क्या बुलडोजर ही समाधान है, या वास्तविक दोषियों की जवाबदेही तय होगी?

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अखिलेश चौधरी

दिल्ली । देश के अनेक शहरों और कस्बों में अनियमित अथवा अवैध कॉलोनियों का फैलता जाल आज एक गम्भीर सामाजिक, प्रशासनिक और मानवीय समस्या बन चुका है। यह समस्या किसी एक राज्य या शहर तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्षों से भवन निर्माताओं, भूमाफियाओं, राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक लापरवाही की साठगांठ से विकसित हुई है। सबसे दुःखद पक्ष यह है कि इस पूरे तंत्र का सबसे बड़ा पीड़ित वह गरीब और मध्यमवर्गीय व्यक्ति बनता है, जिसने जीवन भर की कमाई, ऋण और असंख्य सपनों के सहारे अपने परिवार के लिए एक छोटा-सा घर बनाया होता है।

*प्रशासनिक मौन और साठगांठ की भूमिका*

वास्तव में यह समस्या अचानक पैदा नहीं हुई है। अनेक स्थानों पर निर्माताओं और भूमाफियाओं ने बिना आवश्यक अनुमतियों, स्वीकृत मानचित्रों और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए कृषि भूमि, वन क्षेत्र अथवा प्रतिबन्धित भूखण्डों पर भूखण्ड (प्लॉट) काटकर बेच दिए। लोगों को सस्ते भूखण्ड, शीघ्र विकसित होने वाली कॉलोनियों और उज्ज्वल भविष्य के सपने दिखाए गए। रीयल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए ‘रेरा’ (RERA) जैसे कड़े कानून होने के बावजूद, ये अवैध कॉलोनियां नियामक संस्थाओं की नाक के नीचे फलती-फूलती रहीं। प्रश्न उठता है कि क्या ऐसे कानून केवल बड़े प्रोजेक्ट्स तक सीमित रह गए हैं और छोटे कस्बों या अर्ध-शहरी क्षेत्रों में इनकी पहुंच शून्य है?

स्थानीय प्रशासन, विकास प्राधिकरण और संबंधित विभागों के कुछ अधिकारियों ने अपनी जिम्मेदारी निभाने के बजाय या तो आंखें मूंद लीं या फिर प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से इस अवैध कारोबार को संरक्षण दिया। वर्षों तक कॉलोनियां बसती रहीं। कई कॉलोनियों के निवासी तो गृह कर (हाऊस टैक्स) का भी भुगतान करते हैं। बिजली-पानी के अस्थायी संयोजन (कनेक्शन) मिले, सड़कें बनीं, बाजार विकसित हुए और हजारों परिवार वहां रहने लगे।

*वित्तीय संस्थाओं की ढिलाई और नागरिक की विवशता*

इस पूरी प्रक्रिया में एक आम नागरिक की लाचारी और उसकी विवशता को भी समझना होगा। आज के समय में शहरों में वैध और स्वीकृत जमीनें इतनी महंगी हो चुकी हैं कि गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग की पहुंच से बाहर हैं। ऐसे में इन कॉलोनियों में निवेश करना उनकी रुचि । नहीं, बल्कि विवशता बन जाता है।

रही-सही कसर तब पूरी हो जाती है जब कई प्रतिष्ठित वित्तीय संस्थान और बैंक भी बिना पूरी जांच-पड़ताल के ऐसी सम्पत्तियों पर गृह ऋण स्वीकृत कर देते हैं। जब एक आम नागरिक देखता है कि शासकीय या प्रतिष्ठित निजी बैंक इस सम्पत्ति पर ऋण दे रहा है, तो उसका प्रशासनिक व्यवस्था पर विश्वास सुदृढ़ हो जाता है। वह स्वाभाविक रूप से यह मान लेता है कि यदि प्रशासन और बैंकों की जानकारी में सब कुछ हो रहा है, तो निश्चित रूप से सब वैध होगा। लेकिन इस धोखाधड़ी में बैंकों और वित्तीय संस्थाओं की ढिलाई या संलिप्तता की जांच कभी नहीं होती।

