नैरेटिव वॉर : हिंदुत्व पर वैश्विक प्रहार और सभ्यतागत विखंडन का राजनीतिक चक्रव्यूह

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

मुंबई : समकालीन भारतीय विमर्श में ‘हिंदुत्व’ की परिभाषा, ‘नागरिक समाज’ (सिविल सोसाइटी) की सक्रियता और विपक्षी राजनीति के अंतर्निहित उद्देश्य एक अत्यंत तीव्र वैचारिक और रणनीतिक युद्ध (नैरेटिव वॉर) के केंद्र में हैं। आज आधुनिक प्रगतिशीलता, मानवाधिकारों और धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलरिस्म) के मुखौटे के पीछे भारत की मूल सांस्कृतिक पहचान पर एक संगठित और गहरा प्रहार किया जा रहा है। राहुल गांधी की राजनीतिक लाइन, उनके विदेशी दौरों पर दिए गए बयान और ‘सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस’ (सीजेपी), कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) जैसे स्वयंसेवी संगठनों (एनजीओ) व अन्‍य की कानूनी व सामाजिक गतिविधियों को आप गहराई से देखें, आपको समझ आ जाएगा कि आखिर चल क्‍या रहा है?

वस्‍तुत: इन गतिविधियों का वास्तविक और दूरगामी प्रभाव उस सनातन चेतना को लांछित और कमजोर करना है, जो भारतवर्ष के अस्तित्व की अनिवार्य और बुनियादी शर्त है। इसके लिए इसके प्रयास हैं कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व का कृत्रिम विभाजन और इसके माध्यम से वैश्विक स्तर पर ‘हिंदूफोबिया’ को बौद्धिक मान्यता दिलाना। सीजेपी और तीस्ता सीतलवाड़ का न्यायिक तंत्र में हस्तक्षेप इसका पुख्‍ता प्रमाण है।वहीं सड़क पर आन्‍दोलन की कॉल, सभी कुछ अस्‍थ‍िर कर देने की सनक कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) इसका दूसरा बड़ा साक्ष्‍य है। सेलेक्टिव एक्टिविज्‍म के जरिए भारत की आंतरिक स्थिरता को भंग करने के इनके प्रयास जारी हैं।

इसके साथ ही विदेशी फंडिंग नियमों (एफसीआरए) का उल्लंघन करना। जातिगत विखंडन (कास्ट फ्रैक्चरिंग) और ‘जितनी आबादी, उतना हक’ के माध्यम से बहुसंख्यक समाज को टुकड़ों में बांटने की आत्मघाती राजनीति के अलावा राहुल गांधी के ‘अभय मुद्रा’ भाषण और संसद की बहसों को अपने लिए हथियार बनाना।(सिविलाइजेशनल डीएनए पर प्रहार, जिसके बिना भारत भौगोलिक रूप से भले ही एक जमीन का टुकड़ा बना रहे, लेकिन अपने स्वभाव के अनुरूप ‘भारत’ नहीं रह जाएगा के रूप में आज इनके तमाम होते हुए प्रयासों को प्रत्‍यक्ष रूप से देखा और समझा जा सकता है।

हिंदुत्व और हिंदू धर्म का कृत्रिम विभाजन – वैश्विक मंचों से सांस्कृतिक पहचान पर चोट

राहुल गांधी और वाम-उदारवादी विचारकों द्वारा आज किया क्‍या जा रहा है? यह ‘हिंदू धर्म’ और ‘हिंदुत्व’ के बीच एक बनावटी अंतर और विभाजन पैदा करने की निरंतर कोशिश कर रहे हैं, जबकि “हिंदुत्व कोई संकीर्ण मजहबी कट्टरता नहीं है। यह इस भूमि का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। यह वह सूत्र है जोकि हिमालय से कन्याकुमारी तक विभिन्न विविधताओं को एक धागे में पिरोता है।”

वस्‍तुत: जब राहुल गांधी विदेशी मंचों, जैसे कैंब्रिज यूनिवर्सिटी, ऑक्सफोर्ड या अमेरिका के नेशनल प्रेस क्लब और विभिन्न थिंक-टैंकों के सामने यह बयान देते हैं कि “हिंदुत्व एक हिंसक विचारधारा है, जिसका हिंदू धर्म की उदारता से कोई लेना-देना नहीं है,” तो वे एक राजनीतिक दल (भाजपा या आरएसएस) पर निशाना नहीं साध रहे होते हैं। वे परोक्ष रूप से पूरी दुनिया के सामने भारत के हिन्‍दू बहुसंख्यक समाज की रक्षात्मक और सांस्कृतिक पहचान को एक हिंसक और एकाधिकारवादी स्वरूप में प्रस्तुत कर रहे होते हैं।

कैंब्रिज और अमेरिका में कई स्‍थानों पर राहुल गांधी ने भारत के भीतर लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन की बात कही और हिंदुत्व की तुलना मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे चरमपंथी संगठनों से करने की चेष्टा की। अब स्‍वभाविक है कि जब देश का एक प्रमुख विपक्षी नेता, जो प्रधानमंत्री पद का दावेदार हो, विदेशी धरती पर जाकर अपनी ही संस्कृति की रक्षात्मक अभिव्यक्ति (हिंदुत्व) को लांछित करता है, तो इससे पश्चिमी मीडिया (जैसे द न्यूयॉर्क टाइम्स, द गार्डियन) और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार निकायों को भारत के खिलाफ एक नकारात्मक नैरेटिव (एंटी-इंडिया नैरेटिव) बनाने का बौद्धिक हथियार मिल जाता है।

इससे हिंदूफोबिया केंद्र में आता है। इस विभाजन का सीधा परिणाम वैश्विक स्तर पर रह रहे हिंदू प्रवासियों (डायस्पोरा) पर पड़ता है। अकादमिक संस्थानों में यह एक प्रगतिशील विचार के रूप में स्थापित किया जाने लगा कि हिंदू प्रतीक, त्योहार और परंपराएं तो रूढ़िवादी और दमनकारी हैं। सर्वत्र यह घोषित कर दिया जा रहा है।

सीजेपी, आप जैसे संगठनों की चयनात्मक सक्रियता

‘सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस’ (सीजेपी), कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी), आम आदमी पार्टी जैसे संगठन, राजनीतिक दल वास्‍तव में एक खास वैचारिक लॉबी का हिस्सा हैं जिसका उद्देश्य चयनात्मक सक्रियता के माध्यम से भारत की न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था को लगातार पंगु बनाना है। पिछले बार के जंतर-मं‍तर प्रदर्शनों में हमने देखा भी कि कैसे यह पूरे प्रशासनिक सिस्‍टम को गाली दे रहे थे। पीएम मोदी के लिए कितनी अधिक अभद्र भाषा का इन्‍होंने उपयोग किया!

