सत्ता के आगे घुटने टेकती पत्रकारिता

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नोएडा । मीडिया की दुनिया की आज सबसे बड़ी खबर यही है कि खबर अब खबर नहीं रही। वह एक उत्पाद बन गई है ; बिकती है, पैक होकर आती है, सजती-संवरती है, चमकती है, और फिर दर्शकों के सामने परोस दी जाती है। सच कहीं पीछे छूट जाता है। उसकी जगह ले लेते हैं प्रचार, सनसनी और कारोबार।

कभी पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता था। पत्रकार सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछते थे, जेल जाते थे, मुकदमे झेलते थे, धमकियां सहते थे, पर कलम नहीं झुकाते थे।

आज तस्वीर बदल चुकी है। खबर और प्रचार के बीच की दीवार गिर गई है। जनसंपर्क यानी पीआर और पत्रकारिता कई जगह एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए हैं। सत्ता जो कहना चाहती है, वही सुर्खी बन जाता है; जो सवाल पूछता है, उसे अक्सर किनारे कर दिया जाता है।

आज न्यूज़रूम का सबसे ताकतवर व्यक्ति संपादक नहीं, विज्ञापनदाता है। वही तय करता है कि कौन-सी खबर चलेगी और कौन-सी दब जाएगी। जिस खबर से बड़े कारोबारी या राजनीतिक हित प्रभावित होते हों, वह अक्सर जन्म लेने से पहले ही दम तोड़ देती है।

भारत में मीडिया का बड़ा हिस्सा अब गिने-चुने हाथों में सिमट चुका है। इस केंद्रीकरण की सबसे चर्चित मिसाल 2022 के आखिर में उद्योगपति अडानी द्वारा एनडीटीवी और IANS का अधिग्रहण है, जिसे कई पर्यवेक्षक भारतीय मुख्यधारा मीडिया में स्वतंत्र संपादकीय आवाज़ों के सिकुड़ने के प्रतीक के तौर पर देखते हैं। इसी दौर में “गोदी मीडिया” जैसा शब्द भी लोकप्रिय हुआ ; यानी वे चैनल जो सत्ता-पक्ष के प्रति खुला झुकाव रखते हैं। पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर नज़र रखने वाली संस्था रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 2025 में 180 देशों में 151वें स्थान पर था, जो 2026 के सूचकांक में फिसलकर 157वें स्थान पर आ गया ; यानी भारत अब भी “अत्यंत गंभीर” श्रेणी में गिना जाता है। रिपोर्ट इसकी बड़ी वजहों में मीडिया स्वामित्व का सघन संकेंद्रण, पत्रकारों पर बढ़ती हिंसा और उत्पीड़न, तथा राजद्रोह व मानहानि जैसे औपनिवेशिक दौर के कानूनों के दुरुपयोग को गिनाती है।

इधर पीआर एजेंसियों ने भी पत्रकारिता का चेहरा बदल दिया है। तैयार प्रेस विज्ञप्तियां, चमकदार तस्वीरें, पहले से लिखे बयान और वीडियो सीधे न्यूज़रूम तक पहुंच जाते हैं। समय की कमी और लागत बचाने की मजबूरी में कई संस्थान इन्हें लगभग ज्यों का त्यों खबर बना देते हैं।

नतीजा सामने है। किसान की तकलीफ पीछे छूट जाती है। बेरोज़गार युवा की कहानी जगह नहीं पाती। प्रदूषण, जल संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दे छोटे कोने में सिमट जाते हैं, जबकि किसी उत्पाद की लॉन्चिंग, किसी फ़िल्मी सितारे की पार्टी या सरकारी कार्यक्रम को घंटों का प्रसारण मिल जाता है।

खोजी पत्रकारिता कभी इस पेशे की पहचान थी। एक खबर सरकारें गिरा देती थी, बड़े-बड़े घोटाले उजागर होते थे। आज ऐसे उदाहरण कम दिखते हैं। इसकी एक वजह डर भी है ; मुकदमे, कानूनी दबाव, आर्थिक संकट और नौकरी जाने का भय। ऊपर बताए गए अंतरराष्ट्रीय सूचकांक भी यही संकेत देते हैं कि स्वतंत्र पत्रकारिता पहले से ज़्यादा कठिन होती जा रही है।

