बिहार की असली पहचान: लालू के छद्म से दिनकर की ज्योति तक

Screenshot-2025-11-15-at-11.19.41-PM.png

पटना। बिहार! यह शब्द सुनते ही मन में क्या उभरता है? चारा घोटाला, लाठी की चमक, भूराबाल साफ करने की वीरता, या लौंडा नाच की ठिठोली? अफसोस, पिछले तीन दशकों से बिहार की छवि एक ऐसे कार्टून में कैद हो गई है, जिसे लालू प्रसाद यादव ने अपनी ठठ्ठी हंसी और राजनीतिक करतबों से गढ़ा। लेकिन सच यह है कि हम वो बिहारी नहीं हैं, जो लालू बताते रहे हैं आपको। हम वो बिहारी हैं, जैसा रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कविताओं में उकेरा, नागार्जुन ने जन-संघर्षों में जीया, और विद्यापति ने मैथिली की मधुर वाणी में गाया। सच कह रहा हूं भाई, हमारी मुस्कान बुद्ध की शांत मुस्कान है, न कि लालू की ठठाते हुए हंसी की।

लालू ने बिहार को एक स्टिरियोटाइप में बदल दिया। उनकी लाठी, जो कभी चुनावी रैलियों में चमकती थी, कभी हमारी पहचान नहीं रही। हमारी लाठी तो वो थी, जिसे थामकर मोहनदास करमचंद गांधी महात्मा बने। गांधीजी ने अहिंसा की लाठी से साम्राज्य हिला दिया, जबकि लालू की लाठी केवल सत्ता की रक्षा करती रही। हमारी वीरता ‘भूराबाल’ साफ करने में नहीं, बल्कि ‘महावीर’ बनने में है। महावीर स्वामी की जैन परंपरा बिहार की मिट्टी से जुड़ी है, जहां अहिंसा और त्याग की शिक्षा दी जाती है। माटी की कसम खाकर कहता हूं साहब, हम ‘बिहारी टाइप’ भाषा नहीं बोलते। हम मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका बोलते हैं – ये हमारी मातृभाषाएं हैं। ‘बिहारी’ भाषा तो बस लालूनुमा लोग गढ़ते हैं, जो हिंदी की विकृत छवि पेश करते हैं।

हम चारा नहीं खाते, गाय-भैंस पालते हैं। ग्रामीण बिहार की अर्थव्यवस्था पशुपालन पर टिकी है, जहां दूध, खेती और परिश्रम जीवन का आधार हैं। लालू के जमाने में चारा घोटाला सुर्खियां बना, लेकिन हम तो सोहर, समदाउन और बटगमनी गाते हैं – ये लोकगीत हैं जो जन्म, विवाह और फसल की खुशी मनाते हैं। हम लौंडा नाच नहीं कराते, जो व्यावसायिक मनोरंजन का रूप है। हम घर नहीं जलाते चाचा, बल्कि सामा-चकेवा और पावनि जैसे त्योहारों में चुगले (बुराइयों) को जलाते हैं। ये रीतियां हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं, जो सदियों से चली आ रही हैं।

लालू हमारे लिए मात्र ‘कंस’ नहीं, जो पशुओं का चारा खा गए। वे बख्तियार खिलजी जैसे हैं, जिन्होंने नालंदा और विक्रमशिला की पुस्तकें जलाईं, ज्ञान की ज्योति बुझाई। लालू ने हमारी पहचान को खा डाला – सभ्यता, संस्कृति, रीति-नीति सबको एक झटके में ‘लालूनुमा’ बना डाला। बिहार प्राचीन काल से ज्ञान का केंद्र रहा। नालंदा विश्वविद्यालय ने विश्व को बौद्ध दर्शन सिखाया, वैशाली गणतंत्र की जन्मस्थली थी। लेकिन लालू के शासन में ‘बथानीटोला’ जैसे नरसंहार हुए, जहां खून की नदियां बहीं। हमारा बिहार तो दिनकर वाला सिमरिया है, जहां गंगा किनारे विद्यापति गाते थे: “बर सुखसार पाओल तुअ तीरे…”। नयन में नीर भरकर हम उसी बिहार को उगना की तरह तलाशते हैं – “उगना रे मोर कतय गेलाह”। उगना, हमारी लोककथा का प्रतीक, जो खोई हुई सभ्यता की खोज है।

आज बिहार फिर उभर रहा है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में सड़कें बनीं, शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार हुआ। लेकिन लालू का जिन्न फिर बोतल से बाहर आ गया है। उनकी पार्टी फिर सत्ता की दौड़ में है, पुरानी यादें ताजा कर रही हैं। ठीक है, चारा वापस नहीं आएगा, हम जैसे लोग ‘बेचारा’ ही बने रहेंगे। भविष्य लौटकर नहीं आएगा। लेकिन प्लीज सर, हमारी पहचान लौटा दीजिए! ‘भौंडे बिहारीपना’ की बनाई गई छवि को सदा के लिए बिरसा मुंडा जेल में बंद कर दीजिए। बिरसा मुंडा, आदिवासी क्रांति के नायक, जो अन्याय के खिलाफ लड़े। लालू नामक जिन्न को उसके चारागाह से निकालकर पड़ोसी राज्य के कारागार में भेज दीजिए। त्राहिमाम!

