दुनिया को डरा रहा है इस्‍लाम का जिहाद

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । दुनिया एक बार फिर ऐसे प्रश्नों के सामने खड़ी है, जिनसे मुँह मोड़ना अब संभव नहीं। 14 दिसंबर को ऑस्ट्रेलिया की राजधानी सिडनी के बॉन्डी बीच पर हनुक्का उत्सव मना रहे यहूदियों पर हुआ घातक हमला सिर्फ एक आतंकी घटना नहीं कहा जा सकता है । यह तो उस वैचारिक संकट का प्रतीक है जो बीते दशकों से लगातार गहराता जा रहा है। साजिद और उसके बेटे नवीद द्वारा की गई इस अंधाधुंध गोलीबारी में 15 निर्दोष लोगों की मौत और कई के घायल होने के बाद यह सवाल फिर उभरा है कि आखिर वह कौन-सी सोच है जो धार्मिक पहचान के आधार पर हिंसा को सही ठहराती है। जिसमें कि यह घटना ऐसे देश में घटी है , जहाँ न मुसलमानों पर कोई अत्याचार हो रहा था और न ही धार्मिक स्वतंत्रता पर कोई संकट है। इसके बावजूद गैर-मुसलमानों को निशाना बनाया गया।

ऑस्ट्रेलिया की इस घटना के बाद नवीद अकरम का छह वर्ष पुराना एक वीडियो सामने आया है जो उसकी मानसिक संरचना को समझने में मदद करता है। वीडियो में वह कहता है कि “अल्लाह का कानून हर पढ़ाई और हर काम से ऊपर है और उसे हर किसी तक पहुँचाया जाना चाहिए।” यह वाक्य साधारण नहीं है। यह उस सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें सांसारिक शिक्षा, आधुनिक कानून और नागरिक कर्तव्यों से ऊपर एक धार्मिक (मजहबी) कानून को स्थापित किया जाता है। यही वह बिंदु है, जहाँ समस्या केवल व्यक्ति की नहीं रह जाती है, वह विचारधारा की बन जाती है।

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि “अल्लाह का कानून” आखिर है क्या। इस्लाम में इसे व्यापक रूप से शरिया के रूप में जाना जाता है। मुसलमानों के लिए यह धार्मिक आस्था से अधिक जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति मानी जाती है। इसी क्रम में सीरा, यानी पैगंबर मुहम्मद की जीवनी को आदर्श जीवन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इस्लामी ग्रंथों की कुछ व्याख्याएँ ऐसी भी हैं, जिनमें दुनिया को मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच स्पष्ट रूप से विभाजित किया गया है। गैर-मुस्लिम क्षेत्रों को ‘दारुल-हरब’ कहा गया है, यानी युद्ध का क्षेत्र। ऐसी व्याख्या में प्रमुखता से जिहाद शामिल है, जिसमें यह मान लिया गया है कि जो इस्लाम को स्वीकार नहीं करता, वह ‘शिर्क’ और ‘बुतपरस्ती’ के ज़ुल्म में लिप्त है और उस ज़ुल्म को समाप्त करना हर मुसलमान का मजहबी कर्तव्य है। इस दृष्टिकोण में हिंसा आत्मरक्षा नहीं रहती, वह आक्रामक मजहबी अभियान बन जाती है।

यही कारण है कि इतिहास से लेकर वर्तमान तक, जिहाद शब्द का प्रयोग अक्सर हथियारबंद संघर्ष के अर्थ में हुआ है। कुरान का नौवां अध्याय, जो जिहाद पर केंद्रित माना जाता है, युद्ध और संघर्ष के संदर्भों से भरा है। कुरान (9:111) में ‘अल्लाह के काम’ के लिए ‘कत्ल करना और कत्ल होना’ का उल्लेख मिलता है। इसी अध्याय की आयतें—9:5, 9:29, 9:41, 9:73, 9:123 आक्रामक संघर्ष के आह्वान के रूप में उद्धृत की जाती रही हैं। हदीस-साहित्य में भी ऐसे कथन मिलते हैं, जिनका उपयोग वर्चस्ववादी दृष्टि को पुष्ट करने में किया गया है। उदाहरण के तौर पर सहीह बुखारी (4:53:392) में उद्धृत कथन, “तुम सुरक्षित रहोगे, अगर इस्लाम कबूल कर लो। यह पूरी दुनिया अल्लाह की और मेरी है” को इतिहास में यहूदियों और अन्य गैर-मुसलमानों पर दबाव के औचित्य के रूप में पढ़ा गया है।

इसी प्रकार कुरान के दूसरे अध्याय की कुछ आयतों की व्याख्याएँ गैर-मुसलमानों को अधीन करने, धर्मांतरण या जजिया के लिए मजबूर करने के रूप में प्रस्तुत की गई हैं। यही कारण है कि सदियों के इस्लामी इतिहास में ‘हथियारबंद लड़ाई’ और ‘जिहाद’ को अक्सर समानार्थी की तरह समझा गया। इन आयतों की व्याख्या को लेकर विद्वानों में मतभेद हो सकते हैं, किंतु यह तथ्य नकारा नहीं जा सकता कि कट्टरपंथी समूह इन्हीं व्याख्याओं को आधार बनाकर हिंसा को धार्मिक वैधता प्रदान करते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में भारत में जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी द्वारा दिए गए हालिया जिहाद संबंधी वक्तव्य को जरूर देखना चाहिए, उनका कहना है कि “जब-जब ज़ुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा” और यह कि जिहाद का मूल अर्थ आत्मसंघर्ष, बुराइयों से मुक्ति और अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध है। वे इसे एक पवित्र शब्द बताते हैं और यहां तक प्रस्ताव रखते हैं कि जिहाद के वास्तविक अर्थ को स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। सिद्धांत रूप में यह बात आकर्षक लग सकती है, किंतु व्यवहार की धरातल पर जो हो रहा है, वह इन दावों से मेल नहीं खाता। न भारत में और न ही ऑस्ट्रेलिया में ऐसी कोई स्थिति थी, जिसे जुल्म कहकर हिंसा को जायज ठहराया जा सके। फिर भी निर्दोष गैर-मुसलमानों की हत्या का सिलसिला पूरी दुनिया में चल रहा है!

