एक सपने से साकार हुई उड़ान: जोधपुर के नए टर्मिनल भवन की विकास यात्रा

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रवि प्रकाश टांक

जोधपुर (राजस्थान) : वर्ष 2015 में जब मैंने भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण में नौकरी शुरू करने के साथ जोधपुर एयरपोर्ट पर कार्यभार ग्रहण किया, उस समय इसकी संरचना वर्तमान स्वरूप से काफी भिन्न थी। उस समय यहां एक सीमित क्षमता वाला टर्मिनल भवन था। एप्रन ऐसा जहां एक समय में केवल दो विमान और एक एटीआर ही खड़े हो सकते थे। इतना ही नहीं ट्रॉली गेट से बड़े विमानों का आवागमन और संचालन पायलट की कुशलता और अत्यधिक सावधानी पर निर्भर करता था। यात्रियों की संख्या निरंतर बढ़ रही थी, किंतु उपलब्ध आधारभूत संरचना भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं थी।

समय के साथ यह स्पष्ट रूप से अनुभव किया जाने लगा कि जोधपुर जैसे ऐतिहासिक एवं पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण शहर को एक आधुनिक, विस्तृत और सक्षम टर्मिनल भवन की आवश्यकता है। इसी दृष्टिकोण ने नए टर्मिनल भवन की परिकल्पना को जन्म दिया। इस दिशा में सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त भूमि की उपलब्धता सुनिश्चित करना था।

कई चरणों में आयोजित बैठकों, तकनीकी विचार-विमर्श तथा विभिन्न सरकारी विभागों के समन्वित प्रयासों के परिणामस्वरूप भारतीय वायु सेना से लगभग 37 एकड़ भूमि प्राप्त करने का प्रस्ताव आकार लेने लगा। इस प्रक्रिया में भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों, विशेष रूप से नागरिक उड्डयन मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, भारतीय वायु सेना, भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण, जिला प्रशासन जोधपुर, नगर निगम तथा अन्य संबंधित विभागों ने महत्वपूर्ण और सराहनीय भूमिका निभाई।

लगातार प्रयासों के फलस्वरूप वर्ष 2017 के आसपास वह महत्वपूर्ण समझौता (एमओयू) संपन्न हुआ, जिसके अंतर्गत भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण को नए टर्मिनल भवन के निर्माण हेतु लगभग 37 एकड़ भूमि उपलब्ध कराने का मार्ग प्रशस्त हुआ। यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि जोधपुर के उड्डयन इतिहास में एक नए युग की शुरुआत थी।


भूमि उपलब्ध होने के पश्चात् भी विस्तृत योजना निर्माण, स्वीकृतियां, डिज़ाइन, तकनीकी परीक्षण तथा विभिन्न प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पर्याप्त समय लगा। अंततः वर्ष 2021 में परियोजना को अंतिम रूप प्रदान किया गया और निर्माण कार्य प्रारंभ करने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए। इसके पश्चात् वर्ष 2023 में नए टर्मिनल भवन का निर्माण कार्य औपचारिक रूप से प्रारंभ हुआ।

निर्माण के प्रत्येक चरण में आधुनिक तकनीक, उच्च गुणवत्ता मानकों तथा भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए कार्य किया गया। समय-समय पर विभिन्न चुनौतियां भी सामने आईं, किंतु सभी संबंधित एजेंसियों के समन्वय, प्रतिबद्धता और सतत् प्रयासों के परिणामस्वरूप परियोजना निरंतर प्रगति करती रही।

वर्ष 2026 में यह आधुनिक टर्मिनल भवन पूर्ण भव्यता के साथ तैयार होकर राष्ट्र और जनसेवा को समर्पित है। यह केवल एक संरचना नहीं, बल्कि वर्षों की दूरदृष्टि, समर्पण, समन्वय और अथक परिश्रम का साकार प्रतीक है। इस भवन के माध्यम से जोधपुर को विश्वस्तरीय यात्री सुविधाएं प्राप्त होंगी तथा क्षेत्र के पर्यटन, व्यापार, उद्योग और समग्र आर्थिक विकास को नई गति मिलेगी।

