बिहार में बीजेपी की सरकार और आरजेडी से मुख्यमंत्री !

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पटना। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के हालिया निर्णयों को देखकर लगता है कि वे बीजेपी के मुख्यमंत्री कम, बल्कि जदयू-राजद-कांग्रेस की विचारधारा वाले नेता अधिक हैं। जिन्होंने उन्हें सत्ता सौंपी, उसी बीजेपी के प्रति उनका रवैया उदासीन नजर आता है, जबकि विपक्षी अपराधियों को सुविधाएं दी जा रही हैं।

सबसे विवादास्पद फैसला पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी को Z-श्रेणी सुरक्षा बहाल करना है। लालू यादव फॉडर घोटाले में कई मामलों में दोषी सिद्ध हो चुके हैं-उन्हें कुल 14 वर्ष से अधिक की सजा हुई है, जिसमें चारा घोटाला, दोरंडा खजाना मामले आदि शामिल हैं।

एक सजा-प्राप्त अपराधी को बुलेटप्रूफ कार और क्विक रिस्पांस टीम क्यों? बिहार सरकार इस सवाल का जवाब क्यों नहीं दे रही? कुछ हफ्ते पहले सुरक्षा घटाई गई थी, फिर राजनीतिक दबाव में बहाल कर दी गई। यह फैसला कानून के शासन के बजाय तुष्टिकरण की ओर इशारा करता है।

सम्राट जी बीजेपी के कार्यकर्ताओं और नेताओं को महत्व नहीं देते। पार्टी के कई स्थानीय नेता शिकायत करते हैं कि उन्हें विकास कार्यों में तरजीह नहीं मिल रही, जबकि विपक्ष के पुराने सहयोगियों और राजद परिवार पर नरम रवैया अपनाया जा रहा है। सरकारी बंगलों को खाली कराने का नाटक किया गया, लेकिन अंत में सुरक्षा और सुविधाएं बहाल।

शिक्षा में निजी स्कूलों पर नरम फीस नीति, महिलाओं की ‘पिंक पोलिसिंग’ जैसी योजनाएं राजद-कांग्रेस की छवि को मजबूत करती हैं, न कि बीजेपी की ‘सबका साथ, सबका विकास’ की मूल भावना को।
भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा है, लेकिन पुराने राजद-जदयू काल के बड़े घोटालों में गहरी कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही। बीजेपी कार्यकर्ता निराश हैं-वे सोचते हैं कि जिन्होंने सम्राट जी को मुख्यमंत्री बनाया, उसी पार्टी की विचारधारा और संगठन की उपेक्षा क्यों? उनके पास आरजेडी के ‘खलनायक’ को हीरो बनाने का समय है, लेकिन बीजेपी के कार्यकर्ताओं के लिए नहीं।

सम्राट चौधरी के लिए उंगलबाज.कॉम की सलाह है कि जिस बीजेपी ने आपको मुख्यमंत्री बनाया उसके कार्यकर्ताओं की भी थोड़ी चिंता कर लीजिए। अपने मूल संगठन, कार्यकर्ताओं और बीजेपी की मूल विचारधारा (राष्ट्रीय सुरक्षा, भ्रष्टाचार मुक्ति, हिंदुत्व) को प्राथमिकता दीजिए। विपक्ष को खुश करने से बिहार की प्रगति नहीं होगी, बल्कि जनता का विश्वास टूटेगा। एनडीए की मजबूती तभी संभव है जब बीजेपी की पहचान बनी रहे, न कि आप राजद-कांग्रेस की छाया बन जाए।

बिहार की जनता आपके फैसलों पर नजर रखेगी।

चोरी का VIP संस्करण

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पटना। लालू प्रसाद यादव को बिहार सरकार ने जेड श्रेणी की सुरक्षा दे दी। अब चोरों की सुरक्षा पुलिस की सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गई है। चोर पकड़ने वाले जवान चोर की चौकीदारी पर तैनात। क्या मज़ाक है! आत्मसम्मान की चिंता? अरे, आत्मसम्मान तो चारा घोटाले में ही बिक गया था। अब बचा-खुचा सम्मान सरकारी खर्चे पर बुलेटप्रूफ गाड़ियों में सुरक्षित।

