अडानी समूह के बहाने भारत के उद्योग जगत की छवि खराब करने का षड्यंत्र : संदर्भ- हिंडनबर्ग रिपोर्ट

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा आज महत्वपूर्ण हथियार बन चुकी है। ऐसे समय में यदि किसी तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े औद्योगिक समूह पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो उसका प्रभाव उस कंपनी के साथ ही उस देश पर भी पड़ता है, जहां से उस कंपनी का सीधा संबंध रहता है। ऐसे में पूरे देश की निवेश छवि, वित्तीय विश्वसनीयता और औद्योगिक प्रतिष्ठा पर पड़ता है।

वस्तुत: अडानी समूह से जुड़ा अमेरिकन विवाद भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए। क्योंकि हाल के घटनाक्रमों में अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजे) द्वारा स्वयं अपने मुकदमे के कानूनी आधार, अधिकार-क्षेत्र और साक्ष्यों पर पुनर्विचार करते हुए उसे आगे न बढ़ाने की दलील देना इस बहस को नई दिशा देता है। यह संदेह पैदा होता है कि कहीं यह पूरा प्रकरण सिर्फ इसलिए तो तैयार नहीं किया गया, ताकि भारत की तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति की वैश्विक छवि को प्रभावित किया जा सके।

आज भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। किंतु यह अनायास नहीं है, पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हो, आत्मनिर्भर भारत का संकल्प हो या वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में बढ़ते कदम, गहरायी से देखें तो इन सभी के पीछे देश के बड़े औद्योगिक समूहों का असाधारण योगदान है। ये उद्योग समूह भारत की आर्थिक शक्ति, रोजगार, नवाचार, निर्यात और आधारभूत संरचना के सबसे मजबूत स्तंभ हैं।

रिलायंस इंडस्ट्रीज ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में लगभग ₹11.75 लाख करोड़ का रिकॉर्ड वार्षिक कारोबार दर्ज किया है। अडानी समूह का समेकित कारोबार लगभग ₹2.92 लाख करोड़ के स्तर पर पहुंच चुका है। आदित्य बिड़ला समूह का वैश्विक कारोबार 65 अरब डॉलर से अधिक है। एचसीएल टेक्नोलॉजीज का वार्षिक राजस्व एक लाख करोड़ रुपये से ऊपर है, जबकि टाटा समूह का वैश्विक कारोबार अनेक लाख करोड़ रुपये तक फैला हुआ है। ओ.पी. जिंदल समूह इस्पात, ऊर्जा और अवसंरचना क्षेत्रों में देश की औद्योगिक क्षमता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहा है।

इस तरह से अनेक भारतीय कंपनियों के आंकड़े दिए जा सकते हैं। वस्तुत: ये आंकड़े कॉरपोरेट सफलता के प्रतीक होने के साथ ही भारत के लिए उस आर्थिक सामर्थ्य का प्रमाण हैं जिसने उसे विश्व अर्थव्यवस्था में नई पहचान दिलाई है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अडानी समूह को लेकर माहौल बनाया गया, उससे भारतीय शेयर बाजार में अस्थायी अस्थिरता आई और वैश्विक निवेशकों के बीच अनेक आशंकाएं पैदा हुईं। इस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई चर्चाओं ने अडानी समूह के बाजार मूल्य को प्रभावित किया।करोड़ों निवेशकों की पूंजी प्रभावित हुई और भारत के कॉरपोरेट गवर्नेंस पर भी सवाल उठाने का प्रयास किया गया, लेकिन बाद के घटनाक्रमों ने तस्वीर का दूसरा पक्ष भी सामने रखा।

भारतीय नियामक संस्थाओं की जांच, सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में हुई प्रक्रिया और अब अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा अपने ही मुकदमे के आधार पर गंभीर कानूनी प्रश्न उठाना यह संकेत देता है कि प्रारंभिक आरोपों को जिस प्रकार वैश्विक विमर्श का विषय बनाया गया, वह पूरी तरह निर्विवाद नहीं था। जब स्वयं अभियोजन पक्ष अपने मामले की कानूनी मजबूती पर पुनर्विचार करने लगे, तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या शुरुआती नैरेटिव ने भारत की औद्योगिक छवि को आवश्यकता से अधिक नुकसान पहुंचाया?

