योगी का भगवा और बुलडोजर : विपक्ष के झूठ का पोस्टमार्टम और 2027 के गठबंधन की अनिवार्यता

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लखनऊ : उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वही पुराना टेप-रिकॉर्ड फिर बजा दिया गया है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा और उनके नए-पुराने सहयोगी एक ही सुर में चिल्ला रहे हैं :

“संन्यासी को सत्ता में नहीं आना चाहिए”, “भगवा राजनीतिक हथियार है”, “योगी अनपढ़ हैं, फर्जी डिग्री वाले हैं”, “कट्टर हिंदुत्ववादी हैं”।
ये चार लाइनें पिछले दस साल से एक ही रिकॉर्ड की तरह बज रही हैं। अब समय आ गया है कि इस रिकॉर्ड को तोड़ा जाए और सुई को सच्चाई के पॉइंट पर फिट कर दिया जाए।पहला झूठ : संन्यासी को सत्ता में आने का अधिकार नहींविपक्ष का सबसे पुराना और सबसे घटिया तर्क है कि संन्यासी ने गृहस्थ जीवन त्याग दिया है, इसलिए वह मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। यह तर्क इतना खोखला है कि हंसते-हंसते पेट दुख जाए।भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में हर नागरिक को धर्म पालन करने, धार्मिक संस्थाएं बनाने और प्रचार करने का अधिकार है। संन्यास लेना भी एक धार्मिक अधिकार है। कहीं नहीं लिखा कि संन्यासी वोट नहीं लड़ सकता, मंत्री नहीं बन सकता या मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। अगर ऐसा होता तो 1952 में ही स्वामी करपात्री जी महाराज, स्वामी आत्मानंद, आचार्य जे. बी. कृपलानी जैसे दर्जनों संन्यासी-साधु संसद में नहीं पहुंचते।अब विपक्ष के अपने हीरो देखिए।

  • मौलाना अबुल कलाम आजाद : मौलाना की टोपी-दाढ़ी में आजादी की लड़ाई लड़ी, मंत्री बने। कोई नहीं बोला कि मौलाना ने दुनिया नहीं त्यागी, इसलिए सत्ता में नहीं आ सकते।
  • मौलाना तौकीर रजा : 2022 में सपा के मंच पर खड़े होकर वोट मांगते हैं। कोई नहीं बोला कि मौलाना को मसjid में रहना चाहिए।
  • इमाम-उल-हक बुधवार को जुमे की नमाज पढ़ाते हैं, शनिवार को सपा की रैली में भाषण देते हैं। तब सेक्युलरिज्म की सारी नदियां बहने लगती हैं।

बस योगी आदित्यनाथ भगवा पहनकर जनता की सेवा करें तो संविधान खतरे में पड़ जाता है?
यह दोहरा मापदंड नहीं, घोर पाखंड है। भगवा जब टोपी-दाढ़ी के सामने आता है तो विपक्ष की सेक्युलर आंखें अचानक धुंधली हो जाती हैं।दूसरा झूठ : भगवा राजनीतिक हथियार है, आध्यात्मिकता का प्रतीक नहींयह तर्क भी उतना ही हास्यास्पद है।
भगवा रंग हिंदू संन्यास परंपरा का प्रतीक है। आदि शंकराचार्य से लेकर स्वामी विवेकानंद तक, स्वामी दयानंद सरस्वती से लेकर स्वामी रामदेव तक सबने भगवा धारण किया। क्या वे सब राजनीतिक हथियार बना रहे थे?योगी आदित्यनाथ ने 1993-94 में दीक्षा ली थी। उस समय वे न तो सांसद थे, न विधायक, न मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे थे। वे गोरक्षपीठ के उत्तराधिकारी बने, यह धार्मिक परंपरा का हिस्सा था। 1998 में जब पहली बार लोकसभा लड़े तब भी भगवा नहीं उतारा। 2017 में मुख्यमंत्री बने तब भी नहीं उतारा। अगर भगवा राजनीतिक हथियार होता तो अखिलेश यादव 2013 में सैफई महोत्सव में भगवा शॉल ओढ़कर क्यों घूम रहे थे? राहुल गांधी जनेऊ दिखाकर क्यों वोट मांगते हैं? प्रियंका गांधी माथे पर बड़ी-बड़ी बिंदी लगाकर क्यों घूमती हैं? सच यह है कि भगवा जब हिंदू संन्यासी पहनता है तो कट्टरता हो जाता है, जब विपक्षी नेता चुनाव में ओढ़ लेते हैं तो सेक्युलर फैशन हो जाता है। यह दोहरा चरित्र ही विपक्ष की असली पहचान है।तीसरा झूठ : कम पढ़े-लिखे हैं, फर्जी डिग्री वाले हैंयह विपक्ष का सबसे प्रिय हथियार है। दस साल से एक ही रटंत : “योगी आधे-अधूरे पढ़े हैं।”सच्चाई :

