1983 में घटे असम के नेली नरसंहार की सच्चाई सार्वजनिक की जाए — PPFA की मांग

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नव ठाकुरिया

गुवाहाटी: देशभक्त नागरिकों के संगठन पैट्रियोटिक पीपल्स फ्रंट असम (PPFA) ने असम सरकार द्वारा विधानसभा में नेली नरसंहार से जुड़ी रिपोर्ट पेश किए जाने के निर्णय का स्वागत करते हुए कहा है कि 1983 में घटित इस भयावह घटना की वास्तविक सच्चाई अब देश के सामने आनी चाहिए।
संगठन ने यह भी कहा कि असमिया समाज को ‘मुस्लिम-विरोधी’ बताने की किसी भी साजिश को नाकाम किया जाए और तथ्यों के आधार पर वर्षों से गढ़ी जा रही नकारात्मक छवि को मिटाया जाए।

ज्ञात हो कि 18 फरवरी 1983 को राज्य की नेली क्षेत्र में हुआ यह नरसंहार दुनिया के सबसे भीषण जनसंहारों में गिना जाता है। रिपोर्टों के अनुसार, इसमें 2,000 से अधिक बांग्लादेश मूल के मुस्लिम बसने वालों की मौत हुई थी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इस त्रासदी को मुख्य रूप से महिलाओं और बच्चों की हत्या के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन शायद ही किसी रिपोर्ट में यह उल्लेख हुआ कि इस हिंसा के दौरान हमलावर (स्थानीय जनजातीय और असमिया समुदाय के लोग सहित) भी जवाबी कार्रवाई में मारे गए थे।

PPFA ने अपने बयान में कई बुनियादी प्रश्न उठाए हैं —

“इन हत्याओं में कौन-से हथियार इस्तेमाल किए गए थे? क्या बिना किसी आधुनिक हथियार के स्थानीय लोग इतनी बड़ी संख्या में लोगों को कुछ घंटों में मार सकते थे? यदि मृतक मुस्लिम समुदाय से थे, तो उन्हें कहाँ दफनाया गया? क्या नेली क्षेत्र में सामूहिक कब्रों के कोई संकेत या प्रमाण मिले हैं?”
संगठन का मानना है कि तेवारी आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाना इस पूरे घटनाक्रम की वास्तविकता को समझने की दिशा में अहम कदम होगा। इससे न केवल ऐतिहासिक सच्चाई सामने आएगी, बल्कि उन भ्रांतियों और राजनीतिक कथाओं का भी अंत होगा, जिनके जरिए असमिया समाज को दोषी ठहराने की कोशिशें की जाती रही हैं।

PPFA का कहना है कि रिपोर्ट सार्वजनिक होने से न सिर्फ पीड़ितों और उनके परिजनों के सवालों के जवाब मिल सकेंगे, बल्कि असम और असमिया समाज के प्रति फैलाई गई गलत धारणाओं का भी तथ्यात्मक और निष्पक्ष रूप से खंडन हो सकेगा।

एकीकृत चिकित्सा: कैंसर उपचार की समग्र दिशा

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डॉ शिवानी कटारा

मनुष्य केवल शरीर नहीं है, बल्कि पंचकोशीय अस्तित्व है — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनंदमय। जब इनमें से किसी एक में असंतुलन होता है, तभी रोग जन्म लेता है। कोविड काल ने यह सच्चाई सामने लाई कि स्वास्थ्य केवल दवाओं से नहीं, बल्कि जीवनशैली, प्रतिरक्षा और मानसिक संतुलन से आता है। जब पूरी दुनिया आधुनिक चिकित्सा की सीमाओं में उलझी थी, तब भारत के घरों में काढ़ा, गिलोय, अश्वगंधा, योग और ध्यान ने लाखों लोगों की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत किया। उस दौर ने यह एहसास कराया कि आधुनिक चिकित्सा अपने आप में संपूर्ण नहीं है।

