देश/प्रदेश का सम्मान वेंटिलेटर पर है

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संकेत ठाकुर

रायपुर: आज सुबह से आक्रोशित हूं वर्तमान अव्यवस्था को लेकर …. और दुखी भी हूं कि मैं अपने प्रिय गुरु विनोद कुमार शुक्ल के स्वास्थ्य के लिए कुछ नहीं कर पा रहा हूं ।

उस दिन बहुत राहत मिली थी जब खबर मिली कि प्रधानमंत्री जी ने 1 नवंबर को रायपुर में विमान से उतरने के तुरन्त बाद फोन करके विनोद कुमार शुक्ल सर के स्वास्थ्य का हालचाल पूछा था । दो दिन बाद जब मैं हॉस्पिटल में सर से मिलने गया था तो उनके बेटे शाश्वत जी ने फोन वाले वाकये को विस्तार से बताया था । लेकिन ये भी बताया कि पीएम के फोन आने के बाद राज्य शासन से एक अधिकारी आए थे जिन्होंने हालचाल पूछा फिर शाश्वत जी को एक आवेदन पत्र भरकर देने कहा जिसमें विनोद कुमार शुक्ल जी या उनके बेटे को राज्य शासन से इलाज हेतु आवेदन करना था ! एक स्वाभिमानी संवेदनशील साहित्यकार के पुत्र ने पिता के सम्मान की रक्षा करते हुए इलाज में सहायता हेतु राशि का आवेदन लिखने से इनकार कर दिया ! भला अब भी एप्लीकेशन देना होगा ! गुहार लगानी होगी !!

शाश्वत भाई ने बड़ी शालीनता से उस आवेदन पत्र को भरने से इनकार कर दिया ।
इस तरह शासन की ओर से कोई सहयोग नहीं मिला और लगभग रु 4 लाख निजी अस्पताल में इलाज के नाम पर खर्च करने के बाद अपने पिता को लेकर 12 नवंबर को घर लौट आए । इस दौरान शुक्ल सर का वजन लगभग 15 किलो घट गया । अस्पताल ने बहुत सारे टेस्ट करवाएं लेकिन फेफड़ों में पानी भरने का कारण स्पष्ट समझ नहीं आया । यह बताया गया कि प्रोटीन की कमी है !
सांस लेने में सर को तकलीफ हो रही थी, लेकिन बीमारी का सटीक कारण समझ नहीं आने के कारण उन्हें हॉस्पिटल से छुट्टी दे दी गई । घर लौटकर यथासंभव उचित देखभाल की जाने लगी ।
21 नवंबर को शारीरिक रूप से बेहद कमजोर हो चुके विनोद कुमार शुक्ल जी को देश के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार उनके घर में ही साधारण कार्यक्रम में दिया गया।
3 दिसंबर को स्वास्थ्य फिर खराब होने लगा । सांस लेने में तकलीफ बढ़ी । इस बार निजी अस्पताल में हुए भारी खर्च को देखते हुए निजी की बजाय सरकारी अस्पताल एम्स रायपुर में उन्हें भर्ती किया गया । कुछ मित्रों ने उनको एम्स में भर्ती कराने में मदद की ।

आज शुक्ल सर को एम्स रायपुर में भर्ती हुए 15 दिन हो गए हैं ।
शाश्वत भाई लगातार पिता की सेवा में लगे हुए हैं । कल उन्होंने इलाज को लेकर गहन निराशा व्यक्त की ।
आज सुबह एम्स रायपुर में पत्नी शुभ्रा जी के साथ मिलने गया तो पता चला कि शुक्ल सर को कल रात को वेंटिलेटर में शिफ्ट कर दिया गया है….

