जिस बंगलादेश देश के लिये भारतीय जवानों ने बलिदान दिया वह अब पाकिस्तान के साथ

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दिल्ली । पाकिस्तान कभी भारत का ही हिस्सा था, उसका जन्म भारत की भूमि पर हुआ । वहां रहने वाले लोग भी भारतीय पूर्वजों के वंशज हैं । फिर भी वे लोग दिन रात भारत के विरुद्ध विष वमन और भारत को मिटाने का दंभ भरते हैं । पाकिस्तान एक ऐसा देश है जो अपने जन्म के बाद से नहीं, अपितु अपने गर्भ काल से जन्मदाता भारत की धरती पर रक्तपात का षडयंत्र कर रहा है । पाकिस्तान के इन्हीं षडयंत्रों का परिणाम था 1971 का युद्ध । जो भारत पर थोपा था। इसी युद्ध में जन्म हुआ था संसार में एक नये बंगलादेश का । लेकिन यह विचारणीय है जिस भारत के जवानों के बलिदान से बंगलादेश का जन्म हुआ था वही बंगलादेश, पाकिस्तान से मिलकर भारत के विरुद्ध षड्यंत्र कर रहा है ।

1971 का वह युद्ध कुल तेरह दिन तक चला था । दुनियाँ के इतिहास में यह सबसे छोटा निर्णायक युद्ध माना जाता है । इस युद्ध समापन के साथ एक नये देश का उदय हुआ जो बंगलादेश के नाम से जाना जाता है । बंगलादेश की धरती भी कभी भारत भूभाग बंगाल प्राँत का अंग रही है । लेकिन 1947 में भारत की धरती के इस हिस्से ने भी भारत से अलग होकर पाकिस्तान का नाम स्वीकार कर लिया था और यह प्रक्षेत्र पूर्वी पाकिस्तान कहलाया । लेकिन भाषा को लेकर मतभेद पहले दिन से था । सल्तनत काल में चले बलपूर्वक धर्मांतरण अभियान में बंगाल के निवासियों की पूजा उपासना पद्धति तो बदल गई थी पर भाषा के प्रति लगाव कम न हुआ। बंगाली समाज ने अपना धर्म और राष्ट्रीयता बदलकर पाकिस्तानी नाम तो स्वीकार कर लिया था लेकिन अपनी मातृभाषा से लगाव न छोड़ा। वे चाहते थे कि उनकी भाषा बंगाली ही रहे । जबकि पाकिस्तानी शासक उनकी यह बंगाली पहचान भी बदलना चाहते थे । पाकिस्तान की सरकार बलपूर्वक उर्दू और अरबी का दबाव बना रहे थे । संघर्ष यहीं से शुरू हुआ । इसको लेकर 1948 से आंदोलन आरंभ हो गये थे । जिसका दमन पाकिस्तान की सरकार और सेना करती रही थी । 1950 में बंगाली भाषा के लिये एक बड़ा आंदोलन और उसके सैन्य दमन ने पूर्वी पाकिस्तान में निवासरत बंगालियों के मन में विभाजन की एक धारा खींच दी थी । यह अंतर्धारा और इसका दमन 1968 के बाद तेज हुआ । दमन के विरुद्ध संघर्ष केलिये पूर्वी पाकिस्तान में मुक्ति वाहिनी अस्तित्व में आयी और शेख मुजीबुर्रहमान नेता के रूप में उभरे । 1970 आते आते सैनिकों के जुर्म और बंगालियों का दमन और पलायन दोनों बढ़ गया । पाकिस्तानी सैनिक सामूहिक जुर्म ढाने लगे । पाकिस्तानी सैनिकों ने बंगाली महिलाओं के साथ जैसी बर्बरता की, वह रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। बड़ी संख्या में बंगाली लोग भारत आकर शरण लेने लगे । 25 मार्च 1971 को बंगला अभियान के नेता शेख मुजीबुर्रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया । जिसका भारत ने विरोध जताया । और मुक्ति वाहनी को नैतिक समर्थन देने की घोषणा भी कर दी । भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आंदोलन को खुला समर्थन दिया और जो लोग भारत आ रहे थे उन्हे भी पर्याप्त संरक्षण दिया ।
पाकिस्तान ने अपनी समस्या का ठीकरा भारत के सिर फोड़ा और दुनियाँ में यह प्रचार किया कि भारत अशांति फैला रहा है । इसको लेकर पाकिस्तान में भारत के खिलाफ जुलूस निकलने लगे और नारे लगते “क्रश इंडिया” ऐसे जुलूसों को सत्तारूढ़ दल के नेता संबोधित करते और भारत को मिटाने का दंभ भरते ।

