अकादमिक चोगे में छिपा एजेंडा: प्रोफेसर अपूर्वानंद और बौद्धिक आतंकवाद का चेहरा

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आदर्श उपाध्याय

दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के हिंदी विभाग में बैठकर छात्रों को दिशा देने का दावा करने वाले प्रोफेसर अपूर्वानंद आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। लेकिन उनकी यह पहचान किसी महान साहित्यिक योगदान के कारण नहीं, बल्कि देश की जड़ों को खोखला करने वाले बयानों और समाज को बांटने वाली उनकी जहरीली सोच के कारण बनी है। अभिव्यक्ति की आजादी और मानवाधिकारों का चोगा ओढ़कर भारत की संप्रभुता और बहुसंख्यक समाज पर लगातार हमले करना इनकी पहचान बन चुका है। आलोचकों और प्रखर राष्ट्रवादियों के लिए अपूर्वानंद उस ‘अर्बन नक्सल’ मानसिकता के सबसे सटीक उदाहरण हैं, जो बंद कमरों और वातानुकूलित स्टूडियो में बैठकर देश के खिलाफ साजिशों का ताना-बाना बुनते हैं।

एक हालिया पॉडकास्ट में प्रोफेसर अपूर्वानंद ने जो घिनौना बयान दिया, उसने उनकी सोच की सारी सीमाएं पार कर दीं। हर हिंदू घर में ‘संभावित हत्यारा’ और ‘संभावित बलात्कारी’ देखने वाली यह कुत्सित दृष्टि किसी सामान्य व्यक्ति की नहीं, बल्कि एक गहरे पूर्वाग्रह से ग्रसित एजेंडावादी की ही हो सकती है। जो व्यक्ति एक पूरे समाज को अपराधी और हिंसक घोषित करने की सनक रखता हो, वह दिल्ली विश्वविद्यालय में बैठकर युवा पीढ़ी को क्या शिक्षा दे रहा होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है। यह बयान कोई आकस्मिक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि बहुसंख्यक समाज को हीनभावना से ग्रसित करने और समाज में गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा करने की एक सोची-समझी क्रूर कोशिश थी।

यह कोई संयोग नहीं है कि जब 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों की आग में झुलस रही थी, तब इस हिंसा की साजिश के तार अपूर्वानंद जैसे बुद्धिजीवियों से जाकर जुड़े। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा इनसे घंटों पूछताछ किया जाना इस बात का पुख्ता प्रमाण था कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी प्रदर्शनों की आड़ में जो हिंसक तांडव रचा गया, उसे बौद्धिक हवा देने में इनका बड़ा हाथ था। सड़कों पर पत्थर और पेट्रोल बम फेंकने वाले तो सिर्फ मोहरे थे, असली शतरंज के खिलाड़ी तो अपूर्वानंद जैसे लोग थे, जो ‘शांतिपूर्ण विरोध’ के नाम पर युवाओं को भड़का रहे थे और देश की राजधानी को बंधक बनाने की पटकथा लिख रहे थे।

अपूर्वानंद और उनके वामपंथी कुनबे का ट्रैक रिकॉर्ड रहा है कि इन्हें देश की सेना, देश के कानून और देश की सुरक्षा एजेंसियों पर कभी भरोसा नहीं होता, लेकिन देश पर हमला करने वाले आतंकियों के प्रति इनकी संवेदनाएं तुरंत जाग जाती हैं। संसद हमले के मास्टरमाइंड अफजल गुरु को ‘आतंकी’ न मानना और उसकी फांसी पर विलाप करना इसी देशद्रोही सोच का हिस्सा है। मानवाधिकारों के नाम पर आतंकवादियों का मानवीयकरण करना और देश की न्यायिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करना, अर्बन नक्सलवाद की सबसे बड़ी पहचान है। इनके लिए राष्ट्र की सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती, इनका एकमात्र मकसद है – देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को भीतर से खोखला करना।

