पटरियों पर दौड़ता नया हिंदुस्तान, मुस्कुराता मध्यवर्ग और मजबूत होती राष्ट्रीय एकता

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दिल्ली । एक ज़माना था, जब शादी का कार्ड मिलते ही सबसे पहले रेल यात्रा की चिंता शुरू हो जाती थी। टिकट मिलेगा या नहीं? ट्रेन समय पर चलेगी या नहीं? भीड़ कितनी होगी? रात कैसे कटेगी? बच्चे संभलेंगे या नहीं?बिस्तरबंद, संदूकों, सुराही, खाने में पूरी सब्जी, नमकीन, डकार के लिए चूर्ण! फुल टेंशन।
आज तस्वीर बदल रही है।
इस सप्ताह चेन्नई में हमारे परिवार की एक शादी है। लेकिन यह सिर्फ एक शादी नहीं, बदलते भारत की एक खूबसूरत राष्ट्रीय एकता की कहानी भी है। रिश्तेदार देश के अलग-अलग शहरों से आ रहे हैं। कोई बेंगलुरु से, कोई कोयंबटूर से, लड़के वाले दिल्ली से, रिश्तेदार हैदराबाद से और कोलकाता से भी। हम दोनों, मैं और मेरी पत्नी, मैसूर से वंदे भारत एक्सप्रेस में सवार हुए और पांच घंटे में बैंगलोर होकर चेन्नई पहुंचे।
सफर शुरू होते ही लगा कि मंज़िल से पहले ही जश्न शुरू हो गया है।
कोच चमचमा रहा था। सीटें आरामदेह थीं। झटके नाममात्र के थे। न खाने की फिक्र, न पानी की चिंता। गर्मागर्म नाश्ता और चाय अपनी सीट पर ही मिल गए। साफ-सुथरे शौचालय, शांत माहौल और बड़ी खिड़कियों से बाहर भागते खेत, पहाड़ और गांव।
चेन्नई कब आ गया, पता ही नहीं चला।
स्टेशन पर उतरे तो ऐसा नहीं लगा कि कई घंटे की यात्रा करके आए हैं। हम सीधे शादी की रौनक में शामिल होने के लिए तैयार थे।
यही सबसे बड़ा बदलाव है।
एक समय रेल यात्रा अपने आप में इम्तिहान होती थी। लोग घर से पूड़ी-सब्ज़ी, अचार, पानी की बोतलें और दवाइयों का थैला लेकर चलते थे। पूरी रात सामान की रखवाली करनी पड़ती थी। शादी में पहुंचते-पहुंचते आधी थकान चेहरे पर साफ दिखाई देती थी।
आज वंदे भारत ने सफर की पूरी तासीर बदल दी है।
अब यात्रा बोझ नहीं, छुट्टियों और खुशियों का हिस्सा बन गई है।
भारत का नया आकांक्षी मध्यवर्ग यही चाहता था। वह हवाई यात्रा जितना आराम चाहता है, लेकिन परिवार के साथ रेल यात्रा का अपनापन भी नहीं छोड़ना चाहता। वंदे भारत ने दोनों के बीच का रास्ता निकाल दिया है।
ट्रेन के भीतर भी भारत की एक छोटी-सी तस्वीर दिखाई देती है। कोई लैपटॉप पर काम कर रहा है। बच्चे खिड़की से बाहर झांक रहे हैं। बुजुर्ग आराम से अखबार पढ़ रहे हैं। अलग-अलग भाषाएं सुनाई देती हैं, लेकिन मुस्कान की भाषा सबकी एक होती है। मोबाइल प्रेम इतना बढ़ गया है, की पहले जैसे आपस में अजनबी बात नहीं करते!

भारतीय रेल केवल लोहे की पटरियां और इंजन नहीं है। यह देश की धड़कन है। यह गांवों को शहरों से, पहाड़ों को समुद्र से और दिलों को दिलों से जोड़ती है।

