षड्यंत्रों के साये में राष्ट्रीयता का मानक गढ़ने वाले वीतरागी श्यामा प्रसाद मुखर्जी

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

कोलकाता । राष्ट्र की एकता-अखण्डता के लिए प्रतिबद्ध अपना सर्वस्व आहुत करने वाले डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे महान व्यक्तित्व हैं जिनका जीवनवृत्त भारतीय राजनीति में सबसे ज्यादा प्रभावित करने वाला रहा है।6 जुलाई सन् 1901 को कलकत्ता के प्रतिष्ठित परिवार आशुतोष मुखर्जी के घर जन्मे डॉ. मुखर्जी अपने प्रारंभिक जीवन से ही राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित हो गए थे। घर-परिवार के संस्कारों से समृद्ध डॉ मुखर्जी शैक्षणिक और सामाजिक कार्यों के प्रति तत्परता से संलग्न रहने लगे थे। मैट्रिक, स्नातक और कानून की पढ़ाई के बाद वे सन् 1926 में इंग्लैंड से बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त कर भारत लौटे। तत्पश्चात वे सन् 1934 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बन गए। उनका मात्र 32/33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति होने का गौरव प्राप्त करना अपने आप में ऐतिहासिक घटना थी। यदि हम सामान्य दृष्टि से देखें तो क्या एक सम्पन्न एवं प्रतिष्ठित परिवार से होने के कारण श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को स्वयं को संघर्ष में झोंकने की कोई आवश्यकता थी? लेकिन उनसे राष्ट्र और समाज की दुर्दशा नहीं देखी गईं । अतएव उन्होंने स्वेच्छा से राष्ट्र के लिए आहुति बनना स्वीकार किया।

उनके जीवन से संबंधित एक चीज कौतूहल का विषय बनती है। वह यह कि डॉ मुखर्जी स्वातंत्र्य संघर्ष और स्वातंत्र्योत्तर काल के ऐसे शिखर पुरुष थे। जो सरदार पटेल, महात्मा गांधी आदि के बराबर का क़द रखते थे। राष्ट्र और समाज के प्रति समर्पित डॉ मुखर्जी का योगदान सर्वज्ञात ही था। इसके बावजूद भी नेहरू-गांधी परिवार ने अपने सत्ता के कालखण्ड में उन्हें उपेक्षित क्यों किया ? क्या उनका योगदान एक क्रांतिकारी एवं संगठक के रूप में राष्ट्र के लिए अपने आप में अद्वितीय नहीं है? वे मुखर्जी जी जिन्होंने अपने जीवन को निजी स्वार्थ एवं पद-प्रतिष्ठा के मोह से खुद को विरक्त कर दिया।एक भी प्रसंग नहीं है जब राष्ट्र के जमीनी मुद्दों पर लड़ने से वे पीछे हटे हों। बल्कि उन्होंने स्वयं को राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। राष्ट्र की नस-नस में घुल-मिल गए। राष्ट्रीयता और भारत की अखंडता के संकल्प को अपने कार्यों से साकार किया।

जब सत्ता के गलियारों में कोई सांसद अपनी आवाज भी प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के मत खिलाफ नहीं उठा सकते थे। उस समय भी मुखर्जी जी संसद में बेबाकी से धारा-370 के लिए आवाज बुलंद कर रहे थे। एक ऐसे प्रकाण्ड विद्वान शिक्षाविद् और राजनेता थे जिन्होंने देश के पहले उद्योग मंत्री रहते हुए भी सरकार को घेरा। वे सत्य के लिए-राष्ट्र के लिए किंचित मात्र नहीं डिगे। क्या उनमें हम किसी भी प्रकार के साहस की कमी की कल्पना कर सकते हैं?
लेकिन ऐसे व्यक्तित्व को हमेशा मुख्यधारा से काटना क्या भारतीय जनमानस में व्याप्त राष्ट्र-प्रेम का गला काटना नहीं था? नेहरू खानदान की पैरवी करने वाले जरा बताएँ कि मुखर्जी जी तत्कालीन समय में शीर्ष पर बैठने वाले राजनेताओं से किस पैमाने पर पीछे थे? चाहे वह शिक्षा का क्षेत्र रहा हो याकि राष्ट्रसेवा सेवा में तत्परता का भाव रहा हो। याकि स्वतंत्र भारत के लिए नीतियों के स्पष्ट एवं दूरदर्शी रोडमैप के स्वरूप को प्रस्तुत करने की उनकी दृष्टि रही हो। यदि उनका आँकलन किया जाए तो वे किसी भी पैमाने पर कमतर नहीं दिखे। किन्तु-परन्तु उन्हें क्यों पीछे धकेला जाता रहा ?

श्यामा प्रसाद मुखर्जी को नेपथ्य में कोसों ढकेलने का कार्य हुआ। इसकी केवल एक ही वजह दिखती है कि -नीतियों को लेकर पंडित नेहरू से राष्ट्रीय एकता एवं राष्ट्रीय हितों के विषय पर मतांतर रखना।इसके अलावा अन्य कोई कारण स्पष्ट दृष्टव्य नहीं होता है। लेकिन इतिहास आज नहीं तो कल परत दर परत खुलता ही है।चाहे कुछ भी हो इतिहास और समय सभी के चाल-चरित्र एवं कार्यों का निर्धारण स्वमेव करता है।

