The Senior’s Shadow: When Experience Becomes Ego

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Delhi : Ajit Anjum, now 57 and nearing the threshold of sixty, carries the visible weight of decades in television news. Once Managing Editor at News 24 and India TV, he was a familiar face in studios, anchoring debates and shaping narratives. He earlier directed the talk show Rubaru for BAG Films, hosted by Congress leader Rajeev Shukla, and received the Ramnath Goenka Excellence in Journalism Award in 2010 for his Bihar flood reporting. Old colleagues still refer to him as “channel wala Anjum.” Today, however, the same face addresses the camera on YouTube, where his channel draws millions of subscribers with political commentary and ground reports.
In this digital space, seniority has sometimes worn the cloak of arrogance. When a young journalist posed a few straightforward questions, Anjum is said to have responded dismissively: “You’ll make a reel out of this?” The implication was clear—reels and short-form content by younger creators rank lower than the longer videos he produces. The young reporter’s reply was simple and cutting: “Sir, you also make reels.” It was an observation that needed no elaboration. After all, Anjum’s own output was never destined for the pages of The Washington Post; it thrives on the same algorithmic platforms he appears to scorn when used by others.
The contradiction is hard to miss. A journalist who built his career inside conventional television newsrooms, including work connected to a Congress-linked production house, now depends on YouTube for reach and relevance. If he claims the identity of a journalist while circulating his views digitally, consistency demands that he extend the same respect to other creators operating in the same ecosystem. Treating a basic question as an affront simply because it comes from someone younger reveals more about hierarchy than about journalism.
Voices such as stand-up comedian Kunal Kamra have, in broader cultural conversations, floated the provocative idea that the voting rights of certain elders should be curtailed once seniority hardens into self-absorption—when the only reflection they tolerate is their own and the open air of democracy begins to feel uncomfortable. Whether one accepts that suggestion or not, the underlying unease is familiar: experience is valuable, but it does not automatically confer the right to look down on formats or practitioners who share the same digital ground.
When the crown of senior journalism rests on an algorithm rather than a studio floor, irritation at another person’s camera is misplaced. The young journalist’s retort did little more than recall a basic fact—the ground under everyone’s feet is the same. Arrogance, even when draped in decades of experience, does not occupy a particularly high sky.