प्रोफेसर अपूर्वानंद जैसे लोग अकादमिक स्वतंत्रता के नाम पर देश के टैक्सपेयर्स के पैसे पर पलते हैं, लेकिन वफादारी उस विचारधारा के प्रति निभाते हैं जिसका लक्ष्य भारत के टुकड़े-टुकड़े करना है। यह ‘बौद्धिक आतंकवाद’ बंदूक वाले आतंकवाद से कहीं अधिक खतरनाक है, क्योंकि यह सीधे देश के युवाओं के दिमाग पर हमला करता है। अब समय आ गया है कि शिक्षा जगत में छिपे इन ‘अर्बन नक्सलियों’ के मुखौटों को पूरी तरह से उतार फेंका जाए और समाज को इनके इस जहरीले एजेंडे से सुरक्षित किया जाए।

(सोशल मीडिया से साभार)

अयोध्या राम मंदिर के चढ़ावे में बेईमानी करने वालों को सात वंश तक पाप लगेगा : नृपेंद्र मिश्र

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दयानंद पांडेय

लखनऊ। राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा ने कहा कि राम मंदिर के बेईमानों को सात वंश तक पाप लगेगा !!
 
चंपत राय श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के कर्ता-धर्ता हैं। चंपत राय की निष्ठा पर सवाल नहीं उठाऊंगा। वह पिछले 35 सालों से मंदिर आंदोलन से जुड़े हुए हैं। लेकिन बात निगरानी में कमी की है। चढ़ावे में बेईमानी करने वालों को 7 वंश तक श्राप लगेगा।

ये बातें अयोध्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में पूर्व आईएएस नृपेंद्र मिश्रा ने एक मीडिया हाउस से बातचीत में कही। 71 एकड़ में फैले राम मंदिर का निर्माण नृपेंद्र मिश्रा की देखरेख में हुआ है। वे श्रीराम जन्मभूमि निर्माण समिति के चेयरमैन हैं।

नृपेंद्र मिश्रा ने कहा- चढ़ावा चोरी का मामला पहले सामने आए जमीन खरीद विवाद से अधिक गंभीर और चुनौतीपूर्ण है। जमीन खरीद की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई गई थी। वह घटना एक चेतावनी थी कि अगर व्यवस्थाओं में पारदर्शिता नहीं होगी तो कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं।

नृपेंद्र मिश्रा की खास बातें:

1- चढ़ावे में गड़बड़ियों में मुझे दुख है: श्रद्धालुओं के विश्वास में आई कमी को ठीक करना है। मैनेजमेंट के दो हिस्से होते हैं- निष्ठा और निगरानी। पहला हिस्सा- कर्मचारियों की निष्ठा के प्रति विश्वास रखना। दूसरा हिस्सा- कर्मचारियों की निगरानी रखना। निष्ठा और निगरानी एक सिक्के के दो पहलू हैं। चंपत राय से निष्ठा नहीं, निगरानी में कमी हुई है। मुझे मंदिर के चढ़ावे और दान से जुड़ी कथित गड़बड़ियों पर दुख है।

2- कभी 4 तो कभी 10 करोड़ से ज्यादा दान आया: चढ़ावे में चोरी कब से हो रही इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है। SIT जांच कर रही है, मैं अनुमान नहीं लगाऊंगा। मेरी कोशिश रहती है कि ट्रस्ट के काम में दखल न दूं। चढ़ावे में चोरी की ख़बरों के बाद अलग से जानकारी जुटाई। पिछले 3 साल में हर महीने कितना पैसा आया इसकी जानकारी जुटाई। कभी 4 करोड़ तो कभी 10 करोड़ रुपए से ज्यादा पैसा आया।

