आधुनिक भारत का रथवेग : मानसिक गुलामी से मुक्ति और रामराज्य की ओर अग्रसर भारत

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डॉ पंकज शर्मा

लखनऊ: अयोध्या में श्री राम मंदिर के ध्वजारोहण का ऐतिहासिक क्षण केवल एकधार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्स्थापना और राष्ट्रीयपुनर्जागरण का प्रतीक बन गया। इस शुभ अवसर पर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रमोदी के सम्बोधन ने एक आध्यात्मिक उत्सव से कहीं आगे बढ़कर, राष्ट्र केलिए एक स्पष्ट, सारगर्भित और दूरगामी रोडमैप प्रस्तुत किया। यह भाषणअतीत के प्रति एक सुस्पष्ट विदाई, वर्तमान में एकजुटता का आग्रह औरभविष्य के लिए एक ‘विकसित भारत’ के सपने को साकार करने कासंकल्पपत्र था।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भारत कीसामूहिक मानसिकता को आकार देने वाले एक ऐतिहासिक घाव कोसंबोधित करने के लिए समर्पित किया। उन्होंने सीधे तौर पर 1835 में लार्डमैकाले द्वारा लागू की गई उस शिक्षा नीति की ओर इशारा किया, जिसकाएकमात्र उद्देश्य भारत के मूल ज्ञान-विज्ञान और शैक्षणिक परंपराओं कोव्यवस्थित रूप से हीन सिद्ध करना था। इस नीति ने केवल एकप्रशासनिक ढांचा ही नहीं, बल्कि एक ‘मानसिक गुलामी’ की नींव रखी।यह दासता शारीरिक नहीं, बल्कि बौद्धिक और सांस्कृतिक थी, जो 1947 के बाद भी दशकों तक हमारी सोच में कैद रही।

इसी गुलाम मानसिकता के कारण एक ‘विकार’ उत्पन्न हुआ—एक ऐसीमनोदशा जिसमें विदेशी उत्पाद, विचार और प्रतीक श्रेष्ठतर माने जाने लगे, जबकि स्वदेशी में एक कमी ढूंढी जाने लगी। प्रधानमंत्री ने इस बात परविशेष जोर दिया कि यहां तक कि हमारे गौरवशाली लोकतंत्र औरसंविधान को भी अक्सर पश्चिमी प्रेरणा का परिणाम बताया जाता रहा।उन्होंने इस धारणा का खंडन करते हुए तमिलनाडु में मिले प्राचीनशिलालेखों का उल्लेख किया, जो साबित करते हैं कि भारत में सहभागीशासन और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत वास्तव में ‘लोकतंत्र की जननी’ रहा है।

इस गुलाम मानसिकता को बदलने के लिए केवल शब्द ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि ठोस कार्यवाही की आवश्यकता होती है। पीएम मोदी ने इसकाएक शक्तिशाली उदाहरण देते हुए भारतीय नौसेना के ध्वज में किए गएपरिवर्तन का जिक्र किया। यह कदम केवल एक प्रतीकात्मक डिजाइन मेंबदलाव नहीं था; यह एक गहरी ‘मानसिकता के परिवर्तन’ का प्रतीक था।यह संदेश था कि भारत अब अपनी शक्ति, अपने इतिहास और अपनेप्रतीकों से स्वयं को परिभाषित करेगा, न कि औपनिवेशिक विरासत सेप्राप्त चिन्हों से। अयोध्या में भव्य राम मंदिर का उदय इसी मानसिक मुक्तिऔर सांस्कृतिक आत्मविश्वास के पुनरुत्थान का सबसे बड़ा प्रतीक है।