शाश्वत भाई के साथ करीब 2 घंटे बैठे रहे हम लोग ।

एम्स के MICU वार्ड से लगे प्रतीक्षा वार्ड की फर्श पर दरी बिछाकर शाश्वत भाई, उनकी श्रीमती जी और बिटिया लगातार सेवारत हैं । उन्हें अपने पिता से दिन में दो बार ही मिलने दिया जाता है ।
या फिर वार्ड का सिक्योरिटी गार्ड आवाज देखकर बुलाता है …. 1 नम्बर बेड के परिजन हाजिर हो । वहां जाकर बताया जाता है कि अपने पिता की ड्रेसिंग आप ही करो, बिस्तर की चादर बदलो, पिता का डायपर चेंज करो…आदि । कभी कभी रात को 12 बजे बुलाकर कहा जाता है कि बेड नंबर 1 के पेशेंट का बिस्तर से पैर बाहर आ गया है उसे अंदर करो ! यह सब काम के लिए मना करने पर उन्हें यहां तक कह दिया गया कि आप स्वयं कोई निजी नर्सिंग स्टाफ ले आओ !!

हॉस्पिटल के अन्य स्टाफ इतना लापरवाह है कि सफाई, टॉयलेट से लेकर हर काम के लिए मरीज के परिजनों को संघर्ष करना पड़ रहा है । सारे परिजन हताशा में नजर आए ।
देश के ज्ञानपीठ पुरस्कार से लेकर अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त साहित्यकार के इलाज में घनघोर लापरवाही के दर्द से तड़पकर शाश्वत कहते हैं कि दादा को सांस लेने की तकलीफ है लेकिन डॉक्टर उन्हें दूर से देखते है या उनकी फोटो मोबाइल में देखकर दवा बताते है ना कि छाती पर स्टेथोस्कोप लगाकर फेफड़े की हालत का अनुमान लगाते हों !
मैने किसी तरह अपने संपर्कों से इलाज कर रहे डॉक्टर से चर्चा की तो उन्होंने बताया कि स्थिति स्टेबल है । फेफड़ों में हॉस्पिटल जनित इन्फेक्शन है । निमोनिया हो सकता है । Lungs में 80% फाइब्रोसिस है ।
आज मेरे सामने ही एक और टेस्ट कराने कहा गया जो एम्स में नहीं होता, इसके लिए किसी निजी लेब के टेक्नीशियन आए थे, test की फीस रु 25000 मांगे !

देश के महान साहित्यकार, प्रदेश के ‘धरोहर’ वेंटीलेटर पर हैं । बेटा पिताजी देखरेख करते हुए फ्लोर की सफाई के लिए स्वीपर से संघर्ष करते हुए चटाई पर सोने को मजबूर है।

(सोशल मीडिया से साभार)

विकसित देशों के सम्पन्न नागरिक भारत में बसने के बारे में कर रहे हैं गम्भीर विचार

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ग्वालियर : वैश्विक पटल पर अचानक परिस्थितियां बहुत तेजी के साथ बदलती हुई दिखाई दे रही हैं। अभी तक कुशल युवा भारतीय अपना सपना साकार करने के उद्देश्य से अमेरिका में रोजगार के अवसर तलाशने के लिए जाते रहे हैं। परंतु, अब कुछ अलग प्रकार का माहौल बनता हुआ दिखाई दे रहा है। अमेरिका सहित अन्य कई विकसित देशों में रहन सहन (जीवन निर्वहन) के खर्चे असहनीय स्तर पर पहुंच गए हैं क्योंकि मुद्रा स्फीति की समस्या इन देशों में लम्बे समय से चल रही है, और, इन देशों द्वारा इस संदर्भ में अथक प्रयास करने के बावजूद, इसका हल नहीं निकल पा रहा है। विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बहुत ही भयावह स्थिति में पहुंच गई हैं। विकसित देशों में किसी भी नागरिक को स्वास्थय इंशोरेंस की सुविधा यदि उपलब्ध नहीं हैं तो उसके लिए इलाज करना असम्भव सा ही है। स्वास्थ्य सेवाओं की लागत इन देशों में इतनी बढ़ चुकी है कि आम नागरिक के लिए यहां अपना इलाज करना सम्भव ही नहीं हैं। अमेरिका से तो युवाओं के साथ साथ सेवानिवृत्त नागरिक भी अब भारत में बसने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहे हैं। अमेरिका के न्यूयॉर्क, टेकसास, वाशिंगटन, लासअंजेल्स, सिलिकन वेल्ली, आदि शहरों से इंजीनियर, सृजक (क्रीएटर), युवा उद्यम, बुजुर्ग नागरिक, आदि निकलकर भारत के मुंबई, पुणे, गोवा, हैदराबाद, बैंगलोर, केरल, पोंडिचेरी, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश आदि शहरों/राज्यों में आकर भारत में बसने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहे हैं।

