संघ, हिंदुत्व व सनातन पर सुनियोजित हमले 

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कोलकाता। बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम देखने के बाद संघ, हिंदू तथा सनातन विरोधी ताकतें पुनः पूरी आक्रामकता के साथ सक्रिय हो गई हैं। जिन जिन राज्यों में विरोधी दलों की सरकार हैं, उन- उन राज्यों संघ, हिंदुत्व व सनातन  के विरुद्ध षड्यंत्र प्रारंभ हो गए हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बड़ा हमला कर्नाटक से आया जहां कांग्रेसी गृहमंत्री प्रियांक खरगे ने संघ के पंजीकरण व फंडिग पर प्रश्न उठाते हुए, इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलने पर संध पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी। केरल के नए -नवेले मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन ने केरल के तीन कुलपतियों द्वारा संघ के कार्यक्रम में भाग लेने पर घोर आपत्ति जताते हुए उन्हे नोटिस थमा दी है और तीनों कुलपतियों से माफी मांगने को कहा जा रहा है। इसी बीच सपा के राज्यसभा सांसद जावेद अली ने बयान दिया कि देश का बहुसंख्यक समाज काफी हद तक जहरीला हो गया है। जावेद अली ने कहा कि बीजेपी की वजह से हिंदुओं ओैर मुस्लिमों के बीच दूरी बढ़ी है।धर्म  के आधार पर लोगों  का एक दूसरे पर भरोसा टूट गया है । उत्तर प्रदेश में बकरीद के अवसर पर दोस्ती के बहाने असद ने सूर्या को बुलाया और पूरे परिवार ने मिलकर उसकी नृशंस हत्या कर दी तब ये लोग चुप्पी बांधे सूर्या के हत्यारे असद के साथ खड़े हो गए। जब असद का एनकाउंटर हुआ था तब ये मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए असद के लिए फातिहा पढ़ रहे थे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 वर्ष पुराना सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है। यदि केरल के तीन विश्वविद्यालयों  के कुलपतियों ने संघ की किसी व्याख्यान माला , बौद्धिक चर्चा या सार्वजनिक कार्यक्रम में श्रोता के रूप में भाग ले लिया तो इसे अपराध या पद की गरिमा के विरुद्ध कैसे माना जा सकता है? इसके लिए उन्हें माफी मांगने को क्यों कहा जा रहा है? जब कुलपति वामपंथी विचारकों,  गांधीवादी या अम्बेडकरवादी कार्यक्रमों में भाग लेते हैं या अन्य सामाजिक संगठनों के कार्यक्रम में भाग लेते हैं तो उसे “बौद्धिक संवाद” कहा जाता है किन्तु यदि वही कुलपति संघ प्रमुख का व्याख्यान सुन ले तो उससे माफी मांगने को कहा जाता है। यह दोहरा मापदंड है।

विश्वविद्यालय ज्ञान, संवाद और विचार-विमर्श के केंद्र होते हैं, वैचारिक बहिष्कार के नहीं। यदि किसी कुलपति ने मंच से कोई राजनीतिक घोषणा नहीं की, किसी दल का प्रचार नहीं किया, किसी प्रशासनिक निर्णय को प्रभावित नहीं किया, वरन मात्र एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लिया, तो उसे “संघ कार्यकर्ता के स्तर तक गिर जाना” कहना उच्च शिक्षा संस्थानों और कुलपति की गरिमा का अपमान है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार है, लेकिन विचारों से सहमत और व्यक्तियों के बहिष्कार में अंतर होता है। यदि संघ से वैचारिक मतभेद हैं, तो उसका उत्तर विचार से दिया जाना चाहिए, न कि लोगों को कार्यक्रम में जाने से रोका प्रताड़ित करके। विडंबना यह है कि जो लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वैचारिक बहुलता की बात करते हैं, वही आज यह तय करना चाहते हैं कि कुलपति किसका व्याख्यान सुन सकते हैं और किसका नहीं। क्या भारत में अब किसी शिक्षाविद् को कोई व्याख्यान सुनने के लिए राजनीतिक अनुमति लेनी होगी?