वे मुखर्जी जी ही थे,जिन्होंने राष्ट्र पर आए संकट को पहले भांपकर उसका हल खोज निकाला था। उन्होंने 1946 में मुस्लिम लीग के धार्मिक उन्माद से प्रेरित बंगाल विभाजन के हिन्दू-सिख नरसंहार की त्रासदी के नापाक इरादों को कामयाब नहीं होने दिया। उस समय उन्होंने हिन्दुओं को सशक्त करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ।यह बात उस समय की थी जब तत्कालीन समय में राजनीतिक हस्तक्षेप करने में सक्षम देश के किसी भी बड़े नेता की इस ओर नजर नहीं जा रही थी कि – “पाकिस्तान के लिए लड़ने वाले लोगों की कुत्सित दृष्टि सम्पूर्ण पंजाब व बंगाल को पाकिस्तान के हिस्से में मिलाने की है, जिसके लिए वे किसी भी सीमा तक गिर सकते हैं तथा मुस्लिम लीग एवं सोहराबर्दी ने बर्बरता की सारी सीमा लाँघ दी थी।”

उस समय मुखर्जी जी ने अपनी कुशल दूरदृष्टि एवं रणनीतिक कौशल का का परिचय दिया। भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय पंजाब एवं बंगाल के आधे-आधे भाग को विभाजित कर शेष भारत के हिस्से में करने का अतुलनीय कार्य किया था।यह एक प्रखर राष्ट्रवादी देशभक्त का संकल्प था जिसके हृदय में अखण्ड भारत का संकल्प आलोड़ित हो रहा था।अपने इसी ध्येय को उन्होंने जीवन पर्यन्त निभाया।

राष्ट्र की एकता-अखण्डता एवं सर्वांगीण विकास के लिए आजीवन संघर्षरत रहने वाले मुखर्जी जी ही थे। उन्होंने देश की सभ्यता, संस्कृति के साथ किसी कदम पर कोई समझौता नहीं किया। बल्कि राष्ट्रीय चेतना के प्रखर उद्घोष के साथ संसद व देश भर में अपनी आवाज बुलंद करते रहे। मुखर्जी जी एक बार जिस निर्णय पर डट गए तो फिर कभी पीछे नहीं हटे। भले ही इसके लिए उन्हें अपने प्राणों की बाजी ही क्यों न लगानी पड़ गई हो।राष्ट्र हित के लिए उनकी अनन्य निष्ठा ही उन्हें विरला बनाती है।जब देश स्वतंत्र हुआ और कैबिनेट का गठन हो रहा था। उस समय डॉ मुखर्जी , सरदार पटेल और महात्मा गांधी के अनुरोध पर ही मंत्रिमंडल में शामिल हुए थे। आगे जब उन्हें नेहरू सरकार में राजनीतिक स्वार्थपरता, पदलिप्सा का जोर दिखा। नेहरू सरदार राष्ट्र की समस्याओं एवं मुख्य उद्देश्यों से भटकती हुई दिखी। ऐसे में उन्होंने मंत्री पद से सहर्ष त्यागपत्र दे दिया।विपक्ष में बैठकर राष्ट्र की आवाज बनना न्यायोचित समझा।

वे भारत में जम्मू-कश्मीर कै सम्पूर्ण विलय एवं धारा-370 की समाप्ति के लिए सम्पूर्ण निष्ठा एवं समर्पण के साथ प्रतिबद्ध थे।वे इस पर नेहरू सरकार के विरुद्ध मुखरता के साथ प्रतिरोध दर्ज करवा रहे थे। राष्ट्र जागरण में जुटे थे।जब पंडित नेहरू के खासमखास शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर के अलावा शेष भारत के लोगों को जम्मू-कश्मीर में बगैर परमिट प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। उस समय श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए – “एक देश, दो विधान, दो प्रधान , नहीं चलेंगे” ; ये उद्घघोष कर काश्मीर की ओर 8 मई सन् 1953 को कूच कर दिया।जहाँ उन्हें 10 मई 1953 को जम्मूकश्मीर की सीमा में ही शेख अब्दुल्ला सरकार ने गिरफ्तार करवा लिया।उनकी इस गिरफ्तारी में साजिशों की दुर्गंध आती है। उनकी इस गिरफ्तारी में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की भूमिका का पर्दे के पीछे होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि नेहरू व शेख अब्दुल्ला अजीज मित्र की तरह ही थे। इसीलिए पंडित नेहरू ने महाराजा हरिसिंह से सत्ता का स्थानांतरण शेख अब्दुल्ला के हाथों करवा दिया था।यानी कश्मीर में पृथकता और अलगाववाद की पूरी व्यवस्था प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने कर दी थी।‌

शेख अब्दुल्ला सत्ता में आए और फिर शुरू हुआ कश्मीरी हिन्दुओं के उत्पीड़न का अंतहीन सिलसिला। अब्दुल्ला सरकार ने 1952 से ही डोगरा समुदाय का उत्पीड़न प्रारंभ कर दिया गया था। इसके विरोध में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने मुखरता के साथ आवाज़ बुलंद की। उन्होंने बलराज माधोक और डोगरा समुदाय के प्रतिष्ठित पंडित प्रेमनाथ डोगरा के द्वारा गठित ‘प्रजा परिषद पार्टी’ का सदैव समर्थन किया। जम्मू-कश्मीर की मूल भावना और राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए सदैव प्रतिबद्धता व्यक्त की। अगस्त 1952 में ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने जम्मू की विशाल रैली में अपना संकल्प व्यक्त करते हुए कहा था कि – “या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूँगा”