जब मामला न्यायालय तक पहुंचता है या प्रशासनिक कार्रवाई का समय आता है, तब बुलडोजर सीधे उन लोगों के घरों की ओर बढ़ने लगते हैं, जिन्होंने केवल अपने परिवार के लिए एक सुरक्षित छत खरीदने का प्रयास किया था। इन दिनों हरियाणा के फरीदाबाद के अनेक क्षेत्रों में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन के सन्दर्भ में प्रशासन द्वारा नोटिस दिए जा रहे हैं और मकानों को ढहाने की वास्तविक तोड़-फोड़ की कार्रवाई चल रही है। इस कार्रवाई के बाद हजारों परिवारों की सांसें अटक गई हैं। वर्षों से जिन घरों में लोग रह रहे हैं, आज वे मलबे में तब्दील हो रहे हैं।

इसके विपरीत, व्यवस्था का दूसरा विरोधाभासी चेहरा उदाहरण स्वरूप उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद स्थित इन्दिरापुरम क्षेत्र में देखने को मिलता है, जहां ग्रीन बेल्ट हिंडन नहर के साथ खेल का मैदान बनेगा, कभी मौखिक रूप से ऐसा कहा जाता था, परन्तु आज वहां अलग-अलग रूप से अवैध कब्जा बढ़ता जा रहा है। साथ ही हिंडन नदी की पेटी (डूब क्षेत्र/फ्लड प्लेन) जैसी बेहद सम्वेदनशील जगहों पर आज भी धड़ल्ले से नई बसावट हो रही है। वहां निरंतर भूखण्ड काटे जा रहे हैं, लेकिन प्रशासन शुरुआती चरण में इसे रोकने के लिए कोई कड़ा कदम नहीं उठा रहा है।

*वोट बैंक की राजनीति और नियमितीकरण के झूठे वादे*

जब खेतों में भूखण्ड काटे जा रहे होते हैं, नदियों के डूब क्षेत्रों और ग्रीन बेल्ट पर अवैध निर्माण और नई बसावटें हो रही होती हैं, रजिस्ट्रियां हो रही होती हैं, यहाँ तक कि भवनों के पार्किंग क्षेत्र में भी दुकानें बनाकर बेच दी जाती हैं, तब सम्बंधित विभाग, नगर नियोजन संस्थाएं और स्थानीय प्रशासन क्या कर रहे होते हैं? यदि निवासियों की सुरक्षा, पार्किंग की समस्या, कानून और पर्यावरण के नियमों का सरेआम उल्लंघन हो रहा है, तो समय रहते उसे शुरुआती चरण में ही क्यों नहीं रोका जाता? फरीदाबाद की तरह वर्षों तक मौन रहने वाली व्यवस्था अचानक केवल अंतिम चरण में सक्रिय होकर गरीबों के घरों पर बुलडोजर क्यों चलाती है? ऐसी जगहों पर समय रहते इस जाल को फैलने से क्यों नहीं रोकती?

इस समस्या का एक राजनीतिक पक्ष भी है। अनेक बार वोट बैंक की राजनीति और राजनीतिक संरक्षण के कारण अवैध कॉलोनियां वर्षों तक फलती-फूलती रहती हैं। चुनावों के समय इनके नियमितीकरण के वादे किए जाते हैं, जिससे आम नागरिक यह विश्वास कर बैठता है कि भविष्य में उसकी कॉलोनी को वैध दर्जा मिल जाएगा। परिणामस्वरूप लोग अपनी गाढ़ी कमाई इन क्षेत्रों में निवेश कर देते हैं। किंतु जब कानूनी संकट उत्पन्न होता है, तब वही राजनीतिक दल और व्यवस्था पीछे हट जाते हैं और वे परिवार सबसे अधिक असुरक्षित हो जाते हैं।

*डिजिटल इंडिया का अंतर्विरोध और अनियोजित विकास*

आज जब हम देश में हर छोटी-बड़ी चीज डिजिटल माध्यम से कर रहे हैं, तब जमीनों के रिकॉर्ड, खसरा-खतौनी और उनके भूमि उपयोग (Land Use) की स्पष्ट जानकारी एक क्लिक पर आम भाषा में उपलब्ध क्यों नहीं होती? शासकीय पोर्टल्स को इतना जटिल और अस्पष्ट क्यों रखा जाता है कि एक आम आदमी को दलालों और भूमाफियाओं के जाल में फंसना पड़े?

