माटी उवाच : मिट्टी की स्मृतियों से उठती आवाज़

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डॉ. कुमुद रामानंद बंसल

दिल्ली । कुछ पुस्तकें कहानियाँ सुनाती हैं, कुछ विचार प्रस्तुत करती हैं, और कुछ ऐसी होती हैं जो पाठक को उस संसार में ले जाती हैं जहाँ शब्दों से अधिक मौन बोलता है। माटी उवाच ऐसी ही एक पुस्तक है।

यह कहानी-संग्रह भारतीय आदिवासी जीवन के बाहरी चित्रों का नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक चेतना का साहित्यिक दस्तावेज़ है। यहाँ जंगल केवल वृक्षों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवित उपस्थिति है; नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि स्मृतियों और संबंधों की वाहक हैं; और मिट्टी केवल भूमि नहीं, बल्कि इतिहास, पहचान और अस्तित्व का आधार है।

इस संग्रह की बारह कहानियाँ भारत के विविध जनजातीय संसारों की यात्रा कराती हैं। रात की शेवाली प्रकृति और उपचार के संबंध को उद्घाटित करती है; दिमनगंगा की संध्या विकास और विस्थापन के प्रश्न उठाती है; छोटी चतुरी मानवीय करुणा और सहज विश्वास का उत्सव है। मिट्टी के ताल और पहचान के धागे स्मृति, समुदाय और सांस्कृतिक पहचान की पड़ताल करती हैं। नाच का दर्पण तथा धुआँ और ढोल आदिवासी उत्सवधर्मिता और सामूहिक जीवन की ऊर्जा को स्वर देते हैं। अमर पत्ता, सोयरी बाई की दीवार और रेत की चिट्ठी विरासत, स्त्री-अनुभव और समय की नश्वरता को स्पर्श करती हैं। जंगल की साँस और मोर की चाल प्रकृति, स्वाभिमान और आत्म-खोज की गहरी संवेदनाओं को सामने लाती हैं। इन सबके बीच उपसंहार पुस्तक की मूल चिंता को एक सूत्र में पिरो देता है—मनुष्य और धरती के रिश्ते की चिंता।

इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ आदिवासी पात्र किसी अध्ययन-वस्तु या रोमांचक लोक-कथा के पात्र नहीं बनते। वे अपनी पूरी गरिमा, संवेदना और आत्मसम्मान के साथ उपस्थित होते हैं। लेखक उनके लिए बोलने का दावा नहीं करता; वह उनके साथ बैठकर सुनने का प्रयास करता है। यही कारण है कि इन कहानियों में सहानुभूति नहीं, सहभागिता है; वर्णन नहीं, अनुभव है।

आज जब जंगलों को संसाधन, नदियों को जल-भंडार और मिट्टी को केवल भूमि मानने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, तब माटी उवाच हमें स्मरण कराती है कि प्रकृति के साथ मनुष्य का संबंध उपयोग का नहीं, संवाद का भी है। यह पुस्तक बार-बार हमें उस प्रश्न के सामने खड़ा करती है जिसे आधुनिक समाज लगभग भूल चुका है—क्या विकास और संवेदना साथ-साथ चल सकते हैं?

इन कहानियों का महत्व केवल साहित्यिक नहीं, सांस्कृतिक और नैतिक भी है। वे हमें याद दिलाती हैं कि भारत की आत्मा केवल महानगरों में नहीं बसती; वह उन जंगलों, पहाड़ियों और नदी-तटों में भी जीवित है जहाँ आज भी मनुष्य प्रकृति से संवाद करना जानता है।

माटी उवाच अंततः मिट्टी की आवाज़ सुनने का निमंत्रण है—उस मिट्टी की, जो बोलती कम है, पर याद बहुत कुछ दिलाती है। यह पुस्तक पाठक को केवल कथाएँ नहीं देती; वह उसे ठहरना, सुनना और पुनः स्मरण करना सिखाती है।

जब मिट्टी बोलती है, तो वह शोर नहीं करती—वह स्मरण कराती है।
जब जंगल बोलता है, तो वह उपदेश नहीं देता—वह संबंध रचता है।
और जब मनुष्य सुनना सीख जाता है, तब उसे पता चलता है कि धरती केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि जीवन की सबसे पुरानी गुरु है।