कैंसर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह रोग केवल शरीर की कोशिकाओं का विकार नहीं, बल्कि आहार, जीवनशैली और मानसिक असंतुलन का परिणाम है। भारत के कैंसर रजिस्ट्रियों के अनुसार वर्ष 2024 में लगभग 15.6 लाख नए कैंसर मामले दर्ज किए गए। पुरुषों में मुख (ओरल कैंसर) अब फेफड़ों के कैंसर से भी आगे निकल गया है, जबकि महिलाओं में स्तन कैंसर में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। ICMR रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर पाँच में से तीन कैंसर रोगी निदान के बाद जीवन नहीं बचा पाते। वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की फरवरी 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, हर 20 में से एक महिला स्तन कैंसर के उच्च जोखिम में है। तम्बाकू सेवन में कमी के बावजूद ओरल कैंसर के मामले घटे नहीं हैं। इसका मुख्य कारण तम्बाकू के दीर्घकालिक प्रभाव, शराब सेवन, और अस्वस्थ जीवनशैली है। आधुनिक चिकित्सा के अनुसार, केवल 5 से 10 प्रतिशत कैंसर आनुवंशिक (genetic) होते हैं, जबकि अधिकांश मामलों का संबंध जीवनशैली, आहार, पर्यावरण और मानसिक तनाव से है।

कैंसर की सबसे अधिक घटनाएँ पूर्वोत्तर भारत, विशेष रूप से मिज़ोरम में दर्ज की गईं, जहाँ पुरुषों में 21.1 प्रतिशत और महिलाओं में 18.9 प्रतिशत आजीवन कैंसर जोखिम पाया गया। इसके पीछे मुख्य कारण हैं — उच्च तम्बाकू सेवन, जोखिमपूर्ण आहार आदतें जैसे किण्वित सूअर की चर्बी, धुएँ में पकाया गया मांस, अत्यधिक मसालेदार भोजन और गरम पेय का सेवन, साथ ही कार्सिनोजेनिक संक्रमणों (जैसे HPV, Helicobacter pylori और हेपेटाइटिस वायरस) की अधिकता। भारत में कुल कैंसर मामलों में से लगभग 4 प्रतिशत मामले 0 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों में पाए जाते हैं।

इन आँकड़ों से यह स्पष्ट है कि कैंसर केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं, बल्कि जीवनशैली, पर्यावरण और मानसिक संतुलन का संकट है। और यही वह बिंदु है जहाँ आधुनिक चिकित्सा और आयुर्वेदिक समग्र दृष्टिकोण का संगम सबसे अधिक आवश्यक हो जाता है।