यहां हम सभी को यह भी समझना होगा कि भारत के बड़े उद्योगपति सिर्फ लाभ अर्जित करने वाले कारोबारी नहीं हैं। वे देश के सबसे बड़े रोजगार सृजक, करदाता और निवेशक भी हैं। रिलायंस, टाटा, अडानी, बिड़ला, जिंदल और एचसीएल जैसे समूह प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों की आजीविका का आधार बने हुए हैं। यही कंपनियां हर वर्ष सरकार को हजारों करोड़ रुपये का कर देती हैं, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, आधारभूत संरचना और सामाजिक कल्याण योजनाओं को गति मिलती है।

देश के बंदरगाह, हवाई अड्डे, राजमार्ग, मेट्रो नेटवर्क, ऊर्जा परियोजनाएं, डिजिटल कनेक्टिविटी, दूरसंचार, हरित ऊर्जा, डेटा सेंटर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेमीकंडक्टर जैसे भविष्य के क्षेत्रों में भी सबसे बड़ा निवेश इन्हीं उद्योग समूहों द्वारा किया जा रहा है। यदि भारत आज वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो उसके पीछे इन उद्योगपतियों की दीर्घकालिक निवेश क्षमता और जोखिम उठाने का साहस बहुत अधिक मायने रखता है।

वैश्विक निवेशक किसी एक कंपनी को अलग-थलग करके नहीं देखते। वे पूरे देश की नीतियों, नियामक व्यवस्था और कारोबारी वातावरण का आकलन करते हैं। ऐसे में यदि भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से किसी एक के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नकारात्मक माहौल बनाया जाता है, तो उसका असर विदेशी निवेश, शेयर बाजार, पूंजी प्रवाह और भारत की आर्थिक विश्वसनीयता पर पड़ना स्वभाविक है।

भारत आज केवल एक विशाल उपभोक्ता बाजार होने के साथ ही विश्व का उभरता हुआ उत्पादन, नवाचार और निवेश केंद्र बन चुका है। हरित ऊर्जा, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा निर्माण, सेमीकंडक्टर, लॉजिस्टिक्स और आधुनिक अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में भारतीय उद्योग समूह वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। यही कारण है कि आज भारतीय कंपनियां दुनिया के अनेक देशों में निवेश कर रही हैं और भारत को वैश्विक आर्थिक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ा रही हैं।

ऐसे समय में किसी भी भारतीय उद्योग समूह पर लगने वाले आरोपों का मूल्यांकन तथ्यों, कानून और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए, न कि पूर्वाग्रहों या अंतरराष्ट्रीय प्रचार के आधार पर। यदि किसी मामले में बाद में स्वयं जांच एजेंसियां अपने शुरुआती रुख पर पुनर्विचार करती दिखाई दें, तो यह आवश्यक हो जाता है कि पूरे घटनाक्रम का मूल्यांकन भी नए तथ्यों के आलोक में किया जाए।

क्योंकि किसी एक उद्योग समूह की प्रतिष्ठा पर लगने वाला आघात सिर्फ एक कॉरपोरेट विवाद तक सीमित न रहकर दूरगामी असर छोड़ता है। स्वभाविक तौर पर ऐसे प्रकरणों में इसका प्रभाव भारत की आर्थिक छवि, वैश्विक निवेश वातावरण और विकसित भारत के सपने तक महसूस किया जाता है। यही कारण है कि देश के वेल्थ क्रिएटर्स का निष्पक्ष मूल्यांकन तथ्यों, पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए, क्योंकि भारतीय संदर्भों में उनकी सफलता में ही भारत की आर्थिक शक्ति, वैश्विक प्रतिष्ठा और भविष्य की समृद्धि का एक महत्वपूर्ण आधार है।

अब जब अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा अपने मुकदमे के कानूनी आधार और अधिकार-क्षेत्र पर पुनर्विचार करने की बात स्वीकार कर ली गई है, तब हर भारतीय को चाहिए कि वह अपने स्तर पर इससे जुड़ी सभी सच्चाई लोगों के सामने लेकर आएं, क्योंकि बात यहां सिर्फ अडानी संस्थान की नहीं है, वास्तव में भारत के उद्योग जगत की छवि खराब करने का यह वैश्विक षड्यंत्र था! यह स्थापित किया जाना भविष्य में भारत को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने की दिशा में अत्यधिक आवश्यक है।

9 जुलाई 1301 रणथंबोर में जौहर : रानी रंगा देवी और बारह हजार स्त्री बच्चों ने ली जल और अग्नि समाधि