आत्म शक्ति जाग्रत कर आरोग्य और यूनीवर्स की इनर्जी से जुड़ने की अवधि हैं नवरात्र

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भोपाल । वाह्य स्वरूप में नवरात्र के नौ दिन नौ देवियों की साधना, उपासना, आराधना और पूजा के दिन हैं। पर वास्तव में इन नौ दिनों की दिनचर्या के माध्यम से शरीर की समस्त कोशिकाओं को ऊर्जावान बनाकर अंतरिक्ष की एनर्जी से जुड़कर स्वयं को अधिक सामर्थ्यवान बनाने की प्रक्रिया है। वर्ष में कुल चार नवरात्र आते हैं दो प्रकट और दो गुप्त। दो प्रकट नवरात्र चैत्र और अश्विन माह में तथा गुप्त नवरात्र आषाढ़ एवं माघ माह में आते हैं। इस वर्ष शारदीय नवरात्र 11 अक्टूबर से प्राभ हो गये हैं।
भारतीय वाड्मय में ये नवरात्र अलग-अलग समय और ऋतुओं में आते हैं। चारों नवरात्र के कुल 36 दिनों तक शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक अनुशासन का निर्देश है। चार नवरात्र का विधान केवल उत्सव भर नहीं है । इसके पीछे गहरा शोध और अनुसंधान है। नवरात्र दिनों का निर्धारण प्राणी देह एवं उसकी जीवन प्रक्रिया, प्रकृति और सृष्टि की ऊर्जा एवं उसका प्राणियों पर प्रभाव का अध्ययन करके ही मनाने की विधि तैयार की गई। प्रत्येक नवरात्र में व्यक्ति की आंतरिक एवं वाह्य ऊर्जा को सशक्त करके सृष्टि की ऊर्जा से जोड़ने केलिये इनकी तिथियाँ और आयोजन का तरीका सुनिश्चित किया गया है। वर्ष में पड़ने वाले इन चारों नवरात्र के विधान और महत्व को समझने केलिये हमें सृष्टि की ऊर्जा और उसका प्राणियों के जीवन से संबंध पर एक दृष्टि डालना होगी ।
संसार का प्रत्येक प्राणी सृष्टि की ऊर्जा से ही संचालित है । वह ऊर्जा अदृश्य है, अनंत है । लघुतम चींटी से विशाल हाथी तक सभी प्राणियों की एक श्वांस उसी से चलती है। यह बात हम इसी बात से समझ सकते हैं कि मौसम बदलते ही हमारे मन के विचार भी बदलने लगते हैं और शरीर की आवश्यकता भी। मौसम के अनुरूप ही अनाज,फल, फूल एवं सब्जी की फसल आती है। मौसम के साथ बीमारियाँ भी बदल जाती हैं। अब ये मौसम बदलता कौन है ? कौन संचालित कर रहा है इन चाँद और सूरज को, दिन और रात को । कौन संचालित कर रहा है जीवन और मरण की प्रक्रिया को। यह सृष्टि की वही अदृश्य, अनादि अनंत ऊर्जा है जिससे कोई मुक्त नहीं। आधुनिक विज्ञान ने इसे “यूनिवर्स की एनर्जी” नाम दिया और स्वीकारा है कि इस ऊर्जा को न नष्ट किया जा सकता है न पैदा किया जा सकता। वह रूप बदलती है और कभी इस पदार्थ के रूप में तो कभी उस पदार्थ के रूप में। प्राणियों की देह के रूप में भी वही ऊर्जा आकार लेती है। एक पदार्थ के नष्ट होने पर वह दूसरे पदार्थ का रूप ले लेती है। विज्ञान की इस परिभाषा को प्राचीन भारत के चिंतकों ने “परम् शक्ति” या “आदि शक्ति” कहा । जिसका अंश जीवात्मा है । यदि हम इस रहस्य को जान गये कि हमें श्वांस लेने में, हमारे रक्त संचार में, भोजन पाचन प्रक्रिया में अथवा काम करने की सामर्थ्य के केन्द्र में कोई ऊर्जा है। तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि हम उस ऊर्जा से कुछ अतिरिक्त शक्ति सामर्थ्य ले सकते हैं जिससे जीवन और सफल सक्षम बने ? क्या हम कुछ ऐसा कर सकते हैं कि