अखिल भारतीय साहित्य परिषद अखिल भारतीय अध्यक्ष द्वारा जारी वक्तव्य

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डॉ. सुशील चंद्र त्रिवेदी

दिल्ली । भाषा केवल अभिव्यक्ति का ही माध्यम नहीं, अपितु संस्कृति की भी संवाहक होती हैं। किसी भी समाज की परम्परा और उसका जीवन दर्शन उसके द्वारा प्रयुक्त भाषा व्यवहार में प्रतिध्वनित होता है। भाषाएँ केवल संचार का साधन भी नहीं होती, वे स्मृति की संवाहक, विरासत का भंडार और पहचान की जीवनरेखाएं होती हैं। सारा विश्व बहुभाषिकता का समृद्ध समुच्चय है।

प्रत्येक भाषा का एक पारंपरिक समुदाय होता है, जिसका अपना देशज व्यवहार और सांस्कृतिक दृष्टि होती है, जो उसी भाषा में व्यक्त हो पाती हैं। अन्य भाषाओं में उनका रूपांतरण उसी तरह संभव नहीं है जैसे भारतीय भाषाओं के पोंगल, नवरात्र, दीपावली, होली, यज्ञ, पर्यूषण, धम्म जैसे शब्दों का अन्य भाषाओं में अनुवाद। इसीलिए प्रत्येक भाषा एक विश्वदृष्टि रखती है और जीवन की व्याख्या करने का एक विशिष्ट दृष्टिकोण प्रदान करती है।

भारत जैसे चिर पारंपरिक राष्ट्र में भाषाई गौरव तथा अपनी अपनी भाषा के प्रति प्रेम और लगाव का होना स्वाभाविक है। किन्तु इस भाषायी स्वाभिमान ने भारत देश में अपने से भिन्न भाषा और भाषा-भाषियों के प्रति प्रेम और सौहार्द का भाव रखा है।

हम भारतवासी प्राचीन काल से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के प्रति आस्था रखते हैं अतः अथर्ववेद की इस मान्यता के प्रति हमारा दृढ़ विश्वास हैं कि, ‘जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्’ अर्थात् यह पृथ्वी कई तरह की भाषाएँ बोलने वाले और विभिन्न धर्मों का पालन करने वाले मनुष्यों को एक परिवार की तरह धारण करती है। अतः भाषाई वैविध्य हमारी समृद्धि का द्योतक है न कि पारस्परिक राग द्वेष का।

हमारी यह सुदृढ़ मान्यता है कि भारत की सभी भाषाएं राष्ट्र भाषा हैं। हिंदी अखिल भारतीय संपर्क भाषा है। लोक जीवन में भाषाई प्रतिद्वंदिता अथवा वैमनस्य को कभी कोई स्थान नहीं रहा। राजनैतिक स्वार्थ और दुराग्रहों के कारण कुछ राजनीतिक दल पारस्परिक द्वेष और संघर्ष का वातावरण भले ही बनाते हों किन्तु हम भारत के लोंग प्राचीन काल से यात्राओं, तीर्थाटनों, चलचित्रों और व्यापारिक मंडियों के माध्यम से भाषायी वैविध्य को स्वीकार करते हुए, इस विविधता में एकात्मता के दर्शन करते रहे है।

भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्तमान में 22 भाषाओं को आधिकारिक मान्यता प्राप्त है। इन भाषाओं के अतिरिक्त देश के विभिन्न क्षेत्रों में सैकड़ों बोलियाँ प्रचलित हैं, जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और भाषाई विविधता की सजीव प्रतीक हैं। ये भाषाएँ प्रतिस्पर्धी पहचान नहीं बल्कि राष्ट्रीय जीवन के व्यापक फलक पर पूरक रंग हैं। इन भाषाओं का संरक्षण, संवर्धन और उत्सव प्रतिरोध का कार्य नहीं है-येसमावेशिता और स्वाभिमान के प्रति भारत की प्रतिबद्धता की पुष्टि हैं। अतः भारतीय भाषा दिवस (11दिसंबर) के उपलक्ष में पूरे देश में व्यापक समारोह आयोजित किए जाए।

