टिप टॉप के बहाने अस्सी के देहारादून की याद

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गोविंद सिंह

देहारादून : यदि आपका लिखने-पढ़ने की बिरादरी से थोड़ा भी संबंध है और अस्सी या नब्बे के दशक के देहरादून में रहे हैं, तो टिप टॉप नाम से जरूर वाकिफ होंगे। घंटाघर से चकराता रोड की तरफ बढ़ते ही 100 मीटर की दूरी पर बाईं तरफ टिप टॉप रैस्टौरेंट हुआ करता था, जो इस शहर के लेखकों-पत्रकारों का पसंदीदा अड्डा हुआ करता था। नए-पुराने लेखक यहाँ आया करते थे। अपनी रचनाएँ सुनाते और अनुभव बांटते थे। यहाँ उन्हें नई-नई जानकारियाँ मिलतीं। नए लेखक अपने बड़ों से सीखते थे। कवि-चित्रकार अवधेश कुमार, गजलकार हरजीत, पत्रकार नवीन नौटियाल, कुँवर प्रसून, गुरुचरन, फोटोग्राफर अरविंद शर्मा, कहानीकार प्रेम मनराल आदि नियमित रूप से यहाँ मिलते। पहाड़ से आने वाले नए पुराने लेखकों-पत्रकारों का यही ठिकाना होता था। बाहर से किसी खास स्टोरी की तलाश में आने वाले बड़े पत्रकार भी यहीं मिलते थे। दिल्ली, मुंबई या किसी और शहर में रह रहे यहाँ के पत्रकार जब भी घर आते, यहाँ जरूर हाजिरी लगाते। सुरेश उनियाल, सूरज प्रकाश ऐसे ही कथाकार थे, जिनसे यहीं पहली मुलाक़ात हुई। एक और कथाकार, धीरेन्द्र अस्थाना जो देहरादून से निकल कर सारिका में पहुंचे, उनका भी अक्सर जिक्र होता। खासकर उनके प्रेम विवाह के बारे में। कि कैसे सारिका में छपी एक कहानी को पढ़कर मुंबई की लड़की ने उन्हें विवाह का प्रस्ताव भेजा! काका हरिओम यहीं से धर्मयुग गए, तरुण विजय पाञ्चजन्य पहुंचे। कई छोटे स्तर के राजनीतिक कार्यकर्ता भी यहाँ आते। एक तरह से अघोषित प्रेस क्लब थी यह दुकान।

अपनी पहली नौकरी के सिलसिले में जब मैं 1981 के दिसंबर में देहारादून आया, तो कुछ ही दिनों में यह मेरा प्रिय ठिकाना बन गया था। यहाँ आने से पहले मैंने देहारादून के अनेक लेखकों के नाम पढ़ रखे थे, लेकिन अवधेश कुमार से जल्दी ही आत्मीयता हो गई, क्योंकि वे चौथा सप्तक के पहले कवि थे और सप्तक पर मैंने एमफिल का शोध लिखा था। चौथा सप्तक में उनका पता छपा था, इसलिए उन्हें खोजना मेरे लिए बहुत आसान था। पहली बार टिप टॉप का नाम उन्हीं से सुना। उन्होने बताया कि आगे से हम टिप टॉप में मिलेंगे। वहाँ और लोगों से भी तुम्हारी मुलाक़ात हो जाएगी। उसके बाद अक्सर हम टिप टॉप में मिलते। उनसे मिलने और भी लोग आते। जल्दी ही देहरादून के अनेक संघर्षरत लेखकों-पत्रकारों से परिचय हो गया। अरविंद शर्मा मेरा प्रिय साथी बन गया। आठ महीने में ही मैंने देहारादून से अनेक लेख-फीचर लिखे। मैं फीचर लिखता और अरविंद फोटो खींचता। मेरे लेख के साथ उसके फोटो पर उसका नाम छपता। नाम छपने की खुशी सबसे बड़ी थी। साथ में कुछ पैसे भी मिल जाते। हम सब धर्मयुग, रविवार या सारिका आदि में छपने वाली हर रचना की गहन समीक्षा करते। कुँवर प्रसून, नवीन नौटियाल और गुरुचरन की रविवार में छपने वाली खोजी रिपोर्टों की खूब चर्चा होती। उनकी एक रिपोर्ट एक स्थानीय नेता के खिलाफ थी, जिसने रविवार पत्रिका को बाज़ार में आने से पहले ही गायब करवा दिया। इसलिए डाक से आने वाली लेखकीय कॉपी का इंतज़ार करना पड़ा। उनकी एक रिपोर्ट पर मुकदमा हुआ, जो संभवतः सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा।