कैंसर अब सिर्फ़ बीमारी नहीं, बल्कि एक महँगा कारोबार बन गया है। भारत में ऑन्कोलॉजी दवाओं का बाजार तेज़ी से बढ़ रहा है, जिसकी वार्षिक वृद्धि दर लगभग 15 प्रतिशत है। नई टार्गेटेड और इम्यूनोथेरेपी दवाएँ लाखों रुपये की पड़ती हैं। एक सामान्य परिवार इलाज पर 80–90 हज़ार रुपये खर्च करता है, जिससे कई लोग गरीबी में चले जाते हैं, जबकि दवा कंपनियाँ इस भय से मुनाफ़ा कमाती हैं। लेकिन कुछ कहानियाँ इस सोच को तोड़ती हैं। जैसे अमृतसर की डॉ. नवजोत कौर सिद्धू की। वर्ष 2023 में उनके पति, पूर्व क्रिकेटर और नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने घोषणा की कि उनकी पत्नी अब कैंसर-फ्री हैं। उन्होंने बताया कि आधुनिक उपचार के साथ-साथ सख्त आहार और जीवनशैली बदलाव ने उनकी पत्नी के उपचार में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने लिखा — Treatment + Diet – great combination for cancer cure. उनकी पत्नी ने नींबू पानी, हल्दी, एप्पल साइडर विनेगर, अखरोट, चुकंदर-गाजर-आंवले का रस, नीम की पत्तियाँ और pH-7 वाला जल लिया। उन्होंने शुगर, गेहूँ और डेयरी प्रोडक्ट्स पूरी तरह बंद कर दिए। यह डाइट भारतीय आयुर्वेद और नोबेल पुरस्कार विजेता योशिनोरी ओसुमी की Autophagy पर आधारित खोज से प्रेरित थी — जिसमें शरीर की कोशिकाएँ स्वयं को साफ़ कर पुनर्जीवित करती हैं। यह उदाहरण दिखाता है कि कैसे आधुनिक उपचार और आयुर्वेदिक ज्ञान मिलकर परिणाम दे सकते हैं। आयुर्वेद आज सिर्फ़ एक परंपरा नहीं, बल्कि विज्ञान की पूरक शक्ति बन चुका है। आयुर्वेद कहता है कि बीमारी तब होती है जब शरीर के तीन दोष — वात, पित्त और कफ — असंतुलित हो जाते हैं। कैंसर को आयुर्वेद ‘अर्बुद’ के रूप में देखता है, यानी कोशिकाओं (cells) के असामान्य वृद्धि का परिणाम। इसका उपचार केवल दवाओं से नहीं, बल्कि भोजन, मानसिक स्थिति और जीवनचर्या के सुधार से होता है। आयुर्वेदिक चिकित्सा में रसयान चिकित्सा (Rejuvenation therapy) विशेष रूप से उपयोगी मानी जाती है, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली (immunity) को पुनर्जीवित करती है। भारत का स्वास्थ्य तंत्र आज दो धाराओं पर चलता है — एक ओर आधुनिक चिकित्सा संस्थान जैसे AIIMS, टाटा मेमोरियल और नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट हैं; दूसरी ओर आयुर्वेद, योग और होम्योपैथी के 3800 से अधिक अस्पताल और लगभग 37,000 डिस्पेंसरी हैं। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय और ICMR मिलकर अब क्लिनिकल ट्रायल्स कर रहे हैं, ताकि यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित किया जा सके कि पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा का संयोजन किस हद तक प्रभावी है। यह वही दिशा है जिसकी कल्पना WHO ने अपनी ‘Traditional Medicine Strategy’ (2014–2023) में की थी। आयुर्वेदिक और योग आधारित जीवनशैली का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह बीमारी को शुरू ही नहीं होने देती।

आधुनिक चिकित्सा बीमारी का इलाज करती है, जबकि आयुर्वेद उसके कारण को पहचानकर शरीर के संतुलन को बहाल करता है। आज की जीवनशैली — गलत आहार, तनाव, नींद की कमी और प्रदूषण — हमारे अंदर निरंतर सूजन और विषाक्तता पैदा करती है। आयुर्वेद में इन्हें ‘अम’ कहा गया है। हल्दी, त्रिफला, तुलसी, गिलोय और नीम जैसे तत्व शरीर को इन विषों से मुक्त कर आत्म-चिकित्सा (self-healing) की क्षमता देते हैं। कैंसर उपचार में मानसिक स्वास्थ्य का विषय अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। लेकिन यह सबसे अहम हिस्सा है। कीमोथेरपी और रेडिएशन का दर्द, शरीर की कमजोरी, बालों का झड़ना, और लगातार मृत्यु का भय — यह सब रोगी को भीतर से तोड़ देता है। कई बार देखभाल करने वाले परिवारजन भी अवसाद और थकान से गुजरते हैं। योग और ध्यान यहाँ सबसे प्रभावी औषधियाँ साबित होती हैं। नियमित ध्यान और श्वास अभ्यास से तनाव हार्मोन घटता है, नींद सुधरती है और रोगी की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। मानसिक शांति शरीर की पुनर्प्राप्ति को गति देती है। एकीकृत चिकित्सा प्रणाली इसी समग्र दृष्टिकोण पर आधारित है। यह मानती है कि आधुनिक चिकित्सा तीव्र संकट में जीवन बचाती है, पर दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए जीवनशैली, आहार और मानसिक संतुलन की भूमिका अनिवार्य है। इसीलिए दुनिया के बड़े चिकित्सा संस्थान — हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, मेयो क्लिनिक और NCCIH (अमेरिका) — अब एकीकृत चिकित्सा (Integrative Medicine) पर रिसर्च कर रहे हैं। भारत के लिए यह क्षेत्र और भी स्वाभाविक है, क्योंकि यहाँ आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दोनों का गहरा आधार मौजूद है। आज जरूरत इस बात की है कि चिकित्सा व्यवसाय का चेहरा बदला जाए।

