राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय–डीटीटीडीसी के ‘रंग अम्लान 2026’ बाल रंग महोत्सव के नाट्य प्रदर्शनों का शुभारम्भ

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नई दिल्ली:  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) एवं दिल्ली पर्यटन एवं परिवहन विकास निगम (डीटीटीडीसी) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित *’रंग अम्लान 2026′ बाल रंग महोत्सव एवं कार्यशाला* के अंतर्गत कार्यशाला में भाग ले रहे विद्यार्थियों के लिए आयोजित विशेष नाट्य प्रदर्शनों का शुभारम्भ आज (04 जुलाई 2026) गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, राजघाट स्थित सत्याग्रह मंडप में हुआ। 30 जून से प्रारम्भ हुआ यह महोत्सव एवं कार्यशाला 10 जुलाई 2026 तक आयोजित किया जा रहा है।

इस कार्यशाला में 155 बच्चों को पाँच समूहों में विभाजित कर अनुभवी रंगकर्मियों के मार्गदर्शन में गहन रंगमंच प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रत्येक समूह में लगभग 30 से 33 प्रतिभागी हैं। व्यावहारिक प्रशिक्षण के साथ-साथ बच्चों को देश के प्रतिष्ठित रंग समूहों द्वारा प्रस्तुत उत्कृष्ट बाल नाटकों को देखने का अवसर भी प्रदान किया जा रहा है, जिससे वे नाट्य-कथन, अभिनय, रंग-शिल्प तथा मंचीय प्रस्तुति की विविध विधाओं को निकट से समझ सकें।

इस अवसर पर *राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक श्री चित्तरंजन त्रिपाठी* ने कहा, “भारत के भावी नागरिकों के निर्माण और एक स्वस्थ समाज की रचना में बाल रंगमंच की महत्त्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने अपने थिएटर-इन-एजुकेशन (टीआईई) कंपनी, अथवा संस्कार रंग टोली और बाल नाट्य प्रकोष्ठ तथा अन्य इकाइयों के माध्यम से बाल रंगमंच गतिविधियों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। वर्ष 2026 की ग्रीष्मकालीन अवधि में ही देश के विभिन्न हिस्सों में, जिनमें ग्रामीण एवं जनजातीय क्षेत्रों के साथ-साथ शहरी क्षेत्रों के वंचित समुदाय भी शामिल हैं, 100 से अधिक बाल रंगमंच कार्यशालाओं का आयोजन किया गया है।”

उन्होंने आगे कहा, “हमारा प्रयास इन कार्यशालाओं को प्रत्येक स्तर पर अधिक से अधिक समावेशी बनाना रहा है। इसी सोच के तहत छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, कश्मीर के पंडित कॉलोनी में प्रधानमंत्री पैकेज के कर्मचारियों के बच्चों, सुधार गृहों में रह रहे बच्चों सहित अनेक वर्गों तक रंगमंच की पहुँच सुनिश्चित की गई है। इस प्रयास में सहयोग के लिए हम डीटीटीडीसी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं और भविष्य में भी ऐसी अनेक साझेदारियों की आशा करते हैं।”

महोत्सव का शुभारम्भ आज सायं 6:00 बजे श्रीमती निशा त्रिवेदी द्वारा निर्देशित नाटक ‘शांति की पुकार’ के मंचन से हुआ। 5 से 9 जुलाई तक प्रतिदिन सायं 7:15 बजे नाट्य प्रस्तुतियाँ आयोजित की जाएँगी। महोत्सव के अंतर्गत 5 जुलाई को श्री जयंत राभा निर्देशित ‘प्रेमचंद की लड़कियाँ’, 6 जुलाई को श्री गुलशन वालिया निर्देशित ‘भूतनगरी’, 7 जुलाई को श्री पराग सरमा निर्देशित ‘जाके जाके उड़ी जाई सराई (झुंड के झुंड चिड़ियाँ उड़ जाती हैं)’, 8 जुलाई को श्री विक्रम सिंह निर्देशित ‘रिबिके, ग्रीन बियर्डेड किंग एंड जायंट बीन स्टॉक’ तथा 9 जुलाई को श्री हिम्मत सिंह नेगी निर्देशित ‘मोबाइल-आ? सूर?’ का मंचन किया जाएगा।

