नरवाना में 15 साल की लड़की की बाल विवाह की कोशिश नाकाम, आधे रास्ते से वापस लौटी बारात

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जितेंद्र परमार

दिल्ली ।प्रशासन की तत्परता और लोगों के सहयोग से हरियाणा के जींद जिले के नरवाना में एक 15 साल की लड़की की शादी ऐन वक्त पर रोक दी गई। जब बारात सिर्फ दस किलोमीटर दूर थी, तभी स्थानीय प्रशासन, बाल विवाह निषेध अधिकारी (सीएमपीओ) और सामाजिक संगठन मिशन टू द डेस्परेट एंड डेस्टिट्यूट (एमडीडी) ऑफ इंडिया की टीम मौके पर पहुंच गई। ये खबर सुनते ही बारात ने रास्ते से ही वापस लौटने का फैसला किया। इस बीच टीम ने लड़की के परिवार को समझाया और उसे भी बाल कल्याण समिति के सामने पेश किया। चूंकि लड़का भी नाबालिग है, इसलिए उसे अपने परिवार के साथ अधिकारियों के सामने पेश होने का निर्देश दिया गया है।

दरअसल इस मामले की शुरुआत कुछ दिन पहले हुई, जब एमडडी के सदस्य को एक कॉल आई। संस्था के जिला समन्वयक नरेंद्र शर्मा बताते हैं, “कॉल करने वाले की उम्र ज्यादा नहीं थी, उसने पहचान उजागर न करने की शर्त पर इस शादी की जानकारी दी। उसने बताया कि सोशल मीडिया पर चल रहे एक जागरूकता वीडियो में मेरा नंबर देखा था, जिसे नोट कर लिया था।”

एमडीडी ऑफ इंडिया, नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन का सहयोगी है, जो जिले में बाल संरक्षण के क्षेत्र में जमीन पर काम कर करता है। संगठन लगातार जागरूकता कार्यक्रम चलाता है साथ ही पुलिस थानों, धर्मस्थलों और स्कूलों में कार्यक्रमों के जरिए लोगों को बाल विवाह के खिलाफ जागरूक करता है।

दिलचस्प बात यह है कि कुछ दिन पहले, लड़की के ताऊ ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) को एक पत्र लिखकर बताया था कि लड़की के पिता ने दूल्हे के परिवार से 1.5 लाख रुपये लेकर अपनी नाबालिग बेटी की शादी तय कर दी है। इस शिकायत पर कार्रवाई करते हुए, एनसीपीसीआर ने जींद पुलिस को भी इस मामले में कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। इस तरह उसी फोन कॉल और ताऊ की शिकायत ने मिलकर पूरी कार्रवाई की नींव रखी।
इसलिए सूचना मिलते ही नरेंद्र शर्मा ने पुलिस और बाल विवाह निषेध अधिकारी की संयुक्त टीम के साथ सही वक्त पर पहुंचकर होने वाली इस गैरकानूनी शादी को रोक दिया। शर्मा बताते हैं, “जब दस्तावेज जांचे और परिवार से पूछताछ की गई तो मालूम हुआ कि लड़की, चार बहनों में सबसे बड़ी है और वो भी महज साढ़े पंद्रह साल की है। वह छठी कक्षा में पढ़ती थी लेकिन हाल ही में स्कूल जाना बंद कर दिया था।” इस तरह शादी में अब बस कुछ ही घंटे बाकी रह गए थे और घर पर करीब 20 मेहमान भी इकट्ठा हो चुके थे। बच्ची के माता-पिता को समझाया गया कि बाल विवाह कानूनन अपराध है। इसके बाद माता-पिता ने थाने में हलफनामा देकर कहा कि अब वह बिटिया की शादी बालिग होने के बाद ही करेंगे।

इस बीच बाल कल्याण समिति के सामने पेश होने पर लड़की ने परिवार के साथ वापस जाने से साफ मना कर दिया। उसने अधिकारियों से कहा, “मेरे माता-पिता जबरदस्ती शादी करा रहे हैं। मुझे उनसे डर लगता है, मैं उनके साथ घर नहीं जाना चाहती।” फिलहाल लड़की बाल आश्रय गृह में है जहां उसकी काउंसलिंग की जा रही है।
बाल विवाह रोकने में आपसी तालमेल और जागरूकता की अहमियत पर एमडीडी ऑफ इंडिया के सीईओ सुरिंदर सिंह मान ने कहा, “इस मामले से साफ पता चलता है कि एक फोन कॉल या एक शिकायत भी बच्चों की जिंदगी बचा सकती है। जब सब मिलकर काम करते हैं तो बड़े से बड़ा बदलाव मुमकिन है। इसी तरह के सहयोग और सक्रियता से हम 2030 से पहले ही हरियाणा को बाल विवाह मुक्त बना सकते हैं।”