उन दिनों देहारादून के जिन अन्य लेखकों, पत्रकारों की चर्चा होती थी, उनमें सुभाष पंत, रवीद्र नाथ त्यागी, भीमसेन त्यागी, शशि प्रभा शास्त्री, हरि दत्त भट्ट शैलेश, कविजी यानी सुखबीर विश्वकर्मा, गुरुदीप खुराना, कृष्णा खुराना, शैल शर्मा, फॉटोग्राफर शिवानंद नौटियाल, ब्रह्मदेव आदि प्रमुख थे। श्रीश डोभाल, हिमानी भट्ट (शिवपुरी) भी दिल्ली से आया करते। इनमें से अनेक लोग बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। अवधेश जी की देखादेखी चित्र-कोलाज आदि बनाया करते, गजल लिखा करते और नाटक में काम करते।… बड़े लेखकों से मिलने उनके घर या किसी निजी अड्डे पर जाना होता। छायाकार ब्रह्मदेव जी की एशले हाल के पास एक बड़ी दुकान थी, जिसके टॉप पर साहित्य संसद का अड्डा हुआ करता। यहाँ महीने में एक बार गोष्ठी होती। नए रचनाकारों को भी मौका मिलता। एक बार मैंने अपनी एक कहानी पढ़ी। सुभाष पंत जी ने अच्छी-ख़ासी खिंचाई कर दी। बाद में बाहर आकर बड़े प्यार से बोले, तुममें संभावनाएं लगी, इसलिए इतना बोल दिया, बुरा मत मानना। मैंने सचमुच बुरा नहीं माना। जब तक देहारादून में रहा, उनसे लगातार मिलता रहा। एक बार रवीन्द्र नाथ त्यागी जी ने व्यंग्य पढ़ा। वह उतना अच्छा नहीं था। लोग आलोचना करने लगे तो त्यागी जी नाराज हो गए। उन्होने बोलने वाले को झिड़क दिया। वे बड़े सरकारी अफसर थे। रौब में रहते थे। एक गोष्ठी में भीमसेन त्यागी जी ने एक चाय के बदले अपना पूरा उपन्यास ही सुना डाला। बड़े बोर हुए, लेकिन किसी ने चूँ तक नहीं की। अङ्ग्रेज़ी के भी कई बड़े लेखक यहाँ रहते। लेकिन उनकी दुनिया शायद अलग थी। राजपुर रोड पर नेहरू जी की बहन विजयलक्ष्मी पंडित रहतीं। आपातकाल में इन्दिरा गांधी से मतभेद के बाद वो यहाँ रहने लगी थीं। उनकी कोठी का गेट बंद ही रहता। उनकी बेटी नयनतारा सहगल भी यहाँ थीं। अङ्ग्रेज़ी पत्रकार नर्गिस दलाल भी देहारादून में ही थीं। मैं इन लोगों से मिलने की कोशिश करता रहता। सफलता कम ही मिलती। यह भी लगता कि मिल भी गए तो क्या बात करूंगा! मैं जानता ही कितना हूँ! मोहिनी रोड पर कम्यूनिस्ट इंटरनेशनल के संस्थापक-सदस्य रहे मानवेंद्र नाथ रॉय का घर था। वे अपने अंतिम दिनों में जब भारतीय दर्शन की ओर झुक गए तो यहाँ आकर रहने लगे। वे महर्षि अरविंद के अनुयायी बन गए। उन्होने भारतीय राजनीति को रैडिकल ह्यूमेनिज़्म का दर्शन दिया। शायद अस्सी से पहले ही उनका निधन हो गया था। उनके घर का नाम रैडिकल ह्यूमेनिस्ट हाउस था और वहाँ पर इंडियन रेनेसां इंस्टीट्यूट चल रहा था। एसएन पुरी जी वहाँ रहते थे। वे भी पुराने ह्यूमेनिस्ट थे। उन्होने मुझे रॉय के बारे में कुछ किताबें दीं। इस पर भी मैंने दैनिक ट्रिब्यून में एक फीचर लिखा।