3- SBI के रोल को भी देखना होगा: दान या चढ़ावे को लेकर बहुत पारदर्शिता रखी जानी चाहिए। रोजाना हिसाब का लेखा-जोखा वेबसाइट पर आना चाहिए। गाइडलाइन में लिखा है कि बिना जेब वाले कपड़े पहनने चाहिए। प्रवेश के समय और बाहर जाते समय पूरी जांच हो। चर्चा है कि लोग पॉकेट में गड्डियां लेकर बाहर गए। दिशा निर्देश अच्छे हैं, क्रियान्यवन में कमी रह गई।पूरी प्रक्रिया में SBI के रोल को भी देखना होगा। SBI इससे बच नहीं सकता, काउंटिंग की जिम्मेदारी उनकी है। समझौते में लिखा है कि SBI काउंटिंग कराएगा। बहुमूल्य धातु को लेकर भी SIT जांच करेगी। श्रद्धालुओं ने दान पात्र में अंगूठियां भी डालीं। कान के गहने और सोने की चूड़ियां भी दान पात्र में डाले गए। दान पात्र में डाले गए आभूषण की रसीद नहीं है।

4- CEO बनाया जाए, अयोध्या के साथ इमोशनल कनेक्ट होना जरूरी: SIT हर चीज की बारीकी से जांच कर रही है। सबसे अलग-अलग पूछताछ भी की जा रही है। ट्रस्ट की तरफ से मामले की लीपापोती असंभव है। ट्रस्ट की तरफ से SIT जांच का अनुरोध किया गया था। SIT की जांच किसी भी लेवल पर प्रभावित नहीं होगी। सुधार के लिए हर लेवल पर कदम उठाने होंगे। सीनियर अफसर को मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनाना चाहिए। ट्रस्ट के साथ मिलकर मुख्य कार्यकारी अधिकारी काम करे। CEO का अयोध्या के साथ इमोशनल कनेक्ट होना जरूरी है। PM के सहयोगियों की तरफ से मुझसे जानकारी मांगी गई। पीएम मोदी के लौटने पर सहयोगी उनसे चर्चा कर सकते हैं। चढ़ावे में बेईमानी करने वालों को 7 वंश तक श्राप लगेगा।

सुदर्शनजी : नींव को सींचता कलश

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हेमंत मुक्तिबोध

रायपुर : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक स्वर्गीय श्री सुदर्शन जी एक ऐसे विभूतिमत्‍व थे जिन्होंने अपनी अविचल ध्येयनिष्ठा, पारदर्शिता, अनथक परिश्रम और प्रखर प्रज्ञा से श्रेष्ठ जीवन के प्रतिमान प्रस्तुत किये और अपने स्नेहिल, आत्मीय और निष्छल व्यवहार से संघ के स्वयंसेवकों और देश-हितैषियों को चैतन्य और विष्वास प्रदान किया ।

अपने प्रखर व्यक्तित्व और समर्पण के कारण उन्होंने केवल संघ-हितैषियों में ही नहीं अपितु संपूर्ण सामाजिक जीवन में एक विशिष्ट स्थान और सम्मान प्राप्त किया। मध्यप्रदेश उनकी जन्मभूमि भी रहा और लंबे समय तक कर्म-भूमि भी। यहां उन्हें निकट से देखने वालों ने उनमें सरलता, निष्कपटता और बालसुलभ पारदर्शिता के दर्शन किये हैं। संघ के विचारों और कार्यों के हित में वे कठोर से कठोर निर्णय लेते थे, मैदान में लगने वाली शाखाओं और प्रशिक्षण वर्गों में वे स्वयंसेवकों का पसीना निकाल देते थे। किसी भी काम में जरा सी भी कमी उन्हें बर्दाश्त नहीं होती थी । लेकिन सायं शाखा पर खेलते-खेलते कोई शिशु या बाल स्वयंसेवक घायल हो जाए तो उसकी वे ऐसी चिंता करते जो शायद उसके परिजन भी न करते होंगे। भोपाल की एक शाखा में जब एक शिशु स्वयंसेवक के हाथ में चोट लगी तो वे 15 मिनिट तक उसकी मालश करते रहे थे।