बिहार उसी भारत का हिस्सा है, जहां गंगा बहती है – पवित्रता, ज्ञान और संघर्ष की प्रतीक। दिनकर की ‘रश्मिरथी’ में कर्ण की तरह हम भी योद्धा हैं, नागार्जुन की कविताओं में किसान की तरह संघर्षशील। विद्यापति की प्रेम रसधार हमें मानवीय बनाती है। लालू की विरासत से मुक्त होकर हम नया बिहार गढ़ रहे हैं – आईआईटी, आईआईएम और स्टार्टअप्स का बिहार। लेकिन पहचान की लड़ाई अभी बाकी है। भारतवासियों, तय मानिए, हम वो बिहारी हैं जो विश्व को बुद्ध, अशोक और चंद्रगुप्त दे चुके हैं। लालू का बिहार अतीत है, दिनकर का बिहार भविष्य। आइए, इस पहचान को पुनर्जीवित करें। जय बिहार! जय भारत!

मोदी का कोई तोड़ नहीं : बिहार जीत मायने अनेक

pm-modi-22.jpg

प्रतीकों, मूल्यों, संस्कृति और परंपराओं की पिच पर आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं हरा पाएंगे। ये मोदी और बीजेपी की पसंदीदा पिच है। अगर इस पर विपक्ष फंसा तो उसकी करारी हार सुनिश्चित है विपक्ष हर बार यही ग़लती करता है। वो भारतीय मानस को समझे बिना मोदी को ललकारता है। हिंदू संस्कृति के मानबिंदुओं, परंपराओं और आस्था पर कटाक्ष करता है। अपमानित करता है। विपक्ष को लगता है कि वो हिंदुत्व को गाली देकर जीत सकता है।

विपक्ष को लगता है कि वो भारतीय सेना के शौर्य को चुनौती देकर चुनाव जीत सकता है। विपक्ष को ये लगता है कि जाति के नाम पर विभाजन उत्पन्न कर जीत सकता है। अगर इस मुगालते में विपक्ष है तो वो मोदी से कभी नहीं जीत सकता है। क्योंकि कौन से प्रतीकों को कहां और किस अंदाज़ में आज़माना है। ये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बख़ूबी जानते हैं। यूं कहूं तो वो इसमें सिद्धहस्त हैं। इसके जादूगर हैं।

हरियाणा, महाराष्ट्र के बाद बिहार विधानसभा के ये परिणाम बता रहे हैं कि — आप हिंदू संस्कृति का अपमान कर कोई भी चुनावी किला फतह नहीं कर सकते। आप सांविधानिक संस्थाओं का अपमान कर चुनाव नहीं जीत सकते। विपक्ष को ये समझना होगा कि जिस Gen-Z के नाम पर देश में नेपाल जैसी अराजकता का बिगुल फूंका जा रहा था । भारत के Gen-Z ने उसकी हवा निकाल दी है। उसने भर-भर के एकमुश्त वोट NDA की झोली में डालकर राजतिलक कर दिया है। महिलाओं ने बड़ी ख़ामोशी से प्रधानमंत्री मंत्री नरेंद्र मोदी की गारंटी पर अपना विश्वास जताया है।

देश की जनता ये जान चुकी है कि वर्षों तक सत्ता में रहने वाली कांग्रेस और आरजेडी समेत तमाम विपक्षी दल अब मुद्दाविहीन हो चुके हैं। क्या देश की जनता को ये नहीं दिखता रहा है कि – कैसे समूचा विपक्ष संसद की कार्यवाही नहीं चलने दे रहा था। क्या देश की जनता ये नहीं देख रही थी कि- कैसे राहुल गांधी के नेतृत्व वाला इंडी गठबंधन अराजकता का वातावरण बना रहा था। राष्ट्रीय हित के मुद्दों में इंडी गठबंधन के दलों का गतिरोध, तुष्टिकरण क्या देश की जनता नहीं देख रही थी?

विपक्षी दलों को क्या लगता कि केवल आचार संहिता लगते ही चुनावी जंग जीती जाती है? अगर ये सोचते हैं तो इससे बड़ी भूल भला क्या हो सकती है? जनता हर समय राजनीतिक दलों, उनके नेताओं के आचरणों को देखती है। परखती है। उसके बाद धैर्यपूर्वक ढंग से आंकलन करती है। तत्पश्चात अपना निर्णय सुनाती है।

जीत के ये आंकड़े बता रहे हैं कि —देश की जनता जान चुकी है कि विपक्ष ऐनकेन प्रकारेण केवल सत्ता हासिल करना चाहते हैं। उनकी नीयत में खोट है। क्योंकि क्षेत्रीय दलों को निगल जाने के बाद केवल 99 सीटें लोकसभा चुनाव में जीतने के बाद कांग्रेस जिस ढंग से ग़ैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार कर रही है। कांग्रेस के नेता और विशेष तौर पर राहुल गांधी जिस तरह से मोदी विरोध में—देश विरोधी मानसिकता से ग्रस्त दिख रहे हैं। सामाजिक समरसता को तोड़ने वाले बयान दे रहे हैं। देशद्रोही कम्युनिस्टों की लाइन पर चल रहे हैं। भारतीय समाज में अराजकता, हिंसा फैलाने जैसी बातें कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि जैसे कम्युनिस्टों ने राहुल गांधी को हाईजैक कर लिया हो।‌ क्या जनता ये सब नहीं देखती है?

अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर से लेकर, हिंदुत्व, छठी मैया आदि के विरुद्ध राहुल गांधी के अनर्गल बयान। मिथ्याप्रचार। भारतीय सेना को अपमानित करते हुए विभाजनकारी बयान देना। बात-बात में हिंदुओं को जातियों में बांटने की वकालत करना। भाषा के आधार पर विभाजन के बीज बोना।तुष्टिकरण के लिए नए वक्फ़ क़ानून के विरोध में उतरना। घुसपैठ जैसी घातक समस्या को ख़ारिज़ करना।लव जिहाद और कन्वर्जन के आतंक के विरुद्ध चुप्पी साधे रहना। मौन समर्थन देना। नेता प्रतिपक्ष की भूमिका को मज़ाक बना देना। विदेशों में जाकर भारत की सांविधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करना। हमारी लोकतांत्रिक परंपराओं पर आघात करना। कम्युनिस्टों की तर्ज़ पर माओ की तरह रेड बुक रखना। बार-बार संविधान का माखौल उड़ाना। RSS जैसे राष्ट्रनिष्ठ संगठनों पर झूठे आक्षेप लगाना। कांग्रेस शासित राज्यों में संविधान की हत्या करते हुए प्रतिबंध लगाने का कुकृत्य करना। प्रधानमंत्री जैसे गरिमामय पद पर बैठे ओबीसी वर्ग से आने वाले — नरेंद्र मोदी जी को — तू-तड़ाक जैसी भाषा से संबोधित करना। जनता ये सब देख रही थी और ये भी गांठ बांध रही थी कि — जो व्यक्ति प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे ओबीसी वर्ग के व्यक्ति के प्रति ऐसी घ्रणा रखता है। वो आम आदमी का क्या सम्मान करेगा? क्या कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल ये भूल गए कि – जनजातीय समाज की बेटी द्रौपदी मुर्मू जी के विरुद्ध उन्होंने राष्ट्रपति का कैंडिडेट उतारा था। वो क्यों? इसीलिए न ताकि कोई जनजातीय समाज का व्यक्ति सर्वोच्च आसंदी पर न बैठ सके। विपक्ष को क्या लगता है कि देश और बिहार की जनता ये सब नहीं देख रही थी? भला, हार मिलने पर — अपने कृत्य क्यों भूल जाते हैं?

वहीं परिवारवाद के शीर्ष उदाहरण राहुल गांधी, प्रियंका वाड्रा और तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव— ये सब क्या ये नहीं जानते हैं कि जनता अब ‘परिवारवाद’ को उखाड़ फेंक चुकी है। तिस पर भ्रष्टाचारी लालू परिवार। जंगलराज के आतंक का ख़ौफ, लालू यादव की विवशता। धर्मनिष्ठ आचरण वाले तेजप्रताप यादव जैसे भाई का निष्कासन, आरजेडी पर कब्ज़ा और लालू की विवशता भरी ईसाइयत से रंगी ‘हैलोवीन’ पार्टी। बिहार की जनता ये सब बारीकी के साथ देख रही थी। बिहार की जनता ये जान रही थी कि कैसे तेजस्वी यादव के यहां अब ईसाईयत और मिशनरीज़ का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। हिंदू परंपराओं को किनारे कर चोट पहुंचाई जा रही है।अन्यथा राजनीतिक फायदे के लिए ‘छठी मैया’ का राहुल गांधी ने जिस प्रकार से अपमान किया था। बिहार की जनता ये जान रही थी कि किसकी शह पर खेसारी जैसे दोयम दर्जे के लोग — श्रीराममंदिर पर अपमानजनक टिप्पणी कर रहे थे। क्या तेजस्वी यादव इन सबका विरोध नहीं करते?

