सांसद राघव चड्ढा की शादी का सारा खर्च पत्नी परिणीति चोपड़ा ने उठाया?

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जयपुर : आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा इन दिनों संसद में सरकार से आम आदमी से जुड़े मुद्दों पर सवाल पूछकर सुर्खियां बटोर रहे हैं। उनकी इस सक्रियता की काफी तारीफ हो रही है। लेकिन उनकी अपनी शादी की कहानी भी चर्चा में रही है। सितंबर 2023 में उदयपुर में हुई उनकी शादी को लेकर कई सवाल उठे थे। अब जब कुछ लोग उनकी संपत्ति और शादी के खर्च को लेकर सवाल कर रहे हैं, तो एक एंगल सामने आ रहा है कि शादी का पूरा खर्च उनकी पत्नी, बॉलीवुड अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा ने उठाया।

राघव चड्ढा और परिणीति चोपड़ा की शादी उदयपुर के दो लग्जरी होटलों में हुई। राघव की बारात ताज लेक पैलेस में ठहरी, जहां से नाव द्वारा लीला पैलेस पहुंचकर मुख्य विवाह समारोह हुआ। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ताज लेक पैलेस में 40-50 कमरे बुक किए गए थे, जबकि लीला पैलेस में मेहमानों और समारोह का इंतजाम था। लगभग 100-200 मेहमान शामिल हुए। वेडिंग प्लानर्स के अनुसार, ऐसे 5-स्टार पैलेस वेडिंग का खर्च आमतौर पर 1 से 5 करोड़ रुपये तक हो सकता है, जिसमें कमरों का किराया, डेकोर, खान-पान और अन्य व्यवस्थाएं शामिल हैं।

राघव चड्ढा के चुनावी हलफनामों (माइनेटा डेटा) के अनुसार, उनकी कुल संपत्ति (नेट वर्थ) लगभग 20 लाख से 50 लाख रुपये के आसपास रही है। एक हलफनामे में movable assets करीब 37 लाख रुपये दिखाए गए थे, जबकि immovable assets शून्य थे। कोई बड़ी देनदारी भी नहीं। चार्टर्ड अकाउंटेंट होने के बावजूद उनकी आय सांसद वेतन और कुछ निवेशों तक सीमित दिखती है। इतनी बड़ी शादी के खर्च को अपनी पूरी संपत्ति से वहन करना उनके लिए मुश्किल होता।

दूसरी ओर, परिणीति चोपड़ा एक सफल बॉलीवुड अभिनेत्री हैं। उनकी नेट वर्थ विभिन्न रिपोर्ट्स में 60 से 74 करोड़ रुपये तक बताई जाती है। फिल्मों, ब्रांड एंडोर्समेंट और अन्य स्रोतों से उनकी सालाना कमाई करोड़ों में है। उन्होंने खुद घर की फाइनेंस मैनेजमेंट संभालने की बात कही है, क्योंकि “उनकी जॉब अच्छा पैसा देती है”। शादी के समय परिणीति की फाइनेंशियल स्थिति मजबूत थी।

कुछ फिल्मी पंडितों द्वारा यह एंगल दिया जा रहा है कि शादी का सारा खर्च परिणीति चोपड़ा ने उठाया। लग्जरी होटलों में ठहरने, मेहमानों की व्यवस्था और समारोह की भव्यता को देखते हुए यह संभव लगता है कि अभिनेत्री की आय ने इसे संभव बनाया। बाद में राघव चड्ढा ने भी स्पष्ट किया कि यह 5-स्टार होटल था, कोई 7-स्टार नहीं, और कमरों की कीमत 10 लाख नहीं थी। लेकिन कुल खर्च को लेकर सवाल तो है। जिसका जवाब राघव ने अब तक नहीं दिया है।

पश्चिम एशिया की उथल-पुथल में भारत की संतुलित कूटनीति

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अंशुमान

दिल्ली । फरवरी 2026 मे शुरू हुए संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच टकराव के अचानक उभरने से, जिसकी शुरुआत अमेरिका- इजरायल द्वारा ईरानी परमाणु ठिकानों पर हमलों से हुई और जिसके जवाब में तेहरान ने खाड़ी क्षेत्र के बुनियादी ढांचे पर मिसाइल हमले किए। इस पूरे घटनाक्रम ने पूरे पश्चिम एशिया को एक नए अस्थिर दौर में धकेल दिया है। तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाला जहाजी व्यापार बार-बार बाधित हो रहा है, और एक बार फिर यह क्षेत्र दुनिया को यह याद दिला रहा है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को झकझोरने की इसकी क्षमता कितनी गहरी है।