ख़ैर, टिप टॉप की बात चली तो बता दूँ कि इसके मालिक प्रदीप गुप्ता को कभी भी चिढ़ते नहीं देखा। हम लोग सिर्फ एक चाय पीकर घंटों गप्पें मारते, कविता-कहानियाँ सुनते-सुनाते, फोकट में उनका पंखा चलता रहता लेकिन गुप्ता जी हमेशा खुश रहते। इस तरह से वे हम सबकी हौसला अफजाई करते। निश्चय ही उनके भीतर भी साहित्य का कोई न कोई कीड़ा था, जो उन्हें लेखन की दुनिया के करीब रखता।

कोई दस महीने पहले जब मैं देहारादून आया। जब भी इधर से गुजरता, मेरी आँखें टिप टॉप को तलाशती रहतीं। लेकिन टिप टॉप नहीं मिला। राज्य बनने के बाद देहारादून राजधानी बना तो बहुत कुछ बदल गया। सड़कें चौड़ी हो गईं। बहुत सी दुकानें टूट गईं। जो दुकानें हैं भी, उनका रूपकार भी बादल गया। उन्होने अपने काम भी बदल लिए। कुछ लोग नहीं रहे, बहुत से लोग कहीं और चले गए, कुछ लोग स्मृति से ओझल हो गए। इसलिए जिससे भी पूछो, कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाया। लेकिन पिछले दिनों जब इस इलाके में पैदल चल रहा था, तब एक दुकान पर एक बुजुर्ग-से सज्जन दिखे। उनसे पूछ बैठा। वे सचमुच जानकार निकले। उन्होने बताया, उसी लाइन में दस दुकान आगे टिप टॉप नाम से एक मोबाइल की छोटी-सी दुकान है, वहाँ पूछिए। वहाँ पहुंचा तो पता चला कि मैं सही ठिकाने पर पहुंचा हूँ। जो सज्जन दुकान चला रहे हैं, वे प्रदीप गुप्ता जी के सुपुत्र कुणाल गुप्ता हैं। बोले, रैस्टौरेंट तो 1995 में ही बंद हो गया था, लेकिन 2007-08 के आसपास जब ये सड़क चौड़ी होने लगी तो हमारी दुकान आगे से आधी कट गई। इसलिए जो थोड़ी जगह बच गई, उसमें यही काम हो सकता था। उनके पिता जी और दादाजी, दोनों अब इस संसार में नहीं हैं। बहुत से पुराने लोग आते हैं, टिप टॉप रैस्टौरेंट के बारे में पूछते हैं। हम उनकी बातें सुन-सुनकर खुश हो लेते हैं।

मुझे लगा, टिप टॉप के बहाने अस्सी के दशक के देहारादून के साहित्यिक माहौल को याद करूंगा। मैं साढ़े सात महीने ही देहारादून में रहा। दोस्त कहते, तुम्हारी साढ़ेसाती टल गई। यहाँ मुझे अपार आत्मीयता मिली। मुंबई रवाना होने से पहले टिप टॉप में बकायदा मुझे बिदाई दी गई। छोटे शहरों में वास्तव में ज्यादा आत्मीयता होती है। वैचारिक दुराव कम होता है। 45 साल बाद यहाँ लौटा हूँ तो वही आत्मीयता फिर से तलाश रहा हूँ। कहाँ से मिलेगी!

भराड़ी हमारी संस्कृति, हमारी पहचान, हमारा गौरव

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निलेश कटारा

भोपाल ।गांव से शहर की ओर बढ़ते हुए भी यदि कोई समाज अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपनी पूजा पद्धति को नहीं छोड़ता, तो वही समाज सच्चे अर्थों में समृद्ध कहलाता है। आज झाबुआ जिले के वरिष्ठ वकील एवं संघ के माननीय जिला संघचालक श्री मानसिंह जी भूरिया के सुपुत्र के विवाह समारोह में पारंपरिक भराड़ी परंपरा को जीवंत रूप में देखकर हृदय गर्व से भर गया। यह दृश्य केवल एक रस्म नहीं था, बल्कि हमारी हजारों वर्षों पुरानी आदिवासी संस्कृति, आस्था और प्रकृति-पूजा की जीवंत झलक था। भराड़ी केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि हमारे पुरखों की अमूल्य धरोहर है। यह वह माध्यम है जिसके द्वारा हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। जब आधुनिकता की दौड़ में लोग अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं, ऐसे समय में भराड़ी जैसी परंपराओं का पालन करना वास्तव में प्रेरणादायक है।

