ग्रामीण रोजगार की नई राह

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दिल्ली । भारत का ग्रामीण क्षेत्र देश की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक शक्ति का आधार रहा है। गांवों में रहने वाली बड़ी आबादी आज भी कृषि, मजदूरी और छोटे स्तर के रोजगार पर निर्भर है। ऐसे में ग्रामीण परिवारों को रोजगार सुरक्षा देना केवल गरीबी कम करने का माध्यम नहीं है, बल्कि सामाजिक स्थिरता और आर्थिक विकास की महत्वपूर्ण आवश्यकता भी है। इसी उद्देश्य से वर्ष 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम लागू किया गया था। इस कानून ने ग्रामीण परिवारों को रोजगार का अधिकार देकर देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक नया अध्याय शुरू किया।
मनरेगा का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिनों का अकुशल मजदूरी आधारित रोजगार उपलब्ध कराना था। यह योजना केवल रोजगार देने तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने जल संरक्षण, ग्रामीण सड़क, तालाब निर्माण, भूमि विकास और सामुदायिक परिसंपत्तियों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समय के साथ सरकार ने ग्रामीण विकास की बदलती जरूरतों को देखते हुए रोजगार योजना को अधिक व्यापक बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया।
इसी क्रम में विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम यानी वीबी-जी राम जी अधिनियम को ग्रामीण विकास के नए मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य रोजगार को केवल मजदूरी तक सीमित न रखकर गांवों में स्थायी संपत्ति निर्माण, आजीविका विकास और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ना है।
मनरेगा का महत्व
मनरेगा भारतीय ग्रामीण विकास की सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में से एक रही है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें रोजगार को अधिकार के रूप में देखा गया। ग्रामीण परिवार काम की मांग कर सकते थे और सरकार की जिम्मेदारी थी कि निर्धारित समय के भीतर काम उपलब्ध कराया जाए। यदि काम नहीं मिलता था तो बेरोजगारी भत्ते का प्रावधान भी किया गया था।
इस योजना ने ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सुरक्षा प्रदान की। सूखा, बाढ़, महामारी और आर्थिक संकट जैसे कठिन समय में मनरेगा ने लाखों परिवारों को आय का सहारा दिया। कोरोना महामारी के दौरान जब शहरों से बड़ी संख्या में मजदूर गांव लौटे, तब ग्रामीण रोजगार योजना ने उनके लिए जीवनयापन का महत्वपूर्ण साधन उपलब्ध कराया।
मनरेगा के माध्यम से गांवों में कई प्रकार की स्थायी परिसंपत्तियों का निर्माण हुआ। तालाबों की खुदाई, जल संरक्षण कार्य, वृक्षारोपण, खेत सुधार, ग्रामीण मार्ग और सामुदायिक सुविधाओं के निर्माण से गांवों की आधारभूत संरचना मजबूत हुई।
नया बदलाव
विकसित भारत रोजगार एवं आजीविका मिशन का उद्देश्य ग्रामीण रोजगार को नए दृष्टिकोण से देखना है। इसमें रोजगार को गांवों की उत्पादक क्षमता बढ़ाने और विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ने का प्रयास किया गया है। इस नए ढांचे में रोजगार के दिनों को बढ़ाकर 125 दिन करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को अधिक आय सुरक्षा देना है। साथ ही यह भी प्रयास किया गया है कि रोजगार कार्य ऐसे हों जिनसे गांवों को लंबे समय तक लाभ मिले।
