मुझसे काम नहीं ले पा रहे हो तो पुरानी सेवा में ही भेज दो

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रिंकू सिंह राही

लखनऊ : आज जो मीडिया में खबरें मिल रही हैं, वह पत्र दिनांक 26.03.2026 को ही हस्ताक्षर करके भेज दिया गया था। यह स्पष्ट कर दूं कि यह त्याग पत्र नहीं है बल्कि तकनीकी त्याग पत्र है, मतलब… एक offer type.. कि यदि दिव्यांग आरक्षण के उधार से ली गई (मतलब इस उधार को चुकाने का अतिरिक्त दायित्व), इस सेवा में मुझसे काम नहीं ले पा रहे हो तो पुरानी सेवा में ही भेज दो, वहां पर कम उधार होने से कम काम में ही संतुष्टि मिल सकेगी।*

इसलिए इस offer पत्र पर सरकार को निर्णय लेना है। मैं तो दोनों तरफ ही तैयार हूं। हालांकि इस प्रकार मैंने कुव्यवस्था से सीधा पंगा लिया है। देखते हैं कि कुव्यवस्था वाले लोग मिलकर क्या गलत करते हैं मेरे साथ? मेरा पूरा विश्वास है कि आने वाले समय में प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष तरीके से कुछ तो गलत होगा ही। यदि जन दवाब अधिक पड़ा तो हो सकता है कि यह गलत होना थोड़े समय बाद हो।
किंतु मेरे लिए तो–
सब कुछ लुटाने की तमन्ना,
अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना,
बाजू –ए भ्रष्ट व्यवस्था में है।
चूंकि जैसा कि पिछली पोस्ट में बताया गया था कि cheap मीडियाबाजी से अच्छी बातें सामने नहीं आ पाती हैं, इसलिए उस पत्र पर कार्यवाही होने के लिए छोड़ दिया गया था। हालांकि आज IAS एसोसिएशन के ग्रुप में शेयर किया था कि उन्हें थोड़ा सा तो पता चले कि IAS सेवा क्यों अपनी प्रांसगिकता खोती जा रही है? योजना थी कि अगले तीन चार दिनों में यह पत्र यहां share किया जाता (इसकी hint भी दी थी पिछली पोस्ट में)।
लेकिन IAS एसोसिएशन के ग्रुप से सूचना leak हो गई और सूचना सतही बाहर आई और केवल TRP मात्र के लिए मीडियाबाजी शुरू, कुछ भी लिखकर, वह भी बिना पत्र पढ़े ही।

ऐसे में जो बिंदु मेरे द्वारा उठाए गए हैं, उन्हें वास्तविक तौर पर लाने के लिए बहुत से मीडिया के दौर में कुछ अच्छे मीडिया वालों/अन्य की जरूरत है, (यदि आपके परिचित में कोई हों हों तो आपसे अति विशेष अनुरोध है कि कृपया इन तक ये तीनों पत्र अवश्य पहुंचाएं), जो उठाए गए बिंदुओं पर चर्चा करके IAS PCS एवं अन्य समान सेवाओं में योगदान करने वाले अच्छी मानसिकता (कुछ तो बहुत अच्छी सोच के साथ आते हैं) वाले अधिकारियों के सद्मार्ग में बनने वाली दीवार को तोड़ा जा सके, जिससे कि उन्हें विवशतावश गलत रास्ते की ओर जाने का समझौता न करना पड़े। इसके साथ ही जो एक वाक्य बहुत ज्यादा प्रसिद्ध हो गया है– व्यवस्था/system ही खराब है। जबकि इतने वर्षों से मैं समझ पाया हूं कि जो system/व्यवस्था, संवैधानिक तरीके से बनी है, वह काफी सही है,कुछ कमियां हैं, उन्हें सही करने की भी व्यवस्था है। जबकि हमारा पाला जिससे पड़ता है वह व्यवस्था नहीं बल्कि कुव्यवस्था है। जिसे संवैधानिक व्यवस्था को ठेंगा दिखाने के लिए, इसके विपरीत जानबूझकर खड़ा किया गया है और दिन ब दिन मजबूत किया जा रहा है। बस यहीं से लड़ाई शुरू होती है अच्छे और बुरे लोगों में। अच्छे लोग संवैधानिक व्यवस्था को लागू करना चाहते हैं, और बुरे लोग उससे अलग हटने में बड़ा नुकसान पाते हैं और फिर मेरे जैसे लोग पहले भी attack झेले हैं और आगे भी झेलने के लिए तैयार हैं। (जिस तरह की कुव्यवस्था मजबूत है, यदि एकदम अलग post नहीं रख सके इस कुव्यवस्था से तो, या तो कुव्यवस्था ही खत्म होगी या फिर मैं ही खत्म). क्योंकि यदि व्यवस्था होती तो मेरी उठक बैठक की गलती के लिए या तो सजा देती या माफ करती, लेकिन अलग नहीं बैठाती (हालांकि वहां पर भी काम ढूंढ लिए गए मेरे द्वारा, जिनमें अड़चनों को भी बताया गया है)। मतलब कुव्यवस्था ने अपना कार्य किया और बिना कोई सजा दिए हुए ही अलग कर दिया– कारण कुव्यवस्था में कोई जवाबदेही नहीं है, जबकि व्यवस्था में सबसे बड़े पद वाले की भी जवाबदेही है, इसलिए डरते हैं ऊपर वाले लोग व्यवस्था से और use करते हैं स्थापित कुव्यवस्था का।