आज भारतीय रेल दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में शामिल है। करीब 68 हजार किलोमीटर लंबे नेटवर्क पर रोज़ लगभग 13 हजार यात्री ट्रेनें दौड़ती हैं। हर दिन 2 करोड़ 30 लाख से अधिक लोग रेल से सफर करते हैं। यानी कई देशों की पूरी आबादी से भी ज़्यादा लोग रोज़ भारतीय रेल पर भरोसा करते हैं।
साल 2019 में पहली वंदे भारत एक्सप्रेस नई दिल्ली और वाराणसी के बीच शुरू हुई थी। आज 2026 तक देश के अलग-अलग हिस्सों में 160 से अधिक वंदे भारत सेवाएं चल रही हैं। इन ट्रेनों का निर्माण चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्टरी में ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के तहत हुआ है। यह केवल एक ट्रेन नहीं, बल्कि आत्मविश्वास से भरे नए भारत की पहचान बन चुकी है।
समय की बरबादी और सिरदर्दियों से तो बचते ही हैं, इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि रिश्ते और भी करीब आ गए हैं।
अब मैसूर का परिवार आराम से चेन्नई की शादी में शामिल हो सकता है। बेंगलुरु का बेटा सुबह निकलकर दोपहर तक घर पहुंच सकता है। बुजुर्ग बिना ज़्यादा थके बच्चों और पोते-पोतियों से मिलने जा सकते हैं।
रेल अब केवल यात्रियों को नहीं, उम्मीदों को भी मंज़िल तक पहुंचा रही है।
यह भी सच है कि भारतीय रेल की असली ताकत केवल वंदे भारत नहीं है। लाखों लोगों के लिए आज भी साधारण मेल, एक्सप्रेस और पैसेंजर ट्रेनें जीवनरेखा हैं। किसान, मज़दूर, छात्र, व्यापारी और तीर्थयात्री, सबके लिए रेल बराबरी का सफर उपलब्ध कराती है।
इसी बराबरी में भारत की असली ताकत छिपी है।
रेल हमें केवल एक शहर से दूसरे शहर नहीं ले जाती। वह हमें एक-दूसरे के और करीब भी ले आती है। रास्ते में मिलने वाले लोग, बदलते नज़ारे, अलग-अलग बोलियां और साझा मुस्कानें हमें याद दिलाती हैं कि विविधता के बावजूद हम एक ही देश की संतान हैं।
इस बार चेन्नई की शादी में हमारे परिवार को जोड़ने का काम केवल रिश्तों ने नहीं किया। वंदे भारत ने भी उतनी ही अहम भूमिका निभाई।
कभी-कभी राष्ट्र निर्माण बड़े-बड़े भाषणों से नहीं होता। वह तब होता है, जब दादा-दादी बिना थके शादी में पहुंच जाएं। जब बच्चे सफर का आनंद लें। जब रिश्तेदार समय पर मिलें। जब यात्रा शिकायत नहीं, खुशगवार याद बन जाए।
भारतीय रेल पिछले 170 वर्षों से देश को जोड़ती आई है। वंदे भारत उस लंबी यात्रा का नया पड़ाव है। यह केवल तेज़ रफ्तार ट्रेन नहीं, बल्कि उस नए भारत की तस्वीर है जो अपने नागरिकों को सुविधा, सम्मान और बेहतर जीवन देना चाहता है।
मैसूर से चेन्नई तक के इस सफर में हमने सिर्फ दूरी तय नहीं की। हमने बदलते भारत की रफ्तार को अपनी आंखों से देखा, महसूस किया और जिया।

पत्रकारिता, साहित्य, सिनेमा… कुछ भी नहीं बचा था इमरजेंसी के कहर से

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हरिवंश

दिल्ली । पिछले दिनों भोपाल गया. माधव राव सप्रे समाचार पत्र संग्रहालय में. हिंदी पत्रकारिता के 200 साल होने पर आयोजन था. जिनका संबंध पत्रकारिता (विशेषकर हिंदी पत्रकारिता) से है, वे माधवराव सप्रे संग्राहलय के नाम और काम, दोनों से परिचित होंगे. वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री विजय दत्त श्रीधरजी ने बहुत ही लगन, समर्पण से पत्रकारिता के इस अनूठे संस्थान को खड़ा किया है.
आयोजन में मंच पर जाते समय, बगल में रखे एक स्टैंडी बोर्ड पर नजर पड़ी. अशोक महादेवन जी की तस्वीर के साथ. उस पर चित्र रूप में बॉक्स में विज्ञापन था. इमरजेंसी के दो दिनों बाद, टाइम्स आफ इंडिया में छपा हुआ विज्ञापन. महादेवन जी ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ के संपादकीय विभाग में थे. डिप्टी एडिटर. इमरजेंसी लगने के बाद उन्होंने एक विज्ञापन लिखा—

‘Obituary
‘D’ Ocracy DEM, beloved husband of T. Ruth, loving father of L.I. Bertie, brother of Faith, Hope, Justice, expired on 26th June.’

यह विज्ञापन उन्होंने अपने ही समूह के अखबार ‘टाइम्स आफ इंडिया’ में दिया. ओबिचुअरी वाले सेक्शन में प्रकाशित करने के लिए. महादेवन जी ने इतनी चतुराई से भाषा का प्रयोग किया था कि इसे सहज समझा नहीं जा सका कि विज्ञापन में है क्या? अगले दिन छप गया. 28 जून, 1975 को. छपते ही हंगामा मचा. संस्थान के अंदर ही हड़कंप मचा कि यह कैसे छप गया? इस विज्ञापन का हिंदी मायने और आशय था कि इमरजेंसी के माध्यम से आजाद भारत में लोकतंत्र को श्रद्धांजलि दी गयी.

इमरजेंसी के दौरान अनेक पत्रकारों ने ऐसे विरोध जताये थे. समाचार पत्रों ने भी. पर, यह विरोध जताने का अधिकार छिन लिया गया था. रातोरात कई अखबारों के आफिस में बिजली ही काट दी गयी थी. अखबारों को छपने और बांटने से रोका गया. नियंत्रण अपने पास रहे, अपने अनुकूल खबरें जाये, इसके लिए देश की दो बड़ी एजेंसियों ‘पीटीआई’ और ‘यूएनआई’ के साथ ‘हिंदुस्तान समाचार’ और ‘समाचार भारती’ का विलय कर दिया गया. तब, सबको मिलाकर एक एजेंसी काम करने लगी, जिसका नाम रखा गया, ‘समाचार’. यहीं से सारी खबरें जारी होने लगी. वैसी खबरें, जो सरकार के अनुकूल हो. दूसरी ओर लोकप्रिय माध्यम रेडियो से सरकार के यशोगान की खबरें चलती.