श्रीराम मंदिर में 200 करोड़ की लूट

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आचार्य श्रीहरि

दिल्ली । वरिष्ठ पत्रकार मनोज वर्मा के आँखो में आंसू थे, वे लगातार सिसक रहे थे, आँखों के आंसू रुकने के नाम नहीं ले रहे थे, वे मुझसे पूछते हैं कि आचार्य जी आपने यह क्या करा दिया,? क्या यही दिन देखना था? मै निशब्द हो गया, मेरी कठोरता भी बर्फ की तरह पिघल गई, मुझे अशोक सिंहल के फटे सिर से टपकते खून याद हो गए, मुझे उमा भारती के वे वाक्य भी याद हो गए जिसमें उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी को कहा था कि शर्म आपको आती होगी, मुझे तो बाबरी मस्जिद के ढांचे गिरने, ध्वस्त होने से गर्व की अनुभूति हो रही है।

पत्रकार संवेदनशील होता है, कोई संवेदनाहीन व्यक्ति सही पत्रकार हो ही नहीं सकता है, वह सिर्फ लुटेरा हो सकता है, पैरोकार हो सकता है। चूंकि मनोज वर्मा रामनदिर आंदोलन से न केवल साथ थे, बल्कि भगवान राम के प्रति उनका समर्पण रहा है, इसलिए उनका व्यथित होना अस्वाभाविक नहीं बल्कि स्वाभाविक है। मनोज वर्मा ही क्यों, बल्कि करोड़ों उन रामभक्तो की भावनाएं , बलिदान आहत हुई है,ब जिन्होंने राममंदिर आंदोलन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भूमिका निभाई थी, पुलिस की गोलिया खायी थी, मुस्लिम जिहादियों की हिंसा झेली थी, कांग्रेस राज का उत्पीड़न झेला था, मुलायम सिंह यादव राज की गोलियों के सामने अपने सीने तान कर खड़े थे। मै खुद राममंदिर आंदोलन का हिस्सा था, पुलिस की लाठिया खाई थी, बाबरी मस्जिद के ढांचे का विनाश देखा था, ईट पूजन आंदोलन में महीनों गांव गांव घुमा था। क्योंकि मै राममनोहर लोहिया का वैचारिक शिष्य था, राममनोहर लोहिया के आराध्य भी भगवान श्रीराम थे, राममनोहर लोहिया श्रीराम मेला लगाते थे और कहते थे कि भारत को जानना है तो भगवान राम को जानो, उनके आदर्श और महानता से जुड़ो। श्रीराम तीर्थ मंदिर ट्रस्ट में दान की राशि की लुट कितनी की है? दो सौ करोड़ पार तक लूट की बात आ रही है।

राममंदिर आंदोलन को पूर्ण तक पहुंचाने वाले विनय कटियार की भावनाओं का उल्लेख करना भी अति आवश्यक है। विनय कटियार की रामवाणी युवाओं का खून खोला देती थी, युवाओं को श्रीराम मंदिर के लिए मरने मिटने के लिए प्रेरित कर देती थी। श्रीराम मंदिर में दान और चढ़ावे में लूट, चोरी, डकैती पर दुखी होते हुए कहा कि जिस भगवान श्रीराम मंदिर के लिए कल्याण सिंह ने अपनी सत्ता त्याग दी थी और कहा था कि भगवान श्री राम के लिए एक तो क्या मै सौ सौ सत्ता का भी त्याग कर सकता हूं, कल्याण सिंह जी की आत्मा आज कितनी पीड़ा में होगी? सिर्फ कल्याण सिंह ही नहीं बल्कि उन कोठरी बंधुओं की आत्मा भी व्यथित होगी और अपने बलिदान पर पश्चाताप कर रही होगी। कोलकाता के कोठारी बंधु अपने माता पिता के दो ही बेटे थे, दोनों ने मुलायम सिंह यादव सरकार की गोलियों को डटकर सामना किया था, जिनकी शरीर छलनी हो गई थी, फिर भी अंतिम सांस तक हार नहीं मानी थी। उन सैकड़ों लोगों की आत्मा भी अशांत होगी जिन्होंने राममंदिर आंदोलन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष बलिदान किया था। विशेषकर उन हजारों साधु संतों की आत्माएं भी गुस्से में होगी जिन्होंने पुलिस के सामने दीवार बन गए थे और गोलियों से छलनी होने के बाद भी पुलिस से लड़े थे। अयोध्या की धरती साधु संतों और रामभक्तो के खून से लाल हो गई थी, मुलायम सिंह की सरकार ने हजारों साधु संतों के शवों को सरयू नदी में भी बहा दिया था। चूंकि साधु संत का जीवन परिवार मुक्त और पहचान विहीन होता है, इसलिए उनकी खोज खबर रखना, किसी के लिए संभव नहीं है।