भारत के जीवंत और निरंतर विकसित होते सांस्कृतिक ताने-बाने में भी भाषाई विविधता का स्वर अपनागौरवशाली स्थान रखता है।

(लेखक अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अध्यक्ष हैं)

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अधिवेशन -2025 रीवा (म. प्र.) में पारित प्रस्तावः ओ टी टी प्लेटफॉर्म की सामग्री का नियमन हो।

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रीवा: पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई’ और ‘परोपकराय सताम् विभूतयः’ की मान्यता पर आधारित हमारी संस्कृति आज अति भौतिकता से प्रभावित होकर बाजारवाद का संत्रास झेल रही है।आज हम जिस घोर व्यावसायिक समय में जी रहे हैं, उसने जीवन के मूलभूत संसाधनों को व्यापार में परिवर्तित कर दिया है। तकनीकों पर बाजारवादी शक्तियों का नियंत्रण है। इसी की परिणति है कि डिजिटल मीडिया का एक अति विशाल उद्योगतंत्र खड़ा हो गया है तथा पारंपरिक प्रसारण माध्यमों की जगह ऑनलाइन स्ट्रीमिंग ने ले लिया है। ओवर-द-टॉप(ओटीटी) के सभी प्लेटफॉर्म और गेमिंग एप्पस पर अधिकांश मनोरंजनकी सामग्री का स्वरूप बदलकर नकारात्मक एवं जीवनमूल्यों रहित होता जा रहा है।

मनोरंजन के नाम पर इनके द्वारा जो हिंसक, अश्लील एवं मर्यादा हीन सामग्रियां परोसी जा रही हैं, वे अत्यंत लज्जास्पद एवं निंदनीय हैं। ये युवावर्ग और बालमन व मस्तिष्क में उग्रता, अश्लीलता, विकृत यौनाचार और नशाखोरी जैसे दुराचारों को महिमा मंडित कर उन्हें अधोपतन की ओर अग्रसित कर रही हैं। इन माध्यमों में प्रदर्शित अधिकांश दृश्य, वोकिज़्म और नकारात्मक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने वाली होती हैं। आज इस तरह के प्लेटफॉर्म और गेमिंग एप्पस युवाओं को आत्महत्या के लिए प्रेरित कर रहे है। साथ ही अधिकांश प्लेटफॉर्म भारत के सांस्कृतिक मूल्यों एवं परम्पराओं पर आघातकर उनको विकृत रूप में चित्रित करती हैं। इनका अनियंत्रित प्रसारण समाज एवं राष्ट्र जीवन के लिए अत्यधिक घातक हैं।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद, जो भारतीय साहित्य, संस्कृति और चिंतन के संरक्षण तथा संवर्धन के लिएसमर्पित है, इस गंभीर स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करती है। परिषद का यह मानना है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि समाज की गरिमा और नैतिकता को नष्ट करने की छूट दी जाए। स्वतंत्रता और अनुशासन, सृजन और मर्यादा, ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