फिर अपने इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए उन्हें अपने प्राणों की आहुति देनी पड़ गई।उनकी गिरफ्तारी के बाद जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग होते हुए भी श्रीनगर के कारावास में उनके लिए सभी प्रकार के प्रतिबंध थे। उनके साथ ऐसा ट्रीटमेंट किया जाता था जैसे कि उन्होंने देशद्रोह किया हो। यह सब प्रधानमंत्री नेहरू और शेख अब्दुल्ला के गठजोड़ के चलते ही संभव हो रहा था। प्रतिबंधों की कड़ाई इतनी कि – मुखर्जी जी लिए आने वाली चिठ्ठियों का अनुवाद करवाकर जाँचा जाता था कि चिठ्ठियों में लिखा क्या है? उसके बाद उनका आदान-प्रदान होता था। इतना ही नहीं उन्हें जेल में किसी से भी मिलने की अनुमति नहीं थी। क्या यह सब पंडित नेहरु के संरक्षण व इच्छा के बिना ही हो रहा था? भारत के किसी हिस्से में एकता की बात करने के लिए जेल में डालना क्या कभी सही ठहराया जा सकता है? क्या इसके पीछे पंडित नेहरू की मौन‌ सहमति नहीं थी?

अगर पंडित नेहरू चाहते तो क्या श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को शेख अब्दुल्ला सरकार से रिहा नहीं करवा सकते थे ? क्या जम्मू-कश्मीर सरकार नेहरू के वर्चस्व से बड़ी थी? किन्तु उस समय राष्ट्र के दैदीप्यमान ज्योतिपुंज को जिस तरह से बुझाने का संयुक्त प्रयास किया जा रहा था।उसके पीछे के सभी षड्यंत्र स्पष्ट दिखलाई दे रहे थे।लेकिन उस समय मुखर्जी जी की प्रताड़ना पर किसी ने कभी भी उफ! तक की आवाज नहीं उठाई। सवाल कई आते हैं कोई कहता है कि हर चीज के लिए नेहरू को ही जिम्मेदार क्यों ठहराया जाता है?सवाल यह भी कि उनकी भूमिका की संलिप्तता को हर चीज में दिखाने का प्रयास किया जाता है। इस पर हम आप तो दूर अब इतिहास की ही तारीखों की ओर ही चलते हैं —

तारीख थी 24 मई 1952.. इस दिन प्रधानमंत्री नेहरू और डॉ.कैलाशनाथ काटजू श्रीनगर में थे। लेकिन उन्होंने शेख अब्दुल्ला सरकार के कारावास में बंद श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का हाल-चाल तक पूछना भी उचित नहीं समझा। क्या यह उनकी भूमिका पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाता है? क्या ये तथ्य मुखर्जी जी की गिरफ्तारी के प्रति पंडित नेहरू की कूटरचित संलिप्तता को नहीं दर्शाता है? क्या पंडित नेहरू को श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा धारा-370 का विरोध करना स्वीकार नहीं था? क्या पंडित नेहरू कश्मीर को शेख अब्दुल्ला के हाथों सौंपकर अलगावद को खाद-पानी दे रहे थे?

सत्ता का मोह त्यागने वाले वीतरागी श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिन्होंने राष्ट्र हित के लिए मंत्री पद त्याग दिया।विपक्ष में बैठे मुखर और आक्रामक प्रतिकार किया। लेकिन राष्ट्रीय अस्मिता से रत्तीभर भी समझौता नहीं किया।
ऐसे प्रकाण्ड विद्वान,राजनीतिज्ञ व्यक्तित्व को पंडित नेहरू द्वारा उपेक्षित करना-क्या कभी सही ठहराया जा सकता है? मुखर्जी जी के जम्मू-कश्मीर जाने पर उनकी गिरफ्तारी एवं स्थान की जम्मू-काश्मीर की शेख अब्दुल्ला सरकार को पल-पल की ख़ुफ़िया जानकारी देने वाले कौन लोग थे? फिर ‘परमिट सिस्टम’ के षड्यंत्र के अन्तर्गत उन्हें गिरफ्तार करने के साथ-साथ, उनकी गिरफ्तारी का स्थान और कानूनी दाव-पेंचों का चयन करने वाले लोग कौन थे?

जेल में अचानक से मुखर्जी जी का स्वास्थ्य खराब होना तत्पश्चात रहस्यमयी ढंग से उनकी 23 जून 1953 को मृत्यु होना।इसके बाद उनकी संदिग्ध मृत्यु की जाँच को नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु के रहस्य की तरह ही ठण्डे बस्ते में डालना आखिर क्या दर्शाता है? क्या यह श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की षड्यंत्र पूर्वक हत्या नहीं थी? क्या उनका अपराध धारा-370 के खत्म करने की दृढ़ प्रतिज्ञा थी? क्या उनका अपराध राष्ट्रवादी चिंतन और जनसंघ की स्थापना कर नेहरू के लिए चुनौती देने वाला होना था? क्या पंडित नेहरू को श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी का भय सता रहा था? इसके चलते उन्होंने षड्यंत्रों को समर्थन दिया? क्या इन‌ सवालों का ज़वाब मिलेगा?‌