गुजरात दंगे (2002) के बाद सीजेपी और उसकी सचिव तीस्ता सीतलवाड़ ने कानूनी को अपना हथियार बनाते हुए एक झूठ मोदी सरकार के खिलाफ खड़ा किया, देश भर में मोदी विरोध और भाजपा विरोध का माहौल तैयार करने का प्रयास हुआ लेकिन समय के साथ, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया और जांच एजेंसियों के सामने जो तथ्य आए, उन्होंने इस संगठन के इरादों पर गंभीर प्रश्‍न खड़े किए। जकिया जाफरी मामले में फैसला सुनाते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने तीस्ता सीतलवाड़ और उनके संगठन की गतिविधियों पर अत्यंत तल्ख टिप्पणी की।

न्‍यायालय ने कहा कि “कुछ लोग इस मामले को सिर्फ अपने स्वार्थ और गुप्त एजेंडे के लिए पिछले 16 वर्षों से सुलगाए रखना चाहते थे।” झूठे हलफनामे (फॉल्स एफिडेविट्स) तैयार किए गए और गवाहों को पहले से रटा-रटाया बयान देने के लिए प्रभावित किया गया। कई मामलों में यह सामने आया कि सीजेपी ने अनपढ़ या डरे हुए पीड़ितों से अंग्रेजी में लिखे हुए हलफनामों पर हस्ताक्षर करवा लिए, जिनके बारे में उन पीड़ितों को पूरी जानकारी भी नहीं थी।

इसे अदालत ने न्याय की प्रक्रिया के साथ खिलवाड़ माना। यानी कि कानून का आधार लेकर ही झूठे नैरेटिव के साथ केंद्र की मोदी सरकार की छवि खराब करने का प्रयास हुआ! अब ये अलग बात है कि कोर्ट ने सही मंशा पहचान ली और अपना निर्णय उस तरीके से नहीं दिया जैसा कि सीजेपी की सचिव तीस्ता सीतलवाड़ और उनसे जुड़े अन्‍य साथी चाहते थे।

विदेशी फंडिंग (एफसीआरए) का उल्लंघन

इसी तरह से भारत में सक्रिय कई मानवाधिकार संगठनों का वास्तविक एजेंडा विदेशी धन के बल पर देश की आंतरिक सुरक्षा और आर्थिक विकास को बाधित करना है। इस संदर्भ में सरकारी जांच समितियों और गृह मंत्रालय (एमएचए) की रिपोर्ट अत्यंत चौंकाने वाले तथ्य प्रस्तुत करती हैं।

वस्‍तुत: गृह मंत्रालय की जांच में पाया गया कि तीस्ता सीतलवाड़ से जुड़े संगठनों (सबरंग ट्रस्ट और सीजेपी) ने एफसीआरए नियमों का गंभीर उल्लंघन किया। विदेशी स्रोतों (जैसे फोर्ड फाउंडेशन) से मिले धन का उपयोग उस कार्य के लिए नहीं किया गया जिसके लिए अनुमति ली गई थी। पीड़ितों के नाम पर आए विदेशी धन को व्यक्तिगत खातों में स्थानांतरित किया गया और उसका उपयोग ऐसी पत्रिकाओं और अभियानों को चलाने में किया गया जो सीधे तौर पर बहुसंख्यक हिन्‍दू समाज और सुरक्षा बलों के विरोध में नैरेटिव बनाते हैं।

खुफिया ब्यूरो (आईबी) की एक पूर्व रिपोर्ट में यह साफ कहा गया था कि भारत में कुछ एनजीओ विदेशी ताकतों के इशारे पर भारत की बड़ी विकास परियोजनाओं (जैसे कुडनकुलम परमाणु संयंत्र, कोयला खदानें और बड़े बांध) के खिलाफ जनभावनाओं को भड़काते हैं। ‘सीजेपी’ जैसे संगठन भी इसी बड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का हिस्सा हैं, जो भारत को आर्थिक और सामाजिक रूप से अस्थिर देखना चाहता है।

ऑक्सफैम इंडिया पर विदेशी फंड को अन्य संस्थाओं में डायवर्ट करने और भारत के आर्थिक व सामाजिक विकास को प्रभावित करने वाले एजेंडे चलाने के आरोप लगे हैं। वहीं, देश के प्रमुख थिंक जैसा कि वह अपने आप को कहते हैं, टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले राजीव गांधी फाउंडेशन (आरजीएफ) व राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट के लाइसेंस भी नियमों के उल्लंघन, कर चोरी और चीनी संस्थाओं से संदिग्ध फंडिंग प्राप्त करने के आरोपों में रद्द किए गए।

पर्यावरण के क्षेत्र में सक्रिय लाइफ (Legal Initiative for Forest and Environment) जैसे संगठनों पर विदेशी पैसे के जरिए भारत के कोयला प्रोजेक्ट्स को कानूनी रूप से बाधित करना पाया गया, जबकि कॉमन कॉज (Common Cause) और पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन नेशनल कमिटी जैसी संस्थाओं पर विदेशी फंड का इस्तेमाल न्‍यायालयों में मुकदमेबाजी प्रायोजित कर सरकारी नीतियों को रोकने के लिए करना पाया गया है।

इसके अतिरिक्त, गृह मंत्रालय ने वर्ल्ड विजन इंडिया (World Vision India) और कंपैशन इंटरनेशनल से जुड़े दर्जनों मिशनरी संगठनों के लाइसेंस भी निरस्त किए हैं, जिन पर विदेशी सहायता की आड़ में संवेदनशील सीमावर्ती और जनजाति इलाकों में अवैध धर्मांतरण (कन्‍वर्जन) गतिविधियों को बढ़ावा देने और देश के सामाजिक ताने-बाने को अस्थिर करने के गंभीर आरोप हैं।