टीवी चैनलों की बहसें देखिए ; हर शाम वही चेहरे, वही चीख-पुकार, वही तयशुदा संवाद। एंकर कई बार सवाल पूछने वाले पत्रकार कम और किसी पक्ष के वकील ज़्यादा लगते हैं। बहस कम होती है, शोर ज़्यादा होता है। दर्शक जानकारी लेकर नहीं, उलझन लेकर उठता है।

आज तर्क की जगह तमाशा बिकता है, तथ्य से ज़्यादा तेज़ आवाज़ मायने रखती है। वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से ज़्यादा जगह कई बार ज्योतिषियों, स्वयंभू बाबाओं और सनसनी फैलाने वालों को मिल जाती है। सोशल मीडिया की रफ्तार ने इस बीमारी को और बढ़ाया है ; पहले खबर की पुष्टि होती थी, अब पहले वायरल होना ज़रूरी समझा जाता है।

प्रेस की आज़ादी का मतलब कभी सत्ता से सवाल पूछने की आज़ादी था। आज कई जगह इसका मतलब बदलता दिख रहा है। कुछ मीडिया संस्थान सरकारों और बड़े कॉरपोरेट घरानों के इतने करीब हो गए हैं कि आलोचना उन्हें नागवार गुज़रती है। सत्ता की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल कम, तारीफ ज़्यादा सुनाई देती है। कई नेता अब कठिन सवालों से बचते हुए सीधे सोशल मीडिया के ज़रिए जनता तक अपना संदेश पहुंचा देते हैं। संवाद की जगह एकतरफा प्रसारण ने ले ली है।

यह संकट केवल भारत का नहीं है। दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में मीडिया पर लोगों का भरोसा लगातार घट रहा है। लोगों को लगता है कि खबरें निष्पक्ष कम, झुकाव वाली ज़्यादा हो गई हैं।
हर साल पत्रकारिता के कॉलेज हज़ारों नए छात्र तैयार कर रहे हैं, पर अच्छी पत्रकारिता केवल डिग्री से नहीं आती। उसके लिए भाषा पर पकड़ चाहिए, इतिहास और समाज की समझ चाहिए, और सबसे बढ़कर ईमानदारी चाहिए। अफ़सोस, क्लिकों की दौड़, कम वेतन और नौकरी की असुरक्षा ने नए पत्रकारों पर भी गहरा असर डाला है। बहुत से युवाओं के लिए पत्रकारिता अब केवल पीआर या डिजिटल इन्फ्लुएंसर बनने की सीढ़ी बनकर रह गई है।

इसका सबसे बड़ा नुकसान आम नागरिक उठाता है। जब उसे पूरी और सही जानकारी नहीं मिलती, तो अफ़वाहें फैलती हैं, समाज खेमों में बंटता है, लोग एक-दूसरे को सुनना छोड़ देते हैं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत ; जागरूक नागरिक , धीरे-धीरे भ्रमित नागरिक में बदलने लगता है।

पत्रकारिता का काम सरकार गिराना नहीं, सरकार से सवाल पूछना है। उसका काम किसी दल का विरोध या समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता के हित की हिफाज़त करना है। पत्रकार अगर दरबारी बन जाए, तो जनता की आवाज़ कौन बनेगा?