इन तमाम कारणों से आरंभ हुये युद्ध की तिथि भले तीन दिसम्बर 1971 मानी जाती हो पर पाकिस्तान ने अपनी ओर से यह युद्ध 25 नवम्बर 1971 को ही आरंभ कर दिया था जब लाहौर में ऐसी ही “क्रश इंडिया” रैली को संबोधित करते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री भुट्टो ने बाकायदा युद्ध की घोषणा की थी और उसकी तीनों सेनाओं ने मोर्चाबंदी शुरु कर दी थी । पाकिस्तान ने जहाँ करांची बंदरगाह पर नौ सेना बेड़े तैनात किये वहीं सीमा पर फौज बढ़ा कर घुसपैठ शुरू करदी थी । यह वही कूटनीति थी जो पाकिस्तान ने 1948 और 1965 में युद्ध के पूर्व अपनाई थी । तब उसे सफलता मिल गई थी ।लेकिन इस बार भारत सतर्क था भारत युद्ध तो नहीं चाहता था पर युद्ध से निबटने के लिये पूरी तरह तैयार था । भारत ने लगभग दस दिनों तक पाकिस्तान की घुसपैठ पर नजर रखी और स्वयं को मजबूत किया । दूसरी तरफ पाकिस्तान को लगा कि उसकी घुसपैठ सफल हो रही है । इससे उत्साहित होकर उसने दो और तीन दिसम्बर 1971 की रात भारत पर हवाई हमला बोल दिया । पाकिस्तान की वायुसेना ने एक साथ एक रात में भारत के कुल 11 स्थानों पर बम गिराये । यह बम उसने केवल सीमावर्ती क्षेत्रों में ही नहीं बल्कि भारत की सीमा में चार सौ अस्सी किलोमीटर दूर तक निशाना साधा । पाकिस्तान ने इस अभियान का नाम “आपरेशन चंगेज” दिया था । इसमें पाकिस्तान के 41 युद्धक विमानों ने हिस्सा लिया था

इस बमबारी से पूरा भारत सकते में आ गया । तीन दिसम्बर को भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने राष्ट्र के नाम संदेश दिया और सेना को आदेश दिया कि वह पाकिस्तान को मुँह तोड़ जबाब दे । भारतीय सेना ने तब तीनों प्रकार की रणनीति अपनाई । जल, थल और हवाई युद्ध की । भारतीय थल सेना जहाँ पूर्वी पाकिस्तान के हिस्से में घुसी और वहां संघर्षरत बंगलादेश मुक्ति वाहिनी की खुली मदद करने लगी भारतीय नौ सेना की पनडुब्बी ने बंगाल की खाड़ी में तैनात पाकिस्तान के उस एयर बेस को उड़ा दिया जिससे पाकिस्तान के युद्धक विमान उड़ान भर रहे थे । तीसरे वायुसेना ने पाकिस्तान के उन मिलिट्री कैंपो पर धावा बोला जो उसकी थल सेना के आश्रय स्थल थे । यह सब काम केवल आरंभिक चार दिनों में हो गया । नौ दिसम्बर से पाकिस्तान की फौज डिफेन्स में आई । दस दिसम्बर को भारत ने उसका सैन्य संचार तंत्र बिखेर दिया । हालत यह हुई कि पाकिस्तान के किस कैंप में कितनी सेना है, उसकी हालत क्या है, वह जीवित भी है या नहीं यह सब सूचनाएं बंद हो गयीं । पाकिस्तान की सेना का सारा ताना बाना बिखर गया । भारतीय फौज ने 14 दिसम्बर को ढाका पर कब्जा कर लिया । पूर्वी पाकिस्तान में तैनात पाकिस्तानी सैनिक या तो वर्मा(म्यांमार) भाग गये या सिरेन्डर करके जान की भीख मांगने लगे । 15 दिसम्बर को भारत ने ढाका पर आधिपत्य होने की अधिकृत घोषणा की । इसी के साथ वहां तैनात पाकिस्तान कमांडर ने फौज के आत्म समर्पण का प्रस्ताव दिया जिसे 16 दिसम्बर को माना गया । और भारत ने अपनी ओर से युद्ध विराम की घोषणा कर दी ।