  • योगी आदित्यनाथ ने 1970 के दशक में गढ़वाल विश्वविद्यालय (तब गढ़वाल यूनिवर्सिटी, अब हेमवती नंदन बहुगुणा) से बी.एस-सी. किया था।
  • 1998 से 2007 तक के चुनावी हलफनामों में बी.एस-सी. लिखा था।
  • बाद में उन्होंने स्वयं सुधार किया और नया हलफनामा दिया कि कोर्स पूरा नहीं कर पाए, इसलिए अंतिम योग्यता इंटरमीडिएट है।
  • आज तक कोई कोर्ट, कोई यूनिवर्सिटी, कोई जांच एजेंसी ने फर्जी डिग्री का आरोप सिद्ध नहीं किया। एक भी FIR नहीं।

अब विपक्ष के अपने स्टार देखिए :

  • राहुल गांधी : कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ने 2005 और 2019 में साफ कहा कि उनके पास राहुल गांधी का M.Phil का कोई रिकॉर्ड नहीं। फिर भी “M.Phil” लिखते हैं।
  • अखिलेश यादव : सिडनी यूनिवर्सिटी ने साफ कहा कि उनके पास अखिलेश का कोई रिकॉर्ड नहीं। फिर भी “इंजीनियर” लिखते हैं।
  • तेजस्वी यादव : 9वीं फेल होने के बावजूद क्रिकेट अकादमी में BA का फर्जी सर्टिफिकेट लगाकर खेलते रहे।

इन सबके लिए विपक्ष की जुबान पर ताला लग जाता है। लेकिन योगी जी ने खुद सुधार कर लिया तो फर्जी डिग्री हो गई?
यह नहीं चलेगा।और अगर डिग्री ही सबकुछ है तो बिल गेट्स, मार्क जुकरबर्ग, मुकेश अंबानी, गौतम अडानी – सब अनपढ़ हैं क्या? फिर भी दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियां चला रहे हैं। योगी आदित्यनाथ 20 करोड़ की आबादी वाला प्रदेश 8 साल से बिना एक दंगे, बिना माफिया राज, बिना भ्रष्टाचार के चला रहे हैं। यह डिग्री से नहीं, दम-खम से हो रहा है।चौथा झूठ : कट्टर हिंदुत्ववादी हैं, इसलिए अयोग्य हैंयह सबसे बड़ी हास्यास्पद बात है।
जब मायावती ने 2007 में ब्राह्मण-दलित गठजोड़ किया था तो वह सामाजिक इंजीनियरिंग था।
जब अखिलेश यादव ने 2022 में मुस्लिम-यादव फॉर्मूला चलाया तो वह सेक्युलरिज्म था।
जब राहुल गांधी मंदिर-मंदिर भागते हैं तो वह सॉफ्ट हिंदुत्व है।
लेकिन योगी जी राम मंदिर की बात करें तो कट्टरता हो जाती है?योगी सरकार ने :