वर्तमान में कितने भी सवाल उठाएँ जाए लेकिन सच्चाई यह है कि-इस राष्ट्र ने राजनीतिक षड्यंत्रों में एक ऐसे राष्ट्रीय नेतृत्व के महापुरुष को खोया जिसकी उपस्थिति से राष्ट्र को अप्रत्याशित लाभ होता।अगर उनकी षड्यंत्रों के साये में मृत्यु न होती तो सम्भवतः राष्ट्रीय मुद्दों की दशा और दिशा बहुत पहले ही कुछ और होती। किन्तु यह सब संभव न हो सका। धारा-370 की समाप्ति के लिए जनसंघ और भाजपा ने उनके बलिदान को याद रखा। ‘जहां हुए बलिदान मुखर्जी-वह कश्मीर हमारा है’ — इस नारे के साथ वर्षों तक उनके बलिदान की ज्वाला को वैचारिक चेतना में जगाए रखा। असंख्य आंदोलन और प्रदर्शन किए। अंततोगत्वा नरेंद्र मोदी सरकार ने 5 अगस्त 2019 को धारा-370 को समाप्त करने का ऐतिहासिक कार्य किया।श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी को सच्चे अर्थों में श्रृद्धांजलि दी।श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ, चिंतक-विचारक ही भारत के मूल को उद्घाटित करते हैं।‌ राष्ट्रीयता के संस्कारों और व्यवहारों से समृद्ध उनकी वैचारिकी जन-जन के लिए प्रेरणा है। उनका समूचा जीवन त्याग, संघर्ष और बलिदान का प्रतीक है। उन्होंने जिस ‘अखण्ड भारत’ का चित्र अपने हृदय में बसाया-संघर्ष किया और राष्ट्र यज्ञ की आहुति बन गए। उन्हीं भावों और विचारों पर आधारित राजनीति ही भारत को नई दिशा दे सकती है।‌यही भारत का आत्म स्वर है। यही स्व और राष्ट्रीयता का शाश्वत उद्घोष है।‌आवश्यकता है कि उनके इस संदेश को आत्मसात किया जाए— “राष्ट्रीय एकता के धरातल पर ही सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है।”

गाजियाबाद में संघ शिक्षा वर्ग का भव्य ‘प्रकट समारोह’ संपन्न

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• 15 दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण शिविर का सांगठनिक शौर्य, योग और ओजस्वी घोष वादन के साथ हुआ भव्य समापन।

• शारीरिक व मानसिक विकास के साथ शिक्षार्थियों ने आत्मसात किया ‘राष्ट्र प्रथम’ का भाव और भारत की गौरव गाथाएं।

• जाति-भेद भूलकर समरस समाज का निर्माण और राष्ट्रीय स्वाभिमान ही समर्थ भारत का आधार : क्षेत्र प्रचारक श्रीमान महेन्द्र जी।

• अनुशासित नागरिक ही देश की संप्रभुता और सीमाओं की सुरक्षा की असली रीढ़ : एयर वाइस मार्शल अनिल तिवारी जी।

गाजियाबाद: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) मेरठ प्रांत के तत्वावधान में स्थानीय दुर्गावती हेमराज सरस्वती विद्या मन्दिर में आयोजित 15 दिवसीय आवासीय संघ शिक्षा वर्ग (सामान्य) का आज वीवीआईपी नेहरू स्टेडियम, नेहरू नगर, गाजियाबाद में भव्य एवं ऐतिहासिक प्रकट समारोह के साथ सफलतापूर्वक समापन हो गया। गत 6 जून 2026 (ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी) से प्रारंभ हुए इस गहन प्रशिक्षण शिविर में मेरठ प्रांत के 28 संगठनात्मक क्षेत्रों से आए 518 शिक्षार्थियों ने 15 दिनों तक साधनारत रहकर कड़े अनुशासन, समयबद्धता और देश सेवा का मूलमंत्र सीखा। आज के इस प्रकट समारोह में हजारों की संख्या में पहुंचे आम नागरिकों, प्रबुद्ध जनों और मातृशक्ति के गगनभेदी जयकारों से पूरा स्टेडियम राष्ट्रभक्ति के अनूठे रंग में सराबोर हो उठा।

*संस्कार की पाठशाला : सर्वांगीण विकास का केंद्र*

वर्ग के अधिकारियों ने बताया कि यह 15 दिवसीय वर्ग वास्तव में ‘संस्कार की पाठशाला’ है, जहाँ शिक्षार्थियों के सर्वांगीण विकास पर ध्यान केंद्रित किया गया। इस शिविर में ‘स्व’ (स्वयं) से प्रारंभ होकर अनुशासन, कड़े शारीरिक अभ्यास, प्राणायाम और मानसिक दृढ़ता का पाठ पढ़ाया गया। वर्ग का मूल उद्देश्य केवल शारीरिक रूप से सुदृढ़ करना नहीं, बल्कि बौद्धिक सत्रों के माध्यम से स्वयंसेवकों के अंतर्मन में राष्ट्र प्रथम के भाव को स्थायी रूप से जाग्रत करना है। यहाँ देश के अलग-अलग कोनों से आए शिक्षार्थियों ने जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्र के भेद को भुलाकर सामाजिक समरसता और एकात्मता के सूत्र को आत्मसात किया।

*सांस्कृतिक व ऐतिहासिक गौरव गाथाओं से हुआ वैचारिक पोषण*

इस प्रशिक्षण वर्ग की एक मुख्य विशेषता स्वयंसेवकों का बौद्धिक और वैचारिक पोषण रही। 15 दिनों के दौरान शिक्षार्थियों को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा और ऐतिहासिक गौरव गाथाओं से अवगत कराया गया। छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह और महान स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन संघर्षों के माध्यम से स्वयंसेवकों को देश के गौरवशाली इतिहास का स्मरण कराया गया, ताकि वे वर्तमान की चुनौतियों का सामना करते हुए राष्ट्र के पुनरुत्थान में अपनी सक्रिय भूमिका निभा सकें।