पत्रकारिता और पत्रकारों को कैसी यातनाएं झेलनी पड़ी, इसकी अनंत कथाएं हैं. सिर्फ उन्हीं पत्रकारों को नहीं, जो विरोध कर रहे थे. बल्कि उन्हें भी, जो सत्ता शीर्ष के करीबी थे. एक किस्सा खुशवंत सिंह का है. खुशवंत सिंह जी तब सत्ता शीर्ष परिवार के करीबी माने जाते थे. पर, उन्हें भी कोपभाजन का शिकार होना पड़ा. वजह, एक लेख का छपना. वह लेख भी खुशवंत सिंह के संपादन वाली पत्रिका ‘द इलस्ट्रेटेड वीकली’ में नहीं छपी थी, बल्कि टाइम्स समूह की दूसरी पत्रिका ‘फेमिना’ में छपी थी. इसकी चर्चा खुद खुशवंत सिंह ने की है. अपनी आत्मकथा में. नतीजा यह हुआ था कि बिना तथ्यों की जांच के ‘द इलेस्ट्रेटेड वीकली’ के खिलाफ कार्रवाई हुई. यह आदेश दिया गया कि कोई भी लेख, चित्र या कार्टून प्रकाशित हो, तो उसे पहले सेंसर के लिए भेजना जरूरी होगा.
यह एक छोटा उदाहरण है. ऐसे अनेक प्रसंग हैं, उन दिनों के. कार्टून की एक मशहूर पत्रिका थी, ‘शंकर्स वीकली’. केशव शंकर पिल्लई इसे निकालते थे. उन्हें इमरजेंसी के कोपभाजन का शिकार होकर पत्रिका का प्रकाशन बंद करना पड़ा.

अखबार और पत्र—पत्रिकाओं की बंदी की अनेक घटनाएं उन दिनों घटी. जो स्वाभिमान से समझौता नहीं कर सकते थे, उन्हें यातनाएं झेलनी पड़ी. यह दस्तावेज में दर्ज कि इमरजेंसी के दौरान 253 पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया. इनमें 110 को मीसा,110 को डीआईआर और 33 को अन्य संगीन दफाओं में जेल में रखा गया. 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता रद्द की गई. 29 का भारत में प्रवेश प्रतिबंधित किया गया. सात को देश से बाहर निकाल दिया गया.
गिरफ्तारी भी कैसे की जाती थी, किन बातों पर की जाती थी, उसके अनेक प्रसंग हैं. मशहूर पत्रकार कुलदीप नैयर के प्रसंग से इसे समझ सकते हैं. इमरजेंसी बाद कुलदीप नैयर ने 28 जून को पत्रकारों से एक जगह जुटने का आग्रह किया. स्थान तय हुआ, दिल्ली प्रेस क्लब. 103 पत्रकार पहुंचे. प्रेस सेंसरशिप के खिलाफ प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने की बारी आयी. 27 पत्रकार ही ऐसा करने की हिम्मत जुटा सके. कुलदीप नैयर के इस अभियान पर सरकार ने कार्रवाई की. तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ल ने उन्हें धमकाया. कहा, आपको गिरफ्तार किया जा सकता है. बाद में कुलदीप नैयर गिरफ्तार हुए. जेल भेजे गये. कुलदीप नैयर ने लिखा है कि उस दौर में ऐसे पत्रकार और संपादक भी हुए, जो सत्ता शीर्ष के यहां दरबार लगाते थे. इमरजेंसी के लिए बधाई देते थे. ऐसे ही पत्रकारों और संपादकों के बारे में इमरजेंसी बाद आयी जनता पार्टी सरकार के सूचना प्रसारण मंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी जी ने कहा था कि उन्हें झूकने के लिए कहा था, पर वे रेंगने लगे थे.

सेंशरशिप और दमन का यह चक्र सिर्फ पत्रकारिता पर ही नहीं चला, बल्कि साहित्य, सिनेमा, मनोरंजन जगत पर भी यही प्रक्रिया अपनायी गयी. इमरजेंसी के दौरान दक्षिण भारत से एक नाम खूब चरचे में रहा. स्नेहलता रेड्डी का नाम. वह अभिनेत्री थीं. एक फिल्म बनी थी, ‘चंदा मरुथा’. फिल्म के निर्देशक थे, पट्टाभी राम रेड्डी. फिल्म पी. लंकेश के नाटक पर आधारित थी. इस फिल्म में मुख्य भूमिका में थीं, स्नेहलता. वह गिरफ्तार की गयीं. जेल भेजी गयीं. पे रोल पर रिहा हुईं. पर, कुछ ही दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गयी. स्नेहलता नेशनल अवार्ड विनर एक्ट्रेस थीं. आपातकाल के खिलाफ इन्होंने आवाज भी उठाई. इन्हें झूठे आरोप के तहत मीसा (आंतरिक सुरक्षा अधिनियम) के तहत मामला दर्ज कर बिना सुनवाई बेंग्लुरू के सेंट्रल जेल में आठ महीने तक रखा गया था.