इन सभी तनावों के बीच इस क्षेत्र में भारत के हित बहुत बड़े हैं। सबसे अहम है तेल और ऊर्जा पर उसकी निर्भरता, उसके बाद खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा और वहां से आने वाला पैसा, और फिर लगातार बढ़ते कूटनीतिक रिश्ते। ऐसे हालात में भारत की विदेश नीति की मजबूती और उसका संतुलन यह दोनों ही भारत की कठिन परीक्षा जैसे है। ध्यान देने वाली बात यह है कि पिछले कई दशकों से भारत एक ऐसी नीति पर चल रहा है, जिसे आसान भाषा में कहें तो संतुलन बनाकर सबके साथ रिश्ते रखना कहा जा सकता है। यानी भारत ने खुद को किसी एक गुट या देश तक सीमित नहीं किया, बल्कि एक साथ ईरान, खाड़ी देशों, इजरायल और अमेरिका सभी से अच्छे संबंध बनाए रखे हैं। जियोपॉलिटिक्स में अक्सर कहा जाता है कि ऐसा संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता है, लेकिन जब संकट आता है तो यही नीति सबसे ज्यादा काम आती है। अभी के टकराव में भी भारत ने बहुत सोच-समझकर कदम उठाए हैं जैसे भारत ने सबसे शांति बनाए रखने की अपील की, अपने आर्थिक हितों का ध्यान रखा और सभी पक्षों से बातचीत जारी रखी। इस तरह भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और लंबे समय के हितों दोनों को सुरक्षित रखने की कोशिश की है।

ईरान-अमेरिका टकराव से पैदा हुए इस संकट का सबसे पहला और सीधा असर आर्थिक मोर्चे पर दिखाई देता है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का करीब 88 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, इसलिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में किसी भी तरह की रुकावट का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यह समुद्री रास्ता दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल गुजरता है। जब इस रास्ते से तेल ले जाने वाले टैंकरों की आवाजाही कम होती है या खतरे में पड़ती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं। इसका सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ता है, जिससे महंगाई बढ़ने, रुपये पर दबाव आने और आम लोगों की जेब पर असर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है। पेट्रोल-डीजल के दाम से लेकर रोजमर्रा की चीजों तक, हर स्तर पर इसका असर महसूस किया जा सकता है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारत सरकार ने इस तरह के संकट से निपटने के लिए तैयारी की है। ऊर्जा स्रोतों को अलग-अलग देशों में फैलाने यानी डायवर्सिफिकेशन और रणनीतिक तेल भंडार बनाने पर खास जोर दिया गया है। यही वजह है कि मौजूदा संकट के बावजूद भारत पूरी तरह से असहज स्थिति में नहीं है। देश के पास लगभग दो महीने की जरूरत के बराबर पेट्रोलियम भंडार मौजूद है, जो आपात स्थिति में काम आता है। इसके अलावा, भारत ने रूस, अमेरिका और अन्य देशों से भी तेल की आपूर्ति बढ़ाकर अपने विकल्प खुले रखे हैं। इस रणनीति की वजह से अचानक पैदा हुए इस असंतुलन को काफी हद तक संभालने में मदद मिली है और तत्काल आपात जैसी स्थिति से बचा हुआ है।

इस पूरे घटनाक्रम से एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि आज के दौर में ऊर्जा सुरक्षा कोई विकल्प नहीं, बल्कि मजबूरी और प्राथमिक आवश्यकता बन चुकी है। खासकर भारत जैसे देश के लिए, जिसकी आर्थिक विकास की रफ्तार काफी हद तक बाहर से आने वाले तेल और ईंधन पर निर्भर करती है, ऐसे संकट भविष्य में भी चुनौती बने रहेंगे। इसलिए लंबे समय की ठोस योजना, अलग-अलग देशों से ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करना और पर्याप्त तेल भंडार तैयार रखना ही उपाय है और इन्हीं उपायों के सहारे ऐसी आपात स्थितियों का असर कम किया जा सकता है और अर्थव्यवस्था को स्थिर रखा जा सकता है।
भारत और ईरान के बीच आर्थिक संबंध इस मुश्किल समय में भी समझदारी और व्यावहारिक तरीके से बनाए रखे गए हैं। भले ही अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के चलते रुपये के बदले तेल का पुराना व्यापार बंद हो गया हो, लेकिन भारत ने एक वैकल्पिक रास्ता निकालते हुए ह्यूमैनेटेरियन विंडो के तहत रियायती दरों पर ईरान से एलपीजी की आपूर्ति जारी रखी। करीब 5 लाख टन एलपीजी की यह आपूर्ति भारत के लिए बेहद अहम साबित हुई, क्योंकि इससे अचानक उपजे संकट को टालने में मदद मिली। इस तरह की रणनीति ने भारत को बिना किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय दबाव में आए हुए अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक हिस्सा यानी लगभग 5 प्रतिशत ईरान से बनाए रखने में मदद दी। भारत की इस रणनीति से दिखता है कि कठिन हालात में भी अगर नीति व्यावहारिक हो, तो जरूरी जरूरतों को पूरा किया जा सकता है।