प्रधानमंत्री मोदी ने ‘विकसित भारत’ की अवधारणा को एक सशक्त औरकल्पनाशील रूपक के माध्यम से प्रस्तुत किया—एक अजेय रथ। इसरूपक के माध्यम से उन्होंने राष्ट्र निर्माण के लिए आवश्यक गुणों को स्पष्टकिया: पहिए- शौर्य और धैर्य – यानी वीरता से आगे बढ़ना, लेकिन धैर्य केसाथ चुनौतियों का सामना करना। ध्वजा- नीति और नीयत – ऐसी नीतियांजो सिद्धांतों और ईमानदार इरादों से कभी समझौता न करें। घोड़े-बल, विवेक, संयम और परोपकार – यह चौकड़ी राष्ट्र की शक्ति, बुद्धिमत्ता, अनुशासन और समाज कल्याण की भावना को दर्शाती है। लगाम- क्षमा, करुणा और संयम – जो यह सुनिश्चित करती है कि शक्ति का उपयोगनियंत्रित, मानवीय और नैतिक रहे। यह रथ एक ऐसे समाज का आदर्शचित्रण है जहां सफलता में अहंकार नहीं है और असफलता में भी दूसरों केप्रति सम्मान की भावना बनी रहती है।

प्रधानमंत्री मोदी ने श्री राम को एक सीमित धार्मिक आकृति के स्थान परएक सार्वभौमिक जीवन मूल्य और दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंनेराम के चरित्र को एक आधुनिक संदर्भ में पिरोते हुए उनके विभिन्न गुणों कोरेखांकित किया- राम आदर्श और मर्यादा के प्रतीक हैं। राम भेद नहीं, भाव से जुड़ते हैं, जो एक समावेशी समाज का आधार है। वे धर्म, क्षमा, ज्ञान, विवेक, कोमलता और कृतज्ञता के सर्वोच्च उदाहरण हैं।राम विनम्रता में निहित महाबल और सत्य के प्रति अडिग संकल्प काप्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार, समाज को सशक्त बनाने के लिएप्रत्येक नागरिक के अंदर ‘राम’ के इन सार्वभौमिक मूल्यों—नैतिकता, न्यायऔर करुणा—की स्थापना अनिवार्य बताई गई।

प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि राष्ट्र निर्माण का यह अभियान केवलवर्तमान तक सीमित नहीं हो सकता। उन्होंने एक दूरदर्शीदृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया, जहां हम अगली सदियों को ध्यान मेंरखकर आज नींव रखें। 2047 तक एक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्तकरने के लिए ‘स्वयं से पहले राष्ट्र’ के भाव को आत्मसात करना होगा। यहतभी संभव है जब देश का प्रत्येक वर्ग—महिला, दलित, पिछड़े, आदिवासी, किसान, युवा—सशक्त होकर विकास की मुख्यधारा से जुड़े।उन्होंने ‘कंधे से कंधा मिलाकर’ चलने और राष्ट्र की यात्रा में गति बढ़ाने काआह्वान किया।

प्रधानमंत्री मोदी का अयोध्या में दिया गया संबोधन केवल एक भाषणनहीं, बल्कि एक रणनीतिक घोषणा और एक सांस्कृतिक घोषणापत्र था।यह भारत को मैकाले की शिक्षा से उपजी हीन भावना और मानसिकगुलामी के चंगुल से मुक्त करने, अपनी गौरवशाली विरासत पर अटूट गर्वकरने और भगवान राम के आदर्शों से प्रेरित होकर एक शक्तिशाली, विकसित, न्यायसंगत एवं समावेशी आधुनिक ‘रामराज्य’ के निर्माण कामार्गदर्शक दस्तावेज है। यह संदेश स्पष्ट और ओजस्वी है कि भारत कीअगली यात्रा उसकी अपनी मूल्य प्रणाली, उसकी अपनी पहचान औरउसकी अपनी सामूहिक शक्ति से परिभाषित होगी। अयोध्या से उठी यहआवाज न केवल भारत के वर्तमान को, बल्कि उसके भविष्य के हजारोंवर्षों को गढ़ने का संकल्प है।

सहिष्णु भाजपा की कहानी

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यही सोनपुर मेला था। यही हरिहर क्षेत्र का विशाल मैदान, जहाँ गंगा और गंडक का संगम सदियों से पशु मेला और सांस्कृतिक उत्सव का साक्षी रहा है। फर्क सिर्फ सत्ता का था।