कल्पना कीजिए एक सिपाही की। सुबह उठकर वह चोर-डकैत पकड़ने का सपना देखता है, लेकिन आज्ञा मिलती है— “जाओ, लालू जी की गाड़ी के आगे-पीछे दौड़ो। कोई उन पर उंगली उठाए तो एक्शन लो।” सिपाही सोचता होगा, “मैंने पुलिस जॉइन की चोर पकड़ने के लिए या चोर की रक्षा करने के लिए?” उसका आत्मसम्मान कुचला जा रहा है। वह देख रहा है कि चोरी अगर पकड़ी भी गई तो जेड सुरक्षा, परिवार सुखी और बिहार के टैक्सपेयर का पैसा सुरक्षा पर। ईमानदारी का मजाक बन गया है।

यह व्यंग्य नहीं, बिहार की सच्चाई है। अदालत ने लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाले में दोषी ठहराया। सजा हुई। फिर भी पुलिस उनकी सुरक्षा में लगी हुई है। पुलिस का काम अपराध रोकना है, अपराधी की सेवा करना नहीं। अगर सजा पाए नेता को VIP सुरक्षा मिलती है तो फिर ईमानदार नागरिक और जवान का मूल्य क्या? यह दोहरा मापदंड बिहार राजनीति का सबसे काला चेहरा है।

लालू प्रसाद अपने समाज के लिए यादव गौरव नहीं हो सकते। यदि समाज को गर्व करना होगा तो यादव समाज से नित्यानंद राय हैं। दक्षिण दिल्ली से विधायक गजेन्द्र यादव हैं। भूपेन्द्र यादव हैं। राकेश यादव हैं। उनके बीच ऐसे अनेक नाम हैं, जिन पर पूरा देश गर्व कर सकता है। शिक्षा और विचार क्षेत्र में श्यामलाल यादव जैसे प्रख्यात राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार हैं। इतिहासकार डॉ. के.सी. यादव ने ज्ञान की रोशनी फैलाई। कृषि क्षेत्र में हंशदास यादव जैसे सफल किसान ने दिखाया कि मेहनत से खेती को नई ऊंचाई दी जा सकती है। खेल में अजय यादव जैसे पावरलिफ्टर ने गोल्ड मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया। राजपाल यादव, रघुबीर यादव जैसे कलाकारों ने मनोरंजन जगत में अपनी पहचान बनाई। ये नाम मेहनत, ईमानदारी और संघर्ष से यादव समाज को सिर ऊंचा करके जीने की प्रेरणा देते हैं।

लालू प्रसाद की चोरी से यादव समाज का कोई भला नहीं हुआ। सारी कमाई उनके बेटे-बेटियों की जिंदगी को आसान बनाने में लगी। जिन्होंने कभी खेत में हल नहीं चलाया, कभी मजदूरी नहीं की, कभी पसीना नहीं बहाया। विलासिता, विदेश यात्राएं, महंगी गाड़ियां-सब चोरी की कमाई से। यदि किसी साहसी ने उनके वृहत परिवार की दिनचर्या सार्वजनिक कर दी-सुबह ब्रेकफास्ट से लेकर शाम की पार्टी तक का खर्च, संपत्ति का स्रोत-तो पूरा यादव समाज उनकी वास्तविकता देख लेगा। मेहनत की कमाई और लूट की कमाई में फर्क स्पष्ट हो जाएगा।

चोरी के अलावा कौन सा धंधा इतनी भारी-भरकम संपत्ति जमा करा सकता है? कोई जादू? कोई चमत्कार? नहीं। सिर्फ सरकारी खजाने की लूट। और लूट पकड़ी जाने के बाद भी परिवार सत्ता और सुविधाओं का भोग कर रहा है। बेटे मंत्री, बेटियां सांसद। यह लोकतंत्र नहीं, वंशवाद का चोरी वाला रूप है। यादव समाज के युवा देख रहे हैं-क्या यही आदर्श है? चोरी करो, पकड़े जाओ, फिर भी सुरक्षा और सत्ता मिलेगी? निश्चित तौर पर उत्तराधिकारी तो अपने खानदान का ही होगा। फिर यादव समाज के नेता किस बात के, जब चिंता सिर्फ अपने खानदान की ही करनी है।