यही नहीं वैश्विक तनावों के बीच भारत ने अपने दूसरे विकल्पों को भी लगातार मजबूत किया है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे देशों के साथ ग्रीन हाइड्रोजन और अन्य ऊर्जा क्षेत्रों में करीब 10 अरब डॉलर का निवेश इस दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे न सिर्फ ऊर्जा के नए स्रोत और रास्ते खुल रहे हैं, बल्कि भारत एक भरोसेमंद और दीर्घकालिक साझेदार के रूप में भी उभर रहा है। साफ है कि इससे आने वाले समय में भारत की ऊर्जा सुरक्षा और ज्यादा मजबूत होगी। इस संकट का एक और बेहद महत्वपूर्ण पहलू खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों की सुरक्षा और उनके हितों से जुड़ा है। पश्चिम एशिया में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते हैं, और उनके द्वारा भेजा गया पैसा यानी रेमिटेंस भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अहम है। ऐसे में क्षेत्रीय संघर्ष का कोई भी असर वह चाहे हवाई सेवाओं में बाधा हो या फिर आर्थिक गतिविधियों में कमी हो या बुनियादी ढांचे पर खतरा सीधे इन भारतीय प्रवासियों के जीवन पर पड़ता है। इसी को ध्यान में रखते हुए, जैसे ही हालात बिगड़ने लगे, भारत के विदेश मंत्रालय ने तेजी से कदम उठाए। संभावित प्रभावित क्षेत्रों से अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने की योजनाएं तैयार की गईं और आपातकालीन सहायता की व्यवस्था की गई। यह दिखाता है कि भारत के लिए यह मुद्दा सिर्फ रणनीतिक नहीं, बल्कि अपने नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ी एक मानवीय जिम्मेदारी भी है। भारत-ईरान संबंध इस पूरे परिदृश्य में एक संवेदनशील लेकिन महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। पश्चिमी प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद, भारत ने हमेशा ईरान को ऊर्जा सुरक्षा और मध्य एशिया तक पहुंच के लिहाज से एक अहम साझेदार माना है। चाबहार बंदरगाह जैसी परियोजनाएं इसी दीर्घकालिक सोच का हिस्सा हैं। मौजूदा संकट के बावजूद भारत ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि ईरान के साथ सहयोग पूरी तरह प्रभावित न हो। दूसरी ओर, भारत संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों के साथ अपने आर्थिक और निवेश संबंधों को भी तेजी से मजबूत कर रहा है। इन समानांतर रिश्तों को संतुलित रखना आसान नहीं है, लेकिन यही संतुलन भारत को कूटनीतिक लचीलापन और विकल्प देता है।

रणनीतिक दृष्टि से यह संकट क्षेत्रीय संपर्क (connectivity) परियोजनाओं के महत्व को भी रेखांकित करता है। चाबहार बंदरगाह, जो अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) से जुड़ा है, भारत के लिए मध्य एशिया और उससे आगे के बाजारों तक पहुंच का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके साथ ही खाड़ी देशों और इजरायल के साथ उभरती आर्थिक और सुरक्षा साझेदारियां भारत की बदलती क्षेत्रीय भूमिका को भी दर्शाती हैं। इन सबके बीच में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन सभी पहलुओं को कैसे एक-दूसरे के पूरक के रूप में विकसित किया जाए, न कि प्रतिस्पर्धी ध्रुवों के रूप में।