भगवान श्रीराम मंदिर के दान और चढ़ावे के लुटेरे, चोर, डकैतों के कुछ नाम सामने आए हैं, इनकी पहचान उनकी अचानक बढ़ी हुई संपत्ति और रुतबे के आधार पर हुई है । दो नाम बहुत ही प्रचारित हो रहे हैं। एक नाम है, लवकुश मिश्रा का। लवकुश मिश्रा कभी कार मिस्त्री था, उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, किसी तरह उसका भाग्य चमक गया, भगवान श्रीराम मंदिर ट्रस्ट का कर्मचारी बन गया, कमर्चारी बनते ही उसका रुतबा भी चमक गया, उसकी संपति अचानक सातवें आसमान पर चढ़ गई, करोड़ो का मालिक बन गया, उसके पास कई प्लॉट, कई रिश्तेदारों के नाम संपतिया है, लवकुश मिश्रा के घर से गोबर के ढेर में छिपाये गए लाखों रुपए मिले हैं। एक अन्य है अनिल मिश्रा। अनिल मिश्रा भी करोड़ों का मालिक बन गया। टीनू यादव का प्रकरण और उदाहरण तो लोमहर्षक है और डकैत जैसा है, सबूत मिटाने जैसा है, टीनू यादव चंपत राय का निजी ड्राइवर था, फिर ट्रस्ट का कर्मचारी बन गया। इसकी संपति करोड़ो में है, इनकी तूती बोलती थी, क्योंकि ये चंपत राय का बेहद विश्वास पात्र था। टीनू यादव ने ही रामनदिर चढ़ावे और दान से संबंधित वीडियो डिलीट कराए हैं, कुल आठ महीने के वीडियो गायब मिले हैं, गायब वीडियो की रिकवरी भी संभव नहीं है, जहां तक टीनू यादव की अवैध संपत्ति की बात है तो फिर उसकी संपति करोड़ो में है, जिसके प्रमाण सार्वजनिक हो गए। बैंक अधिकारी भी मालो माल हो गए।

बोया पेड़ बबूल का तो आम कहा से होय? दान और चढ़ावे में लूट के पीछे नृपेन मिश्रा का हाथ बताया जा रहा है, नृपेन मिश्रा भगवान श्रीराम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष है, नृपेन मिश्रा ने कर्मचारियों की नियुक्ति और प्रबंधन में भूमिका निभाई है, नृपेन मिश्रा कौन है? नृपेन मिश्रा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मोहन भागवत के अति दुलारे और विश्वास पात्र हैं, मोहन भागवत के कहने पर मोदी ने इन्हें मंदिर निर्माण का सरगना बनाया था। इसलिए ट्रस्ट के प्रबंधन पर इनकी तूती बोलती है, इनकी सहमति के बिना मंदिर का कोई भी निर्णय और सुधार के कार्यक्रम तय नहीं हो सकते हैं। नृपेन मिश्रा क्या श्रीराम के भक्त थे, क्या ये हिंदुत्व के प्रति सहानुभूति रखते थे, समर्पण रखते थे? इसके उत्तर भी जानना अति आवश्यक है। कारसेवकों और साधु संतों पर गोलियां चलवाने के आरोपी और गुनाहगार नृपेन मिश्रा है। 1990 जब कारसेवकों और साधु संतों के खून की होली खेली गई थी, तब उसका आदेश देने वाले यही नृपेन मिश्रा थे। उस समय ये मुलायम सिंह यादव के प्रमुख सचिव थे, कल्याण सिंह ने इन्हें प्रमुख सचिव के पद से हटा दिया था। सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह सरकार में इनकी पहुंच और रुतबा बढ़ता चला गया, दिन दुगनी और रात चौगुनी इनकी प्रगति होती चली गई। पहले उर्वरक मंत्रालय में सचिव बने फिर दूरसंचार मंत्रालय के सचिव भी बने, ट्राई के हेड भी बना दिए, कांग्रेस के लिए इनकी एक मात्र योग्यता कारसेवकों पर गोलियां चलवाने की थी, संसद में एक बार अखिलेश यादव ने कहा था कि जिसने गोलियां चलवाई , जिसने आपके कारसेवकों की हत्याएं कराई, उसी को आपने भगवान राम के मंदिर निर्माण समिति का अध्यक्ष बनवा दिया। अरुण जेटली ने गुजरात भवन में मोदी और नृपेन मिश्रा की मुलाकात कराई थी। बाद की कहानी सभी को मालूम है। मोदी की कृपा नृपेन मिश्रा पर बरसती चली गई, सैया भय कोतवाल तो डर किस बात का।

