शोलिंगनलूर श्री महा प्रत्यंगिरा पीठ, दक्षिण भारतीय तांत्रिक परंपरा का जीवित प्रयोगशाला

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शिवानी दुर्गा

चेन्नई के शोलिंगनलूर में स्थित श्री महा प्रत्यंगिरा देवी मंदिर केवल एक शक्तिपीठ नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीय तंत्र, आगमिक परंपरा और अथर्वण विद्या का सजीव संगम है। मंदिर में प्रवेश करते ही साधक की यात्रा सामान्य भक्ति से सीधे गूढ़ तांत्रिक अनुभव की ओर मुड़ जाती है, और यह यात्रा शुरू होती है माँ वाराही के सान्निध्य से।
द्वार से भीतर आते ही सबसे पहले वाराही देवी का मंदिर दर्शन देता है। भूमितत्त्व, रक्षण और भौतिक सिद्धि से जुड़ी यह देवी यहाँ हल्दी की गांठों से पूजित होती हैं। हल्दी को प्राचीन शास्त्रों में पृथ्वी की गरिमा, रोग-नाश, आयु और तांत्रिक शुद्धि का प्रतीक माना गया है; वाराही को हल्दी अर्पित करना साधक के लिए ऐसा है मानो वह आगे की उग्र साधना से पहले अपने चारों ओर एक सुरक्षा वृत्त रच रहा हो। वाराही का यह प्रथम दर्शन और हल्दी समर्पण पूरे देवालय के अनुभव का ‘ग्राउंडिंग’ भाग है साधक पहले धरती से जुड़ता है, फिर अग्नि और आकाश की उग्रता में प्रवेश करता है।

वाराही के पश्चात जब साधक मुख्य गर्भगृह की ओर बढ़ता है तो उसकी ऊर्जा सीधे महा प्रत्यंगिरा देवी के मंडल में प्रवेश करती है। यहाँ देवी ‘नरसिंही’ रूप में प्रतिष्ठित हैं सिंहमुखी, उग्र, किंतु रक्षणकारी। वे वही शक्ति हैं जिन्हें वेदों में अथर्वण भद्रकाली के रूप में याद किया गया है, अर्थात् अथर्ववेद की मायावी, मंत्र तांत्रिक और रक्षात्मक शक्तियों की अधिष्ठात्री देवी।  प्रत्यंगिरा को प्रति अंगिरा भी कहा गया ,जो प्रतिकूल या आक्रमक तांत्रिक ऊर्जा को पलटकर उसके प्रभाव को साधक से दूर कर देती है; इसीलिए उन्हें विशेष रूप से काला जादू, अभिचार और दुष्ट शक्तियों के निवारण से जोड़ा जाता है।

 

दक्षिण भारत की आगमिक परंपरा में ऐसे देवालय केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि विधिवत आगम निर्दिष्ट प्रयोगशालाएँ होती हैं। प्रत्यंगिरा देवी के होम, न्यास, यंत्र पूजन और महामंत्र जप के विस्तृत विधान दक्षिण भारतीय शक्त-आगमों और तांत्रिक परंपराओं में मिलते हैं, जिनमें देवी को विशेष रूप से रक्षण तत्त्व की मूर्तिमान शक्ति माना गया है।  शोलिंगनलूर का यह पीठ उसी आगमिक धारा का आधुनिक रूप है यहाँ की होम शाला, अग्निकुंड, दिशा-विन्यास और अनुष्ठानिक क्रम यह संकेत देते हैं कि मंदिर की पूरी संरचना साधक की ऊर्जा परिवर्तन (ट्रांसम्यूटेशन) के लिए रची गई है, न कि केवल दर्शन के लिए।

