कैंसर पीड़ित को ‘हामी नेपाली इंटरनेशनल भारत’ द्वारा आर्थिक सहायता प्रदान

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मनोज बस्नेत

काठमांडू : भारत- वैदेशिक रोजगार के सिलसिले में भारत के गोवा में कार्यरत, कैंसर से पीड़ित एक नेपाली नागरिक को ‘हामी नेपाली इंटरनेशनल भारत’ ने आर्थिक सहायता प्रदान की है।

रक्त कैंसर (ब्लड कैंसर) से पीड़ित कंचनपुर जिले के भीमदत्त नगरपालिका-2, उल्टाखाम निवासी 35 वर्षीय दीपक चंद को उपचार के लिए आर्थिक सहयोग स्वरूप 40 हजार रुपये नकद प्रदान किए गए। ‘हामी नेपाली इंटरनेशनल भारत’ की संयोजक लक्ष्मी अधिकारी ने पीड़ित चंद के पिता को सहायता राशि हस्तांतरित की।

उन्होंने कहा, “हम समस्या में फंसे सभी लोगों की मदद करते आ रहे हैं और आने वाले दिनों में सहयोग का दायरा यथासंभव बढ़ाएंगे।”

दीपक चंद वर्तमान में एक गंभीर बीमारी से संघर्ष कर रहे हैं। वैदेशिक रोजगार के दौरान गोवा में रहते हुए अचानक अस्वस्थ होने पर चिकित्सकों ने उन्हें बी-सेल एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (B-Cell Acute Lymphoblastic Leukemia) होने की पुष्टि की है।

अपने वृद्ध माता-पिता के एकमात्र सहारा और परिवार की एकमात्र आशा, चंद का वर्तमान में गोवा स्थित मणिपाल अस्पताल में उपचार चल रहा है। चिकित्सकों के अनुसार, यह बीमारी तेजी से फैल सकती है, लेकिन समय पर उचित उपचार मिलने से ठीक होने की संभावना बनी रहती है। फिलहाल उनकी कीमोथेरेपी और रक्त चढ़ाने (Blood transfusion) की प्रक्रिया शुरू करने की तैयारी चल रही है।

चंद के उपचार के लिए दीर्घकालिक कीमोथेरेपी, महंगी दवाइयां और संभावित बोन मैरो ट्रांसप्लांट (Bone Marrow Transplant) की भी आवश्यकता दिखाई दे रही है। इस संपूर्ण उपचार प्रक्रिया में लगभग 30 लाख भारतीय रुपये (करीब 48 लाख नेपाली रुपये) से अधिक खर्च होने का अनुमान लगाया गया है।

पीड़ित चंद ने सहयोग की अपील करते हुए कहा, “एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए इतनी बड़ी राशि जुटाना अत्यंत कठिन है, इसलिए मेरा जीवन बचाने के लिए आप सभी का छोटा सा सहयोग भी अमूल्य जीवनदान साबित हो सकता है।”

प्रवासियों के रूप में दुनिया भर में फैले नेपालियों को एकजुट करने के उद्देश्य से ‘हामी नेपाली इंटरनेशनल’ एक साझा संस्था (Umbrella Organization) के रूप में संचालित है। यह एक गैर-लाभकारी संस्था के रूप में अमेरिका के न्यूयॉर्क में पंजीकृत है और ‘नेपाल और नेपालियों के लिए हामी नेपाली’ के नारे के साथ कार्य कर रही है।