स्वास्थ्य केवल दवाओं से नहीं आता; वह जीवनशैली से आता है। अगर कैंसर के इलाज में सर्जरी और कीमो के साथ आहार, योग, ध्यान और सकारात्मकता को जोड़ा जाए, तो इलाज सस्ता, सुलभ और अधिक मानवीय हो सकता है। एकीकृत चिकित्सा न तो परंपरा की वापसी है, न आधुनिकता का विरोध। यह दोनों का संतुलन है। यह हमें याद दिलाती है कि मनुष्य केवल शरीर नहीं, चेतना भी है। और जब उपचार शरीर, मन और आत्मा — तीनों स्तरों पर होता है, तभी वह सच्चा उपचार होता है। आख़िरकार, स्वास्थ्य का लक्ष्य केवल रोग से छुटकारा नहीं होना चाहिए — बल्कि वह होना चाहिए जो आयुर्वेद सदियों से कहता आया है:

:स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार प्रशमनं’

अर्थात् — स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और रोगी के रोग का निवारण — यही सच्ची चिकित्सा है।

(लेखिका मुख एवं दंत चिकित्सक हैं तथा दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पीएच.डी. हैं)

भारत का चुनाव आयोग: आलोचनाओं के घेरे में, फिर भी लोकतंत्र का इंजन

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दिल्ली । लगातार हर मौके पर विपक्ष के नेता अपनी नाकामयाबियों का ठीकरा इलेक्शन कमीशन के गलियारे में जाकर फोड़ते हैं। हर चुनाव से पहले विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं। TN शेषन के बाद चुनाव आयोग एक सक्रिय और सख्त रवैया अपनाता रहा है। चुनाव भी अब छह सात फेज में होने लगे हैं।
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साल 2014 से भारत का चुनाव आयोग (ECI) लगातार विवादों के तूफ़ान में घिरा हुआ है। विपक्षी पार्टियाँ — कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP), तृणमूल कांग्रेस (TMC) व अन्य — बार-बार आरोप लगाती रही हैं कि आयोग सरकार के दबाव में है, निष्पक्ष नहीं, और कभी-कभी जानबूझकर नियमों को तोड़ता-मरोड़ता है।

सबसे ज़्यादा सवाल EVM मशीनों की विश्वसनीयता, वोटर लिस्ट में गड़बड़ियाँ, आचार संहिता (Model Code of Conduct) के पालन और आयुक्तों की नियुक्ति में सरकार की दख़लअंदाज़ी को लेकर उठे हैं। पिछले दस सालों में विपक्षी दलों ने पचास से ज़्यादा बार बयान, धरने और याचिकाएँ दायर की हैं। आयोग हर बार कहता रहा कि वो पूरी तरह क़ानून और पारदर्शिता के तहत काम करता है, लेकिन अविश्वास की परछाई फिर भी बनी हुई है।

2017 के उत्तर प्रदेश और गुजरात विधानसभा चुनावों में EVM की “हेराफेरी” चर्चा का बड़ा मुद्दा बना। कांग्रेस और दूसरे दलों ने दावा किया कि मशीनें हैक की जा सकती हैं और इससे बीजेपी को फ़ायदा हुआ। अक्टूबर 2017 में कांग्रेस ने आरोप लगाया कि गुजरात चुनाव की तारीखें सरकार के दबाव में टाली गईं ताकि बीजेपी को प्रचार का समय मिल सके।

2018 में कर्नाटक चुनाव में भी कांग्रेस ने आयोग पर समय से पहले झुकने का इल्ज़ाम लगाया। बाद में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में भी ऐसे ही आरोप लगे और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया।

2019 के लोकसभा चुनावों में तो बहस अपने चरम पर थी। विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री और बीजेपी नेताओं पर आचार संहिता उल्लंघन के आरोप लगाए—ख़ासकर धर्म और सेना के नाम पर वोट माँगने को लेकर। मगर आयोग की प्रतिक्रिया “धीमी और पक्षपातपूर्ण” बताई गई।