मुख्य गर्भगृह के ठीक बाहर, दायीं ओर स्थित उच्छिष्ठ गणपति का स्थान इस देवालय के तांत्रिक चरित्र को और स्पष्ट करता है। उच्छिष्ठ गणपति गणेश के दुर्लभ तांत्रिक रूपों में गिने जाते हैं, जिन्हें शास्त्रों में उच्छिष्ट -अर्थात यज्ञोपरांत बचा हुआ, नियम-दृष्टि से ‘अपवित्र’ समझे जाने वाले अंश के अधिपति के रूप में वर्णित किया गया है। यह वही रूप है जिसमें गणपति वामाचार तंत्र में काम-शक्ति, इन्द्रिय नियंत्रण, वशीकरण और मंत्र-सिद्धि के अधिष्ठाता देव माने जाते हैं।  उनके नाम और स्वरूप में ही यह शिक्षा छुपी है कि जिसे आम धारणा अपवित्र या त्याज्य मानती है, वही ऊर्जा सही मार्गदर्शन में साधक को बन्धन से मुक्त कर सकती है।

तांत्रिक दृष्टि से देखें तो वाराही-प्रत्यंगिरा-उच्छिष्ठ गणपति का यह क्रम अत्यंत अर्थपूर्ण है। द्वार पर वाराही जो स्थूल जगत की सुरक्षा, भोजन, स्वास्थ्य और भूमिगत भय को संतुलित करती हैं। गर्भगृह में महा प्रत्यंगिरा जो सूक्ष्म स्तर पर अभिचार, दृष्टदोष और अदृश्य हमलों को नष्ट करती हैं। और बाहर दाहिनी ओर उच्छिष्ठ गणपति जो साधक की इन्द्रियों, वासनाओं और ‘टैबू’ समझी जाने वाली ऊर्जा को साधना के पथ पर मोड़ने का बीज-मंत्र हैं। शास्त्रीय परंपराएँ उच्छिष्ठ गणपति को इन्द्रिय-विजय और वासना-परिवर्तन के देव के रूप में भी वर्णित करती हैं, जो वज्र की तरह उस कच्ची शक्ति को साधक के भीतर ही ऊपर की ओर मोड़ देते हैं।

अथर्ववेद, जहाँ भद्रकाली-प्रत्यंगिरा को जादुई और रक्षात्मक सूक्तों की अधिष्ठात्री माना गया, और दक्षिण भारतीय आगम, जहाँ देवी की प्रतिष्ठा, होम, यंत्र और मण्डल का विस्तृत विधान मिलता है – दोनों धाराएँ इस देवालय में एक साथ प्रकट होती हैं।  यही कारण है कि शोलिंगनलूर प्रत्यंगिरा पीठ को केवल एक “लोकप्रिय मंदिर” कहकर नहीं समझा जा सकता; यह वास्तव में अथर्वण-विद्या, आगमिक शैव-शाक्त तंत्र और वामाचार गणपति–उपासना , इन तीनों की संयुक्त धारा का जीवित केन्द्र है।

जब कोई साधक इस मंदिर में प्रवेश करता है, वाराही के चरणों में हल्दी रखता है, मुख्य गर्भगृह में महा प्रत्यंगिरा की उग्र-करुणा को निहारता है, और बाहर दाहिनी ओर उच्छिष्ठ गणपति के स्थान पर दृष्टि टिकाता है, तो अनजाने ही वह एक संपूर्ण तांत्रिक सूत्र में प्रवेश कर चुका होता है -स्थूल से सूक्ष्म, भय से निर्भयता, और ‘अपवित्र’ मानी गई शक्ति से अंततः परम-शुद्धि तक की यात्रा। शोलिंगनलूर का यह मंदिर इसी कारण मेरे लिए केवल देवदर्शन का स्थल नहीं, बल्कि एक जीवित तांत्रिक विश्वविद्यालय है, जहाँ देवी स्वयं साधक को सिखाती हैं कि सुरक्षा, उग्रता और इच्छा ये तीनों यदि सही तरह साधे जाएँ तो मुक्ति का मार्ग बन जाते हैं।

(लेखिका तंत्र साधक और तंत्र विषय की शोधार्थी हैं)

हीरापुर का 64 योगिनी मंदिर ; तांत्रिक शक्ति का प्राचीन रहस्य

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शिवानी दुर्गा
भुवनेश्वर : ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से कुछ किलोमीटर दूर हीरापुर में स्थित 64 योगिनी मंदिर भारत की तांत्रिक परंपरा का एक जीवित, रहस्यमय और अत्यंत दुर्लभ अवशेष है। 9वीं -10वीं शताब्दी में बना यह मंदिर उन थोड़े से शाक्त-तांत्रिक केंद्रों में गिना जाता है जहाँ योगिनी उपासना अपने सबसे गूढ़ स्वरूप में की जाती थी। इसकी सबसे विशेष बात इसका खुला होना है, इस मंदिर की कोई छत नहीं है। तांत्रिक मान्यता है कि योगिनी-ऊर्जा सीधे आकाश-तत्त्व से जुड़कर साधक में शक्ति, साहस और चेतना का प्रसार करती है।