कार्यशाला का समापन 10 जुलाई 2026 को सायं 5:30 बजे से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अभिमंच सभागार में होगा, जहाँ कार्यशाला के सभी पाँच समूह अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रशिक्षण के दौरान अर्जित रचनात्मकता, आत्मविश्वास, सामूहिकता तथा रंगमंचीय कौशल का प्रदर्शन करेंगे।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एवं दिल्ली पर्यटन एवं परिवहन विकास निगम (डीटीटीडीसी) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘रंग अम्लान 2026’ का उद्देश्य बच्चों में रंगमंच के प्रति रुचि विकसित करना, उन्हें गुणवत्तापूर्ण रंगमंचीय प्रशिक्षण के साथ उत्कृष्ट नाट्य प्रस्तुतियों का अनुभव प्रदान करना तथा उनके सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास को प्रोत्साहित करना है।

Theatrical Productions of NSD–DTTDC’s Rang Amlan 2026 Children’s Theatre Festival Commenced

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New Delhi: The theatrical productions of the Rang Amlan 2026 Children’s Theatre Festival, staged for the participating student workshop groups, opened today(04 July 2026) at Satyagraha Mandap, Gandhi Smriti and Darshan Samiti, Rajghat. The productions are under the umbrella of Rang Amlan 2026 Children’s Theatre Festival and Workshop, a joint initiative of the National School of Drama (NSD) and the Delhi Tourism and Transportation Development Corporation (DTTDC), which commenced on 30 June and is scheduled to conclude on 10 July 2026.

The workshop has brought together 155 children, divided into five groups of approximately 30–33 participants each, who are undergoing intensive theatre training under the guidance of experienced theatre practitioners. Alongside practical training, the festival has been specially curated to expose the young participants to a diverse range of high-quality children’s theatre productions by leading theatre groups, enriching their understanding of theatrical storytelling, performance techniques, and stagecraft.

Speaking on the occasion, Shri Chittaranjan Tripathy, Director, NSD, said: “Given the beautiful power of shaping a healthy society through nurturing the future citizens of India, NSD has increasingly focused on children’s theatre workshops through its Theatre-in-Education (TiE) Company, Children’s Theatre Wing, and other branches. In the summer of 2026 alone, we have organized more than 100 children’s theatre workshops in different parts of the country, including many in rural and tribal setups as well as marginalised community pockets in urban areas.”

“Our focus has also been to make it more and more inclusive in every aspect—be it children in the Naxal-affected areas of Chhattisgarh, Prime Minister’s Package employees at Pandit Colony, Kashmir, as well as children of correctional homes, among others. We express our gratitude to DTTDC for coming forward to support us in our effort through Rang Amlan. We look forward to many more such partnerships in the future,” he added.

The festival opened today with ‘Shanti Ki Pukar’, directed by Smt. Nisha Trivedi, at 6:00 p.m. From 5 to 9 July, performances will begin daily at 7:15 p.m. The festival line-up includes ‘Premchand Ki Ladkiyan’, directed by Sh. Jayanta Rabha on 5 July; Bhootnagri, directed by Sh. Gulshan Walia on 6 July; ‘Jake Jake Uri Jai Sarai (Jhoond Ke Jhoond Chdiyan Udd Jaati Hain)’, directed by Sh. Parag Sarmah on 7 July; ‘Ribike, Green Bearded King and Giant Bean Stalk’, directed by Sh. Vikram Singh on 8 July; and ‘Mobile A Sur?’, directed by Sh. Himmat Singh Negi on 9 July.

The workshop will culminate on 10 July 2026 at 5:30 p.m. onwards at Abhimanch, National School of Drama, where all five groups of workshop participants will present demonstrations showcasing the creativity, confidence, teamwork, and theatrical skills they have developed during the workshop.

Organised by the National School of Drama in collaboration with the Delhi Tourism and Transportation Development Corporation (DTTDC), Rang Amlan 2026 aims to nurture children’s interest in theatre by combining intensive theatre training with exposure to inspiring stage productions, and to develop them into holistic individuals.