यदि ऐसे चोर यादव समाज के आइकन बनेंगे तो उन असली आदर्शों का क्या होगा? जिन्होंने मेहनत, शिक्षा और ईमानदारी से यादव समाज को आगे बढ़ाया।  नेताओं ने,  विचारकों ने, सफल किसानों और खिलाड़ियों ने जो रास्ता दिखाया, उसे चोरों के कदम कुचल नहीं सकते। कम से कम एक चोर यादव समाज के लिए वह काम कभी नहीं कर सकता जो मेहनती यादव कर रहे हैं-समाज को सच्ची ऊंचाई देने का।

बिहार की जनता देख रही है। टैक्स का पैसा चोर की सुरक्षा पर, जबकि स्कूलों में टीचर नहीं, अस्पतालों में दवा नहीं। प्राथमिकता गलत है। सरकार को पहले उन गरीब यादव किसानों की सुरक्षा करनी चाहिए जो खेतों में मेहनत करते हैं।

यादव समाज अपने सच्चे हीरोज-मेहनती किसान, शिक्षाविद्, खिलाड़ी और ईमानदार नेता-पर गर्व करे। चोर आइकन नहीं बन सकते। सच्ची प्रगति मेहनत से आती है, लूट से नहीं।

अर्थकरी च विद्या: भारतीय शिक्षा चिंतन का भूला हुआ सूत्र

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आचार्य ललित मुनि

रायपुर । जुलाई का महीना है और विद्यालय, महाविद्यालयों में सत्रानुसार शिक्षा प्रारंभ हो गई है, एक प्रश्न मन में उठता है कि शिक्षा कैसी होनी चाहिए? यह प्रश्न आज की बेरोजगारी, कौशल संकट और डिग्री केंद्रित शिक्षा व्यवस्था के बीच जितना प्रासंगिक है, उतना ही प्राचीन भारतीय चिंतन में भी था। भारतीय मनीषा ने शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान या आध्यात्मिक उन्नति तक सीमित नहीं माना, बल्कि उसे मनुष्य के व्यावहारिक जीवन और स्वावलंबन से भी जोड़ा। महाभारत के उद्योगपर्व में विदुरनीति का एक सूत्र इसी दृष्टि को सामने रखता है:

अर्थागमो नित्यमरोगिता च, प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च।
वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या, षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्॥

अर्थात नियमित अर्थागमन, निरोगता, प्रिय और मधुरभाषिणी पत्नी, आज्ञाकारी पुत्र तथा अर्थकरी विद्या, ये मनुष्य जीवन के छह सुख हैं। इस श्लोक का सबसे महत्वपूर्ण पद है, “अर्थकरी च विद्या”, अर्थात ऐसी विद्या जो मनुष्य को जीवन के लिए सक्षम और स्वावलंबी बनाए।

“अर्थकरी विद्या” को केवल धन कमाने वाली शिक्षा मानना इसके व्यापक अर्थ को संकुचित करना होगा। भारतीय चिंतन में “अर्थ” का अर्थ केवल मुद्रा नहीं है। उसमें प्रयोजन, उपयोगिता, साधन और जीवन की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति भी सम्मिलित है। इसलिए अर्थकरी विद्या वह है जो ज्ञान को जीवनोपयोगी सामर्थ्य में बदल दे।

किसान का कृषि ज्ञान, कुम्हार की मृदा पहचानने की कला, लोहार का धातु ज्ञान, बढ़ई का काष्ठ कौशल, बुनकर की वस्त्र निर्माण कला, वैद्य का औषधीय ज्ञान और स्थापत्यकार की निर्माण विद्या, ये सभी अर्थकरी विद्या के रूप हैं। आधुनिक संदर्भ में चिकित्सा, अभियांत्रिकी, कृषि विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी, भाषा, पत्रकारिता, डिजाइन, पर्यटन और खाद्य प्रसंस्करण का ज्ञान भी तभी अर्थकरी है, जब वह व्यक्ति को किसी उपयोगी कार्य, सेवा अथवा सृजन के योग्य बनाता है।

अर्थकरी विद्या का सार है, ज्ञान को क्षमता में बदलना। यही वह कसौटी है जिस पर आज की शिक्षा व्यवस्था को परखा जाना चाहिए। विद्यार्थी ने कितनी पुस्तकें पढ़ीं और कितनी परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अपनी शिक्षा के आधार पर वह क्या कर सकता है।