अवैध कॉलोनियों का दुष्प्रभाव केवल कानूनी विवाद तक सीमित नहीं है। ऐसी बस्तियों में रहने वाले लोग अक्सर सड़क, सीवर, स्वच्छ पेयजल, पार्क, विद्यालय और चिकित्सालय जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। अनियोजित निर्माण और हिंडन जैसी नदियों के प्राकृतिक प्रवाह/बाढ़ग्रस्त क्षेत्र व पर्यावरण के लिए संवेदनशील ग्रीन बेल्ट पर अतिक्रमण से जल निकासी की गम्भीर समस्याएं उत्पन्न होती हैं, बाढ़ का संकट बढ़ता है, पर्यावरणीय संतुलन प्रभावित होता है और शहरों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ता है। इसलिए नगर नियोजन और पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से भी इस समस्या का स्थायी समाधान आवश्यक है।

*बुलडोजर नहीं, जवाबदेही और पुनर्वास*

जहां हजारों परिवार वर्षों से रह रहे हों, वहां केवल ध्वस्तीकरण को ही एकमात्र उपाय मानना उचित नहीं है। देश की सर्वोच्च अदालत ने भी समय-समय पर यह माना है कि ‘RIGHT TO SHELTER’ (आवास का अधिकार) संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक अभिन्न हिस्सा है। सिर पर छत होना मानवीय गरिमा से जुड़ा विषय है। इसलिए, जब प्रशासन अदालती आदेशों का हवाला देकर फरीदाबाद जैसी कार्रवाई करता है, तो उसे अदालतों की उस मूल भावना को भी याद रखना चाहिए जो निर्दोषों के पुनर्वास और मानवीय दृष्टिकोण की वकालत करती है। जनहित, मानवीय सम्वेदनाएं और कानूनी व्यवस्था के बीच सन्तुलन स्थापित करना अनिवार्य है।

न्याय की मूल भावना यही कहती है कि दोषी वही है जिसने अवैध कार्य किया और उसे संरक्षण दिया। इसलिए अवैध कॉलोनियां काटने वाले निर्माताओं, भूमाफियाओं तथा उन्हें शुरुआती स्तर पर ही न रोककर संरक्षण देने वाले अधिकारियों की व्यक्तिगत, आर्थिक और कानूनी जवाबदेही तय होना आवश्यक है। केवल मकान तोड़ देना समाधान नहीं है; वास्तविक दोषियों की सम्पत्तियां जब्त की जानी चाहिए और उनके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए ताकि गाजियाबाद के डूब क्षेत्रों जैसी नई बसावटों और भवनों में पार्किंग क्षेत्र को व्यावसायिक रूप देने जैसी गतिविधियों पर समय रहते लगाम लग सके। सरकारों को ऐसी पारदर्शी ऑनलाइन व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जहां कोई भी नागरिक किसी भूखण्ड की वैधता आसानी से देख सके। अधिकारियों के केवल स्थानांतरण या निलम्बन पर्याप्त नहीं हैं, उन पर आर्थिक उत्तरदायित्व भी सुनिश्चित होना चाहिए।

एक सभ्य समाज में गरीब का घर केवल ईंट और सीमेंट का ढांचा नहीं होता, बल्कि उसके संघर्ष, त्याग और सपनों का प्रतीक होता है। भ्रष्टाचार पर प्रहार, राजनीतिक संरक्षण की समाप्ति, दोषी निर्माताओं और अधिकारियों पर कठोर कार्रवाई तथा आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा ही समाधान है। न्याय तभी पूर्ण माना जाएगा, जब दण्ड वास्तविक अपराधियों को मिले, न कि उन निर्दोष परिवारों को, जिन्होंने केवल अपने सिर पर एक सुरक्षित छत का सपना देखा था।

बेटियों को निशाना बनाना लोकतंत्र नहीं, सामाजिक पतन का संकेत है।

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दिल्ली । सूरज ढल चुका था, लेकिन लखनऊ की एक पुरानी हवेली में रोशनी अभी भी जल रही थी। अखबारों के बिखरे पन्नों और टीवी चैनलों के शोर के बीच 22 वर्षीय प्रिया अपनी किताबों में डूबी थी। तभी फोन की घंटी बजी। दोस्त का संदेश था, “प्रिया, तुम ठीक हो? सोशल मीडिया पर क्या चल रहा है?”