भारत की तेज गति से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था, भारत में तुलनात्मक रूप से सस्ती दरों पर विभिन्न उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता, अति सस्ती दरों पर सेवा भावना के साथ उच्च स्तर की स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एवं भारत की महान संस्कृति के साथ साथ साकार अवसर अमेरिका सहित विकसित देशों के नागरिकों को भारत की ओर आकर्षित कर रहे हैं। आज भारत का फलता फूलता तकनीकी उद्योग उच्च स्तर की तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है जो किसी भी तरह विकसित देशों में उपलब्ध कराई जा जा रही तकनीकी सुविधाओं से कम नहीं हैं। भारत में नागरिकों को मानसिक शांति उपलब्ध है क्योंकि भारतीय नागरिक, सनातन संस्कृति का अनुपालन करते हैं। जबकि विकसित देशों के नागरिकों में मानसिक शांति का पूर्णत: अभाव है। विकसित देशों के नागरिक पश्चिमी सभ्यता का अनुसरण करते हैं जिसके चलते संयुक्त परिवारों का पूर्णत: अभाव है। इन देशों में पश्चिमी संस्कृति का अनुसरण करते हुए परिवारों में बच्चे 18 वर्ष की आयु प्राप्त करते ही वे अपना अलग घर बसा लेते हैं और माता पिता अकेले रह जाते हैं। जिससे, माता पिता अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं और इनकी देखभाल के लिए सरकार को व्यवस्था करनी होती है। इसके ठीक विपरीत भारतीय संस्कृति नागरिकों को आपस में जोड़ती है एवं संयुक्त परिवार भारतीय समाज की विशेषता है। बुजुर्ग नागरिकों को अपने संयुक्त परिवार में ही रहना होता है। अतः भारत में बुजुर्गों की देखभाल के लिए सरकार को अलग से कोई व्यवस्था नहीं करनी होती है।

हाल ही के वर्षों में अमेरिकी नागरिकों द्वारा भारत के लिए वीजा प्राप्त करने वालों की संख्या वर्ष 2021 के बाद से दुगुनी हो गई है। अमेरिकी नागरिक अब भारत में शांति की तलाश में आ रहे हैं। अमेरिका सहित विकसित देशों में अधिकतम नागरिकों को मानसिक बीमारियों ने घेर रखा है। इन मानसिक बीमारियों से मुक्ति पाने के उद्देश्य से कई विदेशी नागरिक तो भारत के हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड जैसे राज्यों के हिमालय क्षेत्र में बस्ते जा रहे हैं। उन्हें वहां पर आध्यात्म का सुख प्राप्त हो रहा है। भारत की तेजी से बढ़ रही डिजिटल अर्थव्यवस्था से भी अमेरिका का पढ़ा लिखा वर्ग आकर्षित हो रहा है, क्योंकि उन्हें अमेरिका जैसी ही उच्चस्तरीय सुविधाएं भारत में भी उपलब्ध हो रही हैं। भारत का स्टार्टअप इको सिस्टम भी भारत में नित नए नवाचार उपलब्ध करा रहा है इससे अमेरिका में पूर्व से ही सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों को भी भारत में रोजगार के नए अवसर दिखाई दे रहे हैं।