अब केवल मजदूरी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं माना जा रहा है, बल्कि ऐसे कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है जो जल सुरक्षा, कृषि उत्पादकता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करें।
विकास से जुड़ा रोजगार
नए ग्रामीण रोजगार मॉडल में रोजगार और विकास को एक साथ जोड़ा गया है। इसके तहत जल संरक्षण, सिंचाई व्यवस्था, ग्रामीण संपर्क मार्ग, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और जलवायु परिवर्तन से बचाव जैसे क्षेत्रों में कार्यों को बढ़ावा दिया जाएगा।
गांवों में बनाए गए तालाब, छोटे बांध, वर्षा जल संचयन संरचनाएं और सिंचाई से जुड़ी परिसंपत्तियां किसानों की उत्पादकता बढ़ा सकती हैं। इससे ग्रामीण मजदूरों को रोजगार मिलने के साथ-साथ कृषि व्यवस्था भी मजबूत होगी। इस सोच का उद्देश्य यह है कि ग्रामीण मजदूर केवल मजदूरी प्राप्त करने वाले व्यक्ति न रहें, बल्कि गांव की आर्थिक प्रगति में भागीदार बनें।
महिलाओं की भागीदारी
ग्रामीण रोजगार योजनाओं का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक प्रभाव महिलाओं के सशक्तिकरण के रूप में सामने आया है। मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी को विशेष महत्व दिया गया। कानून में महिलाओं के लिए न्यूनतम भागीदारी का प्रावधान रखा गया था, लेकिन कई राज्यों में महिलाओं की भागीदारी इससे भी अधिक रही है।
गांव के पास ही रोजगार मिलने से महिलाओं को घर और काम के बीच संतुलन बनाने में सहायता मिली। पहले ग्रामीण महिलाओं को रोजगार के लिए दूर जाना पड़ता था, जिससे समय, सुरक्षा और सामाजिक कठिनाइयां सामने आती थीं। स्थानीय स्तर पर काम मिलने से उनकी आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ी।
महिलाओं की मजदूरी सीधे बैंक खाते में पहुंचने की व्यवस्था ने भी उनकी वित्तीय भागीदारी को मजबूत किया। इससे परिवार के निर्णयों में उनकी भूमिका बढ़ी और स्वयं सहायता समूहों जैसी गतिविधियों से जुड़ने के अवसर भी बढ़े।
नए ग्रामीण आजीविका मॉडल में महिलाओं को केवल मजदूरी तक सीमित न रखकर स्वरोजगार, कौशल विकास और छोटे उद्यमों से जोड़ने पर भी जोर दिया जा रहा है। महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से कृषि, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण और ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
तकनीक और पारदर्शिता
नए रोजगार ढांचे में तकनीक की भूमिका को बढ़ाया गया है। सरकार का उद्देश्य है कि डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से कार्यों में पारदर्शिता लाई जाए और भ्रष्टाचार कम किया जाए।
इसके लिए मोबाइल आधारित उपस्थिति, भू-स्थान आधारित निगरानी, ऑनलाइन कार्य विवरण और डिजिटल भुगतान जैसी व्यवस्थाएं लागू की जा रही हैं। इससे यह पता लगाना आसान होता है कि कार्य कहां हो रहा है, कितने लोग जुड़े हैं और मजदूरी भुगतान की स्थिति क्या है।
मजदूरी को सीधे बैंक खातों में भेजने से बिचौलियों की भूमिका कम हुई है। इससे श्रमिकों को उनका भुगतान सीधे मिलने में सहायता मिलती है।
हालांकि तकनीक के साथ कुछ चुनौतियां भी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट की समस्या, डिजिटल जानकारी की कमी और तकनीकी त्रुटियां कई बार गरीब मजदूरों के लिए परेशानी पैदा कर सकती हैं। इसलिए डिजिटल व्यवस्था के साथ सहायता केंद्र और मानवीय सहयोग भी जरूरी है।