इस संपूर्ण विकास यात्रा का प्रत्यक्ष साक्षी होना मेरे लिए अत्यंत गर्व और संतोष का विषय है। वर्ष 2015 में जिस सीमित संसाधनों वाले एयरपोर्ट से यह यात्रा प्रारंभ हुई थी, आज उसी स्थान पर एक आधुनिक, विशाल और अत्याधुनिक टर्मिनल भवन स्थापित है। यह परिवर्तन केवल आधारभूत संरचना का नहीं, बल्कि जोधपुर की बढ़ती संभावनाओं, प्रगति और नई उड़ान का प्रतीक है। आने वाले वर्षों में जब भी कोई यात्री इस भवन से अपनी यात्रा प्रारंभ करेगा, वह अनजाने में ही उस लंबी विकास यात्रा का हिस्सा बनेगा जिसने जोधपुर को भारतीय नागरिक उड्डयन के मानचित्र पर एक नई पहचान प्रदान की है।

अकादमिक जिहाद : जम्‍मू-कश्‍मीर में किताबों के जरिए किया जा रहा था आतंकवादियों का महिमामंडन

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

श्रीनगर : जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र की मोदी सरकार की सख्‍ती के परिणाम स्‍वरूप आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों ने लगातार बड़ी सफलताएं हासिल की हैं। सीमापार से होने वाली घुसपैठ में कमी आई है, आतंकवादी नेटवर्क कमजोर हुए हैं, अलगाववादी संगठनों की आर्थिक गतिविधियों पर शिकंजा कसा गया है और कई संगठनों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, लेकिन इसी बीच जम्मू-कश्मीर के सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई दो किताबों को लेकर UAPA के तहत FIR दर्ज गई है।

दरअसल, इन किताबों में मुंबई हमलों के मास्टर माइंड आतंकी हाफिज सईद और अलगाववादी नेता मकबूल भट को महान हस्तियां बताया गया है। पुलिस की काउंटर इंटेलिजेंस विंग ने अब FIR दर्ज करके छापेमारी शुरू कर दी है। दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर सरकार ने सरकारी स्कूलों में वितरित इन पुस्तकों पर तत्काल प्रतिबंध लगाते हुए उन्हें वापस मंगाने के आदेश दिए हैं।

इन पुस्तकों में आतंकवाद और अलगाववाद से जुड़े व्यक्तियों का महिमामंडन करने के साथ ही पाकिस्तान समर्थित शब्दावली का इस्तेमाल किया गया और ऐसे कथन शामिल किए गए जो भारत की संवैधानिक स्थिति के विपरीत हैं। सरकार ने मामले को गंभीर मानते हुए आठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया है, एक संविदा कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कर दी हैं, लेखक और प्रकाशक को ब्लैकलिस्ट किया है तथा पूरी खरीद और स्वीकृति प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच शुरू कर दी है। लेकिन इस सब के बीच एक बड़ी चिंता सामने आई है, क्या जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी सोच अब शिक्षा और साहित्य के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है?

जेकेपीएफ के प्रयासों से सामने आया मामला

मामला उस समय सामने आया जब जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम (JKPF) ने आरोप लगाया कि वर्ष 2025-26 की समग्र शिक्षा योजना के अंतर्गत सरकारी स्कूलों के पुस्तकालयों में कुछ ऐसी पुस्तकें वितरित की गई हैं, जिनमें अलगाववादी नेताओं और आतंकवाद से जुड़े व्यक्तियों को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन पुस्तकों में सैयद अली शाह गिलानी, मसरत आलम, मीरवाइज उमर फारूक और अन्य अलगाववादी नेताओं के विचारों को प्रमुखता दी गई है। कुछ स्थानों पर आतंकवादियों तथा पत्थरबाजों को भी ऐसे रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे बच्चों के मन पर गलत प्रभाव पड़ सकता है।

किन किताबों पर लगा प्रतिबंध

सरकारी जांच के दौरान विशेषज्ञ समिति द्वारा चयनित कुल 463 पुस्तकों की समीक्षा की गई। इनमें दो पुस्तकें विवाद के केंद्र में आईं हैं, Personalities and Legends of J&K और Great Personalities of Jammu and Kashmir।
सरकारी आदेश के अनुसार पहली पुस्तक की 123 प्रतियां जम्मू, रामबन और उधमपुर जिलों के सरकारी विद्यालयों तक पहुंची थीं, जबकि दूसरी पुस्तक की 128 प्रतियां जम्मू और बारामुला जिलों में वितरित की गई थीं। अब दोनों पुस्तकों की सभी प्रतियां तत्काल प्रभाव से वापस मंगाई जा रही हैं।

सबसे बड़ा विवाद किस बात पर?