अब बंगलादेश की भूमिका विचारणीय

पाकिस्तान का अंग बने बंगाल के निवासियों की सहायता करने में भारत ने अपने लगभग चार हजार सैनिकों का बलिदान दिया । दस हजार से अधिक घायल हुये । लगभग एक करोड़ शरणार्थी भारत आये । उन दिनों भारत की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि भारत इतने शरणार्थियों का भार उठा सके । फिर भी भारत ने हिम्मत की और शरण दी । इनमें से अधिकांश लौटकर ही नहीं गये । यहीं बस गये । इस युद्ध को आज 53 वर्ष बीत गये । आधी शताब्दी से भी अधिक इस अवधि में ऐसा कोई वर्ष नहीं बीता जब भारत ने बंगलादेश को सहायता न दी हो । बदले में क्या मिला ? बंगलादेश चीन की गोद में बैठ गया । पाकिस्तान के इशारे पर काम करने लगा । भारत में होने वाली आतंकवादी गतिविधियों का एक केन्द्र बन गया । इन दिनों बंगलादेश में केवल मंदिर ही तोड़े जा रहे बल्कि भारत विरोधी नारे भी लग रहे हैं। कट्टरपंथियों द्वारा यह खुली चेतावनी दी जा रही है कि यदि बंगलादेश के हिन्दुओं की सहायता केलिये भारत ने कदम बढ़ाये तो भारत से बंगाल उड़ीसा और असम भी छीन लेंगे। आज भले बंगलादेश के कट्टरपंथियों की यह धमकी हास्यास्पद लगे पर यदि हम इतिहास की घटनाओं को देखे और पाकिस्तान के षड्यंत्र को समझे तो विचार करना ही पड़ेगा। बंगलादेश बनने के बाद से कट्टरपंथी जैसी भारत की डेमोग्राफी बदल रहे हैं वह चौंकाने वाली हैं। असम, बंगाल और झारखंड के अनेक गांव ऐसे हैं जहाँ से हिन्दू पलायन कर गये और बंगलादेशी आकर बस गये । यह भी चिंताजनक है कि उनके वे सब दस्तावेज भी तैयार हो गये जिनसे उन्हे भारतीय माना जा सके। मीडिया में तो ऐसे समाचार भी आये कि बंगलादेशी घुसपैठिये अब असम और बंगाल में विधायक भी बन गये हैं

युद्ध की कुछ मुख्य बातें

*युद्ध में पाकिस्तान के कुल 97368 युद्ध बंदी बनाये गये इसमें 91 हजार वर्दीधारी सैनिक, दो हजार अर्धसैनिक और चार हजार अन्य सहयोगी थे

* युद्ध में 3843 भारतीय सैनिक बलिदान हुये जबकि पाकिस्तान के नो हजार सैनिक मारे गये

* युद्ध में भारतीय वायु सेना ने कुल 5878 उड़ाने भरी इसमें 4000 लगभग पश्चिमी मोर्चों पर बाकी पूर्वी मोर्चा पर

* शिमला समझौता 2 जुलाई 1972 को हुआ जिसमें भारत ने युद्ध बंदी लौटाये और जीती हुई जमीन भी