फिल्म जगत में ऐसी अनेक घटनाएं घटीं. फिल्म दुनिया पर भी इमरजेंसी की काला छाया पड़ी. कई फिल्में रिलीज नहीं होने दी गयी, कई फिल्मों के प्रिंट जब्त कर लिये गये. सेंशरशिप की कैंची तो कई फिल्मों पर चली ही. इतना ही नहीं, उस समय के मशहूर अभिनेता देव आनंद की फिल्में इसलिए बैन की गयी, क्योंकि उनके भाइयों ने इमरजेंसी का विरोध किया और खुद देव आनंद ने दिल्ली में सत्ताधारी पार्टी के एक कार्यक्रम में भाग लेकर एक नेता विशेष पक्ष में बोलने से मना कर दिया. इसी तरह किशोर कुमार के गानों को आकाशवाणी से प्रतिबंधित कर दिया गया. अनिरुद्ध भट्टाचार्जी और पार्थिव धर द्वारा लिखी गई जीवनी ‘किशोर कुमार: द अल्टीमेट बायोग्राफी’ में इसका जिक्र है. बताया गया है कि आपातकाल शुरू होने के छह महीने बाद जनवरी 1976 में पहली बार प्रतिबंध लागू हुआ. बताया जाता है कि ऐसा इसलिए हुआ था कि किशोर कुमार को इमरजेंसी के दौरान 20 सूत्री प्रोग्राम के लिए बनाए गाने को आवाज देने के लिए कहा गया. उन्होंने मना कर दिया. इसके बाद उनके गाने ऑल इंडिया रेडियो पर बैन कर दिये गये.
इमरजेंसी के दौरान ही सैकड़ों साहित्यकार और सृजनकर्मियों को भी जेल भेजा गया. पर, अनेक ऐसे थे, जो उस समय भी तनकर खड़े रहे और रचते रहे. तत्कालीन सरकार क्यों डर रही थी साहित्य, सिनेमा, संस्कृति से? क्योंकि साहित्य, सिनेमा की ताकत ऐसी होती है कि वह आम जनमानस को सीधे, सहज शब्दों में सच्चाई बताती है. इमरजेंसी के वृत्तांत को हम उस दौरान के साहित्य से समझ सकते हैं.

हिंदी के मशहूर कवि भवानी प्रसाद मिश्र ने उन दिनों रोज एक कविता लिखनी शुरू की. ‘त्रिकाल संध्या’ में संकलित हुई. उनकी लिखी कविता ‘चार कौवे उर्फ चार हौवे’ की कुछ पंक्तियों को पढ़कर आप समझ सकते हैं कि इमरजेंसी की पृष्ठभूमि क्या रही होगी?

‘बहुत नहीं थे, सिर्फ चार कौवे थे काले
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें
वे जिसको त्योहार कहें, सब उसे मनायें.
कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में
दुनियाभर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गये.’

उस दौरान धर्मवीर भारती जी ने जो कविता लिखी, वह गांव—गांव तक पहुंची. कविता का शीर्षक था, ‘मुनादी’.

‘खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का
हुकुम शहर कोतवाल का
हर खासो-आम को आगाह किया जाता है कि
खबरदार रहें
और अपने-अपने किवाड़ों को अंदर से
कुंडी चढ़ा कर बंद कर लें
गिरा लें खिड़कियों के परदे
और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें क्योंकि
एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी
अपनी कांपती कमजोर आवाज में
सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है…’

1975 में जब आपातकाल की घोषणा हुई तो बिहार के मशहूर कवि नागार्जुन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री को संबोधित करते हुए लंबी कविता लिखी—
‘क्या हुआ आपको? क्या हुआ आपको?
सत्ता की मस्ती में भूल गयी बाप को?
इंदु जी, इंदु जी, क्या हुआ आपको?
बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को!
क्या हुआ आपको? क्या हुआ आपको?’

आपातकाल के दौरान ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कविताएं लिखीं, जो ‘कैदी कविराय की कुंडलियां’ शीर्षक से प्रकाशित हुई. उसकी एक कविता की पंक्तियां हैं,

‘धरे गये क्यों रामधन, शेखर क्यों हैं बंद
मुझको समझाकर कहो, मैं ठहरा मतिमंद’

(लेखक राज्यसभा के उपसभापति हैं)

स्वामी विवेकानन्द के आदर्शों को आत्मसात कर अग्रसर हों युवा

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

रायपुर । स्वामी विवेकानंद यह शब्द आते ही मनोमस्तिष्क में एक ऐसी महान विभूति का दृश्य चित्र तैरने लगता है। जो ज्ञान-विज्ञान, धर्म अध्यात्म , त्याग, तप , साहस, शौर्य और पराक्रम के अजस्र स्त्रोत के रूप में ; भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में सर्वकालिक महान दार्शनिक और चिंतक के रूप में विद्यमान हैं। एक ऐसे युवा संन्यासी जिन्होंने मात्र 39 वर्षों के अपने अल्प जीवन में ही भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृति की धरोहर से विश्व को साक्षात्कार कराया। भारतीयता के महान मूल्यों और आदर्शों की विचार गङ्गा में डुबकी लगवाया। वो संन्यासी जिन्होंने भगवा वेश धरकर भारत के सांस्कृतिक सूर्य की अनंत दीप्ति से विश्व को ज्ञान के सच्चे अर्थों से परिचित करवाया।

11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म सभा में अपने व्याख्यान/ उद्बोधन से पहले ; जो अनाम-अपरिचित थे। किन्तु जैसे ही उन्होंने वीणापाणि माँ सरस्वती को प्रणाम कर ‘अमेरिका वासी बहनों और भाइयों’ के संबोधन के साथ संबोधित करना शुरू किया तो कुछ मिनटों तक वहां उपस्थित 7 हजार लोगों की तालियों की गड़गड़ाहट से आर्ट इन्स्टीट्यूट का सभागृह गुंजित होता रहा। फिर विश्व धर्मसभा के सबसे बड़े आकर्षण के केंद्र बनने से लेकर भारतीय ज्ञान-मेधा और हिन्दू धर्म के महान आर्ष सत्य के प्रखर संवाहक के तौर पर स्वामी विवेकानंद जग-प्रसिद्ध हुए। वह दिग्विजय की यात्रा भारत की महान सांस्कृतिक विरासत का प्रतिबिम्ब थी जो स्वामी विवेकानंद की ऋषि वाणी से अमेरिका में गूंजी।