वस्तुत: ये परिणाम चीख-चीख कर यही कह रहे हैं कि -जनता विपक्ष की नीयत के खोट को अच्छी तरह से जान-पहचान चुकी है। इसीलिए जनता अपने मतदान के ज़रिए इन दलों की नियति में हर बार खोट का सर्टिफिकेट लगा देती है। S-I-R, EVM हैक और वोट चोरी के मिथ्या आरोपों को जनता अच्छी तरह जान चुकी है।

जनता ने केन्द्र की मोदी सरकार आने के बाद विकास की जनकल्याणकारी योजनाओं का सीधा लाभ पाया है। विभिन्न योजनाओं की DBT के ज़रिए यानी सीधे खाते में राशि पहुंचने से लाभ पाया। शासन-प्रशासन में हर वर्ग और समाज का समुचित प्रतिनिधित्व देखा है। देश की जनता ने ये पुख्ता कर लिया है कि उसका वास्तविक हितैषी कौन है। उसने ये जाना है हिन्दू और हिंदुत्व का वास्तविक पक्षधर कौन है। क्योंकि जो भारतीय संस्कृति और परंपराओं को त्याज्य मानता है। वोटबैंक के लिए अपमानित करता है। वो तो उसका हितैषी कभी नहीं हो सकता है। जनता अब तत्कालिक लाभ की दृष्टि से ही नहीं बल्कि दूरदर्शिता के साथ अपने निर्णय लेती है। वो ये जान चुकी है कि वास्तव में देश की बागडोर किसके हाथों में सुरक्षित है। 2024 के लोकसभा चुनाव से लेकर तमाम विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति स्वीकार्यता के ये आंकड़े उपरोक्त बातों को बारंबार सिद्ध कर रहे हैं।

अगर कुछ नेताओं और राजनीतिक दलों को लगता है कि वो हवा-हवाई वादों के ज़रिए उसे बेवकूफ बना सकते हैं। भारत की अस्मिता पर प्रहार कर सत्ता पर आ सकते हैं। ऐसे में उन राजनीतिक दलों, नेताओं से बड़ा बेवकूफ कोई नहीं होगा। अगर राजनीतिक दलों को लगता है कि निष्पक्षता का चोला ओढ़कर — पेड वर्कर की तरह काम करने वाले, यूट्यूबर्स— उनका माहौल बना सकते हैं। जनता के दिलों में जगह बना सकते हैं तो ये भ्रम भी तोड़ लें। क्योंकि देश की जागरुक जनता अपना हानि-लाभ अच्छी तरह से जानती है। राजनीतिक दलों, विश्लेषकों, पत्रकारों और मीडिया कर्मियों से बेहतर अपने भविष्य का आंकलन करती है। उसके बाद ही मतदान करती है। अतएव अब अपने आपको कोई ग़लत-फ़हमी में न रखें। क्योंकि ये पब्लिक है सब जानती है। साथ ही जनादेश को अपमानित करने का भी कुकृत्य न करें। क्योंकि ऐसा तो होगा नहीं कि मीठा-मीठा, गप-गप, कड़वा-कड़वा- थू..थू। ये जनता अगर विपक्ष के तमाम हथकंडों के बावजूद भी अगर उस पर विश्वास नहीं जता रही है तो ये आत्मचिंतन का वक्त है। न कि जनादेश पर लांछन लगाने का समय है। अगर विपक्षी दल अब भी नहीं समझे तो उन्हें रसातल में हमेशा के लिए दफ्न होने से कोई शक्ति नहीं रोक सकती है।

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में NDA गठबंधन का विजयरथ एक बड़ी आश्वस्ति लिए हुए है। ये विजय रथ विपक्षी दलों ही नहीं अपितु भारत विरोधी वैश्विक शक्तियों को भी हर बार चित करता है। जब दुनिया भारत को कमजोर करने की साजिश रचती है। जार्ज सोरोस जैसे तमाम भारत विरोधी लोग और शक्तियां— मोदी को उखाड़ फेंकना चाहती हैं। उस समय देश के अंदर एक अदृश्य शक्ति का संचार होता है। जो संजीवनी की भांति मोदी की राजनीतिक शक्ति को और मजबूत करती है। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार की ये प्रचंड जीत केवल चुनावी जीत नहीं है। ये जीत केवल किसी राज्य की राजनीतिक सत्ता की जीत की तरह नहीं देखी जानी चाहिए। बल्कि इन जीतों में जो संदेश छुपा है। देश की जनता का मन और उसका भाव छिपा है। उसके निहितार्थ को भी समझने की ज़रुरत है। क्योंकि नियति ने 21 वीं सदी को भारत की सदी लिखा है। इसीलिए ये तमाम संकेत बहुत कुछ कह रहे हैं।

नया नैरेटिव-पुराना षड्यंत्र : लोकतंत्र को कटघरे में खड़ा करने की पुनरावृत्ति

EVM1.jpg

कैलाशचंद्र जी

दिल्ली । चुनावी मौसम के आते -जाते, विशेषकर हारते ही एक परिचित-सा शोर फिर गूंजने लगता है- “लोकतंत्र समाप्त”, “EVM में झोल”, “वोट चोरी”, “चुनाव आयोग पर भरोसा नहीं”। हाल के दिनों में यह रुझान और तेज हुआ है, जहाँ तथाकथित Gen-G को सड़क पर आना चाहिए क्यों नहीं आ रहे। देश खतरे में, संविधान खतरे में, या कुछ संगठित समूह अचानक सड़कों पर दिखाई देने लगते हैं, मानो लोकतंत्र के लिए अंतिम लड़ाई लड़नी हो।