लोकप्रिय जननायक शक्तिपुंज रामविलास पासवान  

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पटना।भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो केवल चुनाव जीतने वाले नेता नहीं, बल्कि समाज के दबे-कुचले वर्गों की आकांक्षाओं के प्रतीक बन जाते हैं। स्वर्गीय रामविलास पासवान ऐसे ही जननेता थे। उन्होंने लगभग पाँच दशकों तक भारतीय राजनीति में सक्रिय रहते हुए दलितों, पिछड़ों, गरीबों, श्रमिकों और वंचितों की आवाज़ को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में स्थापित करने का कार्य किया। उनका राजनीतिक जीवन केवल सत्ता प्राप्ति की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए निरंतर संघर्ष का इतिहास है।

रामविलास पासवान का जन्म 5 जुलाई 1946 को बिहार के एक साधारण परिवार में हुआ। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से की और 1969 में बिहार विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए। समाजवादी विचारधारा, डॉ. राममनोहर लोहिया के सामाजिक न्याय के सिद्धांतों और लोकनायक जयप्रकाश नारायण के जनांदोलन से प्रेरित होकर उन्होंने राजनीति को जनसेवा का माध्यम बनाया।

आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले नेताओं में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने जेल की यातनाएँ झेलीं, लेकिन अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। 1977 के लोकसभा चुनाव में हाजीपुर से उनकी ऐतिहासिक जीत ने उन्हें राष्ट्रीय राजनीति के अग्रिम पंक्ति के नेताओं में स्थापित कर दिया। यह जीत केवल एक उम्मीदवार की विजय नहीं थी, बल्कि उन करोड़ों लोगों की आशाओं की जीत थी जो सामाजिक समानता और सम्मानजनक जीवन की आकांक्षा रखते थे।

रामविलास पासवान की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने दलित राजनीति को केवल जातिगत सीमाओं में बाँधने के बजाय उसे सामाजिक समावेशन और राष्ट्रीय विकास से जोड़ा। वे मानते थे कि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब समाज का सबसे कमजोर व्यक्ति भी सम्मान और अवसर प्राप्त करेगा। इसी सोच के कारण उन्होंने दलितों, पिछड़ों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के अधिकारों की लड़ाई को संसद से लेकर सड़क तक निरंतर उठाया। उन्होंने दलित सशक्तिकरण के लिए संगठनात्मक प्रयास भी किए और सामाजिक चेतना के विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारतीय राजनीति में उन्हें सामाजिक न्याय के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिना जाता है। मंडल आयोग की सिफारिशों और पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर उनका स्पष्ट और दृढ़ रुख रहा। वे मानते थे कि सदियों से वंचित समुदायों को केवल संवैधानिक अधिकार देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें वास्तविक अवसर, शिक्षा, रोजगार और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी भी मिलनी चाहिए। यही कारण था कि वे आरक्षण और सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रबल समर्थक रहे।

संसद में उनकी उपस्थिति सदैव प्रभावशाली रही। वे उन विरले नेताओं में थे जो ग्रामीण भारत की समस्याओं को राष्ट्रीय एजेंडा बना सकते थे। चाहे श्रमिकों के अधिकारों का प्रश्न हो, खाद्य सुरक्षा का मुद्दा हो, रेल सेवाओं का विस्तार हो या दूरदराज़ क्षेत्रों तक विकास पहुँचाने का प्रयास—उन्होंने हर मंच पर आम जनता की चिंता को प्राथमिकता दी। विभिन्न प्रधानमंत्रियों के साथ काम करते हुए भी उन्होंने अपनी मूल प्रतिबद्धता—गरीब और वंचित वर्गों की सेवा—को कभी नहीं छोड़ा।

केंद्रीय मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल अनेक दृष्टियों से उल्लेखनीय रहा। श्रम एवं कल्याण मंत्री के रूप में उन्होंने श्रमिक वर्ग के हितों को प्रमुखता दी। रेल मंत्री के रूप में उन्होंने आम यात्रियों की सुविधाओं पर ध्यान केंद्रित किया। संचार, कोयला, इस्पात, रसायन एवं उर्वरक तथा उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण जैसे मंत्रालयों का दायित्व संभालते हुए उन्होंने प्रशासनिक दक्षता और जनोन्मुखी दृष्टिकोण का परिचय दिया।

विशेष रूप से खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय में उनकी भूमिका को गरीबों के प्रति संवेदनशील नेतृत्व के रूप में देखा जाता है। वे हमेशा इस बात पर बल देते थे कि देश के किसी भी नागरिक को भूखा नहीं सोना चाहिए। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने, खाद्य सुरक्षा की भावना को मजबूत करने और गरीब परिवारों तक आवश्यक वस्तुएँ पहुँचाने के प्रयासों में उनकी सक्रिय भूमिका रही।