फिर वेतन देकर भी काम नहीं लेते और इस प्रकार सरकारी धन के दुरुपयोग पर शायद ही आज तक कोई audit आपत्ति आई हो।

इसमें IAS एसोसिएशन की भूमिका पर भी प्रश्न उठाए हैं। क्योंकि भ्रष्ट अधिकारियों के लिए यह एसोसिएशन सशक्त भूमिका में होती है जबकि देशहित में कार्य करने वाले किसी भी अधिकारी के पक्ष में यह एसोसिएशन शायद ही कभी दिखाई दी हो।
आदि।
चूंकि अभी मेरे पास पुरानी सेवा का विकल्प रूपी मध्यम मार्ग है और शायद एक लंबी लड़ाई करते हुए सेवा करने के बाद यहां आया हूं, तो इन दीवारों का खास अनुभव भी है, जिससे समझ पा रहा हूं कि कैसे मुझे भ्रष्ट तंत्र के साथ adjust करने वाला अधिकारी बनाने की बहुत ही चमत्कारिक कोशिश हो रही है कि यदि मेरे पास पुराना अनुभव न होता तो समझ ही नहीं पाता कि क्या हुआ और कैसे हो गया? इसलिए इन सब बातों को लिखकर whisteblowing का जोखिम सहर्ष लेने को तैयार हो गया।

शायद जब तक मैं समझ पाता, तब तक स्वंय दलदल में फंस जाता तो खुद की ही बुराई कैसे करता…. मतलब मैं भी इस भ्रष्ट तंत्र का एक हिस्सा हो जाता।

यकीन मानिए कि इन सेवाओं को join करने वाले अधिकतर लोग या कहें aspirants काफी अच्छी सोच और विजन के साथ आते हैं। तो उन्हें छद्म तौर पर बदलने वाली व्यवस्था को उजागर करके whisteblower का ही कार्य करने का प्रयास किया है। जिसमें मेरा नुकसान है, और इसी नुकसान के डर से दूसरे नहीं कर पाते हैं। जबकि शायद एक तो मेरे पास पुरानी सेवा का विकल्प है और दूसरा मेरी पिछली story मेरे साथ है, और तीसरा मुझे इन नुकसान से कम डर लगता है (पिछली सेवा में मात्र चार महीने में ही attack झेला था, जबकि पहले से ही आशंका थी और थोड़ा सा compromise… मतलब… बस नजर फेरनी थी भ्रष्टाचार से (ईमानदार रहते हुए नजर फेरने के लिए कोई रिश्वत न लेता या फिर सात आठ दिवस की छुट्टी लेने तक की पेशकश की गई थी.. मतलब ईमानदारी ही ईमानदारी)और मेरे ऊपर खतरा खत्म)। लेकिन मैं शायद सिर्फ ईमानदार नहीं हूं, वह छोटी सी चीज है। जबकि मैं संवैधानिक मूल्यों को संविधान बनाने वालों की मंशा के अपनाने एवं उनका अनुसरण करने के लिए हृदय से कटिबद्ध हूं। भले ही इसके लिए कुछ भी कुर्बानी क्यों न देनी पड़ें।