Guru Jambeshwar University and C-LAB Join Hands to Bring Child Rights into Mainstream Academia

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Delhi : In a significant step towards institutionalising child protection and child rights within academic frameworks, the Centre for Legal and Behaviour Change for Children (C-LAB) and Guru Jambeshwar University of Science and Technology (GJUST) have signed a Memorandum of Understanding (MoU) to introduce a comprehensive range of undergraduate, postgraduate, and diploma courses and joint research studies in child rights and child protection. C-LAB is a leading institute incubated by India Child Protection (ICP). ICP is a partner of Just Rights for Children (JRC) which is the country’s largest network with over 250 NGO partners working for child protection.

As part of the MoU, while C-LAB will develop the content, syllabi, schedules, duration, and eligibility criteria for the various courses, and provide technical support, expertise and assistance to GJUST on issues related to child rights and child protection, Haryana’s top-ranked state university will take all the necessary policy decisions to launch the courses under its the Centre for Distance and Online Education (CDOE), and provide the necessary infrastructure and academic ambience for conducting such courses on the university campus. Both GJUST and C-LAB have decided to keep the fee for these courses minimum so that more and more students can enrol and strengthen the child protection ecosystem in the coming years.

Building on this vision, Prof. Narsi Ram Bishnoi, Vice Chancellor, Guru Jambeshwar University of Science and Technology, said, “It is our endeavour to produce dynamic and knowledgeable human resources and become a knowledge powerhouse capable of contributing to national development and the welfare of society. This MoU with C-LAB further cements our vision to create a cadre of informed and sensitised individuals who can contribute meaningfully to policy, advocacy, law enforcement, media, and community-based interventions and strengthen the child protection ecosystem.”

Remarking on the importance of this collaboration between field expertise and academic capacity building, Dr Sangita Gaur, Associate Director (Training), India Child Protection, said, “This collaboration marks a crucial milestone in bridging the gap between grassroots realities and academic discourse. It will ensure that future professionals across disciplines are equipped with a rights-based understanding of child protection. Our focus is to address critical issues such as child marriage, trafficking, child labour, online safety, and legal frameworks, including national and international child rights laws.”

The MoU was signed by Prof. Narsi Ram Bishnoi, Vice-Chancellor, Guru Jambheshwar University of Science & Technology and Rajat Kumar, Trustee, India Child Protection. Those present during the event included Dr Vijay Kumar, Registrar, GJUST and Prof O. P. Sangwan, Dean, International Affairs, among others.
With over 30 years of experience and over 52,000 students enrolled in campus spread over 372 acres in Hisar, the University is A+ Grade accredited University from National Assessment and Accreditation Council (NAAC). As per the 2025 National Institutional Ranking Framework (NIRF), the university, which is among the top 50 state universities across the country, has been ranked as number one government university in Haryana. The University is presently offering more than 100 UG, PG, Ph.D Programmes through campus, Distance and Online Distance Learning modes.

Meanwhile, C-LAB has already launched a first-of-its-kind Certificate Course for Support Persons in Dealing with Cases of Child Sexual Abuse. The demand for support persons has grown significantly since the Supreme Court’s 2023 directive mandating their appointment in all child sexual abuse cases.

विदेशी निधि से धर्मांतरण : बदल रही है भारत की नीति

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

दिल्ली । भारत जैसे बहुलतावादी, लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, बाल कल्याण, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में इन संगठनों ने दशकों से समाज के कमजोर वर्गों तक पहुंच बनाकर उल्लेखनीय कार्य किए हैं। परंतु, इसके साथ ही विदेशी निधि के उपयोग को लेकर उठे सवालों, विशेषकर धर्मांतरण और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों ने एक व्यापक और गंभीर बहस को जन्म दिया है। यही कारण है कि केंद्र सरकार ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) को अधिक सख्त, पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में निर्णायक कदम उठाए हैं।