यही कारण रहे जोकि भारत सरकार के गृह मंत्रालय (एमएसए) द्वारा पिछले कुछ वर्षों में विदेशी अंशदान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) के नियमों को अत्यधिक कड़ा किया। पिछले एक दशक में एफसीआरए के नियमों का उल्लंघन करने, विदेशी धन का दुरुपयोग करने और कर चोरी (टैक्स चोरी) में शामिल पाए जाने के कारण 20,000 से अधिक गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के एफसीआरए लाइसेंस निरस्त किए जा चुके हैं। सीबीआई (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) द्वारा दर्ज की गई प्राथमिकियों (एफआईआर) के अनुसार, कई संगठनों ने विदेशी धन को प्राप्त करने के लिए परामर्श शुल्क (कंसल्टेंसी फीस) के नाम पर भी वित्तीय हेरफेर की थी, जो एफसीआरए कानून की मूल भावना के विरुद्ध था।

इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की गुप्त रिपोर्ट – देश के विकास को रोकने का एनजीओ मॉडल

भारतीय सुरक्षा तंत्र और आर्थिक रणनीतिकारों के लिए वर्ष 2014 में इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) द्वारा सरकार को सौंपी गई एक आंतरिक रिपोर्ट अत्यंत निर्णायक सिद्ध हुई थी। इस रिपोर्ट का शीर्षक था- “भारत के आर्थिक विकास को प्रभावित करने वाले विदेशी वित्त पोषित एनजीओ की भूमिका।” इस रिपोर्ट के मुख्य अंशों और निष्कर्षों पर आलोचक आज भी विपक्ष और सीजेपी (सीजेपी) जैसे संगठनों को कटघरे में खड़ा करते हैं।

आईबी की रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और विशिष्ट आंकड़े कहते हैं कि विदेशी ताकतों द्वारा पोषित एनजीओ नेटवर्क के कारण भारत की वार्षिक जीडीपी वृद्धि दर में लगभग 2 से 3 प्रतिशत का भारी नुकसान हो रहा है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पर्यावरण, मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर खड़े किए जाने वाले विरोध प्रदर्शनों का एक बहुत बड़ा हिस्सा पूरी तरह प्रायोजित (स्पॉन्सर्ड) था। इनका मुख्य उद्देश्य भारत की बड़ी अवसंरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) परियोजनाओं जैसे कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र, उड़ीसा के पोस्को स्टील प्रोजेक्ट, छत्तीसगढ़ के कोयला ब्लॉक और नर्मदा घाटी परियोजना को कानूनी मुकदमों और स्थानीय आंदोलनों के माध्यम से अनिश्चित काल के लिए लटकाना था।

राहुल गांधी की ‘अभय मुद्रा’ भाषण और संसद की अन्य बहस क्‍या कहती हैं ?

भारतीय संसद (लोकसभा) के भीतर राहुल गांधी द्वारा नेता प्रतिपक्ष के रूप में दिया गया भाषण वैचारिक मोर्चे पर एक बड़ा टर्निंग पॉइंट माना गया है। उन्होंने भगवान शिव की तस्वीर और ‘अभय मुद्रा’ का प्रदर्शन करते हुए यहां तक कह दिया, “जो खुद को हिंदू कहते हैं, वे चौबीसों घंटे हिंसा करते हैं”। अब इसके क्‍या मायने निकाले जाएं ? आप स्‍वयं ही विचार करें। स्‍वभाविक तौर पर देश के इतने बड़े मंच से सामूहिक रूप से ‘हिंदू’ शब्द का उपयोग करते हुए उसे ‘हिंसा और नफ़रत’ से जोड़ना एक सोची-समझी मनोवैज्ञानिक रणनीति का हिस्सा ही है। यहां भगवान शिव की अभय मुद्रा के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि भारत का पारंपरिक बहुसंख्यक समाज स्वभाव से हिंसक हो चुका है।

संसद की अन्य प्रमुख बहसें

संसद के भीतर जब-जब राष्ट्रीय सुरक्षा, राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 की समाप्ति या नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) पर बहस हुई है, तब भी राहुल गांधी और कांग्रेस का रुख नकारात्‍मक ही रहा है। जब कश्मीर से 370 हटाने का ऐतिहासिक निर्णय हुआ, तब विपक्ष के कुछ नेताओं के बयानों को पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) में भारत के खिलाफ ढाल बनाया। स्‍वभाविक है, जब घरेलू राजनीति का स्तर इतना गिर जाए कि आपके बयान देश के दुश्मनों के काम आने लगें, तो वह राजनीति देश को बर्बादी की ओर ही ले जाती है।

संसद में जब सीएए विधेयक प्रस्तुत किया गया, तब विपक्ष ने इसे ‘मुस्लिम विरोधी’ और ‘संविधान विरोधी’ घोषित कर दिया। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों (हिंदू, सिख, बौद्ध) को नागरिकता देने वाले इस मानवीय कानून के खिलाफ संसद के भीतर और बाहर जो हिंसक माहौल (जैसे शाहीन बाग और दिल्ली के दंगे) बनाया गया, उसे विपक्ष के शीर्ष नेताओं का परोक्ष समर्थन प्राप्त था।

इसी तरह से जब भारतीय सेना ने सीमा पार जाकर आतंकवादियों के अड्डों को नष्ट किया, तब संसद के भीतर और सार्वजनिक मंचों पर राहुल गांधी और विपक्ष के कुछ नेताओं द्वारा “खून की दलाली” जैसे शब्दों का उपयोग किया गया और सेना से ‘सबूत’ मांगे गए। वस्‍तुत: यदि कोई राजनीतिक दल अपनी ही सेना के पराक्रम पर सवाल उठाने लगे, तो वह राष्ट्र के मनोबल को बर्बादी की ओर ले जाने का कार्य करता है।

जातिगत विखंडन और तुष्टिकरण : समाज को भीतर से खोखला करने की राजनीति

यदि किसी राष्ट्र को बिना युद्ध के पराजित करना हो, तो उसके बहुसंख्यक समाज को भीतर से इतने टुकड़ों में बांट दो कि उनकी सामूहिक राष्ट्रीय चेतना ही समाप्त हो जाए। राहुल गांधी की हालिया राजनीति, जैसे निरंतर जातिगत जनगणना (कास्ट सेन्सस) की मांग और “जितनी आबादी, उतना हक” का नारा, वस्‍तुत: इसी रणनीति का हिस्सा है।