केरल से मिला भाजपा के लिए शुभ संकेत

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तिरुवनंतपुरम: भारतीय जनता पार्टी के लिए लम्बे संघर्ष के बाद दक्षिणी राज्य केरल से एक सुखद समाचार आया है । केरल के नगर निकाय चुनावों में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए राजग गठबंधन तीसरी शक्ति के रूप प्रवेश कर चुका है। यह नया राजनीतिक समीकरण मात्र केरल में ही नही अपितु पूरे दक्षिण भारत में कांग्रेस तथा वामपंथियो को सावधान होने को कह रहा है। केरल की राजधानी और कांग्रेस सांसद शशि थरूर के संसदीय क्षेत्र तिरुवनंतपुरम के नगर निगम चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने 101 में से 50 सीटों पर विजय प्राप्त कर इतिहास रच दिया और वाममोर्चे का 45 वर्ष पुराना किला ढहा दिया। माकपा के नेतृत्व वाला गठबंधन यहा 29 और कांग्रेस नेतृत्व वाला गठबंधन मात्र 19 सीटों पर ही सिमट गया। तिरुवनंतपुरम ही नहीं केरल के त्रिशूर नगर निगम पर भी भाजपा गठबंधन का नियंत्रण हो गया है। इसके अतिरिक्त भाजपा ने लगातार तीसरी बार पलक्काड नगर पालिका पर भी अपना नियंत्रण बनाए रखा और त्रिपुनिथुरा नगरपालिका में सत्तारूढ़ गठबंधन के 20 वार्डों के मुकाबले 21 वार्ड जीतकर एडीएफ गठबंधन को एक और तगड़ा झटका देने में सफलता प्राप्त कर ली।

तिरुवनंतपुरम के परिणाम राजनैतिक गलियारे में चर्चा का विषय बन गए हैं क्योंकि यहां से शशि थरूर वर्ष 2009 से कांग्रेस के सांसद हैं और कांग्रेस आलाकमान से उनकी अनबन चल रही है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद जो भारतीय प्रतिनिधिमंडल विदेशी दौरे पर भेजे गए थे उसमें शशि थरूर भी शामिल थे। शशि थरूर समय समय पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किसी न किसी रूप में सराहना कर रहे हैं । मोदी की नीतियों पर थरुर के लेख भी चर्चा का विषय बने रहते हैं।

केरल नगर निकाय के चुनाव परिणामों के आंकड़ों के अनुसार राजग गठबंधन ने राज्यभर में 1900 से अधिक वार्ड जीते हैं जो पिछली बार की तुलना में 300 से अधिक हैं। यद्यपि अब कहा जा सकता है कि अब केरल में भाजपा की उपस्थिति नगण्य नहीं रह गई है, वह धीरे -धीरे बढ़त पर निकल पड़ी है तथापि केरल में भाजपा को अभी बहुत काम करना है क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी उसकी पकड़ नही बनी है।

केरल नगर निकाय चुनाव परिणामों से संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा ने तिरुवनंतपुरम में 45 वर्ष से चले आ रहे वामपंथी गढ को ढहा दिया। कोझिकोड ओैर कन्नूर जैसे कट्टर वामपंथी गढ़ों में भी अपनी उपस्थिति दिखाने में सफलता प्राप्त की जहां उसने 13 और 4 सीटें जीतकर सत्ता के समीकरण गड़बड़ा दिए। एनडीए ने पहली बार 26 ग्राम पंचायतों में सफलता प्राप्त की है। स्पष्ट है कि अब भाजपा केरल में तीसरी ताकत बन रही है और वहां की राजनीति में मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। 2020 के नगर निकाय चुनावों में भाजपा गठबंधन को 15 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे जो अब बढ़ कर 20 प्रतिशत हो गए हैं।

भाजपा के लिए सबसे चौंकाने वाला परिणाम कन्ननकुलंगरा वार्ड जिसे हिंदुओ का गढ़ कहा जाता है का रहा जहां पर भाजपा की मुस्लिम महिला उम्मीदवार मुमताज ने ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की है। मुमताज विगत दो वर्षों से अल्पसंख्यक मोर्चा की जिम्मेदारी संभाल रही हैं। मुमताज एक राजनेता के अतिरिक्त उद्यमी भी हैं।

चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भाजपा को बधाई देते हुए इसे लोकतंत्र की खूबसूरती बताया। केरल की जीत से प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा नेतृत्व गदगद है और इस विजय का उत्सव भी मना रहा है। केरल विजय पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह केरल में कार्यकर्ताओं की पीढ़ियों के कार्य और संघर्ष को याद करने का दिन है जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया। हमारे कार्यकर्ता ही हमारी ताकत हैं हमें उन पर गर्व है।
भारतीय जनता पार्टी केरल में अपने पैर जमाने के लिए लगातार कड़ी मेहनत कर रही है और हर बार नये -नये चेहरों के साथ प्रयोग कर रही है। 2014 में केंद्र में भाजपा गठबंधन की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद से केरल में भाजपा विशेष ध्यान दे रही है जिसका प्रतिफल अब दिखाई दे रहा है। अब केरल में ईसाई समुदाय भी भाजपा की ओर आकर्षित हो रहा हैं और उस समुदाय मे बीजेपी की पैठ बढ़ी है।
इन सब के पीछे केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बढ़ता प्रभाव भी है। स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों तक की चिंता छोड़कर संघ का विस्तार किया है। अब युवा भी संघ की शाखाओं में आ रहे हैं। स्वाभाविक रूप से केरल में संघ के विस्तार का लाभ भाजपा को मिलेगा।

मन्नू भंडारी ने लिखा कि राजेंद्र यादव किसी के साथ छ्लात्कार तो कर सकते हैं , बलात्कार नहीं

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दयानंद पांडेय

लखनऊ। एक बार किसी ने राजेंद्र यादव द्वारा बलात्कार की चर्चा की तो मन्नू भंडारी ने लिखा कि राजेंद्र यादव किसी के साथ छ्लात्कार तो कर सकते हैं , बलात्कार नहीं । और बात खत्म हो गई थी । सच यह है कि राजेंद्र यादव छ्लात्कार में बहुत निपुण थे । तमाम स्त्रियों के साथ उन्हों ने छल किया । अपनी व्याहता मन्नू भंडारी के साथ बेशुमार छल । असल में मोहन राकेश के नेतृत्व वाली यह तिकड़ी अपने स्त्री प्रसंगों के लिए बहुत ज्यादा जानी गई । मोहन राकेश , कमलेश्वर , राजेंद्र यादव । मोहन राकेश ने तो चार विवाह किए । मोहन राकेश की चौथी पत्नी अनीता औलक जो मोहन राकेश से विवाह के बाद अनीता राकेश हो गई थीं , ने मोहन राकेश पर संस्मरण के बहाने अपनी कथा कहिए , आत्मकथा कहिए लिखी है , चंद सतरें और । चंद सतरें और में अनीता राकेश ने पर्याप्त संकेत दिए हैं कि उन की मां भी मोहन राकेश पर आसक्त थीं । और कि उन से सौतिया डाह रखते हुए उन्हें बहुत मारती-पीटती थीं । उन्हों ने लिखा है कि उन की मां से मिलने और भी लेखक आते थे । पहले जैनेंद्र कुमार आते थे । फिर अज्ञेय भी आए । मोहन राकेश भी ।

अनीता की मां चंद्रा औलक भी लेखिका थीं । मोहन राकेश से अनीता औलक भी प्रेम में पड़ गईं । मोहन राकेश ने भी उन्हें निराश नहीं किया । अनीता की मां द्वारा आए दिन की पिटाई कहिए या मोहन राकेश से उन के प्यार की प्रगाढ़ता अनीता अंततः घर छोड़ कर मोहन राकेश के साथ मुम्बई भाग गईं । दिल्ली से भगाने में कमलेश्वर ने मदद की । एयरपोर्ट तक पहुंचाया। मुम्बई में राजेंद्र सिंह बेदी ने होटल वगैरह की व्यवस्था की । लंबी कथा है । अनीता उस समय बी ए में पढ़ती थीं । इस का लंबा विवरण बहुत ही रोमांचक ढंग से अनीता जी ने चंद सतरें और में लिखा है । बाद के दिनों में कमलेश्वर ने भी इस बाबत अपने संस्मरण में लिखा । कमलेश्वर का यह संस्मरण एक समय संडे मेल में धारावाहिक रूप से छपा था ।