सच बोलना कभी आसान नहीं रहा, पर इतिहास गवाह है कि वही समाज आगे बढ़ते हैं जहां पत्रकार सवाल पूछने से नहीं डरते ; जहां कलम बिकती नहीं, झुकती नहीं, और सत्ता के दरबार में सलाम करने के बजाय जनता के दरवाज़े पर खड़ी रहती है।

जिस दिन खबर फिर से सच की तरफ लौटेगी, उसी दिन पत्रकारिता भी अपनी खोई हुई इज़्ज़त वापस पा लेगी। वरना अख़बार छपते रहेंगे, चैनल चलते रहेंगे, मोबाइल पर नोटिफिकेशन बजते रहेंगे, पर सच धीरे-धीरे हमारी आंखों के सामने दम तोड़ देगा। और तब सबसे बड़ा नुकसान किसी एक पत्रकार का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होगा।

उसे आजादी नही मिली निर्णय करने के लिए

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आदरणीय मेघना पंत जी एवं लक्ष्मी प्रसाद पंत जी

विषय : 10 जुलाई 2026 को दैनिक भास्कर में प्रकाशित “अरेंज मैरिज की व्यवस्था को एक अपग्रेड की जरूरत है” लेख के संदर्भ में।

नमस्कार।

आज दैनिक भास्कर में प्रकाशित मेघना पंत जी का लेख पढ़ा। विगत कुछ समय से उनके लेखों में एक समान वैचारिक प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है—भारतीय परिवार, विवाह संस्था, पारिवारिक संबंधों और भारतीय जीवन-दर्शन को तथाकथित आधुनिकता के नाम पर कटघरे में खड़ा करना तथा पश्चिमी समाज में उत्पन्न सामाजिक प्रयोगों को भारतीय समाज के लिए आदर्श के रूप में प्रस्तुत करना।
यह केवल एक व्यक्तिगत मत नहीं रह जाता, बल्कि धीरे-धीरे भारतीय समाज की मूल अवधारणाओं के विरुद्ध एक वैचारिक नैरेटिव निर्मित करता है। इसलिए इसका उत्तर आवश्यक है।

लेख का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि भारतीय समाज में स्त्री को जीवनसाथी चुनने का अधिकार कभी था ही नहीं। यह निष्कर्ष न तो इतिहाससम्मत है, न धर्मसम्मत और न ही भारतीय परंपरा के अनुरूप।

भारत विश्व की वह प्राचीन सभ्यता है जहाँ स्वयंवर की परंपरा थी। सीता, द्रौपदी, दमयंती, सावित्री और अनेक उदाहरण हमारे इतिहास और साहित्य में उपलब्ध हैं, जहाँ कन्या की इच्छा और स्वीकृति का स्पष्ट स्थान था। विवाह को केवल परिवारों का समझौता नहीं माना गया, बल्कि वर और वधू दोनों की सहमति को महत्व दिया गया।
ऋग्वेद और अथर्ववेद के वैवाहिक मंत्र स्पष्ट रूप से पति-पत्नी को समान सहभागी मानते हैं। विवाह के समय कहा जाता है—
“सम्राज्ञी श्वशुरे भव, सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव।”
अर्थात् वधू परिवार में सम्मान और अधिकार के साथ प्रवेश करे।

ऐसी सभ्यता पर यह आरोप कि उसने स्त्री को कभी निर्णय का अधिकार ही नहीं दिया, इतिहास के साथ न्याय नहीं करता।
हाँ, यह सत्य है कि मध्यकालीन विदेशी आक्रमणों—विशेषकर इस्लामी आक्रमणों—के समय सामाजिक परिस्थितियाँ अत्यंत असुरक्षित हो गईं। स्त्रियों की रक्षा के लिए पर्दा, बाल-विवाह जैसी अनेक सामाजिक प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं। वे भारत की सनातन संस्कृति की मूल देन नहीं थीं, बल्कि असुरक्षा की परिस्थितियों में उत्पन्न सामाजिक प्रतिक्रियाएँ थीं।

यदि आज उन ऐतिहासिक परिस्थितियों की उपज को ही भारतीय संस्कृति का मूल स्वरूप बताकर प्रस्तुत किया जाएगा, तो यह अधूरा इतिहास होगा।

लेख में सिया अग्रवाल की घटना का उल्लेख किया गया है। किंतु यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि सिया अग्रवाल के पास कौन-सी स्वतंत्रता नहीं थी? वह आधुनिक शिक्षा प्राप्त युवती थीं, अपने निर्णय स्वयं ले रही थीं और अपने जीवन के विकल्प स्वयं चुन रही थीं।