साथ ही, भारत में प्रतिभावान इंजीनीयरों की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता है जिससे अमेरिका की कई कम्पनियां अब अपने तकनीकी कार्य को भारत में स्थानांतरित कर रही हैं। कई अमेरिकी कम्पनियां अब यह महसूस करने लगी हैं कि भारत में कम खर्चों में अधिक उत्पादकता मिल सकती है, क्योंकि भारत में उत्पादों की लागतें एवं कार्यबल की लागतें बहुत कम हैं, जिससे तुलनात्मक रूप से इन कम्पनियों की लाभप्रदता में सुधार दिखाई दे रहा है। अमेरिका में उत्पादों की लागतें बहुत ऊंचें स्तर पर पहुंच चुकी हैं, जो कम्पनियों की लाभप्रदता को विपरीत रूप से प्रभावित कर रही हैं। और फिर, भारतीय महानगरों में अमेरिकी महानगरों की तुलना में बेहतर एवं टक्कर की सुविधाएं उपलब्ध हैं। भारत में विश्व का सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार भी उपलब्ध है जिससे उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में उत्पादन करने वाली विश्व की लगभग समस्त बड़ी कंपनियां अब भारत में अपनी विनिर्माण इकाईयों की स्थापना करने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रही हैं। ये बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में सस्ती उत्पादन लागत पर उत्पादों का निर्माण कर भारत में ही इन उत्पादों को बेच सकती हैं क्योंकि स्थानीय स्तर पर ही इन उत्पादों के लिए विशाल बाजार उपलब्ध है। अन्य कई कम्पनियां तो भारत में स्थापित विनिर्माण इकाईयों में उत्पादों का निर्माण कर अन्य देशों को निर्यात भी करने लगी हैं।

भारत में आधुनिकतम तकनीकी उपलब्ध है, रहन सहन की लागतें बहुत कम हैं, युवा एवं प्रतिभावान कार्यबल सस्ती दरों पर उपलब्ध है, भारत में मुद्रा स्फीति की दर सबसे कम है, उत्पादों का बड़ा बाजार उपलब्ध है, इन उपलब्धियों की चलते अब विदेशी निवेशक भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं। अमेरिका सहित विकसित देशों में आज मुद्रा स्फीति की समस्या विकराल रूप धारण किए हुए है एवं इसका हल ये देश निकाल नहीं पा रहे हैं इससे इन देशों में पेंशन पाने वाले नागरिक इन देशों में रहन सहन की उच्च लागत को वहन नहीं कर पा रहे हैं। जबकि भारत में इन देशों के नागरिकों का गुजारा बहुत आसानी से हो सकता है। साथ ही, भारत में हाल ही के समय में स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धि में अकल्पनीय सुधार हुआ है। भारत में ही अब विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं तुलनात्मक रूप से बहुत ही सस्ती दरों पर उपलब्ध हैं। अन्य देशों की तुलना में केवल 25/30 प्रतिशत खर्च पर भारत में अत्याधुनिक तकनीकी आधारित स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। अतः आज न केवल विकसित देशों बल्कि अरब देशों से भी नागरिक भारत में अपना इलाज कराने के लिए बहुत बड़ी संख्या में आने लगे हैं।

भारतीय संस्कृति भी विदेशी नागरिकों को अपनी ओर आकर्षित करती हुई दिखाई दे रही है। मन की शांति तो भारत के आध्यात्म में अंतर्निहित है। “वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना, “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” एवं “सर्वे भवंतु सुखिन:” जैसी भावना तो केवल और केवल भारत में ही पाई जाती है। भारत में योगा एवं आयुर्वेदिक जैसी सुविधाएं भी स्वास्थ्य को ठीक बनाए रखने में सहयोग करते हुए दिखाई दे रही हैं। पश्चिम के केवल “मैं” के भाव से भी नागरिक अब ऊब चुके हैं एवं वहां पर छिन्न-भिन्न हुए सामाजिक ताने-बाने से भी बहुत परेशान हैं अतः वे आत्मिक सुख की तलाश में भारत के सामाजिक ताने बाने में रचना बसना चाह रहे हैं। अमेरिका एवं अन्य देशों के नागरिक महाकुम्भ के समय लाखों की संख्या में भारत में प्रयागराज में पवित्र त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाने के उद्देश्य से आए थे, यहां का धार्मिक माहौल देखकर ये लोग अब भारत में बसने के बारे में गम्भीरता से विचार कर रहे हैं। विकसित देशों की तुलना में भारत में उन्हें आत्मिक शांति प्राप्त होती हुई दिखाई दे रहे हैं। आज भारत पूरे मनोयोग एवं आत्म विश्वास के साथ अपने पैरों पर खड़ा है।