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रमेश शर्मा

जयपुर । भारत पर हुये मध्यकाल के आक्रमण साधारण नहीं थे । हमलावरों का उद्देश्य धन संपत्ति के साथ स्त्री और बच्चों का हरण भी रहा । जिन्हे वे भारी अत्याचार के साथ गुलामों के बाजार में बेचते थे । इससे बचने के लिये भारत की हजारों वीरांगनाओं ने अपने बच्चों के साथ जल और अग्नि में कूदकर अपने स्वत्व और स्वाभिमान की रक्षा की । ऐसा ही एक जौहर रणथंबोर में 9 जुलाई 1301 से आरंभ हुआ जो तीन दिन चला । इस जौहर में राणा हमीर देव की रानी रंगा देवी ने अपनी पुत्री पद्मा के साथ जौहर किया था । उनके साथ बारह हजार अन्य स्त्री बच्चों ने जल और अग्नि में कूदकर अपने प्राणों का बलिदान दे दिया ।

रानी रंगादेवी चित्तौड़ की राजकुमारी थीं और रणथंबोर के इतिहास प्रसिद्ध राजा हमीरदेव को ब्याहीं थीं । रणथंबोर का यह राज परिवार पृथ्वीराज चौहान का वंशज माना जाता है । मोहम्मद गौरी के हमले से दिल्ली के पतन के बाद उनके एक पुत्र ने रणथंबोर में राज स्थापित कर लिया था । इसी वंश में आगे चलकर 7 जुलाई 1272 को हमीरदेव चौहान का जन्म हुआ था । उनके पिता राजा जेत्रसिंह चौहान ने भी दिल्ली सल्तन के अनेक आक्रमण झेले थे । लेकिन रणथंबोर किले की रचना ऐसी थी कि हमलावर सफल न हो पाये । लगातार हमलों से राजपूताने की महिलाएं भी आत्म रक्षा के लिये शस्त्र संचालन सीखती थीं। हमीरदेव की की माता हीरा देवी भी युद्ध कला में प्रवीण थीं। परिवार की पृष्ठभूमि ही कुछ ऐसी थी कि हमीर देव ने कभी स्वाभिमान से समझौता नहीं किया । उन्होंने अपने जीवन में कुल 17 युद्ध लड़े थे और 16 युद्ध जीते । जिस अंतिम युद्ध में उनकी पराजय हुई उसी में उनका बलिदान हुआ । उन्होने 16 दिसंबर 1282 को रणथंबोर की सत्ता संभाली थी । पर उनका पूरा कार्यकाल युद्ध में बीता । दिल्ली के शासक जलालुद्दीन ने 1290 से 1296 के बीच रणथंबोर पर तीन बड़े हमले किये पर सफलता नहीं मिली । अलाउद्दीन उसका भतीजा था जो 1296 में चाचा की हत्या करके गद्दी पर बैठा । गद्दी संभालते ही अलाउद्दीन ने राजस्थान और गुजरात पर अनेक धावे बोले । पर रणथंबोर अजेय किला था । वह अपने चाचा के साथ रणथंबोर में पराजय का स्वाद चख चुका था इसलिए उसने यह किला छोड़ रखा था तभी 1299 में एक घटना घटी । अलाउद्दीन की सेना गुजरात से लौट रही थी । उसके दो मंगोल सरदार मोहम्मद खान और केबरु खान रास्ते में रुक गये और रणथंबोर में राजा हमीर देव के पास पहुँचे। दोनों ने अलाउद्दीन के विरुद्ध शरण माँगी । हमीर देव ने विश्वास करके दोनों को न केवल शरण दी अपितु जगाना की जागीर भी दे दी थी । इस घटना के लगभग दो वर्ष बाद अलाउद्दीन ने रणथंबोर पर धावा बोला । यह कहा जाता है कि अलाउद्दीन इन दोनों को शरण देने से नाराज था । इसलिए धावा बोला पर कुछ इतिहास कारों का मानना है कि यह अलाउद्दीन खिलजी की रणनीति थी । इन दोनों ने न केवल किले के कयी भेद दिये अपितु हमीर देव की सेना में भेद पैदा करदी इससे हमीर देव के दो अति विश्वस्त सेनापति रणमत और रतिपाल अलाउद्दीन से मिल गये ।