कहना होगा कि इस वैचारिक ढांचे का परिणाम आज पूरी दुनिया झेल रही है। जम्मू-कश्मीर में लगातार हिंदू यात्रियों और सुरक्षा बलों पर हमले हों, यूरोप में चर्चों, यहूदी केंद्रों और स्कूलों को निशाना बनाया जाए, रूस के मॉस्को कॉन्सर्ट हॉल में सामूहिक हत्या हो या अफ्रीका में गैर-मुस्लिम गांवों पर धावा बोलना रहा है, हर जगह देख सकते हैं कि आतंकियों की धार्मिक (मजहबी) पहचान अक्सर एक जैसी ही रही है। यह कहना अब कठिन हो गया है कि ये सब अलग-थलग घटनाएँ हैं।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि इस आलोचना का उद्देश्य पूरे मुस्लिम समाज को कटघरे में खड़ा करना नहीं है। दुनिया भर में करोड़ों मुसलमान शांति से रहते हैं और हिंसा के विरोधी हैं। किंतु यह भी उतना ही सच है कि जब तक इस्लाम के भीतर मौजूद कट्टर और आक्रामक व्याख्याओं पर खुली बहस और आत्मालोचना नहीं होगी, तब तक यह समस्या समाप्त नहीं होगी। हर हिंसक घटना के बाद सिर्फ यह कह देना कि “इस्लाम शांति का धर्म (मजहब) है” अब पर्याप्त नहीं है, क्योंकि सवाल धर्म के मूल संदेश का नहीं, उसकी राजनीतिक और हिंसक व्याख्या का है। इसलिए वास्तविक संकट हथियारों से कहीं अधिक आगे उस सोच का है जो यह मानती है कि पूरी दुनिया किसी एक धार्मिक (मजहबी) पहचान के अधीन होनी चाहिए। यही सोच युवाओं को यह सिखाती है कि हिंसा पुण्य (सवाब) या अमल-ए-सालिह है और हत्या मजहबी कर्तव्य। यदि इस मानसिकता की जड़ों पर प्रहार नहीं किया गया तो कोई भी सुरक्षा तंत्र, कोई भी कानून और कोई भी सैन्य कार्रवाई स्थायी समाधान नहीं दे सकती है।

अब निर्णय दुनिया के धार्मिक नेताओं, सरकारों और बौद्धिक वर्ग को लेना है। आखिर वे क्‍या चाहते हैं ? क्या वे इस समस्या को कानून-व्यवस्था का मामला मानते रहेंगे या उस वैचारिक खाद को भी चिन्हित करेंगे, जिससे यह हिंसा जन्म लेती है। गैर-मुसलमानों पर हिंसा हर हाल में रुकनी चाहिए। यह किसी एक देश या एक समुदाय तक सीमित समस्‍या नहीं है, आज प्रश्‍न संपूर्ण मानवता का है। यदि आज भी इस पर गंभीर, ईमानदार और साहसी हस्तक्षेप नहीं हुआ तो तय मानिए कल इसकी कीमत और अधिक निर्दोष लोगों को जान एवं हिंसा से चुकानी पड़ेगी।

नितिन नवीन: भाजपा की नई पीढ़ी का प्रतीक और सामान्य कार्यकर्ता से शीर्ष पद तक का सफर

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पटना। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 14 दिसंबर 2025 को एक ऐतिहासिक फैसला लिया, जब बिहार सरकार के मंत्री और पटना की बांकीपुर विधानसभा सीट से पांच बार के विधायक नितिन नवीन को पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति न केवल पार्टी में युवा नेतृत्व की नई लहर का संकेत है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि भाजपा में कोई भी समर्पित कार्यकर्ता शीर्ष पद तक पहुंच सकता है। 45 वर्षीय नितिन नवीन अब देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के सबसे युवा कार्यकारी अध्यक्ष हैं। उनकी इस नियुक्ति ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है और हर तरफ चर्चा है कि भाजपा की संगठनात्मक ताकत का राज क्या है।प्रारंभिक जीवन और राजनीति में प्रवेशनितिन नवीन का जन्म पटना में एक राजनीतिक परिवार में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधायक थे। 2006 में पिता के निधन के बाद मात्र 26 वर्ष की आयु में नितिन नवीन ने राजनीति में कदम रखा। बांकीपुर (तब पटना पश्चिम) सीट से उपचुनाव में उन्होंने जीत हासिल की और तब से लगातार 2010, 2015, 2020 और 2025 के चुनावों में इस सीट को जीतते आ रहे हैं। यह उनके जमीनी जुड़ाव और जनता के बीच लोकप्रियता का प्रमाण है।शुरुआत से ही नितिन नवीन ने खुद को एक मेहनती कार्यकर्ता के रूप में स्थापित किया। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) से छात्र राजनीति की शुरुआत करने वाले नितिन ने भाजपा युवा मोर्चा (भाजयुमो) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वे बिहार भाजयुमो के प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं। इस दौरान उन्होंने युवाओं को पार्टी से जोड़ने में अहम योगदान दिया।संगठनात्मक अनुभव और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियांनितिन नवीन की राजनीतिक यात्रा संगठन की मजबूती पर टिकी है। उन्होंने सिक्किम और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में चुनाव प्रभारी के रूप में काम किया। विशेष रूप से 2023 के छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में भाजपा की निर्णायक जीत में उनकी भूमिका सराहनीय रही। बिहार में भी वे पार्टी के शहरी और बूथ स्तर के संगठन को मजबूत करने में सक्रिय रहे।बिहार सरकार में वे पथ निर्माण मंत्री के रूप में कार्यरत हैं और पहले कानून मंत्रालय भी संभाला है। प्रशासनिक अनुभव के साथ-साथ उनकी सादगी और कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद उन्हें अलग बनाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी नियुक्ति पर कहा कि नितिन नवीन एक समर्पित कार्यकर्ता हैं, जिनकी ऊर्जा और निष्ठा पार्टी को नई मजबूती देगी। गृह मंत्री अमित शाह ने भी इसे युवा कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा बताया।वह वायरल तस्वीर: विनम्रता का प्रतीकनितिन नवीन की एक पुरानी तस्वीर इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। इस तस्वीर में वे ट्रेन यात्रा के दौरान खड़े हैं, जबकि उनके पीछे बैठे हैं वरिष्ठ नेता स्वर्गीय सुशील कुमार मोदी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नंद किशोर यादव। नितिन नवीन उन दोनों के साथ सेल्फी ले रहे हैं।
यह तस्वीर उनकी शुरुआती दिनों की है, जब वे एक युवा कार्यकर्ता थे। यह दर्शाती है कि नितिन नवीन ने कभी पद की गरिमा नहीं देखी, बल्कि वरिष्ठों का सम्मान और पार्टी की सेवा को प्राथमिकता दी। ऐसी विनम्रता ही उन्हें आज इस मुकाम तक ले आई है। यह तस्वीर भाजपा की उस संस्कृति का प्रतीक है, जहां कार्यकर्ता की मेहनत को सम्मान मिलता है।भाजपा की नीति: सामान्य कार्यकर्ता को शीर्ष पद देने की परंपराभाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसकी संगठनात्मक संरचना है। पार्टी की नीति रही है कि कोई भी सामान्य कार्यकर्ता, यदि समर्पित और मेहनती है, तो वह शीर्ष पद तक पहुंच सकता है। नितिन नवीन इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। वे न तो किसी बड़े राजवंश से हैं, न ही दिल्ली के पावर सर्कल से, बल्कि जमीनी स्तर से उठकर आए हैं।पार्टी के इतिहास में देखें तो जनसंघ के समय से ही यह परंपरा चली आ रही है। लाल कृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक – सभी ने कार्यकर्ता के रूप में शुरुआत की। जेपी नड्डा भी कार्यकारी अध्यक्ष से पूर्ण अध्यक्ष बने थे। अब नितिन नवीन की नियुक्ति इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। यह संदेश देती है कि भाजपा में जाति, क्षेत्र या परिवारवाद नहीं, बल्कि कार्य और निष्ठा मायने रखती है।यह नीति पार्टी को युवा और ऊर्जावान बनाती है।
नितिन नवीन की नियुक्ति से पार्टी में नई पीढ़ी को प्रोत्साहन मिलेगा। बिहार जैसे राज्य से एक युवा नेता का उदय पार्टी की राष्ट्रीय छवि को भी मजबूत करता है।निष्कर्ष: नई ऊर्जा और मजबूत भाजपा का भविष्यनितिन नवीन की नियुक्ति भाजपा के लिए एक नया अध्याय है। उनकी युवा ऊर्जा, संगठनात्मक कुशलता और प्रशासनिक अनुभव पार्टी को आगामी चुनौतियों के लिए तैयार करेंगे। यह साबित करता है कि भाजपा एक जीवंत संगठन है, जहां सामान्य कार्यकर्ता भी असाधारण ऊंचाइयों को छू सकता है। नितिन नवीन की यात्रा लाखों कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा है और भाजपा की उस नीति की तारीफ का विषय है, जो मेहनत को सर्वोच्च सम्मान देती है।भविष्य में नितिन नवीन के नेतृत्व में भाजपा और मजबूत होगी, यह निश्चित है। उनकी विनम्रता और समर्पण पार्टी की विचारधारा को नई पीढ़ी तक पहुंचाएगा।