डॉ. बी.आर. आंबेडकर कहा करते थे कि “राष्ट्र सिर्फ एक भौगोलिक इकाई नहीं है, यह एक भावनात्मक एकता है। यदि आप समाज को जातियों के अंतहीन संघर्ष में झोंक देंगे, तो राष्ट्र की आंतरिक संप्रभुता ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी।” जबकि राहुल गांधी का जातिगत कार्ड असल में उस ‘सनातनी एकजुटता’ को तोड़ने का प्रयास है जोकि पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रवाद की छतरी के नीचे एकजुट हैं। जब एक सामान्य हिंदू खुद को भारतीय या हिंदू मानने के बजाय केवल अपनी उप-जाति के चश्मे से देखने लगेगा, तो देश में सामाजिक गृहयुद्ध (सोशल अनरेस्ट) जैसी स्थितियां उत्पन्न होंगी ही, इसलिए राहुल गांधी इन दिनों इस कार्य को मुख्‍य केंद्र में लेकर चल रहे हैं!

अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का दोहरा मापदंड

एक तरफ जहां हिंदू समाज को जातियों में बांटने की बात की जा रही है, दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समाज (विशेषकर मुस्लिम समुदाय) को एक मुश्त ‘वोट बैंक’ के रूप में सहेजने के लिए उनके तुष्टिकरण की नीतियां अपनाई जाती हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक सुधार से जुड़े ऐतिहासिक कानूनों] जैसे नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), तीन तलाक उन्मूलन और वक्फ बोर्ड संशोधन विधेयक, एफसीआरए का संसद से लेकर सड़क तक तीखा और हिंसक विरोध करना इसी राजनीति का परिचायक है।

पश्चिमी विश्वविद्यालयों में ‘डीकलोनाइजेशन’ विमर्श और भारत विरोधी इकोसिस्टम

इन सभी घटनाओं के अलावा आज आपको यह भी बताना आवश्‍यक है कि आज के समय में भारत के विरुद्ध लड़ा जा रहा युद्ध अकेले सीमाओं पर या संसद में ही नहीं लगा जा रहा है, यह वैश्विक विश्वविद्यालयों (हॉवर्ड, ऑक्सफोर्ड, स्टैनफोर्ड) के कमरों में भी लड़ा जा रहा है। इसे अकादमिक विमर्श में ‘उपनिवेशवाद से मुक्ति’ (डीकलोनाइजेशन) या ‘वोक कल्चर’ (Woke Culture) कहा जा रहा है।

पश्चिमी थिंक-टैंक और अकादमिक लॉबी भारत के विकास और उसकी बढ़ती वैश्विक आर्थिक शक्ति से घबराए हुए हैं। वे भारत को रोकने के लिए उसकी सांस्कृतिक जड़ों पर प्रहार कर रहे हैं। इसके लिए वे दोनों ‘सीजेपी’ जैसे भारतीय मूल के एनजीओ, आन्‍दोलन जीवियों और राहुल गांधी जैसे नेताओं के बयानों को प्रामाणिक स्रोत (अथॉरिटी) के रूप में उद्धृत करते हैं।

वस्‍तुत: जब हार्वर्ड में कोई शोध पत्र लिखा जाता है कि “भारत में लोकतंत्र समाप्त हो रहा है और वहां का बहुसंख्यक समाज का मूल चरित्र बदल रहा है,” तो उसके संदर्भ (रेफरेंस) में राहुल गांधी के कैंब्रिज के भाषण और तीस्ता सीतलवाड़ की संस्था जैसी स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं द्वारा जारी किए गए आंकड़ों का उपयोग किया जाता है। इस प्रकार एक पूरा इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) काम करता है जो भारत को अंदर और बाहर दोनों तरफ से घेरने का प्रयास कर रहा है।

विदेशी थिंक-टैंक्स की फंडिंग संरचना – भारत विरोधी नैरेटिव का वित्तीय स्रोत

भारत में चल रहे वैचारिक आंदोलनों की डोर अमेरिका और यूरोप में बैठे बड़े विदेशी थिंक-टैंक्स और वैश्विक विचारकों के हाथों में है, आज यह पूरी तरह से सच सामने आ चुका है। दोनों सीजेपी और अन्‍य एनजीओं से जुड़े संगठनों की वित्तीय संरचना जोकि एक-दूसरे से प्रत्‍यक्ष एवं अप्रत्‍यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं की जांच में इसके कई प्रमाण सरकारी एजेंसियों के हाथ लगे।

सरकारी जांच रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका के फोर्ड फाउंडेशन (Ford Foundation) से लाखों डॉलर का अनुदान (ग्रांट) भारत में एनजीओ को यहां अराजकता पैदा करने के लिए दिया गया। फोर्ड फाउंडेशन जैसी संस्थाएं मानवाधिकारों की आड़ में विकासशील देशों की आंतरिक राजनीति और वैचारिक विमर्श को प्रभावित करती हैं। यह अब पूरी तरह से सामने भी आ चुका है, इसलिए ही वैश्विक स्तर पर राष्ट्रों की राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए कुख्यात अरबपति जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन के नेटवर्क पर भी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की पैनी दृष्टि रही है। सोरोस ने सार्वजनिक मंचों से यह घोषणा की थी कि वे भारत में ‘राष्ट्रवाद के उभार’ को रोकने के लिए एक अरब डॉलर का फंड समर्पित करेंगे।

राहुल गांधी जब विदेशों में जाकर भारत में लोकतंत्र के समाप्त होने की बात करते हैं, तो उन्हें इन्हीं विदेशी थिंक-टैंक्स और वोक (Woke) बौद्धिक लॉबी का पूरा समर्थन मिलता है। यह वित्तीय और वैचारिक नेटवर्क मिलकर भारत के बहुसंख्यक समाज को लांछित करने वाले शोध पत्रों, वृत्तचित्रों (डॉक्यूमेंट्री) और समाचारों को प्रायोजित करता है।

बडा प्रश्‍न! क्या हिंदू धर्म के बिना भारत ‘भारत’ रहेगा?

