संघ के संकल्प से सिद्ध हुआ राम मन्दिर निर्माण का स्वप्न

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सर्वेश कुमार सिंह

अयोध्या : भारतीय सांस्कृतिक गौरव की ऐतिहासिक तिथियों में एक और तिथि शामिल हो रही है। यह 25 नवम्बर 2025, तदनुसार मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि है। इस तिथि को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी श्रीराम मन्दिर के शिखर पर धर्मध्वजा फहरा कर पांच सौ साल की इच्छा और आकांक्षा की पूर्ति के रूप में मन्दिर निर्माण की पूर्णता की घोषणा करेंगे। यह सामान्य तारीख नहीं है, अद्भुत सुयोग है। ईश्वरीय शक्तियों के आध्यात्मिक बल से श्रीराम मन्दिर के लिए 45 साल के एक आन्दोलन का सुफल है। इस आन्दोलन की प्रेरणा, संकल्प और सफलता के मूल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दीर्घकालीन योजना है। राम मन्दिर निर्माण का संकल्प संघ का ही था, जोकि संघ के शताब्दी वर्ष में पूर्ण हो रहा है।

अयोध्या में भगवान श्रीराम के जन्मस्थान पर बने मन्दिर को आज से लगभग 493 साल पहले बाबर के सेनापति मीरबाकी ने तोड़ दिया था। यह तारीख 23 मार्च 1528 थी। पन्द्रह दिन के युद्ध में एक लाख 74 हजार हिन्दुओं के बलिदान के बाद मीरबाकी मन्दिर तोड सका था। मगर हिन्दुओं ने मन्दिर के पुनर्निर्माण की उम्मीद नहीं त्यागी थी, वे लड़ते रहे। वर्ष 1528 से 1949 तक 76 संघर्ष हुए। लेकिन मन्दिर निर्माण का ये लक्ष्य क्या इतनी ही आसानी से प्राप्त हो गया। इस इस दिन को दखेने और स्वप्न को साकार करने के लिए विधिवत योजना बनी, और यह योजना बनाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने। इसके लिए संघ के तत्कालीन सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस (बाला साहब देवरस) ने सभी परिस्थितियों, संघ की सामर्थ्य, समाज की आकांक्षा और मनोदशा का गहन अध्ययन, विश्लेषण कर उन कार्यकर्ताओं को श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को आगे बढ़ाने और लक्ष्य तक पहुंचने की अनुमति दी जो इस आंदोलन को स्थानीय स्तर पर पश्चिम उत्तर प्रदेश में खासकर मुरादाबाद ,मेरठ और कुमायूं मंडलों में चला रहे थे।

संघ के सरसंघचालक से आंदोलन की सफलता और संघ का मार्गदर्शन मांगने वालों में मुरादाबाद निवासी दो सूत्रधार थे, एक मुरादाबाद के पूर्व विभाग प्रचारक और तत्कालीन हिन्दू जागरण मंच के पश्चिम उत्तर प्रदेश के संयोजक दिनेश चंद्र त्यागी (शिक्षा एम एससी फिजिक्स), दूसरे कांग्रेस के प्रखर नेता पूर्व मंत्री, तीन बार कांग्रेस से विधायक रहे मुरादाबाद निवासी दाऊदयाल खन्ना। बाला साहब से आंदोलन की योजना और विस्तार के लिए यह चर्चा बदायूं में 26 दिसम्बर 1983 को लगे संघ के शीत शिविर में हुई। यहां बाला साहब देवरस दो दिन के प्रवास पर शिविर में आए थे। इस वार्ता में संघ के सरसंघचालक ने कहा कि आंदोलन को संघ को चलाना चाहिए अथवा नहीं इस पर गंभीरता से विचार आवश्यक है। यदि आन्दोलन को चलाना है तो यह मानकर आगे बढ़ाया जाए कि इसे हर हाल में सफल करना है चाहे फिर कितना भी संघर्ष और त्याग क्यों ने करना पड़े। साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया कि लक्ष्य प्राप्ति में कम से कम 30 से 40 वर्ष लगेंगे। इसलिए संघ को विचार करना पडेगा। उन्होंने अपने सहयोगियों से भी विचार विमर्श किया। उनका मानना था कि यदि संघ इसे अपने हाथ में ले तो सफलता तक संघर्ष जारी रखना पडेगा। इसके बाद बाला साहब ने दाऊदयाल खन्ना और दिनेश चन्द्र त्यागी से कहा कि आंदोलन चलाइये संघ सहयोग करेगा। आगे चलकर आन्दोलन की प्रखरता और लोकप्रियता को देखते हुए इसे संघ ने अपने समविचार परिवार के संगठन विश्व हिन्दू परिषद् को आन्दोलन चलाने के लिए कहा। दिल्ली के विज्ञान भवन में 7 और 8 अप्रैल 1984 को हुई धर्म संसद में विश्व हिन्दू परिषद् ने आन्दोलन अपने हाथ में ले लिया। यहीं विहिप की देखरेख में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया गया। इसके अध्यक्ष गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ और महामंत्री दाऊदयाल खन्ना को बनाया गया। आगे का आन्दोलन इस समिति के नेतृत्व में आरम्भ हुआ।