अपने हक़ के लिए लड़ती औरत की लड़ाई है ‘हक़’ मूवी

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ऋषभ कुमार

दिल्ली । तलाक़ तलाक़ तलाक़,
क्या है ये? ये मात्र शब्द हैं या कुछ और?
कोई इसे तीन तलाक़ कहता है, तो कोई कहता है, ‘तलाक-ए-बिद्दत’। फिर आसान भाषा में कहें तो तलाक़ है तो एक शब्द और जो तीन बार बोल दिया तो एक औरत का बसा बसाया घर एकदम से उजाड़ हो जाता है। अब वैसे कहें तो इस देश में नियम ओ कानून का शासन है और पूरी आजादी भी है कि आप किसी के भी साथ रह सकते हैं पर आपकी आजादी किसी और की आज़ादी से जो टकराई तो फिर यह आपकी मनमानी बन जाती है। और इस मनमानी का ही एक रूप तीन तलाक़ की शक्ल में निकल के आता है। न जाने कितनी ही खबरें हमें और आपको सुनने को मिलती रहीं हैं कि किसी से खाने से थोड़ा नमक ज्यादा हो गया तो दे दिया तीन तलाक़, किसी को लड़का नहीं हो रहा तो दे दिया तीन तलाक़, किसी को दूसरी बेगम से इश्क़ फरमाना है तो दे दिया तीन तलाक़ छोटी से छोटी बातों पर तीन तलाक़ दे दिया जाता रहा है। और ऐसे में इसका शिकार बनती हैं मुस्लिम समाज की न जाने कितनी ही औरतें। अब अगर तीन तलाक़ के बाद अपने शौहर को फिर से पाना है तो हलाला होगा। एक और प्रक्रिया जो किसी भी औरत की आत्मा पर एक नासूर छोड़ जाता है। तो ऐसे में उनके पास क्या रास्ता है? अगर कहूं तो किसी भी सभ्य समाज में इस तरह की चीजें नहीं होनी चाहिए पर होती रहीं हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ के नाम पर। और उन सारी औरतों का क्या जिन पर यह बीतती है? उन में से न जाने कितनी तो सिसक कर रह जाती होंगी, शायद कुछ चीखतीं भी होंगी और किसी-किसी ने गुस्से में अपने हाथ भी भींचे होंगे। इन्हीं में से एक औरत निकली और उसने न्याय के उन सारे मंदिरों पर दस्तक दी। ताकि वो अपना ‘हक़’ पा सके। और उसने इस देश के कानून निर्माताओं और न्यायमूर्तिओं को इस विषय पर सोचने के लिए मजबुर किया। अब तीन तलाक़ के मुद्दे को आधार बनाकर एक फिल्म आई है, ‘हक़’। फिल्म आधारित है, शाहबानो के फेमस केस पर जिसने फिर एकबार इस देश की दिशा निर्धारित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

फिल्म की कहानी कुछ इस तरह है कि शाज़िया बानो का विवाह होता है, अब्बास खान से जो पेशे वकील हैं। शुरू में दोनों में खूब प्रेम रहता है। शेर ओ शायरी में बात होती है। शाज़िया बानो की हर बात अब्बास की सर आंखों पर रहती है। समय बीतता है परिवार बढ़ता है और साथ ही बढ़ती हैं जिम्मेदारियां। बातें खुशनुमा से जिम्मेदारी नुमा हो जाती हैं। अब्बास खीझने लगता है। जो बीवी उसे जान से प्यारी थी अब वो उसकी बातों पर भी ध्यान नहीं देता है। पाकिस्तान जाता है तो लौटते हुए दूसरी बीवी ले आता है, जिससे पानी शाज़िया बानो के सर से ऊपर चला जाता है। और तब बेगम से शुरू हुआ यह सफर बानो तक पहुंचता है और विवाद बढ़ते-बढ़ते सेशन कोर्ट, हाई कोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक जाता है। और एक औरत के हक़ की लड़ाई के विरोध में पूरी कौम खड़ी हो जाती है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड उसे गद्दार घोषित करने में लग जाता है, आस-पास के मुस्लिम उनका विरोध करते हैं, अपने बच्चों को उनके अब्बा मौलबी साहब के यहां पढ़ाने से मना कर देते हैं यहां तक कि कौम के नाम पर उनको मारने की कोशिशें भी होती हैं। इतना सब होने के बाद भी शाज़िया बानो के पिता हर क़दम पर उसका साथ देते हैं। तब लगता है कि मुस्लिम समाज को उन जैसे रेशनल मौलवी की आवश्यकता है।