रामविलास पासवान की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष उनकी सर्वस्वीकार्य छवि थी। भारतीय राजनीति में अक्सर वैचारिक और दलगत टकराव देखने को मिलता है, लेकिन पासवान ऐसे नेता थे जिनके प्रति विभिन्न राजनीतिक दलों में सम्मान का भाव था। उन्होंने अनेक प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया और हर सरकार में अपनी उपयोगिता तथा जनहितकारी दृष्टिकोण के कारण महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह उनकी राजनीतिक परिपक्वता और संवाद क्षमता का प्रमाण था।

उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक यह थी कि उन्होंने दलित नेतृत्व को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई। बिहार के एक साधारण परिवार से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष स्तर तक पहुँचना स्वयं में प्रेरणादायक यात्रा है। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने अपनी सफलता को व्यक्तिगत उपलब्धि तक सीमित नहीं रखा। वे लगातार उन वर्गों की बात करते रहे जिनकी आवाज़ अक्सर सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँच पाती थी।

गरीबों के प्रति उनकी संवेदनशीलता केवल भाषणों तक सीमित नहीं थी। वे बार-बार इस बात पर ज़ोर देते थे कि विकास का वास्तविक अर्थ तभी है जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। उनकी राजनीति में सामाजिक न्याय और आर्थिक न्याय एक-दूसरे के पूरक थे। वे मानते थे कि गरीबी उन्मूलन, शिक्षा का विस्तार, रोजगार सृजन और सामाजिक सम्मान—ये सभी समान रूप से आवश्यक हैं। यही समग्र दृष्टि उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती थी।

रामविलास पासवान की दूरदर्शिता का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी था कि उन्होंने बहुजन समाज की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाने का निरंतर प्रयास किया। वे चाहते थे कि लोकतांत्रिक संस्थाओं में समाज के सभी वर्गों की समान हिस्सेदारी हो। उनके लिए लोकतंत्र केवल मतदान की प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व का माध्यम था। इस दृष्टिकोण ने उन्हें करोड़ों लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया।

एक वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार के रूप में यदि उनके योगदान का मूल्यांकन किया जाए तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि रामविलास पासवान ने भारतीय राजनीति को अधिक समावेशी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सामाजिक न्याय की अवधारणा को व्यवहारिक राजनीति से जोड़ा। उन्होंने यह सिद्ध किया कि वंचित वर्गों के अधिकारों की बात करते हुए भी राष्ट्रीय विकास, आर्थिक प्रगति और लोकतांत्रिक स्थिरता के प्रति प्रतिबद्ध रहा जा सकता है।

आज जब हम उनके जीवन को पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वे केवल एक राजनीतिक दल के नेता नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के प्रतीक के रूप में दिखाई देते हैं। उनका जीवन संघर्ष, सेवा, प्रतिबद्धता और जनविश्वास का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने करोड़ों गरीबों, दलितों, पिछड़ों और वंचितों को यह विश्वास दिलाया कि लोकतंत्र में उनकी भी आवाज़ है, उनका भी अधिकार है और उनका भी सम्मान है।

रामविलास पासवान का राजनीतिक जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा। उन्होंने यह संदेश दिया कि राजनीति का सर्वोच्च उद्देश्य सत्ता नहीं, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों का उत्थान होना चाहिए। भारतीय लोकतंत्र में उनका नाम एक ऐसे जननायक के रूप में सदैव स्मरण किया जाएगा जिसने सामाजिक न्याय, समान अवसर और मानवीय गरिमा की लड़ाई को अपना जीवन समर्पित कर दिया।

निस्संदेह, रामविलास पासवान केवल एक नेता नहीं थे; वे करोड़ों वंचित भारतीयों की आशाओं, आकांक्षाओं और संघर्षों की जीवंत अभिव्यक्ति थे। उनकी विरासत भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सामाजिक न्याय के एक उज्ज्वल अध्याय के रूप में सदैव अंकित रहेगी।

भ्रष्टाचार की जड़ें: बुलडोजर की जरूरत क्यों?