इतना करने के बाद 1301 में अलाउद्दीन ने रणथंबोर पर धावा बोला तब हमीर देव एक धार्मिक आयोजन में व्यस्त थे और उन्होंने अपने इन्ही दोनों सेनापतियों को युद्ध में भेजा । लेकिन दोनों के मन में विश्वासघात आ गया था । इनके अलाउद्दीन से मिल जाने से रणथंबोर की सेना कमजोर हुई । तब किले के दरबाजे बंद कर लिये गये । पर किले के भीतर गद्दार थे रसद सामग्री में विष मिला दिया गया । किले के भीतर भोजन की विकराल समस्या उत्पन्न हो गई । इस विष मिलाने के संदर्भ में अलग-अलग इतिहासकारों के मत अलग हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मोहम्मद खान और कुबलू खान की कारस्तानी थी जबकि कुछ रणमत और रतिपाल का विश्वासघात मानते हैं। विवश होकर हमीरदेव ने केशरिया बाना पहन कर साका करने का निर्णय लिया । और किले के भीतर सभी महिलाओ ने रानी रंगा देवी के नेतृत्व जौहर करने का निर्णय हुआ । यह जौहर 9 जुलाई से आरंभ हुआ जो तीन दिन चला । यह जौहर दोनों प्रकार का हुआ अग्नि जौहर भी और जल जौहर भी । तीसरे दिन 11 जुलाई 1301 को रानी रंगादेवी ने अपनी बेटी पद्मला के साथ जल समाधि ली । राजा हमीर देव 11 जुलाई को केशरिया बाना पहनकर निकले और बलिदान हुये । इस जौहर में कुल बारह हजार वीरांगनाओं ने अपने स्वत्व रक्षा के लिये प्राण न्यौछावर कर दिये । यह राजस्थान का पहला बड़ा जौहर माना जाता है ।

इतिहास के विवरण के अनुसार रणमत और रतिपाल अलाउद्दीन खिलजी के हाथों मारे गए जबकि मोहम्मद खान और कुबलू खान का विवरण नहीं मिलता । इसी से यह अनुमान लगाया जाता है की इन दोनों सरदारों को हमीर देव के पास भेजने की रणनीति अलाउद्दीन की ही रही होगी ताकि किले के गुप्त भेद पता लगें और भीतर से विश्वासघाती पैदा किये जा सकें । चूँकि युद्ध के पहले का घटनाक्रम साधारण नहीं है । अलाउद्दीन की धमकियों के बीच युद्ध की तैयारी करने की बजाय एक विशाल पूजन यज्ञ की तैयारी करना आश्चर्य जनक है । किसने युद्ध के घिरते बादलों से ध्यान हटाकर यज्ञ में लगाया ? अब सत्य जो हो पर रंगादेवी के जौहर का वर्णन सभी इतिहासकारों के लेखन में है । जो तीन दिन चला ।

इतिहास के जिन ग्रंथों में इस जौहर का विवरण है उनमें “हम्मीर ऑफ रणथंभोर” लेखक हरविलास सारस्वत, जोधराकृत हम्मीररासो संपादक-श्यामसुंदर दास, जिला गजेटियर सवाई माधोपुर तथा सवाईमाधोपुर दिग्दर्शन संपादक गजानंद डेरोलिया में है । इधर हम्मीर रासो में लिखा है कि जौहर के वक्त रणथम्भौर में रानियों ने शीस फूल, दामिनी, आड़, तांटक, हार, बाजूबंद, जोसन पौंची, पायजेब आदि आभूषण धारण किए थे। हम्मीर विषयक काव्य ग्रंथों में सुल्तान अलाउद्दीन द्वारा हम्मीर की पुत्री देवलदेह, नर्तकियों तथा सेविकाओं की मांग करने पर देवलदेह के उत्सर्ग की गाथा मिलती है, किन्तु इसका ऐतिहासिक संदर्भ नहीं मिलता। इतिहासकार ताऊ शोखावटी ने बताया कि उम्मीरदेव की पत्नी रंगादेवी उनकी सेविकाओं और अन्य रानियों के साथ जौहर किया था। इतिहासकारों के अनुसार यह राजस्थान का पहला जौहर था।

इतिहास के जिन ग्रंथों में इस जौहर का विवरण है उनमें “हम्मीर ऑफ रणथंभौर” लेखक हरविलास सारस्वत, हम्मीररासो संपादक-श्यामसुंदर दास, जिला गजेटियर सवाईमाधोपुर तथा सवाईमाधोपुर दिग्दर्शन संपादक गजानंद डेरोलिया में है । हम्मीर रासो में लिखा है कि जौहर के समय रानियों ने शीस फूल, दामिनी, आड़, तांटक, हार, बाजूबंद, जोसन पौंची, पायजेब आदि सभी आभूषण धारण किए थे। जबकि एक विवरण में लिखा है कि सुल्तान अलाउद्दीन ने हमीरदेव की पुत्री देवलदेह सहित रनिवास की सभी महिलाओं के साथ समर्पण करने की शर्त रखी थी । इसलिए हमीरदेव ने शाका करने का निर्णय लिया और रनिवास ने जौहर करने का ।