जिससे न शरीर कमजोर हो और मन-बुद्धि हो। इस प्रश्न का समाधान और इस आवश्यकता की पूर्ति नवरात्र के आयोजन विधान में है। जो बदलते मौसम के प्रभाव के मन बुद्धि और शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करके निर्धारित किये गये। ताकि मनुष्य की आंतरिक ऊर्जा, सृष्टि की अनंत ऊर्जा से अतिरिक्त शक्ति ले सके। व्यक्ति में दो मस्तिष्क होते हैं। एक चेतन (काॅन्शस) और दूसरा अवचेतन (सबकॅन्शस)। हमारा अवचेतन मष्तिष्क सृष्टि की अनंत ऊर्जा से और चेतन मस्तिष्क संसार से जुड़ा होता है। चेतन मस्तिष्क से हम जो भी काम करते हैं उसकी क्षमता केवल पन्द्रह प्रतिशत ही है। जबकि अवचेतन की सामर्थ्य 85% है। सुसुप्त अवस्था में तो दोनों का संपर्क जुड़ता है। पर यदि जाग्रत अवस्था में चेतन मस्तिष्क अपने अवचेतन से शक्ति लेने की क्षमता प्राप्त कर ले तो उसे वह अनंत ऊर्जा से भी संपन्न हो सकता है। प्राचीनकाल में ऋषियों की वचन शक्ति अवचेतन की इसी ऊर्जा के कारण रही है। नवरात्र में पूजा साधना विधि जन सामान्य को अवचेतन की इसी शक्ति को सम्पन्न करने का प्रयास है। इससे आरोग्य तो प्राप्त होगा ही साथ ही अलौकिक ऊर्जा की संपन्नता भी बढ़ती है। मौसम के परिवर्तन के अनुरूप वर्ष को कुछ छै ऋतुओं में बाँटा गया है। चारों नवरात्र ऋतुओं के संधिकाल में आते हैं। ताकि शरीर ऋतु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभाव से बचाने के लिये अतिरिक्त शक्ति प्राप्त हो। संयोग से ऋतुओं के संधिकाल की यह अवधि सृष्टि के पाँचों तत्वों के संतुलन की अवधि होती है। अतिरिक्त क्षमता अर्जित करने के लिये पाँचों तत्वों का संतुलन में संतुलन आवश्यक होता है। असंतुलन की स्थिति में उस तत्व से संबंधित तो प्रगति तीव्र होती है जिसका अनुपात अधिक होता है पर जिन तत्वों की गति कम रहती है वे क्षीण होनै लगते हैं जिससे असंतुलन होता है। यह असंतुलन ही शरीर और मन दोनों की बीमारी लाता है। शरीर रुग्ण होने लगता है और मन भटकने लगता है। शरीर के आंतरिक तत्वों और कोशिकाओं के संतुलित विकास से ही व्यक्ति स्वस्थ्य और सामर्थ्यवान रहता है। प्राणीदेह की कोशिकाओं और तत्वों के विकास एवं उनके ह्रास की अपनी प्रक्रिया है। देह की इस आंतरिक विकास प्रक्रिया को अतिरिक्त ऊर्जा संपन्न बनाने के लिये ही है नवरात्र में यह साधना सिद्धांत। नवरात्र की दिनचर्या चित्त को शाँत करती है और प्राण शक्ति को इस योग्य बनाती है कि व्यक्ति सृष्टि की अनंत ऊर्जा से जुड़ सके। इसीलिए नवरात्र में यम, नियम, संयम, आहार और प्राणायाम पर जोर दिया गया है।
अब एक प्रश्न और उठता है कि नवरात्र के इस साधना विधान को देवी से और देवी के नौ रूपों से क्यों जोड़ा गया है। एक ही देवी की नौ दिन पूजा की जा सकती थी। इस प्रश्न का समाधान भी सरल है। सृष्टि में व्याप्त “ऊर्जा” या “एनर्जी” स्त्रीलिंग शब्द है। इसलिए भारतीय चिंतन में इस ऊर्जा की कल्पना देवी के रूप में की गई । और देवी को आदिशक्ति माना। इसीलिए नारी को “आद्या” और पुरुष को “पूर्णा” कहा गया। शक्ति के विभिन्न रूप हैं। शरीर की शक्ति, मन की शक्ति, बुद्धि की शक्ति, चेतना की शक्ति और प्रकृति की शक्ति। यदि शरीर सबल है किंतु मन भयभीत है, शरीर और मन ठीक हैं बुद्धि कमजोर है, शरीर मन और बुद्धि सब ठीक है लेकिन चेतना कम है शरीर में आलस है तो परिणाम कतई अनुकूल नहीं होंगे। सब ठीक होने पर यदि प्रकृति विपरीत हो तो भी परिणाम प्रभावित होगा । सब प्रकार की शक्ति अर्जित करने और विपरीत मौसम में भी अपनी गति बनाये रखने की ऊर्जा प्राप्त करना ही नवरात्र की अवधि है ।