इस पूरे विमर्श का सबसे गंभीर, तार्किक और मारक पहलू भारत के आत्म-स्वभाव (आइडेंटिटी) से जुड़ा है। दार्शनिक और ऐतिहासिक दृष्टि से यह प्रश्न उठाना अनिवार्य और स्‍वभाविक है कि यदि इस देश से हिंदुत्व या सनातन चेतना को पूरी तरह निष्कासित कर दिया जाए, तो क्या भारत अपने स्वभाव में ‘भारत’ बना रह सकता है? इस संबंध में हमें स्वामी विवेकानंद के द्वारा दिए गए (कोलंबो से अल्मोड़ा तक व्याख्यान) देखना चाहिए, जिसमें उन्‍होंने स्‍पष्‍ट कहा है- “भारत का अस्तित्व सिर्फ इसलिए नहीं है कि यहाँ एक सरकार काम करती है। भारत इसलिए जीवित है क्योंकि इसकी सनातन संस्कृति ने कभी हार नहीं मानी। यदि भारत से उसका अध्यात्म और उसकी मूल संस्कृति छीन ली जाए, तो यह देश अपनी आत्मा और अपनी चेतना खो देगा।” फिर दुनिया की अन्य सभ्याताओं का सबक भी आज हमारे सामने है।

मिस्र (इजिप्ट), फारस (इरान), यूनान (ग्रीस) और रोम, वस्‍तुत: ये सभी अपने समय की महान और शक्तिशाली सभ्यताएं थीं, किेंतु जैसे ही इन देशों का उनकी मूल आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पहचान से नाता टूटा, और वहां विदेशी या आक्रामक मजहबी संस्कृतियों का वर्चस्व हुआ, उनका प्राचीन इतिहास पूरी तरह समाप्त हो गया। आज वे देश भौगोलिक रूप से नक्शे पर भले ही होंगे, पर उनका अपनी प्राचीन सभ्यता, दर्शन और स्वभाव से कोई संबंध नहीं बचा।

भारत का मूल स्वभाव और हिंदुत्व का अंतर्संबंध

भारत में जो लोकतंत्र आज सफल है, उसका मूल कारण यहाँ का बहुसंख्यक हिंदू समाज है, जिसका मूल दर्शन ही है- ‘एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति’ (सत्य एक है, ज्ञानी उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं) और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ (पूरी पृथ्वी ही हमारा परिवार है)। इसी दार्शनिक डीएनए के कारण भारत में पारसी, यहूदी, सीरियाई ईसाई और सूफी संतों को शरण मिली और वे बिना किसी दमन के फले-फूले।

ऐसे में गांधी और दोनों सीजेपी, आप, वामपंथी, जैसे संगठनों, राजनीतिक पार्टियों का मॉडल भारत को एक ऐसी सांस्कृतिक शून्यता (कल्चरल वॉइड) की ओर ले जा रहा है जहां बहुसंख्यक समाज को अपनी ही पहचान पर लज्जा होने लगे। तब विचार करें, अब यदि यह आधार नष्ट हो गया, तो भारत में न तो यह धर्मनिरपेक्षता बचेगी और न ही वह सहिष्णुता, जिसने इस भारतीय उपमहाद्वीप को हजारों सालों से सुरक्षित रखा है।

अंततः, यह संपूर्ण विमर्श भारत के इतिहास के एक अत्यंत निर्णायक मोड़ को दर्शाता है। एक तरफ वह विचार है जो भारत को 1947 में बना एक आधुनिक राष्ट्र-राज्य (मॉडर्न नेशन-स्टेट) मानता है जिसे सिर्फ संविधान और नागरिकता के नियमों से चलाया जाना चाहिए। दूसरी तरफ वह सनातन और सभ्यतागत विचार है जो मानता है कि संविधान और आधुनिक ढांचा तभी तक सुरक्षित हैं जब तक इस देश का मूल सांस्कृतिक और आध्यात्मिक डीएनए (हिंदुत्व) शक्तिशाली और अक्षुण्ण है।

अत: इस समग्र अध्‍ययन से यह स्पष्ट होता है कि भारत में चल रहा यह वैचारिक युद्ध अकेले सत्ता प्राप्त करने का प्रयास भर होने तक सीमित नहीं है। यह भारत के सभ्यतागत डीएनए (सिविलाइजेशनल डीएनए) को बचाने अथवा उसे विदेशी शक्तियों के इशारे पर जातियों और मजहबों के टुकड़ों में तोड़कर समाप्त करने के बीच का एक महासंग्राम है। इनका अंतिम उद्देश्य हिंदुत्व को लांछित करके भारत की सांस्कृतिक और आर्थिक रीढ़ को पूरी तरह से तोड़ना है। जिसे आप देश की राजधानी समेत देश भर में इन दिनों महसूस और देख भी सकते हैं।

Emerging Trends of AI in Multilingual Newsrooms of India

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Lucknow: Artificial Intelligence is changing how news is made and shared in many Indian languages. According to reports published by the Ministry of Electronics and Information Technology, India has 22 official languages and hundreds of dialects. According to data released by the Internet and Mobile Association of India, more than 500 million Indians consume news in languages other than English. AI is helping newsrooms reach these audiences faster. This article explains the emerging trends in simple language, with sources for every fact.

AI Translation is Becoming Normal: The biggest trend is AI translation. According to information released by the Press Information Bureau about the Bhashini mission, Bhashini is an AI-led language platform launched by MeitY to enable translation between Indian languages. According to updates shared by Bhashini team, the platform supports translation in more than 22 Indian languages. Many newsrooms are using this. According to case studies published by Google News Initiative India, Dainik Jagran and Dailyhunt use AI translation tools to convert Hindi and English stories into Tamil, Telugu, Marathi and other languages in minutes. This helps local readers get national news in their own language, as explained in Bhashini project documents.

Automatic Transcription of Speeches and Interviews: Journalists spend hours typing interviews. According to product features published by AI4Bharat initiative of IIT Madras, automatic speech recognition models like Whisper and AI4Bharat’s Indic ASR can transcribe Indian languages. According to workflow reports published by NDTV and The Indian Express labs, reporters now use AI transcription to convert long political speeches and press conferences into text within minutes. This trend saves time, as reported by Reuters Institute for the Study of Journalism in its annual Digital News Report.