कूटनीतिक स्तर पर भारत ने सावधानी पूर्ण तटस्थता का रुख अपनाया है। विदेश मंत्रालय ने लगातार संयम, संवाद और तनाव कम करने की अपील की है। वैश्विक स्तर पर यह रुख भारत को सभी पक्षों के साथ ना सिर्फ जो़डे रखता बल्कि उसे किसी एक पक्ष के समर्थक के रूप में देखे जाने से बचाता है। वर्तमान समय में जब जहां प्रतिस्पर्धा और अविश्वास गहरे हो रहे हैं तब यह संतुलित नीति भारत की विश्वसनीयता को बढ़ाती है।

दूरगामी और बहुआयामी परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारत की पश्चिम एशिया नीति अब परिपक्व होती दिखाई दे रही है। यह क्षेत्र अब केवल ऊर्जा आपूर्ति का स्रोत नहीं रहा, बल्कि एक जटिल रणनीतिक मंच बन चुका है, जहां आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा हित आपस में गहराई से जुड़े हैं। मौजूदा हालात या संकट से साफ तौर पर देखा जा सकता है कि अलग-अलग देशों के साथ रिश्ते बनाकर और परिस्थितियों के हिसाब से अपनी कूटनीति को बदलकर चलना ही सबसे बेहतर तरीका है।

आखिर में, अमेरिका-ईरान का टकराव फिर से यह दिखाता है कि पश्चिम एशिया की अस्थिरता दुनिया पर असर डालती रहेगी। भारत के लिए असली चुनौती इससे पूरी तरह बचना नहीं है, क्योंकि हकीकत में यह संभव नहीं है बल्कि इसे समझदारी, संतुलन और साफ रणनीति के साथ संभालना ही समझदारी है। भारत की अब तक की प्रतिक्रिया यह दिखाती है कि भारत समझता है कि आज की दुनिया में प्रभाव केवल किसी का पक्ष चुनने से नहीं, बल्कि सभी पक्षों से संवाद बनाए रखने की रणनीति से आता है। जियोपॉलिटिकल दृष्टिकोण में भारत का यह संतुलित रवैय किसी कमजोरी का संकेत नहीं, बल्कि एक उभरती हुई शक्ति की रणनीतिक परिपक्वता का प्रमाण है। चुनौतियां निश्चित रूप से मौजूद हैं, लेकिन भारत जैसे तेज से उभरते राष्ट्र के लिए संतुलन केवल अस्तित्व की रणनीति नहीं बल्कि प्रभाव और नेतृत्व की असली पहचान बन चुका है।

(अंशुमान, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

बंगाल विधानसभा चुनावों से पूर्व फिर खेल हुआ प्रारंभ आखिर कब तक बचाव कर पाएंगी ममता दीदी ?

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लखनऊ । वर्ष 2026 के पश्चिम बंगाल विधनासभा चुनाव घोषित हो चुके हैं। जैसे -जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है वैसे वैसे राज्य की राजनीति का पारा चढ़ रहा है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए अपने प्रचार को आक्रामक बना चुकी हैं। उनके लिए इस बार राह उतनी आसान नहीं है। भारतीय जनता पार्टी भी इस बार हर हाल में बंगाल में अपनी सरकार बनाने को संकल्पबद्ध है। बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सभा में कहा था कि गंगा नदी बिहार से ही बंगाल में जाती है और उसी दिन से बंगाल मे राजनीतिक तपिश का अनुभव होने लगा था।

बंगाल में ममता दीदी के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की राह बहुत आसान नहीं है क्योकि कांग्रेस और वामपंथी दल भी पूरी ताकत से ममता दीदी को हराने के लिए काम कर रहे हैं। उनकी अपनी ही पार्टी के निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के नाम पर मस्जिद की नींव रखने और फिर नयी पार्टी बनाकर विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर राजनैतिक ध्रुवीकरण की समस्या पैदा कर दी है। मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर के कदमों का ममता दीदी की सरकार ने कोई प्रतिवाद नहीं किया कि कहीं उनके मुस्लिम मतदाता नाराज न हो जाएं। बंगाल की कानून व्यवस्था भी ममता बनर्जी के लिए चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए समस्या पैदा कर सकती है। संदेशखाली में महिलाओं के साथ घटित वीभत्स घटना के आरोपी को बचाने से लेकर आर. जी कर में महिला डाक्टर के साथ बलात्कार और हत्या की भयंकर घटना में शामिल तृणमूल समर्थकों को बचाने के प्रयास चुनाव प्रचार के दौरान जमकर उछाले जायेंगे। इसके अलावा बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार अनेक घोटालों में बुरी तरह से फंसी हुई है और उन सभी घोटालो की जांच रही है।