अतः यह अधिवेशन भारत सरकार तथा सभी राज्य सरकारों से मांग करता है कि –

1. ओ टी टी प्लेटफॉर्म एवं गेमिंग एप्पस पर प्रसारित होने वाली प्रत्येक सामग्री के परीक्षण, नियमन, और वर्गीकरण हेतु शासन द्वरा एक सशक्त, स्वायत्त विधायी नियामक संस्था का गठन किया जाए।
2. डिजिटल माध्यमों में प्रस्तुत किसी भी दृश्य, संवाद या विचार जो भारत की संविधानिक गरिमा, धार्मिकआस्था, सांस्कृतिक मूल्यों या सामाजिक मर्यादा और सनातन परंपरा को आहत करते हों, उन पर कड़ीनिगरानी रखी जाए।
3. किशोरों और युवाओं के लिए उपयुक्त सामग्री के आयु आधारित नियंत्रण तंत्र को अनिवार्य बनाया जाए।
4. जो मंच या माध्यम अश्लीलता, हिंसा, नशाखोरी या विकृत जीवन मूल्यों का प्रचार करते हैं, उनके विरुद्धकठोर कानूनी दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
5. भारतीय भाषाओं और संस्कृति के संवर्धन हेतु भारतीय मूल्यों पर आधारित वैकल्पिक मनोरंजन माध्यमों को प्रोत्साहित किया जाए।
अंत में, अखिल भारतीय साहित्य परिषद का मानना है कि साहित्य, संस्कृति और समाज की शुचिता तभी सुरक्षित रह सकती है जब जनमानस में सजगता, संवेदनशीलता और नैतिकता बनी रहे। अतः अखिल भारतीय साहित्य परिषद भारत सरकार तथा सभी राज्य सरकारों से यह मांग करती है की उपर्युक्त सभी विषयों का संज्ञान लेकर इस दिशा में उचित कदम उठाए।

ऋण के जाल में फंसे देशों से भारत के राज्यों को मिलती है सीख

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दिल्ली । वैश्विक स्तर पर कई विकासशील एवं अविकसित देशों पर लगातार बढ़ रहे ऋण के दबाव के चलते इन देशों की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव स्पष्टत: दिखाई दे रहा है। इन देशों द्वारा अपने नागरिकों को लम्बे समय तक मुफ्त सुविधाएं उपलब्ध कराना जारी रखा गया है एवं यहां की सरकारों द्वारा अपने आय के साधनों में पर्याप्त वृद्धि नहीं की गई है। नागरिकों को दी जाने वाली सुविधाओं को ऋण लेकर भी जारी रखना अब इन देशों के लिए आत्मघाती निर्णय साबित होता हुआ दिखाई दे रहा है, और आज यह देश दिवालिया होने के मुहाने पर खड़े हैं तथा इन्हें अपना सामान्य प्रशासन चलाने के लिए खर्च करने हेतु भी ऋण लेना पड़ रहा है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक आंकलन के अनुसार, अक्टूबर 2025 में वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद का 98.9 प्रतिशत सार्वजनिक ऋण बकाया है, जो वर्ष 2030 तक 102.3 प्रतिशत तक बढ़ जाने की सम्भावना है। विभिन्न देशों के सार्वजनिक ऋण, आय से अधिक खर्च करने की प्रवृति, अधिक ब्याज दर, आय में कम वृद्धि होना, आदि कारकों के चलते लगातार बढ़ता जा रहा है। विकासशील एवं अविकसित देश अपनी आय में वृद्धि नहीं कर पाते हैं परंतु, उन्हें अपने नागरिकों को विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए खर्च लगातार बढ़ाते रहना होते हैं। इन्हीं कारणों के चलते श्रीलंका, अर्जेंटीना, सूडान, ग्रीस, मालदीव, सेनेगल, आदि देशों में तो आर्थिक आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी थी एवं विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं अन्य वैश्विक वित्तीय संस्थानों द्वारा इन देशों की मदद के लिए आगे आना पड़ा था, अन्यथा यह देश लगभग दिवालिया घोषित होने की स्थिति में पहुंच गए थे। वर्ष 2025 में विश्व के प्रथम 10 देशों में, जिनका ऋण का सकल घरेलू उत्पाद से प्रतिशत सबसे अधिक है, शामिल हैं – जापान (229.6 प्रतिशत), सूडान (221.5 प्रतिशत), सिंगापुर (175.6 प्रतिशत), ग्रीस (146.7 प्रतिशत), बहरीन (142.5 प्रतिशत), इटली (136.8 प्रतिशत), मालदीव (131.8 प्रतिशत), अमेरिका (125 प्रतिशत), सेनेगल (122.9 प्रतिशत) एवं फ्रान्स (116.5 प्रतिशत)।