यदि तथाकथित आधुनिकता, पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक बंधनों से मुक्त जीवन के बावजूद ऐसी दुखद घटनाएँ घट रही हैं, तो क्या समस्या का कारण भारतीय विवाह व्यवस्था है? या फिर आधुनिकता की उस अवधारणा में कहीं गंभीर दोष है, जो स्वतंत्रता और स्वच्छंदता के बीच का अंतर ही समाप्त कर देती है?
दुर्भाग्य यह है कि आज एक पूरी पीढ़ी को यह सिखाया जा रहा है कि हर बंधन दमन है, हर परंपरा पिछड़ी है और हर व्यक्तिगत इच्छा ही अंतिम सत्य है।

यही विचार आगे चलकर संबंधों को क्षणिक बना देता है।
भारतीय दर्शन कभी स्वतंत्रता का विरोध नहीं करता, बल्कि वह स्वतंत्रता को संयम से जोड़ता है। पश्चिम का एक बड़ा हिस्सा स्वतंत्रता को अधिकार के रूप में देखता है, जबकि भारत उसे कर्तव्य के साथ संतुलित करता है।
स्वतंत्रता यदि उत्तरदायित्व से अलग हो जाए तो वही स्वच्छंदता बन जाती है, और स्वच्छंदता अंततः व्यक्ति, परिवार और समाज—तीनों को अस्थिर करती है।

विडंबना यह है कि जिन देशों को आधुनिकता का आदर्श बताकर भारतीय समाज के सामने प्रस्तुत किया जाता है, वहाँ महिलाओं को समान राजनीतिक अधिकार भी भारत से बहुत बाद में मिले।

स्विट्ज़रलैंड, जिसे आज अत्यंत आधुनिक और विकसित लोकतंत्र माना जाता है, वहाँ राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं को मताधिकार 1971 में मिला। यूरोप के अनेक देशों में उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी तक महिलाएँ मतदान, संपत्ति और सार्वजनिक जीवन के अधिकारों के लिए संघर्ष करती रहीं।
दूसरी ओर भारत में संविधान लागू होते ही बिना किसी आंदोलन के महिलाओं को पुरुषों के समान सार्वभौमिक मताधिकार प्राप्त हुआ।
यदि तुलना करनी ही है तो पूरी ईमानदारी से की जानी चाहिए।

आज भी विश्व के अनेक समाजों में हलाला, जबरन विवाह, बहुविवाह, महिलाओं की शिक्षा पर प्रतिबंध, स्त्री की गवाही का आधा मूल्य जैसी कुरीतियाँ मौजूद हैं।
आश्चर्य है कि ऐसे विषय तथाकथित प्रगतिशील विमर्श का केंद्र नहीं बनते; लेकिन भारतीय विवाह संस्था को बार-बार कटघरे में खड़ा किया जाता है।
यह चयनात्मक दृष्टि निष्पक्ष नहीं कही जा सकती।

लेख में कहा गया है कि “अरेंज मैरिज को अपग्रेड करने की आवश्यकता है।” प्रश्न यह है कि अपग्रेड किस आधार पर?
यदि अपग्रेड का अर्थ यह है कि वर-वधू की सहमति हो, संवाद हो, शिक्षा हो, समानता हो और दोनों का निर्णय सम्मानित हो—तो भारतीय समाज भी उसका स्वागत करता है।
किन्तु यदि अपग्रेड का अर्थ पश्चिमी व्यक्तिवाद, अस्थायी संबंध, विवाह संस्था का अवमूल्यन और परिवार को अप्रासंगिक बनाना है, तो भारत को ऐसा अपग्रेड स्वीकार नहीं हो सकता।

भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का निजी अनुबंध नहीं है।
यह दो परिवारों का मिलन है।
यह दो वंशों का दायित्व है।
यह अग्नि के समक्ष लिया गया आजीवन व्रत है।
यह सात जन्मों की प्रतीकात्मक प्रतिज्ञा है।
यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की संयुक्त यात्रा है।
इसीलिए भारतीय समाज हजारों वर्षों से परिवार को सभ्यता की मूल इकाई मानता आया है।