वास्तव में, विदेशी अंशदान का नियमन कोई नया विषय नहीं है। भारत में इसका प्रारंभ 1976 में हुआ था, जिसे 2010 में संशोधित कर अधिक व्यवस्थित रूप दिया गया। इसके बावजूद समय के साथ यह महसूस किया गया कि कुछ संगठनों द्वारा कानून की खामियों का लाभ उठाकर विदेशी धन का दुरुपयोग किया जा रहा है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 के बाद से अब तक 20,000 से अधिक एनजीओ के एफसीआरए पंजीकरण रद्द या समाप्त किए जा चुके हैं। वर्तमान में लगभग 16,000 संगठनों को ही विदेशी निधि प्राप्त करने की अनुमति है, जिन्हें प्रतिवर्ष करीब 20,000 से 22,000 करोड़ रुपये की विदेशी सहायता प्राप्त होती है।

वस्‍तुत: यह आंकड़ा स्वयं इस बात का संकेत है कि विदेशी धन का प्रवाह कितना व्यापक और प्रभावशाली है। जब इतनी बड़ी मात्रा में धन देश के भीतर आ रहा हो, तब उसके उपयोग की पारदर्शिता और वैधता सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी बन जाती है। विभिन्न जांचों में यह सामने आया है कि कई संस्थाओं ने प्राप्त धन का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए नहीं किया। लेखा-जोखा प्रस्तुत नहीं करने से लेकर धन को अन्य गतिविधियों में स्थानांतरित कर देना सामने आता रहा है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) तथा गृह मंत्रालय की रिपोर्टों में भी वित्तीय अनियमितताओं की ओर संकेत किया गया है, जिसने सरकार को कठोर कदम उठाने के लिए प्रेरित किया।

इस पूरे विमर्श में सबसे संवेदनशील मुद्दा धर्मांतरण का रहा है। विशेष रूप से आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में कार्यरत कुछ संगठनों पर यह आरोप सिद्ध पाए गए हैं कि उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य या सामाजिक सेवा की आड़ में कमजोर वर्गों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित किया। कई राज्यों- जैसे झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से समय-समय पर इस प्रकार की शिकायतें सामने आई हैं।

यहां ध्‍यातव्‍य है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता प्रदान करता है, किंतु जब धर्म परिवर्तन में प्रलोभन, दबाव या विदेशी प्रभाव की भूमिका सामने आए, तब यह कानून के साथ नैतिक प्रश्न भी बन जाता है। जिसका सही समाधान देना निश्‍चि‍त तौर पर सरकार का काम है, यही कारण है कि कई राज्य सरकारों ने धर्मांतरण विरोधी कानून भी बनाए हैं, जिनमें ऐसे मामलों में सख्त दंड का प्रावधान है। इस संदर्भ में विदेशी निधि का दुरुपयोग एक अतिरिक्त चिंता के रूप में उभरा है, क्योंकि इससे बाहरी प्रभावों के माध्यम से आंतरिक सामाजिक संरचना को प्रभावित करने की आशंका बढ़ती है।

यही कारण है जो पिछले वर्षों में कई चर्चित संगठनों पर कार्रवाई हुई है, ‘ग्रीनपीस इंडिया’ को लेकर सामने आया कि उसने विदेशी निधि के माध्यम से भारत की विकास परियोजनाओं के खिलाफ अभियान चलाए, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया’ को वित्तीय अनियमितताओं के कारण अपने संचालन को सीमित करना पड़ा। ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ और ‘ऑक्सफैम इंडिया’ जैसे प्रतिष्ठित संगठनों पर भी विदेशी निधि के उपयोग को लेकर प्रश्न उठे हैं।

इसके अतिरिक्त, कुछ संगठनों के मामले राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से अधिक गंभीर पाए गए। ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया’ (पीएफआई) और उससे जुड़े संगठनों पर कट्टरपंथी इस्‍लामिक, जिहादी गतिविधियों और विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग के आरोप सिद्ध होने के बाद प्रतिबंध लगाया गया। इसी प्रकार, ‘इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन’, जिसकी स्थापना जाकिर नाइक ने की थी, पर भी वैचारिक कट्टरता (जिहाद) फैलाना पाया गया। राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील मामलों में राजीव गांधी फाउंडेशन और राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट के एफसीआरए पंजीकरण रद्द किए गए, जिससे यह स्पष्ट संदेश गया कि सरकार इस विषय पर किसी प्रकार की ढिलाई बरतने के पक्ष में नहीं है।