ग्रीस, घाना, हैती, मोजांबीक, पाकिस्तान, जाम्बिया, फिलिपींस, श्रीलंका, कीन्या, अर्जेंटीना, आदि देशों द्वारा अधिक मात्रा में लिए गए ऋण के चलते इनकी वित्तीय स्थिति डावांडोल हो चुकी है। इन देशों द्वारा अपने खर्चों को व्यवस्थित तरीके से नहीं किया गया था एवं केवल जनता को मुफ्त में सुविधाएं उपलब्ध कराना लम्बे समय तक जारी रखा गया था तथा साथ में आय बढ़ाने के साधनों पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। इससे इन देशों का बजटीय घाटा लगातार बढ़ता रहा तथा मजबूरी में इन्हें अपने साधारण सरकारी कामकाज चलाने के लिए भी ऋण लेते रहना पड़ा है। वर्ष 2001 में युगांडा में वित्तीय संकट खड़ा हो गया था एवं उस समय पर युगांडा अपने सामान्य खर्चों को जारी रखने के स्थिति में भी नहीं था।

भारत में भी कुछ राज्य “फ्रीबी” के नाम पर कुछ ऐसी योजनाएं चला रहे हैं जिनके अंतर्गत राज्य की जनता के बिजली एवं पानी के बिल समय समय पर माफ किये जा रहे हैं। किसानों, बुजुर्गों एवं मातृशक्ति के बैंक खातों में सीधे ही कुछ राशि प्रति माह जमा की रही है। जबकि, इन राज्यों की वित्तीय स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि इनके बजट इस अतिरिक्त खर्च को वहन कर सकें। कुछ राज्य तो आज मजबूरी में इन योजनाओं को चलायमान बनाए रखने के लिए बाजार से ऊंची ब्याज दर पर ऋण भी लेने लगे हैं। जिसका प्रभाव इन राज्यों की वित्तीय स्थिति पर विपरीत रूप से पड़ रहा है। यदि समय पर ये राज्य नहीं चेते एवं इन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं किया तो ये राज्य अपने भारी भरकम ऋणों पर ब्याज अदा करने में चूक करने की ओर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। जाहिर तौर पर जब राज्यों की आर्थिक स्थिति की चर्चा होती है तो इसका असर राज्यों के विकास और इन राज्यों में निवास कर रहे नागरिकों के जीवन पर भी पड़ता है। लोकलुभावन राजनीति इन राज्यों की वित्तीय स्थिति को बहुत बुरे तरीके से प्रभावित कर रही है। भारतीय रिजर्व बैंक के वार्षिक प्रतिवेदन में भी राज्यों की वित्तीय स्थिति को लेकर कई गंभीर पहलु और सवाल खड़े किए गए हैं। विशेष रूप से पंजाब, केरल, झारखंड, राजस्थान और पश्चिम बंगाल आदि राज्य बढ़ते कर्ज के बोझ तले दबे जा रहे हैं और इन राज्यों की अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही है। हाल ही के समय में पंजाब, केरल, राजस्थान, पश्चिम बंगाल एवं बिहार की वित्तीय सेहत बहुत बिगड़ी है।