आदरणीय पंत जी,

दैनिक भास्कर जैसा प्रतिष्ठित समाचार पत्र यदि लगातार ऐसे लेख प्रकाशित करेगा, जिनमें भारतीय सामाजिक संस्थाओं का एकपक्षीय मूल्यांकन हो और पश्चिमी सामाजिक प्रयोगों का आकर्षक प्रस्तुतीकरण हो, तो यह स्वस्थ विमर्श नहीं, बल्कि वैचारिक असंतुलन उत्पन्न करेगा।

पत्रकारिता का दायित्व समाज को उसकी जड़ों से काटना नहीं, बल्कि तथ्यों, इतिहास और संतुलित दृष्टिकोण के साथ विचार-विमर्श प्रस्तुत करना है।
भारत को आधुनिक अवश्य बनाइए, पर उसकी आत्मा को नष्ट करके नहीं।
भारत को अपनी सभ्यता के साथ आधुनिक होना है, पश्चिम की विफलताओं की नकल करके नहीं।

यही भारत की शक्ति है, यही उसकी पहचान है और यही वह “कुछ बात” है जिसने इस राष्ट्र को सहस्राब्दियों तक जीवित रखा है।

— सादर

हिन्‍दू धर्म आधारित संस्कारों की शिक्षा पर न्यायिक मुहर

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

रायपुर । छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय उन सभी के लिए नजीर है, जोकि अक्‍सर भारतीय हिन्‍दू ज्ञान परंपरा और धर्म के मूल नैतिक तत्‍वों पर भी प्रश्‍न उठाते रहते हैं, इसलिए यह एक सरकारी परिपत्र की वैधानिकता तक सीमित न होकर उस मूल प्रश्न का उत्तर भी है, जिस पर लंबे समय से देश में बहस चल रही है कि क्या भारतीय संस्कृति और उसकी ज्ञान परंपरा को विद्यालयी शिक्षा का हिस्सा बनाया जाना चाहिए या नहीं!

वस्‍तुत: सरकारी विद्यालयों में सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और शांति मंत्र के वाचन संबंधी राज्य सरकार के निर्देश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि संविधान किसी भी “सांप्रदायिक सिद्धांतों से असंबद्ध नैतिक शिक्षा” पर रोक नहीं लगाता। यह टिप्पणी भारतीय शिक्षा व्यवस्था, संविधान और सांस्कृतिक विरासत के बीच संतुलन स्थापित करने वाली एक महत्वपूर्ण न्यायिक व्याख्या के रूप में देखी जानी चाहिए।

कहना होगा कि भारतीय शिक्षा की अवधारणा सदैव “सा विद्या या विमुक्तये” के सिद्धांत पर आधारित रही है। यहां शिक्षा का उद्देश्य रोजगार प्राप्त करने के साथ ही ऐसे नागरिक तैयार करना है, जिनमें ज्ञान के साथ चरित्र, अनुशासन, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व भी हो। इसी कारण गुरुकुल परंपरा से लेकर आधुनिक विद्यालयों तक प्रार्थना, शांति पाठ, गुरु वंदना और नैतिक मूल्यों का विशेष स्थान रहा है। इन परंपराओं का मूल उद्देश्य मनुष्य के भीतर श्रेष्ठ संस्कारों का विकास करना रहा है।

छत्तीसगढ़ सरकार ने भी अपने विद्यालयों में जो व्यवस्था लागू की, उसका घोषित उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक चेतना और नैतिक मूल्यों से जोड़ना था। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी स्पष्ट रूप से भारतीय ज्ञान प्रणालियों, स्थानीय परंपराओं और मूल्य आधारित शिक्षा को विद्यालयी पाठ्यक्रम का महत्वपूर्ण अंग मानती है। ऐसे में राज्य सरकार का यह प्रयास उसी व्यापक नीति का विस्तार माना जा सकता है।