शारीरिक कौशल और ओजस्वी घोष का अद्भुत सार्वजनिक प्रदर्शन*

समापन समारोह के अवसर पर मैदान में उतरे सैकड़ों स्वयंसेवकों ने जब कदम-से-कदम मिलाकर पूर्ण समता (मार्च पास्ट) का प्रदर्शन किया, तो दर्शकों ने करतल ध्वनि से उनका स्वागत किया। शिक्षार्थियों ने सामूहिक योग, प्राणायाम, निहत्थे आत्मरक्षा की प्राचीन भारतीय पद्धति नियुद्ध और दण्ड (लाठी) संचालन के विभिन्न कौशलों तथा विस्मयकारी व्यूह रचनाओं का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण 107 शिक्षार्थियों के प्रांत घोष वर्ग (बैण्ड) का सामूहिक वादन रहा, जिसकी देशप्रेम की ओजस्वी सुर-लहरियों ने पूरे वातावरण में राष्ट्रभक्ति की ऊर्जा का संचार कर दिया।

*मुख्य वक्ता का पाथेय (मार्गदर्शन)*

समारोह के मुख्य वक्ता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पश्चिम उत्तर प्रदेश क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक श्रीमान महेन्द्र जी ने अपने ओजस्वी संबोधन में कहा :

“संघ अपने शताब्दी वर्ष की यात्रा पूर्ण कर देश को परम वैभव पर ले जाने की साधना में निरंतर संलग्न है। संघ शिक्षा वर्ग का मूल उद्देश्य समाज के भीतर सोई हुई शक्ति को जगाकर राष्ट्र निर्माण के लिए चरित्रवान कार्यकर्ता तैयार करना है। जब समाज जाति, भाषा और संकीर्ण बंधनों से मुक्त होकर संगठित होगा, तभी भारत दुनिया का नेतृत्व कर सकेगा। यहाँ सीखे गए अनुशासन, सांस्कृतिक गौरव और ‘राष्ट्र प्रथम’ के भाव को प्रत्येक स्वयंसेवक अपने दैनिक जीवन में उतारे और समाज परिवर्तन का माध्यम बने।”
उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म और संस्कृति चिर पुरातन नित्य नूतन है। उच्चतम न्यायालय, भारतीय संसद, ओर सभी सेनाओं के ध्येय वाक्य संस्कृत में ही है और कुछ लोग हिंदू धर्म की बात करने पर सांप्रदायिकता की बात उठाने लगते हैं जो सर्वथा अनुचित है। संघ भी 100 वर्ष पूर्ण करने के बाद भी नित्य नूतन बना हुआ है। उन्होंने आगे कहा कि जब भी विश्व को योग, शांति और सुशासन के मार्ग की आवश्यकता होती है उसे भागवत गीता की ओर देखना पड़ता है। छुआछूत, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण, स्व व नागरिक कर्तव्यों की बात करते हुए शताब्दी वर्ष में संघ द्वारा चलाये जा रहे पंच परिवर्तन अभियान को समाज से अपनाने का भी उन्होंने आग्रह किया।

*मुख्य अतिथि (अध्यक्ष) का उद्बोधन*

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे भारतीय वायु सेना के सेवानिवृत्त एयर वाइस मार्शल अनिल तिवारी जी (विशिष्ट सेवा मेडल, वायु सेवा मेडल) ने स्वयंसेवकों के अद्भुत अनुशासन की भूरि-भूरि सराहना की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा:

“एक सैनिक के रूप में मैंने सीमाओं पर कड़ा अनुशासन देखा है, लेकिन आज आम नागरिकों के बीच युवाओं के इस सांगठनिक अनुशासन और दृढ़ संकल्प को देखकर मेरा विश्वास और सुदृढ़ हो गया है। किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं पर तैनात सेना के बल पर नहीं, बल्कि देश के भीतर रहने वाले नागरिकों के अनुशासित चरित्र और सजगता पर निर्भर करती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिस प्रकार युवाओं को संस्कारवान, मानसिक रूप से सुदृढ़ और देशप्रेमी बना रहा है, वह सराहनीय है और देश की वास्तविक सुरक्षा की रीढ़ है।”

*28 संगठनात्मक क्षेत्रों का अनूठा प्रतिनिधित्व और सांख्यिकीय झलक*

इस ऐतिहासिक वर्ग में मेरठ पूर्व, मेरठ पश्चिम, हापुड़, सरधना, मवाना, लक्ष्मीनगर, शामली, बागपत, सहारनपुर, बेहट, देवबंद, बिजनौर, धामपुर, रामपुर, मुरादाबाद, ठाकुरद्वारा, संभल, अमरोहा, बबराला, बुलंदशहर, खुर्जा, अनूपशहर, गौतमबुद्धनगर, नोएडा, गाजियाबाद महानगर, वैशाली, हरनंदी तथा गाजियाबाद जिला सहित कुल 28 सांगठनिक क्षेत्रों के 518 संघ शिक्षा वर्ग शिक्षार्थियों ने सहभागिता की। इस विशाल शिविर के सुचारू संचालन, आवास और भोजन व्यवस्था में 200 से अधिक कार्यकर्ता दिन-रात जुटे रहे।

कार्यक्रम के अंत में वर्ग के अधिकारियों ने शिविर को सुचारू रूप से संपन्न कराने में सहयोग देने वाले सभी स्थानीय नागरिकों, व्यवस्था कार्यकर्ताओं और विद्यालय प्रबंधन का हृदय से आभार व्यक्त किया। संपूर्ण स्टेडियम में स्वयंसेवकों और समाज से आये लगभग 5000 के जनसैलाब द्वारा एक साथ गाए गए ‘संघ की प्रार्ना’ के साथ इस ऐतिहासिक प्रकट समारोह का विधिवत समापन हुआ।