इसी संदर्भ में विश्व धर्म महासभा में स्वामी जी के उद्बोधन का संक्षिप्तांश दृष्टव्य है —“ मैं एक ऐसे धर्म का अनुयायी होने में गर्व का अनुभव करता हूँ जिसने संसार को सहिष्णुता तथा स्वीकृति दोनों की ही शिक्षा दी है। हम लोग केवल सहिष्णुता में ही विश्वास नहीं करते, वरन समस्त धर्म सत्य मानते हैं | मुझे आप से कहने में गर्व है कि मैं ऐसे धर्म का अनुयायी हूँ जिसकी पवित्र भाषा संस्कृत में ‘exclusion’ शब्द अननुवाद्य है (जयध्वनि) । मुझे एक ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान है, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को आश्रय दिया है। मुझे आपको यह बतलाते हुए गर्व होता है कि जिस वर्ष यहूदियों का मन्दिर रोमन जाति के अत्याचार से धूल में मिला दिया गया था उसी वर्ष विशुद्धतम यहुदियों के एक अंश को जिसने दक्षिण भारत आकर उसी वर्ष शरण ली थी, अपने हृदय में स्थान दिया था। मैं उस धर्म का अनुयायी होने में गर्व अनुभव करता हूँ, जिसने महान ज़रथुष्ट्र जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी और जिसका पालन वह आज भी कर रहा है।”

स्वामी विवेकानंद ने केवल 30 वर्ष की अवस्था में ही विश्व के समक्ष भारत के ज्ञान की पताका फहराई थी। किंतु स्वामी विवेकानंद की निर्मित्ति के पीछे त्याग और तप की विराट शक्ति थी। जो उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस और गुरुमाता शारदा देवी के रूप में सदैव विद्यमान रही। लेकिन उस शक्ति की ग्राह्यता के लिए ‘विवेकानंद’ रूपी व्रतधारी का आदर्श जीवन चरित्र भी था। जो राष्ट्र-समाज,धर्म-अध्यात्म को जहां एक ओर तर्क और विज्ञान की कसौटी पर रखता था तो दूसरी ओर असीम श्रद्धा के साथ महान हिन्दू पूर्वजों, धर्मग्रंथों, परम्पराओं के प्रति समर्पण का एकात्म भी प्रस्तुत करता था। एक ऐसा परिव्राजक संन्यासी जिसका क्षण-क्षण राष्ट्र और समाज के लिए समर्पित रहा। एक-एक विचार राष्ट्रीय जीवन को सशक्त -समृद्ध करने के लिए रहा। उन्होंने केवल कोरे उपदेश ही नहीं दिए बल्कि उसको साकार करने के लिए स्वयं को राष्ट्र की यज्ञ वेदी में समर्पित कर दिया। स्वामी विवेकानंद युवाओं के लिए सबसे बड़े आदर्श इसीलिए हैं क्योंकि उनके जीवन का एक-एक पक्ष, एक-एक विचार-अनंत ऊर्जा की विद्युतमय तरंगों से परिपूर्ण है। उनके विचार और दर्शन में तथ्य-तर्क, धर्म-कर्म, ज्ञान-विज्ञान सबका समावेश है। वे कहते हैं कि — “मनुष्य, केवल मनुष्य भर चाहिए। बाकी सब कुछ अपने आप हो जायगा। आवश्यकता है वीर्यवान, तेजस्वी, श्रद्धासंपन्न और दृढ़विश्वासी निष्कपट नवयुवकों की। ऐसे सौ मिल जायँ, तो संसार का कायाकल्प हो जाए।”

जब हम स्वयं के युवा होने का दावा करते हैं तो यह प्रश्न भी उठता है कि — क्या हम स्वामी जी के उन सौ युवाओं की अर्हता को पूरा करते हैं? इतना ही नहीं जब वे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं तो हमें सर्वसामर्थ्यवान होने का बोध भी प्रदान करते हैं। स्वामी जी कहते हैं कि — “ आगे बढ़ो। हमें अनंत शक्ति, अनंत उत्साह, अनंत साहस तथा अनंत धैर्य चाहिए, तभी महान् कार्य संपन्न होगा। मेरे बच्चे, मैं जो चाहता हूँ वह है लोहे की नसें और फौलाद के स्नायु जिनके भीतर ऐसा मन वास करता हो, जो कि वज्र के समान पदार्थ का बना हो। बल, पुरुषार्थ, क्षात्रवीर्य और ब्रह्मतेज !”

