युवाओं में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति: एक गहन विश्लेषण

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डॉ पंकज शर्मा

दिल्ली । राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के ताज़ा आंकड़े देश कीराजधानी दिल्ली के सामने खड़े गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट कीचौंकाने वाली तस्वीर पेश करते हैं। वर्ष 2023 में दिल्ली में 3,131 लोगों नेआत्महत्या का रास्ता चुना। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है किइनमें से आधे से अधिक (1,590 लोग) ऐसे थे जिनकी मासिक आय₹8,300 से कम थी, जबकि 765 पूर्णतः बेरोजगार थे। ये आंकड़े केवलएक शहर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे देश में युवाओं के बीच फैली एकविकट मानसिक स्वास्थ्य महामारी की ओर इशारा करते हैं।

इस समस्या की जड़ें केवल आर्थिक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यहसामाजिक, मनोवैज्ञानिक और पारिवारिक कारकों का एक जटिल जालहै। जब आय मूलभूत आवश्यकताओं—रोटी, कपड़ा, मकान—को पूराकरने में भी असमर्थ हो, तो व्यक्ति स्वयं को समाज पर बोझ समझनेलगता है। NCRB के आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि गरीबी और आत्महत्या केबीच सीधा संबंध है। आज के समाज में नौकरी या पेशा केवलआजीविका का साधन नहीं, बल्कि व्यक्ति की पहचान और आत्म-मूल्यका प्रतीक बन गया है। ऐसे में नौकरी छूटना या लंबे समय तक बेरोजगाररहना केवल आर्थिक नुकसान नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान को गहरा ठेसपहुँचाने वाली घटना है। व्यक्ति स्वयं को अयोग्य और असफल माननेलगता है।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अब भी गहरी गलतफहमियाँ औरकलंक का वातावरण है। इसे कमजोरी या “नाटक” समझा जाता है। यहसमस्या निम्न आय वर्ग में और भी विकट है, जहाँ “डिप्रेशन” जैसीसमस्याओं को लक्जरी माना जाता है और रोजी-रोटी के संघर्ष के आगेइसे महत्वहीन समझा जाता है। देश में मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों(मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक) की भारी कमी है। साथ ही, निजी थेरेपीया काउंसलिंग की लागत आम आदमी की पहुँच से बाहर है। सोशलमीडिया ने एक ‘परफेक्ट लाइफ’ का ऐसा अवास्तविक चित्र पेश किया हैजिसने युवाओं में हमेशा ‘हैप्पी’ और ‘सक्सेसफुल’ दिखने का दबाव पैदाकर दिया है। दूसरों की सफलताओं और विलासिता से लगातार तुलनाहोती रहती है, जो हीनभावना, अकेलापन और असंतोष को जन्म देती है।
हमारे समाज ने सफलता की परिभाषा को केवल अच्छे अंक, उच्च वेतनवाली नौकरी और भौतिक संपत्ति तक सीमित कर दिया है। इसकेविपरीत, कला, खेल, या सामाजिक कार्यों जैसे वैकल्पिक रास्तों को कममहत्व दिया जाता है। इस वजह से जो युवा इस संकीर्ण परिभाषा पर खरेनहीं उतर पाते, वे स्वयं को नाकाफ़ी समझने लगते हैं। इसके साथ हीअधिकांश परिवारों में बच्चों से केवल उनकी शैक्षणिक या पेशेवरउपलब्धियों के बारे में पूछा जाता है, न कि उनके मन की भावनाओं, डर, यातनाव के बारे में। भावनात्मक बातचीत का अभाव युवाओं को अंदर हीअंदर खोखला कर देता है। माता-पिता द्वारा थोपी गई अपेक्षाएँ, जैसेइंजीनियर या डॉक्टर बनने का दबाव, युवाओं पर एक अदृश्य बोझ बनजाती हैं। उनकी अपनी रुचियों और क्षमताओं को नजरअंदाज कर दियाजाता है।