सर्वविदित है कि संघ सौ साल से काम कर रहा है। सब जानते हैं कि संघ क्या करता है। जो सोया है उसे जगाया जा सकता है जो सोने का नाटक  करता है उसे नहीं जगाया जा सकता है। संघ की समाज में निश्चित छवि है। संघ अपनी छवि सुधारने के लिए नहीं अपितु समाज के हित में काम करता है। आरोपों का उत्तर देने में संघ समय नहीं व्यर्थ करता है ।संघ के स्वयंसेवक  समाज में  काम करते हैं। संघ बढ़ रहा है तो हर जगह दिख रहा है। संघ की छवि बिगाड़ने वालों  का प्रयास करने वालों की अपनी कोई विश्वसनीयता नहीं है। समाज के हर वर्ग के लोग संघ को प्रेम दे रहे हैं। संघ के काम को समाज आशीर्वाद  देता है।

वर्तमान कांग्रेस जो आज संघ व भाजपा पर प्रतिबंध लगाने का सपना देख रही है उसको ध्यान रखना चाहिए कि यही काम नेहरू जी से लेकर इंदिरा जी और सोनिया जी तक करने का प्रयास करती रही हैं। प्रियांक जैसा दुस्साहस नेहरू जी ने किया था। वो अपने पत्रों में संघ को खतरा बताते थे और जिन्ना की मुस्लिम लीग को क्लीन चिट देते थे। कांग्रेस की मुस्लिम लीग के प्रति मोहब्बत की यह दुकान केरल में केरल में आज भी चल रही है। केरल के सीएम नाराज हैं कि तीन कुलपति संघ के कार्यक्रम में चले गए थे।इसी प्रकार एक बार नेहरू जी सर्वपल्ली राधाकृष्णन से नाराज हो गए थे क्योंकि वह संघ की शाखा में चले गए थे।उस समय नेहरू जी के लिए संघ, पाकिस्तान से भी खतरनाक था।

नेहरू तो गांधी की हत्या के पहले से ही संघ के खिलाफ योजना बना रहे थे।गांधी की  हत्या हुई तो अवसर मिल गया और प्रतिबंध लगा दिया गया लेकिन उसके विरुद्ध साबित कुछ नहीं  हुआ।कांग्रेसी आज तक संघ को समाप्त करने का सपना देख रहे हैं और संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। इनके नेताओं के मन में संघ , भाजपा व हिंदुत्व के प्रति जो घृणा है उसका मूल कारण यही है कि आज संघ व हिंदुत्व सर्वव्यापी हो चुका है। अगर हिंदू समाज का अपमान  होता है तो वह उसका करारा जवाब देना सीख गया है। संघ के शताब्दी वर्ष में भाजपा व उसके सहयोगी दलों की विजय यात्रा 22 राज्यों तक पहुंच चुकी है । केरल में भी संघ का विस्तार हो रहा है और यही कारण है कि वी डी सतीश को  संघ से डर लग रहा है।

लोकतंत्र : संवैधानिक प्रावधान और वास्तविक व्यवहार में बड़ा अंतर

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लखनऊ। लोकतंत्र को विश्व की सर्वाधिक जनोन्मुख और उत्तरदायी शासन व्यवस्था माना जाता है। इसकी मूल अवधारणा अत्यंत सरल और आकर्षक है—सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है, सरकार बनाती है और अंततः वही शासन की अंतिम स्वामिनी होती है। आधुनिक लोकतंत्र का पूरा ढाँचा इसी सिद्धांत पर आधारित है कि राज्य जनता के लिए है, जनता द्वारा संचालित है और जनता के प्रति जवाबदेह है। भारत का संविधान भी इसी भावना को स्वीकार करता है। संविधान की प्रस्तावना “हम भारत के लोग” शब्दों से प्रारंभ होती है, जो स्पष्ट रूप से यह घोषणा करती है कि देश की संप्रभुता और सत्ता का अंतिम स्रोत जनता ही है। सैद्धांतिक रूप से देखा जाए तो लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता के सेवक होते हैं और सरकारी संस्थाएँ जनता की सुविधा तथा कल्याण के लिए कार्य करती हैं। किंतु जब हम लोकतंत्र के व्यवहारिक स्वरूप को देखते हैं तो अनेक बार यह आदर्श स्थिति वास्तविकता से काफी दूर दिखाई देती है।

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि संविधान में जनता को सर्वोच्च स्थान प्राप्त होने के बावजूद व्यवहार में वही जनता अक्सर उपेक्षित, असहाय और याचक की भूमिका में दिखाई देती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिस नागरिक को व्यवस्था का केंद्र होना चाहिए, वह अनेक बार व्यवस्था के किनारे खड़ा दिखाई देता है। सरकारी कार्यालयों में अपने अधिकारों और वैधानिक सुविधाओं के लिए नागरिकों को बार-बार चक्कर लगाने पड़ते हैं। एक सामान्य व्यक्ति को प्रमाण पत्र बनवाने, भूमि अभिलेख प्राप्त करने, पेंशन, राशन, छात्रवृत्ति, स्वास्थ्य सुविधा या अन्य सरकारी सेवाओं के लिए लंबी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। कई बार उसे यह अनुभव होता है कि वह किसी अधिकार का उपयोग नहीं कर रहा, बल्कि किसी कृपा की याचना कर रहा है।