मतलब कोई तो चाहिए जो बता सके कि असली मुद्दा क्या है इस तकनीकी त्यागपत्र का (अनुरोध सहित)। क्योंकि जो गोलियों से नहीं डरा, क्या वह punishment posting से डरेगा? जबकि यह मात्र whistleblowing का एक बहुत ही छोटा सा बिंदु है, जिस पर ही सभी का ध्यान आकर्षित किया गया है। जबकि असली लक्ष्य…. पुनः–सरकारी सेवा में प्रवेश लेने वालों के लिए ऐसी व्यवस्था को सुनिश्चित कराना है, कि कोई भी भ्रष्ट व्यवस्था का भाग, धोखे में रहकर न बने, हालांकि यदि स्वेच्छा से भाग बनना चाहे तो बने।

इसके लिए पिछली पोस्ट में दिए गए दो पत्र और यहां पोस्ट किए गए पत्र को पढ़ना होगा…. लंबे पत्र हैं तो समय देना होगा… फिर चर्चा आरंभ की जाए इन पत्रों में उठते हुए बिंदुओं पर। मुझे तो बस विश्वास कायम रखना है आमजन का, जो भारतीय संविधान के प्रति अपनी ड्यूटी मानता हूं सरकारी नौकर होने के नाते।
इस चर्चा से मैं भी सीखूंगा। बाकी तो सब दिखावा ही होगा।

कुछ युद्ध जरूरी होते हैं! दोनों पक्ष हल्के हों, तब ही शांति होगी! इतिहास की एक अनिवार्य भिड़ंत

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आसमान लाल है। सायरन चीख रहे हैं। मिसाइलें रात को चीरती हुई इतिहास पर अपने हस्ताक्षर कर रही हैं।
और इसी शोर के बीच एक असहज सवाल सिर उठाता है; क्या हर युद्ध सिर्फ त्रासदी होता है? या कुछ युद्ध इतिहास की अनिवार्य सफाई भी करते हैं?
पश्चिम एशिया सुलग रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़राइल और ईरान, तीनों आमने-सामने खड़े हैं। यह सिर्फ हथियारों की लड़ाई नहीं है। यह अहंकारों की भिड़ंत है। यह विचारधाराओं का टकराव है। यह उन कहानियों का युद्ध है, जिन्हें हर पक्ष सच मानता है और बदलना नहीं चाहता।
वॉशिंगटन और तेल अवीव इसे अस्तित्व की लड़ाई बताते हैं। उनके लिए तेहरान सिर्फ एक देश नहीं, एक खतरा है, परमाणु महत्वाकांक्षाओं से लैस, और पूरे क्षेत्र में फैले अपने नेटवर्क के साथ। हिज़्बुल्लाह, हमास, यमन के हूती; हर मोर्चे पर तनाव, हर दिन एक नई चिंगारी।
उनकी नजर में यह युद्ध कोई विकल्प नहीं, मजबूरी है।
लेकिन तेहरान की कहानी अलग है।
वह खुद को घिरा हुआ देखता है। प्रतिबंधों से जकड़ा हुआ। सौदे टूटते हुए। वैज्ञानिक मारे जाते हुए। उसके लिए यह प्रतिरोध है; अपनी संप्रभुता, अपनी पहचान, अपने अस्तित्व की रक्षा।
दोनों कहानियाँ आधी सच हैं।
और आधी झूठ।
अमेरिका लोकतंत्र की बात करता है, लेकिन इतिहास उसके हस्तक्षेपों से भरा पड़ा है। इज़राइल अपने अस्तित्व का तर्क देता है, लेकिन उस पर अंतरराष्ट्रीय नियमों को तोड़ने के आरोप भी कम नहीं।
ईरान अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाता है, लेकिन अपने ही लोगों की आवाज दबाने में पीछे नहीं रहता। धर्म के नाम पर सत्ता का खेल: पुराना, पर अब भी असरदार।
तीनों चेहरे अलग हैं।
लेकिन आईना एक ही है।
और अब वह आईना दरक रहा है।
“रूल्स-बेस्ड ऑर्डर” की बातें खोखली लगने लगी हैं। नियम अब किताबों में नहीं, ताकत के तराजू पर तय हो रहे हैं। दूसरी तरफ, इस्लामी एकता का मिथक भी बिखर चुका है।
सऊदी अरब चुप है।
तुर्की अपने हिसाब से चाल चल रहा है।
पाकिस्तान संतुलन साध रहा है।
“उम्मा” का नारा हकीकत की दीवार से टकराकर लौट आया है।
हर देश अपने लिए खेल रहा है।
बाकी दुनिया?
वह देख रही है।
भारत अपने हित साध रहा है। बेवजह विपक्ष के महाज्ञानी भारत को युद्ध में धकेलना चाहते हैं, मोदी सरकार की किरकिरी करने को। लेकिन भारत की भलाई चुप्पी साधने में ही है। गली के गुंडे भिड़ रहे हों, तो समझदार लोग किनारा कर लेने में ही भलाई समझते हैं।
चीन मौके तलाश रहा है।
यूरोप बयान दे रहा है: संतुलित, सधे हुए, और लगभग बेअसर।
कोई इस आग में कूदना नहीं चाहता।
कोई इस युद्ध का मालिक बनना नहीं चाहता।
और शायद यहीं सबसे कड़वी सच्चाई छिपी है।
कुछ युद्ध बीच में रुकते नहीं।
उन्हें थकना पड़ता है।
उन्हें खुद को खत्म करना पड़ता है।
सीज़फायर अच्छे लगते हैं, लेकिन कई बार वे सिर्फ सांस लेने का मौका देते हैं, समाधान नहीं। जब जिद, विचारधारा और बदले की आग बहुत गहरी हो जाए, तो बातचीत भी सतही लगने लगती है।
तब बचता क्या है?
एक कठोर विकल्प: इंतज़ार।
यह कोई जश्न का आह्वान नहीं है।
यह यथार्थ की स्वीकारोक्ति है।
इतिहास बताता है; कई बार शांति समझौतों से नहीं, थकान से जन्म लेती है। जब गोलियां इसलिए रुकती हैं क्योंकि चलाने की ताकत नहीं बचती। जब अहंकार इसलिए झुकते हैं क्योंकि उन्हें उठाने वाला ढांचा टूट चुका होता है।
लेकिन इसकी कीमत बहुत भारी होती है।
आम लोग। उजड़े शहर। टूटी अर्थव्यवस्थाएँ। जली हुई धरती।
यह आग साफ-सुथरी नहीं होती।
यह सब कुछ जलाती है।
फिर भी, हर युद्ध एक आईना होता है।
वह दिखाता है कि ताकत की सीमा क्या है।
वह खोलता है कि नैतिकता कितनी लचीली होती है।
वह याद दिलाता है कि सबसे ऊँची आवाजें भी अंततः खामोश हो जाती हैं।
और जब धुआं छंटेगा: कभी न कभी, तो सिर्फ नक्शे नहीं बदलेंगे।
सच भी बदलेंगे।
शायद तब दुनिया थोड़ा समझदार होगी।
शायद तब शांति थोड़ी सच्ची होगी।
क्योंकि कभी-कभी, इंसान सीखता नहीं; उसे सिखाया जाता