यह सब कैसे प्राप्त होगा? नि:संदेह इसके लिए
चारित्रिक श्रेष्ठता और दृढ़इच्छा शक्ति से संपन्न बनना होगा। क्योंकि यही दो मूल्य होते हैं जो किसी भी राष्ट्र और समाज की उन्नति में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्वामी जी उच्च चारित्रिक बल और इच्छाशक्ति को जागृत करने के लिए अपने विविध उद्बोधनों/ पत्र-व्यवहारों में आह्वान करते हुए कहते हैं कि —
“तुमको आवश्यकता है, चरित्र की और इच्छाशक्ति को सबल बनाने की ।अपनी इच्छाशक्ति का प्रयोग करते रहो, तो और भी उन्नत हो जाओगे। इच्छा सर्वशक्तिमान है। केवल चरित्र ही कठिनाइयों के दुर्भेद्य पत्थर की दीवारों को भेदकर उस पार जा सकता है। किसी मनुष्य का चरित्र वास्तव में उसकी मानसिक प्रवृत्तियों एवं मानसिक झुकाव की समष्टि ही है। हम अभी जो कुछ हैं, वह सब अपने चिन्तन का ही फल है। चिन्तन ही बहुकाल-स्थायी है और उसकी गति भी दूरव्यापी है। अत: तुम क्या चिन्तन करते हो, इस विषय में विशेष ध्यान रखो। हमारा प्रत्येक कार्य, हमारा प्रत्येक अंग-संचालन, हमारा प्रत्येक विचार हमारे चित्त पर इसी प्रकार का एक संस्कार छोड़ जाता है। हम प्रत्येक क्षण जो कुछ होते हैं, वह इन संस्कारों के समूह द्वारा ही निर्धारित होता है। प्रत्येक मनुष्य का चरित्र इन संस्कारों की समष्टि द्वारा ही नियमित होता है। यदि भले संस्कारों का प्राबल्य रहे, तो मनुष्य का चरित्र अच्छा होता है और यदि बुरे संस्कारों का, तो बुरा । ”

स्वामीजी अपने कालखंड में समाज को संगठित करने के लिए युवाशक्ति में नव चैतन्यता भर रहे थे। उनके अनुसार कैसा होना चाहिए युवा? साथ ही युवाओं को प्रशिक्षित करने के लिए वे आत्मोत्सर्ग की भावना से ओत-प्रोत रहते थे। इसीलिए उन्होंने उस समय जो कहा था वह आज भी उतना ही अधिक प्रासंगिक है — “वह मैं अच्छी तरह जानता हूँ, भारतमाता अपनी उन्नति के लिए अपने श्रेष्ठ संतानों की बलि चाहती है। संसार के वीरों को और सर्वश्रेष्ठों को ‘बहुजनहिताय, बहुजनसुखाय’ अपना बलिदान करना होगा। असीम दया और प्रेम से परिपूर्ण सैकड़ों बुद्धों की आवश्यकता है। पहले उनका जीवननिर्माण करना होगा, तब कहीं काम होगा। जो सच्चे हृदय से भारतीय कल्याण का व्रत ले सकें तथा उसे ही जो अपना एकमात्र कर्तव्य समझें – ऐसे युवकों के साथ कार्य करते रहो। उन्हें जागृत करो, संगठित करो तथा उनमें त्याग का मंत्र फूँक दो। भारतीय युवकों पर ही यह कार्य संपूर्ण रूप से निर्भर है। मैंने तो इन नवयुवकों का संगठन करने के लिए जन्म लिया है। यही क्या, प्रत्येक नगर में सैकड़ों और मेरे साथ सम्मिलित होने को तैयार हैं, और मैं चाहता हूँ कि इन्हें अप्रतिहत गतिशील तरंगों की भाँति भारत में सब ओर भेजूँ, जो दीन-हीनों एवं पददलितों के द्वार पर सुख, नैतिकता, धर्म और शिक्षा उड़ेल दें। और इसे मैं करूँगा, या मरूँगा।”

फिर जब बात आती है शिक्षा की तो स्वामी जी का शिक्षा के उद्देश्य से क्या आशय था? युवा होने के नाते हम शिक्षा का क्या अर्थ ग्रहण करते हैं? केवल डिग्री जो हमारे रोजगार/ जीविकोपार्जन का माध्यम बनती है? क्या शिक्षा वह जिसे हम तथाकथित आधुनिकता के विषाक्त रंग-रोगन में समेटे ‘अभिजात’ होने का मिथ्यादंभ पाले फिरते रहते हैं? स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा को अत्यंत सुंदर रूप में परिभाषित किया है। वे कहते हैं कि — “जो शिक्षा साधारण व्यक्ति को जीवन-संग्राम में समर्थ नहीं बना सकती, जौ मनुष्य में चरित्र-बल, परहित-भावना तथा सिंह के समान साहस नहीं ला सकती, वह भी कोई शिक्षा है? जिस शिक्षा के द्वारा जीवन में अपने पैरों पर खड़ा हुआ जाता है, वही है शिक्षा।”

यह रही शिक्षा की बात लेकिन यह शिक्षा आचार-व्यवहार में कैसे प्रकट होगी। इसके लिए वे उन्नति के दो सूत्र देते हुए कहते हैं कि — ‘त्याग’ और ‘सेवा’ ही भारत के राष्ट्रीय आदर्श हैं इन दो बातों में भारत को उन्नत करो। ऐसा होने पर सब कुछ अपने आप ही उन्नत हो जाएगा। इतना ही नहीं वो सज्जन होने की अनिवार्य शर्त घोषित करते हुए कहते हैं कि — “उसी को मैं महात्मा कहता हूँ, जिसका हृदय गरीबों के लिए रोता है, अन्यथा वह तो दुरात्मा है।”