अभिषेक (प्रबंधन प्रमुख, संघ शिक्षा वर्ग) ने शिविर को सुचारू रूप से संपन्न कराने में सहयोग देने वाले सभी स्थानीय नागरिकों, व्यवस्था कार्यकर्ताओं और वीवीएस प्रबंधन का हृदय से आभार व्यक्त किया। इस गौरवमयी अवसर पर मुख्य रूप से नरेंद्र तनेजा जी (सह प्रांत संघचालक, पश्चिम उत्तर प्रदेश क्षेत्र), धुरेंद्र जी (संघचालक, गाजियाबाद महानगर), तपन जी (सह क्षेत्र प्रचार प्रमुख), अनिल जी (प्रांत प्रचारक, मेरठ प्रान्त), कृष्ण कुमार जी (प्रांत बौद्धिक प्रमुख), विनय कुमार जी (सहव्यवस्था), विजय गोयल जी (प्रांत संपर्क प्रमुख), सुरेन्द्र जी (प्रांत प्रचार प्रमुख), देवेन्द्र प्रताप (गाजियाबाद विभाग कार्यवाह) तथा अतुल प्रकाश जी (गाजियाबाद विभाग प्रचारक) सहित कई वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहे। समारोह में समाज के विभिन्न क्षेत्रों से आई मातृशक्ति और दर्शक दीर्घा में मौजूद लगभग 5000 बंधु-भगनियों ने स्वयंसेवकों का मनोबल बढ़ाया। अंत में, संपूर्ण स्टेडियम में गूंजती स्वयंसेवकों और विशाल जनसैलाब की सामूहिक ‘संघ प्रार्थना’ के साथ इस ऐतिहासिक प्रकट समारोह का विधिवत समापन हुआ।

सच्ची घटना: नया चैनल खोलने वाले व्यापारियों को वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार पाठक की सलाह

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दिल्ली/ नोएडा: पिछले कुछ सालों में बहुत से ऐसे लोगों से मुलाकात हुई, जो अपना चैनल खोलना चाहते हैं। सही कहूं तो एक से एक जमूरे मिले, चिटफंडिए मिले और कुछ व्यापारी लोग भी मिले।