भगवान् महावीर जन्मकल्याणक – संवत् २०८३

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इंदुशेखर तत्पुरुष

जयपुर : वे राजकुल में जन्मे थे, पर राज्य नहीं किया। कोई युद्ध उन्होंने नहीं जीते। न सेना बनाई। न पराक्रम दिखाया। न शक्ति प्रदर्शन किया। कोई चींटी तक उन्होंने नहीं मारी फिर भी “महावीर” कहलाए। है न अद्भुत बात!

वस्तुत: बाहरी शत्रुओं को परास्त करने से अधिक कठिन है भीतरी शत्रुओं को परास्त करना। क्रांति के लिए बाहरी व्यवस्थाओं से पहले स्वयं की व्यवस्था को बदलना पड़ता है। पहली क्रांति अपने आप में घटित करनी होती है तब जाकर समाज जीवन में क्रान्ति घटित होती है। स्वयं के आचरण, व्यवहार और शील में परिवर्तन लाए बिना समाज में परिवर्तन करने का स्वप्न देखना–दिखाना छल और पाखण्ड है। दुश्मनों को बाहर ही बाहर ढूँढने के चक्कर में हम भीतर छुपे बैठे दुश्मनों को देखना भूल जाते हैं। उनका ख्याल ही नहीं आता। हमारे “अरि” बाहर ही नहीं होते। हमारे भीतर भी रहकर उपद्रव मचाते हैं। काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, अभिमान… और भी न जाने कौन–कौन!
इनको पूर्णत: परास्त कर वह “महावीर” बना। आन्तरिक अरिगण का शमन कर वह “अरिहन्त” कहलाया। वासनाओं को जीत कर वह “जयी” कहलाया।