नवरात्र में नौ देवियों के पूजन का विधान है। मनुष्य के शरीर में कुल आठ चक्र होते हैं। प्रत्येक चक्र की अपनी ऊर्जा का प्रकार है। नौ में से आठ देवियाँ शरीर के सभी चक्रों से संबंधित होतीं हैं। और नवमी देवी सभी चक्रों की संपूर्ण ऊर्जा कि प्रतीक है। इसलिये प्रत्येक देवी का नाम अलग है, रूप अलग है, पूजन विधि भी अलग है। देवी पूजन की साधना विधि से आरंभिक आठ दिन इन आठों चक्रों और उनसे संबंधित शरीर की सभी कोशिकाओं को सक्रिय और समृद्ध बनाया जाता है। जब सभी कोशिकाएँ और चक्र अधिक ऊर्जावान होंगे तो व्यक्ति अधिक ऊर्जा से संपन्न होकर सफलता के नये आयाम स्थापित कर सकेगा।

देवी के स्वरूप और उनका संदेश

देवी के सभी रूपों का संबंध शरीर के चक्रों, औषधियों और वनस्पतियों और अलग ऊर्जा से संबंध होता है ।
नवरात्र के प्रथम दिन देवी के शैलपुत्री स्वरूप का पूजन होता है । इनका संबंध प्लाजमा ऊर्जा और हरड़ वनस्पति से होता है । प्लाजमा जहाँ पाचन शक्ति को सक्रिय करता है और हरड़ अनेक प्रकार के रोग नियंत्रण में काम आने वाली औषधि है । हरड़ को हिमायती गया है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप है। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है। यह पथ्य, हरीतिका, अमृता, हेमवती, कायस्थ, चेतकी और श्रेयसी सात प्रकार की होती है। और सात प्रकार के रोगों का उपचार करती है ।
देवी का द्वितीय स्वरूप देवी के ब्रह्मचारिणी स्वरूप का है । इन्हें ब्राह्मी भी कहा गया है । यह मन वचन और विचार से संयम का संदेश देतीं हैं। शरीर और मन की कितनी बीमारियाँ मन के विचारों से, खानपान में सावधानी न रखने और अनियमित दिन चर्या से उत्पन्न होतीं हैं। इसके अतिरिक्त ब्राह्मी एक औषधि का भी नाम है जो स्मरणशक्ति बढ़ाती है । व्यक्ति आचरणहीनता तभी करता है जब उसे यह स्मरण न रहे कि वह कौन है, उसका सम्मान क्या है । इसके साथ यह ब्राह्मी औषधि रक्तविकारों को दूर करती है । वाणी को भी मधुर बनाती है। मधुर वाणी संबंधों को मधुर बनाने के लिये आवश्यक है । ऊर्जा की दृष्टि से देखे तो देवी का स्वरूप क्वार्क से संबंधित है । यह ऊर्जा शरीर की समस्त कोशिकाओं के बीच समन्वय का काम करती है ।
देवी का तृतीय स्वरूप चन्द्रघण्टा है। इन्हे चन्द्रस्वर भी कहा गया है। चन्द्रस्वर को साधारण बोलचाल में चन्द्रसूर भी कहते हैं। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है चन्द्र स्वर सौम्यता और संतुलन का प्रतीक है। चन्द्रस्वर एक पौधा भी है जो धनिए के समान होता है। यह औषधि मोटापा दूर करती है, सुस्ती दूर करती है। शरीर को सक्रिय रहती है और त्वचा रोगों में भी लाभप्रद है। एनर्जी की दृष्टि से यह एन्टीक्वार्क कहलाती है । अर्थात अदृश्य ऊर्जा का वह प्रकार शरीर की प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि करता है ।