इस जटिल समस्या का समाधान केवल सरकारी नीतियों तक सीमित नहींहो सकता। इसके लिए एक सामूहिक सामाजिक प्रयास की आवश्यकताहै। शैक्षणिक संस्थानों में नियमित मानसिक स्वास्थ्य जांच, काउंसलिंगसेल और जागरूकता कार्यशालाएँ अनिवार्य होनी चाहिए। छात्रों को तनावप्रबंधन और भावनाओं में लचीलापन लाना सिखाना आवश्यक है। इसकेसाथ ही सरकार को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) पर मानसिकस्वास्थ्य सेवाओं को एकीकृत करना चाहिए और मनोवैज्ञानिक सहायताको हेल्थ इंश्योरेंस के दायरे में लाना चाहिए ताकि यह सेवाएँ सस्ती औरसुलभ हो सकें। मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन नंबर (जैसे- ‘किरण’ हेल्पलाइन 1800-599-0019) का व्यापक प्रचार करना चाहिए ताकिजरूरतमंद व्यक्ति बिना झिझक मदद ले सकें। सरकारी योजनाओं कोकेवल डिग्री तक सीमित न रहकर, उद्योगों की मांग के अनुरूप व्यावहारिककौशल विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। युवाओं कोस्टार्ट-अप शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता, मेंटरशिप और नेटवर्किंग केअवसर उपलब्ध कराने होंगे। इससे न केवल रोजगार सृजित होंगे बल्कियुवाओं में नवाचार की भावना भी जागेगी। निजी और सार्वजनिक क्षेत्र मेंकर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए अनुकूल वातावरण बनाना, अत्यधिक कार्यभार को कम करना और वर्क-लाइफ बैलेंस को बढ़ावा देनाजरूरी है।

समाज और समुदाय को एक ‘सुरक्षा जाल’ के रूप में काम करना होगा।असफलता को कलंक नहीं, बल्कि सीख का हिस्सा मानना होगा।पड़ोसियों, दोस्तों और रिश्तेदारों को संवेदनशील बनाना होगा ताकि वेमुसीबत के समय सहारा बन सकें। मीडिया और शैक्षणिक संस्थानों कोसफलता की विविध परिभाषाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए। अच्छाइंसान बनना, समाज के प्रति योगदान देना, या अपनी रुचि के क्षेत्र में खुशरहना—ये सभी सफलता के ही रूप हैं।

परिवार इस लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली इकाई है। माता-पिता को बच्चों के साथ ऐसा रिश्ता कायम करना चाहिए जहाँ वेबिना डर के अपनी हर सफलता, असफलता, डर और चिंता साझा करसकें। उनकी बात को धैर्यपूर्वक सुनें और उनकी भावनाओं को समझने काप्रयास करें । हर बच्चा अलग होता है। अभिभावकों को अपने बच्चों कीरुचियों और क्षमताओं को पहचानना चाहिए और उन्हें उनके हिसाब सेआगे बढ़ने देना चाहिए। उन पर अपने अधूरे सपने थोपने से बचना चाहिए।पेरेंट्स बच्चे में दिखने वाले उदासी, चिड़चिड़ापन, सामाजिक अलगाव, नींद या भूख में बदलाव जैसे मानसिक संकट के चेतावनी संकेतों के प्रतिसजग रहना चाहिए। ऐसे में तुरंत संवाद कायम करें और यदि जरूरी लगेतो पेशेवर मदद लेने में संकोच न करें।

दिल्ली के आंकड़े केवल एक लक्षण हैं, बीमारी नहीं। यह बीमारी हमारेसामाजिक ढाँचे, आर्थिक व्यवस्था और पारिवारिक मूल्यों में घर कर चुकीहै। इसका मुकाबला करने के लिए हमें एक ऐसा समाज बनाना होगा जहाँआर्थिक असुरक्षा को दूर करने के साथ-साथ भावनात्मक सुरक्षा भी प्रदानकी जाए। युवाओं को यह सिखाने और महसूस कराने की जरूरत हैकि “तुम्हारा अस्तित्व केवल तुम्हारी नौकरी या तुम्हारे अंकों से कहीं बड़ाहै। असफलता जीवन का एक हिस्सा है, अंत नहीं। और सबसे महत्वपूर्णबात, मदद माँगना कभी भी कमजोरी का प्रतीक नहीं, बल्कि स्वयं कोमजबूत बनाने का एक साहसिक कदम है।” केवल तभी हम इन अनमोलजिंदगियों को बचा पाने में सफल हो सकेंगे।

क्या रील लाइफ़, हमारी रियल ज़िंदगी को बरबाद कर रही है?