उत्तराध्यान सूत्र के नवें अध्याय की एक गाथा कहती है कि, युद्ध में हजारों–लाखों योद्धाओं को जीतने पर भी सर्वोत्तम विजय तब तक नहीं होती जब तक स्वयं को न जीत लिया जाए।
“जो सहस्सं सहस्साणं, संगामे दुज्जए जिणे।
एगं जिणेज्ज अप्पाणं, एस से परमो जओ।।”

भगवान् महावीर के दिखाए मार्ग पर चल कर कोटि–कोटि मनुष्यों ने मानव–मूल्यों की प्रतिष्ठा की। मनुष्य के आर्यत्व की रक्षा की। धर्म की जड़ सदा हरी रखी। अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अस्तेय, ब्रह्मचर्य जैसे जीवन मूल्यों को धर्म की कसौटी बनाया।

जैनाचार्यों ने “एकम् सद् विप्रा: बहुधा वदन्ति” जैसी लोकतांत्रिक वैदिकी अवधारणा को “अनेकान्तवाद” का सुन्दर स्वरूप प्रदान कर भारतीय चिंतन के मूल चरित्र को स्वर दिया। सत्य के अनुसंधान के सभी मार्गों को उन्होंने स्वीकृति प्रदान की। “सप्तभंगी न्याय” के नाम से प्रसिद्ध यह सिद्धांत दर्शन के क्षेत्र में एक विलक्षण घटना है। जैन दार्शनिकों की यह ऐसी बेजोड़ देन है कि विश्व का कोई विचार इसका कभी अतिक्रमण नहीं कर सका। जैन दर्शन का खंडन करते हुए वेदान्त, सांख्य, न्याय आदि के आचार्यों ने तर्क के आधार पर इसे असिद्ध करने के प्रयास किए, किन्तु इससे बच वे भी नहीं सके। व्यावहारिक जीवन में इस अटल सत्य से कोई नही बच सकता। क्योंकि जीवन “ही–वाद” से नहीं “भी–वाद” से चलता है। दार्शनिकों की एक ही सत्य के भिन्न रूपों को पारमार्थिक सत्ता और व्यावहारिक सत्ता के रूप मानने की विवशता अथवा अनिर्वाच्या माया के द्वारा जगत प्रपंच के मिथ्यात्व का निरूपण; अन्ततः यही सिद्ध करता है। संसारभर में ऐसा अकाट्य सिद्धान्त कहीं और नहीं।

जैन साहित्य का पहला सूत्रग्रंथ ईसा की दूसरी शताब्दी में लिखा गया। और यह जैन धर्म का पहला संस्कृत ग्रंथ भी था। इससे पूर्व का जैन साहित्य प्राकृत भाषा में रचा गया था। “मोक्षशास्त्र” के नाम से प्रसिद्ध यह ग्रंथ “तत्वार्थ सूत्र” के नाम से भी विख्यात है। इसके रचयिता के बारे में रोचक तथ्य यह है कि दिगम्बर इन्हें “उमा स्वामी” और श्वेताम्बर इन्हें “उमा स्वाति” के नाम से जानते हैं। दोनों ही संप्रदायों में इस ग्रंथ की बड़ी मान्यता है, दोनों ही मतों के आचार्यों ने इसकी टीकाएं लिखी। अनेक विलक्षण अर्थपूर्ण सूत्र इस ग्रंथ में है। उदाहरण के लिए भारतीय वाङ्मय के श्रेष्ठतम सूत्रों में से एक अतिप्रसिद्ध उक्ति –”परस्परोपग्रहो जीवानाम्” इसी ग्रंथ का सूत्र है।(अध्याय 5/ 21)

संसार में समरसता का भाव जगाने वाला तत्व तथा प्राणी विज्ञान की शाखा “इकोलॉजी” का सत्व उक्त सूत्र में देखा जा सकता है कि, “प्रत्येक जीव एक दूसरे का उपग्रह कर उसका उपकार करते हैं। सृष्टि के सम्पूर्ण प्राणि एक दूसरे पर निर्भर हैं।”