एक बार क्या हुआ कि लखनऊ से एक पत्रकार दिल्ली गए । यू पी भवन में ठहरे । शराब पी कर उन्हों ने कमलेश्वर को फोन किया कि और पूरा मजा लेते हुए बोले कि सुना है आप लड़की भगाने में बड़े एक्सपर्ट हैं । तो हमारे लिए भी एक लड़की भगा दीजिए । कमलेश्वर ने भी मजा लिया और पूछा कि अपना अता-पता दीजिए , आता हूं । अब पत्रकार को फिर शरारत सूझी । यू पी भवन में उस समय पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक माफ़िया हरिशंकर तिवारी भी ठहरे हुए थे । बतौर विधायक । पत्रकार ने तिवारी के कमरे का नंबर बता दिया । कमलेश्वर आए भी यू पी भवन । पुलिस ले कर आए । उस आदमी को सबक सिखाने । तिवारी से मिले भी । तिवारी को वाकया बताया । तिवारी ने विनम्रता से बताया कि क्या इस उम्र में मुझे यही काम रह गया है ? कुछ और आरोप लगाते आप तो एक बार सुनता भी । आप के साथ किसी ने मजाक कर दिया है । कमलेश्वर चुप रह गए और चले गए ।
इस पूरी कथा की बड़ी परिणति यह थी कि तीन विवाह भले असफल रहे मोहन राकेश के पर अनीता से उन का यह विवाह सफल रहा था । अलग बात है कि दो बच्चे पैदा कर मोहन राकेश दुनिया से विदा हो गए । कुछ समय बाद अनीता राकेश ने भी दूसरा विवाह कर लिया । मोहन राकेश जितने शानदार लेखक हैं , उन की जिंदगी के पन्ने भी उतने अंतर्विरोधी । अंधेरे बंद कमरे , आधे अधूरे , अंतराल और आषाढ़ का एक दिन में उन का जीवन और उस का संत्रास भी खूब दीखता है । बाक़ी रचनाओं में भी । मन्नू भंडारी लिखित आप का बंटी जिस भी किसी ने पढ़ा है , उसे जान लेना चाहिए कि वह बंटी मोहन राकेश की ही जिंदगी पर आधारित है ।

मोहन राकेश मंडली के कमलेश्वर की ज़िन्दगी के पन्ने भी औरतबाजी से रंगे पड़े हैं और राजेंद्र यादव के भी । तय कर पाना मुश्किल है कि कमलेश्वर बड़े औरतबाज कि राजेंद्र यादव । दोनों ही ने अपनी औरतबाजी को छुपाया नहीं है । कमलेश्वर ने दो, तीन मामले छुपाए ज़रूर जिन्हें मन्नू भंडारी ने लिख कर बेपर्दा कर दिया। बताया कि उन औरतों से कमलेश्वर के बच्चे भी हैं । (सोशल मीडिया से)

बिहार में प्रेस क्लब कब तक, दिल्ली पीसीआई ध्यान दे

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अंजान

दिल्ली में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की कमान संगीता बरुआ को मिली और बिहार के पड़ोसी राज्य झारखंड में रांची प्रेस क्लब का अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार शंभुनाथ चौधरी निर्वाचित हुए। दोनों खबरें सामान्य लग सकती हैं, लेकिन बिहार के पत्रकारों को आईना भी दिखा रही हैं, जिनकी पीठ पर पटना प्रेस क्लब से जुड़ी असफलताओं की बड़ी गठरी है।