  • 8 साल में एक भी दंगा नहीं होने दिया (अखिलेश राज में हर साल दर्जनों दंगे)
  • 65 हजार से ज्यादा एनकाउंटर किए, 200 से ज्यादा अपराधी मारे गए, हजारों जेल में
  • माफिया की 6000 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति जब्त की
  • 6 लाख से ज्यादा सरकारी नौकरियां बिना पर्ची-खर्ची के दीं
  • 2.5 करोड़ शौचालय बनवाए, 55 लाख गरीबों को घर दिए
  • 100 से ज्यादा नए मेडिकल कॉलेज खोले

यह सब कट्टरता से हुआ या कुशासन खत्म करने की इच्छाशक्ति से?2027 और गठबंधन की अनिवार्यताविपक्ष जानता है कि अकेले-अकेले लड़ने से उत्तर प्रदेश में उसका सूपड़ा साफ है। इसलिए 2024 लोकसभा की तरह फिर “इंडिया” नाम का नया गठबंधन बना रहे हैं। लेकिन जनता सब देख रही है।

  • एक तरफ वह नेता जो भगवा को गाली देता है, संन्यासी को कोसता है, हिंदू त्योहारों पर चुप रहता है।
  • दूसरी तरफ वह संन्यासी जो सुबह 5 बजे उठकर प्रदेश की 20 करोड़ जनता की चिंता करता है, बिना छुट्टी, बिना परिवार, बिना निजी जीवन के।

2027 में जनता फिर वही फैसला सुना देगी जो 2017, 2019, 2022 और 2024 में सुन चुकी है।
क्योंकि जनता जानती है – भगवा डराता नहीं, माफिया को डराता है।
संन्यासी सत्ता में नहीं आया तो अपराधी सत्ता में आ जाएंगे।
और डिग्री से प्रदेश नहीं चलता, इरादे से चलता है।योगी आदित्यनाथ 2027 में फिर मुख्यमंत्री बनेंगे।
और विपक्ष फिर वही पुराना रिकॉर्ड बजाता रहेगा – “अनपढ़… कट्टर… भगवा…”
लेकिन इस बार जनता की लाठी उस रिकॉर्ड को तोड़कर रख देगी।

दुनिया भर में गांधी इतने प्रासंगिक होकर फिर क्यों लौट आए हैं?

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गांधीदर्शन

दिल्ली । कभी अमेरिका के राष्ट्रपति रहे बराक ओबामा से पूछा गया “अगर आपको जीवन में सिर्फ एक बार किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के साथ भोजन करने का मौका मिले, तो आप किसे चुनेंगे?”और ओबामा ने जवाब दिया—“महात्मा गांधी।”

यह उत्तर चकित करता है। दुनिया की महाशक्ति का सबसे शक्तिशाली आदमी आखिर एक ऐसे बूढ़े व्यक्ति जिसे दुनिया से गए इतने साल हो गए उनके साथ बैठकर क्यों लंच करना चाहता है?

शायद इसलिए कि गांधी की शक्ति उन चीज़ों में थी, जिन्हें हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, हम ग्लैमर, पैसा, ताकत और बाहरी दिखावे से प्रभावित होते हैं जबकि ओबामा के पास सब कुछ था इसके बावजूद वे गांधी के नैतिक साहस, संवेदना और मनुष्य की आत्मा तक पहुँचने की क्षमता से प्रभावित हुए।

गांधी की प्रासंगिकता किसी पद या पदक की देन नहीं; उनकी आवश्यकता इसलिए महसूस की जाती है क्योंकि समय बार-बार उसी मोड़ पर लौट आता है जहाँ मनुष्य खुद से पूछता है “हम किस दिशा में जा रहे हैं?”