भारत में समाज बहुत लचीला है एवं अन्य देशों से भारत आ रहे नागरिकों का स्वागत करता हुआ दिखाई दे रहा हैं। अतः भारत में उनका हार्दिक स्वागत हो रहा है तथा भारत में इनकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। इस प्रकार इन विदेशी नागरिकों को भारत में स्थापित होने में किसी भी प्रकार की परेशानी दिखाई नहीं दे रही है। भारतीय समाज उन्हें न केवल स्वीकार रहा है बल्कि समस्त प्रकार की सुविधाएं एवं सहयोग भी उपलब्ध करा रहा है।

भारत में बुजुर्गों को दिए जाने वाले आदर सत्कार से भी अमेरिका का बुजुर्ग नागरिक अत्यधिक प्रभावित हैं। अमेरिका में इस प्रकार का माहौल उन्हें नहीं मिलता है। वहां तो बुजुर्गों को सामान्यतः उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है तथा इन बुजुर्गों की देखरेख सरकार को करनी होती है। आज अमेरिका में लगभग 6 लाख बुजुर्ग खुले में, पार्कों में, अपना जीवन जीने को मजबूर हैं। संयुक्त परिवार तो केवल भारत में सम्भव है अमेरिका में तो संयुक्त परिवार दिखाई ही नहीं देते हैं। भारत के केरल, गोवा, पोंडिचेरी, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड राज्य अमेरिका में सेवानिवृत्त हुए नागरिकों के लिए किसी स्वर्ग से कम सिद्ध नहीं हो रहे हैं।

“भारतीय पर्यावरण चिंतन” — विमोचन का सार्थक क्षण | भारत बोध कार्यक्रम

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बिरेन्द्र पांडेय

जयपुर : भारत बोध कार्यक्रम में “भारतीय पर्यावरण चिंतन” पुस्तक का विमोचन हम सभी के लिए एक विचारात्मक उत्सव रहा। आदरणीय श्री सुनील आंबेकर जी (अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख) के करकमलों से इस ग्रंथ का लोकार्पण हुआ, मेरे लिए संपादक के रूप में विशेष संतोष और हर्ष का विषय है। पिछले 6 माह के सतत साहित्यिक परिश्रम की यह सार्थक परिणति है।


आज जब विश्व पर्यावरण को संकट के रूप में देखता है, तब भारत की दृष्टि हमें स्मरण कराती है कि पर्यावरण हमारे लिए संस्कार, संस्कृति और सहजीवन का विषय रहा है—प्रकृति संसाधन नहीं, माता और सहचर है। संघ के शताब्दी वर्ष और पंच परिवर्तन की पृष्ठभूमि में इस पुस्तक का प्रकाशन इस दृष्टि को वैचारिक आधार देता है—वैदिक काल से आधुनिक काल तक समग्र भारतीय पर्यावरण चिंतन को एक सूत्र में पिरोते हुए।

इस ग्रंथ में देश के 25 से अधिक विद्वानों और चिंतकों के लेख संकलित हैं—लगभग 140 पृष्ठों में भारतीय परंपरा की आध्यात्मिक, सामाजिक और व्यवहारिक पर्यावरण दृष्टि का सशक्त प्रस्तुतीकरण। आयरलैंड में भारत के राजदूत श्री अखिलेश मिश्र जी, श्री श्री रविशंकर जी, श्री स्वामी अवधेशानंद गिरी जी, श्री सद्गुरु जग्गी वासुदेव जी, प्रो. दयानंद भार्गव जी, प्रो. बजरंग लाल गुप्त जी, श्री गोपाल आर्य जी, वैद्य राजेश कोटेचा जी, श्री प्रशांत पोल जी, प्रो भगवती प्रकाश शर्मा जी, श्री हनुमान सिंह राठौड़ जी और डॉ इंदुशेखर तत्पुरुष जी जैसे प्रतिष्ठित लेखकों के योगदान से यह ग्रंथ विशेष बना है।