फिल्म को लिखा है रेशू नाथ ने जो बोस: डेड/अलाइव और इल्लीगल जैसी बेहतरीन सीरीज का लेखन कर चुके हैं, यहां भी उनकी कहानी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग की तारीफ बनती है। वो संकेतों में अब्बास की मनोवृत्ति को समझाते हुए कहानी के प्लॉट को सेट करते हैं, चाहें वह एक कुकर के थोड़े से खराब हो जाने पर उसे सही करवाने की जगह दूसरा कुकर ले आना हो, शेर ओ शायरी से जब बातें जिम्मेदारी से भरी हो तो उनसे दूरी बनाना हो और तो और चाहे वह अपने मातहत के बड़े भाई की दूसरी शादी के जिक्र पर अब्बास की आंखों में चमक का आना हो। यह सभी दृश्य आगे की घटनाओं की ओर संकेतों में इशारा करते नज़र आते हैं। इल्लीगल जैसी उम्दा कोर्ट रूम ड्रामा सीरीज को उन्होंने जिस शानदार तरीके से अभिव्यक्त किया था तो यहां भी उनसे यही उम्मीद थी जिस पर वो पूरी तरह खरे उतरे हैं। फिल्म के डायलॉग की बात करें तो बहुत से डायलॉग फिल्म के प्रभाव को गाढ़ा करते हैं । जैसे
यामी जब बोलती हैं कि ‘बिरयानी या कोई सीर खोरमा नहीं है जो बांटकर सवाब का काम करूं शौहर हैं आप हमारे’ , ‘ कभी-कभी मोहब्बत पर्याप्त नहीं होती हमें अपनी इज़्ज़त भी चाहिए’ या फिर ‘ पैजामे का पैंगा चढ़ाकर और दाढ़ी बढ़ाकर आप लोगों को सिर्फ जहालियत ही बेंचते हैं’ या ‘ हम सिर्फ मुसलमान औरत नहीं हैं, हम हिंदुस्तान की मुसलमान औरत हैं।’ जैसे डायलॉग ने फिल्म में चार चांद लगाए हैं।

फिल्म के गीत कहानी को और मार्मिक बनाते हैं। फिल्म की शुरुआत में जब शादी का सीन आता है तो क़ुबूल है गीत आता है जो एक दूसरे का सभी गुण और दोषों के साथ कबूल करने की बात करता है। दूसरा गीत अब्बास के दूसरे निकाह के बाद आता है जिसके बोल हैं ‘ओ रब्बा दिल तोड़ गया तूं’ और अंत में बजत है ‘हक़ है मेरा’ जो दर्शकों के हृदय को कंपित कर देता है और उनकी आंखें गीली हो उडती है। कुल मिलाकर कहें तो गीतों ने फिल्म के प्रभाव को बढ़ाने का काम उम्दा तरीके से किया है।

एक्टिंग में यामी गौतम से जिस तरह की एक्टिंग की उम्मीद होती है, उन्होंने बिल्कुल भी निराश नहीं किया है। उन्होंने शाज़िया बानो के दर्द को पर्दे पर ऐसे जिया है कि आप यामी को भूल जाते हैं और शाज़िया के लिए परेशान होने लगते हैं। और उसके हक़ की लड़ाई में आप अपने को उसके साथ खड़ा कर देते हैं। अब्बास का किरदार एक ऐसे व्यक्ति का है जो अपने फायदे और ईगो के लिए मज़हब का कैसे भी इस्तेमाल कर सकता है। अपने गुनाह को छिपाने के लिए कौम को आगे करता है ताकि अपनी लड़ाई को कौम की लड़ाई बना सके। इमरान ने भी अपने किरदार के इस काइयांपन को बखूबी साधा है, घाघ इतने कि कई बार मुस्लिमों को व्यवस्था का शिकार बहुत ही सफाई से बताते दिखे हैं जबकि वो स्वयं की पत्नी के साथ अन्याय कर रहे थे। बेला जैन बनी शीबा चढ्ढा हमें वकील के रूप में आस्वस्त करती हैं।

एक तरह से फिल्म में बढ़िया एक्टिंग देखने को ‌लगती है। पर यामी गौतम सब पर भारी पड़ती ही नज़र ‌आती हैं।
फिल्म आधारित है शाहबानो केस पर जो 1985 का एक ऐतिहासिक भारतीय कानूनी मामला था, जिसमें 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाह बानो को उनके पति द्वारा तलाक दिए जाने के बाद गुजारा भत्ता (भरण-पोषण) के लिए अपने अधिकारों की लड़ाई लड़नी पड़ी थी, और सुप्रीम कोर्ट ने धर्मनिरपेक्ष दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत उनके भरण-पोषण के अधिकार को बरकरार रखा था। यह मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला था। पर इससे मुस्लिम पर्सनल लॉ और संवैधानिक अधिकारों के बीच टकराव पैदा हो गया था। अब चूंकि संविधान इस राष्ट्र की सर्वोच्च विधि है तो जब भी कोई विधि संविधान से टकराती है तो वह अप्रभावी हो जाती है। पर पर उस समय की सरकार ने मुस्लिम पुरुषों का पक्ष लेते हुए मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 पारित करके सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कमजोर कर दिया था। जिसके कारण मुस्लिम महिलाओं की स्थिति उन्हें 2019 तक का इंतजार करना पड़ा। तब जाकर मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 बना, जिससे भारत में ‘तलाक-ए-बिद्दत’ (एक बार में तीन तलाक) को गैरकानूनी और अमान्य घोषित कर दिया, इसे एक दंडनीय अपराध बनाया, जिसके तहत पति को 3 साल तक की कैद और जुर्माना हो सकता है, साथ ही पीड़ित पत्नी को भरण-पोषण और बच्चों की हिरासत का अधिकार भी दिया गया।
अगर हम देखें तो पहली मुस्लिम बेगम की स्थिति पर आज तक न तो कोई रिसर्च हुई और न ही इनकी स्थिति जानने समझने में किसी संस्था या सरकार ने कोई दिलचस्पी दिखाई। जबकि तीन तलाक़ के बाद बहुतों को दुनिया जहां के कष्ट सहने पड़ते हैं और हलाला जैसे अमानवीय अनुभवों से गुजरना पड़ता रहा था। फिर भी कोई महिला संगठन उनके पक्ष में कभी खड़ा नहीं हुआ जो इन सबके दोगलेपन को दर्शाता है।

फिल्म के हर विभाग पर कार्य किया गया है । कहानी, गाने, डायलॉग, एक्टिंग या डायरेक्शन सभी हिस्सों को साधा गया है और एक ऐसे मुद्दे को उठाया गया है जो एक समय तक एक समुदाय की महिलाओं के विरुद्ध अन्याय का अस्त्र रहा है। यह फिल्म सार्थक विमर्श को बढ़ावा देती नजर आती है। इस तरह की फिल्में निश्चय ही बनती रहनी चाहिए जो पीड़ितों की आवाजें उठाती हैं।