स्क्रीन खुलते ही उसकी दुनिया बदल गई।

कहीं चोरी की अफवाह, कहीं गुमशुदगी की मनगढ़ंत कहानी, कहीं फोटोशॉप की गई तस्वीरें। एक ट्रोल ने लिखा, “नेता की बेटी का असली चेहरा सामने आ गया।” देखते ही देखते लाइक्स, कमेंट्स और शेयरों की बाढ़ आ गई। कुछ लोग इसे मजाक समझ रहे थे, कुछ इसे राजनीतिक हथियार बना रहे थे।

घर में सन्नाटा था। माँ की आँखों में आँसू थे। पिता की खामोशी में गुस्सा और बेबसी।

राजनीति हमेशा ऐसी नहीं थी। मतभेद होते थे, तीखी बहसें भी होती थीं, लेकिन परिवारों को निशाना बनाने की परंपरा नहीं थी। विरोधियों पर वैचारिक हमले होते थे, निजी जीवन पर नहीं। आज बहस का मंच कीचड़ उछालने का अखाड़ा बनता जा रहा है। मुद्दे गायब हैं, मर्यादा लापता है।

देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। कभी किसी नेता की बेटी को फर्जी वीडियो से बदनाम किया जाता है, कभी किसी की पत्नी या माँ को अभद्र टिप्पणियों का शिकार बनाया जाता है। चुनावी रैलियों से लेकर सोशल मीडिया तक, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अब निजी हमलों में बदलती जा रही है।

तमिलनाडु, महाराष्ट्र, बिहार, राजस्थान या उत्तर प्रदेश, कोई प्रदेश इससे अछूता नहीं है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और खतरनाक बना दिया है। एक झूठी पोस्ट मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाती है। किसी को सनसनी चाहिए, किसी को लाइक्स चाहिए, तो किसी को अपने विरोधी को नीचा दिखाने का अवसर।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल में कहा, “बेटी तो बेटी होती है।” यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि हमारी साझा संस्कृति और तहजीब की याद दिलाने वाला संदेश है। बेटियों का सम्मान किसी दल, धर्म, जाति या विचारधारा का विषय नहीं हो सकता।

इस मामले में पुलिस ने त्वरित कार्रवाई की। विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी एक स्वर में इसकी निंदा की। यह स्वागतयोग्य है, लेकिन समस्या केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। जब तक राजनीतिक दल अपने समर्थकों को संयम और जवाबदेही का पाठ नहीं पढ़ाएँगे, तब तक ऐसी घटनाएँ रुकने वाली नहीं हैं।

जरा उस लड़की की कल्पना कीजिए, जिसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं। वह स्कूल जाती है, सपने देखती है, दोस्तों के साथ हँसती है। अचानक पिता की राजनीतिक पहचान उसकी अपनी पहचान पर भारी पड़ जाती है। उसकी तस्वीरें वायरल होने लगती हैं। संदर्भ बदल दिए जाते हैं। स्कूल में सवाल उठते हैं, मोहल्ले में कानाफूसी शुरू हो जाती है। परिवार की नींद उड़ जाती है।

लोकतंत्र में असहमति जरूरी है। सरकार की आलोचना होनी चाहिए, विपक्ष से सवाल पूछे जाने चाहिए। लेकिन जब बहस परिवारों तक पहुँच जाती है, तब असली मुद्दे दम तोड़ देते हैं। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महँगाई और किसानों की समस्याएँ पीछे छूट जाती हैं। चर्चा अफवाहों और अपमान तक सिमट जाती है।

हमें ठहरकर सोचना होगा।

हर सनसनीखेज पोस्ट को साझा करने से पहले उसकी सच्चाई परखें। राजनीतिक कार्यकर्ता हों, इन्फ्लुएंसर हों या आम नागरिक, सभी को संयम दिखाना होगा। झूठ फैलाने वाला दोषी है, लेकिन बिना जाँच उसे आगे बढ़ाने वाला भी उतना ही जिम्मेदार है।