2022 का नवंबर। बिहार में महागठबंधन की सरकार थी। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री थे और राजद उनका सबसे बड़ा सहयोगी। सोनपुर साहित्योत्सव में कवियत्री अनामिका जैन अम्बर को काव्य पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था। लेकिन जैसे ही पता चला कि उन्होंने कुछ कविताएँ नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों के पक्ष में लिखी-पढ़ी हैं, हंगामा खड़ा हो गया। प्रगतिशील खेमे ने एलान किया—ऐसी कवियत्री को मंच नहीं मिलेगा। विरोध इतना तीव्र था कि अनामिका को पटना एयरपोर्ट से ही वापस लौटना पड़ा। उस दिन साहित्य की नहीं, विचारधारा की जीत हुई थी। सहिष्णुता का दावा करने वाले खेमे ने असहिष्णुता का जीवंत प्रदर्शन किया।

कट टू 2025। अब सोनपुर में फिर साहित्योत्सव हो रहा है। आयोजक वही बिहार सरकार, लेकिन इस बार सत्ता में NDA है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं, पर बहुमत भाजपा का है। पर्यटन विभाग और कला-संस्कृति विभाग—दोनों के मंत्री भाजपा के हैं। दोनों की पृष्ठभूमि संघ से जुड़ी हुई है। जिन्हें “असहिष्णु”, “फासीवादी”, “संघी” कहा जाता रहा है, वही लोग आज आयोजन चला रहे हैं।

और अब देखिए मेले का पोस्टर। उसमें शामिल नाम पढ़कर आँखें फटी की फटी रह जाती हैं-

प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के बिहार राज्य सचिव
वे वरिष्ठ वामपंथी लेखक जो NDA को “फासीवाद” बताते नहीं थकते
वे क्रांतिकारी कवि जो कभी भाजपा सांसद द्वारा आयोजित भोज का बहिष्कार कर चुके हैं
वे सभी चेहरे जो 2022 में अनामिका को एयरपोर्ट से लौटवाने में आगे-आगे थे
सब के सब मंच पर हैं। कोई विरोध नहीं। कोई हंगामा नहीं। कोई धरना-प्रदर्शन नहीं। कोई बयान नहीं कि “इनको मंच क्यों दिया?”

यहाँ न तो किसी को एयरपोर्ट से लौटाया गया, न किसी की किताब जलाई गई, न किसी को “देशद्रोही” कहकर चुप कराया गया।

बस चुपचाप मंच साझा किया जा रहा है। विचारधारा से ऊपर उठकर साहित्य को जगह दी जा रही है।
2022 में जिस खेमे ने सहिष्णुता का ढोंग किया था, वह असहिष्णुता के आरोप लगाता फिरता था।
2025 में जिस खेमे पर असहिष्णुता का ठप्पा लगा था, वह बिना शोर मचाए सहिष्णुता का जीता-जागता प्रमाण दे रहा है।

सोनपुर का मैदान वही है। मेला वही है।
बस अब पता चल गया है—सहिष्णु कौन है।

राजद्रोह फंसी नेहा सिंह राठौर! UP पुलिस ने सारे रास्ते बंद कर कस दिया शिकंजा!

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लखनऊ: गायिका नेहा सिंह राठौर की मुश्किलें अब बढ़ गई हैं। पहलगाम आतंकी हमले के बाद सोशल मीडिया पर किए गए उनके भड़काऊ और राष्ट्र-विरोधी पोस्ट के मामले में यूपी पुलिस ने कमर कस ली है। दो नोटिस जारी होने, हाईकोर्ट के सख्त आदेश और अग्रिम जमानत याचिका खारिज होने के बावजूद बयान दर्ज न कराने पर अब उनकी गिरफ्तारी तय मानी जा रही है। हजरतगंज कोतवाली पुलिस ने दो विशेष टीमें गठित कर दी हैं, जो नेहा के अंबेडकरनगर स्थित पैतृक गांव हीडी पकड़िया सहित संभावित ठिकानों पर लगातार दबिश दे रही हैं।