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं)

फिल्म ‘धुरंधर’ : एक सिने–महाकाव्य की अंतर्ध्वनि

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~ परिचय दास

दिल्ली । धुरंधर किसी पर्दे पर चलती हुई साधारण कथा नहीं बल्कि एक ऐसी गहरी साँस है जो दर्शक के भीतर उतरकर देर तक थमती नहीं। यह फिल्म इतिहास की राख से उठती हुई चिंगारी की तरह सामने आती है, जहाँ हर दृश्य एक जले हुए स्मृति-खंड की तरह चमकता है। यह फिल्म राष्ट्रवाद का नारा नहीं बल्कि राष्ट्र की पीड़ा का मौन आख्यान बनकर उभरती है। जब परदे पर कंधार कांड और संसद पर हमले की स्मृतियाँ उभरती हैं तो वे केवल घटनाएँ नहीं रहतीं, वे एक पूरे समय की घबराई हुई धड़कनों में बदल जाती हैं। इसी भय के गर्भ से “ऑपरेशन धुरंधर” जन्म लेता है — एक ऐसा मिशन, जो बाहर से गुप्त है, पर भीतर से अत्यंत नग्न और असहाय।

इस फिल्म का नायक कोई चमकता हुआ पोस्टर नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता घाव है। रणवीर सिंह द्वारा अभिनीत हमज़ा अली मजहरी, या उसका भारतीय नाम, जैसे उसके भीतर दो मुल्क, दो पहचानें और दो आत्माएँ लगातार टकराती रहती हैं। वह सड़क पर चलता है तो उसके कदम नहीं, उसकी शंकाएँ आगे बढ़ती हैं। उसकी आँखें किसी रोमांच की तलाश में नहीं भटकतीं, वे हमेशा एक डरे हुए पक्षी की तरह आसपास के आकाश को नापती रहती हैं। वह जब पाकिस्तान की धरती पर उतरता है तो उसका पहला संघर्ष बाहर नहीं, अपने भीतर से शुरू होता है। उसे हर पल यह याद रखना है कि उसका चेहरा नक़ाब है, उसकी सांसें उधार हैं और उसका जीवन समय-सीमा के भीतर कैद है।

कराची का ल्यारी इलाका फिल्म में केवल एक जगह नहीं बल्कि एक मनोदशा की तरह रचा गया है। गली-गली फैला अँधेरा, दीवारों पर जमी घबराहटें, और हवा में घुली हुई बारूद की गंध—ये सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जहाँ इंसान होना ही एक जोखिम लगता है। यहीं उसका सामना होता है रहमान डकैत से, जिसे अक्षय खन्ना ने असाधारण संयम और आतंरिक निर्दयता के साथ जिया है। रहमान कोई चीखता-चिल्लाता अपराधी नहीं, वह शांत, योजनाबद्ध और अपने भीतर ठंडा पड़ा हुआ ज्वालामुखी है। उसकी आँखों में क्रूरता नहीं, बल्कि एक ठहरी हुई समझदारी है—जैसे उसने हिंसा को रोमांच नहीं बल्कि रोज़मर्रा की आवश्यकता मान लिया हो। जब हमज़ा उसके बेटे की जान बचाता है, तब वह केवल एक कृपा-पात्र नहीं बनता बल्कि उस शत्रु के घर का हिस्सा बन जाता है, जिसके भीतर उसे चुपचाप विस्फोट करना है।

इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहाँ दुश्मन चीखते नहीं, यहाँ दुश्मन सोचते हैं और जब दुश्मन सोचने लगते हैं तब संघर्ष केवल हथियारों से नहीं, आत्मा से लड़ा जाता है। इस धुंधले संसार में मेजर इक़बाल का प्रवेश फिल्म को एक नई सिहरन देता है। अर्जुन रामपाल द्वारा निभाया गया यह किरदार किसी साधारण खलनायक की तरह नहीं आता, बल्कि किसी ठहरे हुए तूफान की तरह धीरे-धीरे छा जाता है। उसके शब्दों में जल्दबाज़ी नहीं, उसके फैसलों में भावुकता नहीं। वह आतंक को जुनून की तरह नहीं, रणनीति की तरह जीता है। 26/11 जैसे हमलों की छाया इसी चरित्र के आसपास मंडराती रहती है और दर्शक बार-बार महसूस करता है कि वह केवल कहानी नहीं देख रहा, बल्कि इतिहास का एक जख्मी पन्ना उलट रहा है।

फिल्म में भारतीय खुफिया तंत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं अजय सान्याल, जिसे आर माधवन ने अत्यंत संयमित गंभीरता के साथ निभाया है। उनका चेहरा किसी नायक जैसा नहीं, बल्कि किसी ऐसे पिता जैसा है जो अपने ही बच्चों को युद्ध में भेजते समय मन ही मन टूटता रहता है। वे पर्दे पर कम दिखाई देते हैं, मगर उनकी उपस्थिति हर फ्रेम में महसूस होती है। उनकी आवाज़ में आदेश नहीं, जिम्मेदारी का बोझ है। वे “धुरंधर” को सिर्फ मिशन नहीं, बल्कि एक नैतिक बोझ की तरह संभालते हैं—जहाँ हर हार का अर्थ सिर्फ असफलता नहीं, बल्कि लाशों की संभावनाएँ हैं।

फिल्म का राजनीतिक पक्ष अपने भीतर कई परतें समेटे चलता है। सत्ता के गलियारों में होने वाले संवाद किसी औपचारिक बहस की तरह नहीं, बल्कि नुकीली फुसफुसाहटों की तरह हैं। यहाँ देश केवल सीमा रेखाओं से नहीं बनता, बल्कि निर्णयों से बनता है—और हर निर्णय का अर्थ किसी अनदेखे व्यक्ति की जान से जुड़ा होता है। इस धूसर राजनीति के बीच चौधरी असलम का किरदार फिल्म में एक विचित्र द्वंद्व लेकर आता है। Sanjay Dutt का यह पात्र पुलिस की वर्दी में एक ऐसा इंसान है जो कानून और इंसानियत के बीच फँस चुका है। उसका चेहरा कठोर है, पर उसकी आँखों में कहीं न कहीं थकान और पछतावे की परतें साफ दिखाई देती हैं। वह पूरी तरह खलनायक नहीं, पूरी तरह नायक भी नहीं—वह इस फिल्म का सबसे त्रासद चेहरा है, जो यह दिखाता है कि युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, भीतर की ज़मीन पर भी लड़ा जाता है।