विवाद का सबसे बड़ा कारण पुस्तक में मकबूल भट के बारे में लिखी गई सामग्री बनी। इस संबंध में सामने आई “जम्‍मू-कश्‍मीर अध्‍ययन केंद्र” की रिपोर्ट के अनुसार पुस्तक में उनके अध्याय का शीर्षक “शहीद मकबूल भट” रखा गया है। इतना ही नहीं, आगे उन्हें “शहीद-ए-आज़म”, “आधुनिक कश्मीर का महान क्रांतिकारी” और “कश्मीर का राष्ट्रपिता” जैसे विशेषणों से संबोधित किए जाने का आरोप है।

रिपोर्ट का दावा है कि पुस्तक स्वयं उनके विरुद्ध चली न्यायिक प्रक्रिया और सजा का उल्लेख करती है, लेकिन उसके बावजूद उन्हें सम्मानजनक शब्दों में प्रस्तुत करती है। विपक्ष के नेता सुनिल शर्मा का कहना है कि विद्यालयी स्तर की पुस्तक में किसी दोषसिद्ध व्यक्ति को इस प्रकार प्रस्तुत करना बच्चों के सामने न्यायिक व्यवस्था और इतिहास की भिन्न तस्वीर पेश कर सकता है। पुस्तक में यह भी उल्लेख है कि मकबूल भट की फांसी के बाद कश्मीर में “सशस्त्र क्रांति” का दौर शुरू हुआ और उनका मिशन अभी अधूरा है, जोकि भयंकर आपत्‍त‍िजनक है।

उल्‍लेखनीय है कि मकबूल भट वही व्यक्ति हैं जिसे आतंकवादी घटनाओं एवं कई हत्‍याओं के मामले में दोषी ठहराया गया था। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) का संस्थापक रहा है। उसे एक सीआईडी अधिकारी की हत्या, विमान अपहरण की घटनाओं से जुड़े आरोप तथा बाद में भारतीय राजनयिक रविंद्र म्हात्रे के अपहरण और हत्या के घटनाक्रम से जुड़ी परिस्थितियों के बाद फांसी दी गई थी।

किन-किन चेहरों को मिला प्रमुख स्थान?

विवादित पुस्तकों में जिन व्यक्तियों पर अलग-अलग अध्याय होने का दावा किया गया है, उनमें प्रमुख नाम हैं-

मकबूल भट, सैयद अली शाह गिलानी, मसरत आलम, शब्बीर शाह, मीरवाइज उमर फारूक, जबकि ये सभी किसी न किसी रूप में अलगाववादी राजनीति या हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से जुड़े रहे हैं। पुस्तक में सैयद अली शाह गिलानी के विचारों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। अलगाववादी नेताओं सैयद अली शाह गिलानी, शब्बीर शाह, मीरवाइज उमर फारूक को प्रभावशाली व्यक्तित्व बताया है।

ऐसे में जम्‍मू कश्‍मीर अध्‍ययन केंद्र का मानना है कि पुस्तक में उनके राजनीतिक दृष्टिकोण का उल्लेख तो है, लेकिन उनके नेतृत्व वाले अलगाववादी आंदोलन, पाकिस्तान समर्थक रुख और भारत की संवैधानिक व्यवस्था के विरोध से जुड़े संदर्भ नहीं दिए गए। स्‍वभाविक है कि इन पुस्‍तकों के माध्‍यम से सिर्फ एक तरफा विचार प्रस्तुत किए गए जोकि अलगाववादियों के पक्ष में हैं।

पुस्तक में मसरत आलम का भी विस्तृत उल्लेख किया गया है। कई कथनों को उद्धृत किया गया है। साथ ही उनके जीवन का परिचय अपेक्षाकृत सहानुभूतिपूर्ण शैली में लिखा गया है। जबकि उनके विरुद्ध अनेक आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं, उन्हें कई बार हिरासत में लिया गया और बाद में उनके संगठन पर भी कार्रवाई हुई। इसी प्रकार शब्बीर शाह और मीरवाइज उमर फारूक पर लिखे अध्याय भी विवादों में हैं। दोनों नेताओं को मुख्यतः अलगाववादी आंदोलन के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि उनसे जुड़े विवाद, जांच और कानूनी कार्रवाइयों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

हुर्रियत का पूरा संदर्भ क्यों महत्वपूर्ण है?