सत्ता बदलती रहती है। नेता आते-जाते रहते हैं। लेकिन समाज की शालीनता एक बार टूट जाए, तो उसे जोड़ने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।

बेटी तो बेटी होती है। यह कोई नारा नहीं, हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा होना चाहिए। क्योंकि जब सियासत बेटियों को निशाना बनाती है, तब हार किसी एक दल की नहीं होती, पूरे समाज की होती है। और इस हार की भरपाई कोई चुनावी जीत नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने पैदल चलने को मौलिक अधिकार बनाया, अब परीक्षा आगरा की है

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आगरा : आगरा में सुबह की सैर अब सैर नहीं, संघर्ष बन गई है। स्कूल जाते बच्चे तेज़ बाइकों से बचते हुए सड़क पार करते हैं, बुज़ुर्ग फुटपाथ न होने पर जान जोखिम में डालकर चलते हैं, और ताज देखने आए पर्यटक पार्क की गाड़ियों, आवारा पशुओं, ठेलों और खुले नालों के बीच रास्ता तलाशते हैं। प्रेम के इस शहर में पैदल चलना आज एक साहसिक एडवेंचर, काम बन गया है।

यह तस्वीर अब बदल सकती है। 19 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा कि सुरक्षित, सुस्पष्ट और सुव्यवस्थित फुटपाथ पर चलना नागरिकों का मौलिक अधिकार है , संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) और 21 के तहत। न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि सड़क पर पहला हक मोटर वाहनों का नहीं, पैदल यात्री का है। पीठ ने दिव्यांगजनों के लिए सुगम सुविधाओं और एक अलग राष्ट्रीय पैदल-सुरक्षा कानून की सिफारिश की, और कहा कि उल्लंघन की स्थिति में नागरिक मोटर वाहन अधिनियम से स्वतंत्र मुआवज़े और कानूनी राहत के हकदार होंगे।

यह फैसला अचानक नहीं आया। ठीक एक साल पहले, मई 2025 में, न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ केंद्र को फुटपाथ-दिशा-निर्देश और एक राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड बनाने का आदेश दे चुकी थी। मौजूदा फैसला उसी सिलसिले की अगली कड़ी है : अदालत ने मामले को अनुच्छेद 32 की याचिका के रूप में फिर दर्ज किया, केंद्र को पक्ष बनाया, और 1985 के ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन फैसले का हवाला देकर कहा कि फुटपाथ तक सुरक्षित पहुँच गरिमा से जीने के अधिकार का हिस्सा है।

आगरा के लिए यह चेतावनी है

यह शहर दशकों से वाहनों के हिसाब से बढ़ा, इंसानों के हिसाब से नहीं। सड़कें चौड़ी हुईं, फ्लाईओवर बने, पार्किंग बढ़ी ; पर फुटपाथ या तो बने ही नहीं, या अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए। एम.जी. रोड, फतेहाबाद रोड, सिकंदरा, शाहगंज और यमुना किनारा मार्ग पर एक ही कहानी दिखती है: दुकानों ने फुटपाथ निगल लिए हैं, वाहन उन पर खड़े हैं, बिजली के खंभे और टूटे स्लैब राह रोकते हैं, खुले मैनहोल जान जोखिम में डालते हैं। इसकी सबसे बड़ी कीमत वही चुकाते हैं जिनके पास निजी वाहन नहीं ; बच्चे, महिलाएँ, बुज़ुर्ग, दिव्यांगजन।

विरोधाभास भी चुभता है: हर साल लाखों पर्यटक ताज देखने आते हैं, पर शहर की सड़कों पर वे खुद को असुरक्षित पाते हैं। यह सिर्फ सुविधा का मामला नहीं । इसका असर सड़क सुरक्षा, जनस्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी पड़ता है, क्योंकि पैदल चलना हतोत्साहित होने पर ट्रैफिक और प्रदूषण बढ़ते हैं।