लोकतंत्र की आत्मा यह कहती है कि जनप्रतिनिधि जनता के प्रति जवाबदेह हों, किंतु व्यवहार में अनेक बार स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। चुनाव के समय जनता का महत्व अचानक बढ़ जाता है। नेता घर-घर पहुँचते हैं, हाथ जोड़ते हैं, वादे करते हैं और स्वयं को जनता का सेवक बताते हैं। किंतु चुनाव संपन्न होने के बाद जनता और प्रतिनिधियों के बीच दूरी बढ़ने लगती है। अनेक नागरिकों का अनुभव है कि जिन प्रतिनिधियों तक चुनाव से पहले पहुँचना आसान होता है, वे चुनाव के बाद सामान्य नागरिकों की पहुँच से दूर हो जाते हैं। इससे लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास कमजोर पड़ता है और यह भावना विकसित होती है कि सत्ता जनता की नहीं, बल्कि सत्ता प्राप्त समूहों की संपत्ति बनकर रह गई है।

लोकतंत्र में जनसेवा को सर्वोच्च मूल्य माना गया है, किंतु वास्तविकता में कई बार जनसेवा की अवधारणा सत्ता और विशेषाधिकार प्राप्त करने का माध्यम बन जाती है। सार्वजनिक जीवन में प्रवेश करने वाले अनेक लोग ईमानदारी और समर्पण के साथ कार्य करते हैं, किंतु यह भी सत्य है कि भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, संसाधनों के दुरुपयोग और सत्ता के केंद्रीकरण जैसी समस्याएँ लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करती हैं। जब सार्वजनिक पदों का उपयोग निजी लाभ के लिए होने लगता है, तब लोकतंत्र का नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है। जनता के करों से संचालित संसाधन यदि कुछ प्रभावशाली समूहों के हित में अधिक उपयोग होने लगें और आम नागरिक को उसका उचित लाभ न मिले, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है।

वास्तव में लोकतंत्र और राजतंत्र के बीच सबसे बड़ा अंतर यही माना जाता है कि लोकतंत्र में शासक और शासित का संबंध मालिक और प्रजा का नहीं, बल्कि सेवक और स्वामी का होता है। किंतु व्यवहारिक स्तर पर अनेक बार प्रशासनिक संस्कृति में औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेष दिखाई देते हैं। नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करने के बजाय कई संस्थाएँ आदेशात्मक और नियंत्रणकारी दृष्टिकोण अपनाती हैं। लोकतंत्र में नागरिक अधिकारों का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए, किंतु कई बार नागरिकों को अपनी वैध माँगों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। यह स्थिति लोकतंत्र की मूल भावना के अनुकूल नहीं कही जा सकती।

लोकतंत्र का उद्देश्य केवल चुनाव कराना नहीं है। चुनाव लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक सफलता इस बात से निर्धारित होती है कि शासन व्यवस्था कितनी पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-केंद्रित है। यदि नागरिकों को अपने अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करना पड़े, यदि सरकारी सेवाएँ समय पर न मिलें, यदि निर्णय प्रक्रिया में जनता की भागीदारी सीमित हो और यदि सत्ता का उपयोग जनहित के बजाय विशेष हितों के लिए होने लगे, तो लोकतंत्र का स्वरूप कमजोर पड़ने लगता है।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि लोकतंत्र की चुनौतियों के लिए केवल राजनेताओं या प्रशासन को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र एक साझी व्यवस्था है जिसमें नागरिकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। जागरूक मतदाता, सक्रिय नागरिक समाज, स्वतंत्र मीडिया, उत्तरदायी संस्थाएँ और मजबूत संवैधानिक व्यवस्थाएँ लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखती हैं। जब नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग रहते हैं, तब लोकतंत्र अधिक उत्तरदायी बनता है। इसलिए लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए नागरिक चेतना का विकास भी उतना ही आवश्यक है जितना कि प्रशासनिक सुधार।