अभिप्रायत: हम जो भी ग्रहण करें वह राष्ट्र जीवन के लिए हो। त्याग और सेवा के मूल के साथ हम समाज के वंचितों-उपेक्षितों के सहायक बनें। उनके उत्थान और कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हों। इसी दिशा में प्रबोधन करते हुए कहते हैं कि — “अपने तन, मन और वाणी को ‘जगद्धिताय’ अर्पित करो। तुमने पढ़ा ‘अपनी माता को ईश्वर समझो, अपने है, ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव’ पिता को ईश्वर समझो’ परंतु मैं कहता हूँ, दरिद्रदेवो भव, मूर्खदेवो भव गरीब, निरक्षर, मूर्ख और दुःखी, इन्हें अपना ईश्वर मानो। इनकी सेवा करना ही परम धर्म समझो।”

वस्तुत: स्वामी विवेकानंद ने युवा होने के जिन अर्थों को-बोध को प्रकट किया। हमें उन्हें आत्मसात कर कर्त्तव्य पथ की ओर अग्रसर होना पड़ेगा। 21 वीं सदी भारत की है उसकी बागडोर युवाओं के कंधों में है। ऐसे में उच्च चारित्र्यबल से संपन्न, आत्मानुशासित, आत्मगौरव से परिपूर्ण विचारों के प्रवाह की आवश्यकता है। जो राष्ट्र जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रवहमान हो। राष्ट्र की गौरवपूर्ण विरासत के साथ नागरिक कर्त्तव्यों का पालन करना। ‘स्व’ को केंद्रित रखकर व्यक्तिगत जीवन से लेकर समाज जीवन शुचिता की ओर अग्रसर होना।उच्छृंखलता के विकृत वातावरण को समाप्त करते हुए सर्जनात्मकता के साथ गतिमान रहना। युवा होने के नाते यह हमारी प्राथमिक और अनिवार्य जिम्मेदारी है। समाज को स्वावलंबी बनाने के उद्देश्य से नवाचारों और नवोन्मेष के पथ पर सतत् अग्रसर रहना। सामाजिक समरसता को आचार और व्यवहार में उतारना और विभाजनकारी शक्तियों के प्रतिकार करने के लिए प्रति क्षण तत्पर रहना होगा। त्याग और सेवा को आचरण में उतारना होगा। इसके साथ ही तकनीकी के प्रसार के साथ ही जिस ढंग से चुनौतियां राष्ट्रजीवन के समक्ष आई हैं। उनके उपाय भी हमें ही खोजने होंगे। समाज को जागरूक करना पड़ेगा। फिर जब हम राष्ट्र प्रथम की भावना के साथ अपने जीवन को गढ़ेंगे तो निश्चय ही सर्वत्र राष्ट्र की जय-जयकार सुनाई देगी। भारत माता विश्व गुरु के पद पर सिंहासनारुढ़ होकर राष्ट्र को अमरता के पथ की ओर प्रेरित करेंगी। यही स्वामी जी के आदर्शों पर चलते हुए नव भारत को गढ़ने का – मन्त्र है।

अंग्रेजों से भारत की मुक्ति के सैन्य अभियान आरंभ

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भोपाल । द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने अंग्रेजों से भारत की मुक्ति के लिये सैन्य संघर्ष आरंभ किया और वर्मा के रास्ते भारत की ओर कूच किया । उन्होंने उत्तर पूर्व के अनेक भूभाग को मुक्त कराकर तिरंगा फहरा दिया था ।

भारत को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिये जापान की सहायता से एक सशस्त्र सैन्य दल तैयार किया गया था । इसका नाम आजाद हिन्द फौज रखा गया । इसके गठन की योजना कैप्टन मोहन सिंह, रासबिहारी बोस एवं निरंजन सिंह गिल ने बनाई थी । विदेशों में रह रहे भारतीयों को इससे जोड़ने के लिए “इण्डियन इण्डिपेंडेंस लीग” की स्थापना की । इसकी बैठक जून 1942 को बैंकाक में हुई । इस लीग का मुख्य कार्य आजाद हिन्द फौज केलिये सैनिक तैयार करना था ।वर्मा मलाया आदि स्थानों में भर्ती आरंभ हुई और केवल छै माह में सैनिकों की संख्या सोलह हजार तक पहुँच गई । लेकिन आज़ाद हिन्द फौज की भूमिका को लेकर जापान सरकार और मोहन सिंह के बीच में मतभेद हो गये और मोहन सिंह एवं निरंजन सिंह गिल को गिरफ्तार कर लिये गये। उन दिनों नेताजी सुभाषचन्द्र बोस बर्लिन में थे । वे अपनी संस्था इंडियन लीग के माध्यम से अंग्रेजों के विरुद्ध सैन्य अभियान की तैयारी कर रहे थे । उन्होंने इस लीग का गठन 1941 में किया था । इसी बीच आजाद हिन्द फौज के सैनिकों ने नेताजी सुभाषचन्द्र बोस से संपर्क किया । जर्मनी और जापान सरकारों ने उनकी सहायता की और अंततः नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने 4 जुलाई 1943 को दोनों संस्थाओं की बैठक बुलाई गई। जिसमें सर्वसम्मति से नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को को नेतृत्व सौंप दिया गया । नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने 5 जुलाई 1943 को सिंगापुर में बाकायदा एक सैन्य परेड के रूप में सभा का आयोजन किया । जिसे नेताजी सुभाषचन्द्र ने सुप्रीम कमाण्डर के रूप में सम्बोधित किया । नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने “दिल्ली चलो” का नारा दिया और जापानी सेना का सहयोग लेकर अंग्रेजी सत्ता पर धावा बोल दिया इसकी शुरुआत बर्मा से की । बर्मा को अब म्यांमार के नाम से जाना जाता है । आजाद हिन्द फौज ने रंगून पर अपना अधिकार कर लिया और भारत की ओर कूच कर दिया । 18 मार्च 1944 ई. को कोहिमा और इम्फ़ाल क्षेत्र में ब्रिटिश सेना से मोर्चा लिया और अंग्रेजों से मुक्त करा लिया । 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में भारत की स्वतंत्र सरकार का गठन किया । इसकी कमान नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने संभाली ।