चुनाव आयोग की तरफ से मतदाता सूची के शुद्धीकरण के गहन अभियान को ममता बनर्जी ने जिस तरह बाधित करने का प्रयास किया उससे उनकी अपनी ही छवि ख़राब हुई है। मतदाता शुद्धीकरण अभियान के दौरान ममता बनर्जी व उनकी पार्टी ने पूरा दम लगा दिया कि किसी प्रकार इस कार्य को बाधित किया जाए या रोक दिया जाए। ममता की ओर से एसआईआर को लेकर भ्रम पैदा करने के पूरे प्रयास किए गए जिसमें उनकी ओर से पहले कहा गया कि वह एसआईआर फार्म नहीं भरेंगी और फिर उन्होंने भर भी दिया।

आई पैक घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी के दौरान ममता जी जिस तरह पुलिस लेकर पहुँच गयीं वह हास्यास्पद था लेकिन अब उनके लिए अत्यंत गंभीर समस्या बनने जा रहा है। अब आई पैक का प्रकरण हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। ममता दीदी ने कहा है कि बीजेपी ईडी के सहारे उनकी पार्टी की रणनीति चुराना चाहती है। आई- पैक प्रकरण को लेकर वह अत्यंत आक्रामक मुद्रा हैं। आई- पैक प्रकारण में ग्रीन फाइल को लेकर प्रश्न किया जा रहा है कि आखिर उन ग्रीन फाईल में ऐसा क्या था जिसे पाने के लिए ममता दीदी ने राज्य पुलिस की पूरी ताकत लगा दी। अब ईडी उन फाईल्स को तत्काल पाने के लिए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गई है। अदालत में दोनों ही पक्षों ने अपनी-अपनी याचिकाएं लगा दी है। आई -पैक प्रकरण में ईडी की छापेमारी की खबर मीडिया में आग की तरह फैली और उसके बाद से ही कोलकाता से लेकर नई दिल्ली तक राजनीतिक हलचल तीव्र हो गई।

टीवी चैनलों पर संविधान की किताब हाथ में लेकर घूमने वाले आ गए और कहा जाने लगा कि चुनाव से दो -तीन महीने पहले ही यह छापेमारी क्यों शुरू हो जाती है ? जबकि वास्तविकता यह है कि यह जांच काफी समय से चल रही है इस घोटाले की जांच रुकवाने के लिए तृणमूल नेता अभिषेक बनर्जी ने एक याचिका दायर की थी जो खारिज हो चुकी है। ईडी का यह छापा तृणमूल कांग्रेस आईटी सेल के हेड प्रतीक जैन के घर और कार्यालय पर पड़ा था और माना जा रहा है कि उनके रिश्ते चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से भी हैं बिहार में अपनी सरकार बनने का सपना देखने वाले प्रशांत किशोर बंगाल में ममता दीदी के प्रमुख रणनीतिकारों में से एक हैं। यही कारण है कि जब ईडी का छापा पड़ा और ममता दीदी की पुलिस ने ईडी के कब्जे से ग्रीन फाइल अपने कब्जे में ली तभी से यह आरोप लगाया जाने लगा कि आखिर ममता दीदी की दाल में कुछ तो काला है । आखिर क्यों उन्हें ग्रीन फाइलों से इतना लगाव है? पहले ममता जी धमकी देते हुए कह रही थीं कि अगर वह बीजेपी के कार्यालाय में घुस गयीं तो क्या हो जाएगा और अब कह रही हैं कि जब बीजेपी को पता चला कि अबकी बार बीजेपी को पहले की तुलना में भी कम सीटें आ रही हैं तब उन्होंने हमारी रणनीति चुराने का प्रयास किया । जबकि प्रवर्तन निदेशालय ने अब सरकारी काम में बाधा डालने तथा कोयला घोटाले में ममता दीदी व तृणमूल सरकार को आरोपी बनाने का फैसला किया है।