यह पुस्तक स्मरण कराती है कि भारतीय दृष्टि में विकास और प्रकृति विरोधी नहीं, पूरक हैं— संरक्षण कानून से नहीं, चेतना से आता है; और चेतना संस्कृति से जन्म लेती है।
इसी भाव से शीर्षक है—“विमर्श: भारत बोध का”। आशा है कि “भारतीय पर्यावरण चिंतन” केवल पढ़ी जाने वाली पुस्तक नहीं, जीने की दृष्टि बने—क्योंकि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व ही भारत की शाश्वत पहचान है।

भारतीय बैंक भ्रष्टाचार के सब से बड़े कम्युनिकेशन सेंटर

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दयानंद पांडेय
लखनऊ : वर्ष 1985 में जब दिल्ली से लखनऊ आया था तो एक बैंक में यूनियन के एक नेता पर नज़र गई। थे तो वह क्लर्क ही लेकिन रहते ख़ूब ठाट -बाट से थे । बड़े-बड़े बैंक मैनेजर उन के आगे-पीछे घूमते थे । बैंक मैनेजर तो छोड़िए कई आई ए एस , आई पी एस , पी सी एस अफ़सर भी उन की मुट्ठी में रहते थे । उन की कोई बात टालते नहीं थे । टेढ़े से टेढ़े मामले भी वह चुटकी बजाते ही संभव बनवा देते थे । इंजीनियर , ठेकेदार , व्यवसायी भी उन की छांव खोजते थे । गज़ब जलवा था । फिर हम ने इन को अपने राडार पर लिया । बैंक में तो जल्दी यह जनाब मिलते नहीं थे । किसी अफ़सर , किसी ठेकेदार , किसी व्यवसायी के यहां वह मिलते थे । या फिर यह लोग इन के यहां । मोबाइल का ज़माना नहीं था तब लेकिन एक फ़ोन पर यह अपने ज़रूरी काम करवा लेते । वह लगातार मोबाइल रहते । कुछ ख़ास अड्डे इन के तय थे । अलग-अलग समय पर । दोपहर का ,कहीं शाम का कहीं । लंच और डिनर भी अकसर पांच सितारा होटलों में । या उन होटलों से लोग पैक करवा लाते ।

एक व्यवसायी ने तो उन्हें हज़रतगंज जैसी जगह में ऊपरी मंजिल का एक बड़ा सा फर्निश घर ही दे रखा था । नीचे आलीशान शोरुम , ऊपर आलीशान घर । बहुत सुरागरसी की पर जनाब की असल कुंजी नहीं मिल पा रही थी । ताकि ख़बर निकल सके । बहुत दिनों तक फॉलो करता रहा । फिर अंतत: राज का पता चल गया । होता क्या था कि रिश्वत के लेन-देन में उन दिनों रिश्क बहुत बढ़ गया था । लोग रंगे हाथ पकड़े जाने से भयभीत रहते । ठीक वैसे ही जैसे औरतें संभोग से सिर्फ़ इस लिए डरती फिरती हैं कि कहीं गर्भवती न हो जाएं । तो यह जनाब बैंक कर्मचारियों के नेता जी , निरोध कहिए , कापर टी कहिए , कोई गोली कहिए , का काम करते थे । होता यह था कि किसी नाम से किसी बैंक में एक खाता खुल जाता । करोड़ , लाख किसी भी रकम में । फिर संबंधित व्यक्ति को एक चेक बुक दे दी जाती । दस्तखत कर के । लिमिट बता दी जाती । अब अगला आदमी किस नाम से , किस अकाउंट में , किस धनराशि में , बियरर या अकाउंट पेयी जैसे , जिस तरह से चाहे , जब चाहे निकाल ले । न कोई रिश्क , न कोई झंझट । किस ने दिया , किस को दिया , किसी को पता नहीं । और कार्य सुगमता से संपन्न हो जाता । हफ्ते , महीने में पैसा खत्म होते ही वह अकाउंट बंद हो जाता । सूत्रधार होते यह बैंक नेता जी । बैंक मैनेजर से लगायत हर किसी का अनुपात उस को मिल जाता । बस सूत्रधार होते यह बैंक नेता जी । हर किसी का राज इन को मालूम होता । हर किसी को इन पर विश्वास होता ।