भराड़ी का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व

भराड़ी में पारंपरिक गीतों के साथ दीवारों पर और स्थान विशेष पर प्राकृतिक प्रतीकों के माध्यम से चित्रांकन किया जाता है। इसमें सूर्य, चंद्रमा, तारे, दूल्हा-दुल्हन, पेड़-पौधे, पत्तियाँ और अन्य प्राकृतिक तत्वों से सुंदर आकृतियाँ बनाई जाती हैं। यह केवल सजावट नहीं होती, बल्कि इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दर्शन छिपा होता है। आदिवासी समाज सदैव प्रकृति पूजक रहा है। हमारे लिए प्रकृति केवल संसाधन नहीं, बल्कि माता के समान है। भराड़ी के माध्यम से हम सूर्य से ऊर्जा, चंद्रमा से शांति, वृक्षों से जीवन और पृथ्वी से धैर्य का संदेश लेते हैं। यही कारण है कि भराड़ी में बनाया गया हर चित्र एक दर्शन, एक संदेश और एक आशीर्वाद होता है।

परंपरा और आधुनिकता का सुंदर संगम

आज जब गांव से शहर की ओर पलायन बढ़ रहा है, तब यह चुनौती भी है कि कहीं हम अपनी परंपराओं से दूर न हो जाएं। ऐसे समय में श्री मानसिंह जी भूरिया जैसे व्यक्तित्व, जो एक शासकीय सेवक होने के साथ-साथ निष्ठावान स्वयंसेवक भी हैं, उनके परिवार द्वारा भराड़ी जैसी परंपरा का पालन करना पूरे समाज के लिए एक प्रेरणा है। यह संदेश देता है कि आधुनिक जीवन जीते हुए भी अपनी संस्कृति को जीवित रखा जा सकता है। मैं आधुनिक भारत के युवाओं से विशेष रूप से आग्रह करता हूं कि वे अपनी संस्कृति, पूजा पद्धति और परंपराओं को केवल अतीत की चीज न समझें, बल्कि उन्हें अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं।

भराड़ी जैसी परंपराएं हमें हमारी पहचान देती हैं, हमें हमारी जड़ों से जोड़ती हैं और हमें यह सिखाती हैं कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर कैसे जीवन जिया जाए। यदि हम आज इन परंपराओं की रक्षा नहीं करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। हमारी संस्कृति ही हमारी असली पूंजी है, यही हमारी शान है, यही हमारा गौरव है। भराड़ी केवल विवाह की एक रस्म नहीं, बल्कि यह हमारी सभ्यता, संस्कृति और प्रकृति-पूजा की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह हमें गर्व से सिर ऊंचा करके यह कहने का अधिकार देती है कि

“मेरी संस्कृति, मेरी पूजा पद्धति, मेरी परंपरा मेरा अभिमान है।” हम सभी मिलकर अपनी इस अनोखी, विशिष्ट और गौरवशाली परंपरा को सहेजें, संजोएं और आने वाली पीढ़ियों तक पूरे गर्व के साथ पहुंचाएं।

✍️(श्री कटारा(माध्यमिक शिक्षक)
ग्राम मदरानी, तहसील मेघनगर, जिला झाबुआ, मप्र)

एक समय में आकाशवाणी और डीडी के एंकरों की लोकप्रियता फिल्म स्टारों जैसी थी- डॉ. सच्चिदानंद जोशी

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नई दिल्ली: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए), नई दिल्ली के कला निधि विभाग द्वारा सुश्री संगीता अग्रवाल की पुस्तक ‘दूरदर्शन: आधी आबादी की सशक्त गाथा’ के लोकार्पण एवं पुस्तक परिचर्चा कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की। मुख्य अतिथि के रूप में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की कुलपति प्रो. कुमुद शर्मा उपस्थित रहीं। अपने संबोधन में उन्होंने पुस्तक को भारतीय दूरदर्शन के माध्यम से महिला सशक्तिकरण की यात्रा का महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बताया और कहा कि यह कृति आधी आबादी की सामाजिक-सांस्कृतिक भूमिका को सशक्त स्वर प्रदान करती है।