फिल्म की प्रेमकथा भी किसी फूलों वाली कोमलता के साथ नहीं आती। एलीना के साथ हमज़ा का रिश्ता किसी राहत की तरह नहीं बल्कि और गहरी उलझन की तरह विकसित होता है। प्रेम यहाँ सुकून नहीं देता, बल्कि डर बढ़ा देता है, क्योंकि प्रेम का अर्थ है किसी के लिए कमजोर पड़ जाना। और कमजोर पड़ना एक जासूस के लिए मृत्यु का दूसरा नाम होता है। यह प्रेम कहानी नायक को नरम नहीं करती, बल्कि उसे और अधिक टूटने योग्य बना देती है।

“धुरंधर” की सिनेमाई भाषा बहुत आक्रामक नहीं बल्कि भीतर तक चुभने वाली है। कैमरा अक्सर चेहरों के बहुत पास जाकर रुक जाता है, मानो त्वचा से परे मन को पढ़ लेना चाहता हो। अंधेरा यहाँ केवल रोशनी का अभाव नहीं, बल्कि एक स्थायी भाव है। संगीत भी बहुत मुखर नहीं होता; वह कभी-कभी केवल एक धीमी धुन बनकर भीतर उतरता है और दर्शक के दिल की धड़कन के साथ घुल जाता है।

इस फिल्म का सबसे बड़ा साहस यह है कि यह अपने नायक को महिमामंडित नहीं करती। हमज़ा किसी आदर्श पुरुष की तरह नहीं उभरता—वह टूटता है, डरता है, घबराता है, गलतियाँ करता है। उसकी सीटियाँ नहीं बजतीं, उसके शरीर पर कभी-कभी पसीने की ठंडी बूंदें दिखती हैं। वह अपने देश के लिए लड़ता है, लेकिन वह अपने डर से भी लगातार लड़ रहा होता है। यही उसे महिमामंडित नहीं, बल्कि मानवीय बनाता है।

फिल्म के भीतर छिपा हुआ तनाव केवल बमों या गोलियों से नहीं, बल्कि पहचान के संकट से पैदा होता है। एक ऐसा व्यक्ति जो दिन भर दुश्मन की भाषा बोलता है, दुश्मन की तरह चलता है, दुश्मन की रोटी खाता है—वह कब तक अपने आपको याद रख सकता है? यह प्रश्न इस फिल्म की आत्मा है। “धुरंधर” इसी प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमती रहती है, बिना उसका कोई आसान उत्तर दिए।

लंबाई के बावजूद फिल्म बोझिल नहीं लगती, क्योंकि हर दृश्य अपने साथ एक नया मनोभाव लेकर आता है। कहीं कोई क्षण बहुत तेज़ है, कहीं बहुत धीमा, लेकिन दोनों ही मिलकर दर्शक को बाँधे रखते हैं। यह फिल्म चीखती नहीं, धीरे-धीरे भीतर उतरती है। यह आपको झकझोरती नहीं, बल्कि आपको अकेला छोड़ देती है।

अंत की ओर आते-आते फिल्म एक खुला घाव छोड़ देने जैसा अनुभव देती है। कोई परिपूर्ण न्याय नहीं होता, कोई पूर्ण विजय नहीं आती। केवल यह एहसास बचता है कि कुछ लोग अपने जीवन की पूरी उम्र दूसरों की नींद बचाने में खर्च कर देते हैं और उनकी कोई तस्वीर दीवार पर नहीं लगाई जाती। वे केवल फाइलों की धूल में, खुफिया रिपोर्टों की स्याही में और कभी-कभी किसी फिल्म के किसी धुंधले फ्रेम में जीवित रहते हैं।

“धुरंधर” वही धुंधला फ्रेम है—पर भीतर से बहुत स्पष्ट, बहुत कठोर, बहुत सच्चा। यह फिल्म राष्ट्रभक्ति का शोर नहीं है, यह राष्ट्र के लिए चुपचाप जलने वालों की धीमी रोशनी है। इसे देखने के बाद दिल गर्व से नहीं बल्कि एक अजीब-सी नम्रता से भर जाता है। यह एहसास होता है कि बहादुरी अक्सर अनदेखी रहती है, और सबसे बड़े युद्ध अक्सर बिना तालियों के लड़े जाते हैं।

यह फिल्म इसलिए महत्वपूर्ण नहीं कि इसमें कितने धमाके हैं, बल्कि इसलिए कि इसमें कितने सवाल हैं। यह इसलिए याद नहीं रहती कि इसमें कितने खून के छींटे हैं, बल्कि इसलिए कि इसमें कितनी खामोशियाँ हैं। यह सिनेमा का वह रूप है जहाँ कहानी नहीं, विवेक बोलता है।

और जब फिल्म समाप्त होती है, तब मन एक अजीब से खालीपन से भर जाता है—ऐसा खालीपन जो भयावह नहीं, बल्कि आवश्यक है। क्योंकि कुछ फिल्में आपको भरने नहीं आतीं, वे आपको खाली करने आती हैं—ताकि आप अपने भीतर कुछ नया सोच सकें, कुछ नया महसूस कर सकें।

“धुरंधर” ऐसी ही एक फिल्म है।
वह खत्म नहीं होती।
वह भीतर शुरू होती है।

फिल्म जब पर्दे पर खुलती है, तो उसका पहला परिचय – एक अधीर धड़कन, एक गहरी साँस जैसा — आपको सीने से चिपक कर लेता है। कहानी, जासूसी, सत्ता संघर्ष, देश-विदेश के बीच छुपे षड़यंत्रों और व्यक्तिगत पहचान के द्वंद्व का मिश्रण है। पर “धुरंधर” सिर्फ थ्रिलर नहीं; वह एक आत्मीय, आध्यात्मिक, और नैतिक सवालों से भरी यात्रा है — जहाँ नायक, खलनायक, सत्ता, धर्म, देश, और पहचान — सब कुछ काल–विराम में खिसकता दिखाई देता है। इस बीच, यही भ्रम, यही असमंजस, यही धुंध ही फिल्म की असली ताकत बन जाती है।

नेतृत्व की कमान जो हैं — रणवीर सिंह — उनका किरदार सादगी या दिखावे से नहीं, बल्कि उस भीतरी उथल-पुथल, उस मानसिक सीमा पर टकराहट की माधुर्यता से जीता गया है। उनके हर इशारे, हर खामोशी, हर लड़खड़ाहट में देश, धर्म, पहचान और विश्वास के बीच उभरे द्वंद्व की गूंज सुनाई देती है। उनकी भूमिका “रोबोट-नायक” की तरह नहीं, बल्कि एक मानवीय लोकतंत्र के भीतर फटी आत्मा की तरह है। उनके अभिनय में शोर नहीं, कमल-सी सूक्ष्मता है — और हर बार जब वे स्क्रीन पर आते हैं, लगता है कि वह सिर्फ कोई मिशन पूरा नहीं कर रहे, बल्कि अपनी ही आत्मा से लड़ रहे हैं।