याचिकाकर्ताओं ने इस व्यवस्था को संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 25, 28, 29 और 30 का उल्लंघन बताते हुए इसे धार्मिक शिक्षा का स्वरूप देने का प्रयास किया। उनका तर्क था कि सरकारी विद्यालयों में ऐसे मंत्रों का वाचन अल्पसंख्यक समुदाय के विद्यार्थियों को असहज कर सकता है। यह एक संवैधानिक प्रश्न था, जिसका उत्‍तर सिर्फ भावनाओं के आधार पर देना संभव नहीं था, संविधान की भाषा और उसके उद्देश्य से ही दिया जा सकता था।

यहीं पर उच्च न्यायालय का निर्णय महत्वपूर्ण हो जाता है। न्‍यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 28(1) का आशय राज्य पोषित संस्थानों में किसी विशेष धर्म के कर्मकांड, पूजा-पद्धति अथवा धार्मिक सिद्धांतों की शिक्षा को रोकना है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि नैतिक शिक्षा, नागरिक कर्तव्यों, सामाजिक समरसता और चरित्र निर्माण से जुड़े सांस्कृतिक मूल्यों को भी प्रतिबंधित मान लिया जाए।

न्यायालय ने यह भी पाया कि सरकारी आदेश में ऐसा कोई बाध्यकारी प्रावधान नहीं है, जिससे किसी छात्र को उसकी धार्मिक मान्यता के विरुद्ध कार्य करने के लिए विवश किया जा रहा हो। महत्वपूर्ण यह भी है कि आदेश में किसी छात्र के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई का कोई प्रावधान नहीं था, इसलिए यह निर्णय भारतीय संस्कृति और भारतीय संविधान के बीच कृत्रिम टकराव पैदा करने वाली सोच पर भी अप्रत्यक्ष प्रश्नचिह्न लगाता है।

भारतीय परंपरा में गायत्री मंत्र को सद्बुद्धि की प्रार्थना, शांति मंत्र को समस्त विश्व के कल्याण की कामना और सरस्वती वंदना को ज्ञान के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है। इनका मूल भाव नैतिक और मानवीय है। इन्हें सिर्फ संकीर्ण धार्मिक दृष्टि से देखना भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता को सीमित कर देना होगा।

इस निर्णय का एक और महत्वपूर्ण पक्ष राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से जुड़ा है। नई शिक्षा नीति तकनीकी दक्षता से आगे समग्र व्यक्तित्व निर्माण पर बल देती है। उसमें भारतीय ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत, नैतिक मूल्यों और संवैधानिक कर्तव्यों को शिक्षा का अभिन्न अंग बताया गया है। यदि विद्यालय बच्चों को केवल परीक्षा पास करने की मशीन बना दें और उनके भीतर अनुशासन, करुणा, कृतज्ञता, राष्ट्रबोध तथा सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास न हो, तो शिक्षा अधूरी रह जाएगी।

आज जब समाज अनेक सामाजिक चुनौतियों, बढ़ती हिंसा, नशे की प्रवृत्ति, डिजिटल व्यसन और नैतिक संकट का सामना कर रहा है, तब विद्यालयों में मूल्य आधारित शिक्षा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है। यह मूल्य किसी एक धर्म (हिन्‍दू) तक सीमित कर उन्‍हें संकीर्ण मान लेना उचित नहीं है, क्‍योंकि किसी भी धर्म के श्रेष्‍ठ सिद्धान्‍त सभ्‍य समाज की साझा आवश्यकता हैं। यदि भारतीय संस्कृति की सकारात्मक परंपराएं विद्यार्थियों में आत्मानुशासन, एकाग्रता, कर्तव्यबोध और श्रेष्ठ नागरिकता की भावना विकसित करने में सहायक बनती हैं, तो उन्हें पूर्वाग्रह के बजाय विवेकपूर्ण दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह निर्णय इसी संतुलित सोच का प्रतिनिधित्व करता है। अदालत ने न तो संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना से समझौता किया और न ही भारतीय सांस्कृतिक विरासत को संदेह की दृष्टि से देखा। उसने स्पष्ट किया कि नैतिक शिक्षा और सांप्रदायिक शिक्षा में मूलभूत अंतर है तथा दोनों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जा सकता।