वास्तव में यह भावनात्मक उबाल नहीं, बल्कि एक पूर्व-निर्मित राजनीतिक नैरेटिव है, जो हर उस समय सतह पर लाया जाता है जब जनादेश अनुकूल न हो।

चुनाव आयोग, जो दशकों से देश की लोकतांत्रिक विश्वसनीयता का आधार रहा है, अचानक से संदिग्ध घोषित कर दिया जाता है। EVM, जिसने बूथ-कैप्चरिंग और बलपूर्वक मतदान जैसी समस्याओं को काफी हद तक समाप्त किया, उसी मशीन को हर बार हार के बाद कटघरे में खड़ा किया जाता है। मज़ेदार बात यह है कि जब इन्हीं मशीनों से जीत मिलती है, तब यह तकनीक ‘लोकतंत्र की विजय’ कहलाती है, और जब परिणाम विपरीत हों तो ‘साजिश’!

इन आरोपों के पीछे एक रणनीति साफ दिखाई देती है।देश में भ्रम निर्माण कर विश्वास-क्षरण की राजनीति। जनता के मन में यह भ्रम पैदा करना कि संस्थाएँ निष्पक्ष नहीं हैं, प्रक्रिया विश्वसनीय नहीं है, और परिणाम स्वीकार करना ‘मूर्खता’ है।
इस रणनीति के साथ अक्सर कुछ और पुराने मुद्दे भी जोड़ दिए जाते हैं —
• “संविधान खतरे में है”
• “फासीवाद आ गया है”
• “असहमति की आवाज दबा दी गई है”
• “युवा पीढ़ी से भविष्य छीन लिया गया है”

इन सबका उद्देश्य सीधा है। समाज को दो ध्रुवों में बाँटना, और प्रत्येक चुनाव को जनादेश के बजाय वैचारिक युद्ध (Ideological warfare) में बदल देना।

लोकतंत्र की असली चुनौती विचारों की विविधता नहीं, सत्ता विहीन जीने की कल्पना न होना है। इसके लिये हार स्वीकार करने की अनिच्छा है। जनमत को हर बार कटघरे में खड़ा करना, संस्थाओं को अविश्वसनीय बताना और युवाओं को भ्रमित कर सड़कों पर उतारना आखिरकार लोकतंत्र को मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर करता है।

देश में वर्तमान आवश्यकता है कि राजनीतिक दलों के नेता, कार्यकर्ता अपनी कमज़ोरियों का आत्ममंथन करें, बजाय इसके कि हर बार जनता के निर्णय को संदिग्ध ठहराएँ।

लोकतंत्र आरोपों पर नहीं, विश्वास और परिपक्वता पर चलता है। और यह जिम्मेदारी सभी की है, न कि सिर्फ मतदाता की। आखिर कब तक ये नेता, पार्टी, दल, चमचे, योजनाकार और सलाहकार एजेंसियों को स्वयं के निकम्मेपन और आलस्य को व्यवस्था और जनता पर मढ़ते रहने का शौक पलता रहेगा? ये सवाल तो इनसे बनता है।

जनजातियों का गौरवपूर्ण अतीत और उनके साथ हो रहे वैश्विक षड्यंत्र

2020_42020042211060672106_0_news_large_23.jpg

~ कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

भारत और भारतीयता की पताका फहराने वाला जनजातीय समाज अपनी वैविध्यपूर्ण विरासत के साथ राष्ट्र के ‘स्व’ की छटा बिखेर रहा है। किन्तु जनजातीय समाज का निवास स्थान वनांचलों और ग्राम्य क्षेत्रों में होने के चलते उनके समक्ष कई तरह के संकट आ रहे हैं। उनमें सबसे घातक संकट ईसाई मिशनरियों के द्वारा कराया जाने वाला ‘कन्वर्जन’ है। मिशनरियों के कन्वर्जन का यह षड्यंत्र परतन्त्र भारत में अंग्रेजों के बर्बर शासन के समय से चला आ रहा है। ईसाई मिशनरियां वर्षों से प्रलोभन, सेवा और सहायता के हथियारों से कन्वर्जन कराने पर जुटी हुई हैं।
इसके लिए अन्तरराष्ट्रीय स्तर तक के षड्यंत्रों का एक दीर्घकालीन एजेंडा सामने दिखता है। कन्वर्जन के उसी एजेंडे को बढ़ाने के लिए गद्दार कम्युनिस्ट आतंकियों से लेकर , माओवादी, अर्बन और बौद्धिक नक्सलियों की बड़ी लंबी फौज सक्रिय है। जो ऐनकेन प्रकारेण जनजातीय समाज को हिन्दू समाज से अलग पहचान बताने और अलगाववाद की विषबेल रोपने में जुटे हुए हैं। इसके लिए मानवाधिकार से लेकर देश के संविधान और वैश्विक संधियों की आड़ लेकर अपने विभाजनकारी षड्यंत्रों को पूरा करने में टुकड़े-टुकड़े गैंग जुटी हुई है। ठीक ऐसा ही प्रयोजन 9 अगस्त को व्यापक रूप से
रचा जाता है। जब जनजातीय समाज को कभी ‘मूलनिवासी’ तो कभी उनके भ्रामक, कपोल कल्पित अधिकार हनन की कहानियों से बरगलाने के कुकृत्य किए जाते हैं। इन सबके पीछे स्पष्ट और एक एजेंडा जनजातीय समाज की हिन्दू पहचान को नष्ट करना। उन्हें अलग बताकर पृथकता और अलगाववाद के बीच लाना है। ताकि भविष्य में जनजातीय समाज का कन्वर्जन कराने में भारत विभाजनकारी शक्तियां सफल हो सकें।