मंदिर की पूरी संरचना एक पूर्ण वृत्त में बनाई गई है, जो शक्ति-चक्र का प्रतीक है। इसी वृत्त में 64 योगिनियों की अत्यंत सूक्ष्म, रहस्यमयी और विशिष्ट मूर्तियाँ स्थापित हैं। हर योगिनी की मुद्रा, आयुध और भाव अलग है, मानो वे मनुष्य के भीतर छिपे 64 चेतना-स्तरों को दर्शाती हों। केंद्रीय गर्भगृह में महाशक्ति का रूप स्थापित है, जो सम्पूर्ण मंडल को ऊर्जा प्रदान करता है।

यह मंदिर केवल स्थापत्य का चमत्कार नहीं, बल्कि एक ऊर्जा-स्थल है। वृत्ताकार निर्माण, खुला आकाश और योगिनी-मंडल मिलकर एक ऐसा स्पंदन-क्षेत्र बनाते हैं जिसमें खड़े होकर साधक सहज रूप से एक विशेष शांत-उदात्त कंपन का अनुभव करता है। प्राचीन काल में यह स्थान कौल-पूजा, योगिनी साधना, रात्रि-चक्र और विभिन्न तांत्रिक प्रयोगों के लिए अत्यंत प्रतिष्ठित था।

हीरापुर का यह योगिनी मंदिर हमें याद दिलाता है कि भारतीय परंपरा में स्त्री-ऊर्जा, चेतना और तंत्र-साधना कितनी गहरी, वैज्ञानिक और विकसित थीं। आज भी यह स्थल एक अलौकिक शांतिपुंज जैसा अनुभव देता है , जहाँ आकाश, शक्ति और साधना एक साथ उपस्थित लगते हैं। यह केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि महाशक्ति के प्राचीन मंडल का जीवित साक्षात्कार है।

(लेखिका तंत्र साधक और तंत्र विषय की शोधार्थी हैं)

शरद जोशी का 1977 में कांग्रेस पर लिखा व्यंग्य

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शरद जोशी

दिल्ली । कांग्रेस को राज करते-करते 30 साल बीत गए. कुछ कहते हैं, तीन सौ साल बीत गए. गलत है. सिर्फ तीस साल बीते. इन तीस सालों में कभी देश आगे बढ़ा, कभी कांग्रेस आगे बढ़ी. कभी दोनों आगे बढ़ गए, कभी दोनों नहीं बढ़ पाए. फिर यों हुआ कि देश आगे बढ़ गया और कांग्रेस पीछे रह गई. तीस सालों की यह यात्रा कांग्रेस की महायात्रा है. वह खादी भंडार से आरम्भ हुई और सचिवालय पर समाप्त हो गई.

पूरे 30 साल तक कांग्रेस हमारे देश पर तम्बू की तरह तनी रही, गुब्बारे की तरह फैली रही, हवा की तरह सनसनाती रही, बर्फ सी जमी रही. पूरे तीस साल तक कांग्रेस ने देश में इतिहास बनाया, उसे सरकारी कर्मचारियों ने लिखा और विधानसभा के सदस्यों ने पढ़ा. पोस्टरों, किताबों ,सिनेमा की स्लाइडों, गरज यह है कि देश के जर्रे-जर्रे पर कांग्रेस का नाम लिखा रहा रेडियो, टीवी डाक्यूमेंट्री, सरकारी बैठकों और सम्मेलनों में, गरज यह कि दसों दिशाओं में सिर्फ एक ही गूँज थी और वह कांग्रेस की थी. कांग्रेस हमारी आदत बन गई. कभी न छूटने वाली बुरी आदत. हम सब यहां वहां से दिल दिमाग और तोंद से कांग्रेसी होने लगे. इन तीस सालों में हर भारतवासी के अंतर में कांग्रेस गेस्ट्रिक ट्रबल की तरह समा गई.