श्रीराम मंदिर का दान : श्रद्धा, मर्यादा की कसौटी पर 

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लखनऊ । अयोध्या स्थित भगवान श्रीरामलला के मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित की जाने वाली भेंट-राशि में अनियमितता की घटना सामने आई है। इसे एक साधारण प्रशासनिक चूक मानकर अनदेखा करना उचित नहीं होगा। यह मात्र एक मंदिर नहीं है, बल्कि करोड़ों हिंदुओं श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इससे जुड़ी किसी भी अनियमितता का प्रभाव केवल प्रशासनिक स्तर तक ही सीमित नहीं रह सकता। यह लाखों श्रद्धालुओं की भावनाओं को गहराई से स्पर्श करती है। पाँच सौ वर्षों के दीर्घ संघर्ष और प्रतीक्षा के बाद जिस मंदिर में श्रीरामलला विराजमान हुए, वहाँ एक-एक रुपये की भेंट केवल धनराशि नहीं, बल्कि करोड़ों भक्तों के अश्रु, उनकी पीढ़ियों की प्रतीक्षा और अटूट श्रद्धा का प्रतीक है। ऐसे पावन स्थल पर उठा कोई भी प्रश्न सीधे जनमानस के हृदय को छूता है। आहत करता है।

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास में विश्व हिंदू परिषद तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े अनेक समर्पित भक्त स्वयं सेवक वर्षों से इस पावन स्थल पर सेवाकार्य में दायित्व निभा रहे हैं। उनका जीवन सादगी और राष्ट्रसेवा के मूल्यों पर आधारित रहा है। ऐसे में इस प्रकरण को न्यास के समस्त कार्यकर्ताओं से जोड़ना थोड़ा बेमानी हो जाएगा। साथ ही, इस घटना की गंभीरता को देखते हुए व्यापक और पारदर्शी जाँच अपेक्षित है, चल भी रही है। जिन भक्तों ने दूर-दूर से, कष्ट सहकर, अपनी श्रद्धा-निधि भगवान के चरणों में अर्पित की, उनके विश्वास को आहत नहीं होने देना अब श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास का प्रथम परम कर्तव्य है।

यह विदित है कि कुछ ऐसे व्यक्ति भी धर्म कार्ययुक्त ऐसे संगठन में स्थान पा लेते हैं जो चरित्र, योग्यता या प्रतिबद्धता में अपेक्षित स्तर पर खरे नहीं उतरते। यह किसी संगठन की विफलता नहीं, बल्कि मानवीय स्वभाव और विशाल संगठनात्मक संरचना की एक नैसर्गिक सीमा है। महत्त्वपूर्ण यह है कि संगठन इसे पहचाने और सुधार की दिशा में सक्रिय व त्वरित कदम उठाए। एक और विचारणीय पक्ष है कि किसी भी बड़े संगठन में श्रेष्ठ और समर्पित कार्यकर्ता प्रायः मौन साधना में लीन रहते हैं। वे प्रचार और प्रशंसा से दूर रहकर कार्य करते हैं। दूसरी ओर, कुछ व्यक्ति चाटुकारिता और दिखावे के बल पर नेतृत्व के निकट पहुँच जाते हैं। यह प्रवृत्ति किसी भी संस्था-संगठन के लिए हानिकारक होती है। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास में जो हुआ, उसके मूल में कहीं न कहीं यही कमज़ोरी परलक्षित हो रही है।

संघ के पास आत्मावलोकन की एक सुदृढ़ परंपरा-पद्धति है, 100 वर्षों का संगठन अनुभव भी है। जनमानस की यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि संघ इस घटना को गंभीरता से लेगा और भविष्य में कोई पुनरावृत्ति न हो, ऐसा आवश्यक आंतरिक मंथन भी करेगा। केवल पुलिस, सीबीआई या एसआईटी जाँच पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास को स्वयं आगे आकर एक स्वतंत्र, पारदर्शी और विश्वसनीय जाँच सुनिश्चित करनी चाहिए।