सहजता और सरलता उनके स्वभाव में थी। 1964 में वे मध्यभारत के प्रांत प्रचारक बनाये गए। द्वितीय सरसंघचालक श्री माधव सदाशिव गोळवलवकर एक कार्यकर्ता-बैठक में आए थे। इस बैठक में शामिल कार्यकर्ताओं से श्री गुरूजी ने दो व्यक्तियों का परिचय कराया था। इनमें एक थे पं दीनदयाल उपाध्याय, और दूसरे का परिचय कराते हुए उन्होंने कहा था ‘‘यह जो दुबला पतला लडका माईक ठीक कर रहा है न, उसे माईक वाला मत समझ लेना । ये टेलिकम्यूनिकेशन मे इंजीनियर है और आज से आपका प्रांत प्रचारक है।’’ माईक सुधारने वाले वे व्यक्ति थे सुदर्शन जी। इससे पूर्व वे महाकोशल प्रांत में विभाग प्रचारक थे।

प्रांत प्रचारक बनते ही उन्हेांने व्यापक प्रवास किया । मध्यभारत में यदि आज संघ और संघ-प्रेरित संगठनों की मजबूत आधारभूमि है तो उसमें सुदर्शन जी का उल्लेखनीय योगदान है। कार्यक्षेत्र और कार्यकर्ताओं का आकलन करने और उन्हें कार्यविस्तार की दृष्टि देने की उनमें अद्भुत क्षमता थी। संघ की सारी आर्थिक जरूरतें ही नहीं, बल्कि अनेकानेक सामाजिक कार्यों की जरूरतें भी वर्ष में एक बार स्वयंसेवकों द्वारा दी जाने वाली गुरूदक्षिणा से ही पूरी होती हैं। उन दिनों पूरे प्रांत की गुरूदक्षिणा इतनी कम हुआ करती थी की इतनी अल्प राशि में पूरे प्रांत के संगठन को चलाना कितना दुष्कर होता होगा, कितनी मितव्ययिता से काम करना पडता होगा और कितने अभावों में उस दौर के कार्यकर्ताओं ने काम किया होगा, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। मध्यभारत में संघ की शाखाओं की संख्या बढाने की बहुत आवष्यकता थी। लेकिन इसके लिए अच्छे प्रशिक्षित युवा कार्यकर्ताओं की संख्या बढाना प्राथमिक आवष्यकता थी । इस परिप्रेक्ष्य में सुदर्शन जी ने कार्यकर्ताओं के सामने तीन लक्ष्य रखे। पहला, प्रांत की गुरूदक्षिणा एक लाख रूपये करना । दूसरा, प्रांत में शााखाओं की कुल संख्या 300 तक ले जाना और और तीसरा] 2000 स्वयंसेवकों का प्रांत का शिविर आयोजित करना । आज संघ इतना बढ गया है कि एक छोटी से छोटी तहसील में भी इससे कहीं अधिक संख्या के शिविर संपन्न हो जाते हैं। लेकिन उन दिनों यह भी एक बडा लक्ष्य था। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए सुदर्शन जी ने अविश्रांत प्रवास किया । अपने स्वयं के उदाहरण से उन्होंने स्वयंसेवकों में वह ऊर्जा भरी कि तीनों लक्ष्य सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिये गए । मध्यभारत के संघ इतिहास में पहली बार शाजापुर जिले के चिलर बांध के किनारे 2800 स्वयंसेवकों का शिविर संपन्न हुआ। आज भी सैकडों प्रौढ और वयोवृद्ध स्वयंसेवकों की आँखों में उस शिविर की स्मृति एक नई चमक पैदा कर देती है।

सुदर्शन जी सचमुच कई मामलों में अनूठे थे। सरसंघचालक का दायित्व छोडने के बाद भोपाल में संघ कार्यालय ‘समिधा’ उनका आवास बना । यहाँ उनका साढे तीन साल का निवासकाल स्वयंसेवकों को बेहद प्रेरणादायी अनुभव दे कर गया । सरसंघचालकत्व के विराट वलय मे शोभित उनके महद् व्यक्तित्व ने एक सामान्य स्वयंसेवक की कर्तव्य-सजग भूमिका में अपने आपको जिस सहजता से ढाल लिया था उसे देख कर कई बार मन में प्रश्न उठता था कि इसे वामन की विराटता कहा जाये या विराट का वामन हो जाना । उनका केवल ‘दायित्व’ बदला था ‘दायित्वबोध’ नहीं। साढे तीन साल तक वे लगातार, रोज इसी दायित्वबोध के साथ सक्रिय रहे। भोंपाल की लगभग सभी बाल और किशोर शाखाएं उन्होंने प्रत्यक्ष जाकर देखी थीं। एक सामान्य कार्यकर्ता की तरह वे छोटे-छोटे बच्चों को खेल खिलाते, उन्हें कदमताल करना सिखाते और कहानियाँ सुनाते, उनके साथ खेलते और खिलखिलाते । यह दृश्य देख कर अनुभव होता था मानो एक कलश ही अपनी नीव को सींच रहा है।