जैसे ही आजादी मिली कांग्रेस ने यह महसूस किया कि खादी का कपड़ा मोटा, भद्दा और खुरदुरा होता है और बदन बहुत कोमल और नाजुक होता है. इसलिए कांग्रेस ने यह निर्णय लिया कि खादी को महीन किया जाए, रेशम किया जाए, टेरेलीन किया जाए. अंग्रेजों की जेल में कांग्रेसी के साथ बहुत अत्याचार हुआ था. उन्हें पत्थर और सीमेंट की बेंचों पर सोने को मिला था. अगर आजादी के बाद अच्छी क्वालिटी की कपास का उत्पादन बढ़ाया गया, उसके गद्दे-तकिए भरे गए और कांग्रेसी उस पर विराज कर, टिक कर देश की समस्याओं पर चिंतन करने लगे. देश में समस्याएं बहुत थीं, कांग्रेसी भी बहुत थे. समस्याएं बढ़ रही थीं, कांग्रेस भी बढ़ रही थी.

एक दिन ऐसा आया की समस्याएं कांग्रेस हो गईं और कांग्रेस समस्या हो गई. दोनों बढ़ने लगे. पूरे तीस साल तक देश ने यह समझने की कोशिश की कि कांग्रेस क्या है? खुद कांग्रेसी यह नहीं समझ पाया कि कांग्रेस क्या है? लोगों ने कांग्रेस को ब्रह्म की तरह नेति-नेति के तरीके से समझा. जो दाएं नहीं है वह कांग्रेस है. जो बाएं नहीं है वह कांग्रेस है. जो मध्य में भी नहीं है वह कांग्रेस है. जो मध्य से बाएं है वह कांग्रेस है. मनुष्य जितने रूपों में मिलता है, कांग्रेस उससे ज्यादा रूपों में मिलती है. कांग्रेस सर्वत्र है. हर कुर्सी पर है. हर कुर्सी के पीछे है. हर कुर्सी के सामने खड़ी है. हर सिद्धांत कांग्रेस का सिद्धांत है. इन सभी सिद्धांतों पर कांग्रेस तीस साल तक अचल खड़ी हिलती रही.

तीस साल का इतिहास साक्षी है कांग्रेस ने हमेशा संतुलन की नीति को बनाए रखा. जो कहा वो किया नहीं, जो किया वो बताया नहीं,जो बताया वह था नहीं, जो था वह गलत था. अहिंसा की नीति पर विश्वास किया और उस नीति को संतुलित किया लाठी और गोली से. सत्य की नीति पर चली, पर सच बोलने वाले से सदा नाराज रही. पेड़ लगाने का आन्दोलन चलाया और ठेके देकर जंगल के जंगल साफ़ कर दिए. राहत दी मगर टैक्स बढ़ा दिए. शराब के ठेके दिए, दारु के कारखाने खुलवाए; पर नशाबंदी का समर्थन करती रही.

हिंदी की हिमायती रही अंग्रेजी को चालू रखा. योजना बनायी तो लागू नहीं होने दी. लागू की तो रोक दिया. रोक दिया तो चालू नहीं की. समस्याएं उठी तो कमीशन बैठे, रिपोर्ट आई तो पढ़ा नहीं. कांग्रेस का इतिहास निरंतर संतुलन का इतिहास है. समाजवाद की समर्थक रही, पर पूंजीवाद को शिकायत का मौका नहीं दिया. नारा दिया तो पूरा नहीं किया. प्राइवेट सेक्टर के खिलाफ पब्लिक सेक्टर को खड़ा किया, पब्लिक सेक्टर के खिलाफ प्राइवेट सेक्टर को. दोनों के बीच खुद खड़ी हो गई.