आज दुनिया के डेढ़ सौ देशों में लगी उनकी मूर्तियाँ केवल इतिहास की निशानी नहीं हैं; वे चेतावनी की घंटियाँ हैं कि समाज जब हिंसा, भय और विभाजन में उलझने लगता है, तो कोई एक धीमी सी आवाज़ फिर से पुकारती है और कहती है कि “सत्य और अहिंसा सिर्फ आदर्श नहीं, हमारे अस्तित्व का आधार हैं।”

दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला ने 28 साल जेल में बिताए। बाहर निकलकर उन्होंने अपने ही अत्याचारी राष्ट्रपति डी क्लार्क जिसने मंडेला को जेल भेजा था को ही दक्षिण अफ्रीका का उपराष्ट्रपति बनने का निमंत्रण दे दिया और डी क्लार्क ने स्वीकार भी कर लिया। यह कोई राजनीतिक रणनीति नहीं थी—यह गांधी की उस सीख का प्रभाव था जिसमें क्षमा शक्ति बनती है, और संवाद टूटे हुए समाज का पुनर्निर्माण करता है। इस बात को शायद हम भारत के लोग भूल गए हैं। हम यह भी भूल गए हैं कि नेल्सन मंडेला ने कहा था कि आपने हमें मोहनदास दिया था हमने उस मोहनदास को महात्मा गांधी बनाया।

अमेरिका में कुछ साल पहले एक स्कूल में हुई भयावह गोलीबारी में कई मासूम बच्चों की मौत ने पूरे विश्व को हिला दिया था। उस घटना के बाद जब राष्ट्रपति बराक ओबामा टीवी पर राष्ट्र को संबोधित करने आए, तो वे शुरुआती दो मिनट तक एक शब्द भी नहीं बोल पाए—केवल आँसू थे और गहरा मौन। बाद में उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा कि उस घड़ी उन्हें बार-बार महात्मा गांधी की छवि याद आ रही थी, जैसे गांधी उनसे पूछ रहे हों—“अंधाधुंध भौतिक दौड़ में तुमने अपने ही देश का क्या रूप बना दिया है?”

ओबामा लिखते हैं कि तब उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि दुनिया की महाशक्ति का राष्ट्रपति होने के बावजूद वे उस सामाजिक सच के सामने बिल्कुल एक साधारण इंसान की तरह खड़े थे—बेबस, दुखी और स्तब्ध।
उन्होंने स्वीकार किया कि यह हिंसा किसी बाहरी दुश्मन की उपज नहीं, बल्कि अपने ही समाज में पैदा हुए उस खालीपन का परिणाम है जहाँ युवाओं के जीवन से मूल्य और संवेदनाएँ धीरे-धीरे मिटते जा रहे हैं। गांधी जैसे कह रहे थे—“ये लड़के आतंकवादी नहीं हैं, यह तुम्हारे समाज के भीतर का ख़ालीपन है जो उन्हें हिंसा की ओर धकेल रहा है।”

अक्सर हम पश्चिम को असंवेदनशील कहकर एक आसान स्पष्टीकरण चुन लेते हैं, जबकि हिरोशिमा पर बम गिराने वाला अमेरिकी पायलट अपराध-बोध से टूटकर खुद आत्महत्या करके समाप्त हो गया। यह भी गांधीवादी प्रभाव है जो यह कहता है कि तुम कब तक अपने दिल पर नफरत और हिंसा का बोझ लादे रहोगे?
संवेदनहीनता किसी भूगोल की नहीं होती;
वह मनुष्य की आत्मा से दूरी बढ़ने का परिणाम है।

गांधी का लम्बा जीवन पश्चिम में बीता, पर वे किसी एक सभ्यता के प्रतिनिधि नहीं बने।
वे उस मानवीय विवेक के दूत बने, जो हर महाद्वीप में समान रूप से जरूरी है। इसीलिए गांधी “मरकर भी नहीं मरते।” जैसे जैसे समाज में कठोरता भरती है,हिंसा बढ़ने लगती है,समय कठिन होने लगता है—गांधी फिर लौट आते हैं।
उनकी छाया का साया और अधिक लंबा हो जाता है।

हम गांधीजी को चाहें या न चाहें, उनकी सजीव उपस्थिति हमें खुद से यह पूछने पर मजबूर करती है कि “सत्ता की दौड़ में हम क्या खो रहे हैं? प्रगति के शोर में हम कौन-सी संवेदनाएँ पीछे छोड़ रहे हैं?”