पुस्तक परिचर्चा सत्र में अंतरराष्ट्रीय न्यायविद परिषद्, लंदन के अध्यक्ष एवं सर्वोच्च न्यायालय बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. आदर्श सी. अग्रवाल, आईजीएनसीए के डीन एवं कला निधि विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रमेश चन्द्र गौड़, वाणी प्रकाशन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुश्री अदिति माहेश्वरी, आकाशवाणी की उप-निदेशक सुश्री प्रज्ञा देवड़ा तथा वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखिका सुश्री संगीता अग्रवाल ने भी अपने विचार रखे।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सचिदानंद जोशी ने कहा कि किसी भी चुनौतीपूर्ण और जोखिमपूर्ण विषय पर पुस्तक का प्रकाशन लेखक से कहीं अधिक साहस का कार्य होता है, क्योंकि आज समाज में पढ़ने वालों और विशेषकर पुस्तकें खरीदकर पढ़ने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। उन्होंने दूरदर्शन के स्वर्ण-युग को स्मरण करते हुए कहा कि एक समय दर्शक पूरे कार्यक्रम धैर्यपूर्वक देखते थे, जबकि आज के रील-युग में ध्यान-अवधि कुछ सेकंड तक सीमित रह गई है। उन्होंने कहा कहा, उस दौर के एंकरों और रचनाकारों की लोकप्रियता फिल्म स्टारों जैसी थी, लेकिन इसके पीछे निरंतर संघर्ष, अनुशासन और प्रतिबद्धता थी।

डॉ. जोशी ने यह भी रेखांकित किया कि ‘आधी आबादी’ का संघर्ष आज भी समाप्त नहीं हुआ है और कैमरे के सामने तथा पीछे कार्यरत महिलाओं की भूमिका को समान रूप से स्वीकार करने और उस पर संवाद करने की आवश्यकता है। उन्होंने आशा व्यक्त की कि भविष्य में कैमरे के पीछे कार्य करने वाले लोगों के संघर्ष पर केंद्रित गंभीर लेखन सामने आएगा, जो समय की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। उन्होंने दूरदर्शन के कार्यक्रम ‘कृषि दर्शन’ में अपनी एंकरिंग के दिनों को भी रोचकता से याद किया।

मुख्य अतिथि कुमुद शर्मा ने पुस्तक के शीर्षक पर बात करते हुए कहा कि भारतीय परम्परा के आलोक में स्त्रियां आधी आबादी नहीं हैं, बल्कि वे आधेपन के पूरा करने वाली हैं। आज मीडिया में जो स्त्रियां हैं, वो पुरुष के चैतन्य को कसौटी पर कस रही हैं। मीडिया इंडस्ट्री बहुत तेज़ी से बदली है और उसने बहुत विकास किया है। मीडिया में महिलाएं बहुत सशक्त स्थिति में हैं, नीति-निर्माताओं में शामिल हैं। पूरे परिदृश्य में उनकी विजिबिलिटी बहुत सशक्त है। उन्होंने यह भी कहा, स्त्रियों का मीडिया में जो संघर्ष रहा है, वह बहुत कठिन रहा है। महिलाओं ने प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में चौतरफा संघर्ष करके अपना मुकाम बनाया है। उन्होंने कहा कि स्त्रियों के संघर्ष के साथ-साथ उनकी प्रगति और विकास की गाथा आना भी ज़रूरी है।

प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने स्वागत भाषण करते हुए कहा, हमारी पीढ़ी, जो दूरदर्शन और आकाशवाणी की सिग्नेचर ट्यून सुनकर बड़ी है, उसका लगाव आज भी दूरदर्शन और आकाशवाणी से है। उन्होंने कहा कि पुस्तक के तीन खंड हैं- आकाशवाणी, दूरदर्शन और डीडी न्यूज़। इस पुस्तक में बहुत सारी नई जानकारियां हैं।