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दिल्ली। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार एक ऐसा घाव है जो स्वतंत्रता के बाद भी नहीं भरा। अंग्रेजों के समय में अपने अधिकारियों को बचाने के लिए उन्हें विशेषाधिकार दिए गए, बड़े-बड़े पाप छुपाए गए। लेकिन आजाद भारत में ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। फिर भी, भ्रष्टाचार जारी है। सिपाही से लेकर बड़े अधिकारी तक, सबकी गाड़ियों से पैसा निकलता रहता है। जब तक ठोस कार्रवाई नहीं होगी—निलंबन की बजाय घर पर बुलडोजर नहीं चलेगा-तब तक यह रुकने वाला नहीं है। लाखों की प्राइवेट नौकरी छोड़कर सरकारी नौकरी की ओर लोगों का आकर्षण इसलिए है क्योंकि यहां वेतन से कहीं ज्यादा, करोड़ों की कमाई का रास्ता साफ दिखता है। इस तस्वीर ने समाज का व्यवस्था पर विश्वास उठा दिया है।

भ्रष्टाचार भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज दोनों को खोखला कर रहा है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में सरकारी विभागों में रिश्वतखोरी आम है। छोटे स्तर पर तो यह रोजमर्रा की बात हो गई है। एक साधारण व्यक्ति को पासपोर्ट बनवाने, राशन कार्ड या ड्राइविंग लाइसेंस के लिए भी चप्पल खोलनी पड़ती है। लेकिन समस्या तब गंभीर हो जाती है जब बड़े अधिकारी इसमें लिप्त होते हैं। वे नीतियां बनाते हैं, फाइलें घुमाते हैं और करोड़ों की लूट मचाते हैं।
छोटे स्तर के उदाहरण: सिपाही और क्लर्क की लूट
कल्पना कीजिए, एक ट्रक ड्राइवर सड़क पर चल रहा है। चेकिंग पॉइंट पर सिपाही रुकवाता है। ओवरलोडिंग या कागजात में छोटी सी गलती का हवाला देकर 500 से 2000 रुपये की रिश्वत मांगता है। यह रोज की घटना है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान जैसे राज्यों में पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार की शिकायतें सबसे ज्यादा आती हैं। एक सिपाही से लेकर इंस्पेक्टर तक ‘हफ्ता वसूली’ का सिलसिला चलता है—दुकानदारों से, ठेलेवालों से, यहां तक कि गरीब मजदूरों से।
क्लर्कों की कहानी भी कम नहीं। सरकारी दफ्तर में फाइल अटक जाती है। ‘स्पीड मनी’ के नाम पर 1000-5000 रुपये देने पड़ते हैं। हाल के मामलों में पंजाब पब्लिक सर्विस कमीशन भर्ती घोटाले में निचले स्तर के कर्मचारियों की मिलीभगत सामने आई। ऐसे में योग्य उम्मीदवार पीछे रह जाते हैं और अयोग्य, लेकिन पैसे वाले आगे बढ़ जाते हैं। इससे पूरा सिस्टम कमजोर होता है।
मध्यम स्तर: इंस्पेक्टर और अधीक्षक
मध्य स्तर पर भ्रष्टाचार और संगठित रूप ले लेता है। दिल्ली के सीबीआई इंस्पेक्टर दीपक फलस्वाल का मामला ताजा है। उन्होंने एक केस सेटल करने के बदले दो करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी। हरियाणा के आईपीएस अधिकारी दीपक गहलावत पर काउंटरफीट दवाओं के रैकेट से तीन करोड़ रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप लगा। सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार किया। ऐसे अधिकारी जांच प्रभावित करते हैं, अपराधियों को बचाते हैं और खुद मोटी कमाई करते हैं।
पुलिस विभाग में ‘कैश फॉर बेल’ या केस दबाने की प्रथा आम है। नारदा स्टिंग ऑपरेशन में पश्चिम बंगाल पुलिस अधिकारियों की रिश्वत लेते हुए वीडियो सामने आई। इनसे समाज का कानून व्यवस्था पर भरोसा टूटता है।
बड़े अधिकारी और बड़े घोटाले