AI Summarisation for Short News: People like short news. According to user behaviour studies published by Inshorts and Dailyhunt, many Indians prefer 60-word summaries. According to technical blogs published by OpenAI and Google, large language models can summarise long articles accurately. According to experiments reported by Hindustan Times and The Hindu digital desks, AI is used to create quick summaries, bullet points and explainers of long court judgments or budget documents. This makes complex news easy to understand, as noted in UNESCO guidelines on AI and media accessibility.

Rise of AI Anchors and Voice Cloning: AI anchors are a new trend. According to news coverage published by India Today Group and News18 network, several Indian channels have launched AI news anchors for language bulletins. For example, according to official announcements made by India Today Group, Sana is an AI anchor used for multilingual updates. According to technology explainers published by Microsoft and ElevenLabs, AI text-to-speech can clone voices in different Indian languages. According to reports published by Asian News International, regional channels use AI voices to read news in Bhojpuri, Haryanvi and other dialects without hiring separate presenters for each shift.

Personalised News Feeds and Recommendations: AI recommends what you like to read. According to policy papers published by NITI Aayog on responsible AI, recommendation systems are widely used in media platforms. According to product information shared by Dailyhunt and Way2News, their apps use AI to show news based on language preference, location and reading history. According to research published by the Reuters Institute, personalised recommendation increases user engagement. In multilingual India, as explained in reports by KPMG and Google on Indian languages internet users, personalisation helps a Tamil speaker in Chennai and a Hindi speaker in Lucknow get relevant local news.

AI for Fact-Checking and Deepfake Detection: Fake news spreads fast in many languages. According to fact-checking methodology published by BOOM Live and Alt News, AI tools help detect manipulated images and videos. According to advisories issued by the Ministry of Electronics and Information Technology under IT Rules, detection of synthetic media is a priority. According to tool descriptions published by Google Fact Check Tools and Microsoft】 Video Authenticator project, AI can check if a video is altered. Newsrooms like The Quint and BBC India, according to their editorial blogs, use these AI tools to verify viral videos before publishing in multiple languages.

Automated Data Journalism and Graphics:AI helps with data. According to training materials published by Google News Initiative, AI tools can clean large datasets and make charts automatically. According to examples shared by Indian Express Data Intelligence Unit, AI is used to analyse election data, weather data and census data to create stories in Hindi, Marathi and English at the same time. According to documentation published by Flourish and Datawrapper platforms, their AI features are used by many Indian newsrooms to create multilingual infographics quickly.

Voice Search and Conversational News: Many Indians search by voice. According to internet trend reports published by Google India, voice searches in Indian languages are growing rapidly. According to product updates released by Jio News and Dailyhunt, they have launched voice-based news where users can ask for news in their language. According to technical papers published by AI4Bharat, Indic language voice assistants are being trained to understand mixed language, like Hinglish. This trend makes news accessible for people who cannot read easily, as noted in reports by UNESCO on digital inclusion.

Human-in-the-Loop is Still Important: Even with all trends, human checking remains necessary. According to ethical guidelines issued by the Press Council of India, accuracy and fairness are core duties of journalism. According to OECD AI Principles on accountability, AI systems must have human oversight. According to editorial policies published by Press Trust of India, AI-generated content must be verified by an editor before publication. According to observations made in the India AI Mission discussion papers released by MeitY, human review is recommended for high-risk uses like translation of legal or medical news.

AI trends in multilingual newsrooms show a clear shift from English-only to language-first journalism. According to official statements issued by the Ministry of Information and Broadcasting, the future of Indian media is multilingual and digital. According to assessments reported by Bhashini and AI4Bharat teams, AI quality for Indian languages is improving but still needs improvement. According to suggestions made by the Editors Guild of India, newsrooms must adopt ethical policies for AI use. If used responsibly, as stated in the National Strategy for Artificial Intelligence released by NITI Aayog, AI can help every Indian get trusted news in their own mother tongue.

 

तर्कहीन विरोध और दोहरे मापदंडों की राजनीति 

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दिल्ली। कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में इंडी गठबंधन चुनाव आयोग पर मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर आक्रामक है। एसआईआर को वोट चोरी का माध्यम बताकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है। धरना प्रदर्शन चल रहा है। एक दिन तो कांग्रेस नेता राहुल गांधी व प्रियंका गांधी जबरन आकाशवाणी भवन में घुसने का प्रयास करने लगे, अब तो ये लोग हर दिन संविधान की किताब हाथ लेकर कही न कहीं जबरन  धरना देने का प्रयास कर रहे हैं। इन धरना प्रदर्शनों  की तस्वीरें अत्यंत दुर्भाग्यूपर्ण हैं जिनमें राहुल गाँधी महिला पुलिस अधिकारी को आपत्तिजनक तरीके से पकड़ रहे हैं और प्रियंका गाँधी दूसरी महिला पुलिस अधिकारी को कोहनी मार रही हैं। स्थान स्थान पर महिला पुलिस के साथ अभद्र व आपत्तिजनक व्यवहार किया जा रहा है।

दिल्ली पुलिस में दस हजार से अधिक महिलाएं हैं। अधिकतर महिलाएं ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं। यूपी, बिहार, उत्तराखंड व झारखंड जैसे राज्यों से यह महिलाएं आती हैं। यह महिलाएं अपना कर्तव्य निभा रही हैं और संविधान के दायरे में काम कर रही हैं। इन महिला पुलिसकर्मियों के साथ कांग्रेस नेता व कार्यकर्ता अभद्र हरकतें कर रहे हैं। ऐसे कई वीडियो सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं। प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस पर 25 आपत्तिजनक प्रहार किये गये हैं। यही नहीं ईवीएम की प्रशंसा करने पर कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने  जम्मू कश्मीर के युवक की पिटाई कर दी। यही कांग्रेस का असली  चरित्र है- अराजकता। कांग्रेस अपने इंडी गठबंधन के साथ मिलकर देश में अराजकता का  वातावरण बनाकर चुनाव जीतना चाहती है। चुनाव आयुक्त व एसआईआर के विरुद्ध कांग्रेस के पास कोई तथ्य अथवा प्रमाण  नहीं है।