इन परिस्थितियों में सरकार द्वारा एफसीआरए में संशोधन लाना एक स्वाभाविक और आवश्यक कदम था। 2020 में किए गए संशोधनों में कई महत्वपूर्ण प्रावधान जोड़े गए, जैसे कि विदेशी निधि को अन्य एनजीओ को स्थानांतरित करने पर रोक, प्रशासनिक खर्च की सीमा को 50 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत करना और सभी विदेशी अंशदान को सिर्फ स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की नई दिल्ली स्थित मुख्य शाखा में खोले गए खाते के माध्यम से प्राप्त करना अनिवार्य किया गया। इन प्रावधानों का उद्देश्य धन के प्रवाह को अधिक नियंत्रित और पारदर्शी बनाना रहा है।

अब प्रस्तावित नए संशोधनों में यह व्यवस्था की जा रही है कि यदि किसी संगठन का पंजीकरण रद्द होता है, तब उस स्‍थ‍िति मे उसकी विदेशी निधि से निर्मित संपत्तियों को जब्त किया जा सकेगा। साथ ही इन संपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक विशेष प्राधिकरण के गठन की भी योजना है। पंजीकरण के नवीनीकरण की प्रक्रिया को भी अधिक सख्त और समयबद्ध बनाया गया है, जिससे अनियमित संस्थाएं स्वतः ही प्रणाली से बाहर हो जाएं।

सरकार का तर्क स्पष्ट है; यह कानून उन तत्वों के खिलाफ है, जो विदेशी निधि का उपयोग व्यक्तिगत लाभ, अवैध धर्मांतरण या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए करते हैं। गृह राज्य मंत्री द्वारा संसद में दिए गए वक्तव्यों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि एफसीआरए के पुराने प्रावधानों में कई अस्पष्टताएं थीं, जिनका दुरुपयोग हो रहा था। नए संशोधन इन खामियों को दूर करने का प्रयास हैं, ताकि एक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था स्थापित की जा सके।

समग्र रूप से देखा जाए तो विदेशी अंशदान विनियमन में हो रहे ये बदलाव भारत की बदलती नीति और प्राथमिकताओं को दर्शाते हैं। एक ओर सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक संतुलन और आर्थिक पारदर्शिता को सुनिश्चित करना चाहती है, वहीं दूसरी ओर वह यह भी स्पष्ट कर रही है कि ईमानदारी और नियमों के दायरे में काम करने वाले संगठनों के लिए कोई बाधा नहीं है।

वास्तव में, यह समय की मांग है कि विकास और सामाजिक सेवा के नाम पर आने वाले विदेशी धन का उपयोग पूरी तरह पारदर्शी और उत्तरदायी ढंग से हो। यदि ऐसा नहीं होगा तो यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी संकट खड़ा करेगा। इसलिए सख्त लेकिन संतुलित नीति ही इस दिशा में सबसे उपयुक्त मार्ग है।

लोकनायक श्रीराम

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– प्रशांत पोळ

नागपुर : कालचक्र की गति तेज है. वह घूम रहा है. घूमते – घूमते पीछे जा रहा है. बहुत पीछे. इतिहास के पृष्ठ फड़फड़ाते हुए हमें ले चलते हैं त्रेतायुग में. कई हजार वर्ष पीछे..!

इस त्रेता युग में पृथ्वी पर एक बहुत बड़ा भूभाग है, जिसे आर्यावर्त नाम से जाना जा रहा है. यह प्रगत मानवी संस्कृति का क्षेत्र है. समृद्ध देश है. उच्चतम एवं उदात्त मानवी भाव-भावनाओं से समाज प्रेरित है. समाज में ज्ञान की लालसा है. अध्ययनशील विद्यार्थी है. नए-नए ग्रंथ लिखे जा रहे हैं. उन्नत ऐसी ऋषि संस्कृति का समाज पर प्रभाव है. यज्ञ – याग हो रहे हैं. वायुमंडल और समाज जीवन, दोनों में शुद्धता की सतत प्रक्रिया चल रही है. देवाधिदेव, पृथ्वी पर स्थित इस आर्यावर्त को निहार रहे हैं. इस पर विचरण करने की आकांक्षा रख रहे हैं.