आज आवश्यकता इस बात की है कि लोकतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित न माना जाए। शासन व्यवस्था का प्रत्येक अंग इस भावना के साथ कार्य करे कि वह जनता का सेवक है और जनता ही उसकी वास्तविक स्वामी है। सरकारी कार्यालयों को नागरिक-अनुकूल बनाना होगा। प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना होगा। जनप्रतिनिधियों को चुनावी वादों और सार्वजनिक उत्तरदायित्व के प्रति अधिक गंभीर होना होगा। सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही नागरिकों को भी लोकतांत्रिक मूल्यों, संवैधानिक अधिकारों और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता के प्रति अधिक सजग होना होगा।

भारतीय लोकतंत्र ने अनेक उपलब्धियाँ हासिल की हैं और विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में उसकी पहचान स्थापित हुई है। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र के आदर्श और उसके व्यवहारिक स्वरूप के बीच अभी भी एक उल्लेखनीय दूरी मौजूद है। संविधान ने जनता को सर्वोच्च स्थान दिया है, किंतु उस संवैधानिक भावना को प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवहार में पूरी तरह उतारना अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। लोकतंत्र की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब नागरिक स्वयं को व्यवस्था का याचक नहीं, बल्कि सम्मानित अधिकार-संपन्न स्वामी अनुभव करे; जब जनप्रतिनिधि सत्ता के अधिकारी नहीं, बल्कि जनता के उत्तरदायी सेवक के रूप में कार्य करें; और जब शासन का प्रत्येक निर्णय नागरिक हित को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान करे। लोकतंत्र की आत्मा भी यही है और उसका अंतिम लक्ष्य भी यही होना चाहिए।

बंगाल से लेकर कश्मीर तक राष्ट्र रक्षा आदोलनों की लंबी श्रृंखला

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भोपाल : सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और क्राँतिकारी विचारक डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 23 जुलाई 1901 को बंगाल के अति प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था । उनके पिता आशुतोष मुखर्जी सुप्रसिद्ध शिक्षाविद् और बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । उन्हे अंग्रेजों ने “सर” की उपाधि से सम्मानित किया था । श्यामाप्रसाद जी की अधिकांश शिक्षा कलकत्ता में ही हुई । उन्होंने 1917 में मैट्रिक एवं 1921 में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की । 1923 में लॉ की उपाधि अर्जित करके वे विदेश चले गये और 1926 में लंदन से बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। अपने पिता का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी अल्पायु में ही विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएँ अर्जित कीं। वे मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। इतनी कम आयु में कुलपति बनने वाले वे भारत के पहले व्यक्ति बने । एक प्रखर वक्ता, उच्च कोटि के विचारक और शिक्षाविद् के रूप में उनकी ख्याति भारत भर में हो गई।

उन दिनों बंगाल में दो प्रकार का वातावरण बन रहा था । एक तो विभाजनकारी साम्प्रदायिक शक्तियाँ जोर पकड़ रहीं थीं जिनके सिर पर अंग्रेजों का हाथ था । दूसरे भारतीय को अंग्रेजों से मुक्ति का आंदोलन तेज हो रहा था । डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी शाँत न रह सके । उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली और स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने लगे । वे चार वर्ष के लिये विधायक भी बने । किन्तु वे चाहते थे कि संघर्ष अंग्रेजों के साथ साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ भी संघर्ष किया जाना चाहिए। इस बात पर कांग्रेस से मतभेद हुये और उन्होंने त्यागपत्र दे दिया । डॉ॰ मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक थे। उन्होने एक नया राजनैतिक समूह प्रगतिशील गठबन्धन तैयार किया और विधायक बने । इस गठबंधन सरकार में वे वित्तमन्त्री बने। तभी सावरकर जी के राष्ट्रवाद दर्शन से प्रभावित हुये उन्हे लगा कि मुस्लिम लीग की साम्प्रदायिक राजनीति से मुकाबला करने के लिये बुद्धिजीवी समाज को जाग्रत और संगठित करना होगा । इस विचार से वे हिन्दू महासभा में सम्मिलित हो गये ।