राम मन्दिर के संकल्प को साकार करने के लिए संघ ने व्यापक योजना बनायी। आन्दोलन के लिए लगभग एक दर्जन से अधिक प्रचारकों को विश्व हिन्दू परिषद् में भेजा गया। इन प्रचारकों ने अपने जीवन को इस लक्ष्य के लिए समर्पित कर दिया। बंगलौर में 1981 में हुई संघ की बैठक में दिल्ली प्रांत प्रचारक अशोक सिंहल को दायित्व से मुक्त कर विश्व हिन्दू परिषद् में नया दायित्व दिया गया। आन्दोलन की पूरी सांगठनिक संचरचना के मूल केन्द्र रहे चंपतराय को भी 1986 में पश्चिम उत्तर प्रदेश में मेरठ विभाग प्रचारक से विश्व हिन्दू परिषद् में भेज दिया। वर्ष 1984 में संघ ने आंदोलन की कमान विश्व हिन्दू परिषद को सौंपने का महत्वपूर्ण और दूरगामी लक्ष्य प्राप्ति के संकल्प के लिए निर्णय लिया। यह निर्णय आसान नहीं था क्योंकि संघ ने अपने एक महत्वपूर्ण संगठन को एक ऐसे आंदोलन के लिए दांव पर लगा दिया था,जिसकी सफलता की राह बहुत कठिन थी,संघर्ष बहुत लंबा था। सुयोग्य, साहसी, समर्पित प्रचारकों की एक बड़ी टीम की आवश्यकता थी। लेकिन संघ ने हिंदू समाज के स्वाभिमान की रक्षा के लिए ये निर्णय किया।

प्रचारक गिरिराज किशोर, ओंकार भावे, सूर्यकृष्ण,श्यामजी गुप्त, राजेंद्र सिंह पंकज, उमाशंकर, पुरुषोत्तम नारायण सिंह, तुलसीराम नाना भागवत, सदानंद काकडे, गुरुजन सिंह, सूबेदार सिंह सरीखे प्रखर प्रचारकों की एक बड़ी टीम संघ से विहिप में भेजी गई। बाद में भी कई प्रमुख प्रचारक संघ से आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभाने के लिए विश्व हिन्दू परिषद् में भेजे गए। इनमें दिल्ली के क्षेत्र प्रचारक दिनेश कुमार ( बडे दिनेश जी) का नाम प्रमुख है।