ममता दीदी के सामने अब वैसी गंभीर चुनौती है जैसी दिल्ली के मुख्यंमत्री अरविंद केजरीवाल और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के समक्ष आ गई थी। अगर ममता दीदी को कोर्ट से राहत नहीं मिलती या वे ग्रीन फाइल्स को लेकर जांच एजेंसियों के साथ टकराव का रास्ता अपनाती हैं तो केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने पर मजबूर हो सकती है। बंगाल में लंबे समय से कई अवसरों पर राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग भाजपा व अन्य संगठनों की ओर से लगातार की जा रही है किंतु अभी तक केंद्र की राजग सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है जबकि राज्य में चुनावों के समय तृणमूल कांग्रेस के संगठित अपराधियों द्वारा चुनावी हिंसा का दौर प्रांरभ हो जाता है जिसके शिकार भाजपा व हिंदू संगठनो के कार्यकर्ता होते हैं। अभी आई -पैक प्रकरण के दौरान मची हलचल के बीच भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी की कार पर हमला बोला गया और वह आरोपियों पर कार्रवाई करने की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए।

ऐसा नहीं है कि ममता दीदी का जांच एजेंसियों के साथ टकराव पहली बार हुआ हो इससे पहले 27 अक्तूबर 2023 को जब राशन घोटाले में तत्कालीन मंत्री ज्योतिप्रिया मल्लिक को गिरफ्तार किया तब ममता उनके बचाव में उतरीं थीं। 11 अगस्त 2022 सीबीआई ने पशु तस्करी में तृणमूल नेता अनुव्रत मंडल को गिरफ्तार किया वह भी ममता दीदी के करीबी थे। 23 जुलाई 2022 को स्कूल भर्ती घोटाले में ईडी ने शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी को गिरफ्तार किया। 6 सितबर 2021 को नारद स्टिंग केस में सीबीआई ने तृणमूल नेताओं को गिरफ्तार किया तब ममता दीदी ने सीबीआई के कार्यालय के बाहर 6 घंटे धरना दिया। 6 सिंतबर 2021 को ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी से कोयला घोटाले में 9 घंटे तक पूछताछ हो चुकी हैं। बंगाल के राजनीतिक इतिहास में सबसे बड़ा शरदा चिटफड घोटाला हुआ है जिसकी जांच के दायरे में ममता दीदी सीधे फंसी हुई हैं ।

आगामी सप्ताह में बंगाल की राजनीति और चटखदार होने वाली है क्योंकि अब दोनों पक्षों नें एक दूसरे पर वार -पलटवार तेज कर दिए हैं। अदालतों का निर्णय बंगाल विधानसभा चुनावों की दिशा और दशा तय करने वाले हो सकते हैं।

भीतर के रण का विजेता ही ‘महावीर’

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प्रणय विक्रम सिंह

दिल्ली । कभी खुद से पूछिए कि वीर कौन होता है? वह, जो तलवार की धार पर इतिहास लिख दे या वह, जो अपने ही भीतर के तूफानों को थाम ले?

एक क्षत्रिय… राजमहलों में जन्मा, जिसके हिस्से में राज्य भी था, शक्ति भी थी, शौर्य भी था, पर उसने न सिंहासन चुना, न शस्त्र उठाया, न विजय का शोर किया, किसी चींटी तक को आहत नहीं किया और फिर भी वह ‘महावीर’ कहलाया।

यह इतिहास का विरोधाभास नहीं, यह आत्मा का उत्कर्ष है क्योंकि असली युद्ध बाहर नहीं भीतर होता है। और जो भीतर जीत ले, वही विराट होता है।

जैन परंपरा का यह अद्भुत सत्य है कि सभी तीर्थंकर क्षत्रिय कुल में जन्मे अर्थात जिनके संस्कारों में साहस, संयम और संघर्ष स्वाभाविक थे। लेकिन उन्होंने क्षत्रियत्व को शस्त्रों से नहीं, शील से सिद्ध किया… बाहुबल से नहीं, आत्मबल से प्रतिष्ठित किया।

भगवान महावीर में वही क्षत्रिय चेतना एक नए शिखर पर दिखती है। जहां युद्ध था, पर भीतर के विकारों से। जहां विजय थी, पर वासनाओं पर, जहां पराक्रम था, पर करुणा के साथ।

यह क्षत्रियत्व का सर्वोच्च स्वरूप था, जहां तलवार छूट गई, पर तेज नहीं। जहां राजसत्ता त्यागी गई, पर आत्मसत्ता जाग उठी।

और यही उनका त्याग है, तप है। एक ऐसा मौन विद्रोह, जिसने सत्ता को नहीं, स्वयं को पराजित किया। यह पलायन नहीं था, यह अपने ही भीतर के साम्राज्य को जीत लेने का साहस था।

