इन्हीं की रणनीति से कालिंजर में मारा गया था शेरशाह सूरी. .

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भोपाल । रानी दुर्गावती भारतीय इतिहास की ऐसी वीराँगना हैं जिनके शौर्य, दूरदर्शिता और रणनीति का प्रभाव अपने कालिंजर से गौंडवाना तक है। लेकिन इतिहास में उन्हें उतना स्थान नहीं मिला जितना योगदान उनका भारतीय संस्कृति की रक्षा में है। उन्हें आमने सामने की वीरता में कोई हरा नहीं पाया। मुगल सेना भी पराजित हुई अंततः मुगल सेनापति आसफ खाँ की कुटिल योजना बनाई, समझौते का संदेश भेजा और घेरकर किये गये हमले में उनका बलिदान हुआ।

ऐसी वीराँगना और दूरदर्शी रणजीतकार रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524 को हुआ था। उनके पिता राजा कीर्तिवर्धन सिंह इतिहास प्रसिद्ध कालिंजर के राजा थे। यह राजघराना चंदेल राजवंशी था। उनकी माता चित्तौड़ राजघराने की राजकुमारी और सुप्रसिद्ध यौद्धा राणा सांगा की बहन थीं। राणा सांगा का खानवा के मैदान में बाबर के साथ हुये युद्ध में राजा कीर्तिवर्धन की भूमिका महत्वपूर्ण थी। इसीलिए खानवा युद्ध के बाद बाबर ने कालिंजर पर आक्रमण किया था। लेकिन वह जीत नहीं पाया था और पराजित होकर लौटा।

कालिंजर किला उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के अंतर्गत है। इतिहास के हरेक युग की घटनाओं में कालिंजर का उल्लेख मिलता है। यह कालिंजर का आकर्षण ही था कि प्रत्येक आक्रांता ने हमला बोला। मेहमूद गजनवी से आरंभ यह क्रम सल्तनतकाल में कभी रुका नहीं। आक्रांताओं द्वारा निर्दोष नागरिकों की हत्याओं, लूट और अत्याचारों की कहानियाँ कण कण में फैली हैं। लेकिन किला सदैव अजेय रहा और किसी शासक ने समर्पण नहीं किया। ऐसी वीरभूमि और साँस्कृतिक गौरव की परंपरा में जन्मी थीं रानी दुर्गावती। उनके पिता राजा कीर्तिवर्धन का नाम पृथ्वीदेव सिंह था वे कीर्तिवर्धन नाम से गद्दी पर बैठे। इसलिए इतिहास की पुस्तकों में दोनों नाम मिलते हैं। राजकन्या का जन्म दुर्गाष्टमी हुआ था। इसलिए उनका नाम दुर्गावती रखा गया। राजा कीर्तिवर्धन ने एक से अधिक विवाह किये थे। परिवार में और भी बेटियाँ थीं। लेकिन दुर्गावती अपनी माता की इकलौती संतान थीं। इसलिये उनका लालन पालन बहुत लाड़ के साथ हुआ । वे बचपन से कुशाग्र बुद्धि, ऊर्जावान और साहसी थीं। कालिंजर ने बहुत आक्रमण झेले थे। इस कारण राजपरिवार की सभी महिलाओं और राजकुमारियों को आत्मरक्षा के लिये शस्त्र संचालन सिखाया जाता था। कालिंजर पर अक्सर होने वाले हमले के कारण अधिकांश नागरिकों में भी युद्ध कला के प्रशिक्षण का चलन हो गया था। इसी संघर्ष मय वातावरण में दुर्गावती बड़ी हुईं।राजकुमारी दुर्गावती को शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा दी गयी। साहसी दुर्गावती सखियों के साथ वनक्षेत्र में भी निर्भय घूमती थीं। उनकी सखी सहेलियों की टोली भी वीरांगनाओं की थी। सबने शस्त्र चलाने का अभ्यास किया था। वे हाथी पर बैठकर तीर कमान के युद्ध में भी पारंगत थीं। उनके तीर का निशाना अचूक था। वीरांगना दुर्गावती कृपाण से चीते का शिकार कर लेतीं थीं। उनकी माता ने उन्हे इतिहास और पूर्वजों की वीरोचित परंपरा की कहानियाँ सुनाकर बड़ा किया था। 1544 में उनका विवाह गढ़ मंडला के शासक राजा संग्राम शाह के सबसे बड़े पुत्र दलपतशाह हे हुआ। गढ़ मंडला के शासक गौंड माने जाते थे और कालिंजर के चंदेल राजा सूर्यवंशी क्षत्रिय थे। यदि सूर्यवंशी राजा अपनी पुत्री का गौंडवाना में करते हैं तो इससे संकेत है कि भारत में राजपूताना और गौंडवाना में का कोई भेद न था।