पंचायतों की भूमिका
ग्रामीण विकास में ग्राम पंचायतों की भूमिका को और मजबूत किया गया है। नए मॉडल में गांव की जरूरतों के अनुसार योजनाएं तैयार करने पर जोर है। ग्राम सभा स्थानीय समस्याओं की पहचान करती है और पंचायत विकास योजनाएं बनाती है। इससे सड़क, पानी, स्वच्छता, रोजगार और अन्य आवश्यकताओं को स्थानीय स्तर पर प्राथमिकता दी जा सकती है।
यदि पंचायतें तकनीकी और प्रशासनिक रूप से मजबूत होती हैं तो ग्रामीण विकास योजनाएं अधिक प्रभावी हो सकती हैं। इससे गांवों में स्थानीय नेतृत्व का विकास भी होता है।
कृषि और रोजगार का संतुलन
भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्व सबसे अधिक है। इसलिए रोजगार योजनाओं और कृषि कार्यों के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। खेती के मुख्य समय जैसे बुवाई और कटाई के दौरान किसानों को पर्याप्त मजदूर मिल सकें, इसके लिए रोजगार कार्यों को कृषि जरूरतों के अनुसार संचालित करने का प्रयास किया जाता है।
इससे किसानों और मजदूरों दोनों के हितों को ध्यान में रखने की कोशिश की जाती है। मजदूरों को पूरे वर्ष रोजगार सुरक्षा मिले और किसानों को कृषि कार्यों के समय श्रमिक उपलब्ध हों, यही संतुलन ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है।
वित्तीय व्यवस्था और चुनौतियां
नई व्यवस्था में केंद्र और राज्यों की वित्तीय जिम्मेदारियों को लेकर भी चर्चा हुई है। सामान्य राज्यों में केंद्र और राज्य के बीच खर्च का अनुपात तय किया गया है, जबकि विशेष राज्यों के लिए अलग व्यवस्था रखी गई है।
कुछ राज्यों ने चिंता जताई है कि अतिरिक्त वित्तीय जिम्मेदारी से ग्रामीण रोजगार कार्यक्रमों को लागू करने में कठिनाई हो सकती है। कमजोर आर्थिक स्थिति वाले राज्यों के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाना चुनौती हो सकता है। वहीं सरकार का तर्क है कि राज्यों की भागीदारी बढ़ने से योजनाओं की जिम्मेदारी और प्रभावशीलता बढ़ेगी।
डिजिटल अंतर की चुनौती
ग्रामीण भारत में डिजिटल सुविधाओं का विस्तार तेजी से हुआ है, लेकिन अभी भी कई क्षेत्रों में डिजिटल अंतर मौजूद है। सभी ग्रामीण नागरिकों के पास स्मार्टफोन, इंटरनेट और तकनीकी ज्ञान उपलब्ध नहीं है।
यदि पूरी व्यवस्था केवल ऑनलाइन हो जाती है तो बुजुर्ग, गरीब और कम शिक्षित लोग पीछे छूट सकते हैं। इसलिए कॉमन सर्विस सेंटर जैसे सहायता केंद्रों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। तकनीक का उद्देश्य लोगों को सुविधा देना होना चाहिए, न कि उनके अधिकारों तक पहुंच में बाधा बनना।
भविष्य की दिशा
विकसित भारत रोजगार एवं आजीविका मिशन ग्रामीण भारत के विकास मॉडल में एक बड़ा परिवर्तन माना जा सकता है। यह रोजगार को सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक विकास और स्थायी परिसंपत्ति निर्माण से जोड़ने का प्रयास करता है।
यदि इसे पर्याप्त बजट, मजबूत पंचायत व्यवस्था, पारदर्शी निगरानी और प्रभावी क्रियान्वयन के साथ लागू किया जाता है तो यह गांवों की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। ग्रामीण भारत की असली शक्ति उसके लोग, प्राकृतिक संसाधन और स्थानीय क्षमता हैं। रोजगार योजनाओं का सही उद्देश्य तभी पूरा होगा जब गांव के लोगों को केवल मजदूरी नहीं बल्कि विकास प्रक्रिया में भागीदारी मिले।