आदिश सी. अग्रवाल ने कहा, भारतीय जनमानस में दूरदर्शन और आकाशवाणी का जो स्थान है, वह स्थान देश के बड़े-बड़े उद्योगतियों द्वारा चलाए जा रहे चैनल कभी नहीं ले सकते। लेखिका संगीता अग्रवाल ने कहा, इस पुस्तक में मैंने बताने का प्रयास किया है कि आकाशवाणी, दूरदर्शन, डीडी न्यूज़, डीडी इंडिया में विभिन्न पदों पर कार्यरत महिलाओं ने कितना संघर्ष किया है। उन्होंने यह भी कहा कि यह बताना भी ज़रूरी है कि देश की आज़ादी से लेकर देश निर्माण के हर कार्य में आधी आबादी यानी महिलाओं की हमेशा महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

अदिति माहेश्वरी ने कहा, विश्व के सबसे अनोखे ब्रॉडकास्ट नेटवर्क (आकाशवाणी व दूरदर्शन) के बारे में जितनी बात की जाए, उतना कम है। इस नेटवर्क ने आज़ादी से लेकर अब तक देश की भावना को आवाज़ दी है। इस किताब में कई ऐसी कहानियां हैं, जिन्हें आप परत दर परत खोलेंगे, तो देखेंगे कि अगर आप अपनी शिक्षा और अभिव्यक्ति के अधिकार का देश के लिए उपयोग करेंगे, तो आपको कोई रोक नहीं सकता। इस अवसर पर आकाशवाणी की उप-निदेशक सुश्री प्रज्ञा देवड़ा ने भी आकाशवाणी के अपने अनुभव साझा किए।

परिचर्चा में सभी वक्ताओं ने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया कि दूरदर्शन ने किस प्रकार भारतीय समाज में महिलाओं की आवाज़, पहचान और सशक्तिकरण को मंच प्रदान किया तथा यह पुस्तक उस यात्रा की सजीव और प्रामाणिक गाथा प्रस्तुत करती है।

कार्यक्रम की ख़ासियत यह भी रही कि पुस्तक में जिन महिलाओं की कहानियां शामिल हैं, उनमें से कई उपस्थित रहीं और उनका परिचय भी श्रोताओं से कराया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में विद्वान, शोधार्थी, मीडिया प्रतिनिधि और कला-संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे।

राजनीति का लेबल या अस्तित्व की लड़ाई? ‘लेफ्टिस्ट एजेंडा’ बनाम ‘किसान हित’ का असली सच

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निलेश देसाई

भोपाल । भारतीय कृषि क्षेत्र में जब भी कोई बड़ा बदलाव या अंतरराष्ट्रीय समझौता होता है, तो अक्सर एक पुराना हथियार निकाला जाता है— ‘विचारधारा का लेबल’। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (2026) के तहत जीएम (GM) उत्पादों के आयात का विरोध करने वाले स्वर भी आज इसी कसौटी पर कसे जा रहे हैं। इसे ‘लेफ्टिस्ट एजेंडा’ या ‘विकास विरोधी’ बताकर खारिज करने की कोशिशें तेज हैं। लेकिन क्या यह बहस वाकई दक्षिणपंथ बनाम वामपंथ की है? या फिर यह भारत की आने वाली पीढ़ियों की थाली और किसानों की आर्थिक संप्रभुता का गंभीर प्रश्न है?

विचारधारा की दीवार के पार: सर्वसम्मत संकट
अक्सर विरोध को विचारधारा से जोड़ना असली मुद्दे से ध्यान भटकाने का सबसे आसान तरीका होता है। हकीकत यह है कि अमेरिका से सब्सिडी वाले मक्का और सोयाबीन के आयात का विरोध केवल वामपंथी संगठन नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित संगठन भी कर रहे हैं। जबभारतीय किसान संघ (BKS) और आशा-किसान स्वराज जैसे धुर विरोधी छोरों के संगठन एक ही मुद्दे पर खड़े हों, तो समझ लेना चाहिए कि संकट विचारधारा का नहीं, बल्कि अस्तित्व का है।
सब्सिडी का अर्थशास्त्र: बाजार का ‘अन्यायपूर्ण युद्ध’
इसे राजनीति के बजाय शुद्ध ‘अर्थशास्त्र’ के नजरिए से देखें। अमेरिकी कृषि का मॉडल भारी सरकारी नकद सब्सिडी (PSE) पर टिका है। वहां का किसान बाजार की कीमतों के भरोसे नहीं, सरकारी चेक के भरोसे खेती करता है। जब वह अपना ‘अधिशेष’ (Surplus) भारत में डंप करता है, तो वह भारत के उस छोटे किसान से प्रतिस्पर्धा कर रहा होता है जिसे एमएसपी (MSP) के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।
• क्या अपने देश के उत्पादकों को विदेशी सब्सिडी वाली डंपिंग से बचाना ‘एजेंडा’ है?
• या यह एक कल्याणकारी राज्य का बुनियादी आर्थिक कर्तव्य है?
. जीएम (GM) का प्रवेश: विज्ञान बनाम व्यापारिक दबाव
जीएम उत्पादों का मुद्दा केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है। अमेरिका का दबाव है कि भारत अपने ‘नॉन-जीएम’ (Non-GM) प्रमाणपत्र की शर्तों को हटाए। इसे ‘प्रौद्योगिकी का विरोध’ कहना गलत है; यह असल में ‘सूचना के अधिकार’ और ‘जैविक सुरक्षा’ (Biosecurity) का प्रश्न है।

