मॉडल ही विकसित करने की आवश्यकता है। वरना, इसी प्रकार की गलतियां इन विदेशी वित्तीय संस्थानों द्वारा की जाती रहेंगी एवं भारत में कुछ विघ्न संतोषी पत्रकार इसी प्रकार देश के आर्थिक विकास की दर पर अपनी शंका-कुशंकाओं को समाज के बीच में लाते रहेंगे और गलत विमर्श खड़ा करने का प्रयास करते रहेंगे।

हां, भारत में ऐसे कुछ क्षेत्र जरूर हैं जिनमे विकास दर को गति देने के प्रयास किए जाने चाहिए। जैसे, भारत में खदानों से उत्पादन में वित्तीय वर्ष 2025-26 की द्वितीय तिमाही में 0.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, पिछले वर्ष भी इसी अवधि में 0.4 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई थी। जब देश में विनिर्माण के क्षेत्र में 9.1 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल की जा रही है तो फिर खदानों से उत्पादन क्यों नहीं बढ़ना चाहिए? इसका आश्य कहीं यह तो नहीं कि हम कच्चे माल की जरूरतों को आयात के माध्यम से पूरा करने का प्रयास कर रहे हों। इस बीच भारत में आयात की मात्रा में भी भारी वृद्धि दर्ज हुई है, जबकि उत्पादों के निर्यात में वृद्धि दर कुछ धीमी रही है। उक्त अवधि (तिमाही) के दौरान, भारत में उत्पादों का आयात 18,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा है, जबकि भारत से उत्पादों का निर्यात 10,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा है। इस प्रकार, कुल व्यापार घाटा बढ़कर 8,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर का हो गया है। इस प्रकार, भारत में कच्चे माल के उपयोग में आत्म निर्भरता हासिल करना आवश्यक हो गया है। जिन वस्तुओं का उत्पादन भारत में ही आसानी से सम्भव है, उनका आयात बंद अथवा कम करना ही होगा। अन्यथा, की स्थिति में भारत को अपने व्यापार घाटे को संतुलित करना, अति मुश्किल कार्य हो जाने वाला है। सामाजिक स्तर पर भी इस समस्या का हल निकालना होगा। केवल देश में ही उत्पादित वस्तुओं का उपयोग करना आज प्रत्येक परिवार का कर्तव्य बन जाना चाहिए। देश में बढ़ती मांग की आपूर्ति यदि देश में ही निर्मित वस्तुओं से होने लगेगी तो विदेशी संस्थाओं द्वारा भारत में अपने उत्पाद बेचकर कमाए जाने वाले लाभ को वे अपने देश में नहीं ले जा सकेंगे और इससे अंततः भारत के व्यापार घाटे को भी नियंत्रित किया जा सकेगा।

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