मनरेगा से विकसित भारत रोजगार एवं आजीविका मिशन तक का सफर ग्रामीण रोजगार नीति में बदलाव को दर्शाता है। पुरानी व्यवस्था ने ग्रामीण गरीबों को रोजगार सुरक्षा दी, जबकि नया मॉडल रोजगार को विकास, उत्पादकता और आत्मनिर्भर गांवों से जोड़ने का प्रयास करता है।

इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि रोजगार की गारंटी, मजदूरी भुगतान, महिलाओं की भागीदारी और गरीब परिवारों की सामाजिक सुरक्षा को मजबूत बनाए रखा जाए।
भारत के विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य में गांवों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होगी। यदि ग्रामीण रोजगार व्यवस्था पारदर्शी, समावेशी और प्रभावी तरीके से लागू होती है, तो यह ग्रामीण भारत के सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का मजबूत आधार बन सकती है।

आपातकाल को याद रखना जरूरी है

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सुरेंद्र चतुर्वेदी, जयपुर

जयपुर : आज की रात जब यह लेख लिख रहा हूँ, तब याद आता है कि इक्यावन साल पहले आज ही की रात देश में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगा कर लोकतंत्र को गंभीर रूप से घायल कर दिया था। *यह काम उस डरे हुए राजनेता का था जिसे बरसों बरस इतिहास में लौह महिला या आयरन लेडी के रूप में महिमा मंडित किया गया।*

लोकतंत्र में विरोध और समर्थन तो चलता ही रहता है लेकिन इंदिरा गांधी, जॉर्ज फर्नांडीज की अगुवाई में हुई रेलवे की हड़ताल और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहे छात्र आंदोलन से उपजे असंतोष से सहमी हुई थी, उस पर राजनारायण की याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्याधिपति जगमोहन लाल सिन्हा ने जब इंदिरा गांधी के 1971 में हुए निर्वाचन को अवैध घोषित करते हुए अगले छह साल तक चुनाव लड़ने पर रोक की सजा दे दी, तो इसका मतलब यह हुआ कि उनका 1976 का निर्वाचन भी निरस्त हो गया। इंदिरा गांधी ने इसे अपमान की तरह माना और देश को आपातकाल के अंधे कुएँ में धकेल दिया।

प्रश्न यह है कि अब जब आधी सदी बीत चुकी है तो क्या इस दुर्घटना को याद करना समीचीन होगा ? भारत जैसे विविध राजनीतिक विचारों, मान्यताओं, परंपराओं और व्यवहार जैसे सतरंगी देश में ऐसे कुत्सित विचारों और प्रयासों को हमेशा याद रखा जाना चाहिए, जिससे राजनीतिक दल और सत्ता हमेशा सावधान रहे कि भारत जैसे लोकतंत्र में जनमानस के प्रति दुर्भावनापूर्ण व्यवहार और आचरण को कभी माफ नहीं किया जाता और ना ही भूला जाता है।

तब से लेकर अब तक राजनीति बहुत बदल गई है। उस समय कांग्रेस ही एक मात्र राष्ट्रीय पार्टी थी जो निर्बाध रूप से सत्तासीन थी। यह सोचना भी मुश्किल था कि देश में कोई ऐसा दल या समूह सामने आएगा जो कांग्रेस के स्वामित्व को चुनौती देगा। जयप्रकाश नारायण की प्रेरणा कहें या छात्र आंदोलन से उपजा अवसर कि ग़ैर कांग्रेसी सभी राजनीतिक अपनी विचारधारा को पीछे रखते हुए एक साथ आ गए और जनता पार्टी के रूप में एक कांग्रेस का विकल्प खड़ा करने की कोशिश की। *1977 में आपातकाल हटने के बाद हुए चुनावों में जनता पार्टी को सत्ता तो मिली लेकिन आपसी अविश्वास, संदेह और सत्ता के लालच ने जनता पार्टी के कुनबे को तिनके तिनके की तरह बिखेर दिया। यदि हम ध्यान से देखें तो पाएंगे कि जनता पार्टी का शासन भी कांगेसी संस्कारों से अलग नहीं था। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई कांग्रेस से ही निकले थे। उनकी प्राथमिकता इंदिरा गांधी को हटाने की थी ना कि कांग्रेस का विकल्प बनने की।* इसलिए वो जनता पार्टी को एक नहीं रख पाये और चरण सिंह ने उनका स्थान ले लिया। अंतत: 1980 में जनता पार्टी तिरोहित हो गई और कांग्रेस के राष्ट्रीय विकल्प की संभावना धुंधली पड़ गई।

तो उस आपातकाल ने दो बातें स्पष्ट की या सीख दी कि लोकतंत्र में जनभावनाओं का दमन एक ऐसा श्राप है जो दशकों बीत जाने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ता और दूसरा आपसी अविश्वास, सत्ता का लालच और अहंकार किसी को भी सत्ता के केंद्र से बाहर फेंक सकता है। चाहे वो इंदिरा गांधी हों या मोरारजी देसाई !!