विदुरनीति को केवल अर्थ और सत्ता की नीति के रूप में नहीं देखा जा सकता। महाभारत के उद्योगपर्व में विदुर धृतराष्ट्र को धर्म, विवेक, संयम, नेतृत्व, न्याय और व्यवहार की शिक्षा देते हैं। इसलिए “अर्थकरी च विद्या” को भी इसी व्यापक दृष्टि में समझना चाहिए। विदुर की दृष्टि में अर्थ और नीति विरोधी नहीं हैं। मनुष्य को समृद्धि चाहिए, लेकिन अन्यायपूर्ण समृद्धि नहीं। उसे विद्या चाहिए, लेकिन ऐसी विद्या नहीं जो अहंकार उत्पन्न करे और उसे जीवन के वास्तविक दायित्वों से विमुख कर दे।

भारतीय परंपरा का प्रसिद्ध सूत्र है, “सा विद्या या विमुक्तये”, अर्थात विद्या वह है जो मुक्ति प्रदान करे। प्रथम दृष्टि में यह सूत्र “अर्थकरी च विद्या” से भिन्न दिखाई देता है, लेकिन दोनों में वास्तविक विरोध नहीं है। भारतीय जीवन दृष्टि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को मनुष्य के चार पुरुषार्थों के रूप में स्वीकार करती है। अर्थ जीवन की आवश्यकता है और मोक्ष उसका उच्चतम लक्ष्य। वास्तव में अर्थकरी विद्या भी मनुष्य को आर्थिक पराधीनता, बेरोजगारी और असहायता से मुक्ति देती है। इसलिए आदर्श शिक्षा वह है जो मनुष्य को जीविका के योग्य भी बनाए और विवेकवान भी।

भारत की परंपरागत ज्ञान व्यवस्था में शिक्षा के अनेक प्रवाह थे। शास्त्रीय परंपरा में दर्शन, व्याकरण, गणित, ज्योतिष, चिकित्सा और साहित्य का अध्ययन होता था, वहीं परिवारों और व्यावसायिक समुदायों में कृषि, शिल्प, धातुकर्म, वस्त्र निर्माण, स्थापत्य और व्यापार का व्यावहारिक ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता था।

कृषक केवल हल चलाना नहीं जानता था। उसे मिट्टी, वर्षा, बीज, पशुधन और ऋतुचक्र का ज्ञान था। वनवासी समुदाय वनस्पतियों, औषधियों, जलस्रोतों और मौसम के संकेतों को समझते थे। शिल्पकारों के पास सामग्री, अनुपात और निर्माण तकनीक का गहरा अनुभवजन्य ज्ञान था।

आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में धीरे धीरे पुस्तकीय ज्ञान और व्यावहारिक कौशल के बीच दूरी बढ़ी। हाथ से किए जाने वाले कार्यों को निम्न समझने की सामाजिक मानसिकता ने इस दूरी को और गहरा किया। परिणाम यह हुआ कि उच्च शिक्षा प्राप्त युवा भी कई बार किसी वास्तविक कार्य को करने में स्वयं को असमर्थ पाता है।

“अर्थकरी च विद्या” इस मानसिकता को चुनौती देती है। वह पूछती है कि शिक्षा ने व्यक्ति में कौन सी क्षमता विकसित की? क्या वह किसी समस्या को समझ सकता है? क्या समाधान खोज सकता है? क्या कोई उपयोगी वस्तु या सेवा उत्पन्न कर सकता है? क्या वह अपने ज्ञान को समाज की आवश्यकता से जोड़ सकता है? भारत जैसे विविध देश में अर्थकरी शिक्षा को स्थानीय परिस्थितियों से जोड़ना आवश्यक है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी प्राकृतिक संपदा, सांस्कृतिक परंपरा और आर्थिक संभावनाएं हैं।

उदाहरण के लिए भारत में वन संपदा, कृषि, लघु वनोपज, जैव विविधता, औषधीय वनस्पतियां, हस्तशिल्प, धातु शिल्प, खाद्य प्रसंस्करण, पुरातत्त्व और पर्यटन में व्यापक संभावनाएं हैं। यदि स्थानीय शिक्षा इन क्षेत्रों को ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और उद्यमिता से जोड़े, तो रोजगार की प्रतीक्षा करने वाले युवाओं के साथ अवसर उत्पन्न करने वाले युवा भी तैयार हो सकते हैं।