सभी राज्यों की वित्तीय सेहत का विस्तार से आकलन करने पर ध्यान में आता है कि कई राज्यों द्वारा अनियंत्रित रूप से चलाई जा रही मुफ्त योजनाओं, लोकलुभावन घोषणाओं, अत्यधिक सब्सिडी देने एवं पुरानी पेंशन योजना बहाली से इन राज्यों की वित्तीय सेहत बहुत बुरी तरह से बिगड़ रही है। राज्य, विशेष रूप से सत्ता प्राप्त करने के उद्देश्य से, कई लोकलुभावन घोषणाएं करते हैं जैसे कि बिजली एवं पानी मुफ्त में उपलब्ध कराने का वादा, उर्वरकों पर सब्सिडी प्रदान करने का वादा आदि जिसका सीधा असर राज्य की माली हालत पर पड़ता है। पंजाब की आर्थिक स्थिति पूर्व में ही बहुत गम्भीर अवस्था में पहुंच चुकी है फिर वहां नई सरकार ने किए गए चुनावी वादे अर्थात मुफ्त बिजली उपलब्ध कराने के अपने वादे पर कार्य करना शुरू कर दिया है जिससे पंजाब की स्थिति निश्चित रूप से और अधिक बिगड़ने जा रही है और पंजाब को ऋण की किश्त एवं ऋणों पर ब्याज अदा करने हेतु भी ऋण लेना पड़ रहा है। किन परिस्थितियों में, कितने प्रकार की, कितनी और किस स्तर तक लोक लुभावन घोषणाएं की जानी चाहिए, इस सम्बंध में अब नियम बनाने का समय आ गया है। वैसे यदि ऋण को उत्पादक कार्यों पर खर्च किया जाय तो अधिक ऋण-सकल घरेलू अनुपात अपने आप में बुराई नहीं है परंतु जब ऋण लेकर इसे अनुत्पादक कार्यों जैसे मुफ्त बिजली एवं मुफ्त पानी उपलब्ध कराने जैसे कार्यों पर खर्च किया जाता है तो इसका राज्य की आर्थिक व्यवस्था पर बहुत ही बुरा असर पड़ता है। चुनावों के वादे पूरे करने के लिए राज्यों द्वारा ऋण लिए जा रहे हैं। इन्हीं कारणों के चलते पंजाब की आर्थिक हालत आज बहुत ही दयनीय स्थिति में पहुंच गई हैं। देश के कई राज्य आज ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं कि इन राज्यों को केंद्र सरकार द्वारा आर्थिक मदद यदि समय पर नहीं पहुंचाई जाती तो इन राज्यों की स्थिति भी आर्जेंटीना, श्रीलंका अथवा ग्रीस जैसी बनती दिखाई देती। कुछ राज्यों की स्थिति तो यह है कि इनके रोजमर्रा के खर्चे चलाने के लिए उनकी कुल आय का 90 प्रतिशत भाग इन खर्चों पर उपयोग हो जाता है जिसके परिणाम स्वरूप राज्य के विकास कार्यों पर खर्च करने को कुछ बचता ही नहीं है। अब इन राज्यों की आय कैसे बढ़े? इन राज्यों द्वारा लगातार की जा रही लोक लुभावन घोषणाओं के कारण इन राज्यों के खर्चे लगातार अनियंत्रित रूप से बढ़ते जा रहे हैं। इस तरह के खर्चों को करने के लिए नित नए ऋण लिए जा रहे हैं और इन ऋण राशि का उपयोग उत्पादक कार्यों में नहीं लगा पाने के कारण ये राज्य अपनी आय में वृद्धि भी नहीं कर पा ररही हैं। इस प्रकार ये राज्य “डेट ट्रैप” की स्थिति में फंसते जा रहे हैं। आय का 25 से 30 प्रतिशत भाग ऋण का ब्याज भुगतान करने में ही खर्च हो रहा है। पंजाब तो अब आर्थिक मदद के लिए केंद्र सरकार से लगातार गुहार लगा रहा है। इसी तरह राजस्थान, केरल, पश्चिम बंगाल एवं बिहार की स्थिति भी बिगड़ रही है। अगर राज्य पूंजीगत खर्च नहीं कर रहे हैं तो अपना भविष्य अंधकारमय बना रहे हैं। इस प्रकार तो भविष्य में इन राज्यों की विकास दर भी रुक जाने वाली है।