कन्वर्जन और अलगाववाद, माओवाद के इस पूरे षड्यंत्र में वैश्विक यूरोपीय शक्तियाँ पर्दे के पीछे से काम कर रही हैं। इसी कड़ी में 9 अगस्त को ‘वर्ल्ड इण्डिजिनियस डे’ को एक हथियार के रूप में भारत विभाजनकारी शक्तियां प्रयोग करती हैं। इस सन्दर्भ में विश्व मजदूर संगठन (आईएलओ) के ‘इण्डिजिनियस पीपुल’ शब्द को ‘मूलनिवासी’ शब्द के रूप में प्रस्तुत कर जनजातीय समाज को पृथक बताने के कुकृत्य किए जाते हैं। जबकि वास्तविकता यह है किविभिन्न राष्ट्रों के सम्बन्ध में ‘इण्डिजिनियस पीपुल’ का अर्थ और उसे परिभाषित करना अत्यन्त कठिन है। यहां भारत के लिए मूलनिवासी और ‘इण्डिजिनियस पीपुल’ को परिभाषित करना और ही कठिन है। क्योंकि भारतीय इतिहास, आधुनिक इतिहास की तथाकथित थ्योरी भिन्न है। भारत की अपनी विविधतापूर्ण – एकात्म विरासत है जो स्थान-स्थान में भिन्न-भिन्न है। भारत के आधुनिक इतिहास में वर्णित आक्रांताओं के अलावा भारत भूमि में निवास करने वाला और राष्ट्र की पूजा करने वाला प्रत्येक व्यक्ति यहाँ का ‘मूलनिवासी’ है। क्योंकि भारतीय चेतना में जो भारत को माता कहकर मानता और पूजता है । प्रकृति का उपासक है वही भारत का मूलनिवासी है‌। अब ऐसे में मूलनिवासी या अन्य किसी भी शाब्दिक भ्रमजाल के द्वारा भारत को परिभाषित या पृथक्करण करना तो राष्ट्र की संस्कृति में ही नहीं है।

किन्तु विश्व मजदूर संगठन के गठन के उपरांत इसी ‘इण्डिजिनियस पीपुल’ शब्द के भ्रमजाल में 13 सितम्बर 2007 को यूएन द्वारा विश्व भर के ‘ट्राईबल’ कम्युनिटी के अधिकारों के लिए घोषणा पत्र जारी किया गया। प्रतिवर्ष 9 अगस्त को ‘वर्ल्ड इंडिजिनियस डे’ के रुप में मनाया जाने लगा जिसकी घोषणा दिसंबर 1994 में की गई थी। भारत ने भी राष्ट्र की संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार सम्प्रभुता, अस्मिता और अखण्डता के आधार पर इस पर अपनी सहमति दी । इसके साथ भारत ने स्पष्ट किया था कि इसका पालन भारतीय संविधान के अनुरूप ही किया जावेगा।

इसी सन्दर्भ में सन् 2006 में इण्टरनेशनल लॉ एसोशिएशन (टोरंटो जापान में आयोजित ट्राईबल अधिकारों के अधिवेशन में भारत के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वाई.के.सबरवाल ने जनजातीय एवं गैर जनजातीय समाज में समानता के विभिन्न बिन्दुओं को स्पष्ट करते हुए अपना आधिकारिक पक्ष रखा था । उन्होंने कहा था कि — “भारत के आधिकारिक मत के अनुसार भारत में रहने वाले सभी लोग ‘मूलनिवासी’ अथवा देशज हैं। इन सभी में से कुछ समुदायों को ‘अनूसूचित’ किया गया है जिन्हें सामाजिक,आर्थिक ,न्यायिक व राजनीतिक समानता के नाते विशेष उपबन्ध दिए गए हैं।”