एक को बढ़ने नहीं दिया. दूसरे को घटने नहीं दिया. आत्मनिर्भरता पर जोर देते रहे, विदेशों से मदद मांगते रहे. ‘यूथ’ को बढ़ावा दिया, बुड्द्धों को टिकेट दिया. जो जीता वह मुख्यमंत्री बना, जो हारा सो गवर्नर हो गया. जो केंद्र में बेकार था उसे राज्य में भेजा, जो राज्य में बेकार था उसे उसे केंद्र में ले आए. जो दोनों जगह बेकार थे उसे एम्बेसेडर बना दिया. वह देश का प्रतिनिधित्व करने लगा. एकता पर जोर दिया आपस में लड़ाते रहे.
जातिवाद का विरोध किया, मगर अपनेवालों का हमेशा ख्याल रखा. प्रार्थनाएं सुनीं और भूल गए. आश्वासन दिए, पर निभाए नहीं. जिन्हें निभाया वे आश्वश्त नहीं हुए. मेहनत पर जोर दिया, अभिनन्दन करवाते रहे. जनता की सुनते रहे अफसर की मानते रहे. शांति की अपील की, भाषण देते रहे. खुद कुछ किया नहीं दूसरे का होने नहीं दिया. संतुलन की इन्तहा यह हुई कि उत्तर में जोर था तब दक्षिण में कमजोर थे. दक्षिण में जीते तो उत्तर में हार गए.

कांग्रेस अमर है. वह मर नहीं सकती. उसके दोष बने रहेंगे और गुण लौट-लौट कर आएंगे. जब तक पक्षपात ,निर्णयहीनता ढीलापन, दोमुंहापन, पूर्वाग्रह, ढोंग, दिखावा, सस्ती आकांक्षा और लालच कायम है, इस देश से कांग्रेस को कोई समाप्त नहीं कर सकता. कांग्रेस कायम रहेगी. दाएं, बाएं, मध्य, मध्य के मध्य, गरज यह कि कहीं भी किसी भी रूप में आपको कांग्रेस नजर आएगी. इस देश में जो भी होता है अंततः कांग्रेस होता है….जो कुछ होना है उसे आखिर में कांग्रेस होना है. तीस नहीं तीन सौ साल बीत जाएंगे, कांग्रेस इस देश का पीछा नहीं छोड़ने वाली.”

बंगाल की सियासी आग: तृणमूल का तुष्टीकरण और 2026 का हिंदू जागरण

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कोलकाता की गलियों में राम नवमी की धूम मच रही थी। हिंदू युवा भगवा झंडे लहराते, मंदिरों की घंटियां बज रही थीं। तभी, मुरशिदाबाद के बेल्डंगा में एक पोस्टर चिपका मिला—’बाबरी मस्जिद का शिलान्यास 6 दिसंबर को’। यह घोषणा तृणमूल कांग्रेस के विधायक हुमायूं कबीर की थी। “तीन साल में मस्जिद पूरी हो जाएगी, मुस्लिम नेता आएंगे,” उन्होंने कहा। दूर अयोध्या में राम मंदिर की भव्यता का जश्न मनाते हिंदू समाज के लिए यह चुभन थी। बीजेपी नेता सुकंता मजुमदार ने इसे “हिंदुओं के लिए खुली धमकी” कहा। बिहार के डिप्टी सीएम विजय सिन्हा ने चेतावनी दी, “भारत माता के बच्चे जाग चुके हैं, बाबर का कोई समर्थक अब बाबरी नहीं बना सकेगा।”

यह घटना 2025 की है, लेकिन 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की नींव इसी पर रखी जा रही है। ममता बनर्जी की तृणमूल सरकार पर मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप सालों से लगते रहे हैं। अब ‘पश्चिम बंगाल’ को ‘पश्चिम बांग्लादेश’ कहना बीजेपी का नया हथियार बन गया है। कारण? अवैध घुसपैठ, जनसांख्यिकीय बदलाव और हिंदू असुरक्षा। बीजेपी की नजर में, यह तुष्टीकरण बंगाल को ‘ईस्ट पाकिस्तान’ की तरह विभाजित करने की साजिश है। 1947 में बंगाल का धार्मिक आधार पर बंटवारा हुआ था—पूर्वी हिस्सा मुस्लिम बहुल ईस्ट बंगाल (बाद में बांग्लादेश) बना, पश्चिमी हिस्सा हिंदू बहुल वेस्ट बंगाल। आज, बीजेपी दावा करती है कि ममता की नीतियां उसी इतिहास को दोहरा रही हैं।
कबीर का बयान कोई पहला उदाहरण नहीं। तृणमूल का मुस्लिम तुष्टीकरण लंबे समय से विवादों में रहा है। 2012 में, ममता सरकार ने 77 मुस्लिम समुदायों को OBC कोटा में शामिल किया—इनमें से 75 शुद्ध मुस्लिम थे। कलकत्ता हाईकोर्ट ने इसे “अल्पसंख्यक तुष्टीकरण” करार देते हुए रद्द कर दिया।

बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा, “OBC का मतलब अब ‘वन साइडेड बेनिफिशरी’ हो गया—केवल मुसलमानों के लिए।” इससे पहले, इमामों को 2500 रुपये मासिक भत्ता दिया गया, जबकि हिंदू पंडितों को सिर्फ 1000। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक ठहराया। ममता ने खुद 2019 में कहा, “मैं मुसलमानों का तुष्टीकरण करती हूं, और सौ बार करूंगी। दूध देने वाली गाय की लात खाने को तैयार हूं।” फुरफुरा शरीफ दावत-ए-इफ्तार में उनकी मेजबानी, वक्फ एक्ट विरोध में मुसलमानों को “दीदी आपकी संपत्ति की रक्षा करेगी” का आश्वासन—ये सब तुष्टीकरण के प्रमाण हैं।
‘पश्चिम बांग्लादेश’ की उपाधि का आधार जनसांख्यिकीय आंकड़े हैं। 2011 की जनगणना में मुसलमान 27% थे, लेकिन अब अनुमान 30% से ऊपर। बीजेपी का आरोप है कि बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ ममता सरकार की आंखें बंदी से बढ़ी। 2025 में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) अभियान में 10 लाख नए वोटर जोड़े गए—जिनमें से अधिकांश मुस्लिम। बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा, “यह चुपचाप जनसांख्यिकीय आक्रमण है। 2026 का चुनाव बंगाल और बंगाली हिंदुओं के अस्तित्व का फैसला करेगा।” मुरशिदाबाद में Waqf एक्ट विरोध के दौरान हिंसा हुई—तीन मौतें, 150 गिरफ्तारियां। बीजेपी ने इसे “इस्लामिस्ट भीड़” कहा, जबकि TMC ने “बीजेपी की साजिश”। संदेशखाली हिंसा, जहां हिंदू महिलाओं पर अत्याचार हुए, ने हिंदू मतदाताओं को झकझोर दिया।

बीजेपी के लिए यह सुनहरा अवसर है। 2024 लोकसभा में 38.73% वोट शेयर के साथ, वे 2026 में 7-8% की बढ़ोतरी चाहते हैं। हिंदू ध्रुवीकरण उनकी रणनीति है—राम मंदिर जश्न, हनुमान जयंती पर भगवा झंडे। सुवेंदु अधिकारी कहते हैं, “ममता हिंदू-विरोधी हैं, बंगाल को बांग्लादेश बना देंगी।” RSS की घासफूस मजबूत हो रही है, गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों (ईसाई, बौद्ध) को लुभाया जा रहा। लेकिन चुनौती बाकी: मुस्लिम 30% वोट TMC के पक्के हैं, 100 सीटों पर वे निर्णायक। बीजेपी को 150+ सीटें चाहिए, जो TMC की बूथ-स्तरीय ताकत से मुश्किल।

फिर भी, कबीर का बयान बीजेपी का ट्रंप कार्ड है। यह हिंदू असंतोष को भुनाएगा—जैसे हरियाणा, महाराष्ट्र में हुआ। ममता का ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ (मंदिर दर्शन, दुर्गा पूजा) जवाब है, लेकिन घुसपैठ और हिंसा के सवालों से बचना मुश्किल। 2026 में बंगाल ‘NRC चुनाव’ से ‘SIR चुनाव’ बनेगा। हिंदू जागेंगे, बीजेपी मजबूत। ममता की कुर्सी डगमगाएगी। बंगाल की मिट्टी में राम का नाम गूंजेगा, बाबर का नहीं। क्या यह ‘पश्चिम बांग्लादेश’ को ‘मां भारती का अभिन्न अंग’ बना देगा? समय बताएगा, लेकिन बीजेपी का संदेश साफ: “हम बंगाल बचाएंगे।”

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