कई पूर्व नौकरशाहों और जजों ने राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखकर कहा कि “आयोग की साख पर संकट है।”
2021 में बंगाल चुनाव के दौरान, प्रशांत किशोर ने आयोग को “बीजेपी का विस्तार कार्यालय” तक कह दिया।

और 2024 में, आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया से मुख्य न्यायाधीश को हटाने के क़ानून ने फिर यह सवाल खड़ा किया कि क्या आयोग अब सरकार से स्वतंत्र है या नहीं।

पत्रकारों, विशेषज्ञों और टेक्नोलॉजी जानकारों का मानना है कि आयोग की पारदर्शिता और विश्वसनीयता घट रही है, और कार्यपालिका का प्रभाव बढ़ गया है।

लेकिन इन तमाम विवादों के बावजूद, यही आयोग हर पाँच साल में दुनिया का सबसे बड़ा चुनावी आयोजन सफलतापूर्वक कराता है।
2024 में करीब 96.88 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे — यानी लगभग एक अरब भारतीय!

करीब 1.5 करोड़ अधिकारी और सुरक्षा कर्मी तैनात किए गए।

पहाड़ों से लेकर रेगिस्तानों तक, सीमावर्ती इलाकों से लेकर महानगरों तक, हर जगह मतदान हुआ — एक तय समय-सारिणी में, शांति से।
स्वतंत्रता के बाद से आज तक कभी भी सत्ता परिवर्तन इस प्रक्रिया के बाहर नहीं हुआ। यही भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त है।
आयोग ने कई नई तकनीकी पहलें की हैं —

2024 लोकसभा चुनाव के लिए 42 विस्तृत सांख्यिकीय रिपोर्टें जारी कीं, डिजिटल डैशबोर्ड शुरू किया, और उम्मीदवारों के खर्च पर रीयल-टाइम निगरानी प्रणाली लागू की।

अब उम्मीदवारों को पूरा आर्थिक लेखा-जोखा ऑनलाइन देना होता है और नकद दान पर सीमा तय की गई है, ताकि चुनावी फंडिंग पारदर्शी हो।
पहुंच और समावेशन के मोर्चे पर भी प्रगति हुई है।

बिहार 2025 चुनावों के लिए हर बूथ पर रैंप, व्हीलचेयर सुविधा, और दृष्टिबाधित मतदाताओं के लिए ब्रेल बैलेट की व्यवस्था अनिवार्य की गई है।
85 वर्ष से ऊपर या दिव्यांग मतदाता घर से मतदान कर सकते हैं, जिसकी वीडियो रिकॉर्डिंग और उम्मीदवार प्रतिनिधियों की मौजूदगी में पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।

दिव्यांग कर्मियों द्वारा संचालित विशेष मतदान केंद्र भी आयोग की “नो वोटर लेफ्ट बिहाइंड” नीति को साकार करते हैं।

इन सबके बावजूद आलोचकों की बात भी ग़लत नहीं कि विश्वास एक बार टूट जाए तो उसे लौटाना मुश्किल होता है। इसीलिए ज़रूरी है कि आयोग नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी बनाए, सारे मतदान आँकड़े सार्वजनिक करे, और 100% VVPAT मिलान लागू करे।

हालाँकि तकनीकी सुधार, पारदर्शिता और समावेशन के प्रयास जारी हैं, पर असली चुनौती है — जनता के दिलों में निष्पक्षता का यक़ीन दोबारा कायम करना। हर नज़र उस पर टिकी है, फिर भी उसी से उम्मीद है कि वो भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी अद्भुत मिसाल पेश करेगा। बहस जारी है — स्वतंत्रता बनाम प्रभाव, पारदर्शिता बनाम शक़ —मगर लोकतंत्र की धड़कन अभी भी उसी पर टिकी है। क्योंकि भारत में शांतिपूर्ण, समय पर और जनसहभागी चुनाव ही वह धागा हैं, जो इस विशाल लोकतंत्र को जोड़कर रखते हैं —और यही ज़िम्मेदारी चुनाव आयोग कभी नहीं भूल सकता।

Scamistān Turns Bhāsmāsura: India’s Dark Fraud Economy Unveiled

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Delhi : India stands at a dangerous crossroads where digital progress collides with a burgeoning fraud industry. From fake diabetes cures to political bribery, honey traps to sophisticated crypto scams, the country’s integrity is under assault in a sprawling carnival of deceit. Trust is eroding as every click risks a trap, and every promise masks a con.