शुतुरमुर्ग की तरह कब तक सिर धंसाए रहेंगे

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रायपुर : वो कहते हैं कि अपनी पीड़ा और कराह के बारे में कुछ मत बोलो, कुछ मत लिखो। चुप रहो। वर्ना सेक्युलरिज्म ख़तरे में आ जाएगा। उनका कहना है कि- जिहादी आतंक के ख़िलाफ़ कुछ भी कहोगे तो बीजेपी का एजेंडा बनेगा। जब भी आप अपना दर्द बयां करोगे तो ठप्पा लगा दिया जाएगा कि-हिंदू-मु-स्लिम कर रहे हो।कितनी धूर्तता है न साहेब? एक संगठित योजना के तहत लोभ-लालच, भय और लव जिहाद के ज़रिए हिंदुओं के कन्वर्जन का खुला खेल-खेला जा रहा है।जब मामले सामने आते हैं तो विक्टिम कार्ड खेला जाता है। शुतुरमुर्ग की तरह कब तक रेत में सिर धंसाए रहेंगे? जब तक कि कन्वर्जन की तलवार आपकी गर्दन तक न आ जाए?

जहां तक रही बात ‘हिंदू-मु-स्लिम’ करने की तो
सच्चाई तो ये है कि किसी हिंदू को किसी मुस्लिम से कोई तकलीफ़ नहीं है। भारत में रहने वाला हर भारतीय एक है। मु-स्लिम भाई हमारे हैं। लेकिन जिहादी आतंक के ख़िलाफ़ तो चुप नहीं रहा जा सकता न? क्या आपने कभी देखा है कि इन मुद्दों में ‘सच्चे और अच्छे’, ‘सब मुस-लमान ऐसे नहीं होते हैं’— ऐसी संज्ञाओं से अलंकृत मुस्लिम लोग सामने आते हैं?वो कन्वर्जन और कट्टरपंथियों-जिहादियों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करते हों? लेकिन दूसरी ओर आप जिहादियों की पूरी योजना को देखिए—इन सबका अंतिम उद्देश्य क्या है? कन्वर्जन के ज़रिए डेमोग्राफी परिवर्तन। डेमोग्राफी परिवर्तन यानी सत्ता परिवर्तन — और फिर जो हश्र होता है।‌उसके परिणाम पाकिस्तान और बांग्लादेश के तौर पर सामने आते हैं। ये भी दिमाग न लगाइए तो देश के उन हिस्सों में चले जाइए जहां मु-स्लिम बाहुल्य है। क्या वहां से कोई हिंदू चुनाव जीत पाता है? क्या वहां कोई हिंदू सुरक्षित रह पाता है? वहां के घरों में यही लिखा मिलता है —’यह मकान बिकाऊ है’

28 जुलाई 2025 को राजस्थान पत्रिका ने एक विशेष पड़ताल की। राजस्थान के तक़रीबन 5 जिलों में रहने वाले चीता, मेहरात और काठात समाज पर अब जिहादियों का ख़तरा मंडरा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार जो तथ्य सामने निकलकर आए वो डरावने हैं— “चीता, मेहरात और काठात समुदाय के लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता खत्म होती जा रही है। इन समुदाय के कई लोग हिंदू जीवन शैली और संस्कार मानना चाहते हैं। लेकिन खुद उनके कुछ रिश्तेदार और गांवों में बाहर से आए मौलवी उनकी धार्मिक स्वतंत्रता छीन रहे हैं। कई गांवों में तो हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि परिवार में किसी की मौत पर शव का दाह संस्कार लॉ एंड ऑर्डर का मामला बन रहा है। त्योहार मनाने के लिए पुलिस को सूचना देनी पड़ रही है। रजामंद न होने पर भी बच्चों के ख़तने का दबाव डाला जा रहा है।”