मुस्लिम लीग ने बंगाल का वातावरण पूरी तरह दूषित कर दिया था। बंगाल के हिन्दुओं में एक भय का वातावरण बन रहा रहा था । उन्होंने मुस्लिम लीग के बंगाल को विभाजित करने के प्रयासों को नाकाम करने का संकल्प लिया और जन जागरण में जुट गये । 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ हुआ । यह आव्हान गाँधीजी का था । यद्यपि डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी कांग्रेस में नहीं थे फिर भी उन्होंने आंदोलन में भाग लिया उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया । रिहाई के बाद वे पुनः जन जागरण और, बंगाल का विभाजन रोकने के अभियान में जुट गये । डॉ॰ मुखर्जी अपनी सभाओं में यह बात समझाने का प्रयास कर रहे थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक हैं। धर्म व्यक्ति का निजीत्व है इसके आधार पर भारत का विभाजन कैसे हो सकता है । वे मानते थे कि विभाजन की मानसिकता कुछ लोगों के स्वार्थी मस्तिष्क की उपज है जिसे अंग्रेज प्रोत्साहित कर रहे हैं। वे मानते थे कि आधारभूत सत्य यह है कि हम सब एक हैं। हममें कोई अन्तर नहीं है। हम सब एक ही रक्त के हैं। कितु बात न बनी। अंग्रेज जाते जाते भारत को विभाजित करने गये ।

अंततः भारत स्वतंत्र हुआ। पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में सरकार बनीं। नेहरू जी ने डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी को मंत्रीमंडल में स्थान दिया । 1951 में नया राजनैतिक दल भारतीय जनसंघ अस्तित्व में आया । डाक्टर मुखर्जी भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने । पर डाक्टर मुखर्जी साम्प्रदायिक आधार पर कश्मीर में अलगाववादियों को विशेषाधिकार देने के विरुद्ध थे । उन्होंने केन्द्रीय मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया और कश्मीर जाकर आंदोलन की घोषणा कर दी । डॉ. मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का एकात्म अंग मानते थे । वे कहते थे कि धारा 370 से अलगाव बढ़ेगा । संसद में अपने भाषण में उन्होंनें धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। उन्होंने संसद के बाहर देश व्यापी आंदोलन की घोषणा की और अगस्त 1952 में जम्मू कश्मीर की विशाल रैली में अपना यह संकल्प दोहराया कि ”या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा”। डॉ. मुखर्जी अपने संकल्प को पूरा करने के लिये 1953 में जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े । उन्होंने नारा दिया था “एक देश में दो निशान, दो विधान और दो प्रधान- नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे” । सरकार ने उन्हे कश्मीर जाने से रोकना चाहा । उन्हें कश्मीर की सीमा पर गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में 23 जून 1953 को उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गयी। जेल में उनकी मृत्यु के समाचार ने देश को हिलाकर रख दिया । यद्यपि तत्कालीन सरकार ने उनकी इस रहस्यमय मृत्यु की जाँच कराने से इंकार कर दिया किन्तु देश में जो व्यापक प्रतिक्रिया हुये उससे झलक कर और कश्मीर में प्रवेश के लिये परमिट सिस्टम समाप्त कर दिया । इस प्रकार राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिये उनका बलिदान हुआ ।

माता रामबेटी वृद्धाश्रम में वरिष्ठ नागरिकों के साथ विशेष योग कार्यक्रम का आयोजन

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भास्कर बिक्रम चेतिया

दिल्ली । अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 के अवसर पर युग संस्कृति न्यास एवं वृद्धकेयर फाउंडेशन द्वारा वरिष्ठ नागरिकों के साथ एक विशेष योग कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस वर्ष की अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की थीम “Yoga for Healthy Ageing” को केंद्र में रखते हुए आयोजित कार्यक्रम का उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों के शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाने हेतु योग के महत्व को जन-जन तक पहुँचाना था।

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन एवं वैदिक मंगलाचरण के साथ हुआ। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. पवन गर्ग (पूर्व वाइस प्रेसिडेंट एवं सेक्रेटरी, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन), विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री राहुल (फाउंडर एवं सीईओ, होमलेस केयर फाउंडेशन), श्रीमती शिखा टंडन (प्रिंसिपल, दृष्टि पब्लिक स्कूल) तथा श्रीमती शगुन चड्ढा (संयोजिका, संस्कार डीएलएफ शाखा, भारत विकास परिषद) उपस्थित रहीं। युग संस्कृति न्यास के संस्थापक आचार्य धर्मवीर जी और वृद्धकेयर फाउंडेशन की डायरेक्टर श्रीमती गार्गी लखनपाल जी ने सभी अतिथियों का स्वागत किया और इस कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े अनेक गणमान्य अतिथियों, अधिकारियों एवं प्रबुद्ध वर्ग के लोगों की भी गरिमामयी उपस्थिति रही।