विवाह के एक वर्ष पश्चात रानी ने पुत्र को जन्म दिया। जिसका नाम वीर नारायण रखा। रानी ने जब पुत्र को जन्म दिया तब वे मायके कालिंजर आयीं हुईं थीं। इन्हीं दिनों शेरशाह सूरी का आक्रमण कालिंजर पर हुआ। राजा कीर्तिवर्धन सिंह ने वीरता से युद्ध लड़ा लेकिन लगातार हमलों से कालिंजर पर हमले से शक्ति क्षीण हो गई थी। फिर भी राजा ने समर्पण न किया और वीरता से युद्ध किया। वे घायल हो गये। किले के द्वार बंद करलिये गये। शेरशाह ने किले पर घेरा मजबूत किया और आसपास के गाँवों में अत्याचार आरंभ करके राजा के सामने समर्पण का संदेश भेजा। समर्पण में शर्त में रनिवास और राजकोष के समर्पण की शामिल थी। राजा ने समर्पण से इंकार कर दिया। घेरा लंबा चला। शेरशाह की सेना में बेचैनी तो हुई पर वह खाली हाथ नहीं लौटना चाहता था। रानी दुर्गावती की एक बहन कमलावती भी थीं। उनके सौन्दर्य और वीरता के भी चर्चे थे। रानी दुर्गावती ने अपने पिता की ओर से शेरशाह के पास संदेश भेजा कि यदि राजकुमारी से विधिवत विवाह कर लें तो समर्पण करके आधीनता स्वीकार कर ली जायेगी। अपनी सेना की बेचैनी भाँपकर शेरशाह जल्दी लौटना चाहता था। उसने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। तब योजना पूर्वक शेरशाह के पास सगुन भेजा गया। किले में विवाहोत्सव की गीत संगीत होने लगे। यह सूचना शेरशाह को मिली तब उसका विश्वास पक्का हो गया। तीसरे दिन शेरशाह को विवाह केलिये किले में आमंत्रित किया गया। शेरशाह किले के मुख्य द्वार की ओर बढ़ा। जैसे ही वह समीप आया किले की दीवार से तोप गरज उठी और शेरशाह मारा गया। भारतीय इतिहास के ऐसे गौरव प्रसंगों पर परदा डालने वाले कुछ इतिहासकार यह तो स्वीकार करते हैं कि शेरशाह की मौत किले से आने वाले तोप के गोले से हुई। लेकिन वे कुतर्क देते हैं कि वह तोप का गोला शेरशाह की तोप का ही था जो किले की दीवार से टकराकर लौट आया था। कोई इन इतिहासकारों से कि क्या तोप के गोले में हवा भरी थी जो दीवार से टकरा लौट आया। कालिंजर के किले से गरजी तोप से केवल शेरशाह ही नहीं मारा गया था अपितु उसका तोपखाना भी नष्ट हो गया था। शेरशाह की सेना में भगदड़ मच गई। नागरिकों ने भी हमला बोला। रानी दुर्गावती की रणनीति से न केवल कालिंजर की रक्षा हुई अपितु क्रूर हमलावर और लुटेरा शेरशाह सूरी मारा गया। यह गाथा लोक जीवन की कहानियों में है।