यानी स्पष्ट है कि जिहादी अपने मॉड्यूल और टास्क को पूरा करने के पूरी शिद्दत के साथ जुटे हुए हैं। पहले सत्ता और प्रशासन हर जगह घुसपैठ कर अपना ‘सुरक्षा कवच’ बनाया। जो उन्हें कानूनी कार्रवाइयों से संरक्षण दे सके। इसके बाद बेख़ौफ़ कन्वर्जन के खेल में जुट गए।
उनके निशाने पर हर राज्यों में बसे वो लोग शामिल हैं जो घुमक्कड़ प्रवृत्ति के हैं। याकि जो आज भी मुख्य धारा की भूमिका में नहीं जुड़ पाए हैं। जो अपनी विशिष्ट परंपराओं, पुस्तैनी कौशल के माध्यम से जीवन व्यतीत करते हैं।
इन समुदायों के कन्वर्जन के लिए — उनके टारगेट एकदम फिक्स्ड हैं-सबके अलग-अलग टास्क हैं जिसमें वो जुटे हुए हैं।

ये ठीक वैसा ही है जैसे 7वीं सदी से शुरू हुए इस्लामिक आक्रमण के दौरान ये सब गर्दन पर तलवार रखकर कराया जाता था। अब पूरी शातिर योजना के तहत कन्वर्जन की पूरी साज़िश को अंज़ाम दिया जा रहा है। इसी नेक्सस का जब कहीं पर्दाफ़ाश होता है तो कहीं नासिक में TCS की HR निदा ख़ान – हिंदू युवतियों, युवकों का कन्वर्जन कराने वाली गिरोह का संरक्षण करती मिलती है।

कहीं कोई यूपी से जमालुद्दीन उर्फ छांगुर‌ बाबा बनकर आ रहा है। कहीं कोई इंदौर के कांग्रेस पार्षद अनवर डकैत के तौर पर, कहीं भोपाल के शारिक मछली परिवार के तौर पर…तो कहीं भोपाल के एक कॉलेज में जिहादी फरहान कहता है कि- ‘हिंदू लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाकर, दुष्कर्म करना – सवाब का काम था’ …तो बुरहानपुर का जिहादी रईस खान पहले हिंदू लड़की को प्यार के जाल में फंसाता है फिर उसका गला का-ट देता है। आए दिन ऐसे मामले आपके सामने आ रहे हैं लेकिन आप – मानने को तैयार ही नहीं हैं। आपको लगता है कि ये भाजपा का एजेंडा है। यही सबसे बड़ा आत्म-घाती क़दम है। क्योंकि आप इस संकट को एड्रेस ही नहीं करना चाहते हैं।

मैं ख़बरों की दुनिया में काम करते हुए हर दिन देखता हूं कि—जितने भी जिहाद के केस आते हैं। उनमें पीड़ितों के साथ विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल के वही लोग खड़े होते हैं जिन्हें आप जैसे सेक्यूलरिज्म में डूबे लोग गालियां देते रहते हैं। क्योंकि सिस्टम – पैसों के आगे झुकता है, अपराधियों को बचाता है। कांग्रेस समेत तममा पार्टियां मौन धारण कर लेती हैं। आप और हम जैसे लोग अपने खोल में छुपे बैठे हैं, तब तक बैठे रहेंगे जब तक संकट हमारे घरों तक न आ जाए।

आप कमाकर कितनी भी धन, संपत्ति खड़ी करते रहिए ‌। अगर आपने संकट नहीं पहचाना, उसके समूल नाश के लिए सामूहिक और सांविधानिक ढंग से कोई क़दम नहीं उठाया।तो इसके दुष्परिणाम हिन्दू समाज को ही भुगतने पड़ेंगे। क्योंकि उन्हें न तो पैसा कमाने से मतलब है, न संपत्ति कमाने से— वो बड़ी प्लानिंग में हैं। एक जिहादी आएगा और ‘लव जिहाद’ के ज़रिए एक झटके में आपका सबकुछ छीनकर चला जाएगा।
उप्र के शामली के व्यापारी के अकेले बेटे आयुष मलिक जैसे व्यापारी को लव जिहाद में फंसाकर योजना के साथ उसका कन्वर्जन करा लिया जाता है। हालांकि बाद में उसकी घर वापसी संभव हुई। लेकिन आप ये देखिए कि जिहादी कितने बड़े अभियान में जुटे हैं।

लेकिन साहेब सेक्युलरिज्म की चासनी में डूबे
आप फिर भी चुप हैं। आपके हलक़ से चीख तक नहीं निकल पाती है। ये वो मामले हैं जो पुलिस तक आ गए । इन जैसे न जाने और कितने मामले हैं जो कहीं दब गए। क्या वहां तक किसी की नज़र जा पा रही है? हालांकि इन राज्यों में बीजेपी सरकारों के होने से जिहादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाइयां भी हो रही हैं। वे जेल की सलाखों में भी जा रहे हैं। अवैध जिहादी अड्डे भी ध्वस्त किए जा रहे हैं। लेकिन क्या सबकुछ सरकारों के भरोसे छोड़ा जा सकता है? अगर इन‌ राज्यों में बीजेपी की सरकारें न होती तो क्या ये कार्रवाइयां आपको होती दिखतीं?