संघ में ही रहकर वरिष्ठ प्रचारक मोरोपंत पिंगले ने आंदोलन की योजना और रचना की। वे विहिप के मार्गदर्शक बनाए गए। मोरोपंत जी की ही योजना से विहिप ने एकात्मकता यात्राएं निकाल कर जन जागरण किया। राम ज्योति और शिला पूजन जैसे आयोजन हुए। इन कार्यक्रमों ने हिंदू समाज की सुप्तावस्था में रही शाश्वत चेतना और स्वाभिमान को जगा दिया। फलस्वरूप जागरूक समाज ने वर्ष 1990 और 1992 में अपने इष्ट के मंदिर निर्माण के लिए कूच कर दिया। दो बार कारसेवा संपन्न हुई।

आंदोलन में दो अलग अलग मोर्चों पर संघर्ष की रणनीति विहिप ने बनाई। एक थी प्रत्यक्ष आंदोलन, यानि सभा,सम्मेलन,प्रदर्शन,गोष्ठी,धार्मिक आयोजन,धर्म संसद, संत सम्मेलन आदि। दूसरी न्यायालय में विचाराधीन वादों की सुव्यवस्थित ढंग से पैरवी करना। इन वादों के लिए तथ्य जुटाना,गवाही कराना, अच्छे अधिवक्ताओं की एक बड़ी टीम जुटाना। आंदोलन को दिशा देने और संत समाज को एक जुट करके आंदोलन का अगुआ बनाने का काम अशोक सिंघल जी की प्रतिभा से संपन्न हो सका था। भारत के विभिन्न मत,पंथ,संप्रदायों के संतों महंतों को एकजुट करना कोई आसान काम नहीं था। लेकिन अशोक जी ने ये किया। वे इसलिए भी सफल हुए क्योंकि स्वयं भी संत प्रकृति और प्रवृत्ति के थे। इसलिए उनकी वाणी का अद्भुत प्रभाव था। उनके आग्रह को कोई टाल नहीं सकता था। वे श्वेत वस्त्रधारी संत थे।

जितना मुश्किल राम जन्मभूमि आंदोलन चलाना था,उससे भी मुश्किल था, न्यायालयों का संघर्ष। इस मोर्चे को विहिप में विभिन्न दायित्व पर रहे चंपतराय ने संभाला। चंपतराय जी हमेशा परिदृश्य से ओझल रहकर कार्य करते रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमे की पैरवी के लिए चंपत जी अच्छे से अच्छे अधिवक्ताओं को जुटा रहे थे। उनकी बैठकें करते थे। साक्ष्य भी जुटाते थे। एक एक पेपर की फोटो कॉपी कराने से लेकर उसे समय पर न्यायालय में पहुंचवाना। सभी अधिवक्ताओं की चिंता। हर तारीख पर सजग और गंभीर रहना । वे हर तारीख को निर्णायक मानकर तैयारी करते थे, मानो उसी दिन फैसला होना हो। इन प्रयासों का प्रतिफल था न्यायलय का 9 नवंबर 2019 का फैसला और 22 जनवरी 2024 को मन्दिर में प्राण प्रतिष्ठा का दिवस। और अब मन्दिर निर्माण की पूर्णता और भारतीय सांस्कतिक गौरव की प्रतीक धर्मध्वजा का फहराना।

विद्या भारती पूर्व छात्र परिषद (उत्तर-पूर्व क्षेत्र) द्वारा नई दिल्ली में 7 दिसंबर को “पूर्व छात्र संगम 2025” का भव्य आयोजन

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नई दिल्ली, — भारतीय संस्कृति, जीवन मूल्यों, चरित्र निर्माण और राष्ट्रभावना पर आधारित दुनिया के सबसे बड़े और सबसे सक्रिय पूर्व छात्र संगठन विद्या भारती पूर्व छात्र परिषद के उत्तर-पूर्व क्षेत्र इकाई का “पूर्व छात्र संगम” आगामी 7 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में किया जा रहा है जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में भारत सरकार के केंद्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान जी उपस्थित रहेंगे। 