सत् /अस्तित्ववान् की परिभाषा करते हुए उमा स्वामी कहते हैं “उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्।” अर्थात् जिसमें उत्पत्ति, विनाश एवं स्थिति है, वह सत् है। उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय की ब्रह्मा, विष्णु, महेश के रूप में अंगीकृत पौराणिक मान्यता से इसकी समानता देखी जा सकती है। इसका भाव यही है कि प्रत्येक पदार्थ में यह तीनों अवस्थाएंँ एक साथ संपादित होती रहती हैं। संसार में उत्पत्ति, स्थिति और विनाश का कार्य निरंतर चलता रहता है।

जैन दर्शन का त्रिरत्न सिद्धांत बड़ा महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र ये तीन रत्न हैं, जो मनुष्य को मुक्ति प्रदान करते हैं। आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) कहते हैं– “सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः”

इस सिद्धांत के अनुसार अकेले दर्शन, अकेले ज्ञान, अकेले चरित्र अथवा इनमें से किन्हीं दो रत्नों के भरोसे मनुष्य का कल्याण संभव नहीं। तीनों मिलकर ही मनुष्य के मोक्षमार्ग को प्रशस्त करते हैं। यह बड़ी महत्वपूर्ण बात है कि मनुष्य का कल्याण न अकेला ज्ञान कर सकता है न अकेला कर्म; वह तो दोनों की सम्यक साधना से ही होता है।

उल्लेखनीय है कि यहाँ सम्यक् दर्शन में दर्शन शब्द का वह तात्पर्य नहीं जो हम फिलोसॉफी के अर्थ में लेते हैं। जैन मत में सम्यक् दर्शन है, वास्तविक तत्त्वों के प्रति श्रद्धा। तत्वों के सही अर्थ को समझकर उनके प्रति श्रद्धा भाव रखना ही सम्यक् दर्शन है।
“तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्”।

इसी का अग्रिम चरण दूसरा रत्न है सम्यक् ज्ञान तथा तीसरा, सम्यक् चरित्र अर्थात् श्रेष्ठ आचरण, उत्तम नैतिक व्यवहार। अभिप्राय है कि दर्शन से ज्ञान और ज्ञान के चरित्र तक की यात्रा के बिना जीवन का उन्नयन और उर्ध्वगमन संभव नहीं। इनके बिना मानव का अधोपतन ही होता है।

इधर कुछ वर्ष पूर्व जी–22 सम्मेलन के अवसर पर जब “इण्डिया” के स्थान पर “भारत” को प्रतिष्ठापित करने का प्रसंग आया और देशभर में भारत शब्द की चर्चा पुनः चल पड़ी तो मेरा ध्यान अकस्मात् इस ग्रन्थ की ओर गया। तत्वार्थसूत्र के तृतीय अध्याय में जम्बूद्वीप को एक लाख योजन विस्तार वाला बताते हुए इसके सात खण्डों का उल्लेख किया है, जो इस प्रकार हैं–
“भरत–हैमवत–हरि–विदेह–रम्यक–हैरण्यवत–ऐरावतवर्षा: क्षेत्राणि”।।१०।। (तृतीय अध्याय)

विशेष बात यह है कि यहांँ भारतखंड का जो परिमाप बताया गया है, उसके अनुसार भारतक्षेत्र कुल 526 योजन सहित 6÷19 योजन विस्तार वाला है। अर्थात् भरत क्षेत्र का दक्षिण से उत्तर तक विस्तार 526+ 6/19 (526.316) योजन है।
“भरत: षड्विंशतिपञ्चयोजनशतविस्तार: षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य”।।२४।। (तृतीय अ.)
भरत सहित जम्बूद्वीप के सातों खण्डों का परिमाप बताते हुए मुनिवर लिखते हैं कि,
“भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवातिशत भाग:” ।।३२।। (तृतीय अध्याय)
अर्थात् भारत क्षेत्र का विस्तार जम्बूद्वीप का 190वांँ भाग है। यहांँ शास्त्रकार की गणितीय परिशुद्धता भी परिलक्षित होती है कि 100000 में 190 का भाग देने पर परिमाण वही 526+ 6/19 (526.316) योजन आता है, जो पूर्व में उल्लिखित है। ध्यान देने की बात है कि विविध पुराणों में पाए जाने वाले भारत के भौगोलिक वर्णन से यह अत्यधिक साम्य रखता है। यह तथ्य विविध संप्रदायों की अपनी–अपनी मान्यताओं के बीच भारतीय ज्ञान–विज्ञान की परम्परा के सुसंवादी और अक्षुण्ण होने का भी द्योतक है।