रिपोर्ट में एक पूरा अध्याय ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (APHC) को समर्पित है। पुस्तक में जिन अधिकांश व्यक्तियों का उल्लेख है, वे किसी न किसी समय इसी मंच से जुड़े रहे हैं। हुर्रियत के घोषित उद्देश्यों में आत्मनिर्णय, कश्मीर को विवादित क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करना और भारत की संवैधानिक स्थिति को चुनौती देना शामिल रहा है।

‘IOK’ और ‘IHK’ शब्दों पर भी विवाद

विवाद केवल व्यक्तियों के महिमामंडन तक सीमित नहीं है। “जम्‍मू-कश्‍मीर अध्‍ययन केंद्र” की रिपोर्ट के अनुसार पुस्तक में कई स्थानों पर जम्मू-कश्मीर के लिए Indian Occupied Kashmir (IOK) और Indian Held Kashmir (IHK) जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। दरअसल, ये वही शब्द हैं जिनका उपयोग पाकिस्तान लंबे समय से अपने आधिकारिक प्रचार में करता रहा है। भारत का आधिकारिक और संवैधानिक दृष्टिकोण यह है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।

भारत को ‘दमनकारी राज्य’ बताने का आरोप

पुस्तक के कुछ हिस्सों में भारत को कश्मीर के संदर्भ में “कब्जा करने वाला” और “दमनकारी राज्य” बताया गया है। पुस्तक में भारत के शासन की तुलना औपनिवेशिक शासन से की गई है और लोकतांत्रिक मूल्यों तथा मानवाधिकारों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता पर भी प्रश्न उठाए गए हैं।

लल्लेश्वरी के बहाने ब्राह्मणों को किया गया टार्गेट

यहां विवाद अकेले राजनीति सोच तक सीमित नहीं है। पुस्तक में कश्मीर की महान संत और शिवभक्त लल्लेश्वरी (ललद्यद) के संबंध में भी ऐसे दावे किए गए हैं जिनका कई इतिहासकारों ने विरोध किया है। पुस्तक में लिखा गया कि लल्लेश्वरी ब्राह्मणों से असंतुष्ट थीं और बाद में उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया। जबकि ऐसा दावा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है। कश्मीर की साझा सांस्कृतिक विरासत में लल्लेश्वरी को हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदाय समान श्रद्धा से याद करते हैं। मुस्लिम समाज उन्हें “लल आरिफा” कहता है, जबकि हिंदू समाज उन्हें संत कवयित्री और शिवभक्त के रूप में पूजता है।

इतिहास या वैचारिक नैरेटिव?

सबसे गंभीर बहस इस बात पर है कि क्या यह सामग्री इतिहास प्रस्तुत कर रही थी या किसी विशेष वैचारिक दृष्टिकोण को स्थापित करने का प्रयास कर रही थी। यानी कि एक तरह से अकादमिक जिहाद फैला रही है! पूरा विवाद अब इस प्रश्न पर आकर टिक गया है कि आखिर ऐसी सामग्री सरकारी प्रणाली से होकर विद्यालयों तक पहुंची कैसे?

बताया गया है कि इन पुस्तकों को एक विशेषज्ञ समिति ने “आयु-उपयुक्त” मानते हुए अनुशंसित किया था। इसके बाद समग्र शिक्षा योजना के तहत सार्वजनिक धन से इनकी खरीद की गई और फिर सरकारी विद्यालयों के पुस्तकालयों में भेजा गया। यानी यह किसी शिक्षक या विद्यालय का व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद पुस्तकें बच्चों तक पहुंचीं।

किताबें या वैचारिक दस्तावेज?

पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है। क्या ये पुस्तकें केवल इतिहास और जीवनी प्रस्तुत कर रही थीं? या फिर उनमें एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव शामिल था, जिसे विद्यालयी छात्रों तक पहुंचाया जा रहा था? यही प्रश्न अब सरकारी जांच का सबसे बड़ा विषय है। आठ अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया, एक संविदा कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। पुस्तकों के लेखक और प्रकाशक को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।

30 दिन में मांगी गई रिपोर्ट

जांच की जिम्मेदारी अतिरिक्त मुख्य सचिव (वित्त) अश्विनी कुमार को सौंपी गई है। उन्हें निर्देश दिए गए हैं कि वे 30 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें। इस संबंध में स्कूल शिक्षा विभाग के आयुक्त सचिव राम निवास शर्मा का कहना है, “उक्‍त किताबों के चयन, खरीदारी और वितरण के हर स्तर की जांच हो रही है। यह देखा जाएगा कि किस-किस अधिकारी की क्या भूमिका थी और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी।”

अलगाववाद का बदलता चेहरा

सुरक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि आधुनिक समय में आज वैचारिक प्रभाव, डिजिटल माध्यम, सोशल मीडिया, सांस्कृतिक विमर्श और शिक्षा भी संघर्ष के महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुके हैं। यदि कोई संगठन प्रत्यक्ष हिंसा में सफल नहीं होता, तो वह समाज की नई पीढ़ी की सोच को प्रभावित करने का प्रयास कर सकता है, इसलिए विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली सामग्री की निष्पक्षता और तथ्यपरकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

जम्मू कश्मीर अध्ययन केन्द्र की आरे से कहा गया है कि स्कूल पुस्तकालयों में पढ़ने के लिए भेजी गई ‘पर्सनैलिटीज एंड लीजेंड्स ऑफ जेएंडके’ और ‘ग्रेट पर्सनैलिटीज ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ पुस्तक में आतंकवादियों, अलगाववादियों और देश विरोधी तत्वों को शामिल किए जाने का वह विरोध करता है और दोषियों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई करने की सरकार से मांग करता है।

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की प्रतिक्रिया

मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने प्रारंभिक प्रतिक्रिया में कहा कि उन्होंने विवादित पुस्तक अभी तक नहीं पढ़ी है और न ही पहले उसके बारे में जानकारी थी। उन्होंने कहा कि पूरी सामग्री देखने और तथ्यों का अध्ययन करने के बाद ही वह कोई अंतिम टिप्पणी करेंगे।

एस.पी. वैद ने जताई गंभीर चिंता

जम्मू-कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी. वैद, जिनका नाम भी कथित रूप से पुस्तक में शामिल था, ने इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि ऐसी पुस्तक में अपना नाम शामिल होना उनके लिए सम्मान नहीं बल्कि चिंता का विषय है। उनके अनुसार यदि विद्यालयों में ऐसी सामग्री पहुंचती है जिसमें अलगाववाद, आतंकवाद और भारत विरोधी सोच को वैचारिक आधार मिलता हो, तो यह आने वाली पीढ़ी के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। वैद का मानना है, “आतंकवाद सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों से भी फैलता है। यदि बच्चों को गलत ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ दिए जाएं तो उसका प्रभाव वर्षों तक बना रह सकता है।”

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने इस पूरे मामले को विद्यालयों में राष्ट्रविरोधी सोच फैलाने की कोशिश बताया। उन्होंने मांग की कि केवल अधिकारियों के निलंबन से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि सार्वजनिक धन से खरीदी गई पुस्तकों में ऐसी सामग्री पहुंच सकती है तो यह प्रशासनिक गलती होने के साथ ही संस्थागत विफलता का संकेत भी है।

JKPF रिपोर्ट ने किन सवालों को उठाया?

इस विवाद को सामने लाने वाली जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम (JKPF) ने अपनी रिपोर्ट में कई गंभीर प्रश्न उठाए हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, पुस्तक किसने लिखवाई? विशेषज्ञ समिति ने किन मानकों पर इसे स्वीकृति दी? क्या समिति ने पुस्तक की पूरी सामग्री पढ़ी थी? लेखकों और प्रकाशक को कितना भुगतान किया गया? कुल कितनी प्रतियां खरीदी गईं? किन-किन विद्यालयों में इन्हें भेजा गया? सार्वजनिक धन का कुल कितना उपयोग हुआ? रिपोर्ट यह भी मांग करती है कि समग्र शिक्षा योजना के अंतर्गत खरीदी गई अन्य पुस्तकों की भी स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कहीं और ऐसी सामग्री शामिल तो नहीं है।

उल्‍लेखनीय है कि समग्र शिक्षा भारत सरकार की केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसके माध्यम से प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा 12 तक की शिक्षा के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता दी जाती है। जम्मू-कश्मीर जैसे केंद्रशासित प्रदेश में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी विशेष रूप से अधिक रहती है।

जो भी आपसे मिला, प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। मुझे भी आपका असीम स्नेह मिला अधीश जी ….