संघ का प्रचारक मंद बुद्धि का नहीं होता है, संघ का प्रचारक तो अति विद्वान होता है, संघ का प्रचारक तो अति समझदार होता है,संघ का प्रचारक बईमान भी नहीं होता है, संघ का प्रचारक लोभ लालच से मुक्त होता है, संपति और परिवारिक मोह से भी दूर होता है। ये सभी भ्रम भी टूट गए, बेनकाब हो गए है। यह भी सर्विदित हो गया कि संघ का प्रचारक भी बईमान हो सकता है, झूठ बोल सकता है, सबूत मिटाने की करतूत को अंजाम दे सकता है, अपने नजदीकी की चोरी डकैती पर पर्दा डाल सकता है, पुलिस और कानून के हाथ लगने से बचा सकता है। इसका साक्षात उदाहरण चंपत राय है। चंपत राय श्रीराम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव है, उनकी नियुक्ति संघ के प्रचारक के तौर पर हुई है। चढ़ावे और दान की राशि की लुट, चोरी, डकैती की घटना सामने आने पर चंपत राय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर खुलेआम झूठ बोला और कहा कि दान और चढ़ावे की राशि में कोई लूट नहीं हुई है, कोई गबन नहीं हुआ है, कोई हेराफेरी नहीं हुई है, कोई वीडियो डिलीट नहीं हुई है, हमारे कर्मचारी सत्य निष्ठा के प्रतीक हैं , भगवान श्रीराम के विरोधियों ने झूठा आरोप लगाया है, हम उन सभी पर कानूनी कार्रवाई करेंगे जो अफवाह उड़ाई है। पर जैसे उनके चालक टीनू यादव का लूट में शामिल होने का प्रकरण सामने आया, लव कुश मिश्रा, अनिल मिश्रा की संपति का खुलासा हुआ, वैसे ही चंपत राय गायब हो गए, उनकी बोलती बंद हो गई, उनकी ईमानदारी से पर्दा और नकाब उठ गया। कहने का अर्थ है कि चंपत राय ने झूठ बोल कर संघ की छवि खराब कर दिया। अगर चंपत राय ने सच को स्वीकार कर लिया होता तो फिर संघ की छवि भी खराब होने से बच जाती, रामभक्तो मे चंपत राय खुद सत्य निष्ठा के प्रतीक बन जाते और नायक भी बन जाते।

साधु संत और पुजारी का स्वभाव प्रबंधन सरीखा हो ही नहीं सकता है, साधु संत अपने ध्यान और तपस्या में लीन रहते हैं, इसलिए वे दान और चढ़ावे में गबन को रोकने में सफल नहीं हो सकते हैं। इसलिए श्रीराम तीर्थ मंदिर ट्रस्ट में साधु संतों के अलावा समाज के संघर्षशील और निष्ठावान लोगों को शामिल किया जाना चाहिए,ट्रस्ट से एक जाति का नियंत्रण और वर्चस्व सामाजिक विद्रोह के लिए प्रेरित करता है। सामाजिक समीकरण बनना चाहिए। भगवान श्रीराम सिर्फ एक जाति के नहीं बल्कि सभी के आराध्य है। योगी आदित्यनाथ ईमानदार हैं , उन्होंने जांच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया है फिर भी बीजेपी उत्तर प्रदेश विधानसभा के भावी चुनाव को देखते हुए कोई जोखिम नहीं लेगी, चढ़ावे और दान चोरी में जो पकड़े जाएंगे , उनकी जातियां विद्रोह पर उतर आएंगी और बीजेपी योगी को हराने की कसम खाने लगेगी। सिर्फ एनआईए ही इस लूट के गुनहगारों की गर्दन नाप सकती है। एनआईए जांच से ही श्रीराम तीर्थ मंदिर ट्रस्ट, बीजेपी, संघ की छवि बचेगी।