स्वयंसेवक के सुख-दुख में सहभागी होने को लेकर वे बहुत आग्रही थे। समिधा कार्यालय में खाना बनाने वाले एक युवक की माँ बीमार हो गईं तो उनसे मिलने वे रायसेन जिले के दूरस्थ ग्राम में उनके घर जा पहॅंचे। शल्य चिकित्सा के लिए उन्हें भोपाल लेकर आए और जयप्रकाष अस्पताल में उन्हें भर्ती करवाया। रोज उन्हें देखने जाते । अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद चिकित्सकीय देखरेख के लिए सुदर्शन जी ने उन्हें भोपाल में रोक लिया और पूरे परिवार के एक सप्ताह तक रूकने ठहरने की व्यवस्था की । क्या आश्चर्य कि समिधा में रखे सुदर्शन जी के चित्र को देखते ही उस युवक की आंखें आज भी भर आती हैं ?
अरेरा कालोनी के एक मकान में चौकीदारी करने वाले व्यक्ति का छोटा-सा बेटा वहाँ की सायं शाखा में जाता था। बालसुलभ आकांक्षा में उसने अपनी बहन की शादी का निमंत्रण सुदर्शन जी को दे दिया । रात में शादी थी। उस उम्र में भी वे रात को 12 बजे विवाह में शामिल होने उसके घर पहॅुचे। एक कमरे के घर में वर-वधु पक्ष के लोग जैसे-तैसे बैठे थे। यहाँ वहाँ सामान बिखरा पडा था। देखते ही सुदर्शन जी ने स्वयं झाडू उठायी, सबने मिल कर कमरे को व्यवस्थित किया । उन्होंने वर-वधु के गले में मालायें पहनायीं, दोनों को भेंट में वस्त्र दिए और आशीर्वाद प्रदान किया। रात में डेढ बजे जब वे बाहर निकले तो उन्हें विदा करने बाहर आए हुए घराती और बाराती इसी बात पर धन्य हुए जा रहे थे कि चैकीदारी करने वाले उनके जैसे निर्धन परिवार की खुशी में इतना बडा व्यक्ति शामिल हुआ।

वे रोज सुबह पैदल घूमने जाते थे। एक दिन घूमते-घूमते वे सुबह-सुबह अचानक अरेरा कालोनी में रहने वाले एक चिकित्सक के घर चले गए । घण्टी बजाते ही उस चिकित्सक महोदय ने दरवाजा खोला तो एक अपरिचित चेहरा देख कर असमंजस में पड गए। उन्हें देखते ही सुदर्शन जी बोल उठे ‘‘मैं सुदर्शन, आपकी नाम-पट्टिका देखी तो परिचय करने चला आया।’’ फिर पूरे परिवार के साथ बैठकर वे गपशप करते रहे। इतने सहज और सरल थे वे । जिस सहजता से चौकीदार की बेटी की शादी में चले गए, उसी सहजता से एक प्रतिष्ठित चिकित्सक के घर पहुँच गए । अपने पद, नाम, प्रतिष्ठा और गुणसंपदा आदि किसी बात का कोई अहंकार नहीं।