विवादित पोस्‍ट का पाकिस्‍तान ने किया इस्‍तेमाल

यह मामला 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए उस भयानक आतंकी हमले से जुड़ा है, जिसमें 26 निर्दोष भारतीय पर्यटकों की क्रूर हत्या कर दी गई थी। हमलावरों ने धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना साधा था, जिससे पूरे देश में आक्रोश की लहर दौड़ गई। इसी संवेदनशील माहौल में नेहा सिंह राठौर ने अपने एक्स हैंडल से एक के बाद एक विवादित पोस्ट किए। इनमें उन्होंने केंद्र सरकार और भाजपा पर सीधा हमला बोला, हमले को खुफिया विफलता बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार इसे वोटों के लिए भुनाएगी, जैसे पुलवामा हमले के बाद किया था। एक पोस्ट में उन्होंने लिखा, “पुलवामा का खून अभी सूखा भी नहीं, पहलगाम का खून बह रहा है। मोदी जी, क्या ये भी वोट बैंक है?”

एक वीडियो में तो उन्होंने प्रधानमंत्री पर तंज कसते हुए कहा, “रूस-यूक्रेन युद्ध रोक सकते हैं, लेकिन अपने देश में आतंकी हमला नहीं?”

इन पोस्ट्स ने न सिर्फ धार्मिक समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने का काम किया, बल्कि पाकिस्तान में भारत-विरोधी प्रचार का हथियार भी बन गए।

तीन लोगों ने की थी शिकायत

इन पोस्ट्स के खिलाफ सबसे पहले कुर्सी रोड स्थित वुडलैंड पैराडाइज अपार्टमेंट के निवासी अभय प्रताप सिंह ने हजरतगंज कोतवाली में तहरीर दी। उन्होंने शिकायत की कि नेहा के पोस्ट राष्ट्रीय एकता को खतरे में डाल रहे हैं और एक खास समुदाय को निशाना बना रहे हैं।

इसके बाद रानीगंज के सौरव, दुर्विजयगंज के हिमांशु वर्मा और दुगांवा के अर्जुन गुप्ता ने भी अपनी शिकायतें दर्ज कराईं। पुलिस ने सभी तहरीरों को एक साथ जोड़ते हुए 27 अप्रैल को एफआईआर दर्ज की, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 152 (राजद्रोह के समकक्ष), आईटी एक्ट की धाराएं और अन्य प्रावधान शामिल हैं।

डिजिटल साक्ष्यों की प्रामाणिकता हुई सिद्ध

जांच के दौरान पुलिस ने नेहा के सभी डिजिटल साक्ष्यों-पोस्ट, वीडियो और कमेंट्स को एक पेन ड्राइव में संकलित कर विधि विज्ञान प्रयोगशाला (एफएसएल) भेजा। रिपोर्ट में इनकी प्रामाणिकता सिद्ध हुई, कोई छेड़छाड़ नहीं पाई गई।नेहा ने गिरफ्तारी की आशंका से बचने के लिए हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल की, लेकिन कोर्ट ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।

फिर भी, उन्होंने पुलिस नोटिस का पालन नहीं किया। अंबेडकरनगर पुलिस ने उनके गांव में नोटिस चस्पा किया, हाईकोर्ट ने पेशी का आदेश दिया, लेकिन नेहा ने बीमारी का बहाना बनाकर टालमटोल की। हजरतगंज के एसएचओ मुताबिक, “वे जांच से बच रही हैं, अब सारे रास्ते बंद हैं। टीमें उनके लोकेशन ट्रैक कर रही हैं।” सुप्रीम कोर्ट ने भी अक्टूबर में एफआईआर रद्द करने की याचिका ठुकरा दी, जिसमें नेहा ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला दिया था।

विवादों से घिरी रही हैं नेहा

नेहा सिंह राठौर पहले भी विवादों से घिरी रही हैं। 2023 में ‘यूपी में का बा-सीजन 2’ गाने पर पुलिस नोटिस मिला था, जिसमें उन्होंने कानपुर देहात में बुलडोजर कार्रवाई के दौरान दो महिलाओं की मौत पर सवाल उठाए थे।