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बृज खंडेलवाल
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पहले खाली वक्त में अंताक्षरी खेलते थे, अब रील्स और यूट्यूब शॉट्स से फुर्सत नहीं मिल रही। फालतू बैठी गृहणियां मोबाइल पर इस दूषित, खतरनाक कंटेंट की सबसे ज्यादा कंज्यूमर हैं। उधर ओल्ड एंड यंग, “पुरुष सोशल मीडिया निपल को चूसे बगैर छटपटाते रहते हैं।”
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यह बस 15 सेकंड का एक स्टंट होना था — इंस्टाग्राम पर “लाइक” पाने के लिए नहर में छलांग लगाना। लेकिन मध्य प्रदेश के 19 साल के राकेश के लिए यह रील उसकी आख़िरी बन गई। दोस्त वीडियो बनाते रहे, और राकेश डूब गया। वीडियो फिर भी वायरल हो गया।

आज हिंदुस्तान में सोशल मीडिया की यह दीवानगी जानलेवा बन चुकी है। जो प्लेटफ़ॉर्म कभी रचनात्मकता के लिए बने थे, अब वहाँ अश्लीलता, हैरानी और हद से ज़्यादा दिखावे की दौड़ मची है। “वायरल” होने की इस पागलपन ने न सिर्फ़ क़ीमती जानें ली हैं, बल्कि हमारी तहज़ीब और सामाजिक मूल्यों को खोखला कर दिया है।

हाल ही में दिल्ली मेट्रो में एक जोड़े ने ऐसा वीडियो बनाया जिसमें वे सॉफ्ट ड्रिंक को एक-दूसरे के मुँह में डालते दिखे — लोगों को घिन आई, लेकिन व्यूज़ लाखों में पहुंचे।

नोएडा में दो लड़कियों ने “अंग लगा दे” गाने पर रील बनाई, जिसमें वे एक-दूसरे को रंग लगाते और आपत्तिजनक हरकतें करती दिखीं। वीडियो वायरल हुआ, पर साथ में भारी आलोचना भी मिली।

एक इन्फ़्लुएंसर ने एक वीडियो डाला, जिसमें एक लड़का गाड़ी पर नाचता दिखा और पीछे दो लड़कियाँ थीं — नतीजा, ₹33,000 का जुर्माना और सोशल मीडिया पर हंगामा।

तेलंगाना में एक कुल्फ़ी बेचने वाला भी तब गिरफ़्तार हुआ जब उसने ग्राहकों के सामने अश्लील इशारे करते हुए रीलें बनाईं।

और फिर वे हादसे — जो इस पागलपन की असली कीमत दिखाते हैं:

श्वेता सुरवसे, 23, महाराष्ट्र में रील बनाते वक़्त कार समेत 300 फ़ीट गहरी खाई में गिरी और जान चली गई।

छत्तीसगढ़ में एक 20 साल का स्टूडेंट दोस्तों के साथ रील बनाते हुए छत से गिरकर मर गया।

शिवम कुमार, 21, यूपी के खैराडा गाँव में झंडे के डंडे पर उल्टा लटकने का स्टंट करते वक़्त नीचे दब गया।

2023 में ही देशभर की पुलिस ने 100 से ज़्यादा ऐसी मौतों की रिपोर्ट दी — ज़्यादातर 25 साल से कम उम्र के लड़के-लड़कियाँ, जिन्हें चाहिए था बस थोड़ा सा नाम और कुछ “फ़ॉलोअर्स।”

नशे की तरह लाइक्स की भूख निरंतर बढ़ रही है।मनोवैज्ञानिक इसे “डोपामिन इकॉनमी” कहते हैं — जितनी सनसनीख़ेज़ हरकत, उतने ज़्यादा लाइक्स। हर “लाइक” एक नशे जैसा एहसास देता है।

सोशल मीडिया के एल्गोरिदम अब अच्छाई या रचनात्मकता नहीं, बल्कि हैरान कर देने वाले या गंदे कंटेंट को आगे बढ़ाते हैं।
आगरा में कुछ लड़कों ने बुज़ुर्ग आदमी का मज़ाक उड़ाते हुए रील बनाई। दिल्ली में एक औरत ने भिखारी की नकल की — वीडियो को लाखों ने देखा, कुछ ने ही विरोध किया। आज मज़ाक के नाम पर ज़िल्लत और बेइज़्ज़ती को भी मनोरंजन मान लिया गया है।