इस आर्यावर्त में, सरयू नदी के किनारे बसा हुआ एक बहुत बड़ा जनपद है, जो ‘कोशल’ नाम से विख्यात है. यह समृद्ध है. धन-धान्य से सुखी है. आनंदी है.

_कोसलो नाम मुदितः स्फीतो जनपदो महान् ।_
_निविष्टः सरयूतीरे प्रभूतधनधान्यवान् ॥५॥_
(वाल्मीकि रामायण / बालकांड / पांचवा सर्ग)

*इस जनपद की राजधानी है – अयोध्या. समूचे आर्यावर्त में विख्यात है. अयोध्या, जहां युद्ध नहीं होता. श्रेष्ठतम नगरी, जिसे स्वयं मनु महाराज ने बनाया और बसाया है.*

_अयोध्या नाम नगरी तत्रासील्लोकविश्रुता ।_
_मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम् ॥६॥_
(बालकांड / पांचवा सर्ग)

यह नगरी अति विशाल है . भव्य है. 12 योजन (अर्थात 150 किलोमीटर) लंबी है और 3 योजन (अर्थात 38 किलोमीटर) चौड़ी है. इस नगरी में विस्तीर्ण राजमार्ग है. लता – वृक्ष, फल – फूलों से यह नगरी सुशोभित है. इस नगरी के चारों ओर गहरा खंदक खुदा हुआ है. सुरक्षा की पूर्ण व्यवस्था है. इस नगरी के लोग उद्यमी हैं. कला प्रेमी है. नृत्य – गान – संगीत – नाटक में परिपूर्ण है. सभी नागरिक धर्मशील, संयमी, सदा प्रसन्न रहने वाले तथा चारित्र्यवान है.

ऐसी पवित्र और संपन्न नगरी जिसकी राजधानी है, ऐसे कोशल जनपद पर, महा पराक्रमी राजा दशरथ राज्य कर रहे हैं. जिस प्रकार आकाशपट पर, सारे नक्षत्रलोक में चंद्रमा राज करता है, उसी प्रकार, शीतल, सुखद शासन राजा दशरथ का है.

_तां पुरीं स महातेजा राजा दशरथो महान् ।_
_शशास शमितामित्रो नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ॥२७॥_
(बालकांड / छठवा सर्ग)

चंडप्रतापी राजा दशरथ, अपने अष्टप्रधानों के साथ लोक कल्याणकारी राज्य चला रहे हैं. उनके सभी आठो मंत्री यह उच्च गुणों से और शुद्ध विचारों से ओतप्रोत है. यह मंत्री है – धृष्टि, जयंत, विजय, सौराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमंत्र. इनमें, सुमंत्र यह अर्थशास्त्र के ज्ञाता है तथा राज्यकोषीय व्यवहार देख रहे हैं.

*यह सारे मंत्री, एक विचार से, देश हित के लिए प्रेरित है. यह सभी विनय संपन्न है. शस्त्र विद्या के ज्ञाता है. सुदृढ़ और पराक्रमी है. इनके सिवा सुयज्ञ, जाबालि, कश्यप, गौतम, दीर्घायु, मार्कंडेय और कात्यायन यह ब्रह्मर्षि भी राजा दशरथ के मंत्री है. ऐसे मंत्रियों के साथ, गुणवान राजा दशरथ, कोशल का शासन कर रहे हैं.*

_ईदृशैस्तैरमात्यैश्च राजा दशरथोऽनघः ।_
_उपपन्नो गुणोपेतैरन्वशासद् वसुन्धराम् ॥२०॥_
(बालकांड / बीसवां सर्ग)

किंतू…

किंतु आर्यावर्त में सभी कुछ ठीक नहीं चल रहा है. अयोध्या तो सुरक्षित है. किंतु अयोध्या के बाहर, न केवल कोशल जनपद में, वरन् समूचे आर्यावर्त में, एक दहशत की काली छाया छाई हुई है. सज्जन शक्ति भयभीत है. ऋषि, मुनियों को, ब्रह्मर्षियों को यज्ञ – याग करना भी कठिन हो रहा है. किसी भी शुभ कार्य में आसुरी शक्तियों के विघ्न डालने का भय लगातार बना हुआ है.