(लेखक

सेंटर फॉर मीडिया रिसर्च एंड डेवलपमेंट, जयपुर से संबद्ध हैं)

चरित्र निर्माण की पाठशाला और बदलती छवि

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दिल्ली ।  के बाद भारतीय राजनीति में एक बड़ा मोड़ आया, जिसने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सत्ता के शिखर पर पहुँचा दिया और उसका अभूतपूर्व कायाकल्प किया। लेकिन इस राजनीतिक सफलता के समानांतर, वैचारिक और संगठनात्मक धरातल पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के मूल स्वरूप और उसकी छवि को लेकर कई गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

आरएसएस को पारंपरिक रूप से ‘चरित्र निर्माण की पाठशाला’ माना जाता रहा है, जहाँ राष्ट्रवाद, सादगी और नि:स्वार्थ सेवा सर्वोपरि थी। स्वयंसेवकों की पहचान नैतिक बल और कड़े अनुशासन से होती थी। लेकिन हाल के वर्षों में, संघ के भीतर से या उससे जुड़े लोगों से भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के किस्से सामने आना बेहद चिंताजनक है। जब किसी ऐसी संस्था से भ्रष्टाचार की खबरें आती हैं जिसका आधार ही नैतिक शुद्धता हो, तो आम जनता और समर्थकों के बीच गहरा वैचारिक संकट पैदा होता है।

निजी एनजीओ (NGO) का उदय और वैचारिक भटकाव

संघ का पारंपरिक दृष्टिकोण हमेशा से आत्मनिर्भरता और सीधे जन-संपर्क के ज़रिए सामाजिक कार्य करने का रहा है। वह विदेशी या कड़े कॉर्पोरेट फंड्स से चलने वाले एनजीओ (गैर-सरकारी संगठनों) मॉडल का खुलकर समर्थन नहीं करता था। लेकिन समकालीन परिदृश्य में यह देखा जा रहा है कि संघ के कई बड़े और प्रभावशाली पदाधिकारियों या उनके करीबियों ने अपने निजी एनजीओ बना लिए हैं। इन संगठनों के पास बड़े पैमाने पर सरकारी और कॉर्पोरेट (CSR) फंड आ रहे हैं।

यह बदलाव दो मुख्य चिंताओं को जन्म देता है:

हितों का टकराव (Conflict of Interest): सत्ता के करीब होने के कारण इन एनजीओ को मिलने वाला फंड पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।

 मिशन से भटकाव: जब सेवा का माध्यम ‘समर्पण’ के बजाय ‘संस्थागत फंडिंग’ बन जाता है, तो संगठन का मूल चरित्र बदलने लगता है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भाजपा के सत्ता में आने से संघ की वैचारिक नीतियों को देश में बड़ी स्वीकार्यता मिली है, लेकिन इस ‘पावर गेम’ में संघ ने अपनी वह साख दांव पर लगा दी है जो उसने सौ सालों की तपस्या से कमाई थी। सत्ता की नजदीकी अक्सर संगठनों में भौतिकवाद और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है। यदि आरएसएस ने इस आंतरिक क्षरण और पदाधिकारियों के ‘निजी हितों’ पर समय रहते अंकुश नहीं लगाया, तो वह केवल एक राजनीतिक दबाव समूह बनकर रह जाएगा और नैतिक मार्गदर्शन की अपनी अनूठी पहचान खो देगा।

एफसीआरए (FCRA) नियमों में बड़ा बदलाव: विदेशी फंडिंग पर कड़े अंकुश और पारदर्शिता का नया युग

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दिल्ली। भारत में काम कर रहे गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और विभिन्न सामाजिक-धार्मिक संस्थाओं के लिए विदेशी फंडिंग प्राप्त करने की प्रक्रिया अब और अधिक जटिल और जवाबदेह होने जा रही है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट (FCRA) के नियमों में व्यापक और ऐतिहासिक बदलाव किए हैं। सोमवार को जारी हुई गजट नोटिफिकेशन के अनुसार, विदेशी चंदे के दुरुपयोग को रोकने, पारदर्शिता बढ़ाने और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से इन कड़े प्रावधानों को लागू किया गया है। नए संशोधनों के तहत न केवल कंपाउंडिंग पेनल्टी (शमन दंड) के ढांचे को सख्त किया गया है, बल्कि संगठनों के काम करने के भौगोलिक और वैचारिक दायरे को भी पूरी तरह स्पष्ट कर दिया गया है।