यह जानकारी आज नई  दिल्ली में आयोजित एक प्रेस वार्ता में कार्यक्रम संयोजक संतोष गुप्ता जी ने दी।  यह ऐतिहासिक संगम मुख्य रूप से झारखंड और बिहार के उन पूर्व छात्रों के लिए है जिन्होंने सरस्वती शिशु मंदिरों एवं सरस्वती विद्या मंदिरों में अध्ययन किया है और आज दिल्ली–NCR में अध्ययनरत, कार्यरत या निवासरत हैं। इस संगम में 1000 से अधिक पूर्व छात्रोंकी सहभागिता अपेक्षित है, जो इसे क्षेत्रीय स्तर पर अब तक का सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली Alumni Gathering बनाती है।

विद्या भारती पिछले 73 वर्षों से राष्ट्रभावना, भारतीय संस्कृति, अनुशासन, सेवा और चरित्र निर्माण पर आधारित शिक्षा का अद्वितीय कार्य कर रही है। वर्तमान में विद्या भारती के देशभर में 12,000+ विद्यालय, 35 लाख विद्यार्थी, 1.5 लाख शिक्षक–कार्यकर्ता, और 11 क्षेत्र एवं सभी प्रांतों में सक्रिय हैं, जो इसे भारत का सबसे बड़ा शैक्षिक-सांस्कृतिक नेटवर्क बनाते हैं। इसी शिक्षा–संस्कार की परंपरा को आगे बढ़ाने और पूर्व छात्रों को संगठित करने के लिए वर्ष 2020 में विद्या भारती पूर्व छात्र परिषद को अखिल भारतीय स्वरूप दिया गया। आज परिषद10.6 लाख से अधिक पंजीकृत पूर्व छात्रों का मजबूत नेटवर्क बन चुकी है, जो 11 क्षेत्रों और 28 प्रांतों में संगठित रूप से कार्य कर रहा है।

इस संगम का उद्देश्य केवल पुनर्मिलन नहीं, बल्कि पूर्व छात्र शक्ति को एक धागे में पिरोना, विद्यालय में प्राप्त संस्कारों को पुनर्जीवित करना, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य–भाव को जागृत करना, तथा पेशेवर, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर एक मज़बूत नेटवर्क तैयार करना है। विद्या भारती मानती है कि “पूर्व छात्र किसी भी संस्थान की संचित निधि होते हैं” और वही समाज जीवन को सुगंधित करने वाले पुष्प के समान होते हैं। संगम के माध्यम से इन पूर्व छात्रों को विद्यालय–समाज–राष्ट्र के विकास में अपनी सामूहिक भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा।

पूर्व छात्र संगम में मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. कृष्ण गोपाल जी (सह-सरकार्यवाह, RSS) तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में विद्या भारती के राष्ट्रीय संगठन मंत्री श्री गोविंद चंद महंत जी अपना मार्गदर्शन प्रदान करेंगे। यह संगम नई पीढ़ी को प्रेरित करने और पूर्व छात्रों में सहयोग, एकता तथा संगठन शक्ति को सुदृढ़ करने का अवसर प्रदान करेगा।

कार्यक्रम का विवरण निम्नलिखित है:
तिथि: 7 दिसंबर 2025 (रविवार)
समय: दोपहर 2:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक
स्थान: डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर, जनपथ, नई दिल्ली
उपरांत: स्नेहभोज एवं आपसी परिचय-संवाद

कार्यक्रम की तैयारी में क्षेत्र के कई वरिष्ठ कार्यकर्ता एवं संयोजक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जिनमें प्रमुख रूप से संतोष जी (संयोजक), डॉ अंकित जी, सौरभ जी, हेमंत जी, प्रियांशु जी, जयकिशोर जी आदि उपस्थित थे और आयोजन की रूपरेखा साझा की गई।

विद्या भारती पूर्व छात्र परिषद इस संगम को बिहार–झारखंड के पूर्व छात्रों का ऐतिहासिक “मिलन, और प्रेरणा का मंच” मानती है और सभी पूर्व छात्रों से इसमें सहभागिता करने का आग्रह करती है।

NIOS’s Inclusive Education System is Wonderful: Shri Dharmendra Pradhan

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Delhi: The 36th Foundation Day celebration of the National Institute of Open Schooling (NIOS) was held on Sunday at Kaushal Bhawan. The event was graced by the Hon’ble Union Minister of Education, Government of India, Shri Dharmendra Pradhan, as the Chief Guest. Shri Sanjay Kumar, IAS, Secretary, and Ms. Prachi Pandey, IA&AS, Joint Secretary, Department of School Education and Literacy, Ministry of Education, Government of India, attended as Distinguished Guests.