आंख मूंद कर लोग नेता जी के एक फोन पर लाखों करोड़ों की डील कर लेते थे । छोटे-मोटे काम में नेता जी हाथ भी नहीं लगाते थे । ऐसे मामलों के कोई सुबूत भी नहीं मिलते । कहते ही हैं कि घूस और भूत के सुबूत नहीं होते । कई व्यवसायियों के खाते में पैसे नहीं होते लेकिन लाखों की डिमांड ड्राफ्ट नेता जी बनवा देते । हफ्ते दस दिन में माल आते ही खाते में पैसा पहुंच जाता । कुछ मामले हम ने निकाले । ख़बर लिखी । पर छपी नहीं । पता चला कि इस पूरे रैकेट में अख़बार के मालिकान भी शामिल थे । उन को भी पचास काम इसी पुल से गुज़र कर करवाने होते थे । नौकरी जाते-जाते बची । खैर , मजा तब आया जब इन नेता जी के एक बेटे की शादी हुई । नेता जी मुझे भी बुलाना नहीं भूले । गया भी मैं । देखा कि एक से एक अफसर , व्यवसायी , ठेकेदार , इंजीनियर उपस्थित थे । कुछ राजनीतिज्ञ भी । एक दूसरे से आंख छुपाते , बचते-बचाते । लेकिन कब तक और कितना बचते ? बैंक नेता के हमाम में सभी नंगे हो चुके थे । सब एक दूसरे की नस पकड़ चुके थे । और तो और कुछ अफ़सर तो ऐसे भी दिखे जो अपने इमानदार होने का डंका पीटते नहीं थकते थे । एक बैंक क्लर्क के बेटे की शादी में राजनीतिज्ञों , आला अफसरों , ठेकेदारों , इंजीनियरों और व्यवसायियों की उपस्थिति लेकिन किसी अख़बार की सुर्खी नहीं बनी । बनती भी कैसे भला कुछ अख़बारों के मालिकान भी तो इस हमाम में चहक और महक रहे थे । कुछ दल्ले पत्रकार भी उपस्थित थे ।

मैं अभिशप्त था यह और ऐसा नज़ारा देखने के लिए । देख कर भी खामोश था । तब मोबाइल भी नहीं होते थे कि कुछ फ़ोटो ही खींच लेता । ख़बर भी नहीं लिखी । फ़ेसबुक , ट्विटर या ब्लॉग भी नहीं था कि यह सब लिख देता । बाद के दिनों में तो सब कुछ आन लाइन होने लगा । चेक तो अब भी है ही , क्रेडिट कार्ड भी थमा देते हैं लोग । लेकिन बैंक अकाऊंट खोलने और रिश्वत लेने और देने वालों का लिंक जोड़ने वाले बैंक कर्मियों की सर्वदा ज़रुरत रही है इस सिस्टम को , सर्वदा रहेगी । बेवजह लोगों की आंखें चौंधिया गई हैं बैंक के मार्फ़त करोड़ों के गुलाबी रुपए की खेप दर खेप देख कर । यह सब तो होना ही था , सर्वदा होता रहेगा । यह जन धन खाते , खातों का इंश्योरेंस वगैरह में भी बैंक वालों ने कितना जय हिंद किया है , यह बात भी भला कितने लोग जानते हैं ? तो मित्रों जानिए कि भारत एक कृषि प्रधान देश है , यह ग़लत अवधारणा है । सच यह है कि भारत एक भ्रष्टाचार प्रधान देश है । और भारतीय बैंक इस भ्रष्टाचार के सब से बड़े कम्युनिकेशन सेंटर । केंद्र बिंदु । धुरी । भ्रष्टाचार के सूत्रधार । देश में भ्रष्टाचार की सारी ट्रैफिक बैंक की रेल , नाव और जहाज से ही गुज़रती है ।

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