सरकार का यह तर्क कि “प्रसंस्करण (Processing) के बाद जीएम का प्रभाव खत्म हो जाता है”, वैज्ञानिक से ज्यादा व्यापारिक लगता है। यदि पशु जीएम चारा (DDGS) खाएंगे, तो वही तत्व दूध के माध्यम से इंसानों तक पहुंचेंगे। इस खतरे पर सवाल उठाना किसी विचारधारा की गुलामी नहीं, बल्कि एक जागरूक नागरिक का अपने स्वास्थ्य के प्रति सतर्क होना है।

कंपनियों का कौशल: विरोध को राजनीति में उलझाना
बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस खेल की माहिर खिलाड़ी हैं। वे जानती हैं कि यदि वे विरोध को ‘राजनीति’ या ‘एजेंडा’ करार दे दें, तो मध्यम वर्ग और नीति-निर्माता उस मुद्दे से किनारा कर लेंगे। कंपनियां भारत में ‘सेवा’ करने नहीं, बल्कि ‘बाजार’ कब्जाने आई हैं। वे अक्सर व्यापारिक समझौतों की पेचीदगियों में उन प्रावधानों को छिपा देती हैं जो हमारी घरेलू बीज संप्रभुता को स्थायी रूप से नष्ट कर सकते हैं।

. समाधान: ‘विरोध’ को ‘वैकल्पिक व्यापार’ में बदलना
इस बहस को तभी गंभीर बनाया जा सकता है जब हम विरोध के साथ-साथ ‘विकल्प’ की बात करें।
• सहकारिता का शस्त्र: अमूल जैसे मॉडलों ने दिखाया है कि जब किसान संगठित होता है, तो वह बाजार की शर्तों को तय करता है। हमें प्राकृतिक खेती और स्वदेशी बीजों के आधार पर ‘प्राकृतिक सहकारिता’ (Natural Cooperatives) विकसित करनी होगी।
• बाजार के हुनर: हमें कंपनियों की तरह ब्रांडिंग, गुणवत्ता और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) के हुनर सीखने होंगे। यदि “जीएम-मुक्त” उत्पाद एक सफल बिजनेस मॉडल बन जाए, तो कोई भी वैश्विक ताकत उसे बाजार से बाहर नहीं कर पाएगी।

‘लेफ्टिस्ट एजेंडा’ जैसे जुमले उन लोगों के लिए ढाल का काम करते हैं जो गहन चर्चा से बचना चाहते हैं। भारत-अमेरिका व्यापार समझौता केवल डॉलर का लेनदेन नहीं है; यह इस बात का फैसला है कि हमारी मिट्टी में क्या बोया जाएगा और हमारी अगली पीढ़ी क्या खाएगी। जब लड़ाई अस्तित्व और आत्मनिर्भरता की हो, तो वहां ‘लाल’ या ‘केसरिया’ नहीं, बल्कि केवल ‘मिट्टी का रंग’ प्राथमिकता होना चाहिए। हमें सड़कों पर आवाज उठाने के साथ-साथ बाजार में अपना ‘हुनर’ दिखाना होगा, तभी हम इन वैश्विक ताकतों का मुकाबला बराबरी के धरातल पर कर पाएंगे।

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