विभिन्न राज्यों के वित्तीय घाटे की स्थिति एवं प्रवृत्ति पर गम्भीरता पूर्वक विचार कर इस पर रोक लगने का समय अब आ गया है। उत्पादक कार्यों पर सब्सिडी दी जाय तो ठीक है परंतु यदि यह लोक लुभावन वायदों को पूरा करने पर दी जा रही है तो इन पर अब अंकुश लगाया जाना चाहिए। केंद्र सरकार द्वारा आगे बढ़कर इस सम्बंध में कुछ नियम जरूर बनाए जाने चाहिए। यदि इन राज्यों की वित्तीय स्थिति लोक लुभावन घोषणाओं को पूरा करने की नहीं है तो, इस प्रकार की घोषणाएं चिन्हित राज्यों द्वारा नहीं की जानी चाहिए, ऐसे नियम बनाए जाने चाहिए। सहायता की राशि केवल चिन्हित व्यक्तियों को ही प्रदान की जानी चाहिए न कि राज्य की पूरी जनता को उपलब्ध करायी जाय। जैसा कि बिजली माफी योजना के अंतर्गत किया जा रहा है। राज्य के समस्त परिवारों को 330 यूनिट बिजली मुफ़्त में उपलब्ध कराए जाने के प्रयास हो रहे हैं। यदि राज्य की आर्थिक हालत बिगड़ रही है तो इसका खामियाजा भी अंततः उस प्रदेश की जनता को ही भुगतना पड़ता है। यह राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, आदि मदों पर होने वाले खर्च में कटौती करते हैं, जो राज्य के आर्थिक विकास एवं भविष्य में आने वाली पीढ़ी के लिए ठीक नहीं है। राज्य में आर्थिक विकास की गति कम होने से इन राज्यों में रोजगार के अधिक अवसर भी निर्मित नहीं हो पा रहे है।

सांस्कृतिक मार्क्सवाद का प्रतिकार: बौद्धिक योद्धाओं की तैयारी और नई पीढ़ी का बोध

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कैलाश चंद्र

दिल्ली । आज का युग केवल आर्थिक या राजनीतिक संघर्षों का नहीं है, बल्कि यह विचारों का युद्ध है— “Mind Colonization” का युग, जहाँ व्यक्ति का मस्तिष्क, उसकी सोच, और उसकी सांस्कृतिक चेतना पर आक्रमण किया जा रहा है।

यह युद्ध बंदूक या बारूद से नहीं, बल्कि विचार, मीडिया, शिक्षा और मनोरंजन के माध्यमों से लड़ा जा रहा है। इस युद्ध का नाम है— कल्चरल मार्क्सवाद (#Cultural_Marxism)।

भारत जैसे विविधता और परंपरा-प्रधान देश के लिए यह चुनौती और भी गंभीर है। क्योंकि यहाँ संस्कृति केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। जिसमें परिवार, समाज, भाषा, उत्सव, कला और आस्था सभी जुड़े हैं। वह इन सभी से अभिव्यक्त होती है। अतः इसका संरक्षण केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि बौद्धिक और वैचारिक जिम्मेदारी भी है।

वर्तमान समय विचारों का युद्धक्षेत्र है। यहाँ न शस्त्र चल रहे हैं, न सेनाएँ— परंतु एक सतत युद्ध चल रहा है मनुष्य की चेतना पर। इस युद्ध का सामना केवल वही कर सकता है जो जागरूक, तर्कशील और सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी है।

इसलिए, आज आवश्यकता है बौद्धिक योद्धाओं की। जो विचार, तर्क और सृजन के माध्यम से समाज की रक्षा करें।

हमें युवाओं में यह भावना जगानी होगी कि वे गर्व करना सीखें, स्वयं पर, परिवार, पूर्वजों पर, इससे आगे केवल अपने अतीत पर गर्व न करें, बल्कि भविष्य के निर्माता भी बनें। जब नई पीढ़ी अपने अस्तित्व का बोध पाएगी, जब शिक्षा में भारतीयता का समावेश होगा, जब संवाद संस्कृति के केंद्र में सत्य और विवेक आएगा, तब भारत अपनी वैचारिक स्वतंत्रता पुनः प्राप्त करेगा।
यह केवल प्रतिकार नहीं, बल्कि पुनर्जागरण का मार्ग है।
और इस पुनर्जागरण का नेतृत्व वही करेगा
जो विचार को अस्त्र और सत्य को शस्त्र बनाकर युग के युद्ध में उतरेगा।