कुछ समय रूककर रानी दुर्गावती अपनी ससुराल गौंडवाना लौट आईं। इस घटना के बाद उनकी चर्चा पूरे भारत में हुई। लेकिन रानी का दाम्पत्य जीवन अधिक न चल सका। 1550 में राजा दौलत शाह की मृत्यु हो गई। तब पुत्र वीर नारायण की आयु मात्र पाँच वर्ष थी। रानी ने अल्पवयस्क वीर नारायण को गद्दी पर बिठाकर राजकाज चलाना आरंभ किया। उन्होंने अपनी नौ सदस्यीय मंत्री परिषद गठित की। इसमें कोष, सेना, अंतरिम व्यवस्था, शाँति सुरक्षा आदि के प्रमूख बनाये। मंत्री परिषद के प्रमुख को दीवान पद दिया। इसके साथ रानी ने अपने पूरे राज्य में कृषि और वनोपज के व्यापार को बढ़ावा दिया। राज्य की आय बढ़ी तो नये निर्माण कार्य भी हुये। उन्होंने अपनी राजधानी सिंगोरगढ़ से चौरागढ़ स्थानांतरित की । चौरागढ़ सुरम्य सतपुड़ा पर्वतीय श्रृंखला पर किला है। सामरिक दृष्टि से यह किला महत्वपूर्ण था। तब गौंडवाना साम्राज्य मंडला, नागपुर से लेकर नर्मदा पट्टी तक फैला था। गौंडवाना राज्य के अंतर्गत कुल 28 किले आते थे । राज्य निरंतर प्रगति की ओर बढ़ रहा था। रानी दुर्गावती प्रजा वत्सल वीरांगना थीं। जबलपुर का आधारताल, चेरीताल और रानीताल का निर्माण कार्य उन्हीं के कार्यकाल में हुआ। उनपर माँडू के सुल्तान बाज बहादुर ने तीन बार आक्रमण किया और तीनों बार पराजित हुआ। तीसरी बार तो बड़ी मुश्किल से प्राण बचाकर भागा था। गौंडवाना राज्य की बढ़ती समृद्धि और ख्याति ही उसपर आक्रमण का कारण बनी। यदि मालवा के सुल्तानों से कुछ राहत मिली तो मुगल सेना ने भारी सेना और तोपखाने से आक्रमण बोला। जो मुगलसेना गौंडवाना पर आक्रमण करने आयी उसका सेनापति आसफ खाँ था। उसने पहले इलाहाबाद में अपना कैंप लगाकर आसपास लूट की लोगों आधीन बनाया। रीवा राज्य को भी समर्पण करने विवश किया। समर्पण का संदेश रानी को भी भेजा गया। रानी ने इंकार कर दिया। मुगल सेना ने जोरदार आक्रमण किया लेकिन पराजित हुआ और भागकर वापस इलाहाबाद पहुँचा। अतिरिक्त तोपखाना और सेना भी बुलाकर दोबारा हमला बोला। इस बार भी पराजित हुआ। उसने लगातार चार आक्रमण किये। हर आक्रमण में पराजित हुआ। इन आक्रमणों में रानी को विजय तो मिली लेकिन उनकी शक्ति क्षीण हो गई थी लेकिन रानी ने साहस न खोया और छापामार युद्धनीति अपनाई।

अपनी निरंतर पराजय के बाद आसफ खाँ ने एक कुटिल योजना बनाई। आसफ खाँ ने नरई नाले पर अपना कैंप लगाया । रानी के पास स्थाई समझौते का संदेश भेजकर बातचीत के लिये अपने कैंप पर आमंत्रित किया। रानी सतर्क तो थीं पर उन्होंने समझौता वार्ता के लिये नाले तक जाना स्वीकार कर लिया। यह नाला गौर और नर्मदा नदी के बीच में था। आसफ खाँ ने अपनी रणनीति के अंतर्गत रानी को नर्मदा के इस पार आने दिया। घाट पर उनके स्वागत की व्यवस्था की गई थी। इससे रानी कि विश्वास बढ़ा और वे आगे बढ़ीं। लेकिन कुटिल आसफ खाँ ने अपने तीरंदाज पेड़ों पर तैनात कर दिये थे। रानी जैसे ही आगे बढ़ीं तो तीरों से हमला हो गया। कुछ अंग रक्षक घायल हुये और एक तीर रानी को लगा। वे भी घायल हुईं। बेटा वीर नारायण भी उनके साथ था। इस स्थिति में भी रानी ने समर्पण नहीं करके युद्ध करना बेहतर समझा। मुगल सेना उन्हें जीवित पकड़ना चाहती थी। इसलिये उनपर तीरों से हमला किया जा रहा था। जबकि रानी के अंगरक्षकों पर तोपखाना भी आग उगल रहा था। फिर भी रानी ने हार नहीं मानी तभी एक तीर उनके कान के पास और एक तीर उनकी गर्दन में लगा। वे बेहोश होने लगीं। महावत ने उन्हें कहीं छिपकर निकलने की सलाह दी। पर रानी को शत्रु की रणनीति का अनुमान हो गया था। वहाँ से सुरक्षित निकलना सरल न था। उनके पास पुनः समर्पण का संदेश आया। पर उन्होंने पराधीन जीवन से बेहतर स्वाभिमान से मर जाना बेहतर समझा और कटार निकालकर स्वयं पर वार कर लिया। यह 24 जून 1564 का दिन था जब वीरांगना रानी दुर्गावती ने कटार निकालकर स्वयं का बलिदान दे दिया। उनके बलिदान के बाद मुगल सेना राज्य घुसी लूट और हत्याओं के साथ महिलाओं के साथ जो व्यवहार हुआ। वह सब इतिहास के पन्नों में दर्ज है ।