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यह मैंने नहीं लिखा है, पर अधीश जी के बारे में मेरी शब्दशः यही अनुभूति है।🙏 आशीष अंशु

लखनऊ : नब्बे के दशक में लखनऊ विश्व संवाद केन्द्र पर अधीश जी का आगमन हुआ था। डी-टू पार्क रोड तब संवाद केन्द्र का पता हुआ करता था और उसे लोग संवाद केन्द्र नहीं, डी-टू कहा करते थे। अधीश जी के कार्यकाल में ही डी-टू को संवाद केन्द्र की पहचान मिली। संवाद केन्द्र से विभिन्न आयु वर्ग के, और अभिरुचियों के लोग जुड़े। निजी सम्बन्ध बनाना, परिवारों की चिन्ता करना, प्रशंसा से विमुख रहना, मंच के नीचे रहकर नयी प्रतिभाओं को मंच देना अनेक ऐसे प्रमुख गुण थे कि लोग जुड़ते जाते थे। आगरा में 17 अगस्त 1955 को जन्मे अधीश जी ने लखनऊ से ऐसा नाता बनाया कि जैसे वे इसी नगर में जन्मे हों और इसके घर-घर से परिचित हों।

वे वर्ष 1968 में स्वयंसेवक बने। संघ के प्रति उनका प्रेम शनैः शनैः बढ़ता गया और बी.एस.सी. एल.एल.बी. करने के बाद 1973 में उन्होंने संघ कार्य हेतु घर छोड़ दिया और प्रचारक बन गये। 1975 में आपातकाल लगने पर उन्हें जेल में डाल दिया गया और उन पर भीषण अत्याचार किये गये। आपातकाल के बाद उन्हें विद्यार्थी परिषद में और 1981 में संघ कार्य हेतु मेरठ भेजा गया। मेरठ महानगर, सहारनपुर जिला, विभाग, मेरठ प्रान्त बौद्धिक प्रमुख जैसे प्रमुख दायित्वों के निर्वहन के बाद वे 1997 में लखनऊ आये थे।

संवाद केन्द्र में संवाद का कोई भी सिरा अधीश जी से नहीं छूटा। समाचार पत्र पढ़ने और उस पर प्रतिक्रिया देने वालों के लिये पत्र लेखक मंच बना इसकी साप्ताहिक बैठक होती थी और पत्र लेखकों को विषय-लेखन बिन्दु- प्रभावशाली पत्र लेखन जैसे गुण सिखाये जाते थे जिससे सम्पादक उन पत्रों को प्रकाशित करने को बाध्य हो जाएँ। इस मंच के सदस्यों की संख्या बढ़ते बढ़ते दो सौ पार हो गयी थी। आरम्भ में पत्र लेखक मंच में कोई भी लेखक श्रेणी में नहीं था किन्तु बाद में इसी मंच से कई लेखक विकसित हुए। स्तम्भकार तथा लेखकों के लिये अलग मंच था, इनकी बैठक अलग हुआ करती थी। साप्ताहिक और विषय आधारित मासिक संगोष्ठियाँ होती थीं जिनमें युवा प्रतिभागियों को प्रमुखता दी जाती थी। विभिन्न विषयों पर प्रामाणिक जानकारी मिल सके इसके लिये एक कटिंग-फाइलिंग सेक्शन बनाया गया था। विषय आधारित, विश्व संवाद केन्द्र त्रैमासिक पत्रिका अधीश जी के नेतृत्व में लखनऊ संवाद केन्द्र का एक अभिनव प्रयास था जिसे बाद में अन्य कई केन्द्रों ने अपनाया। डॉ. गौरीनाथ रस्तोगी के सम्पादन में तैयार होने वाली इस पत्रिका का प्रत्येक अंक आज भी प्रासंगिक हैं। वन्देमातरम, संविधान समीक्षा, जम्मू कश्मीर में से कोई भी अंक उठा लें आज भी समीचीन लगेगा।