और सिर्फ़ अश्लीलता नहीं — सोशल मीडिया पर ग़लत जानकारी (मिसइनफ़ॉर्मेशन) सबसे तेज़ फैलती है। किसी “चमत्कारी इलाज” या “झटपट अमीरी के नुस्खे” वाला वीडियो कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाता है। एक वायरल वीडियो में “डायबिटीज़ का देसी इलाज” बताया गया — दस मिलियन लोगों ने देखा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

डिजिटल थिएटर बिना किसी निगरानी के बंदर के हाथ स्तर बन रहे हैं। हर फ़िल्म को रिलीज़ से पहले सेंसर बोर्ड (CBFC) की मंज़ूरी चाहिए। मगर सोशल मीडिया पर कुछ भी, कभी भी पोस्ट किया जा सकता है — कोई रोक नहीं, कोई जवाबदेही नहीं।

15 सेकंड की एक रील करोड़ों लोगों की सोच को बदल सकती है — और कोई नहीं पूछता कि ये सही है या नहीं।

चीन ने जब ऐसी ही समस्या देखी, तो तुरंत क़दम उठाया। अब वहाँ जो भी स्वास्थ्य, फ़ाइनेंस, क़ानून या शिक्षा पर कंटेंट डालना चाहता है, उसे अपनी क़ाबिलियत साबित करनी पड़ती है। सज़ा भारी नहीं, पर संदेश साफ़ है — ज़िम्मेदारी के बिना असर नहीं।

भारत में भी आईटी नियम 2021 हैं, जो सरकार को आपत्तिजनक कंटेंट हटाने का अधिकार देते हैं, मगर तब जब कोई शिकायत करे। तब तक वीडियो लाखों बार देखा जा चुका होता है।

भारत को सेंसरशिप नहीं, बल्कि जवाबदेही चाहिए।
सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत एक “सोशल मीडिया मानक परिषद” (Social Media Standards Council) बनाई जा सकती है, जो:

हेल्थ, फ़ाइनेंस या क़ानून से जुड़े कंटेंट डालने वालों की जाँच करे,
अश्लील या हिंसक वीडियो को चिन्हित कर नीचे करे,
बार-बार ग़लत जानकारी फैलाने वालों को सस्पेंड करे,
और सच्चे, जिम्मेदार क्रिएटर्स को बढ़ावा दे।

जैसे फ़िल्म सेंसर बोर्ड सिनेमाघरों में मर्यादा बनाए रखता है, वैसे ही सोशल मीडिया के लिए भी एक हल्की लेकिन असरदार निगरानी ज़रूरी है — ताकि आज़ादी बनी रहे, पर अराजकता नहीं फैले।

हर ख़तरनाक रील के पीछे एक ख़ालीपन है — देखा जाने की, सुना जाने की, क़द्र पाने की तलब।

नौकरी, मौके और उम्मीदें कम होती जा रही हैं। ऐसे में सोशल मीडिया एक झूठा सुकून देता है — कुछ सेकंड की शोहरत, थोड़ी सी पहचान। मगर यह पहचान अक्सर ज़िल्लत, मौत या गिरावट में बदल जाती है।

कितने और राकेश मरेंगे कुछ “व्यूज़” के लिए?
अगर हमने अब भी रोक नहीं लगाई, तो रील लाइफ़ हमारी असली ज़िंदगी को निगल जाएगी।

हमपर FIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई। पंजाब सरकार के वकील कन्फ्यूज्ड नज़र आए

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अनुपम के सिंह

दिल्ली । जज: FIR की कॉपी ला कर दीजिए।

सरकारी वकील: हमारी जानकारी में कोई FIR नहीं है।

जज: फिर मैं लिख देता हूँ कि उक्त व्यक्तियों पर राज्य में कोई FIR नहीं है।

वकील: नहीं-नहीं… हो सकता है हो भी! लेकिन इतना बड़ा राज्य है, हमें कैसे पता होगा…

जज: तो पता कीजिए… सप्ताह भर बाद हमें FIR (यदि हुई है) की कॉपी चाहिए।

वकील: जी!
—-

पत्रकारों को धमकाने के लिए राज्य सरकारें किस स्तर तक जाती हैं, उसका यह एक उदाहरण मात्र है। FIR की बातें सोशल मीडिया पर डाल दो कि हमने सैकड़ों लोगों पर FIR कर दी है। बड़े नेताओं से पोस्ट करवाओ कि अब तो इनकी खैर नहीं।