गांधी इसलिए प्रासंगिक हैं क्योंकि मनुष्य आज भी वही है।उसकी आवश्यकताएं, जीवनमूल्य वही हैं। मनुष्य चाहे जैसा हो वह अपने जीवन के अर्थ की तलाश में रहता है। और जब दुनिया के कोलाहल में कोई आवाज़ कहती है “अहिंसा कमजोरी नहीं, मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत है,”तो हम समझ जाते हैं कि गांधी किसी देश की संपत्ति नहीं, समय की जरूरत हैं।

ध्रुव तारे की तरह है भारत -रूस मैत्री

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दिल्ली । रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन की दो दिवसीय भारत यात्रा संपन्न हो चुकी है। राष्ट्रपति पुतिन की यह यात्रा भारत- रूस मैत्री की वर्तमान दिशा और भविष्य की रूपरेखा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। यह यात्रा ऐसे समय मे हुई है जब रूस स्वयं यूक्रेन युद्ध के रूप में गंभीर संकट में फंसा है। अमेरिका व अन्य पश्चिमी देश युद्ध समाप्त करने के लिये यूक्रेन की बजाए रूस पर दबाव डाल रहे हैं और भारत पर रूस से व्यापार न करने का दबाव बनाने के लिए तरह -तरह के प्रतिबंध लगाकर धमकियां दे रहे हैं।

रूस- भारत के सम्बंध सात दशक पुराने हैं । बीसवीं सदी के छठे और सातवें दशक में जब चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध बेहद तनावपूर्ण थे तब भी सोवियत संघ डटकर भारत के साथ खड़ा रहा था। तत्कालीन सोवियत संघ ने वैश्विक मंचो पर भारत को कूटनीतिक समर्थन दिया। 1962 में चीन युद्ध के बाद भारतीय सेनाओं के आधुनिकीकरण में सहयोग दिया जबकि अमेरिका व पश्चिमी देश बाधक बने रहे। अटल जी की सरकार में भारत के परमाणु परीक्षण करने पर जहां अमेरिका व पश्चिमी देशों ने भारत पर प्रतिबंध लगा दिए थे किन्तु तब भी सोवियत संघ भारत के साथ खड़ा रहा था। कारगिल युद्ध हो या फिर भारत पर हुए आंतकवादी हमले सोवियत संघ सदा भारत के साथ रहा। लम्बे समय तक भारत और रूस के संबंधों में रक्षा क्षेत्र का प्रभुत्व रहा जिसमें भारत खरीददार था और रूस विक्रेता। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद भारत ने रक्षा आपूर्ति में विविधता लाने का निर्णय लिया। आज भारत रूस के साथ मात्र क्रेता की भूमिका में नही अपितु साझीदार के रूप में खड़ा है।