हाल ही में ऐसे ही एक व्यक्ति से मुलाकात हुई जो उत्तर प्रदेश/ उत्तराखंड के लिए आज तक से बड़ा चैनल खोलना चाहते थे ( हंसिए मत) । मिलने की इच्छा नहीं थी लेकिन एक पुराने सीनियर ने बार-बार कहा, जिन्हें मैं टाल नहीं सकता था तो मिलने चला गया। पेश है उस व्यापारी के साथ बातचीत का थोड़ा सा हिस्सा..
व्यापारी – नमस्कार पाठक जी
मैं – नमस्कार, कैसे हैं आप ( दुआ सलाम और कुछ औपचारिक बातचीत के बाद काम की बात पर आए)
व्यापारी – पाठक जी, पैसों की कोई कमी नहीं है अपने पास। मेरी इच्छा बस आज तक से भी बड़ा चैनल खोलने की है।
मैं -जी, अच्छा
व्यापारी : आप बताइए, आपके पास क्या प्लान है?
मैं – देखिए, जितनी चीनी डालेंगे ..चाय तो उतनी ही मीठी होगी..इसलिए फंड..
व्यापारी – बात काटते हुए बीच में ही बोला, पाठक जी, फंड की चिंता मत कीजिए। बहुत है अपने पास..
मैं – तो फिर किसी और धंधे में लगाइए, चैनल क्यों खोलना चाहते हैं। यह तो घाटे का सौदा बन गया है।
व्यापारी : इस देश ने मुझे बहुत कुछ दिया है, अब समाज को लौटाना चाहता हूं।
मैं – हम्म्म्म
व्यापारी – आप बताइए, आपके पास क्या प्लान है?
मैं – चैनल का लाइसेंस..
व्यापारी – ( फिर बात काटते हुए) वो बात हो गई है। अभी तो रेंट पर ले रहे हैं , बाद में उसी को खरीद लेंगे। आप बताइए , आपके पास क्या प्लान है?
मैं – आज तक जैसा चैनल खोलना चाहते हैं तो फिर..
व्यापारी : ( फिर बात को बीच में काटते हुए) आज तक जैसा नहीं, आज तक से भी बड़ा..
मैं – ( मुस्कुराते हुए) ये तो बहुत अच्छी बात है..लेकिन चैनल का फोकस एरिया क्या होगा?
व्यापारी – अब तो चुनाव का समय आने वाला है। हम एक साल उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड पर फोकस करेंगे। सुना है आपकी बहुत पकड़ है यूपी/उत्तराखंड पर..आपके पास तो लखनऊ, देहरादून और हर जिले में रिपोर्टर्स की फौज है..
मैं -जी
व्यापारी : मैंने जितने लोगों से आपका फीडबैक लिया, सब आपकी तारीफ करते हैं।
मैं – जी, ये तो उन लोगों का बड़प्पन है।
व्यापारी : अरे नहीं पाठक जी, सच कह रहा हूं। अभी परसो ही दिल्ली में भाईसाहब ( जिनका नाम लिया, उसे लिखना ठीक नहीं है) से मुलाकात हुई। मैंने आपके नाम का जिक्र किया तो उन्होंने तुरंत कहा कि हां पाठक जी, बहुत अच्छे आदमी हैं। राष्ट्रवादी हैं और उन्हें फिर से राष्ट्रवादी विचारधारा से जोड़ना है।
मैं – ( यह जानते हुए भी कि वह बन्दा झूठ बोल रहा है, मैं मुस्कुराया ) हम्म्म्म
व्यापारी : तो बताइए , कैसे करेंगे आप?
मैं : मैंने तो बता ही दिया आपको, प्लानिंग फंड के हिसाब से ही होती है..
व्यापारी – उसकी चिंता मत कीजिए..
मैं -लेकिन चैनल के लिए कुछ तो रखा होगा।
व्यापारी – एक अमाउंट का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें तो एक साल का काम चल जाएगा। फिर यूपी/उत्तराखंड का चुनाव भी तो है.. बाकी आप चिंता मत कीजिए.. अपने पास 5 साल का फंड है..
मैं – एक साल नहीं , सिर्फ कुछ महीने ही बाकी है। जिस दिन आप डील फाइनल करेंगे, उस दिन से अगर हम 24 घंटे सातों दिन काम करेंगे तो भी चैनल ऑन एयर जाने में ढाई से 3 महीने लगेंगे।
व्यापारी : अरे नहीं, 15-20 दिन में चैनल शुरू हो जाएगा। 2 बड़े फीमेल एंकर का नाम लेते हुए कहा कि आप उनसे बात कर लीजिए.. और भी कुछ बड़े नामों को जोड़िए। बाकी आपका क्या प्लान है? चुनाव में कितना तक आ जाएगा?
मैं – लेकिन आपका प्लान तो 5 साल का है न ?आज तक से भी बड़ा चैनल चलाने का..
व्यापारी – बिल्कुल
मैं – एक रिक्वेस्ट है लेकिन
व्यापारी -कहिए
मैं- 3-4 मिनट मुझे बिना किसी रुकावट के बोलने दीजिए..
व्यापारी- ( झेंपते हुए) अरे, अरे बिल्कुल बोलिए पाठक जी..
मैं – पिछले कुछ सालों में दिल्ली के इसी तरह के होटलों में और कुछ के साथ नोएडा के होटलों में भी मुलाकात हुई। शायद 13-14 लोगों के साथ। शुरुआत में तो मैं लंबी-चौड़ी तैयारी करके जाता था। फिर छोड़ दिया।
आपने जितना फंड बताया है, उसमें 5 साल तो छोड़िए , 3 महीने भी नहीं चल पाएगा ( अगर आज तक से मुकाबला करना है ) लेकिन यह बात सही है कि समाचार प्लस के बंद होने के बाद यूपी/उत्तराखंड में उस जैसे चैनल की जगह खाली है..जो हम चैनल शुरू होने के 6 महीने के अंदर हासिल कर सकते हैं लेकिन उसके लिए भी इससे तीन गुना फंड की जरूरत पड़ेगी.. लेकिन मेरी कुछ शर्तें हैं..
व्यापारी – ( चेहरे का रंग अब थोड़ा सा बदलने लगा)
बिल्कुल पाठक जी।
मैं – अगर मुझे चैनल चलाना है तो फिर सिर्फ मैं ही चलाऊंगा और वो भी प्रोफेशनल तरीके से। हर डिपार्टमेंट में काबिल और प्रोफेशनल लोग रखेंगे Including Sales & Marketing
व्यापारी – Sales वालों की क्या जरूरत है , वो तो..
मैं – बात को बीच में ही काटते हुए बोला.. चैनल को प्रोफेशनल तरीके से चलाने के लिए हर डिपार्टमेंट जरूरी है। बाकी और भी बहुत सारी चीजें हैं..
व्यापारी – लखनऊ और देहरादून में किसको रखेंगे?
मैं – बाकी सारा फंड अलग रखिए.. जिसका खर्च आप या आपके द्वारा appoint किया गया कोई व्यक्ति अपनी निगरानी में करें। Purchase में मेरा कोई दखल नहीं होगा लेकिन सामान हमें quality वाला मिलना चाहिए।
व्यापारी : जी
मैं – स्टॉफ की सैलरी का एक फंड अलग से बनाइए , जिसमें डेढ़ साल की सैलरी का फंड होना चाहिए ( लगभग इतना तो..)
व्यापारी – चौंकते हुए डेढ़ साल
मैं – जी ( इस पर दोनों के बीच लगभग 10 मिनट तक वाद-विवाद हुआ)
व्यापारी – ये तो ज्यादा है, लेकिन कुछ प्लान तो होगा आपके पास
मैं – अगर आप मुझे जोड़ना चाहते हैं तो पहले 6 महीने की सैलरी मुझे एडवांस देनी पड़ेगी।
व्यापारी -( चौंकते हुए ) 6 महीने
मैं – जी, यह मेरी सुरक्षा के लिए बहुत जरूरी है।
उनका चेहरा बता रहा था कि वो कुछ और ही सोच कर आए थे।
मैं-  और अगर आप सिर्फ प्लान सुनना चाहते हैं तो उसका चार्ज मैंने एक लाख रुपया रखा है। उसे मेरे अकाउंट में तुरंत ट्रांसफर कीजिए। उसके बाद सारा प्लान बता देता हूं।
लखनऊ और देहरादून की लिस्ट मेरे पास तैयार हैं। हर जिले में भी रिपोर्टर की लिस्ट तैयार हैं। भगवान ने इतना तो गुडविल बना ही दिया है कि अगर मैं आपके साथ जुड़ा तो मेरे फोन करने पर इनमें से 70-80 फीसदी लोग तो जॉइन कर ही लेंगे और जो नहीं कर पाएंगे वो कहीं से भी ढूंढकर हमें अच्छा बंदा दे देंगे।
व्यापारी -लेकिन शुरू में ही एक लाख? हम तो साथ में जुड़ ही रहे हैं।
मैं – अरे आप तो इतने बड़े आदमी हैं महाराज। आपके लिए तो एक लाख , एक रुपए के बराबर ही है। बाकी अगर साथ में जुड़ेंगे तो जो 6 महीने का एडवांस आपसे कहा है, उसमें से काट लीजिएगा।
बैठक में थोड़ी देर खामोशी छा गई। फिर मैंने उठते हुए कहा
मैं – चैनल खोलना और चलाना मज़ाक नहीं है, महाराज। अच्छे से सोचिए ठीक लगे तो कॉल कीजिएगा। बाकी इस इंडस्ट्री में नए चैनल खुलवाने वाले बहुत से लोग हैं जो फ्री में भी आ जाएंगे और purchase में जमकर दलाली कूटेंगे और भाग जाएंगे। और आपके हाथ में..
यह 35-40 मिनट की मीटिंग का एक सार है।