पानी में छिपा जहर

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रमेश कुमार
भूजल संकट अब सिर्फ कमी नहीं, खतरा भी

देश में भूजल संकट अब केवल पानी की कमी तक सीमित नहीं रह गया है। जमीन के नीचे मौजूद पानी की गुणवत्ता तेजी से खराब हो रही है। जिस भूजल को जीवन का सबसे बड़ा सहारा माना जाता है, वही कई क्षेत्रों में लोगों की सेहत के लिए खतरा बनता जा रहा है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की रिपोर्ट ने देश के सामने एक गंभीर तस्वीर रखी है। कई राज्यों के भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, नाइट्रेट, आयरन, यूरेनियम और लवणता जैसे प्रदूषक तय मानकों से अधिक पाए गए हैं। भारत की बड़ी आबादी आज भी पीने के पानी के लिए भूजल पर निर्भर है। ऐसे में दूषित पानी का बढ़ना भविष्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

जमीन के नीचे बढ़ता प्रदूषण

भूजल प्रदूषण कई कारणों से बढ़ रहा है। खेतों में रासायनिक खादों का ज्यादा उपयोग, उद्योगों से निकलने वाला जहरीला कचरा, सीवेज का रिसाव और भूजल का अत्यधिक दोहन इस संकट को बढ़ा रहे हैं। कई बार जमीन के अंदर पहुंच चुके जहरीले तत्व वर्षों तक बने रहते हैं। इसका असर धीरे-धीरे लोगों के स्वास्थ्य पर दिखाई देता है। यह समस्या केवल किसी एक राज्य की नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग रूप में सामने आ रही है।

187 जिलों में फ्लोराइड की अधिकता

देश के कई राज्यों में फ्लोराइड की समस्या गंभीर हो चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार 25 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 187 जिलों में भूजल में फ्लोराइड की मात्रा सामान्य सीमा से अधिक पाई गई है। राजस्थान इससे सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। लंबे समय तक फ्लोराइड युक्त पानी पीने से दांतों और हड्डियों पर असर पड़ सकता है। बच्चों पर इसका प्रभाव ज्यादा पड़ सकता है। ग्रामीण इलाकों में लोग वर्षों से ऐसे पानी का उपयोग कर रहे हैं।

राजस्थान और गुजरात में लवणता की मार

भूजल में लवणता बढ़ना भी बड़ी समस्या बन चुका है। 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 165 जिलों में लवणता की समस्या सामने आई है। गुजरात और राजस्थान में इसका असर ज्यादा दिखाई देता है। खारा पानी पीने योग्य नहीं रहता और खेती को भी नुकसान पहुंचाता है। मिट्टी की गुणवत्ता खराब होने लगती है। फसल उत्पादन घटता है और किसानों की परेशानी बढ़ती है।