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समाज में सकारात्मक और रचनात्मक बदलाव लाने में ज़ेन ज़ी का महत्वपूर्ण योगदान – सुनील आंबेकर जी

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पुणे। संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में नवी पेठ स्थित पुणे श्रमिक पत्रकार संघ की ओर से आयोजित विशेष वार्तालाप कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने कहा कि “देश की नई पीढ़ी यानी ‘ज़ेन ज़ी’ (Gen Z) को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) बेहद आशान्वित है। आज के युवा अपनी परंपराओं और भारत के गौरवशाली इतिहास से जुड़े हुए हैं। समाज में सकारात्मक और रचनात्मक बदलाव लाने में यह पीढ़ी बहुत बड़ा योगदान दे रही है”।
इस अवसर पर मंच पर पत्रकार संघ के अध्यक्ष ब्रिजमोहन पाटिल और महासचिव मंगेश फल्ले भी उपस्थित रहे। सुनील आंबेकर जी ने संघ के पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन), ‘ज़ेन ज़ी’, जनसंख्या असंतुलन और मुस्लिम समाज को लेकर संघ के दृष्टिकोण को साझा किया। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के आंदोलन से जुड़े प्रश्न पर कहा कि “भारत में सभी स्तरों पर लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव होते हैं। हमारी अदालतें, प्रशासन और मीडिया पूरी स्वतंत्रता के साथ अपना काम कर रहे हैं। ऐसे मजबूत लोकतंत्र में यदि कोई अपनी आवाज उठा रहा है, तो व्यवस्था में उसकी बात को सुनने और उचित संज्ञान लेने की क्षमता होनी चाहिए। इसलिए इस तरह के आंदोलनों से अचंभित या हैरान होने की कोई आवश्यकता नहीं है।”

आरएसएस के सभी वित्तीय व्यवहार केवल बैंकों के जरिए
संघ के पंजीकरण (रजिस्ट्रेशन) को लेकर कतिपय राजनेताओं द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम को सिरे से खारिज करते हुए उन्होंने कहा, “संघ के विधि-सम्मत अस्तित्व को लेकर कोई कानूनी विवाद है ही नहीं; केवल तुच्छ राजनीतिक लाभ के लिए कुछ तत्वों द्वारा दिग्भ्रमित करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्णतः विधि-सम्मत और मान्यता प्राप्त सामाजिक संगठन है। यही कारण है कि स्वतंत्रता के पश्चात समय-समय पर सभी सरकारों ने विभिन्न राष्ट्रीय आपदाओं और रचनात्मक कार्यों में संघ का सक्रिय सहयोग लिया है। संघ के पथ संचलन को प्रशासन द्वारा नियमानुसार अनुमति प्राप्त होती है, इतना ही नहीं, हमारी स्थानीय शाखाओं के नाम पर बैंकों में अधिकृत खाते संचालित हैं। संघ का समस्त आर्थिक व्यवहार पूर्णतः पारदर्शी है और केवल बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से ही होता है। संघ अपनी दैनिक शाखा पद्धति के माध्यम से प्रतिदिन समाज के प्रति प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी (जवाबदेह) रहता है।”