कार्यक्रम का संचालन श्री भास्कर चेतिया जी द्वारा किया गया। योग एवं प्राणायाम सत्र का नेतृत्व श्रीमती ममता गोयल जी ने किया। देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार से पधारी योग विशेषज्ञ टीम के सदस्य श्री आदित्य, श्री सयोन एवं अन्य प्रशिक्षकों ने वरिष्ठ नागरिकों को योग, प्राणायाम एवं ध्यान की विभिन्न विधियों का अभ्यास कराया तथा उनके स्वास्थ्य संबंधी लाभों की जानकारी दी। प्रतिभागियों ने पूरे उत्साह, अनुशासन एवं सकारात्मक ऊर्जा के साथ योगाभ्यास में सहभागिता करते हुए योग के शारीरिक एवं मानसिक लाभों का अनुभव किया तथा अपने प्रेरणादायक अनुभव भी साझा किए।

इस अवसर पर वक्ताओं ने योग को स्वस्थ एवं संतुलित जीवन की आधारशिला बताते हुए कहा कि नियमित योगाभ्यास न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाता है, बल्कि मानसिक शांति, आत्मविश्वास एवं सकारात्मक दृष्टिकोण के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विशेष रूप से बढ़ती आयु में योग व्यक्ति को सक्रिय, आत्मनिर्भर एवं ऊर्जावान बनाए रखने में सहायक सिद्ध होता है।

आश्रम की संचालक महंत महानंद गिरी जी ने अपने संबोधन में कहा कि ऐसे कार्यक्रम समाज के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। योग व्यक्ति को स्वस्थ, अनुशासित एवं शांतचित्त बनाता है तथा जीवन में सकारात्मकता एवं आत्मबल का संचार करता है। उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों के स्वास्थ्य एवं कल्याण हेतु युग संस्कृति न्यास और वृद्धकेयर फाउंडेशन के द्वारा किए जा रहे सतत प्रयासों तथा योग दिवस पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम के लिए दोनों संस्थाओं के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।

इस अवसर पर अपने भावनात्मक विचार व्यक्त करते हुए युग संस्कृति न्यास के संस्थापक आचार्य धर्मवीर जी ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत की प्राचीन योग परंपरा को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिली है तथा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के माध्यम से विश्वभर में योग के प्रति व्यापक जागरूकता का प्रसार हुआ है।

उन्होंने कहा कि यदि हमें भारत को पुनः विश्वगुरु के रूप में स्थापित करना है तो समाज के प्रत्येक वर्ग को साथ लेकर चलना होगा। इसके लिए शांत मन, अनुशासित जीवनशैली एवं स्वस्थ शरीर का होना आवश्यक है, जिसमें योग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ नागरिक हमारे समाज की अमूल्य धरोहर, अनुभव के स्रोत एवं युवा पीढ़ी के प्रेरणास्तंभ हैं। उनका स्वस्थ एवं सक्रिय रहना आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सकारात्मक उदाहरण प्रस्तुत करता है। योग इस दिशा में एक प्रभावी एवं सरल माध्यम है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।

वृद्धकेयर फाउंडेशन के संचालक सुश्री गार्गी जी ने वृद्धाश्रमों में रहने वाले वृद्ध व्यक्तियों के जीवन में योग के महत्व को अपने लंबे अनुभव के आधार पर उजागर किया। उन्होंने माता रामबेटी वृद्धाश्रम में रहने वाले सभी बुजुर्गों को नियमित रूप से योग करने के लिए आह्वान किया जिससे उनके शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक सोच-विचार पर अच्छी और गहरी प्रभाव और विकास हो पाए।

कार्यक्रम के दौरान उपस्थित अतिथियों ने युग संस्कृति न्यास एवं वृद्धकेयर फाउंडेशन द्वारा किए जा रहे सामाजिक एवं स्वास्थ्य जागरूकता संबंधी प्रयासों की सराहना की। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार के कार्यक्रम समाज में स्वास्थ्य, जागरूकता एवं पीढ़ियों के बीच सकारात्मक संवाद को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। साथ ही भविष्य में भी युवाओं एवं वरिष्ठ नागरिकों के लिए ऐसे प्रेरणादायी, ज्ञानवर्धक एवं मनोरंजक कार्यक्रमों के आयोजन की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई।

कार्यक्रम का समापन सामूहिक ध्यान, स्वस्थ जीवनशैली के संकल्प एवं सभी प्रतिभागियों के साथ सामूहिक आहार के साथ हुआ।

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