पंजाब-हरियाणा में यूरेनियम की चिंता

भूजल में यूरेनियम की मौजूदगी ने भी चिंता बढ़ाई है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में कई इलाकों में इसकी मात्रा सामान्य सीमा से अधिक मिली है। यूरेनियम प्राकृतिक तत्व है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा लंबे समय तक शरीर में जाने पर नुकसान पहुंचा सकती है। जिन क्षेत्रों में लोग बोरवेल और हैंडपंप के पानी पर निर्भर हैं, वहां खतरा ज्यादा रहता है।

आर्सेनिक का खतरनाक विस्तार

आर्सेनिक प्रदूषण देश की गंभीर जल समस्याओं में शामिल है। गंगा और ब्रह्मपुत्र के मैदानी क्षेत्रों में इसका प्रभाव ज्यादा देखा गया है। पश्चिम बंगाल, बिहार, असम और उत्तर प्रदेश के कई इलाके इससे प्रभावित हैं। रिपोर्ट के अनुसार 196 जिलों में आर्सेनिक की मात्रा सामान्य सीमा से ऊपर पाई गई है। लंबे समय तक दूषित पानी पीने से त्वचा रोग और गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

नाइट्रेट बना सबसे बड़ा प्रदूषक

नाइट्रेट प्रदूषण देश के सबसे बड़े भूजल संकटों में शामिल हो गया है। 26 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के 409 जिलों में नाइट्रेट का स्तर सामान्य सीमा से अधिक पाया गया है। इसका मुख्य कारण खेती में रासायनिक उर्वरकों का ज्यादा इस्तेमाल है। बारिश और सिंचाई के साथ ये रसायन जमीन के अंदर पहुंच जाते हैं। सीवेज और गंदे पानी का रिसाव भी इस समस्या को बढ़ा रहा है।

11 हजार से ज्यादा बस्तियां प्रभावित

देश में हजारों ग्रामीण बस्तियां दूषित पानी की समस्या से जूझ रही हैं। कई जगह आयरन, नाइट्रेट, भारी धातु और अन्य रसायनों के कारण पानी खराब हो चुका है। सरकार ने कई क्षेत्रों में जल शुद्धिकरण संयंत्र लगाए हैं, लेकिन समस्या बहुत बड़ी है। केवल पानी पहुंचाना नहीं, बल्कि सुरक्षित पानी पहुंचाना सबसे जरूरी है।

प्रकृति के साथ इंसानी गलती

भूजल प्रदूषण के पीछे प्राकृतिक कारणों के साथ मानव गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं। तेजी से बढ़ता शहरीकरण, उद्योगों का कचरा, रसायनों का बढ़ता इस्तेमाल और पानी का गलत प्रबंधन इस संकट को बढ़ा रहे हैं। अगर अभी सुधार नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियों के सामने साफ पानी की बड़ी समस्या खड़ी हो सकती है।

भविष्य की बड़ी चुनौती

पानी केवल एक संसाधन नहीं, जीवन का आधार है। भूजल की हर बूंद को बचाना जरूरी है। आने वाला संकट केवल पानी की कमी का नहीं होगा, बल्कि उस पानी का होगा जो मौजूद तो होगा लेकिन पीने योग्य नहीं रहेगा। साफ पानी और सुरक्षित भूजल ही स्वस्थ भविष्य की सबसे बड़ी जरूरत है।

आईजीएनसीए में ‘आरव : मिरज का तानपुरा’ फिल्म का लोकार्पण एवं सांगीतिक प्रस्तुति सम्पन्न

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अनुराग पुनेठा

 