सांस्कृतिक मार्क्सवाद: संकल्पना और चुनौती
मार्क्सवाद मूलतः आर्थिक वर्ग-संघर्ष पर आधारित विचारधारा थी। लेकिन बीसवीं शताब्दी में एंटोनियो ग्राम्स्की और फ्रैंकफर्ट स्कूल के विचारकों ने इसे नया रूप दिया। जहाँ संघर्ष अब “आर्थिक वर्गों” के बजाय “संस्कृति और विचार” के स्तर पर लड़ा जाना था।
ग्राम्स्की ने कहा— “किसी भी समाज की आर्थिक संरचना को बदलने से पहले उसकी सांस्कृतिक संस्थाओं पर अधिकार जमाना आवश्यक है।”

इसी से उत्पन्न हुआ कल्चरल मार्क्सवाद— एक ऐसी विचारधारा जो पारंपरिक धर्म, संस्कृति, परिवार, भाषा और नैतिकता को “दमनकारी संस्थाएँ” बताकर उनकी आलोचना और विखंडन करती है।
यह विचारधारा कहती है कि समाज को “मुक्त” करने के लिए पहले उसके “मूल्यों” को नष्ट करना होगा।
भारत के संदर्भ में यह चुनौती और भी व्यापक है, क्योंकि यहाँ समाज की शक्ति संस्कृति और परंपरा में निहित है। जब यहाँ के मूल प्रतीक, देवी-देवता, परिवार प्रणाली, और मातृभूमि की अवधारणा पर लगातार प्रश्न उठाए जाते हैं— तब यह केवल विचार नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा पर आघात होता है।
‘Reject – Resist – Rebel’: सांस्कृतिक विखंडन की रणनीति
सांस्कृतिक मार्क्सवाद तीन चरणों में काम करता है—
सर्वप्रथम हमें उसके चरण, उद्देश्य और भारतीय समाज में उसके प्रभाव को
Reject (अस्वीकार)- पारंपरिक संस्कृति और धर्म की निरंतर आलोचना करना, हिंदू ग्रंथों, देवी-देवताओं और परंपराओं को लगातार पिछड़ा बताना ही कार्य है।
Resist (प्रतिरोध)- सांस्कृतिक प्रतीकों और संस्थाओं का विरोध करना, जाति के नाम पर वाद विवाद, पितृसत्तात्मक आरोपण, ब्राह्मणवाद के नाम पर अनेक प्रकार के जैसे विमर्शों से समाज में द्वंद्व उत्पन्न कर लड़ाना
Rebel (विद्रोह) – सामाजिक संघर्ष और विभाजन को बढ़ावा देना, धर्मांतरण, अलगाववाद, नक्सलवाद जैसे रूपों में अभिव्यक्ति करना
यह रणनीति धीरे-धीरे व्यक्ति को उसकी जड़ों से काट देती है। उसका विश्वास, गर्व, और सांस्कृतिक आत्मबोध खो जाता है।

बौद्धिक योद्धाओं की आवश्यकता
इस विचारधारा का प्रतिकार केवल नारों या भावनाओं से संभव नहीं है।
इसका उत्तर विचार से ही दिया जा सकता है— विचार के स्तर पर, ज्ञान के माध्यम से।
यही कारण है कि आज समाज को बौद्धिक योद्धाओं (Intellectual Warriors) की आवश्यकता है— वे व्यक्ति जो अध्ययन, लेखन, तर्क, और संवाद के माध्यम से समाज की वैचारिक रक्षा करें।
बौद्धिक योद्धा वह है जो:
• अपने समाज की जड़ों को समझता है,
• पश्चिमी विमर्शों को तर्क से चुनौती देता है,
• और नवयुवकों में आत्मगौरव और विवेक दोनों का विकास करता है।
ऐसे लोग केवल ‘रक्षक’ नहीं, बल्कि ‘पथ-प्रदर्शक’ भी होते हैं। वे धर्म को अंधविश्वास नहीं, बल्कि जीवनदर्शन के रूप में प्रस्तुत करते हैं; संस्कृति को स्थिरता नहीं, बल्कि जीवंतता का प्रतीक मानते हैं।