नवरात्र के चौथे दिन देवी के कूष्माण्डा स्वरूप का पूजन होता है। यह एनर्जी के पार्टिकल स्वरूप से संबंधित माना जाता है और वनस्पति में इनका प्रतीक कुंमड़ा है । हालांकि इस दिन कुंमड़े की बलि देने का प्रचलन हो गई है जो कुप्रथा है जो समय के साथ जुड़ गई। वस्तुतः कुम्भड़ा भी एक प्रकार की औषधि है जो रक्त विकार दूर करती है । और रक्तचाप भी संतुलित होता है । इससे एक मिष्ठान्न पेठा बनता है। जो रक्त रोगों की औषधि के साथ मानसिक रोगों पर नियंत्रण केलिये तो मानों अमृत के समान है ।
नवरात्र के पाँचवे दिन देवी के स्कन्दमाता स्वरूप का पूजन होता है। यह एनर्जी के एंटी पार्टिकल स्वरूप से संबंधित है। एनर्जी का यह पार्ट प्राणी में जीवन शक्ति का प्रादुर्भाव करती है। इस स्वरूप का प्रतीक अलसी है । कहते हैं देवी अलसी में विद्यमान रहती हैं। अलसी वात, पित्त व कफ रोगों की नाशक औषधि है।
देवी का षष्ठम् स्वरूप कात्यायनी है। इनमें एनर्जी का एटम स्वरूप माना जाता है। इन्हें मोइया भी कहा गया है। यह औषधि कफ, पित्त व गले के रोगों का नाश करती है।
नवरात्र में देवी का सप्तम्  कालरात्रि है । एनर्जी के रूप में इन्हें मालीक्यूल माना जाता है। इन देवी का वास औषधि नागदौन में माना गया है । यह औषधि नागदौन सभी प्रकार के रोगों में लाभकारी होती और मनोविकारों को दूर करती है।
देवी कि अष्ठम् स्वरूप महागौरी है। इन्हें धरती का रूप माना गया है इनका निवास तुलसी में माना गया है। तुलसी कितनी गुणकारी होती है। हम परिचित हैं। तुलसी सात प्रकार की होती है सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरूता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र तुलसी । शरीर मन और मस्तिष्क का ऐसा कोई रोग नहीं जिसमें तुलसी लाभकारी न हो । पिछले दिनों पूरी दुनियाँ में एक बीमारी कोरोना फैली । जिन घरों में तुलसी पत्ती की नियमित चाय बनती थी वहाँ इस बीमारी का प्रभाव नगण्य ही रहा ।
देवी का नवम् स्वरूप सिद्धिदात्री है। इन्हे समस्त ग्रह और नक्षत्रों में व्यापक माना गया है । इनका वास औषधि शतावरी में माना गया है। इसे नारायणी शतावरी भी कहते हैं। यह बल, बुद्धि एवं विवेक के लिए उपयोगी है।

नवरात्र में दिन चर्या

देवी के नौ स्वरूप, उनका एनर्जी और औषधि से संबंध एवं पूरे नौ दिन की दिनचर्या समझकर यह स्पष्ट हो जाता है कि एक सक्षम, सबल और समुन्नत जीवन के लिये यह दिनचर्या कितनी महत्वपूर्ण है । प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व उठना। बहते हुये पवित्र जल में स्नान, सूर्योदय के ऊषाकाल में सूर्य नमस्कार का योग। फिर घर आकर पूजन और प्रणायाम। नौ दिन में पहले दिन से अन्न का आहार कम करना । इसकी पूर्ति फलाहार से । चौथे दिन अन्न का आहार बिल्कुल नहीं केवल फलाहार। चौथे दिन से थोड़ा थोड़ा करके आहार की वृद्धि। नवें दिन पूर्णाहार। यह एक प्रकार से नौ दिन का कायाकल्प है। जो शरीर को आंतरिक व्याधियों से मुक्त करके आरोग्य प्रदान करता है। जबकि यम नियम संयम और प्राणायाम आत्म शक्ति को जाग्रत करते हैं जिससे यूनीवर्स की एनर्जी ही तो दैवी कृपा है।

देवराहा बाबा के जीवन पर बनेगी फिल्म ‘मचान बाबा’, 2027 में होगी रिलीज

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नई दिल्ली। नीब करौरी बाबा से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ की बॉक्स ऑफिस सफलता के बाद अब भारतीय संत परंपरा के एक और रहस्यमयी व्यक्तित्व देवराहा बाबा के जीवन पर फिल्म बनने जा रही है। फिल्म का नाम ‘मचान बाबा’ है और इसका टाइटल पोस्टर जारी कर दिया गया है।