नई दिल्ली। विश्व संगीत दिवस एवं संगीत-विदुषी डॉ. प्रेमलता शर्मा की पुण्य-स्मृति के अवसर पर इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कलाकोश विभाग तथा अखिल भारतीय गांधर्व महाविद्यालय मंडल, मुंबई के द्वारा विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस आयोजन में महाराष्ट्र के सांगली जिले के मिरज में बनने वाले विश्वविख्यात तानपुरा पर आधारित डॉक्यूमेंट्री फिल्म “आरव : मिरज का तानपुरा” की स्क्रीनिंग की गई और पं. कुमार गंधर्व के शिष्य पं. सत्यशील देशपांडे ने सुंदर गायन प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। साथ ही, उन्होंने तानपुरा के महत्त्व पर सारगर्भित व्याख्यान भी दिया। इस अवसर पर हिन्दी और अंग्रेजी में ‘आरव : मिरज का तानपुरा’ पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने की, जबकि सारस्वत अतिथि थे पद्म श्री प्रो. भरत गुप्त। विशिष्ट अतिथि के रूप में कला-विदुषी एवं शास्त्रीय संगीत गायिका डॉ. सुभद्रा देसाई ने कार्यक्रम को संबोधित किया। कार्यक्रम की प्रस्तावना आईजीएनसीए के कलाकोश विभाग के अध्यक्ष प्रो. सुधीर लाल ने प्रस्तुत की। उन्होंने भारतीय संगीत परंपरा में तानपुरे की महत्ता तथा उसके सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक पक्षों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर तानपुरा शिल्पी अल्ताफ मुल्ला और मिरज की तानपुरा पर शोध करने वाली डॉ. पी.वाई मुल्ला भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का आयोजन आईजीएनसीए के समवेत सभागार में किया गया।

अध्यक्षीय सम्बोधन में डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने वाद्ययंत्रों के संरक्षण की आवश्यकता पर ज़ोर दिया और इस संदर्भ में “आरव : मिरज का तानपुरा” जैसी फिल्मों को बहुत महत्त्वपूर्ण बताया। उन्होंने बताया कि आईजीएनसीए इस तरह के कई कार्य कर रहा है। आईजीएनसीए की अभिलेखीकरण पहलों, विशेष रूप से ‘भीमषड्ज’ परियोजना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस परियोजना के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय संगीत परम्परा के 36 रागों का दस्तावेजीकरण किया गया है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि वाद्य-निर्माताओं को भी वही सम्मान और पहचान मिलनी चाहिए, जो संगीतज्ञों, गायकों और कलाकारों को प्राप्त होती है, क्योंकि उनका योगदान भारत की संगीत विरासत का अभिन्न हिस्सा है।

उन्होंने यह भी कहा कि अगर वाद्ययंत्रों का प्रयोग ही नहीं होगा और इलेक्ट्रॉनिक गजट से ही काम चलाया जाने लगेगा, तो वाद्ययंत्र बनाने वालों की परम्परा समाप्त हो जाएगी। इस तरह, वाद्ययंत्र विलुप्त हो जाएंगे और यह भारतीय संगीत की बहुत बड़ी हानि होगी। उन्होंने कहा, वाद्ययंत्र बजाने वालों की चिंता तो बहुत लोग करते हैं, लेकिन वाद्ययंत्र बनाने वालों की चिंता कोई नहीं करता। हमें इस पर भी विचार करना चाहिए।

प्रो. भरत गुप्त ने कहा, आज तानपुरा की जगह तरह-तरह के एप्स आ गए हैं, लेकिन आपको ये समझ होनी चाहिए कि ये जो रेडिमेड एप्प हैं, वो रेडिमेड कॉफी हैं और रेडिमेड कॉफी में जितने तरह के दुर्गुण होते हैं, वो एप्प में भी हैं। अगर किसी को सृजन करना है, अगर किसी को वास्तव में समझना है कि संगीत क्या है और वो भाव-जगत को कैसे बदलता है, तो तानपुरा ही एक आश्रय है।

फिल्म “आरव : मिरज का तानपुरा” में भारतीय शास्त्रीय संगीत की साधना में तानपुरे की केंद्रीय भूमिका तथा मिरज की प्रसिद्ध तानपुरा निर्माण परम्परा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कार्यक्रम में उपस्थित तानपुरा शिल्पी श्री अल्ताफ मुल्ला एवं डॉ. पी. वाय. मुल्ला ने तानपुरा निर्माण की परंपरा, उसके शिल्प और संरक्षण की आवश्यकता पर अपने विचार साझा किए।

इस अवसर पर आयोजित पं. सत्यशील देशपांडे की सांगीतिक प्रस्तुति ने उपस्थित संगीतप्रेमियों और कला अनुरागियों को भारतीय शास्त्रीय संगीत की गहन संवेदना से परिचित कराया। यह आयोजन भारतीय संगीत परंपरा, वाद्य-निर्माण कला और गुरु-शिष्य परम्परा के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुआ।

 

Special Yoga Programme on International Day of Yoga organised amongst the Senior Citizens of Mata Rambeti Old Age Home 

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Bhaskar Bikram Chetia

Delhi: On the occasion of International Day of Yoga 2026, a special yoga programme was organized with senior citizens by Yug Sanskriti Nyas and VridhCare Foundation. Centered on this year’s theme of the International Day of Yoga – “Yoga for Healthy Ageing,” the programme aimed to promote awareness about the importance of yoga in strengthening the physical, mental, and emotional well-being of senior citizens.