राष्ट्रपति पुतिन तथा प्रधानमंत्री मोदी के मध्य हुई द्विपक्षीय शिखर वार्ता के उपरांत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो उद्गार व्यक्त किये वह अत्यंत सटीक हैं।भारत -रूस संबंध एक धुव तारे की तरह ही हैं जो सभी परिस्थितियों में चमकते रहे हैं । पुतिन की इस यात्रा में दोनों नेताओं ने आर्थिक सहयोग को नई ऊचाईयों पर ले जाने के लिए 2030 तक के एक आर्थिक सहयोग कार्यक्रम पर सहमति बनाई है। दोनो ही नेताओं ने विश्व से आतंकवाद से लड़ने की अपील की। शिखर वार्ता और साझा बयान में प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने पहलगाम और रूस के क्रेकस सिटी हॉल में हुए आतंकी हमलों की कड़ी निंदा की गई । पीएम मोदी ने कहा कि आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध में भारत रूस ने कंघे से कंधा मिलाकर सहयोग किया है।
भारत रूस मैत्री संबंध आगे और प्रगाढ़ होंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रोटोकॉल तोड़कर अपनी मंत्रिपरिषद के सहयोगियों के साथ पुतिन का स्वागत करने के लिए स्वयं एयरपोर्ट पहुंचे। पुतिन को 21 तोपों की सलामी के साथ गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया । दोनों देशों के मध्य ऊर्जा व स्वास्थ्य सहित कई क्षेत्रों में सहयोग के लिए समझौते हुए हैं। रूस ने भारत को बिना रुकावट ईंधन आपूर्ति करने का भरोसा दिया है। दोनो देशों के मध्य परमाणु सहयोग जारी रहेगा। महत्वपूर्ण दुर्लभ खनिजों के क्षेत्र में सहयोग और बढ़ाया जाएगा। रूसी पक्ष ने स्पष्ट किया कि वह 2030 तक व्यापार को 100 अरब डालर तक बढ़ाने के प्रयास में अधिक भारतीय वस्तुओं का आयात करेगा। रूसी नागरिको को 30 दिनों की वीजा मुफ्त यात्रा सुविधा मिलेगी। दोनो देशों के मध्य खाद्य सुरक्षा नियमों को मजबूत करने पर भी समझौता हुआ है। चिकित्सा अनुसंधान व स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर समझौता हुआ। दोनो देशों ने कुल 11 अहम समझौते किए जिसमें उर्वरक, स्वास्थ्य सेवा, वैज्ञानिक अनुसंधान, शिक्षा और नागरिकों के बीच पारस्परिक आदान -प्रदान के क्षेत्रों मे सहयोग से संबंधित हैं । दोनो देशों के मध्य परिवहन गलियारों पर और अधिक सहयोग बढ़ाने पर सहमति हो गई है।

दोनो देशों के मध्य एक बहुत महत्वपूर्ण व अब तक का सबसे बड़ा रक्षा समझौता हुआ जिस पर पूरे विश्व की दृष्टि थी। रूस के साथ एस -400 और एस- 500 को लेकर डील पक्की हुई है किन्तु अभी इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। भारत अब अपनी थलसेना के लिए रूस के सबसे मजबूत टैंक की खरीद भी करने जा रहा है । नई व्यवस्था के अंतर्गत अब दोनों देशो की सेनाएं एक दूसरे के सैन्य ठिकानों, पोर्ट और सुविधाओं का उपयोग कर सकेंगी। यह रक्षा सहयोग को और अधिक व्यावहारिक और संचालन स्तर पर मजबूत बनाता है। अब रूस अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियों की प्रौद्योगिकी भी साझा करने पर सहमत हो गया है ।

दोनो देशों के मध्य मीडिया और प्रसारण सहयोग बढ़ाने को लेकर भी समझौता हुआ है। व्यापार को और सरल बनाने के लिए दोनों देशों की राष्ट्रीय मुद्राओं में भुगतान किया जाएगा । भारत और रूस के मध्य हुए समझौतों का स्वरूप बहुत ही व्यापक और गहरा है। अमेरिका के साथ टैरिफ वार के बीच जहाँ भारत व्यापार बढ़ाने के लिए नया बाजार खोज रहा था वहीं रूस को भी इसकी आवश्यकता थी क्योंकि रूसी बाजार चीनी उत्पादों से भरते जा रहे हैं और रूस अपने बाज़ार को किसी एक देश पर आश्रित नहीं रख सकता।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन को उनकी भारत यात्रा के दौरान भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, कला और परंपरा का प्रतिनिधित्व करने वाले छह विशेष उपहार भी भेंट किए हैं। इन उपहारों में सबसे विशिष्ट रूसी भाषा में अनुवादित श्रीमद्भगवदगीता है जो सर्वाधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। इसके अतिरिक्त रूसी राष्ट्रपति को कश्मीरी केसर, असम की काली चाय, पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद का चांदी का नक्काशीदार चाय का सेट, आगरा का हस्तनिर्मित संगमरमर का शतरंज सेट और महाराष्ट्र का हस्त निर्मित चांदी का घोड़़ा भी उपहार में दिया गया है। ये उपहार भारत की एक जिला एक उत्पाद जैसी पहल को भी बढ़ावा देते है। राष्ट्रपति पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी के लोकल फॉर वोकल, मेड इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे आह्वानों का समर्थन और स्वागत किया।