वे अद्भुत प्रतिभा संपन्न व्यक्ति थे। उनकी स्मरशक्ति बेजोड थी। गहरी अध्ययनशीलता और विस्मयकारी स्मरणशक्ति को जब उनके प्रभावी वक्तृत्व का जोड मिलता था तो श्रोता मंत्रमुग्ध होकर सुनते रहते थे। इतिहास, संस्कृति, विज्ञान या स्वदेशी जैसे गरिष्ठ विषय हों या अनौपचारिक चर्चाओं में चुटकुले सुनाने हों, सुदर्शन जी का कोई सानी नहीं था। कुछ वर्ष पहले भोपाल रेल्वे स्टेशन पर ट्रेन के आने में विलंब होता चला गया तो लगभग ढाई घण्टों तक वे एक के बाद एक दिलचस्प किस्से और चुटकुले सुनाते रहे, और वह भी पूरे हावभाव और अभिनय के साथ।

स्वदेशी और स्वभाषा के वे जबर्दस्त पक्षधर थे। हिंदी में अंग्रेजी की मिलावट उन्हें सख्त नापसंद थी। उन्हें 12 भाषाओं का ज्ञान था। अंग्रेजी में वे धाराप्रवाह भाषण दे सकते थे। लेकिन उनकी हिंदी में कभी गलती से भी अंग्रेजी शब्द नहीं आता था। भाषा और वर्तनी की शुद्धता के वे बेहद आग्रही थे। भोपाल के एक बडे अखबार में भाषा की त्रुटियों और अंग्रेजी की मिलावट को देख कर वे स्वयं एक बार उस अखबार के दफ्तर में जा पहुँचे थे।

उनके आचार, विचार और शब्द, देश , समाज, संस्कृति और इतिहास की उनकी गहरी समझ और विशिष्ट अंतर्दृष्टि का प्रतिबिंब होते थे। सत्य कई बार कटु होता है, पर वह किसी न किसी को तो कहना ही होता है। वे बडी बेबाकी और साफगोई से अपने विचार रखते थे। सत्य को लोग आसानी से न पचा पाते हैं और न ही स्वीकार कर पाते हैं। इसलिए कभी-कभी उनके कथन से लोग विवाद के बवण्डर भी खडे कर देते थे। पर वे उसमें भी शांत बने रहते । इतना शांत और संयत शायद वही व्यक्ति रह सकता है जो अपने विचारों को लेकर संशयमुक्त और उनकी सत्यता के प्रति आश्वस्त होता है।

भारत के संविधान की पुनर्समीक्षा के बारे में उनके कथन की कुछ हलकों में बडी तीखी आलोचना हुई। संविधान को डा- आंबेडकर के सम्मान के साथ जोड कर देखने वालों में से कुछ लोग उनकी बात को पचा नहीं पाये, हालांकि स्वयं डा आंबेडकर ने संविधान की युगानुकूल समीक्षा और उसमें संशोधन या पुनर्लेखन की संभावना को स्थान दिया हुआ है। सुदर्शनजी के इस कथन की पुष्टि स्वयं डा आंबेडकर के पौत्र “डॉ प्रकाश आंबेडकर ने सांची में बौद्ध एवं भारतीय ज्ञान अध्ययन केन्द्र के शिलान्यास के मौके पर आयोजित संगोष्ठी में मनुस्मृति की वास्तविकता और समकालीन संदर्भों में संविधान की पुनर्समीक्षा की बात कहते हुए की थी।

ये सुदर्शन जी ही थे जो स्वयं फोन करके नागपर में डॉ बाबासाहब की दीक्षाभूमि के दर्शन करने गए। सामाजिक समरसता को लेकर संघ की प्रतिबद्धता जगजाहिर है। सुदर्शन जी ने ही ईसाई और मुस्लिम नेतृत्व के साथ संवाद की पहल की । उन्होंने ही भारतीय या स्वदेशी चर्च की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके ही आग्रह पर राष्ट्रीय मुस्लिम मंच की स्थापना हुई । उनके ही सरसंघचालक रहते संघ के नागपुर मुख्यालय में ईसाई और मुस्लिम नेताओं, विचारकों और धार्मिक प्रमुखों की आवाजाही बढी। जो लोग ईद के दिन मुस्लिम समाज को बधाई देने के लिए भोपाल के ईदगाह में जाने के सुदर्शन जी के आग्रह की बात सुन कर चौंक उठे थे उन्हें तो शायद भरोसा ही नहीं होगा कि एक बार नमाज का वक्त हो जाने पर सुदर्शन जी से मिलने गए हुए कुछ मुस्लिम नेताओं के लिए स्वयं सुदर्शन जी ने नागपुर कार्यालय में ही नमाज अदा करने की व्यवस्था की थी।