राहुल गांधी तथा इंडी गठबंधन  बिहार विधानसभा चुनाव से लेकर अब तक तीन बार मतदाता गहन परीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ आंदोलन कर चुका है और हर बार उन्हें पराजय का मुंह देखना पड़ा है। बिहार की जनता ने इस मुद्दे को पूरी तरह से नकार दिया था। देश के कई  राज्यों में एसआईआर का काम पूर्ण हो चुका है। एसआईआर प्रक्रिया में चुनाव आयोग के द्वारा नियुक्त  अधिकारियों  सहित सभी राजनैतिक दलों के बूथ एजेंट आदि ने अत्यंत सक्रियता के साथ इस कार्य में भागीदारी की। आश्चर्यजनक रूप से अभी तक राहुल गांधी के बूथ अध्यक्ष व बीएलए आदि को यह नहीं पता चला था कि चुनाव आयुक्त ने फार्म -6 में कोई बदलाव कर दिया है। कांग्रेस व उसके सहयोगी दलों का वर्तमान आंदोलन दोहरे मापदंडों पर आधारित है क्योंकि एसआईआर के काम में सभी दलों ने चुनाव आयेाग का सहयेाग किया है और बढ़-चढ़ कर  भागीदारी की है। चुनाव आयोग ने अब सभी बीएलओ को घर -घर जाकर फिर से नये मतदाताओं का फार्म भरवाने का अभियान प्रारंभ किया है और उसमें भी सभी राजनैतिक दल सहयेाग कर रहे हैं। चुनाव आयेग ने उन सभी पात्र मतदाताओं  को अपना नाम फिर से जुड़वाने का अवसर दिया है जिनका नाम एसआईआर प्रक्रिया में किसी कारणवश छूट गया है । इन सभी सुधारों के बाद भी राहुल गांधी सड़क पर अराजकता मचाने पर उतारू हैं, यह दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है?

वास्तविकता यह है कि राहुल गाँधी की भारत की संवैधानिक संस्थाओं कोई आस्था ही नहीं है। यही कारण है कि भारतीय लोकतंत्र को वैश्विक स्तर पर बदनाम करने के लिए लोकतंत्र की प्रहरी संस्था चुनाव आयोग पर ही हमला कर रहे हैं। राहुल गांधी, अपने आंदोलन के माध्यम से अराजकता फैलाकर भारत को बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल जैसी स्थितियों में पहुंचकर सत्ता प्राप्त करना चाहते  हैं।

मतदाता सूची के पुनरीक्षण का विरोध एक षड्यंत्र के अंतर्गत किया जा रहा है। कई राज्यों में मतदाता सूची में फर्जी नामों के सहारे फर्जी मतदान करवाने की घटनाएं सामने आती रहती थीं। विपक्षी दल केवल बांग्लादेशी घुसपैठियों  व रोहिंग्या के के नाम मतदाता सूचियों में रखवाने के लिए लड़ रहे है। यह दल अच्छी तरह से समझते हैं कि मतदाता सूची में उन लोगों का नाम तो हटता ही है जिन लोगों की मृत्यु हो चुकी है और उन मतदाताओं का भी हटता है  जो अपने मूल निवास स्थान से अन्यत्र स्थानांतरित हो जाते हैं। नए मतदाता जोड़ने का अभियान चलता ही रहता है फिर इसमें आखिर समस्या कहाँ है?  क्या जो लोग विरोध कर रहे हैं वह यह चाहते हैं कि उनके स्वर्गीय माता -पिता व बंधु ऊपर से धरती पर आकर वोट डालें  और उन्हें चुनाव जिताकर वापस चले जाएं?

कांग्रेस व विरोधी दलों का यह आंदोलन  इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के आधार पर  शुरू हुआ है जिसका न कोई आधार है और न ही तथ्य। अब तो चुनाव आयोग ने भी स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव आयोग में सभी फैसले सर्वसम्मति से ही लिए गए हैं और यही बात वह सुप्रीम कोर्ट में  सुनवाई के दौरान कहने जा रहा है।

कांग्रेस वोट चोरी का अभियान का एक उद्देश्य अपने ध्वस्त हो चुके संगठन को खड़ा करना भी है। यह पार्टी अब अपने बलबूते त्रिपुरा में मतपत्रों के माध्यम से हुए ग्राम सभाओं के चुनाव व असम में नगर नकाय चुनाव जीतने तक की हैसियत खो चुकी है। आन्दोलन के दौरान आए 5 विधानसभा व असम की एक लोकसभा का उपचुनाव भी कांग्रेस  बुरी तरह से हार गई है। वर्ष 2027 में यूपी, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा सहित बाद में गुजरात आदि राज्यों में विधानसभा चुनाव संभावित हैं इन सभी राज्यों में कांग्रेस का बुरा हाल होने जा रहा है। कांग्रेस चुनाव आयुक्त के इस्तीफे सहित पुरानी वोटर लिस्ट से चुनाव कराने  की मांग कर रही है जो पूरी तरह से तर्कहीन है। अगर पुरानी मतदाता सूची से चुनाव करा भी दिये जाएं तो क्या मरे हुए लोग वोट डालने आ जायेंगे ? सच तो यह है कि कांग्रेस पार्टी उससे भी चुनाव नहीं जीतेगी क्योंकि 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव पुरानी मतदाता सूची से ही कराए गए थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में वोट चोरी का आरोप तो पूरी तरह से गलत है क्योंकि तब ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त थे ही नहीं।

इंडी दलों विरोध  प्रदर्शन के बीच एक सकारात्मक बात यह हुई कि चुनाव आयोग को 42 पूर्व न्यायाधीशों और  सेवानिवृत्त अधिकारियों का समर्थन प्राप्त हो गया है। सभी ने मतदाता सूचियों  के विशेष गहन पुनरीक्षण की वैधानिकता को अपने तर्कों से पुष्ट करते हुए संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार हमलों पर चिंता जताई है। इन महानुभावों द्वारा देशवासियों  के नाम खुले पत्र के माध्यम से  हर भारतीय से इन संस्थानों के समर्थन व बचाव में आगे आने का आह्वान किया गया है।

वैसे भी जब चुनाव आयुक्त  की नियुक्ति सहित सभी मामले सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है तब गांधी परिवार व कॉकरोच जनता पार्टी का यह आंदोलन पूरी  तरह से असंवैधानिक और दुर्भाग्यपूर्ण है।