मांगें जो अब संवैधानिक ताकत पा गई हैं

शहर के नागरिक अधिकार कार्यकर्ता वर्षों से इस संकट को उठाते रहे हैं ; लेखों, अभियानों और रिपोर्टों के ज़रिए फुटपाथों की कमी, तेज़ रफ्तार वाहनों, आवारा पशुओं और अव्यवस्थित यातायात के खतरे सामने लाते रहे हैं। उनकी मांग रही है: यमुना किनारा मार्ग समेत हर इलाके से अतिक्रमण हटाया जाए, भारतीय सड़क कांग्रेस के मानकों के अनुरूप फुटपाथ और साइकिल ट्रैक बनें, और अवैध पार्किंग पर सख्ती हो। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अब इन्हीं मांगों को कानूनी आधार देता है।

अब परीक्षा प्रशासन की है

देश की सर्वोच्च अदालत का संदेश साफ है: सड़कें सिर्फ गाड़ियों के लिए नहीं हैं, उन पर पहला हक पैदल चलने वालों का है। अब आगरा विकास प्राधिकरण, नगर निगम, लोक निर्माण विभाग और ट्रैफिक पुलिस की बारी है , हर नई सड़क परियोजना में सुरक्षित फुटपाथ, सुगम क्रॉसिंग, साइकिल ट्रैक और दिव्यांगजन-अनुकूल सुविधाएँ अनिवार्य करनी होंगी, पुराने मार्गों का पुनर्विकास करना होगा, और अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई लगातार चलानी होगी।

जो शहर अपने पैदल यात्रियों की रक्षा नहीं कर सकता, वह खुद को स्मार्ट या विश्वस्तरीय नहीं कह सकता। आगरा ने दशकों मशीनों के लिए सड़कें बनाई हैं। अब समय इंसानों के लिए रास्ते बनाने का है , क्योंकि हर नागरिक और हर पर्यटक को बिना डर के चलने का अधिकार है।

असली सवाल यह है कि यह अदालती आदेश कागज़ों तक सीमित तो नहीं रह जाएगा। जवाबदेही अब केवल नैतिक नहीं, क़ानूनी भी है। आगरा के नागरिक संगठनों, मीडिया और स्थानीय निकायों को इस मौके का इस्तेमाल प्राधिकरणों से स्पष्ट समय-सीमा और जवाबदेही माँगने के लिए करना चाहिए, ताकि यह ऐतिहासिक फैसला सिर्फ एक और रिपोर्ट बनकर फाइलों में दफ़न न हो जाए।