Home-makers fall prey to “online job” scams, businessmen lose fortunes to cyber mafias, and young lovers are ensnared by digital blackmail. The rot extends from the halls of Parliament to private clinics once revered for spirituality, driving India towards becoming the “Scam Factory of the World.”
The scale is staggering. According to government and cybersecurity reports, online fraud losses in India are projected to exceed ₹20,000 crore by year-end—a 200% spike from 2024. The digital tools that ushered in India’s tech revolution—UPI, social media, instant payments, and smartphones—have also become the weapons of choice for modern con artists.

Simple texts, like “Your KYC is expiring,” or enchanting job offers are often the opening gambit. Housewives chase fake “online tasks,” students pay “processing fees” for illusory employment, and even bankers and engineers fall victim to AI-crafted scams, explains IT expert Vikas.

Millions of UPI users find themselves trapped in a sinister game where scanning a QR code or clicking a forged link can drain accounts instantly. This year alone, over one lakh UPI scam cases are expected, causing losses north of ₹3,000 crore. Although individual losses average between ₹1,000 and ₹5,000, the cumulative effect is devastating. Law enforcement recovers only 20% of stolen funds, with the remaining money vanishing through mule accounts routed abroad.

Old Ponzi schemes re-emerge in digital guise—fake trading apps, crypto tokens, AI bots promising “double income” empty pockets with alarming speed. Over 30,000 investment scams detected in 2025 wiped out ₹1,500 crore.

Connections run deep, extending to Southeast Asia’s fraudulent call centers in Myanmar and Cambodia, manned by Hindi-speaking gangs operating round the clock. Deepfake CEOs, “verified” websites, and fake influencers lure victims until servers shut down and money disappears.

In cities like Delhi alone, ₹300–400 crore has vanished to digital investment scams, with recovery rates less than 20%. Shame and lack of resources keep most victims silent, burying cases unheard.
The “digital arrest scam” tops the terror list, according to computer expert Chaturbhuj Tiwari. Scammers impersonate police officers in video calls so realistic they could fool anyone—with badges, files, and official language—extorting lakhs in “bail” money. Over 80,000 fell victim last year, losing ₹6,000 crore.

With unemployment soaring, job scams have morphed into an epidemic. Thousands have lost money through fake offers on WhatsApp and LinkedIn, with fraudsters cloning company logos and HR profiles, demanding “verification” and “training” fees.

Even education is targeted. Cyber fraudsters duped students and parents of ₹800 crore invoking the names of reputed coaching institutes. New scams emerge even as arrests are made, with AI chatbots conducting bogus interviews to maintain the illusion of legitimacy.

Trust-based scams cause the deepest wounds. Thousands of women on matrimonial platforms are duped by fake NRI, doctor, or CEO grooms, who extract huge sums with AI-edited photos and fabricated conversations. Requests for “visa,” “customs,” or “medical” payments complete the deception. In 2025 alone, losses in such cases topped ₹1,000 crore, many hidden by victims’ shame or fear.
AI is now the scammers’ greatest weapon. Cyber journalist Vishnu reports a doubling of voice-cloning scams, with 15,000 cases recorded in 2025. Imagine calls mimicking a daughter’s voice pleading for urgent help—fake voices, real fear.

AI expert Pandey notes, “Deepfakes erase the line between truth and fiction. Scammers mimic CEOs, officials, celebrities, extracting crores. One case involved millions lost to a cloned telecom tycoon’s voice.” Total losses from such scams exceed ₹1,000 crore this year.

The damage extends beyond wallets to mental health. Victims report depression, paranoia, and social withdrawal. As one said, “They didn’t just steal my money; they killed my trust.”

Technology promised empowerment, but without awareness it now embodies helplessness. Behind the shining screen of “Digital India” lurks the darker underworld of “Scamistān,” spreading its shadow ever wider.

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