The Foundation Day was attended by senior officials from the Ministry and various institutions, former Chairpersons of NIOS, Directors of all Regional Centres of NIOS, eminent educationists, the Director of NCERT, Vice-Chancellors of NIPAs and Jamia Millia Islamia, representatives from DUTA, Navodaya Vidyalaya Samiti and CBSE, Principals of various schools, NIOS learners, and Journalists. The programme commenced with the lighting of the ceremonial lamp and a Saraswati Vandana presented by learners from Sugam NGO.

Following the NIOS anthem, the Chairman of NIOS, Professor Akhilesh Mishra, welcomed the dignitaries and highlighted the Institute’s notable contributions. He also underlined the launch of the world’s first Senior Secondary curriculum in Indian Sign Language. Emphasising self-reliance, he spoke about the need for self-awareness and shared plans to soon introduce the “Shiksha Mitra Programme” for learners deprived of educational opportunities.

Addressing the gathering, the Hon’ble Union Education Minister Shri Dharmendra Pradhan praised the commendable work of NIOS and congratulated it for connecting with India’s unique educational heritage. Sharing an anecdote, he noted that many institutions are working to bring out-of-school children into the mainstream of education in collaboration with NIOS. He stressed the need to promote education in the mother tongue and called for moving beyond the colonial “Macaulay mindset.” Highlighting the importance of experimentation with Artificial Intelligence in education, he stated that AI can help address learners’ queries effectively and enhance teacher education.

Distinguished Guest Ms. Prachi Pandey congratulated NIOS on its 36th Foundation Day and appreciated its significant role in educating the underprivileged. She also lauded the initiative of providing education in the mother tongue.

In his address, Shri Sanjay Kumar commended NIOS for the extensive use of ICT to provide maximum facilities to its learners. He also highlighted NIOS’s important initiatives in offering accessible learning facilities for persons with disabilities through multiple modes.

On this occasion, NIOS also launched the portal for the Teacher Training Programme (Bridge Course) along with various academic and vocational courses, inaugurated by the Hon’ble Union Education Minister.

Thereafter, the Secretary of NIOS expressed gratitude to the Chief Guest and all distinguished dignitaries for their presence. The programme concluded with the National Anthem. A large number of NIOS officers and staff were present during the celebration.

एनआईओएस ने मनाया अपना 36वां स्थापना दिवस समारोह केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान रहे मुख्य अतिथि

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दिल्ली। राष्ट्री य मुक्तउ विद्यालयी शिक्षा संस्थानन (एनआईओएस) के 36वें स्थापपना दिवस समारोह का आयोजन रविवार को कौशल भवन में आयोजित किया गया। जिसमें माननीय केंद्रीय शिक्षा मंत्री, भारत सरकार श्री धर्मेंद्र प्रधान जी बतौर मुख्यि अतिथि शामिल हुए। श्री संजय कुमार, भा.प्र.से., सचिव, विशिष्ट अतिथिगण के रूप में और सुश्री प्राची पांडे, (आईए एंड एएस), संयुक्तक सचिव, स्कू,ल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार भी विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुई। साथ ही, मंत्रालय एवं विभिन्न संस्थांओं के अन्य उच्चासधिकारीगण, एनआईओएस के पूर्व अध्य क्ष, एनआईओएस के सभी क्षेत्रीय केंद्र निदेशक, शिक्षा जगत के विद्वान, एनसीईआरटी के निदेशक, नीपा और जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति, डूटा, नवोदय विद्यालय समिति और सीबीएसई के अध्यक्ष सहित विभिन्न विद्यालयों के प्राचार्य, एनआईओएस के शिक्षार्थियों के साथ मीडियाकर्मी भी समारोह में उपस्थित हुए। समारोह का आरंभ दीप प्रज्ज्वलन और सुगम एनजीओ के शिक्षार्थियों द्वारा प्रस्तुत सरस्वपती वंदना से हुई।