गर्मी की छुट्टियाँ: बच्चों से बोला जाने वाला वह दो महीने का सबसे प्यारा झूठ

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मेरठ (उप्र): आह, गर्मी की छुट्टियाँ!
यह वाक्य कभी आज़ादी की महक लेकर आता था।
तीस-चालीस साल पहले भारत में पले-बढ़े बच्चों के लिए गर्मी की छुट्टियाँ कैलेंडर की तारीख़ नहीं, साल का सबसे बड़ा उत्सव होती थीं। स्कूल की आख़िरी घंटी बजते ही लगता था, मानो जेल का फाटक खुल गया हो।
वो भी क्या दिन थे!
स्कूल की यूनिफॉर्म अलमारी के किसी कोने में फेंक दी जाती थी। जूते धूल खाने लगते थे। अलार्म घड़ियाँ बंद हो जाती थीं। रिपोर्ट कार्ड स्टील की अलमारी में रख दिया जाता था और फिर पूरे दो महीने कोई उसका नाम तक नहीं लेता था।
गर्मियाँ लंबी थीं। सुस्त थीं। सुनहरी थीं। पूरे दो महीने की खुली साँस जैसी।
सुनीता भाभी यादों में खो जाती हैं, “घरों में रखे आमों की मीठी खुशबू फैली रहती थी। गीले कपड़े में लिपटे मिट्टी के घड़ों का पानी अमृत लगता था। खिड़की पर रखा रेगिस्तानी कूलर अपनी खरखराती आवाज़ में लोरी सुनाता था। गलियों में पुकार गूँजती थी, ‘कुल्फी ले लो!’ ‘बर्फ वाली चुस्की!'”
बच्चे तपती छतों पर नंगे पाँव दौड़ते थे। सुबह शुरू हुआ क्रिकेट का मैच स्ट्रीट लाइट जलने पर ख़त्म होता था। हर खाली मैदान वानखेड़े बन जाता था। हर टूटी खिड़की पर लंबी बहस होती थी कि बल्लेबाज़ आउट था या नहीं।
न कोई फिटनेस ट्रैकर था। न कोई प्ले-डेट। न हर पल की निगरानी।
बस धूल से सने चेहरे, छिले हुए घुटने और “मेरी बैट, मेरे नियम” वाली दोस्ती।
दोपहरें दादा-दादी और नाना-नानी के नाम होती थीं।
नीम की छाँव तले या आँगन में बिछी चारपाई पर दादी राजा-रानी, भूत-प्रेत और पुराने ज़माने की कहानियाँ सुनाती थीं। दादा पतंग बनाना सिखाते थे, ताश खेलते थे और जीवन के वे सबक दे जाते थे, जिनकी अहमियत बरसों बाद समझ आती थी।
कोई कैरम खेलता, कोई गुल्ली-डंडा। लड़कियाँ गुटके, लंगड़ी-टांग, गुड्डे-गुड़िया की शादी और चोर-सिपाही खेलतीं।
चंपक, नंदन, चाचा चौधरी, लोटपोट और टिंकल जैसी कॉमिक्स ख़ज़ाने की तरह दोस्तों के बीच घूमती थीं। पढ़ाकू बच्चे एक दिन में पूरा उपन्यास चाट जाते थे। बाकी बच्चे स्टांप, सिक्के, ड्राइंग और छोटी-छोटी हॉबीज़ में खोए रहते थे।
फिर शुरू होता था सालाना पलायन।
पूरा परिवार स्टील के टिफ़िन, सुराही, अचार के डिब्बे और ढेर सारे बैग लेकर ट्रेन में सवार होता था। नाना-नानी या दादा-दादी के घर जाना छुट्टियों का सबसे बड़ा कार्यक्रम होता था।
अलग-अलग शहरों से आए चचेरे-ममेरे भाई-बहन घर भर देते थे। फ़र्श पर गद्दे बिछते थे। एक पंखे के नीचे छह बच्चे सोते थे।
और किसी को कोई शिकायत नहीं होती थी।
वे सिर्फ़ छुट्टियाँ नहीं थीं।
वे यादों की फैक्ट्री थीं।
अब आज की गर्मियों को देखिए।
कैलेंडर पर भले ही आज भी “समर वेकेशन” लिखा होता है, लेकिन हक़ीक़त में यह भारतीय माता-पिता की महत्वाकांक्षाओं का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट बन चुका है।
जैसे ही आख़िरी परीक्षा ख़त्म होती है, परिवारों के व्हाट्सऐप ग्रुप सक्रिय हो जाते हैं।
“समर कैंप में एडमिशन करा दिया?”
“कोडिंग क्लास कहाँ लगवा रहे हो?”
“एआई फ़ॉर किड्स वाला कोर्स कैसा है?”
लगता है, अब बचपन भी सालाना प्रदर्शन समीक्षा के साथ आता है।
जो कभी छुट्टी हुआ करती थी, वह अब स्कूल का आउटसोर्स किया हुआ संस्करण बन चुकी है।
आज के बच्चों का समर टाइम-टेबल किसी कॉरपोरेट कर्मचारी की डायरी जैसा दिखता है।