उनके व्यक्तित्व के ये पहलू ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं हैं। बेशक वे आग्रही थे, लेकिन दुराग्रही नहीं। पूर्वाग्रही तो बिलकुल भी नहीं। वे सत्य के पक्षधर थे, पक्षपाती नहीं। 81 वर्ष का सुदीर्घ और सार्थक जीवन जीने के बाद किसी योगी की तरह ध्यानस्थ अवस्था में उनकी मृत्यु हुई । वे रायपुर में जन्मे, देश दुनिया में घूमे और रायपुर में ही देह त्याग दी। संघ मुख्यालय रेशिमबाग में स्वयंसेवकों ने उन्हें सरसंघचालक के रूप में प्रथम प्रणाम दिया था तो रेशिमबाग में ही अंतिम संस्कार से पहले पूर्व सरसंघचालक के रूप में स्वयंसेवकों ने उन्हें अंतिम प्रणाम दिया । इन दोनो संयोगों में संकेत शायद यह है कि उनका जन्म-मृत्यु का चक्र पूरा हुआ। जीवन अपनी सार्थकता को प्राप्त हुआ। आत्मा परमात्मा में विलीन हो गई। अब सुदर्शन जी स्मृति-शेष हैं। आज उनके जन्मदिवस पर उन्हें सादर नमन.

साहित्य, संस्कृति एवं कला के संवर्धन हेतु आईजीएनसीए और लेखक गांव के बीच एमओयू

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नई दिल्ली : इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) एवं लेखक गांव, देहरादून के बीच साहित्य, संस्कृति एवं कला के क्षेत्र में सहयोग और संयुक्त गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। आईजीएनसीए की ओर से सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी तथा लेखक गांव की ओर से निदेशक श्रीमती विदुषी निशंक ने समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए। आईजीएनसीए के डीन (प्रशासन) और कला निधि प्रभाग के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम आईजीएनसीए के उमंग सम्मेलन कक्ष में संपन्न हुआ।

इस अवसर पर दोनों संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भारतीय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार के लिए मिलकर कार्य करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की और भविष्य में संयुक्त संगोष्ठियों, कार्यशालाओं, सांस्कृतिक आयोजनों और शोधपरक गतिविधियों के संचालन की संभावनाओं पर चर्चा की। डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, लेखक गांव के साथ मिलकर आईजीएनसीए वहां क्या कर सकता है, यह प्रश्न हमारे सामने था। हमारा सम्बंध सीधे-सीधे लेखकों से नहीं है। हम कुछ कार्यक्रम करते हैं, जिसमें लेखकों को आमंत्रित करते हैं, पर वैसे सीधे-सीधे हमारा सम्बंध लेखकों से नहीं होता। खासकर, जो समकालीन साहित्यकार, लेखक हैं, उनसे तो बिल्कुल ही नहीं हो पाता। एक-आध कार्यक्रम अगर होते हैं, क्योंकि हम अलग तरह के प्रकल्पों पर काम करते हैं, जो भारतीय संस्कृति की स्थायी निधि, स्थायी कोष, स्थायी संदर्भ की बात करते हैं। तो हम क्या लेखक गांव के साथ कर सकते हैं? तो, हमें यह समझ में आया कि ऐसी बहुत सारी चीजें हैं, जहां हमें ऐसे विशेषज्ञों की आवश्यकता पड़ती है, जो एक साथ बैठकर एक नैसर्गिक एवं निष्पक्ष वातावरण में मंथन करें। अगर आप यहां बैठकर मंथन करते हैं, तो थोड़ी देर बाद आपके अंदर यह बात हावी होने लगती है कि हम कला केंद्र में बैठे हैं।यह आपके अवचेतन में आ जाता है, तो आपके अंदर जो एक निष्पक्ष विचार प्रक्रिया होनी चाहिए, वह शायद कई बार नहीं होती। इसलिए हमको लगा कि अगर हम एक ऐसी जगह जाएंगे, जहां हमारे विद्वान शांत एवं निष्पक्ष वातावरण में बैठकर मंथन कर सकें, ऐसी जगह हमारे लिए अत्यंत आवश्यक है।