वास्तव में यह निर्णय केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहेगा। यह भविष्य में शिक्षा, संस्कृति और संविधान से जुड़े अनेक विमर्शों के लिए संदर्भ बिंदु बनेगा। इससे यह संदेश भी जाता है कि भारतीय लोकतंत्र में संविधान और संस्कृति परस्पर विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं। उनका उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए समाज में सद्भाव, नैतिकता और उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना है।

इसके साथ ही यहां यह भी स्‍पष्‍ट हो गया है कि जो लोग भारतीय हिन्‍दू धर्म एवं संस्‍कृति को संकुचित आइने से देखते हैं, वे अपने दृष्टिकोण में विस्‍तार करें, हिन्‍दू धर्म के नैतिक मूल्‍य सर्वकल्‍याणकारी हैं, यानी वे प्रत्‍येक मनुष्‍य के जीवन को उत्‍तरोत्‍तर आगे श्रेष्‍ठ दिशा में बढ़ानेवाले हैं, यह किसी संप्रदाय, मत, पंथ, रिलीजन के सीमित दायरे से परे हैं, इसलिए हिन्‍दू धर्म के सभी सिद्धांत मनुष्‍य मात्र के हित के लिए हैं, वह सभी के लिए समान हितकारक हैं। सभी इन्‍हें समान रूप से स्‍वीकार्य करें। इसमें सभी का समान हित निहित है।

थोड़ी तो शर्म करो संदीप चौधरी

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फिल्म सिटी/नोएडा। टीवी एंकर संदीप चौधरी की बेशर्मी की मिसाल बन चुकी है। बीते सात दिनों से श्रीराम मंदिर ट्रस्ट के चंपत राय पर एबीपी न्यूज पर लगातार मीडिया ट्रायल चलाना उनकी पत्रकारिता की निचली सतह को उजागर करता है।

जब मंदिर निर्माण जैसे पवित्र कार्य पर सवाल उठाने वाले अखिलेश यादव सरीखे लोग खुद विवादों में घिरे हों, तब संदीप बिना सबूत के आरोपों की बौछार कर रहे हैं।

मेरठ मामले में आईपीएस अधिकारी को आज कानून पढ़ाते हुए उनका घमंडी अंदाज देखकर लानत भेजने को दिल करता है, उनकी एंकरिंग पर। खुद की पत्रकारिता की बुनियाद कमजोर होने पर दूसरों को ज्ञान बांटना उनकी सबसे बड़ी बेशर्मी है।

पहले अपनी रिपोर्टिंग की पढ़ाई तो ठीक से कर लीजिए साहब! तथ्यों की जांच, संतुलित विश्लेषण और नैतिकता-ये बुनियादी सिद्धांत आपको अभी भी समझ नहीं आए।

लोग आज भी अक्सर उन्हें सुधीर कहकर पुकार देते हैं, क्योंकि संदीप चौधरी सुधीर चौधरी की छाया भी नहीं बन पाए। सुधीर की तीखी, साहसिक और तथ्यपरक पत्रकारिता का मुकाबला करने की क्षमता उनमें कहां? एक औसत एंकर बनकर रह गए, जो चीख-चीखकर बहस जीतने का भ्रम पालते हैं।
सबसे बड़ा ढोंग तो ‘गोदी मीडिया’ का है। संदीप से कोई पूछे-किस संविधान की धारा में लिखा है कि जो आपकी मन की बात न करे, उसे गोदी कह दो?

जबकि उनका अपना अतीत न्यूज 24 का रहा है, जहां ‘मैडम’ की चापलूसी और सनसनीखेज खबरों का बाजार गरम था। इसीलिए संदीप से लेकर अजीत तक, सारे सनसनीखेज पत्रकार न्यूज 24 से ही निकले हैं।

ऐसे एंकर टीवी पत्रकारिता को कलंकित कर रहे हैं। संदीप चौधरी, अपनी आंख में फंसे तिनके को पहले हटाइए, फिर दूसरों को उपदेश दीजिए।

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