सुबह सात बजे उठो।
आठ बजे वैदिक मैथ्स।
दस बजे रोबोटिक्स।
दोपहर में फ़्रेंच क्लास।
शाम को स्विमिंग।
रात में ओलंपियाड की तैयारी।
इन सबके बीच बच्चे से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी छिपी प्रतिभा भी खोज ले, नेतृत्व कौशल भी विकसित कर ले और भविष्य की नौकरी के लिए भी तैयार हो जाए।
और फिर आते हैं छुट्टियों के होमवर्क।
ये असाइनमेंट नहीं, बचपन पर दागी गई मिसाइलें हैं।
“मेरा गाँव” पर स्क्रैपबुक बनाओ।
वर्षा जल-संचयन का मॉडल तैयार करो।
दादा-दादी का साक्षात्कार लो।
“मैंने अपनी गर्मी की छुट्टियाँ कैसे बिताईं” पर 500 शब्दों का निबंध लिखो और स्कूल खुलने के पहले दिन जमा करो।
छुट्टियाँ ख़त्म होने से पहले ही उनका आनंद ख़त्म हो जाता है।
माता-पिता भी कम उस्ताद नहीं हैं।
“बेटा, थोड़ा पढ़ लो।”
मतलब, चार घंटे की कोचिंग।
“बस दो घंटे।”
मतलब, जब तक शर्मा जी का बेटा पढ़ रहा है।
“चलो, पहाड़ों पर घूमने चलते हैं।”
मतलब, तुम पर्सनैलिटी डेवलपमेंट कैंप में जाओगे और हम सेल्फ़ियाँ लेंगे।
भारतीय दोपहर की पवित्र नींद भी अब कब्ज़े में है।
कूलर की ठंडी हवा, हाथ में कॉमिक्स और आँख लग जाने वाला वह सुकून अब इतिहास बन चुका है।
उसकी जगह अब एबाकस, एप्टीट्यूड टेस्ट और ब्रिटिश एक्सेंट वाली स्पोकन इंग्लिश क्लास ने ले ली है, मानो आईआईटी का इंटरव्यू ख़ुद ब्रिटिश राज लेने वाला हो।
सामाजिक कार्यकर्ता मुक्ता जी कहती हैं, “कोचिंग उद्योग के लिए गर्मी का मौसम दिवाली जैसा होता है। ऐसे बच्चों के लिए क्रैश कोर्स चल रहे हैं, जो अभी तक किसी चीज़ से टकराए भी नहीं हैं। तेरह साल के बच्चों के लिए जेईई और नीट फ़ाउंडेशन बैच हैं, जो अभी तक मैगी और पास्ता में चुनाव नहीं कर पाते। ब्रॉशर में मुस्कुराते बच्चे टेस्ट ट्यूब और सर्टिफिकेट लेकर खड़े होते हैं। असलियत में वे नींद से भरे चेहरे और फ़ॉर्मूलों से भरे दिमाग़ लेकर घूमते हैं।”
आजकल हर गतिविधि को एक गंभीर नाम देना ज़रूरी हो गया है।
डांस मनोरंजन नहीं, अनुशासन है।
स्विमिंग गर्मी से राहत नहीं, जीवन कौशल है।
यहाँ तक कि दादा-दादी के घर जाना भी लक्ष्य-आधारित हो गया है।
“अगली क्लास की एनसीईआरटी ख़त्म कर लेना, बेटा। समय कम है।”
इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जब स्कूल दोबारा खुलते हैं, तब बच्चे तरोताज़ा नहीं होते।
वे थके हुए, तराशे हुए और प्रदर्शन के लिए तैयार किए हुए होते हैं।
रिटायर्ड स्कूल टीचर मीरा जी कहती हैं, “गर्मी की छुट्टियाँ जिज्ञासा को चेकलिस्ट में और कल्पना को टाइम-मैनेजमेंट की प्रस्तुति में बदल चुकी हैं। आज के बच्चों के पास अवसर ज़्यादा हैं, लेकिन खाली समय कम है। वे कोडिंग जानते हैं, लेकिन बारिश के बाद जुगनू पकड़ने का रोमांच नहीं। वे नेतृत्व कार्यशालाओं में जाते हैं, लेकिन मोहल्ले की टोली का नेतृत्व करने का आनंद नहीं जानते। वे रोबोट बना सकते हैं, लेकिन छत पर तारों के नीचे सोने की यादें शायद कभी नहीं बना पाएँगे।”
तो आइए, एक और शानदार गर्मी की छुट्टी का स्वागत करें।
जहाँ बच्चे पहले से ज़्यादा व्यस्त होंगे, पहले से ज़्यादा कुशल होंगे, शायद पहले से ज़्यादा सफल भी।
बस एक डर है।
कहीं इस दौड़ में वे बचपन जीना ही न भूल जाएँ।
क्योंकि बचपन की सबसे बड़ी पाठशाला खाली समय होता है।
और गर्मी की छुट्टियाँ, कभी उसी पाठशाला का सबसे सुंदर अध्याय हुआ करती थीं

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