भौगोलिक सीमा और उद्देश्य का स्पष्ट निर्धारण

नए नियमों का सबसे पहला और महत्वपूर्ण प्रभाव संगठनों के कार्यक्षेत्र पर पड़ेगा। अब किसी भी संगठन को अपने रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट में यह स्पष्ट रूप से दर्ज करना होगा कि वह किन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में काम करेगा और उसका सही मकसद क्या है।

  • शेड्यूल और नया फॉर्म FC-6F: आवेदकों को अपनी गतिविधियों को गृह मंत्रालय द्वारा पहले से तय किए गए शेड्यूल में से ही चुनना होगा।
  • एक वर्ष की समयसीमा: वर्तमान में सक्रिय संगठनों को अपने उद्देश्यों और कार्यस्थलों को री-अलाइन (संरेखित) करने के लिए नए फॉर्म FC-6F के माध्यम से एक वर्ष का समय दिया गया है। उन्हें यह स्पष्ट घोषणा करनी होगी कि वे भविष्य में कौन सा विशिष्ट उद्देश्य और स्थान बनाए रखना चाहते हैं।

धार्मिक गतिविधियों की नई परिभाषा: ‘धर्म परिवर्तन’ पर पूर्ण रोक

संशोधित नियमों में धार्मिक श्रेणियों (Religious Categories) को लेकर सबसे बड़ा और सख्त बदलाव किया गया है। नए शेड्यूल में धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, एजुकेशनल और सोशल हेड के तहत स्वीकृत गतिविधियों की सूची दी गई है।

  • स्वीकृत गतिविधियां: धार्मिक श्रेणी में मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों, गुरुद्वारा, मठों और पूजा स्थलों के निर्माण, रखरखाव और जीर्णोद्धार की अनुमति है। साथ ही धर्मशाला, लंगर, धार्मिक शिक्षा, नैतिक शिक्षा, सत्संग और मेडिटेशन रिट्रीट के आयोजन को भी वैध माना गया है।
  • कड़ा प्रतिबंध: सरकार ने नियमों में साफ कर दिया है कि धार्मिक फिलॉसफी, थियोलॉजी, धार्मिक इतिहास की पढ़ाई और आदिवासी परंपराओं के डॉक्यूमेंटेशन जैसी गतिविधियां तभी मान्य होंगी, जब उनमें ‘धर्म परिवर्तन शामिल न हो’। हर धार्मिक गतिविधि की अनुमति से ‘धर्म परिवर्तन’ को पूरी तरह और स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है। इसका सीधा संदेश है कि विदेशी चंदे का इस्तेमाल किसी भी प्रकार के प्रलोभन या मतांतरण के लिए नहीं किया जा सकता।

‘मुख्य अधिकारी’ की परिभाषा और विदेशी नागरिकों पर लगाम

गृह मंत्रालय ने जवाबदेही तय करने के लिए संगठनों के ‘मुख्य पदाधिकारी’ (Chief Functionary) की परिभाषा को अधिक स्पष्ट और विस्तृत किया है। अब इसके दायरे में कंपनी डायरेक्टर, पार्टनर, ट्रस्टी, हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के कर्ता और संगठन के नीतिगत मामलों को नियंत्रित करने वाले सभी प्रमुख लोग शामिल होंगे।

  • विदेशी नागरिकों पर पाबंदी: नए नियमों के अनुसार, जिन संगठनों में मुख्य पदाधिकारी के रूप में विदेशी नागरिक शामिल हैं (भारतीय मूल के लोगों को छोड़कर), उन्हें सामान्य तौर पर पंजीकरण या पूर्व-अनुमति (Prior Permission) के योग्य नहीं माना जाएगा। हालांकि, विशेष परिस्थितियों में सरकार आदेश जारी कर इसमें छूट दे सकती है।