जब विश्व के दो शक्तिशाली नेता आपस में मिलते हैं तो वैश्विक जगत में उसकी चर्चा होना स्वाभाविक है। मोदी और पुतिन की भेंट सबकी दृष्टि रूस -यूक्रेन युद्ध पर प्रधानमंत्री मोदी के पक्ष पर थी। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कर दिया कि भारत इस युद्ध में न्यूट्रल नहीं अपितु शांति के पक्षधर हैं ।दोनो ही नेताओं ने शीघ्र ही शांति स्थापित होने और वैश्विक जगत को राहत मिलने की बात कही।

राष्ट्रपति पुतिन की इस भारत यात्रा ने पूरे विश्व को स्पष्ट सन्देश दे दिया कि भारत और रूस दोनों ही देश बाहरी दबाव झेलने सक्षम हैं । दोनों ही देशों ने बिना किसी दबाव के द्विपक्षीय महत्व के अनेक क्षेत्रों में प्रमुख समझौतो पर हस्ताक्षर किए। यही सामर्थ्य और अडिगता दोनों देशों के मध्य ध्रुव तारे जैसी मैत्री का आधार है।

राजभवन बनाम लोकभवन की संस्कृति

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दिल्ली । केंद्र सरकार ने भारत के सभी राजभवनों को लोकभवन कहे जाने का निर्णय लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई अवसरों पर गुलामी के प्रतीकों को समाप्त करने का संदेश दे चुके हैं, स्वाभाविक है इससे गहन रूप से घर कर गई वैचारिक गुलामी की मानसिकता भी धीरे- धीरे समाप्त हो जाएगी। श्रीराम जन्मभूमि पर नव निर्मित दिव्य – भव्य मंदिर के ध्वजारोहण कार्यक्रम में भी प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि आगामी 10वर्षों तक गुलामी की मानसिकता को समाप्त रकने के लिए व्यापक अभियान चलाया जाएगा। इसी श्रृंखला में देश में शासन के प्रतीकों में शांत कितु गहन व व्यापक प्रभाव डालने वाले परिवर्तन किए जा रहे हैं । सनातन हिंदू सभ्यता में नामों का विशेष महत्व है । माना जाता है कि व्यक्ति का जैसा नाम होगा उसका प्रभाव व व्यक्तित्व भी उसी प्रकार होगा। उपनिवेशकालीन शाही ठिकानों की छवि लिए राजभवनों को अब लोकभवन नाम दिया गया है। राजभवन का नामकरण लोकभवन करने का तात्पर्य है उसे लोकहितकारी बनाना। इस परिवर्तन का उद्देश्य यह भी है कि इन भवनों में निवास करने वालों को स्मरण रहे कि उनका काम शक्ति प्रदर्शन नहीं अपितु जनसेवा है।

मोदी सरकार ने इसके पूर्व भी कई स्थानों के नाम बदले हैं जैसे राजपथ अब कर्तव्यपथ है। राजपथ का अर्थ है “राजा का मार्ग” जो शक्ति का प्रतीक है, वहीं कर्तव्य पथ, कर्तव्य का स्मरण कराता है। वर्ष 2016 में रेस कोर्स का नाम परिवर्तित करके इसको लोक कल्याण मार्ग किया गया। अब प्रधानमंत्री कार्यालय के नए परिसर को सेवातीर्थ नाम दिया गया है । यह नाम बताता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय सेवा और समर्पण की भावना का केंद्र है न कि मात्र प्रशासनिक केंद्र। इसी प्रकार केंद्रीय सचिवालय का नाम भी बदला गया है और उसे अब कर्तव्य भवन कहा जाता है।