सोशल मीडिया, कॉलेज, स्कूल, जिम, रेस्तरां, टूरिस्ट प्लेस, वर्किंग फील्ड, गांव-गली, मुहल्ले और शहर, मुशायरे-मंच, थियेटर-सिनेमा- क्या कहीं ऐसा बचा है जहां जिहादी— आतंक फैलाने पर अमादा न हों? वो हर जगह एक्टिव हैं जहां भी उन्हें थोड़ी गुंजाइश मिलती है वो ‘कन्वर्जन’, अस्मत लूटने, संपत्ति हथियाने और डेमोग्राफी परिवर्तन के लिए पूरी प्रतिबद्धता के जुटे हैं। देश-विदेश से भरपूर फंडिंग हो रही है। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को Collaboration के बदले मोटा पैसा देना। Free Of Cost उनके टूर प्लान करना। वास्तव में ये प्रमोशन के टूल नहीं हैं। बल्कि ब्रेनवाश और कन्वर्जन के लिए चिड़ियों को जाल में फंसाने जैसे विषैले दाने हैं।

ये तथ्य इसलिए नहीं बताए जा रहे हैं कि आप डरिए और माथा पकड़ लीजिए। बल्कि ये जानना इसलिए ज़रूरी है कि सचेत होइए घर-परिवार में संवाद कीजिए।‌ बच्चों और बच्चियों को इन ख़तरों के बारे में अच्छे से बताइए। उन्हें बताइए कि ‘अमर’ बनकर पहचान बनाने वाला — ‘अब्दुल’ हो सकता है। उसके मंसूबों को लेकर सचेत रहें। अपने आस पड़ोस में नज़र रखिए। लोगों की पीड़ाओं को अपनी पीड़ा समझिए।सबके सुख-दु:ख के साथी बनिए।आपकी सामूहिक चेतना के जागृत होने की आवश्यकता है।अपने आस-पास चौकन्नी नज़र रखने की ज़रूरत है।‌ उन समुदायों के साथ आत्मीयता के संबंध बनाने और उन्हें अपनाने की जरूरत है जो विकास के रास्ते में कहीं पीछे छूट गए। उनके लिए सरकारी योजनाओं की मदद और पेट की भूख का इंतजाम करने की आवश्यकता है।सबको अपनाने समरसता और समभाव के साथ संगठित रहने के ये गुण हिंदू समाज के मूल में हैं।‌बस जांम्बवंत जैसे हर हनुमान को जगाने की आवश्यकता है —
“कहइ रीछपति सुनु हनुमाना। का चुप साधि रहेहु बलवाना।।
पवन तनय बल पवन समाना। बुधि बिबेक बिग्यान निधाना।।”

ये सब हुआ तो निश्चय मानिए कि ‘लंका दहन’ भी होगा और राक्षसों का संहार भी होगा। धर्म की जय-जयकार भी होगी। बस अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारियां निभाइए।क्योंकि जिहादी आतंक और कन्वर्जन के विरुद्ध समाज की मुखर और प्रखर चेतना ही -इन आसुरी शक्तियों का नाश कर सकती है।

राजकुमारी की शादी: शैलेश लोढ़ा के घर में कला का महोत्सव

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जोधपुर। जब भी शैलेश लोढ़ा का नाम लिया जाता है, तो सहज ही मुंह से निकलता है – “अरे भाई, वो राजा आदमी हैं।” यह सिर्फ़ एक मुहावरा नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व की सच्चाई है। हाल ही में उनकी इकलौती बेटी स्वरा की शादी उनके बचपन के मित्र शाश्वत के साथ हुई, तो यह शादी महज़ दो परिवारों का मिलन नहीं बनी। यह राजस्थान की रेत पर सजी एक अनोखी सांस्कृतिक महफ़िल बन गई, जहाँ कविता, संगीत, नाटक, सिनेमा और रिश्तों का अद्भुत संगम हुआ।