उनके खिलाफ — या उनके साथ — खड़े हैं अक्षय खन्ना, संजय दत्त और आर माधवन जैसे चेहरे, जो सिर्फ सहायक नहीं बल्कि स्वयं-स्वरूप धुरा-निर्माण करते हैं। खासकर अक्शय का खलनायक — विडंबना, भय और शक्ति का संगम है; उसके चेहरे पर आने वाली हल्की मुस्कान भी डराती है। वह वह है जो स्पष्ट बुराई नहीं, बल्कि उस बुराई की शुद्ध, तराश-सी निर्भीकता दिखाता है, जो सत्ता और प्रभाव की भाषा जानती है।

माधवन की भूमिका — साधारण चरित्र नहीं, बल्कि उस तर्क-धारा की मूरत है, जो जासूसी, राजनैतिक चालबाज़ी, विश्वास और धोखे के जाल में इंसान की मजबूरी को समझने की कोशिश करती है। वह सिर्फ सहयोगी नहीं, बल्कि विचारक है — जिसके प्रत्येक वाक्य में सिर्फ मिशन की नहीं, मानवीय लागत की आसुई गहराई होती है।

फिल्म का ढांचा — एक द्वि-भागी कथा, जिसकी पहली कड़ी अभी हमारी आँखों के सामने है — स्वयं में एक साहसिक प्रयत्न है। यह दर्शाने की हिम्मत कि हर गूँजी बंदूक की गोली, हर दफन सूचना, हर छल-कपट के पीछे इंसान की खामोशी, उसकी बेचैनी, उसकी अस्मिता हलचल करती है। यह केवल देश की सीमाओं, जासूसी नेटवर्क, सत्ता संघर्ष नहीं दिखाती — बल्कि उस व्यक्ति की आंतरिक लड़ाई का दर्पण खड़ा करती है, जो हर मोड़ पर अपने अस्तित्व, अपने विश्वास, अपने नैतिक चयन से जूझता है।

लेकिन “धुरंधर” की महानता में इसके दोष भी हैं — 3 घंटे 34 मिनट (214.1 मिनट) की लंबाई, जो कभी-कभी कहानी की गति को बोझिल कर देती है। कुछ दृश्य, संवाद और हिंसात्मक तरीके — बारकी सूक्ष्मता के बजाय जोर-शोर से भाव जगाते हैं, जिससे वह अधूरी संवेदनशीलता कहीं खो जाती है। यह बॉक्स-ऑफिस की थ्रिलर-मासिकता व कथानक-चाल का दबाव हो सकता है, या निर्देशक की अभिलाषा — पर इन हिस्सों में फिल्म अपना दायित्व, अपनी आत्मा खोती नज़र आती है।

इस सबके बावजूद, “धुरंधर” अपना अस्तित्व सिर्फ एक फिल्म के रूप में नहीं बल्कि एक अनुभव, एक प्रतिध्वनि के रूप में जिंदा रखती है। थ्रिलर-जगत की चमक-दमक, जासूसी की चाल, अदाकारी की तीव्रता — सब कुछ एक साथ आते हैं, पर कहीं-कहीं उनकी परतों के बीच, उस भूली हुई मानवीय खामोशी की गूँज सुनाई देती है।

और जब पर्दा गिरता है तो केवल एक कहानी समाप्त नहीं होती — आप अकेले नहीं होते। आपके भीतर एक सवाल बच जाता है: शक्ति, देश, पहचान और इंसान — किसके लिए, किस हद तक? जब धुरंधर बन जाए, तब कौन बचता है? क्या जीत की परिभाषा बदल जाती है, या हार की?

“धुरंधर” एक संकल्प है — न कि सिर्फ सरकार या राजनीति का, बल्कि उस आत्मा का जो हर दिन, हर पल, अपने विश्वास और अस्मिता की लड़ाई लड़ती है। और यह लड़ाई, दर्शकों को सामने रखकर, उन्हें प्रतिबिंब दिखाकर, उन्हें सोचने पर मजबूर करके, इस फिल्म को सिर्फ देखते समय की नहीं — बल्कि जीवन भर की याद बना देती है।

शायद यही उसकी सबसे बड़ी विजय है: वह नायक नहीं बनाती, बल्कि मानव बनाती है।

फिल्म जब शुरू होती है तो पहली ही झलक में उसकी महत्वाकांक्षा साफ दिख जाती है — राष्ट्रहित, खुफिया मिशन, आतंक-तंत्र, देश की सुरक्षा और भावनात्मक दायित्वों का संगम। निर्देशक आदित्य धर ने जिस तीव्रता से शुरुआत की है, वह वाकई दिल धड़काता है। पहले हाफ की गति — मजबूत, खतरनाक, और आशाजनक — दर्शक को बांधे रखती है।

अभिनय — “धुरंधर” की असली ताकत यहां है। रणवीर सिंह, जो लीड किरदार में हैं, उन्होंने अपने किरदार “हमज़ा” को दिखावटी हीरोइज़्म नहीं, बल्कि भीतर की बेचैनी, संदिग्ध पहचान और जासूसी के दर्द के साथ जिया है। उनके किरदार की कड़कित — हल्के डगमगाते पल, शांति और अचानक सन्नाटा — सब कुछ दिखाता है कि वह केवल एक मिशन पर नहीं, एक तंत्र में फँसे हालात के बीच ज़िंदा हैं। कई समीक्षकों ने इसे “कैल्म प्रीडेटर” वाला अवतार कहा है।

लेकिन जब स्क्रीन पर आते हैं ~अक्षय खन्ना तो ऐसा लगता है कि फिल्म ने अपना सबसे भारी दांव वहीं लगाया है। उनका किरदार — रहमान डकैत या गैंगस्टर/विलेन — चेहरा जितना शांत, वह उतना ही खतरनाक। कई लोगों ने इसे “मास्टरक्लास” परफॉर्मेंस कहा है। जब वह पर्दे पर होते हैं, कैमरा खुद उनकी ओर मुड़ जाता है, हर हल्की हरकत, हर मुस्कान, हर आँख की हल्की चमक पर निगाह टिक जाती है।

अन्य कलाकार — जैसे संजय दत्त, अर्जुन रामपाल और आर माधवन — अपने-अपने हिस्से अच्छे लगे लेकिन उन्हें उतनी जगह नहीं मिली जिससे वे पूरी तरह पंख पसार सकें। कुछ समीक्षकों का कहना है कि सपोर्टिंग कास्ट ने फिल्म को मजबूती दी है लेकिन उनका उपयोग सीमित रहा।