उल्लेख्य है कि जैन परंपरा में भगवान महावीर स्वामी के जन्म दिवस को “जन्म कल्याणक” कहा जाता है। तीर्थंकरों के जीवन से संबंधित पाँच घटनाएँ विशेष शुभ–कल्याणकारी हैं जिन्हें पंच कल्याणक कहा गया है। ये जब भी घटित होती हैं तो समस्त जीवों का कल्याण होता हैं। ये पाँच घटनाएँ हैं–
(१). गर्भ कल्याणक–जब तीर्थंकर की आत्मा माता के गर्भ में आती है। (२). जन्म कल्याणक– तीर्थंकर का जन्म। (३). दीक्षा कल्याणक– तीर्थंकर द्वारा मुनि की दीक्षा। (४). केवलज्ञान कल्याणक– तीर्थंकर को ज्ञान की प्राप्ति। (५). निर्वाण कल्याणक– तीर्थंकर को मोक्ष प्राप्ति।

और अंत में चलते–चलते “उत्तराध्ययन सूत्र” में एक अर्थपूर्ण गाथा जो जीवन में सदैव धर्म को धारण किए रखने का उपदेश देती है–
“जहा सागडिओ जाणं समं हिच्चा महापहं।
विसमं मग्गमोइण्णो अक्खे भग्गम्मि सोयइ।।
एवं धम्मं विउक्कम्मं अहम्मं पडिवज्जिया।
बाले मच्चुमुहं पत्ते अक्खे भग्गे व सोयई।।”
[अध्याय 5 /14वीं–15वीं गाथा]
जैसे कोई मूर्ख गाड़ीवाला जानबूझकर अच्छे मार्ग को छोड़कर उबड़–खाबड़ रास्ते पर गाड़ी चलाता है और उसकी धुरी टूट जाने पर शोक करता है, वैसे ही मूर्ख मनुष्य धर्म का साथ छोड़, अधर्म का हाथ पकड़कर मृत्यु के मुख में चला आता है। और जीवन की धुरी टूट जाने पर शोक करता है।

धर्मावतार भगवान् महावीर स्वामी को बारम्बार प्रणाम।

गोष्ठी :सबको साथ लेकर चलने की भावना जरूरी: स्वांत रंजन

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लखनऊ। राष्ट्रधर्म के कार्यालय में आयोजित विशिष्ट गोष्ठी में नगर के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी उपस्थित हुए। गोष्ठी में यूजीसी के विवादित प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा की गयी। गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांत रंजन ने कहा कि इस मामले में जो सतर्कता की जानी चाहिए थी वह नहीं की गयी। इसको लेकर सतर्क रहने की जरूरत थी। उन्होंने कहा कि समाज में सबको साथ लेकर चलने की भावना जरूरी है। शिक्षण संस्थानों में दण्डात्मक नहीं, सुधारात्मक प्रावधान होने चाहिये। राष्ट्रधर्म के निदेशक मनोजकांत ने कहा कि जिस बहस से समाज की आत्मीयता प्रभावित हो उससे बचने की आवश्यकता है। केवल कानून बनाने से काम नहीं चलेगा। संवेदना होने की भी आवश्यकता है।

लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के डॉ. सौरभ मालवीय ने विषय पर चर्चा करते हुए अपनी बात विस्तार से रखी। राष्ट्रधर्म के प्रभारी निदेशक सर्वेश चन्द्र द्विवेदी ने यूजीसी के विवादास्पद संवैधानिक पक्षों को स्पष्टता से सबके सामने रखा। उन्होंने कहा कि समाज को जागरूक और संगठित करने की आवश्यकता है। यही बात देश के लिए हितकारी होगी।
अमित कुमार मल्ल ने कहा कि अलग-अलग वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों से समाज में मुश्किल बढ़ेगी। शोध छात्र आलोक त्रिपाठी ने कहा कि इससे यह संदेश गया है यह राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त निर्णय है। ओमप्रकाश, हरमेश चौहान, कुमार अशोक पांडेय, के.के. वत्स, संजय उपाध्याय, जयव्रत राय, राजीव द्विवेदी, सुनील अग्रवाल, डॉ. राजीव सागर ने भी अपने विचार व्यक्त किये।

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