शिक्षा और संवाद की भूमिका
सांस्कृतिक मार्क्सवाद ने सबसे अधिक प्रभाव शिक्षा और मीडिया पर डाला है।
पाठ्यपुस्तकों, फिल्मों, विश्वविद्यालयों और सोशल मीडिया के माध्यम से यह विचार धीरे-धीरे यह स्थापित करता है कि पारंपरिक मूल्य “पुराने” और “दमनकारी” हैं।
अतः आवश्यक है कि शिक्षा का भारतीयकरण केवल नारे तक सीमित न रहे, बल्कि उसमें भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत साहित्य, दार्शनिक विविधता और इतिहास का स्वदेशी दृष्टिकोण पुनः स्थापित हो।
इसी तरह संवाद के क्षेत्र में हमें ऐसे मंच विकसित करने होंगे जहाँ स्वतंत्र चिंतन, बहस और तर्क के माध्यम से हमारी सांस्कृतिक दृष्टि पुनः सशक्त हो।

नई पीढ़ी का बोध और जिम्मेदारी
कहा गया है— “हमें अपनी पीढ़ी को केवल यह नहीं बताना है कि हम क्या हैं, बल्कि यह भी समझाना है कि वह क्या है।”
यह वाक्य आज के युग में अत्यंत प्रासंगिक है। आधुनिक युवा सूचना और तकनीक के युग में जी रहा है, लेकिन आत्मबोध से दूर जा रहा है। वह जानता है कि उसके पास क्या है, पर यह नहीं जानता कि वह स्वयं क्या है।

इसलिए, युवाओं को यह समझाना आवश्यक है कि आधुनिकता का अर्थ परंपरा से विमुख होना नहीं, बल्कि परंपरा को नए युग के अनुसार पुनः परिभाषित करना है।
यदि युवा अपने मूल्यों, भाषा, और संस्कृति पर गर्व करेगा, तभी वह सच्चे अर्थों में “वैश्विक नागरिक” भी बन सकेगा।

विवेकानंद ने कहा था— “राष्ट्र की उन्नति उसके युवाओं की विचार शक्ति पर निर्भर करती है।”
आज वही समय है जब यह विचार पुनः प्रासंगिक हुआ है।

आधुनिकता और आत्मबोध का समन्वय
विकास का अर्थ केवल तकनीकी उन्नति नहीं, बल्कि मानसिक और सांस्कृतिक प्रगति भी है।
जब हम आधुनिकता और परंपरा को परस्पर विरोधी मान लेते हैं, तब हम स्वयं को विभाजित कर लेते हैं।
भारत की आत्मा यही सिखाती है — “नवीनता परंपरा के भीतर से ही जन्म लेती है।”
इसलिए, आधुनिक युवा को यह सीखना होगा कि वह पश्चिम की उपयोगिता को स्वीकार करे, पर भारत की आत्मा को न भूले।
वह विज्ञान का विद्यार्थी हो सकता है, पर उसे वेदों के ज्ञान, भगवद्गीता के दर्शन, और उपनिषदों की आत्मा से भी परिचित होना चाहिए।
इसी संतुलन में भविष्य का भारत सुरक्षित और सशक्त रहेगा।

प्रतिकार की दिशा: विचार से कार्य तक
सांस्कृतिक मार्क्सवाद का प्रतिकार तीन स्तरों पर किया जा सकता है—
• बौद्धिक प्रतिकार:- अध्ययन, लेखन, विमर्श और अकादमिक तर्क के माध्यम से सांस्कृतिक सत्य को पुनः स्थापित करना।
• संस्थागत प्रतिकार:- शिक्षा, मीडिया, साहित्य, और कला के माध्यम से वैकल्पिक विचार मंच तैयार करना।
• सांस्कृतिक पुनर्जागरण:- लोक परंपराओं, भाषा, त्योहारों और परिवार प्रणाली के प्रति गौरव का पुनरुद्धार करना।
जब ये तीनों स्तर एक साथ सक्रिय होंगे, तभी यह वैचारिक युद्ध जीता जा सकेगा।

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