2020 के ‘बिहार में का बा’ और 2022 के ‘यूपी में का बा’ गानों से वे राजनीतिक कमेंट्री के लिए मशहूर हुईं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि ये राष्ट्र-विरोधी प्रचार का माध्यम बन गए। अब पहलगाम मामले ने उनके पुराने कदमों को फिर उजागर कर दिया है। सोशल मीडिया पर उनके समर्थक उन्हें ‘आवाज’ बता रहे हैं, लेकिन ज्यादातर यूजर्स उन्हें ‘एंटी-नेशनल’ करार दे रहे हैं।

पुलिस का कहना है कि नेहा के पोस्ट्स ने न सिर्फ आंतरिक सुरक्षा को खतरा पैदा किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब की। गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में उनके अन्य पुराने मामलों की भी पड़ताल होगी। क्या नेहा अब भी ट्वीट्स से बच निकल पाएंगी, या कानून का शिकंजा उन्हें जकड़ लेगा? मामला गरमाता जा रहा है।

संघ के संकल्प से सिद्ध हुआ राम मन्दिर निर्माण का स्वप्न

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सर्वेश कुमार सिंह

अयोध्या : भारतीय सांस्कृतिक गौरव की ऐतिहासिक तिथियों में एक और तिथि शामिल हो रही है। यह 25 नवम्बर 2025, तदनुसार मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि है। इस तिथि को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी श्रीराम मन्दिर के शिखर पर धर्मध्वजा फहरा कर पांच सौ साल की इच्छा और आकांक्षा की पूर्ति के रूप में मन्दिर निर्माण की पूर्णता की घोषणा करेंगे। यह सामान्य तारीख नहीं है, अद्भुत सुयोग है। ईश्वरीय शक्तियों के आध्यात्मिक बल से श्रीराम मन्दिर के लिए 45 साल के एक आन्दोलन का सुफल है। इस आन्दोलन की प्रेरणा, संकल्प और सफलता के मूल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दीर्घकालीन योजना है। राम मन्दिर निर्माण का संकल्प संघ का ही था, जोकि संघ के शताब्दी वर्ष में पूर्ण हो रहा है।

अयोध्या में भगवान श्रीराम के जन्मस्थान पर बने मन्दिर को आज से लगभग 493 साल पहले बाबर के सेनापति मीरबाकी ने तोड़ दिया था। यह तारीख 23 मार्च 1528 थी। पन्द्रह दिन के युद्ध में एक लाख 74 हजार हिन्दुओं के बलिदान के बाद मीरबाकी मन्दिर तोड सका था। मगर हिन्दुओं ने मन्दिर के पुनर्निर्माण की उम्मीद नहीं त्यागी थी, वे लड़ते रहे। वर्ष 1528 से 1949 तक 76 संघर्ष हुए। लेकिन मन्दिर निर्माण का ये लक्ष्य क्या इतनी ही आसानी से प्राप्त हो गया। इस इस दिन को दखेने और स्वप्न को साकार करने के लिए विधिवत योजना बनी, और यह योजना बनाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने। इसके लिए संघ के तत्कालीन सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस (बाला साहब देवरस) ने सभी परिस्थितियों, संघ की सामर्थ्य, समाज की आकांक्षा और मनोदशा का गहन अध्ययन, विश्लेषण कर उन कार्यकर्ताओं को श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को आगे बढ़ाने और लक्ष्य तक पहुंचने की अनुमति दी जो इस आंदोलन को स्थानीय स्तर पर पश्चिम उत्तर प्रदेश में खासकर मुरादाबाद ,मेरठ और कुमायूं मंडलों में चला रहे थे।