राजनैतिक रोटी सेंकने के लिए पत्रकार तवा बन जाते हैं। दो दिन का हो-हल्ला होता है, बात दब जाती है। उनका लक्ष्य सध जाता है कि हम फलाँ समूह के लिए बहुत चिंतित हैं। उनको नया विषय मिल जाता है।

एक पत्रकार के समक्ष दो विकल्प होते हैं। डर कर बोलना-लिखना छोड़ दे, यह स्वीकार ले कि सरकार से आप नहीं भाग सकते। या यह कि, चाहे जो हो जाए हम जो कर रहे हैं, वो करते रहेंगे।

मेरे जैसे व्यक्ति के लिए तो स्थिति और विचित्र होती है। हमें न्याय भी वहीं से माँगना होता है, जिस संस्था की आलोचना हम करते रहे हैं। यह भी सत्य है कि पूरी संस्था में हर कोई यशवंत वर्मा ही नहीं होता, कुछ कर्तव्यनिष्ठ लोग भी होते हैं।

आप आशा की वही डोर पकड़ कर इस युद्ध में उतरते हैं।

राजद के नेतृत्व में प्रमुख बाहुबली परिवार चुनावी मैदान में

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पटना। बिहार की राजनीति हमेशा से ही बाहुबलियों की छाया में रही है, लेकिन 2025 के विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने इसे एक कला में बदल दिया है। अपराध के काले इतिहास वाले परिवारों को टिकट बांटकर वोटों की फसल लूटने की यह रणनीति न केवल नैतिक पतन की मिसाल है, बल्कि बिहार के भविष्य को भी खतरे में डाल रही है। जहां अन्य पार्टियां जैसे भाजपा, जेडीयू या कांग्रेस में दागदार उम्मीदवारों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती है, वहीं आरजेडी का घोषणापत्र ही बाहुबली वंशवाद का प्रतीक बन गया है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाली यह पार्टी अपराधियों की विरासत को ‘राजनीतिक न्याय’ का नाम देकर बिहार को फिर से गुंडाराज की ओर धकेलना चाहती है। क्या यह लोकतंत्र है या अपराध की राजनीति? आइए, इन प्रमुख बाहुबली परिवारों पर नजर डालें, जो चुनावी मैदान में आरजेडी के सहारे उभर रहे हैं।

अनंत बनाम सूरजभान

सबसे पहले बात मोकामा की, जहां अनंत सिंह परिवार की छाया आज भी भय का प्रतीक है। जेडीयू ने अनंत सिंह को टिकट देकर उन्हें मैदान में उतारा है, लेकिन यह वही सीट है जिसे 2020 के उपचुनाव में आरजेडी के सहयोगी ने जीता था। अनंत सिंह पर हथियार रखने और अपहरण जैसे दर्जनों मुकदमे हैं। मोकामा की राजनीति ‘अनंत बनाम सूरजभान परिवार’ की परंपरागत जंग बन चुकी है, जहां हिंसा और बदले की आग कभी ठंडी नहीं पड़ती।

आरजेडी इस जंग को भुनाने के बजाय, सूरजभान सिंह परिवार को अप्रत्यक्ष समर्थन देकर खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश कर रही है। सूरजभान सिंह खुद चुनावी दौड़ में नहीं हैं, लेकिन उनकी पत्नी वीणा देवी आरजेडी टिकट पर मैदान में हैं। यह टक्कर ‘बाहुबल बनाम बाहुबल’ की होनी है, जो बिहार के ग्रामीण इलाकों को फिर से रक्तरंजित कर सकती है। आरजेडी क्यों ऐसे परिवार को संरक्षण दे रही है? साफ है, वोट बैंक की लालच में अपराध को वैधता प्रदान करना।

आरजेडी का चेतन आनंद पर विश्वास

कोसी और सीमांचल के इलाके में आनंद मोहन परिवार की दहशत आज भी बरकरार है। पूर्व राजद सांसद आनंद मोहन, जिन्हें ‘राजपूत बाहुबली’ कहा जाता है, आजीवन कारावास की सजा काट चुके हैं। उनके अपराधों की फेहरिस्त लंबी है—हत्या, अपहरण से लेकर गुंडागर्दी तक। फिर भी, उनके बेटे चेतन आनंद को आरजेडी ने नवीनगर से टिकट थमा दिया है। आनंद मोहन की सामाजिक पकड़ अभी भी मजबूत है, और आरजेडी इसे जातिगत समीकरण साधने के लिए इस्तेमाल कर रही है। क्या बिहार के युवाओं को ऐसे अपराधी वंशजों से प्रेरणा लेनी चाहिए? यह परिवार की राजनीति नहीं, अपराध की निरंतरता है, जिसे आरजेडी चुपचाप प्रोत्साहित कर रही है।