इस घटना का एक और आयाम है। जब भी किसी धार्मिक संस्था में इस प्रकार की अनियमितता होती है, तो कुछ अवसरवादी तत्त्व इसे राजनीतिक रंग देने का प्रयास करते हैं। धर्म और राजनीति दोनों से ही ऐसे स्वर उठते हैं जो इस प्रसंग को अनावश्यक रूप से विवादास्पद बना देना चाहते हैं। हिंदू समाज से अपेक्षा है कि वह ऐसी उत्तेजनाओं से बचकर शांत और विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाए।
अंततः यह प्रसंग हमें स्मरण दिलाता है कि धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और नैतिक मानकों का पालन कितना आवश्यक है। करोड़ों भक्तों की श्रद्धा का यह पावन केंद्र किसी प्रकार की अनदेखी या लापरवाही का भार वहन नहीं कर सकता। समय की माँग है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास अपनी प्रबंधन व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़, पारदर्शी तथा जवाबदेह बनाए। ताकि श्रीरामलला के प्रति समाज की अटूट आस्था और विश्वास बना रहे।

भगवान श्रीराम और इस विशाल मंदिर के प्रति आस्था केवल एक धार्मिक भावना नहीं, बल्कि सदियों की पीड़ा, संघर्ष और प्रतीक्षा से उपजा अमूल्य विश्वास है। जिसे हर भारतीय ने अपने हृदय में श्रीरामलला के प्रतिबिंब रूप संजोकर रखा हुआ है।। यह विश्वास अक्षुण्ण रहे, यही समस्त हिंदू समाज की हार्दिक अभिलाषा और अपेक्षा है। यह अपेक्षा विभिन्न संगठनों और सरकारों से है, क्योंकि भारत का भक्तिमय समाज अब सुदृढ़ है, सशक्त है, जो हर परिस्थिति को प्रभु की इच्छा मान जीवन पथ पर बढ़ता है। होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

(लेखक चिंतक-विचारक, पर्यावरणविद -समाजसेवी हैं एवं
शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली में राष्ट्रीय सह-सचिव के दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं)

राम मंदिर प्रकरण की आड़ में रोमाना इसार खान की पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता पर विहिप की गंभीर आपत्ति

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नई दिल्ली : विश्व हिंदू परिषद (विहिप), इंद्रप्रस्थ प्रांत के प्रांत मंत्री सुरेन्द्र कुमार गुप्ता ने राम मंदिर चढ़ावा चोरी प्रकरण पर एबीपी न्यूज चैनल पर प्रसारित लाइव डिबेट की अनैतिक शैली, उत्तेजक प्रस्तुति और एंकर रोमाना इसार खान के आक्रामक व पक्षपातपूर्ण रवैये पर तीव्र आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि डिबेट के दौरान जिस प्रकार विहिप के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल पर अनैतिक रूप से दबाव बनाने और पूरे मामले को दुर्भावनापूर्ण धार्मिक रंग देकर राम जन्मभूमि ट्रस्ट, विहिप एवं समस्त हिंदू समाज को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का प्रयास किया गया, वह पत्रकारिता के इतिहास में एक काला अध्याय है।

गुप्ता ने मीडिया के समक्ष तीखे तार्किक बिंदु रखते हुए कहा:

‘सामान्यीकरण’ के नाम पर हिंदू समाज की प्रताड़ना: किसी भी आपराधिक घटना की निष्पक्ष और त्वरित जांच होनी चाहिए, और दोषी को कठोरतम दंड मिलना चाहिए। किंतु, ABP News की एंकर द्वारा लाइव शो में “क्या यह ट्रस्ट हिंदुओं को बेवकूफ बनाने के लिए है?” जैसे अत्यंत आपत्तिजनक और उत्तेजक शब्दों का प्रयोग करना, यह दर्शाता है कि विमर्श (Narrative) निष्पक्ष जांच के लिए नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर चोट करने के लिए गढ़ा जा रहा था। किसी एक कृत्य के आधार पर संपूर्ण धार्मिक संस्था और समाज को कठघरे में खड़ा करना अनैतिक है।