एनआईओएस गीत के उपरांत संस्थान के अध्यक्ष प्रोफेसर अखिलेश मिश्र ने मंचासीन अतिथियों का स्वागत करते हुए अपने उद्बोधन में एनआईओएस के उत्कृष्ट कार्यों का उल्लेख किया। साथ ही, संस्थान द्वारा विश्व की पहली भारतीय सांकेतिक भाषा पर उच्चतर माध्यमिक स्तर के पाठ्यक्रम को रेखांकित किया। आत्मनिर्भरता पर पर बल देते हुए उन्होंने स्व के जागरण की बात कही। शिक्षा वंचित शिक्षार्थियों के त्वरित एवं आसान नामांकन हेतु उन्होंने जल्द ही एनआईओएस मित्र कार्यक्रम शुरू करने की योजना साझा की।

एनआईओएस के 36वें स्थापना दिवस समरोह के अवसर पर मुख्य अतिथि माननीय केन्द्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेन्द्र प्रधान जी ने अपने उद्बोधन में एनआईओएस के कार्यों की प्रशंसा करते हुए, एनआईओएस भारत की अनोखी परंपरा से जुड़ने की बधाई दी। एक संस्मरण साझा करते हुए उन्होंने कहा कि बहुत से संस्थान शिक्षा वंचित बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं और यह कार्य एनआईओएस के साथ मिलकर हो रहा है। मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर उन्होंने जोर दिया और मैकाले की मानसिकता से बाहर निकलने का आवाहन भी किया। शिक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की प्रयोगधर्मिता को बढ़ावा देने की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि इसके प्रयोग से जिज्ञासाओं को आसानी से शांत किया जा सकता है और इसके माध्यम से शिक्षक शिक्षा को भी बेहतर बनाया जा सकता है।

विशिष्ट अतिथि सुश्री प्राची पांडे ने अपने संबोधन में एनआईओएस को 36वें स्था पना दिवस समारोह की शुभकामनाएं दीं और शिक्षावंचितों को शिक्षित करने में एनआईओएस की महत्वएपूर्ण भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि एनआईओएस द्वारा मातृभाषा में शिक्षा उपलब्ध कराना सराहनीय है।

सम्मानित अतिथि श्री संजय कुमार जी ने अपने संबोधन में एनआईओएस द्वारा आईसीटी का अधिकाधिक प्रयोग करने और आईसीटी के माध्य म से अपने शिक्षार्थियों को अधिकतम सुविधाएं प्रदान करने के लिए सराहना की। साथ ही, विभिन्न माध्यमों से दिव्यांगों को अध्ययन की सुविधाएँ उपलब्ध कराने की दिशा में एनआईओएस की महत्वीपूर्ण पहल को भी रेखांकित किया।

एनआईओएस ने अपने 36 वें स्थापना दिवस के अवसर पर शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम ब्रिज कोर्स के पोर्टल के साथ विभिन्न शैक्षिक एवं व्यावसायिक पाठ्यक्रमों का विमोचन भी माननीय केन्द्रीय शिक्षा मंत्री के कर कमलों कराया।

तत्पंश्चाकत एनआईओएस के सचिव ने स्था पना दिवस समारोह में पधारे मुख्यक अति‍थि माननीय केंद्रीय शिक्षा मंत्री एवं सभी सम्मायनित विशिष्टक मनीषियों का आभार व्यनक्तस किया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। समारोह में एनआईओएस के अधिकारी एवं कर्मचारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

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