मुस्लिम समाज और संघ के अंतर्संबंधों पर कहा, “यह ऐतिहासिक सत्य है कि संघ की स्थापना से बहुत पहले से ही देश में अलगाववादी मानसिकता के कारण हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष विद्यमान रहा है। दुर्भाग्यवश, स्वतंत्रता पूर्व मुस्लिम समाज में यह विषैली धारणा विकसित की गई कि ‘पूजा पद्धति बदलने से राष्ट्र, पूर्वज और इतिहास बदल जाता है’, और इसी विभाजनकारी मानसिकता के कारण देश ने विभाजन का दंश झेला। हर्ष का विषय है कि अब स्वयं मुस्लिम समाज के भीतर से भी सामाजिक सुधारों के लिए सकारात्मक पहल प्रारंभ हुई है। भारतीय मुस्लिमों को अपनी प्रेरणाओं के लिए पाकिस्तान की ओर नहीं, बल्कि इंडोनेशिया के सांस्कृतिक आदर्श की ओर देखना चाहिए, जिसने इस्लाम अपनाने के बाद भी अपनी मूल हिन्दू सांस्कृतिक जड़ों को अक्षुण्ण रखा है।”
उन्होंने कहा, “वर्तमान में यूरोप और चीन जैसे देशों ने अपनी आत्मघाती जनसंख्या नीतियों के कारण अब ‘यू-टर्न’ ले लिया है। इसे देखते हुए भारत के संदर्भ में जनसांख्यिकीय संतुलन बनाए रखना राष्ट्र की सुरक्षा के लिए कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।”
वर्ष 1947 के दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन का स्मरण कराते हुए उन्होंने चेतावनी दी कि देश का बँटवारा भी ‘डेमोग्राफिक असंतुलन’ के कारण ही हुआ था। यदि भविष्य में पुनः किसी भूभाग में ऐसा असंतुलन पैदा हुआ, तो अखंड भारत की पहचान, सुरक्षा और सनातन संस्कृति को अक्षुण्ण रखना अत्यंत कठिन हो जाएगा। अतः भारतीय संस्कृति और राष्ट्रनिष्ठा को मानने वाले नागरिकों की बहुलता देश के प्रत्येक क्षेत्र और कोने में होनी अनिवार्य है।

अयोध्या राम मंदिर दान चोरी आरोप: न्यासियों के त्यागपत्र की मांग और नैतिकता का संकट