इसके साथ ही जब विश्व कानून संगठन द्वारा स्पष्टता को लेकर मांग की गई। प्रश्न पूछा गया कि – क्या एसटी समाज अथवा जनजातीय समाज ही केवल भारत का ‘ट्राइबल’/मूलनिवासी/देशज समाज है? इस पर न्यायमूर्ति सबरवाल ने साफ इंकार किया । और उन्होंने अपने विभिन्न प्रश्नात्मक तथ्य रखे। साथ ही विश्व कानून संगठन के समक्ष भारत के सम्बन्ध में पक्ष रखते हुए कहा कि – ‘मूलनिवासी’ या ‘इण्डिजिनियस पीपुल’ को परिभाषित या पृथक से विवेचन का भारत कोई इत्तेफाक नहीं रखता। तत्पश्चात भारत के जनजातीय समाज के हितों के संरक्षण लिए यूएन द्वारा जारी घोषणा पत्र में भारतीय संविधान के अनुसार ही सहमति जताते हुए न्यायमूर्ति अजय मल्होत्रा ने 13 सितम्बर 2007 को मतदान किया था।

ये रही तथ्यों की बात। किन्तु इन सभी बातों के इतर आज जिस जनजातीय समाज को सनातन हिन्दू धर्म से अलग बतलाने के प्रयास एवं षड्यंत्र हो रहे हैं । क्या वह जनजातीय समाज हिन्दू धर्म से कभी अलग रहा है ? इस ओर विशेष ध्यानाकर्षण की आवश्यकता है। यह सर्वज्ञात तथ्य है कि भारत के इतिहास में जनजातीय समाज का योगदान कभी भी किसी से कम नहीं रहा है। जनजातीय समाज में समय-समय पर ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने अपनी सनातन संस्कृति पर हो रहे कुठाराघातों /कन्वर्जन के विरुद्ध संगठित होकर पुरजोर विरोध किया। मिशनरियों और लुटेरों के आतंक के विरुद्ध लड़ाई लड़ी और भारत के ‘स्वत्व’ की रक्षा करते हुए अपने शौर्य से परिचित करवाया है।

महाराणा प्रताप के वन निर्वासन के दौरान उनकी सेना में सभी प्रकार का सहयोग करने वाले भील सरदार पूंजा रहे‌ ‌। इन्हें बाद में महाराणा प्रताप ने ‘राणा’ की उपाधि दी। उनके नेतृत्व में हल्दीघाटी के युध्द में मुगलों को परास्त करने में भील समाज के योद्धाओं की बड़ी भूमिका रही है। उनके उसी पराक्रम की निशानी आज भी ‘मेवाड़ और मेयो कॉलेज’ के चिन्ह में अंकित है। इसी तरह टंट्या मामा के रूप में ख्यातिलब्ध टंट्या भील जिन्हें जनजातीय समाज देवतुल्य पूजता है। उन्होंने मराठों के साथ और स्वतन्त्र तौर पर अंग्रेजों के विरुद्ध आर-पार की लड़ाई लड़ी। फिर अंग्रेजी शासन ने उन्हें छल से पकड़कर फांसी दे दी। वहीं जनजातीय समाज के गुलाब महाराज संत के रुप में विख्यात हुए जिन्होंने जनजातीय समाज को धर्मनिष्ठा के लिए आह्वान दिया। जनजातीय समाज की शौर्य गाथा में कालीबाई और रानी दुर्गावती जैसी वीरांगनाओं का अपना गौरवपूर्ण अतीत रहा। इनके पराक्रम और बलिदान ने नारी शक्ति के महानतम् त्याग और शौर्य की गूंज से सम्पूर्ण राष्ट्र में चेतना का सूत्रपात किया। स्वर्णिम अध्याय रचा।

उसी बलिदानी परंपरा में सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा भीमा नायक ने अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दी। उन्होंने राष्ट्रयज्ञ के लिए अपना जीवन समर्पित कर यह सिखलाया कि राष्ट्र की स्वतंत्रता ही जीवन का ध्येय होना चाहिए। इसी क्रम में जनजातीय समाज के गोविन्दगुरु और ठक्कर बापा के समाज सुधार के कार्यों , उनकी सनातन निष्ठा से भला कौन परिचित नहीं होगा?

जनजातीय समाज के गौरव भगवान बिरसा मुंडा ने जो सनातन हिन्दू धर्म के प्रसार एवं ईसाई धर्मान्तरण के विरुद्ध जो रणभेरी फूँकी थी। भला उसे कौन विस्मृत कर सकता है? भगवान बिरसा मुंडा ने जनजातीय समाज के कन्वर्टेड बन्धुओं की सनातन हिन्दू धर्म की वैष्णव शाखा में वापसी कराई । इसके लिए उन्होंने ‘उलगुलान’ के बिगुल के रुप में जिस क्रांति की ज्वाला को प्रज्ज्वलित किया था । वही तो सनातन हिन्दू समाज की सांस्कृतिक विरासत है।