इस दहशत का केंद्र बिंदु है – रावण. सुदूर दक्षिण में, सिंहल द्वीप अर्थात लंका का राजा. पुलस्त्य मुनि जैसे विद्वान ऋषि का पौत्र और वेदविद् विश्रवा का पुत्र. परम शिव भक्त. किंतु अन्यायी, क्रोधी और कपटी राजा. सज्जन शक्ति को कष्ट देने में आसुरी आनंद प्राप्त करने वाला.

इस रावण ने सारे आर्यावर्त में अपने क्षत्रप बनाकर रखे हैं. यह सभी क्षत्रप दानवी प्रवृत्ति के, आसुरी वृत्ति के है. नागरिकों का उत्पीड़न कर रहे हैं. उनसे धन की वसूली करते हैं. सामान्य नागरिकों का जीवन इन्होंने दूभर करके रख दिया है. पूरे आर्यावर्त की सज्जन शक्ति, रावण के इन आसुरी प्रवृत्ति के क्षत्रपों से भयभीत है. अत्यंत कष्ट में है.

यह सज्जन शक्ति प्रार्थना कर रही है, इस सृष्टि के रचयिता से, परमपिता परमेश्वर से, की ‘रावण नाम का राक्षस, आपका कृपा प्रसाद पाकर, अपने असीम बल से हम लोगों को अत्यंत पीड़ा दे रहा है. कष्ट दे रहा है. हम में यह शक्ति नहीं है, कि हम इसे परास्त करें. अतः आप ही कुछ कीजिए.’

_भगवंस्त्वत्प्रसादेन रावणो नाम राक्षसः ।_
_सर्वान् नो बाधते वीर्याच्छासितुं तं न शक्नुमः ॥६॥_
(बालकांड / पंद्रहवा सर्ग)

देवलोक में सृष्टि के निर्माता, सृष्टि के रचयिता, परमपिता परमेश्वर यह प्रार्थना सुन रहे हैं. वह पृथ्वी के पवित्र देश आर्यावर्त में रावण ने दस दिशाओं में मचाया हुआ उत्पात भी देख रहे हैं. रावण का आतंक, एक प्रकार से प्रत्यक्ष अनुभव भी कर रहे हैं. सज्जन शक्ति को हो रहे कष्ट भी देख रहे हैं.

*इन सब को देखते हुए. सृष्टि के रचयिता यह तय कर रहे हैं कि आर्यावर्त के नागरिकों को निर्भय होकर जीवन यापन करने के लिए रावण का विनाश अवश्यंभावी है. किंतु यह विनाश किसी चमत्कार से नहीं होगा, ऐसा परमपिता परमेश्वर ने तय किया है. नरसिंह अवतार में चमत्कार आवश्यक था, कारण हिरण्यकशपू में ऐसी दानवी शक्ति निर्माण हुई थी, जिसे किसी सामान्य व्यक्ति के द्वारा नष्ट करना संभव नहीं था.*

किंतु इस बार नहीं.

*इस बार कोई चमत्कार नहीं. यदि इस बार भी चमत्कार से रावण को नष्ट करते हैं, तो सज्जन शक्ति निष्क्रिय हो जाएगी. जब कभी समाज में आसुरी प्रवृत्ति जन्म लेगी, तब यह सज्जन शक्ति प्रतीक्षा करेगी परमपिता परमेश्वर के किसी अवतार की. वह प्रत्यक्ष संघर्ष नहीं करेगी.*

यह उचित नहीं है. इस सज्जन शक्ति के आत्मविश्वास को जगाना होगा. उनमें यह विश्वास निर्माण करना होगा की सारी सज्जन शक्ति यदि एक होती है, संगठित होती है, तो किसी भी बलशाली दानवी शक्ति को परास्त कर सकती है. परमपिता परमेश्वर के अंश इसमें माध्यम बनेंगे. किंतु सारा संघर्ष करेगी सज्जन शक्ति.

बस्. तय हो गया. भगवान अवतार अवश्य लेंगे. किंतु किसी चमत्कार के बगैर. वे तो संगठित सज्जन शक्ति मे देवत्व का संचार करने का कार्य मात्र करेंगे. इसके लिए वे माध्यम बनेंगे, आर्यावर्त की पवित्र नगरी अयोध्या के चंडप्रतापी राजा दशरथ के पुत्र के रूप में.

श्रीराम के रूप में..!

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