मर्यादाहीन एंकरिंग और व्यक्तिगत एजेंडा: डिबेट के दौरान एंकर द्वारा तथ्यों पर बात करने के बजाय विहिप प्रवक्ता पर चिल्लाना, उनके तर्कों को दबाना और एकतरफा नैरेटिव सेट करना ‘चौथे स्तंभ’ की गरिमा को तार-तार करता है। जब प्रवक्ता ने इस शैली पर आपत्ति जताई, तो मर्यादा भूलकर व्यक्तिगत आक्षेपों और सीना ठोककर चुनौती देने वाली भाषा का प्रयोग किया गया, जो किसी भी गंभीर समाचार संस्थान के अनुकूल नहीं है।

न्यायिक प्रक्रिया और सामाजिक सौहार्द से खिलवाड़: राम मंदिर वैश्विक स्तर पर सनातनियों की आस्था का केंद्र है। जब मामला जांच के अधीन है, तब मीडिया ट्रायल के जरिए ‘हिंदू फोबिया’ और अविश्वास का माहौल बनाना सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने का कुत्सित प्रयास है।

विहिप द्वारा समाचार चैनल के प्रबंधन से तीखी मांगें: सुरेन्द्र कुमार गुप्ता ने संबंधित समाचार चैनल के वरिष्ठ प्रबंधन को पत्र लिखकर निम्नलिखित मांगें की हैं:

1. एंकर के रवैये की संपादकीय समीक्षा (Editorial Audit): लाइव डिबेट में एंकर रोमाना इसार खान द्वारा विहिप प्रवक्ता के साथ किए गए अभद्र व्यवहार, पक्षपातपूर्ण भाषा और ‘बेवकूफ बनाने’ जैसी अनैतिक शब्दावली की तत्काल आंतरिक समीक्षा की जाए।

2. सार्वजनिक स्पष्टीकरण और जवाबदेही: पत्रकारिता के स्थापित मानकों (Media Ethics) और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों का सरेआम उल्लंघन करने के लिए संबंधित एंकर को उचित परामर्श, चेतावनी और इस कृत्य के लिए जवाबदेही तय की जाए।

3. पूर्वाग्रह से मुक्त दिशा-निर्देश: भविष्य में धार्मिक और संवेदनशील विषयों पर डिबेट आयोजित करते समय स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताकि स्क्रीन का उपयोग किसी संस्था, धर्म या आस्था को बदनाम करने और लाइव शो में प्रवक्ताओं को प्रताड़ित करने के हथियार के रूप में न हो सके।

श्री गुप्ता ने अंत में चेताया कि यदि समाचार संस्थान अपनी निष्पक्षता, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व को ताक पर रखकर ऐसी ‘लाउड’ और एजेंडा-संचालित पत्रकारिता को बढ़ावा देता रहेगा, तो हिंदू समाज और विहिप ऐसे चैनलों के एकाधिकार और भ्रामक विमर्श का लोकतांत्रिक व कानूनी रूप से कड़ा प्रतिकार करने के लिए विवश होंगे।

सिटीजन विजिलेंटे : प्रतिबंधित फिल्म जो एक्स पर उपलब्ध है

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दिल्ली। जर्मनी और ब्रिटेन ने अभी एक फिल्म को प्रवासियों के खिलाफ बताते हुए प्रतिबंध लगाया है, जिसपर एलन मस्क ने पूरी फिल्म “सिटीजन विजिलेंटे” को ही एक्स पर डाल दिया। फिल्म की शुरुआत माइकल सैंडर्स से होती है, जो एक अमेरिकी सैन्य अधिकारी रह चुका है और अब व्यवसाय में लगा हुआ है, इस दौरान वो अपने शहर में घूम रहा होता है, जहां वो प्रवासी मुस्लिमों को देखता है, वे शहरों में गंदगी फैलाते है, स्थानीय लोगों को घूरते है खासकर महिलाओं को और कई बार बेवजह चिल्लाते है, दुकानों से बिना पैसे दिए समान ले जाते है जब पकड़े जाए तो धमकी देते है। माइकल अनुशासनप्रिय व्यक्ति था, कुछ प्रवासी बस का किराया मांगने पर धमकाने लगे, जिसपर माइकल खुद आगे आकर पैसे देता है और उन्हें समझाता है।