सबसे खतरनाक भ्रष्टाचार उच्च स्तर पर होता है। आईएएस और आईपीएस अधिकारी, जो नीति बनाने वाले होते हैं, खुद लूट का हिस्सा बन जाते हैं। झारखंड की आईएएस पूजा सिंघल के घर से ED छापे में 20 करोड़ रुपये नकद बरामद हुए। मनी लॉन्ड्रिंग केस में उन्हें गिरफ्तार किया गया। केरल के आईएएस टीओ सूरज पर फ्लाईओवर प्रोजेक्ट में फंड के दुरुपयोग का आरोप, उनके पास 11 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति मिली।
छत्तीसगढ़ के आईएएस बाबूलाल अग्रवाल ने फर्जी अकाउंटों से 40-60 करोड़ की हेराफेरी की। उत्तर प्रदेश के नोएडा से पूर्व आईएएस नीरज यादव पर लैंड अलॉटमेंट घोटाले में 250 करोड़ रुपये का आरोप। गुजरात के आईएएस राजेंद्रकुमार पटेल ने लैंड क्लियरेंस के लिए ‘स्पीड मनी’ का फिक्स्ड रेट चलाया-प्रति वर्ग मीटर 5-10 रुपये। 800 से ज्यादा आवेदनों में 10 करोड़ से ज्यादा की कमाई।
बड़े घोटालों की सूची लंबी है-2G स्पेक्ट्रम घोटाला (1.76 लाख करोड़), कोलगेट (1.86 लाख करोड़), कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला (70,000 करोड़)। इनमें मंत्री और अधिकारी दोनों शामिल रहे। यूपी एनआरएचएम घोटाले में स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी गिरफ्तार हुए।
क्यों आकर्षित होती है सरकारी नौकरी?
लोग सरकारी नौकरी इसलिए चाहते हैं क्योंकि यहां ‘सेट’ हो जाने पर पेंशन, पावर और पैसा-तीनों मिलते हैं। वेतन तो औसत है, लेकिन ‘एक्स्ट्रा इनकम’ असीमित। यूपीएससी की तैयारी में लाखों खर्च कर युवा इसलिए लगते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि पोस्टिंग के बाद रिटर्न मिलेगा। लेकिन इससे योग्यता का ह्रास होता है। ईमानदार अधिकारी भी दबाव में आ जाते हैं या ट्रांसफर हो जाते हैं।
समाधान है बुलडोजर सी सख्ती
निलंबन या ट्रांसफर से भ्रष्टाचार नहीं रुकता। अपराधी को पता चलता है कि worst case में सैलरी बंद हो जाएगी, लेकिन लूटा हुआ पैसा सुरक्षित रहेगा। यदि भ्रष्टाचारी के घर पर बुलडोजर चल जाए, संपत्ति जब्त हो, परिवार सड़क पर आ जाए, तो डर पैदा होगा। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने माफिया और अपराधियों की अवैध संपत्तियों पर बुलडोजर चलाकर उदाहरण पेश किया। इसी तरह भ्रष्ट अधिकारियों पर लागू होना चाहिए। जब तक कर्मचारी से लेकर अधिकारियों के बीच कानून का डर पैदा नहीं होगा, स्थितियां नहीं बदलेंगी।
सख्त कानून चाहिए—Prevention of Corruption Act को और मजबूत बनाएं। संपत्ति का स्रोत पूछने का अधिकार, समयबद्ध जांच, डिजिटल ट्रांसपेरेंसी। ई-गवर्नेंस से फाइलों में घूमने की गुंजाइश कम हो। लोकपाल और सीवीसी को स्वतंत्र शक्ति दें।
भ्रष्टाचार राष्ट्र की प्रगति में बाधक है। जब तक सिपाही से लेकर सचिव तक सबको एक समान सजा नहीं मिलेगी, तब तक बदलाव नहीं आएगा। अंग्रेजी विरासत के विशेषाधिकारों को खत्म करें। बुलडोजर सिर्फ प्रतीक नहीं, कार्रवाई का हथियार बने। समाज पर अधिक विश्वास ना करें। वह अपना विश्वास खो चुका है। वह भ्रष्टाचार के साथ जीना सिख रहा है। वह सड़क से लेकर रेल तक, थाने से लेकर अंचल तक सामने प्रतिदिन भ्रष्टाचार होते देखता है लेकिन कुछ बोलता नहीं। उसे आदत पड़ गई है। वह जानता है कि एक बार उसने बोला दिया फिर सिस्टम उसे जीने नहीं देगा। वह बोल नहीं रहा, इसका मतलब बिल्कुल यह नहीं लगाया जाना चाहिए वह देख और समझ भी नहीं रहा है।
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