नाम परिवर्तन का उददेश्य है विचारों में परिवर्तन लाना। सभी सरकारी संस्थाएं अब सेवा और कर्तव्य की भाषा बोल रही हैं। गुजरात लोकभवन ने सोशल मीडिया में अपने चित्र साझा करते हुए लिखा है, “ यह परिवर्तन केवल नाम का नहीं अपितु जनसेवा की भावना को और गहराई से आत्मसात करने का संकल्प है।“ अब यह भवन केवल राज्यपाल का निवास नहीं नागरिकों, विद्यार्थियों , किसानों, शोधकर्ताओं तथा सामाजिक संगठनों का भवन है।
कई राज्यों के राज्यपालों ने राजभवन का नामकरण लोकभवन करने की जानकारी सोशल मीडिया के माध्यम से नागरिकों को दी है। एक समय था जब राजभवनों का उपयोग केंद्र सरकार द्वारा राज्यों की सत्ता में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए किया जाता था। नेहरू काल से लेकर वर्ष 2014 के पूर्व तक 94 बार राज्यपालों की शक्तियों का दुररुपयोग करके राज्य सरकारें गिराई गयीं और राष्ट्रपति शासन लगाया गया। 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढांचे के पतन के बाद उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के साथ साथ अन्य सभी भाजपा शासित राज्यों की सरकारों को तत्काल प्रभाव से गिराकर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था । तमिलनाडु में आज जो द्रमुक सरकार कांग्रेस के साथ सत्ता का सुख भोग रही है, कांग्रेस पार्टी पूर्व में उनकी सरकारों को भी गिरा चुकी है। कांग्रेस के एक राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी राजभवन में अशोभनीय स्थिति में रहने के कारण वहां से बेदखल किए गए थे ।

यद्यपि अब समय बदल रहा है, राजभवन लोक भवन बन रहे हैं तथापि पंजाब, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में घोर भाजपा विरोधी सरकारें हैं जिनका अपने राज्यपालों के साथ विवाद चलता रहता है ।अभी हाल ही में इन राज्यों में राज्यपालों के साथ लंबित विधेयकों का प्रकरण उच्चतम न्यायालय तक पहुंच गया था।

वर्ष 2014 के पूर्व तक राजभवनों मे निवास करने वाले राज्यपाल की पहुंच जनता तक नहीं होती थी किंतु अब यह संभव हो गया है। बंगाल के हालात बहुत दयनीय हैं और कई बार वहां राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की गई हैं, केरल और तमिलनाडु की स्थिति भी अच्छी नहीं है किंतु राज्यपालों ने अत्यंत संयमित रूप से कार्य किया है। राज्यपालों ने जनता के मध्य जाकर परिस्थितियों पर नियंत्रण प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की है। बंगाल के पूर्व राज्यपाल जगदीप धनखड़ हों या फिर वर्तमान राज्यपाल सी.वी. बोस दोनों ही आवश्यकता के समय नागरिकों के बीच पहुंचे हैं । उतर प्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल की सक्रियता भी अद्भुत है राज्य सरकार और केंद्र सरकार के प्रयासों को आगे बढ़ाने का कोई भी अवसर उनसे नहीं चूकता ।
“नाम में क्या रखा है”, कहने वाले लोग इस प्रयास का उपहास कर सकते हैं, राजभवन बनाम लोकभवन पर व्यापक वाद विवाद भी संभव हो सकता है किंतु जो परिवर्तन लोकभवन बने राजभवन में दिख रहा है उसकी प्रशंसा तो करनी ही होगी ।

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