बात हद से ज्यादा तब बढ़ गई जब एक चौदह साल की बच्ची को सीरियाई प्रवासियों के समूह ने पकड़ लिया और गैंगरेप कर अधमरी हालात में छोड़ दिया। जब ये मामला अदालत में पहुंचा तो अदालत ने अपराधियों की कम उम्र और शरणार्थी होने की दलील देकर रिहा कर दिया। माइकल समझ जाता है कि कानून व्यवस्था इनका कुछ बिगाड़ नहीं सकती तब ये पीड़ित के पास पहुंचते है और पूछते है कि “तुम्हे बदला चाहिए”? पीड़िता और उसके मां बाप हाँ कहते है। माइकल सबसे पहले उस भ्रष्ट जज की हत्या कर देता है, जिसने आरोपियों को छोड़ा था। उसने चेहरा ब्लर करके एक वीडियो पोस्ट किया, जिसमें उसने बताया कि कानून प्रणाली पीड़ितों को न्याय देने असक्षम हो चुकी है, जिस कारण उसे ये करना पड़ रहा है।वो एक हीरो बन जाता है, पर वो गुप्त था, उसे सब विजिलेंटे कहने लगते है। फिल्म के अंत इतना विवादित है कि यूरोपीय देशों ने बैन लगा दिया। वास्तव में माइकल एक बलात्कारी गिरोह के लड़के के घर जाता है और उसे डराकर बाकी सभी उसके दोस्तों को बुलवाता है, इस दौरान माइकल मुख्य आरोपी के पिता से पूछता है कि क्या आपने यहीं संस्कार दिया है? तो पिता बोलता है कि वो उसे कुरान की शिक्षा देता है और उसके मुख्यभूमि में युद्ध के कारण इसके मन पर दबाव पड़ा है, इसलिए इसे माफ कर देना चाहिए। इसके पश्चात ये आरोपी की बहन के पास जाते है, उसकी बहन उसके कपड़े को लेकर बोलती है, उसने कपड़े ही ऐसे पहने थे।

इसके पश्चात वो मुख्य आरोपी से पूछता है, आरोपी बोलता है कि उसे लगा वो लड़की यहीं चाहती है
तब माइकल कहता है कि यूरोप और अमेरिका की महिलाएं इसलिए रेप के लायक है क्योंकि वे अपनी मर्जी के कपड़े पहनती है? तो फिर तुम यहां आए ही क्यों? इसके बाद बंदूक की गड़गड़ाहट शुरू होती है, उसने सब लोगो को गोलियों से भून दिया था।

अब आप सोच रहे होंगे कि ये फिल्म प्रोपेगैंडा होगी, बिल्कुल नहीं, ये रियल घटना पर बेस्ड है, जो जर्मनी में हुई थी जहां अदालत ने आरोपियों को रिहा कर दिया था, बस राइटर ने फिल्म की कहानी को इसके आगे से लिखना शुरू किया, जो हर व्यक्ति प्रतिक्रिया में करता।

यूरोप के देशों ने इसे बैन करके शुतुरमुर्ग के जैसे अपना सर रेत में गाड़ दिया है, क्या ये घटना गलत है? क्या फिल्म ने जो प्रश्न उठाया वो गलत है? अगर गलत है तो फ्रांस क्यों जल रहा है? स्पेन और स्वीडन क्यों जलता रहता है? अभी कुछ दिन पहले ही लंदन और जर्मनी में प्रवासियों द्वारा बनाए शिकार की घटना घटी है क्या वो भी गलत है?

Movie :  https://x.com/D_Tarczynski/status/2071163180139561304?s=20

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