अधीश जी स्वयं भी एक अच्छे लेखक थे। उनके सम्पादन में “कारगिल अपराधी कौन”, “जम्मू -कश्मीर पुनर्गठन क्यों आवश्यक” जैसी पुस्तकों का प्रकाशन हुआ। जिन्होंने वे पुस्तकें पढ़ीं और जम्मू कश्मीर का पुनर्गठन और धारा 370 व 35-ए हटाने का निर्णय देखा वह अधीश जी की दूरदर्शिता और रणनीतिक समझ से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम ईसाई संगठनों की साजिशों को भी बेनकाब किया। अधीश जी का बौद्धिक स्तर अत्यन्त उच्चकोटि का था। वह खाली समय में सभी को भाषण देने की कला सिखाया करते थे। इसी कड़ी में महापुरुषों की जयन्ती मनाने का क्रम आरम्भ हुआ। उसमें सभी वक्ता नये होते थे और उनको क्या बोलना है वो स्वयं तय करते थे। वक्ता चाहे तो मंच से यही बताकर वापस आ सकता था कि आज हम सभी किस महापुरुष की जयन्ती मनाने को लिये एकत्र हुए हैं या फिर उनके विषय कोई भी संक्षिप्त जानकारी हो किन्तु बोलना आवश्यक होता था। इन कार्यक्रमों से अनेक लोगों के मन से मंच से बोलने का भय जाता रहा। अधीश जी की स्मरण शक्ति अत्यन्त प्रबल थी। उन्हें यह अच्छी तरह से याद रहता था कि किस पुस्तक में कौन सी बात किस पृष्ठ पर किस पैरा में लिखी हुई है और उस पुस्तक का कवर किस रंग का है तथा उसमें कौन सा चित्र बना है। अधीश जी के कार्यकाल में, संवाद केन्द्र कार्यालय पर प्रतिदिन शाम 4 बजे गीता के 11 श्लोकों अर्थ सहित पठन-पाठन प्रारम्भ हुआ था। आज जिस प्रकार गीता परिवार व कुछ अन्य संगठन घर-घर गीता का अभियान चला रहे हैं इसकी प्रेरणा का केन्द्र भी एक प्रकार से विश्व संवाद केन्द्र ही है बस उसका स्वरूप बदला है।

स्नेह, सम्मान, आत्मीयता, सहयोग, प्रतिभा संवर्धन और मंच देकर नये लोगों को जोड़ना अधीश जी की कार्यशैली थी। अधीश जी अपनी अत्यन्त व्यस्तता के मध्य भी कार्यकर्ताओं व उनके परिवार का स्वयं हालचाल लेते रहते थे। यदि किसी कार्यकर्ता के घर-परिवार में कोई समस्या आ जाती थी तो वह उसके घर जाते थे। वह अत्यन्त आत्मीय तथा मिलनसार स्वभाव के थे। उनसे जो कोई भी मिलता तो फिर वह उनका होकर रह जाता था।

यदि कार्यालय में कोई बड़ा आयोजन होता था तो वह सभी उपस्थितजनों के जलपान व भोजन की स्वयं चिन्ता करते थे। अधीश जी के रहते ही संवाद केन्द्र डी टू से अपने नये भवन जियामऊ पहुँच गया, नये भवन का लोकार्पण परम पूज्य सुदर्शन जी के हाथों हुआ और वही उनकी एक बड़ी प्रेस वार्ता हुई किन्तु इसी समय अधीश जी अस्वस्थ रहने लगे। पेट का मामूली समझा गया संक्रमण कर्क रोग निकला जो काफी बढ़ चुका था। सभी उपलब्ध चिकित्सा विधाओं का सहयोग लिया गया किन्तु कैन्सर आखिरी चरण तक पहुँच चुका था। मार्च 2007 में उनकी दिल्ली में फिर जाँच हुई तब चिकित्सकों ने कहा कि अब अधिकतम दो -से तीन माह का समय है। उन्होंने एक विरत योगी की भाँति अपने मन को शरीर से अलग कर लिया। अब उन्हें जो कष्ट होता वह कहते यह शरीर को है मुझे नही। उनका कष्ट -देखकर उनकी माता जी ने 5 जुलाई 2007 की शाम को उनके सिर पर हाथ रखा- बेटा अधीश निश्चिन्त होकर जाओ। जल्दी आना और बाकी बचा संघ का काम करना। इसके कुछ देर बाद ही अधीश जी ने अपनी देह त्याग दी।