देवराहा बाबा की कहानी को असामान्य बनाने वाली बात केवल उनका नदी किनारे ऊंचे मचान पर रहना नहीं, बल्कि उनकी आयु और उनके लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन में मौजूद रहने से जुड़े दावे भी हैं।
लेखक अभिजीत सेन की 2026 में प्रकाशित पुस्तक Devraha Baba and His 900-Year Life बाबा की असाधारण दीर्घायु से जुड़े दावों की पड़ताल करती है। देवराहा बाबा से जुड़ा एक और दिलचस्प ऐतिहासिक दावा किंग जॉर्ज पंचम को लेकर है। वर्ष 2009 में संसद में लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पर चर्चा के दौरान राजनाथ सिंह ने कहा था कि पुराने इतिहास संबंधी विवरणों में जॉर्ज पंचम के 1911 में देवराहा बाबा से मिलने का उल्लेख मिलता है। उसी भाषण में उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सहित कई नेताओं के बाबा से संबंध का भी जिक्र किया था।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़ा प्रसंग भी बाबा की लोकप्रिय कथाओं में शामिल है। देवरिया स्थित बाबा के आश्रम के महंत ने 2019 में दावा किया था कि 1978 में इंदिरा गांधी बाबा से आशीर्वाद लेने पहुंची थीं और इसके बाद कांग्रेस ने खुले हाथ को चुनाव चिन्ह बनाया। यह लोकप्रिय कथा है, हालांकि इसे स्वतंत्र रूप से प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जाता।
फिल्म का निर्माण ओजस फिल्म्स के बैनर तले किया जा रहा है। ओजस फिल्म्स, सॉफ्टवेयर और एआई कंपनी ओजस सॉफ्टेक की फिल्म एवं कंटेंट इकाई है। ओजस सॉफ्टेक के प्रमुख डिजिटल ब्रांड्स में एस्ट्रोसेज एआई शामिल है।
‘मचान बाबा’ को ब्रिटेन में स्थापित भारतीय मूल की कारोबारी पूनम गुप्ता OBE और अमेरिका में रहने वाले उद्यमी विकल्प पालीवाल प्रोड्यूस कर रहे हैं। पूनम गुप्ता ब्रिटेन के कारोबारी जगत में ‘Paper Queen’ के नाम से जानी जाती हैं, जबकि दूसरे निर्माता विकल्प पालीवाल लखनऊ में पले-बढ़े हैं और वर्तमान में ऑस्टिन, टेक्सास में आईटी तथा रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े हैं।
पूनम गुप्ता ने कहा, “देवराहा बाबा का जीवन अपने आप में एक असाधारण रहस्य है। उनकी आयु से लेकर देश के अलग-अलग दौरों और बड़ी हस्तियों से जुड़ी उनकी स्मृतियां हमें लगातार नए सवालों तक ले जाती हैं। हमारी कोशिश इन दावों को सनसनी की तरह नहीं, बल्कि गंभीर रिसर्च, श्रद्धा और सिनेमाई संवेदनशीलता के साथ देखने की है।”
दूसरे निर्माता विकल्प पालीवाल ने कहा, “यह ऐसी भारतीय कहानी है जिसमें इतिहास, विश्वास और रहस्य एक साथ मौजूद हैं। यही बात इसे भारत के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के लिए भी दिलचस्प बना सकती है।”
‘मचान बाबा’ की घोषणा ऐसे समय में हुई है जब नीब करौरी बाबा से प्रेरित ‘हनुमान अंश’ ने बॉक्स ऑफिस पर 400 करोड़ रुपये से अधिक का वैश्विक कारोबार किया है और आध्यात्मिक व्यक्तित्वों पर आधारित फिल्मों को लेकर नई चर्चा शुरू की है।
दिलचस्प रूप से, देवराहा बाबा और नीब करौरी बाबा लगभग एक ही दौर में सक्रिय रहे। निर्माताओं के अनुसार फिल्म की रिसर्च के दौरान सामने आए भक्त-संस्मरणों और मौखिक विवरणों में दोनों संतों की मुलाकातों तथा नीब करौरी बाबा द्वारा देवराहा बाबा के प्रति सम्मान का उल्लेख मिलता है।