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अयोध्या :अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मंदिर में भक्तों के चढ़ावे और दान की राशि में कथित चोरी तथा गबन के आरोपों ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है। राम मंदिर का निर्माण लाखों स्वयंसेवकों और कारसेवकों की बलिदान की साधना का प्रतीक था, लेकिन अब दान-पेटियों से करोड़ों रुपये गायब होने के दावों ने आस्था पर गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। इस प्रकरण में ट्रस्ट के न्यासियों और पदाधिकारियों पर नैतिक जिम्मेदारी का बोझ बढ़ गया है, जिनसे त्यागपत्र की मांग जोर पकड़ रही है।
विवाद की शुरुआत इस माह की शुरुआत में हुई जब समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि राम मंदिर में भक्तों द्वारा दिए गए करोड़ों रुपये का गबन हुआ है। पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिंह ने गंभीर खुलासा किया। उन्होंने दावा किया कि दान गिनने की प्रक्रिया में अनियमितताएं लंबे समय से चल रही थीं। उन्होंने चंपत राय और अन्य ट्रस्ट सदस्यों को सूचित किया था, लेकिन शिकायत के अगले दिन उन्हें पद से हटा दिया गया। महिपाल सिंह ने सीसीटीवी फुटेज डिलीट होने और सोने-चांदी-हीरे जैसी संपत्तियों में गड़बड़ी का भी आरोप लगाया।
ट्रस्ट के मुख्य पदाधिकारी और आरोप
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय इस पूरे प्रकरण में घेरे गए हैं। आरोप है कि 7 जून को कथित चोरी की घटना के बाद उन्होंने अन्य न्यासियों को सूचना नहीं दी। ट्रस्ट सदस्य डॉ. अनिल मिश्रा और परिसर प्रशासक गोपाल राव की भूमिका भी जांच के दायरे में है। विनय कटियार जैसे राम जन्मभूमि आंदोलन के नेता ने खुलकर कहा कि ‘सब चोर हैं’ और ट्रस्टियों की संलिप्तता की आशंका जताई।
ट्रस्ट में कुल 15 सदस्य हैं। स्थायी सदस्यों में महंत नृत्य गोपाल दास (अध्यक्ष), चंपत राय (महासचिव) आदि प्रमुख हैं। जांच में कर्मचारियों के नाम सामने आए हैं, जिनमें लवकुश मिश्रा (दान गिनने वाला कर्मचारी), रामशंकर उर्फ टिन्नू यादव (चंपत राय के करीबी, पूर्व ऑटो ड्राइवर), उनके भतीजे मनीष यादव, अनुकल्प मिश्रा, राजेश पाठक, केडी तिवारी, करुण और ऋतिक सिंह शामिल हैं। इनमें से कई के पास  18-20 हजार रुपये मासिक वेतन के बावजूद करोड़ों की संपत्ति, लग्जरी कारें, आईफोन और जमीनें पाई गई हैं।
जांच और बरामदगी
उत्तर प्रदेश सरकार ने ट्रस्ट के अनुरोध पर तीन सदस्यीय SIT गठित की, जिसमें लखनऊ मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, आईजी किरण एस और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन शामिल हैं। SIT ने अयोध्या पहुंचकर दस्तावेज खंगाले। लवकुश मिश्रा की गिरफ्तारी हुई और उनके घर से लगभग 10 लाख रुपये बरामद किए गए-कुछ अलमारी में, कुछ गोबर के ढेर में छिपाए गए। कुल मिलाकर 2 करोड़ रुपये नकद, सोना, कार और आईफोन जैसी वस्तुएं बरामद हुई हैं। करीब 50 कर्मचारी जांच के दायरे में हैं। ट्रस्ट का दावा है कि 11 माह में 82.78 करोड़ रुपये दान प्राप्त हुए और ऑडिट में कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं मिली, लेकिन विपक्ष और जनता इसे पर्याप्त नहीं मान रही।
न्यासियों के त्यागपत्र पर केंद्रित बहस
इस प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू न्यासियों की नैतिक जिम्मेदारी है। विपक्षी नेता, पूर्व सांसद और स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि जांच पूरी होने तक चंपत राय, डॉ. अनिल मिश्रा समेत सभी संदिग्ध न्यासी और पदाधिकारी त्यागपत्र दे दें। महिपाल सिंह ने नाम लेकर कुछ ट्रस्टियों पर आरोप लगाए हैं। पवन पांडे और अवधेश प्रसाद जैसों ने कहा कि नैतिकता का रंच मात्र भी बचा हो तो पद छोड़ दें।
आरएसएस और हिंदू संगठनों के लिए यह बेहद चिंताजनक है। राम मंदिर आंदोलन में हजारों कारसेवकों ने प्राणों की आहुति दी। लाखों स्वयंसेवकों ने वर्षों साधना की। आज जब दान चोरी के आरोप लग रहे हैं, तो पदों पर बने रहना शर्मनाक माना जा रहा है। विनय कटियार ने कहा कि कल्यान सिंह जैसे लोग पद छोड़ देते थे; ऐसे लोग ट्रस्ट में जगह नहीं रख सकते।
नैतिक साहस की कमी?
सवाल उठ रहा है कि इतने गंभीर आरोपों के बीच न्यासी क्यों चुप हैं? चंपत राय बीमार पड़ गए, अनिल मिश्रा केरल चले गए-यह बचाव की रणनीति लग रही है। ट्रस्ट ने SIT मांगी है, जो सकारात्मक है, लेकिन स्वयं त्यागपत्र देकर जांच को निष्पक्षता का संदेश क्यों नहीं देते? जांच पूरी होने तक पद छोड़ना नैतिक कर्तव्य है। जिन्होंने चोरी की, वे पकड़े जाएंगे, लेकिन न्यास के सदस्यों में नैतिकता बची भी है या नहीं, यह बड़ी परीक्षा है।
राम मंदिर केवल ईंट-गारे का ढांचा नहीं, आस्था का प्रतीक है। यदि दान की एक-एक पाई का हिसाब साफ नहीं, तो करोड़ों भक्तों का विश्वास डांवाडोल हो जाएगा। SIT की रिपोर्ट 15 दिनों में आनी है। उसमें दोषी पाए गए किसी भी स्तर के व्यक्ति पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही, ट्रस्ट को पारदर्शिता बढ़ानी होगी-दान की राशि, व्यय और ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक की जाएं।
यह प्रकरण RSS की शताब्दी साधना को धत्ता बता रहा है। यदि न्यासी नैतिक साहस दिखाकर त्यागपत्र देते हैं, तो यह आंदोलन की पवित्रता बचाने का कार्य होगा। अन्यथा, आस्था के इस महान मंदिर पर हमेशा सवालिया निशान लग जाएगा। जांच सत्य उजागर करे और दोषियों को सजा मिले-यही भक्तों की अपेक्षा है।
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