हर बेटी राजकुमारी होती है और हर पिता राजा। लेकिन शैलेश लोढ़ा और स्वाति लोढ़ा ने इस सत्य को एक भव्य उत्सव का रूप दे दिया। जोधपुर के उमैद पैलेस और आसपास के वातावरण में कई दिनों तक चला यह विवाह समारोह पारंपरिक रीति-रिवाजों को कलात्मकता के रंग में रंगकर एक नया आयाम दे गया। शादी की शुरुआत मुशायरे से हुई और फेरों के बाद समापन कवि सम्मेलन से। बीच के दिनों में शिव पुराण, रामचरितमानस और गीत गोविंद के प्रसंगों को ब्रॉडवे-स्टाइल म्यूजिकल नाटक के रूप में प्रस्तुत किया गया। मंच पर संगीत, अभिनय और काव्य एक साथ गूंजे, जैसे पूरा महल किसी जीवंत कलाकृति में बदल गया हो।

इस आयोजन की सबसे खास बात यह थी कि यह केवल एक परिवार का उत्सव नहीं रहा। देश भर के प्रमुख कवियों को एकत्र कर शैलेश जी ने इसे ‘कवियों की बेटी की शादी’ बना दिया। साहित्यकारों का कार्निवल सा माहौल था, जहाँ मेहमानों को उपहार स्वरूप किताबें दी जा रही थीं। साहित्य, संगीत, पत्रकारिता और सिनेमा के दिग्गज एक छत के नीचे थे। बॉलीवुड अभिनेता विक्की कौशल बड़े भाई की ममता से मुख्य द्वार पर खड़े होकर बारात का स्वागत कर रहे थे — हाथ जोड़े, मुस्कान बिखेरते। उदयपुर के महाराजा लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ और महारानी निवृत्ति कुमारी मेवाड़ की आत्मीय आवभगत ने मेहमानों को राजसी एहसास कराया।

शैलेश लोढ़ा स्वयं एक बहुमुखी व्यक्तित्व हैं – अभिनेता, कवि, संवेदनशील इंसान। उनकी पत्नी स्वाति के साथ मिलकर उन्होंने इस शादी को यादगार बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। पिछले एक साल से चल रही तैयारियों में उनके करीबी दोस्तों को भी योगदान देने का मौका मिला। यही कारण है कि यह आयोजन भावनात्मक रूप से भी गहरा था। स्वरा और शाश्वत का रिश्ता बचपन की दोस्ती से शुरू होकर प्रेम में बदल चुका था। उनकी शादी में प्रेम-गीतों की धुन हर कोने में गूंजती रही।

यह शादी भारतीय कलाओं का उत्सव थी। एक तरफ़ राजस्थानी परंपराओं की रौनक, दूसरी तरफ़ आधुनिक कलात्मक प्रस्तुतियाँ। कवि सम्मेलन में देश के नामचीन शायरों की कविताएँ सुनकर लगा कि शब्दों में भी कितनी ताकत है। संगीत के कार्यक्रमों में भक्ति और प्रेम दोनों का मिलन था। नाट्य प्रस्तुतियाँ इतनी प्रभावशाली थीं कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते। पूरा माहौल ऐसा था कि हर मेहमान खुद को इस महोत्सव का हिस्सा महसूस कर रहा था।

शैलेश जी और स्वाति जी की सबसे बड़ी खूबी यह रही कि इस भव्यता के बीच भी उन्होंने हर मेहमान का व्यक्तिगत ध्यान रखा। कोई छोटी-बड़ी इच्छा अनसुनी नहीं हुई। राजसी ठाठ-बाट के साथ-साथ पारिवारिक स्नेह और आत्मीयता का संतुलन उन्होंने बखूबी बनाए रखा। यही कारण है कि यह शादी न सिर्फ़ स्वरा-शाश्वत की, बल्कि उन सभी लोगों की यादों में बस गई जो इसमें शामिल हुए।

ईश्वर स्वरा और शाश्वत के प्रेम को शाश्वत बनाए रखे। महादेव से यही प्रार्थना है कि उनका गृहस्थ जीवन भी कविता और संगीत से भरा रहे। शैलेश लोढ़ा जैसे पिता, जो अपनी बेटी को राजकुमारी की तरह संजोते हैं, समाज को प्रेरणा देते हैं कि रिश्तों को भी कलाकृति की तरह गढ़ा जा सकता है।

जोधपुर की इस शादी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जब करने वाले कलाकार हों, तो शादी महज़ एक संस्कार नहीं, बल्कि कला का महोत्सव बन जाती है। स्वरा-शाश्वत को अनंत सुख की कामना।

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