इस सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सेनाध्यक्ष का पद नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने संभाला । वित्त विभाग एस.सी चटर्जी को, प्रचार विभाग एस.ए. अय्यर को महिला संगठन लक्ष्मी स्वामीनाथन को सौंपा गया। इस सरकार को जर्मनी, जापान, फिलीपीन्स, कोरिया, चीन, इटली, मान्चुको और आयरलैंड ने मान्यता देने की घोषणा कर दी । जापान ने अंडमान व निकोबार द्वीप इस अस्थायी सरकार को दे दिये। नेताजी ने अंडमान का नाम शहीद द्वीप तथा निकोबार का स्वराज्य द्वीप रखा । 30 दिसम्बर 1943 को इन द्वीपों पर स्वतन्त्र भारत का ध्वज फहराया और आगे बढ़े । 4 फ़रवरी 1944 को आजाद हिन्द फौज धावा बोला और कोहिमा, पलेल आदि क्षेत्र अंग्रेजों से मुक्त करा लिया। 6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम जारी एक प्रसारण में अपनी स्थिति स्पष्ठ की और आज़ाद हिन्द फौज द्वारा लड़ी जा रही इस निर्णायक लड़ाई की जीत के लिये सहयोग मांगा। अपने संदेश में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने कहा “मैं जानता हूँ कि ब्रिटिश सरकार भारत की स्वाधीनता की माँग कभी स्वीकार नहीं करेगी। मैं इस बात का कायल हो चुका हूँ कि यदि हमें आज़ादी चाहिये तो हमें खून के दरिया से गुजरने को तैयार रहना चाहिये। अगर मुझे उम्मीद होती कि आज़ादी पाने का एक और सुनहरा मौका अपनी जिन्दगी में हमें मिलेगा तो मैं शायद घर छोड़ता ही नहीं। मैंने जो कुछ किया है अपने देश के लिये किया है। विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने और भारत की स्वाधीनता के लक्ष्य के निकट पहुँचने के लिये किया है। भारत की स्वाधीनता की आखिरी लड़ाई शुरू हो चुकी है। आज़ाद हिन्द फौज के सैनिक भारत की भूमि पर सफलतापूर्वक लड़ रहे हैं। हे राष्ट्रपिता! भारत की स्वाधीनता के इस पावन युद्ध में हम आपका आशीर्वाद और शुभ कामनायें चाहते हैं।

22 सितम्बर 1944 को शहीदी दिवस मनाते हुए सुभाषचन्द्र बोस ने अपने सैनिकों से मार्मिक शब्दों में कहा- “हमारी मातृभूमि स्वतन्त्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा। यह स्वतन्त्रता की देवी की माँग है।

जून 1944 तक जापान की सहायता से आज़ाद हिन्द फ़ौज ने भारत की पूर्वी सीमा एवं बर्मा से युद्ध लड़ा किन्तु तभी अमेरिका के हस्तक्षेप से द्वितीय विश्व युद्ध का पासा पलट गया। जर्मनी और जापान ने हार स्वीकार करके समर्पण कर दिया । नेताजी सुभाष चंद्र बोस विमान दुर्घटना के शिकार बने । आजाद हिन्द फौज के सैनिक और अधिकारी गिरफ़्तार कर लिये गये । लाल किले को विशेष जेल बनाकर रखा गया । वहीं नवम्बर 1945 राजद्रोह का मुकदमा चला और कर्नल सहगल, कर्नल ढिल्लों एवं मेजर शाहवाज ख़ाँ पर राजद्रोह का आरोप में फाँसी की सजा सुनाई गई । इस निर्णय के विरुद्ध पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई । प्रदर्शन आरंभ हुये । एक नारा गूँजा “लाल क़िले को तोड़ दो, आज़ाद हिन्द फ़ौज को छोड़ दो। उन्हीं दिनों अंग्रेज ने भारत को मुक्त करने का निर्णय हुआ और वायसराय वेवेल ने इनके मृत्युदण्ड से मुक्त कर रिहा करने की घोषणा कर दी ।

आजाद हिन्द फौज के सेनानियों की संख्या के बारे में लेखकों में मतभेद हैं फिर भी आजाद हिन्द फौज में सैनिकों की संख्या लगभग चालीस हजार मानी जाती है । यह संख्या ब्रिटिश गुप्तचर रहे कर्नल जीडी एण्डरसन ने लिखी है। 18 अगस्त 1945 को हुई विमान दुर्घटना के बाद नेताजी सुभाषचन्द्र बोस और उनकी आजाद हिन्द फौज पर विराम लगा । द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद रंगून और सिंगापुर में आजाद हिन्द फौज के अधिकांश सेनानियों को मौत के घाट उतार दिया गया था । उनके नाम तक नहीं हैं । इतिहास लेखक केवल उन सेनानियों के नाम खोज सके जो भारत में बंदी बनाये गये थे ।

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