The programme commenced with the ceremonial lighting of the lamp and a Vedic invocation. The event was graced by Dr. Pawan Garg (Former Vice President and Secretary, Indian Medical Association) as the Chief Guest. Distinguished Guests included Mr. Rahul Singh (Founder and CEO, Homeless Care Foundation), Mrs. Shikha Tandon (Principal, Drishti Public School), and Mrs. Shagun Chadha (Coordinator, Sanskar DLF Branch, Bharat Vikas Parishad) etc. and many more. Acharya Dharmveer, Founder of Yug Sanskriti Nyas and Mrs. Gargi Lakhanpal, Director of VridhCare Foundation, warmly welcomed all the guests. The programme was also attended by several eminent personalities, officials, and members of the intellectual community from various fields.

The event was anchored by Mr. Bhaskar Bikram Chetia. The yoga and pranayama session was led by Mrs. Mamta Goyal. A team of yoga experts from Dev Sanskriti Vishwavidyalaya, Haridwar, including Mr. Aditya, Mr. Sayan, and other instructors demonstrated various advanced yoga postures, pranayama techniques, and meditation practices while explaining their health benefits. Participants enthusiastically engaged in the sessions with discipline and positive energy, experiencing the physical and mental benefits of yoga and sharing their inspiring experiences.

On this occasion, the invited speakers described yoga as the foundation of a healthy and balanced life. They emphasized that regular yoga practice not only improves physical health but also plays a vital role in fostering mental peace, self-confidence, and a positive outlook. They further highlighted that yoga is particularly beneficial in old age, helping individuals remain active, self-reliant, and energetic.

In his address, Mahant Mahanand Giri Ji, the administrator of the Mata Rambeti Old Age Home, stated that such programmes are extremely important for society. He noted that yoga helps individuals become healthy, disciplined, and calm-minded while nurturing positivity and inner strength. He expressed his heartfelt gratitude to Yug Sanskriti Nyas and VridhCare Foundation for their continuous efforts toward the health and welfare of senior citizens and for organizing this special programme on International Day of Yoga.

Expressing his thoughts on the occasion, Acharya Dharmveer, Founder of Yug Sanskriti Nyas, said that under the leadership of Prime Minister Narendra Modi, India’s ancient yoga tradition has gained renewed recognition on the global stage, and International Day of Yoga has significantly increased awareness of yoga across the world.
He further stated that if India is to regain its position as a Vishwaguru, every section of society must be included in the nation’s progress. For this, a calm mind, disciplined lifestyle, and healthy body are essential, and yoga plays a crucial role in achieving these goals. He emphasized that senior citizens are invaluable assets to society, repositories of experience, and sources of inspiration for younger generations. Their health and active participation in life set a positive example for future generations. Yoga, he said, is a simple yet highly effective means of achieving this and should become an integral part of everyone’s daily routine.

Ms. Gargi Ji, Director of VridhCare Foundation, highlighted the importance of yoga in the lives of elderly individuals living in old age homes, drawing upon her extensive experience in the field. She encouraged all residents of Mata Rambeti Old Age Home to practice yoga regularly so that it may positively influence and contribute to the development of their physical, mental, emotional, and spiritual well-being.

During the programme, the guests appreciated the social and health-awareness initiatives undertaken by Yug Sanskriti Nyas and VridhCare Foundation. They expressed confidence that such programmes would play a significant role in promoting health awareness and fostering positive inter-generational dialogue within society. A commitment was also expressed to continue organizing similar inspirational, educational, and engaging programmes for both youth and senior citizens in the future.

The programme concluded with a collective meditation session, a pledge to adopt a healthy lifestyle, and a community meal shared by all the participants.

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