फिल्म फिलहाल रिसर्च और प्री-प्रोडक्शन के चरण में है। टीम बाबा से जुड़ी पुस्तकों, पुरानी तस्वीरों, दस्तावेजों, अभिलेखीय सामग्री और प्रत्यक्षदर्शियों के विवरणों का अध्ययन कर रही है।
निर्माताओं का कहना है कि फिल्म का उद्देश्य केवल देवराहा बाबा से जुड़ी चमत्कार कथाओं को पर्दे पर उतारना नहीं, बल्कि उस रहस्यमयी जीवन की पड़ताल करना है, जिसकी स्मृतियां ब्रिटिश भारत से लेकर स्वतंत्र भारत के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास तक फैली दिखाई देती हैं।
‘मचान बाबा’ को 2027 में रिलीज करने की योजना है।

कनाट प्लेस का दोपहर, प्रेस क्लब की भीड़ और एक सवाल जो किसी ने पूछा नहीं

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दिल्ली। दोपहर के कनाट प्लेस में ऐसी सन्नाटा छाया था जैसे किसी ने प्रदर्शनकारियों को आज छुट्टी’ का संदेश भेज दिया हो। मैदान खाली और पुलिस वाले एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा रहे थे-काम नहीं था तो दो-चार कैमरेवालों को पकड़कर डिटेन कर लिया, ताकि शाम को साहब हिसाब मांगे तो कह सके: “आज चार पकड़े, साहब?”
प्रदर्शनकारी कहाँ गए? सब नेहा बोरा के पीछे आरके आश्रम की तरफ निकल गए। मैदान में एक प्रदर्शनकारी पर तीन पत्रकार का हिसाब था। जैसे ही पुलिस किसी को उठाती, चालीस कैमरे वाले दौड़ पड़ते। दृश्य रोमांचक था-जैसे जमीन से रिपोर्टिंग नहीं, बल्कि किसी को पकड़ने का वीडियो बनाना मकसद हो।
उधर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आशुतोष रांका, रत्ना सिंह और सौरभ दास की प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों की भीड़ लगी हुई थी। सारे कॉकरोच-समर्थक पत्रकार वहाँ जमा थे। कनाट प्लेस इसलिए सुना-सुना था क्योंकि असली ‘कवरेज’ प्रेस क्लब में हो रहा था। जो आज डिटेन हुए, वे पत्रकार नहीं, एक्टिविस्ट थे।
जिनकी रिपोर्टिंग से पता चलता है कि वे पत्रकार हैं। जैसे कॉमरेड श्रीनिवासन जैन। उनके आस-पास के दो-चार उठ गए, जैन को किसी ने हाथ नहीं लगाया। अजीत अंजुम के साथ वालों को सुरक्षा नहीं मिली, लेकिन जब सीपी में दो दिन पहले उनके पीटने की नौबत आई तो सुरक्षा बलों ने बचा लिया। यह बात उन्होंने किसी वीडियो में नहीं बताई।
और सबसे मजेदार बात। आज के प्रेस कांफ्रेन्स में सारे गांधी परिवार के दरबारियों को न्योता था। वहां एक भी पत्रकार में इतनी हिम्मत नहीं थी कि सौरव दास से उनकी कंपनी ‘क्लाइमेट एक्शन फ्रंट’ और उनकी विदेशी फंडिंग के बारे में पूछे। प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों की बारिश हो रही थी, लेकिन सारे सवाल पीएम मोदी से वहां मौजूद लोगों की नफरत को और अधिक प्रामाणिक बना रहा था। लेकिन जिसे सवाल कहते हैं। जिन्हें किसी भी पत्रकार को पूछना चाहिए। वह सवाल वहां नहीं था।
जो कन्टेंट क्रिएटर खुद इस कथित आंदोलन के beneficiary हैं। वह क्यों सवाल पूछेंगे। वे तो अपना अगला assignment पूछने के लिए वहां इकट्ठे हुए होंगे।
कनाट प्लेस खाली था, प्रेस क्लब भरा था, और आज असली सवाल अभी भी हवा में लटका हुआ था।
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