फंड के उपयोग पर कड़े वित्तीय नियम

विदेशी चंदे के निष्क्रिय पड़े रहने या उसके दुरुपयोग को रोकने के लिए वित्तीय नियंत्रण को और मजबूत किया गया है:

  • न्यूनतम खर्च की शर्त: किसी संगठन को रिन्यूअल (नवीनीकरण) के योग्य तभी माना जाएगा, जब उसने पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये के विदेशी योगदान का वास्तविक इस्तेमाल किया हो।
  • 75% खर्च का नियम: पूर्व-अनुमति के मामलों में विदेशी फंड की अगली किस्त तभी जारी की जाएगी, जब पिछली किस्त का कम से कम 75 प्रतिशत हिस्सा खर्च हो चुका हो और फील्ड जांच (Field Verification) के माध्यम से उसकी सत्यता प्रमाणित हो चुकी हो।
  • अतिरिक्त विवरण: अब संगठनों को अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स, विस्तृत गतिविधि रिपोर्ट, मुख्य पदाधिकारियों द्वारा जारी पब्लिकेशन्स और ‘डोनर-एडवाइज्ड फंड’ के माध्यम से आने वाले पैसों के असली दानदाताओं (Ultimate Beneficiaries) की जानकारी भी सरकार को देनी होगी।

उल्लंघन पर भारी जुर्माना (कंपाउंडिंग पेनल्टी)

नियमों की अनदेखी करने वाले संगठनों के लिए वित्तीय दंड को अत्यधिक कड़ा कर दिया गया है:

उल्लंघन का प्रकार निर्धारित जुर्माना / पेनाल्टी
प्रशासनिक खर्च सीमा का उल्लंघन: धारा-8 के तहत मिले चंदे का 20% से अधिक हिस्सा अन्य कार्यों में खर्च करना। ₹1,00,000 या सीमा से अधिक खर्च की गई राशि का 5% (जो भी अधिक हो)।
सट्टेबाजी/जोखिम भरे निवेश: धारा 8(1) का उल्लंघन कर विदेशी अंशदान को सट्टेबाजी या सट्टा गतिविधियों में लगाना। ₹1,00,000 या निवेश की गई रकम का 30% (जो भी अधिक हो) + अर्जित की गई 100% कमाई की वसूली।
फंड का विचलन (Diversion): विशेष कार्य के लिए मिले चंदे का किसी अन्य कार्य में इस्तेमाल करना। ₹1,00,000 या डायवर्ट की गई राशि का 30% (जो भी अधिक हो)।

इमिग्रेशन और लुकआउट नोटिस पर स्पष्टीकरण

मंत्र्यालय ने एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक स्पष्टीकरण भी जारी किया है। इसके तहत, जो वैधानिक संस्थाएं (Statutory Bodies) आपराधिक अधिकार क्षेत्र (Criminal Jurisdiction) से बाहर हैं, वे किसी भी भारतीय या विदेशी नागरिक को देश छोड़ने से रोकने के लिए सीधे इमिग्रेशन ब्यूरो (Bureau of Immigration) से अनुरोध या लुकआउट सर्कुलर जारी नहीं करवा सकती हैं। इसके लिए उन्हें तय कानूनी और आपराधिक न्याय व्यवस्था के चैनलों का पालन करना होगा।

FCRA नियमों में किए गए ये हालिया बदलाव भारत में विदेशी चंदे की निगरानी प्रणाली को एक नए स्तर पर ले जाते हैं। सरकार का यह कदम देश की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने, अवैध धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने और विदेशी धन के माध्यम से होने वाली अवांछित गतिविधियों को नियंत्रित करने की दिशा में बेहद कड़ा है। जहां एक ओर नेक नीयत से काम करने वाले NGOs के लिए पारदर्शिता बढ़ेगी, वहीं नियमों का उल्लंघन करने वाले या अस्पष्ट उद्देश्यों के साथ काम करने वाले संगठनों के लिए भारत में परिचालन करना अब बेहद मुश्किल हो जाएगा।

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