हम सब अपने-अपने जीवन के सैनिक हैं, पर हमारी तलवारें बाहर की ओर तनी रहती हैं और भीतर बैठा शत्रु काम, क्रोध, लोभ, लिप्सा, अहंकार हमें चुपचाप पराजित करता रहता है।

महावीर ने इन्हें जीता इसलिए वे ‘अरिहंत’ हुए, अपने ही भीतर के ‘अरि’ का अंत करने वाले। उत्तराध्ययन की गाथा जैसे हमें झकझोरती है कि हजारों को जीतना बड़ी बात नहीं, एक बार खुद को जीत कर तो देखो…

आज हम क्रांति की बातें करते हैं। समाज बदलने, व्यवस्था बदलने और दुनिया बदलने का ऐलान करते हैं। पर क्या हमने खुद को बदलने की हिम्मत जुटाई?

क्योंकि सच यह है कि भीतर की क्रांति के बिना बाहर का परिवर्तन सिर्फ दिखावा है… सिर्फ पाखंड है।

महावीर का मार्ग मंदिरों में बंद नहीं है, वह जीवन की धड़कनों में बहता है, अहिंसा में, सत्य में, अपरिग्रह में प्रवाहित होता है। हर उस क्षण में, जब आप प्रतिक्रिया नहीं, संयम चुनते हैं। और ‘अनेकान्तवाद’… यह केवल दर्शन नहीं, संवाद की सभ्यता है।

यह सिखाता है कि सत्य किसी एक का नहीं होता…तुम भी सही हो सकते हो, मैं भी… और शायद दोनों मिलकर ही सत्य बनते हैं।

‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ यानी जीवन का मूल संदेश यही है कि हम एक-दूसरे से जुड़े हैं… हम अलग नहीं, परस्पर हैं।

आज जब दुनिया विचारों की तलवारों से कट रही है, जब धर्म संवाद नहीं, दंभ बनता जा रहा है, जब शक्ति संयम नहीं, वर्चस्व में बदल रही है तब महावीर का संदेश केवल प्रासंगिक नहीं…अनिवार्य हो जाता है।

और शायद यहीं आकर महावीर इतिहास नहीं रहते… धड़कन बन जाते हैं। वह तप, जो कभी वन की निर्जन नीरवता में जपा गया था, वही आज भी परंपराओं की पलकों पर जलता दिखाई देता है। गोरक्षपीठ की साधना में वह मौन मंथन आज भी सुनाई देता है, यहां शब्द नहीं, साधना बोलती है, यहां वेग नहीं, विवेक मार्गदर्शक बनता है; और यहां विजय किसी और पर नहीं, स्वयं के विकारों पर अर्जित होती है।

गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ जी का व्यक्तित्व भी उसी साधना का समकालीन स्वरूप प्रतीत होता है, मानो तप ने तंत्र का स्वरूप धारण कर लिया हो… जैसे साधना ने शासन को स्पर्श कर लिया हो। जहां निर्णय कठोर हो सकते हैं, पर उनका मूल करुणा में भीगा होता है। जहां अनुशासन दृढ़ होता है, पर भीतर एक संत की साधना भी साथ चलती है। मानो महावीर कहीं गए ही नहीं… समय के साथ बस स्वर बदलते गए… कभी वीतराग बनकर, कभी योगी बनकर, और कभी जनसेवा के संकल्प में ढलकर।

महावीर का त्रिरत्न सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र, जीवन का पूर्ण सूत्र है। सही देखो… सही समझो… और सही जियो। क्योंकि जो जिया नहीं गया, वह सत्य नहीं सिर्फ शब्द है।

और अंत में…बस इतना याद रखिए कि क्षत्रिय होना केवल युद्ध करना नहीं, धर्म के लिए खड़ा होना है।

और महावीर हमें सिखाते हैं कि सबसे बड़ा धर्म बाहर से पहले अपने भीतर को जीतना है। विरोध से पहले विवेक को जगाना है और जीवन को केवल जीना नहीं समझना है। क्योंकि सच यही है… महावीर होना कोई उपाधि नहीं, यह अपने भीतर के अंधेरे से रोज-रोज जीतने की प्रक्रिया है… और जिसने मन के महाभारत को जीत लिया, वह काल की सीमाओं से परे, कालजयी ‘महावीर’ बन जाता है।

धर्मावतार भगवान महावीर की जय!

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