संघ के सरसंघचालक से आंदोलन की सफलता और संघ का मार्गदर्शन मांगने वालों में मुरादाबाद निवासी दो सूत्रधार थे, एक मुरादाबाद के पूर्व विभाग प्रचारक और तत्कालीन हिन्दू जागरण मंच के पश्चिम उत्तर प्रदेश के संयोजक दिनेश चंद्र त्यागी (शिक्षा एम एससी फिजिक्स), दूसरे कांग्रेस के प्रखर नेता पूर्व मंत्री, तीन बार कांग्रेस से विधायक रहे मुरादाबाद निवासी दाऊदयाल खन्ना। बाला साहब से आंदोलन की योजना और विस्तार के लिए यह चर्चा बदायूं में 26 दिसम्बर 1983 को लगे संघ के शीत शिविर में हुई। यहां बाला साहब देवरस दो दिन के प्रवास पर शिविर में आए थे। इस वार्ता में संघ के सरसंघचालक ने कहा कि आंदोलन को संघ को चलाना चाहिए अथवा नहीं इस पर गंभीरता से विचार आवश्यक है। यदि आन्दोलन को चलाना है तो यह मानकर आगे बढ़ाया जाए कि इसे हर हाल में सफल करना है चाहे फिर कितना भी संघर्ष और त्याग क्यों ने करना पड़े। साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया कि लक्ष्य प्राप्ति में कम से कम 30 से 40 वर्ष लगेंगे। इसलिए संघ को विचार करना पडेगा। उन्होंने अपने सहयोगियों से भी विचार विमर्श किया। उनका मानना था कि यदि संघ इसे अपने हाथ में ले तो सफलता तक संघर्ष जारी रखना पडेगा। इसके बाद बाला साहब ने दाऊदयाल खन्ना और दिनेश चन्द्र त्यागी से कहा कि आंदोलन चलाइये संघ सहयोग करेगा। आगे चलकर आन्दोलन की प्रखरता और लोकप्रियता को देखते हुए इसे संघ ने अपने समविचार परिवार के संगठन विश्व हिन्दू परिषद् को आन्दोलन चलाने के लिए कहा। दिल्ली के विज्ञान भवन में 7 और 8 अप्रैल 1984 को हुई धर्म संसद में विश्व हिन्दू परिषद् ने आन्दोलन अपने हाथ में ले लिया। यहीं विहिप की देखरेख में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया गया। इसके अध्यक्ष गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ और महामंत्री दाऊदयाल खन्ना को बनाया गया। आगे का आन्दोलन इस समिति के नेतृत्व में आरम्भ हुआ।

राम मन्दिर के संकल्प को साकार करने के लिए संघ ने व्यापक योजना बनायी। आन्दोलन के लिए लगभग एक दर्जन से अधिक प्रचारकों को विश्व हिन्दू परिषद् में भेजा गया। इन प्रचारकों ने अपने जीवन को इस लक्ष्य के लिए समर्पित कर दिया। बंगलौर में 1981 में हुई संघ की बैठक में दिल्ली प्रांत प्रचारक अशोक सिंहल को दायित्व से मुक्त कर विश्व हिन्दू परिषद् में नया दायित्व दिया गया। आन्दोलन की पूरी सांगठनिक संचरचना के मूल केन्द्र रहे चंपतराय को भी 1986 में पश्चिम उत्तर प्रदेश में मेरठ विभाग प्रचारक से विश्व हिन्दू परिषद् में भेज दिया। वर्ष 1984 में संघ ने आंदोलन की कमान विश्व हिन्दू परिषद को सौंपने का महत्वपूर्ण और दूरगामी लक्ष्य प्राप्ति के संकल्प के लिए निर्णय लिया। यह निर्णय आसान नहीं था क्योंकि संघ ने अपने एक महत्वपूर्ण संगठन को एक ऐसे आंदोलन के लिए दांव पर लगा दिया था,जिसकी सफलता की राह बहुत कठिन थी,संघर्ष बहुत लंबा था। सुयोग्य, साहसी, समर्पित प्रचारकों की एक बड़ी टीम की आवश्यकता थी। लेकिन संघ ने हिंदू समाज के स्वाभिमान की रक्षा के लिए ये निर्णय किया।