जहाँ “धुरंधर” सफल होती है — वह है उसका विज़ुअल और सेट-अप। कराची की सड़कों, माफिया-एंडरस्लूम इलाकों, गुप्त ऑफिस, खुफिया बैठकें — सब कुछ ऐसा दिखता है कि आप असुरक्षा, डर, और गुप्तता की हवा महसूस करने लगते हैं। एक थ्रिलर होने के नाते यह वातावरण काम करता है।

लेकिन — और यह “लेकिन” काफी बड़ा है — फिल्म की लंबाई और कथानक की चपलता उसके सबसे बड़े बोझ बन जाते हैं। लगभग 3 घंटे 34 मिनट की अवधि में, कई बार ऐसा लगता है कि कहानी खिंची जा रही है, न कि आगे बढ़ रही। कुछ दृश्यों में कार्रवाई ज़ोर-जुल्म से अधिक, दिखावे के लिए लगती है; हिंसा और खून-खराबा ऐसे फ्रेमों में इस्तेमाल हुआ है जहाँ शायद मौन और तनाव अधिक असर देते।

क्लाइमैक्स — जो कि दर्शकों को एक मजबूत अंत की उम्मीद देता है — वहीं फिल्म फिसलती है। बहुत कुछ खुला छोड़ जाता है, कई धागे केवल “To be continued…” की ओर इशारा छोड़ कर। इसकी वजह से यह महसूस होता है कि यह कहानी अभी पूरी तरह नहीं हुई; उसका असली मुकाम अगली कड़ी में है।

फिर भी, “धुरंधर” उस तरह की फिल्म नहीं है जिसे आप सिर्फ छुट्टी फिल्म की तरह देखें और भूल जाएँ। यह एक अनुभव है — एक जासूसी-थ्रिलर का जो सिर्फ एक्शन नहीं, भय, कटुता, घुसपैठ, धोखा, पहचान और आत्मनिर्णय की जमीनी सच्चाइयों को उभारने की कोशिश करता है। इसमें चमक-दमक कम है, गहराई अधिक।

फिल्म के अंत तक, आप नायक से जुड़ जाते हैं — न कि उसकी जीत या हार के कारण बल्कि उसकी यात्रा, उसकी उलझन, उसकी उत्पीड़न और उसके मन के उस भय के कारण जो आपने कभी महसूस न किया हो लेकिन अब महसूस होता है।

यदि इसे देखा जाए, तो “धुरंधर” एक ऐसा थ्रिलर है जो आपको सिर्फ मनोरंजन नहीं देता — बल्कि सवाल देता है: पहचान क्या है? मिशन क्या है? सही और गलत की रेखा कब धुंधली होती है? और उस धुंध में भी इंसान अपनी मानवता कैसे बचाए रखता है?

“धुरंधर” उन फिल्मों में से है जो दिखने से पहले सोचने पर मजबूर करती हैं। जहाँ प्रदर्शन (performance), दिशा (direction) और माहौल (ambience) — तीनों मिलाकर एक असर छोड़ते हैं लेकिन उस असर को पूरी तरह साधने के लिए थोड़ी तीव्रता, थोड़ी परिपक्वता और थोड़ी कुशलता की कमी है।

इसलिए, यह फिल्म — सभी कमज़ोरियों के साथ — एक मतिभ्रष्ट नहीं बल्कि एक बहादुर, ज़ख्मी और असंतुष्ट कोशिश है। उन्हीं धड़कनों, उल्लासों, भय और सवालों के बीच, “धुरंधर” कहीं टूटता है, कहीं जलता है — और कहीं आपके मन में रुक जाता है।

रणवीर सिंह का परफॉर्मेंस गहराई, आंतरिक तनाव और शारीरिक ट्रांसफ़ॉर्मेशन के कारण सबसे मज़बूत पक्ष है। अक्षय खन्ना का खलनायक वाला किरदार डर और ठंडेपन का गहरा असर छोड़ता है। आदित्य धर की निर्देशकीय दृष्टि भव्य, गहरी और डार्क है लेकिन अत्यधिक लंबाई और कुछ अनावश्यक दृश्य इसकी गति को धीमा कर देते हैं। कहानी का विचार मजबूत है लेकिन उपकथाएँ और विस्तार कई जगह बोझिल महसूस होते हैं। छायांकन और बैकग्राउंड म्यूज़िक फिल्म का मिज़ाज बनाए रखते हैं। एडिटिंग थोड़ी और कसी हो सकती थी।
“धुरंधर” एक गहरी, गंभीर और महत्त्वाकांक्षी स्पाई-थ्रिलर है जो पूरी तरह “हल्की” मनोरंजक फिल्म नहीं बल्कि एक भावनात्मक और राजनीतिक अनुभव देना चाहती है। इसमें कमियाँ हो सकती हैं लेकिन यह फिल्म असरदार है — और लंबे समय तक याद रहती है।

‘धुरंधर’ सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं रह जाती, वह समय की नसों में उतरे भय, साहस और मौन की एक लम्बी, थरथराती हुई परछाईं बन जाती है। यह उन अदृश्य चेहरों की कथा है जो राष्ट्र की नींद की रखवाली करते हैं और अपनी पहचान को खुद ही दफ़ना देते हैं। रणवीर सिंह का किरदार किसी चमकते हुए नायक की तरह नहीं, बल्कि भीतर-ही-भीतर जलते हुए मनुष्य की तरह स्मृति में ठहरता है — एक ऐसा मनुष्य जो जीतने के लिए नहीं, केवल निभाने के लिए जीता है।

फ़िल्म की सबसे बड़ी सफलता यही है कि वह शोर में भी एक सन्नाटा रच देती है और विस्फोटों के बीच भी दर्शक के मन में एक प्रश्न छोड़ जाती है — देश की सुरक्षा का मूल्य क्या केवल दुश्मन की लाशों में मापा जा सकता है, या उन अपनों की ख़ामोश कुर्बानियों में, जिनकी कोई तस्वीर नहीं होती? अपनी सीमाओं और लंबे विस्तार के बावजूद, “धुरंधर” उस अदृश्य युद्ध का एक भारी, धुएँ से भरा पर ज़रूरी दस्तावेज़ बन जाती है।

परदे पर जब अंधेरा घिरता है, कहीं बहुत भीतर एक धीमी-सी आवाज़ गूंजती है — असली धुरंधर वे नहीं होते जो दिखते हैं, बल्कि वे जो सब कुछ खोकर भी राष्ट्र की छाया बनकर चलते रहते हैं। यही इस फ़िल्म की असली अंतर्ध्वनि है और यही उसकी सबसे गहरी विजय।

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