शिक्षा विद्यार्थी को संसार की जानकारी दे, लेकिन अपने गांव, नगर, नदी, वन, मिट्टी और समाज से अपरिचित न बनाए। वैश्विक ज्ञान और स्थानीय आवश्यकताओं का समन्वय ही अर्थकरी शिक्षा की मजबूत आधारभूमि हो सकता है।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राज्य की समृद्धि को कृषि, पशुपालन, व्यापार, खनन, वन संपदा, उद्योग और कुशल प्रशासन से जोड़ा गया है। इसका सीधा संदेश है कि किसी राष्ट्र की आर्थिक शक्ति के पीछे ज्ञान और कौशल की बड़ी भूमिका होती है।

हर विद्यार्थी प्रशासनिक सेवा में जाना चाहता है, चिकित्सक, अभियंता, अधिवक्ता इत्यादि बनना चाहता है, लेकिन शिल्पकार नहीं। जो शिल्पकार्य ही नगद अर्थ अर्जन करता है, उसे लोग छोड़ते जा रहे हैं, परम्परागत शिल्प व्यवसाय को छोड़कर भले ही जोमेटो, स्वीगी ब्लिंकिट इत्यादि के डिलवरी बॉय बनकर घूमते रहें। अर्थकरी शिक्षा बेरोजगारी दूर करने के लिए उत्तम है, महंगी डिग्री अर्थकरी होने की गारंटी नहीं है। यदि बड़ी राशि खर्च करने के बाद भी विद्यार्थी ज्ञान, कौशल और आजीविका के स्तर पर असहाय है, तो शिक्षा की कीमत और उसकी उपयोगिता के बीच अंतर स्पष्ट है।

शिक्षा केवल धन कमाना भी नहीं सिखा सकती। उसे अर्थकरी के साथ संस्कारकरी और विवेककरी होना चाहिए। वह कौशल दे, लेकिन चरित्र भी बनाए। प्रतिस्पर्धा की क्षमता दे, लेकिन सहयोग की भावना समाप्त न करे। तकनीक दे, लेकिन उसके नैतिक उपयोग का विवेक भी दे। आत्मनिर्भर बनाए, लेकिन समाज के प्रति उत्तरदायित्व से विमुख न करे। ऐसे समय में भारत की प्राचीन गुरुकुल पद्धति का स्मरण होता है, जो विद्यार्थी का सर्वांगिण विकास कर उसे भविष्य के लिए तैयार करती थी।

आज विश्वविद्यालयों, शिक्षकों, अभिभावकों और विद्यार्थियों, सभी को यह प्रश्न स्वयं से पूछना होगा कि शिक्षा का अंतिम परिणाम क्या है? केवल अंकसूची और उपाधि या ज्ञान के साथ वास्तविक क्षमता? भारत को ऐसी शिक्षा चाहिए जो नौकरी के लिए आवेदन करना ही न सिखाए, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अवसर का निर्माण करना भी सिखाए। जो युवा को केवल किसी पद का आकांक्षी न बनाए, बल्कि सृजनकर्ता, उत्पादक, शोधकर्ता, उद्यमी और उत्तरदायी नागरिक बनाए।

महाभारत की विदुरनीति का प्राचीन सूत्र आज भी शिक्षा जगत के सामने एक सीधा प्रश्न रखता है: क्या हमारी विद्या वास्तव में अर्थकरी है? यही “अर्थकरी च विद्या” की आधुनिक प्रासंगिकता है और संभवतः भारतीय शिक्षा चिंतन का वह भूला हुआ सूत्र भी, जिसकी ओर लौटना आज समय की आवश्यकता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं)

भारत की एकता और प्रगति के लिए समर्पित एक जीवन

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नरेन्द्र मोदी

दिल्ली। आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और मां भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं।

श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहां उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना। उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे। इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी।

डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे। शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, ‘’शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’

कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान मेंरिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।

उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कांग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे।शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न ‘दीपक’ यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जीका भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे। उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।

यहां मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूं। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।

भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है। उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।

75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कांग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वां संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।

डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटरशुरू किए गए। एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया।

कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’ आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है।ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उसभारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएंगे।

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( लेखक प्रधानमंत्री, भारत सरकार हैं)

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