अधीश जी परम पूज्य गुरु जी को सदा पढ़ते रहते थे और जीवन पथ पर उन्हीं के पद चिह्नों पर चलने का प्रयास करते थे। परम वैभवं नेतुमेतत स्वराष्ट्रं …….यही उनका जीवन उद्घोष था और यही जीवन दर्शन।

वरिष्ठ पत्रकार हर्ष वर्धन त्रिपाठी ने यू ट्यूबर रवीश कुमार से की अपील

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प्रिय रवीश, आपकी कार के माइलेज को लेकर मेरी चिंता नहीं है। कार के माइलेज में #E20 से पुरानी गाड़ियों के माइलेज में कमी आने की बात सामने आ ही रही है। आपका थोड़ा अधिक है तो वो स्वाभाविक ही है, लेकिन मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि, महीने में सिर्फ 2-3 दिन आप बाहर निकलते हैं। देश-समाज से आप पूरी तरह कट चुके हैं, यह आपके वक्तव्यों से आसानी से पता चलता है, लेकिन इतना कट जाने की वजह यही है कि, आप अपने घर में, अपने विचारों के दुश्चक्र में भयानक फंस गए हैं। इस तरह से आप बीमार, बहुत बीमार हो जाएंगे। बाहर निकलिए, लोगों से मिलिए। वर्तमान में जीने से अच्छा महसूस होगा। आप टाइम मशीन में अभी भी यूपीए शासनकाल में फँसे हैं। निकल आइए रवीश जी। प्लीज

यह प्रतिक्रिया श्री त्रिपाठी ने रवीश कुमार के एक्स पर की गई टिप्पणी पर की थी :
रवीश लिखते हैं :
 
मुझे कार की बहुत ज़रूरत नहीं पड़ती है। महीने में दो तीन दिन ही घर से निकलता हूँ। आज कई दिनों बाद कार चलाने गया तो पता चला कि मेरी कार का माइलेज 14km/lसे घट कर 9.6km/lit हो गया है। मेरी कार 2024 की है। 5.4 किलोमीटर प्रति लीटर कम हो गया है। परिवार के लोग इस्तेमाल करते हैं। तेल का ख़र्चा काफ़ी बढ़ गया है। मुझे लगता है कि E20 भी नोटबंदी है। इसके ज़रिये कार और बाइक चालकों पर निष्ठा प्रयोग हो रहा है कि वे किस हद तक मोदी सरकार को सपोर्ट कर सकते हैं। ज़्यादा पैसे ख़र्च कर घटिया ईंधन ख़रीदने और कार डैमेज होने पर चुप रह सकते हैं। मोदी सरकार का प्रयोग सौ फीसद सफल हो गया है। जिस स्केल पर माइलेज गिरा है, मनमोहन सिंह की सरकार होती तो सारे गोदी संपादक पेट्रोल पंप से लाइव रिपोर्ट कर रहे होते। नोट चोरी, वोट चोरी, चंदा चोरी, पेपर चोरी के बाद तेल चोरी को भी व्यापक समर्थन मिल रहा है। यह काम केवल मोदी सरकार कर सकती है। उसके समर्थकों का जवाब नहीं। जो लोग 500 रुपया लीटर पेट्रोल ख़रीदने का सपना देख रहे थे, E20 से पूरा करने का मौका मिल गया है। पेट्रोल और कार की मरम्मत का ख़र्चा जोड़ कर इतना हो जाता होगा। सरकार चाहे तो एक और प्रयोग कर सकती है। पेट्रोल पंप पर मोदी समर्थक 38 प्रतिशत वोटर के लिए E20 का विकल्प दे और मोदी विरोधी 62 प्रतिशत को E10 का विकल्प दे। मुझे लगता है कि डिफ़ेंडर वाली मोहतरमा भी निष्ठा नहीं बदलेंगी और E20 ही भराएँगी। अगर ये हो जाए तो मोदी समर्थकों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहेगा। 😎
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