उन्होंने आगे कहा, दूसरा एक विचार यह आया कि हम लोग बहुत सारे युवा पेशेवरों के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम करते हैं, चाहे फिर वह कंजर्वेशन हो, रिसर्च मेथोडोलॉजी हो, कल्चरल इंफॉर्मेटिक्स हो, क्रिटिकल एडिशन तैयार करना हो। तो ऐसे में वर्कशॉप के लिए भी अगर हम कोई ऐसी आवासीय जगह ढूंढ़े, जहां पर प्रतिभागी अपनी पढ़ाई की अवधि के बाद भी आपस में बातचीत करके उसको आगे बढ़ा सकें, ऐसा वातावरण भी आपको लेखक गांव में मिलता है। यह रचनात्मकता के लिए उर्वर भूमि तैयार करने वाला एक स्थान है, पवित्र स्थान है। इसकी ऊर्जा और प्रेरणा से लोगों की रचनात्मकता मुखरित हो सकती है।

विदुषी निशंक ने लेखक गांव के बारे में बताते हुए कहा कि लेखक गांव की यात्रा इस प्रश्न से शुरू हुई थी कि लेखक के बारे में कोई सोचेगा क्या? क्या कोई ऐसा स्थान होगा, जहां साहित्य केवल लिखा नहीं जाएगा, बल्कि जिया भी जाएगा? जहां प्रकृति, संस्कृति, संवेदना, संवाद और सृजन एक साथ उपस्थित होंगे? जहां हिमालय केवल दृश्य नहीं, बल्कि दृष्टि बनेगा। इसी विचार से, हिमालय और मां गंगा के आशीर्वाद के साथ तथा डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक जी की अविराम साधना और दूरदृष्टि ने लेखक गांव की परिकल्पना को यथार्थ के धरातल पर उतारा है। यह इस देश का पहला लेखक गांव है, जो हिमालय की वादियों में बसा है। लेखक गांव केवल लेखकों के लिए सीमित नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत केंद्र है। यह साझेदारी दोनों संस्थानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आईजीएनसीए के सानिध्य में यह हमारे लिए बहुत बड़ा अवसर है। यह दो संस्थानों का मिलन नहीं है, बल्कि दो विचारों का मिलन है।

प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने कहा, जब हम किसी भी संस्था के साथ एमओयू साइन करते हैं, तो सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह होता है कि दोनों संस्थाएं मिलकर भारतीय साहित्य और संस्कृति को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं। लेखक गांव के साथ यह समझौता ज्ञापन कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अनूठी पहल है। भारत में ऐसी जगहों के उदाहरण आपको बहुत कम देखने को मिलेंगे, जहां जाकर आप रुक सकते हैं, अपनी किताब लिख सकते हैं, अपनी रिसर्च कर सकते हैं।

समझौता ज्ञापन कार्यक्रम में आईजीएनसीए के अधिकारियों एवं कर्मचारियों, लेखक गांव के प्रतिनिधियों, डॉ. बेचैन कंडियाल, अलका सिन्हा, सर्वेश उनियाल सहित साहित्य, संस्कृति एवं कला जगत से जुड़े अनेक विद्वान, लेखक, कलाकार, शोधार्थी तथा अतिथि उपस्थित रहे। दोनों संस्थानों के बीच यह समझौता ज्ञापन दो सांस्कृतिक धाराओं का एक मिलन है। निश्चित रूप से यह समझौता ज्ञापन भारतीय सभ्यता, संस्कृति और कला के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध होगा।

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