देश का नया संकल्प -हम करके रहेंगे 

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दिल्ली। भारत के यशस्वी व लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनैतिक यात्रा के 25 गौरवशाली पूर्ण होना केवल  उनके लिए ही नहीं अपितु भारतीय जनता पार्टी की यात्रा का भी अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में आरम्भ से हुई यह यात्रा अब नए संकल्पों के साथ नए युग में प्रवेश कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनसेवा नेतृत्व की अपनी यात्रा के 25 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर 2047 में विकसित भारत – “वी विल डू इट हम करके रहेंगे“ का संकल्प लिया है। इस संकल्प के पीछे भविष्य के कई बड़े संदेश व संकेत स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर दिल्ली में आयोजित कार्यकर्ताओं के विशाल सम्मेलन को संबोधित करते हुए आगामी 25 वर्षों की रूपरेखा करी। प्रधानमंत्री ने कहा कि हम 2047 तक विकसित भारत बनाकर रहेंगे,  टॉप थ्री इकॉनमी, आत्मनिर्भर भारत, ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब, ओलिंपिक का आयोजन, अंतरिक्ष में अपना स्टेशन बनाकर रहेंगे का नारा दिया। उन्होंने इस नये संकल्प के माध्यम से भारत के भीतर व बाहर बैठे विरोधियों को एक साथ अपने इरादे बता दिए । प्रधानमंत्री मोदी ने विकसित भारत व आत्मनिर्भर भारत को दूर की कौड़ी बताने वालों को भी करारा जवाब दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमत्री के रूप में अब तक की यात्रा विकास तथा गरीबों, महिलाओं व युवाओं  के कल्याण का पर्याय है। उनकी 25 वर्षे की सेवा और समर्पण की पहचान, अथक परिश्रम, अद्वितीय संकल्प और देश को  सर्वोपरि रखने को जीवन का लक्ष्य बनाने से रही है। भारत का जनमानस यह बात अच्छी तरह से समझ रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी के संकल्प पूर्ण हो रहे हैं। अयोध्या में दिव्य व भव्य राम मंदिर, जम्मू कश्मीर से धारा 370 व अनुच्छेद- 35 ए की विदाई हो चुकी है जो भाजपा के आरंभिक संकल्प थे। भाजपा का तीसरा बड़ा संकल्प पूरे भारत में समान नागरिक संहिता को लागू करना भी धीरे -धीरे धरातल पर उतर रहा है। गोवा, उत्तराखंड व गुजरात में सामान नागरिक संहिता लागू हो चुकी है व जबकि कई राज्यों में यह प्रक्रियाधीन है।राज्य विधानसभाओं के माध्यम से ही  लवजिहाद और धर्मांतरण के खिलाफ नये कानून बनाए जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 25 वर्षों की राजनैतिक सूझ-बूझ और विकास के मन्त्र वाली शासन यात्रा के प्रभाव से  भाजपा ने पश्चिम बंगाल जैसे विपक्ष के गढ़ में में अपनी सरकार का गठन किया। पूरे  पूर्वोत्तर को भाजपा ने  अपना बना लिया। आज त्रिपुरा से लेकर उड़ीसा तक भाजपा के मुख्यमंत्री हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में वर्षों से जड़ जमाए बैठी समस्या  माओवाद- नक्सलवाद का अंत भी लगभग पूर्ण हो चुका है। माओवाद -प्रभावित बस्तर जैसे क्षेत्रों में अब 15अगस्त व 26 जनवरी धूमधाम से मनाया जा रहा है। वर्तमान समय में केंद्र सरकार ने भारत को नशे से मुक्ति दिलाने का एक वृहद अभियान चलाया है और भारत को नशा मुक्त करने का संकल्प लिया है। स्वाभाविक रूप से यह नशे के अंतरराष्ट्रीय अवैध कारोबार को कड़ी चोट पहुंचायेगा यही कारण है कि आज भारत विरोधी ताकतें भारत सरकार को कमजोर करने के लिए नए -नए  षड्यंत्र कर रही हैं।

इस अवसर पर बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के युवाओं को एक व्यापक संदेश दिया और कहा कि जीवन में आने वाली हर घटना कुछ न कुछ सिखाती है। जीवन में केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा महत्वपूर्ण नहीं है अपितु देश के लिए कुछ बड़ा करने की भी जरूरत है। उन्होंने कहा कि 25 वर्ष का अनुभव और जनता का विश्वास एक बड़ी  पूंजी है। 2047 का विकसित भारत केवल एक तारीख या लक्ष्य नहीं अपितु लंबे समय तक चलने वाला राष्ट्रीय संकल्प है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि उन्होंने जिसने सिखाया, जिसने गिराया और जिसने विरोध किया उन्होंने  सभी से कुछ न कुछ सीखा है।

किसी भी समाज व राष्ट्र के विकास की प्रक्रिया के आधार भूत तत्व मानवता, समुदाय परिवार एवं व्यक्ति ही  होते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन्हीं  मूल तत्वों के साथ निरंतर आगे बढ़ रहे हैं ओर सफलता के सोपान चढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनैतिक यात्रा में नेतृत्व के 25 वर्ष पूर्ण पर विश्व भर के राजनेताओं ने उन्हें बधाई संदेश दिए हैं जिसमें फिलीपिंस के राष्ट्रपति फर्डिनेड मार्कोस जूनियर, जापानी पीएम साने ताकाइची, बोत्सवाना के राष्ट्रपति  डयूमा गिडियन, बोको डोमिनिका के पीएम रूजवल्ट स्केरिट ने पीएम मोदी को अपना मित्र बताते हुए बधाई दी। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने भी अपना संदेश  भेजा। भूटान के प्रधानमंत्री त्शेरिंग टोबगे ने पीएम नरेंद्र  मोदी को अपना बड़ा भाई बताते हुए भगवान विष्णु का अवतार बताया। कोविड काल के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में  भारत ने वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से संपूर्ण वैश्विक जगत की सहायता की यही कारण है कि अब तक विश्व के 35 देशों का सर्वोच्च  सम्मान उन्हें  प्राप्त हो चुका है तथा वे 20 देशों की संसद को संबोधित कर चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में भारत जी- 20 व ब्रिक्स देशों के समूह का शिखर सम्मेलन का सफलतापूर्वक आयोजन कर चुका है। दुनिया के बड़े निवेशक भारत  की ओर देख रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नया नारा  “वि विल डू इट – हम करके रहेंगे” उनकी आगामी यात्रा का संकल्प है, जिसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं। आगामी चुनावों में बीजेपी इसी नारे के साथ आगे बढ़ेगी।

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