बिहार का दुर्भाग्य है कि आज़ादी से पहले और बाद में देश को दिशा देने वाली पत्रकारिता के बावजूद आज तक राज्य का अपना कोई प्रेस क्लब नहीं है। यह तकलीफ तब और गहरी हो जाती है जब याद आता है कि 2019 में नीतीश कुमार की सरकार ने पटना के गोलघर के पीछे डेढ़ एकड़ जमीन पर आधुनिक प्रेस क्लब भवन बनाकर पत्रकारों को सौंपा था। यह बिहार और खासकर पटना के पत्रकारों के लिए ऐतिहासिक अवसर था। भवन पर कब्जा हो गया, चुनाव की तैयारी शुरू हुई और छह सौ से अधिक सदस्य भी बना लिए गए। सदस्यता फीस के रूप में छह लाख रुपये जमा हो गए और राज्य सरकार ने भी मोटी रकम आवंटित कर दी।

लेकिन दुर्भाग्य ने यहीं करवट ली। चुनाव से पहले ही कुछ मठाधीश पत्रकारों की खींचतान, अहंकार और लालच ने प्रेस क्लब को राजनीति की भेंट चढ़ा दिया। नतीजा हुआ कि बहुप्रतीक्षित पटना प्रेस क्लब धरातल पर आने से पहले ही बिखर गया। हालात से आजिज आकर कुछ ही महीने बाद राज्य सरकार ने वह भवन वापस ले लिया और बिजली विभाग को सौंप दिया। यह केवल एक भवन का खोना नहीं था, बल्कि बिहार के पत्रकारों की सामूहिक साख और अवसर की भी भारी क्षति थी।

इसके ठीक उलट तस्वीर रांची में दिखाई देती है। अपेक्षाकृत नवोदित राज्य झारखंड के पत्रकारों ने रघुवर दास सरकार के समय न सिर्फ अपना प्रेस क्लब खड़ा किया, बल्कि पिछले सात वर्षों से वहां नियमित, निष्पक्ष और लोकतांत्रिक चुनाव भी हो रहे हैं। रांची प्रेस क्लब के पहले अध्यक्ष राजेश सिंह बने और इस बार यह जिम्मेदारी शंभुनाथ चौधरी को मिली है। उपाध्यक्ष विपिन उपाध्याय, सचिव अभिषेक सिन्हा और कोषाध्यक्ष कुबेर सिंह निर्वाचित हुए हैं। यह निरंतरता और संस्थागत मजबूती का प्रमाण है।

रांची प्रेस क्लब के पूर्व सचिव अमरकांत द्वारा अपने कार्यकाल की उपलब्धियों का दिया गया ब्योरा पटना के पत्रकारों के लिए सबक है। उनके कार्यकाल में रांची प्रेस क्लब ने वरिष्ठ पत्रकारों को मतदान अधिकार देकर उनका सम्मान लौटाया, क्लब का फंड आठ लाख से बढ़ाकर 28 लाख रुपये किया, ढाई दशक की पत्रकारिता कर चुके साथियों को आजीवन निःशुल्क सदस्यता दिलाई। सदस्यता शुल्क भी छह सौ से घटाकर 250 रुपये किया। सरकारी मदद से 48 लाख रुपये में क्लब का जीर्णोद्धार कराया। जाहिर है, यह उपलब्धि बताती है कि रांची का मीडिया समूह उत्कर्ष की ओर अग्रसर है।

रांची प्रेस क्लब की यह उपलब्धि गाथा बिहार के हर पत्रकार को पढ़नी चाहिए। साथ ही उन चंद मठाधीशों पर आत्ममंथन भी होना चाहिए, जिनके स्वार्थ और दंभ ने पटना प्रेस क्लब के सपने तोड़ दिए। जब तक बिहार के वरिष्ठ पत्रकार व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर सामूहिक हित को नहीं समझेंगे, तब तक रांची प्रेस क्लब जैसे उदाहरण उन्हें आईना दिखाते रहेंगे।

(लेखक का नाम उपलब्ध नहीं)

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