जनजातीय समाज को जब हिन्दू समाज से अलग बताने के प्रयास किए जाते हैं। उस समय बिरसा मुंडा दीवार बनकर खड़े होते हैं। यदि जनजातीय समाज हिन्दू धर्म से अलग होता तो क्या भगवान बिरसा मुंडा धार्मिक सुधार आंदोलन चलाते? क्या वे धार्मिक पवित्रता,तप, जनेऊ धारण करने ,शाकाहारी बनने ,मद्य (शराब) त्याग के नियमों को जनजातीय समाज में लागू करवाते?भगवान बिरसा मुंडा ने जो धार्मिक चेतना जागृत की थी। उसमें उनके अनुयायी – ब्रम्हा, विष्णु, रुद्र, मातृदेवी, दुर्गा, काली ,सीता के स्वामी, गोविंद, तुलसीदास और सगुण तथा निर्गुण उपासना पद्धति को मानते थे। यही तो सनातन हिन्दू संस्कृति का मूल स्वरूप है जिसे समूचा हिन्दू समाज बड़ी श्रध्दा एवं आदरभाव के साथ पूजता है। ऐसे में सवाल यही है कि – यदि जनजातीय समाज हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग नहीं है. तो क्या भगवान बिरसा मुंडा द्वारा चलाई गई परिपाटी झूठ है?

सन् 1929 में गोंड जनजाति के लोगों के मध्य ‘भाऊसिंह राजनेगी’ के सुधार आन्दोलनों भी अपने आप में मील के पत्थर हैं। उन्होंने
यह स्थापित किया था कि उनके पूज्य ‘बाड़ा देव’ और कोई नहीं बल्कि शिव के समरुप ही हैं। भाऊसिंह राजनेगी ने कट्टर हिन्दू धार्मिक पवित्रता का प्रचार करते हुए माँस-मदिरा त्याग करने का अह्वान किया था।इसी प्रकार 19 वीं और 20 वीं शताब्दी में छोटा नागपुर के आराओं में ‘भगतों’ का सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए उदय हुआ ‌। इसके लिए जात्रा और बलराम भगत का योगदान इतिहास के चिरस्मरणीय पन्नों में दर्ज है। उन्होंने जनजातीय समाज के बीच
गौरक्षा, कन्वर्जन (धर्मान्तरण) का विरोध, मांस-मदिरा त्याग करने का सन्देश दिया। समाज को जागृत और सशक्त किया था।

वहीं सन् 1930 में बोरोबेरा के बंगम मांझी ने भी जनजातीय समाज के लिए मांस-मद्य त्याग करने और खादी पहनने का सन्देश दिया था। उनके इस पुनीत कार्य के गवाह सरदार वल्लभ भाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद बने। जो देश के पहले राष्ट्रपति बने। ये दोनों महापुरुष बंगम मांझी के कार्यक्रम में पहुंचे थे‌। वहां सभा की थी। वहां लगभग 210 की संख्या में संथालों का उपनयन संस्कार भी हुआ था। उपनयन संस्कार तो सनातन हिन्दू धर्म के सोलह संस्कारों में से ही एक है ,तो जनजातीय समाज हिन्दू धर्म से अलग कैसे हो सकता? इसी प्रकार अंग्रेजों ने मिदनापुर (बंगाल) के लोधाओं को ‘अपराधी जनजाति’ घोषित कर दिया था। यह वही लोधा थे जो वैष्णव उपासना पद्धति में विश्वास रखते थे जो कि राजेंद्रनाथदास ब्रम्ह के अनुयायी थे। इसी प्रकार असम की (सिन्तेंग,लुशई,ग्रेरो,कुकी) जनजातियों ने अंग्रेजों का विरोध किया था जो कि वैष्णव संत शंकर देव के अनुयायी थे।

जनजातीय समाज में ऐसे अनेकानेक महापुरुष ,समाज सुधारक , क्रांतिकारी हुए जिन्होंने सनातन हिन्दू संस्कृति,राष्ट्र की रक्षा के लिए प्राणोत्सर्ग कर दिया । फिर अपने व्यक्तित्व और कृतित्व से भारतीय मानस के ह्रदयतल में बस गए‌‌ ।ऐसे में कम्युनिस्टों /ईसाई मिशनरियों और बौध्दिक नक्सलियों के सारे प्रयोजन सिर्फ़ और सिर्फ़ जनजातीय गौरव-बोध समाप्त करने वाले सिद्ध होते हैं। इसके लिए वे ‘वर्ल्ड इंडिजिनियस डे’ के सहारे जनजातीय समाज को उनके पुरखों की संस्कृति से अलग करने का कुत्सित कृत्य करते हैं। ताकि वे जनजातीय समाज की अस्मिता ,गौरवबोध को खत्म कर कन्वर्जन के सहारे भारत की अखण्डता को खंडित कर सकें। इन सभी तथ्यों,उदाहरणों और जनजातीय समाज की गौरवपूर्ण शौर्यगाथा से तो यह एकदम से स्पष्ट सिद्ध होता है कि टुकड़े टुकड़े गैंग का उद्देश्य विभाजन, हिंसा और उत्पात है। किन्तु इन्हें यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि जनजातीय समाज जिस क्षण इन षड्यंत्रकारियों की सच्चाई से अवगत होगा। उस क्षण फिर कोई बिरसा मुंडा ,कालीबाई, दुर्गावती,राणा पूंजा,टंट्या भील,भाऊसिंह राजनेगी आदि आएँगे और षड्यंत्रकारियों का संहार करेंगे!!

scroll to top