प्रचारक गिरिराज किशोर, ओंकार भावे, सूर्यकृष्ण,श्यामजी गुप्त, राजेंद्र सिंह पंकज, उमाशंकर, पुरुषोत्तम नारायण सिंह, तुलसीराम नाना भागवत, सदानंद काकडे, गुरुजन सिंह, सूबेदार सिंह सरीखे प्रखर प्रचारकों की एक बड़ी टीम संघ से विहिप में भेजी गई। बाद में भी कई प्रमुख प्रचारक संघ से आन्दोलन में प्रमुख भूमिका निभाने के लिए विश्व हिन्दू परिषद् में भेजे गए। इनमें दिल्ली के क्षेत्र प्रचारक दिनेश कुमार ( बडे दिनेश जी) का नाम प्रमुख है।

संघ में ही रहकर वरिष्ठ प्रचारक मोरोपंत पिंगले ने आंदोलन की योजना और रचना की। वे विहिप के मार्गदर्शक बनाए गए। मोरोपंत जी की ही योजना से विहिप ने एकात्मकता यात्राएं निकाल कर जन जागरण किया। राम ज्योति और शिला पूजन जैसे आयोजन हुए। इन कार्यक्रमों ने हिंदू समाज की सुप्तावस्था में रही शाश्वत चेतना और स्वाभिमान को जगा दिया। फलस्वरूप जागरूक समाज ने वर्ष 1990 और 1992 में अपने इष्ट के मंदिर निर्माण के लिए कूच कर दिया। दो बार कारसेवा संपन्न हुई।

आंदोलन में दो अलग अलग मोर्चों पर संघर्ष की रणनीति विहिप ने बनाई। एक थी प्रत्यक्ष आंदोलन, यानि सभा,सम्मेलन,प्रदर्शन,गोष्ठी,धार्मिक आयोजन,धर्म संसद, संत सम्मेलन आदि। दूसरी न्यायालय में विचाराधीन वादों की सुव्यवस्थित ढंग से पैरवी करना। इन वादों के लिए तथ्य जुटाना,गवाही कराना, अच्छे अधिवक्ताओं की एक बड़ी टीम जुटाना। आंदोलन को दिशा देने और संत समाज को एक जुट करके आंदोलन का अगुआ बनाने का काम अशोक सिंघल जी की प्रतिभा से संपन्न हो सका था। भारत के विभिन्न मत,पंथ,संप्रदायों के संतों महंतों को एकजुट करना कोई आसान काम नहीं था। लेकिन अशोक जी ने ये किया। वे इसलिए भी सफल हुए क्योंकि स्वयं भी संत प्रकृति और प्रवृत्ति के थे। इसलिए उनकी वाणी का अद्भुत प्रभाव था। उनके आग्रह को कोई टाल नहीं सकता था। वे श्वेत वस्त्रधारी संत थे।

जितना मुश्किल राम जन्मभूमि आंदोलन चलाना था,उससे भी मुश्किल था, न्यायालयों का संघर्ष। इस मोर्चे को विहिप में विभिन्न दायित्व पर रहे चंपतराय ने संभाला। चंपतराय जी हमेशा परिदृश्य से ओझल रहकर कार्य करते रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमे की पैरवी के लिए चंपत जी अच्छे से अच्छे अधिवक्ताओं को जुटा रहे थे। उनकी बैठकें करते थे। साक्ष्य भी जुटाते थे। एक एक पेपर की फोटो कॉपी कराने से लेकर उसे समय पर न्यायालय में पहुंचवाना। सभी अधिवक्ताओं की चिंता। हर तारीख पर सजग और गंभीर रहना । वे हर तारीख को निर्णायक मानकर तैयारी करते थे, मानो उसी दिन फैसला होना हो। इन प्रयासों का प्रतिफल था न्यायलय का 9 नवंबर 2019 का फैसला और 22 जनवरी 2024 को मन्दिर में प्राण प्रतिष्ठा का दिवस। और अब मन्दिर निर्माण की पूर्णता और भारतीय सांस्कतिक गौरव की प्रतीक धर्मध्वजा का फहराना।

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