अनिता देवी राजद की प्रॉक्सी उम्मीदवार

वारिसलीगंज सीट पर आरजेडी का यह खेल और भी साफ दिखता है। तेजस्वी यादव ने बाहुबली अशोक महतो की पत्नी अनीता देवी को फिर से टिकट दिया है। अशोक महतो पर हत्या और अपराध के सैकड़ों केस हैं, और उनकी पत्नी को ‘प्रॉक्सी’ बनाकर चुनाव लड़ाना आरजेडी की पुरानी चाल है। उनका मुकाबला भाजपा की अरुणा देवी से है, जो स्वर्गीय अखिलेश सिंह (दूसरे बाहुबली) की पत्नी हैं। यह ‘दो बाहुबलियों की पत्नियों’ के बीच टक्कर सबसे चर्चित है, लेकिन सवाल यह है कि आरजेडी क्यों अपराध की इस होड़ को बढ़ावा दे रही है? वोटों के लिए नैतिकता की बलि चढ़ाना बिहार की छवि को धूमिल कर रहा है।

आरजेडी से शुक्ला परिवार को उनकी जागीर समझी जाने वाली सीट

वैशाली के लालगंज में मुन्ना शुक्ला परिवार की कहानी भी कम आपराधिक नहीं है। पूर्व बाहुबली विधायक मुन्ना शुक्ला की बेटी शिवानी शुक्ला आरजेडी टिकट पर चुनाव लड़ रही हैं। यह सीट लंबे समय से शुक्ला परिवार की जागीर रही है, जहां अपराध और राजनीति का घालमेल आम है। मुन्ना पर हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आरोप हैं, फिर भी आरजेडी उन्हें विरासत सौंप रही है।

शाहबुद्दीन का बेटा भी मैदान में

इसी तरह, सीवान के रघुनाथपुर में दिवंगत राजद बाहुबली मोहम्मद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब को टिकट मिला है। शहाबुद्दीन की गुंडागर्दी की यादें अभी ताजा हैं—हत्या, जबरन वसूली से लेकर न्यायपालिका पर दबाव तक। ओसामा लंदन से कानून पढ़कर लौटे हैं, लेकिन पिता की विरासत को जीवित रखने का मतलब अपराध को वैधता प्रदान करना है। आरजेडी का यह फैसला सीवान को फिर से अराजकता की ओर ले जा सकता है।

बाहुबली मंत्री के परिवार से

नवादा में राजवल्लभ यादव परिवार की विभा देवी को आरजेडी ने फिर से मैदान में उतारा है। राजवल्लभ को ‘बाहुबली मंत्री’ कहा जाता था, और उनकी पत्नी की पहचान ‘बाहुबली की बीवी’ से ही जुड़ी है। अपराध के केसों की परतें अभी भी खुले हैं। तरारी सीट पर पूर्व जदयू विधायक सुनील पांडेय के बेटे विशाल प्रशांत उम्मीदवार हैं, लेकिन यहां भी आरजेडी का अप्रत्यक्ष समर्थन दिखता है। मगध क्षेत्र के युवा चेहरे के रूप में विशाल को प्रोजेक्ट करना वंशवाद का नया रूप है।

आरजेडी की यह रणनीति बिहार को पीछे धकेल रही है। अपराधियों के परिवारों को टिकट देकर पार्टी न केवल वोट बटोर रही है, बल्कि लोकतंत्र को अपराध का शिकार बना रही है।

अन्य पार्टियां जहां सुधार की दिशा में कदम बढ़ा रही हैं, वहीं आरजेडी पुरानी सोच में अटकी हुई है। बिहार के मतदाताओं को सोचना होगा—क्या हम अपराध की जंजीरों में बंधे रहना चाहते हैं?

विकास, शिक्षा और रोजगार की बजाय बाहुबलियों की विरासत चुनना आत्मघाती होगा। समय है कि बिहार की जनता इस वंशवादी राजनीति को ठुकराए और एक स्वच्छ, अपराधमुक्त भविष्य का निर्माण करे। अन्यथा, बाहुबलियों का साया कभी न मिटेगा।

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