आंख खोलने वाली है हरेंद्र जी की ‘सेकुलरवाद और बदलती जनगणना के आंकड़े’ पुस्तक

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प्रभात मिश्रा

पटना। हरेंद्रजी प्रताप  से रिश्ते कितने पुराने हैं, उन्हें वर्षों में नहीं बल्कि घनिष्ठता से माध्यम से समझा जा सकता है। घोषित रूप से पहली बार 1985 में दिल्ली में आयोजित विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन में मिला था। तब वह एबीवीपी के राष्ट्रीय मंत्री थे और मैं इंटर का छात्र। इस सम्मेलन में मैं पलामू जिला के नियंत्रक के रूप में भाग ले रहा था। इसकी वजह से कई मौकों पर उनसे मिलने का अवसर मिला। यहीं से निकटता बढ़ी। उनके बोलने का अंदाज, किसी भी विषय पर तर्क के साथ रखने की उनकी शक्ति ने मुझ जैसे किशोर को काफी प्रभावित किया। संभव है उन्हें भी मेरे अंदर कुछ खास दिखा होगा तभी तो उन्होंने मुझे छोटे भाई के रूप में स्वीकार किया और बड़े भाई की तरह स्नेह दिया।

अभी हाल में हरेंद्र जी की पुस्तक ‘सेकुलरवाद और बदलती जनगणना के आंकड़े’ प्रकाशित हुई है। बिहार, झारखंड, असम और बंगाल में जिस तरह से जनसंख्या के आंकड़ों में बदलाव आया है, उन परिस्थितियों पर यह पुस्तक आंख खोलने वाली है। किस तरह से हिंदुओं की संख्या कम हो रही है और मुस्लिमों व ईसाइयों की संख्या बढ़ रही है वह चौंकाने वाली तो हैं ही चिंताजनक भी हैं। हरेंद्र जी ने जिस तरह शोध और तर्क के साथ अपनी बातें व आंकड़े पेश किए हैं, उन पर सरकारी स्तर पर कार्रवाई किए जाने की जरूरत है। लेखक का रिश्ता जिस विचारधारा से है, आज वह बहुत ही शक्तिशाली है। जिस राजनीतिक दल से कभी उनका जुड़ाव रहा है आज उसकी सरकार केंद्र में ही नहीं उन सभी राज्यों में है, जिनके चिंताजनक स्थिति की चर्चा इस पुस्तक में है। ऐसे में उम्मीद है कि सरकार इन आंकड़ों का इस्तेमाल कर ठोस कदम उठाएगी।

‘अटल जी और बांग्लादेशी घुसपैठ’ वाले हिस्से में लिखा गया है- 13 फरवरी 1964-राष्ट्रपति जी की अस्वस्थता के चलते, उपराष्ट्रपति जी के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के विरोध में बोलते हुए श्री अटल जी का भाषण-“भारत में जो पाकिस्तानी रहते है जिनकी संख्या का हमे पता है, हम क्यों नहीं उनसे भारत छोड़कर जाने के लिए कहते है। असम में पाकिस्तानी अवैध रूप से घुस रहे हैं और घुस आए हैं उनको निकालने में हमने कमी कर दी है, क्योंकि इससे पूर्वी पाकिस्तान में दंगे हो जायेंगे। दंगे तो पूर्वी पाकिस्तान में हो रहे हैं। फिर भी हम असम से पाकिस्तानियों को निकालने में ढिलाई कर रहे है। 8 से 10 लाख तक पाकिस्तानी असम में बसे हुए हैं। पश्चिमी बंगाल में उनकी संख्या 4 लाख है। सारे देश में सन् 1961 की जनगणना के अनुसार 50 लाख पाकिस्तानी रह रहे है।” आज भी कमोबेश यही स्थिति है और वर्तमान सरकार के रहते यह चिंताजनक है।

पिछली बार जब हरेंद्र जी से दिसंबर 2023 में विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय अधिवेशन में ही मिला था। मिलते ही उन्होंने कहा, ‘तुम्हारी किताब कहां मिलेगी?’ मैंने कहा कि अधिवेशन स्थल पर ही प्रभात प्रकाशन का स्टॉल लगा है। इस पर उन्होंने मेरे साथ ही जाकर किताब खरीदी। करीब 10-15 मिनट तक किताब देखने के बाद कहा, ‘तुमने काफी मेहनत और शोध किया है।’ आपके लिए मैं यह तो नहीं कह सकता पर इतना जरूर कहूंगा कि आपकी पुस्तक शोधकर्ताओं और एक्शन लेने वालों के लिए पाथेय का काम कर सकती है। पुस्तक का प्रकाशन ‘सुरुचि प्रकाशन, नई दिल्ली’ ने किया है।

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