‘भाभीजी’ ने रवीश कुमार को दिया सलीके से जवाब

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नेहा निहारिका चौहान

रवीश जी,

आप मेरा शो इतना ध्यान से देखते हैं।

बस एक हीं शिकायत है कि आप तो चुनावी निकलें, मैं सालों से ठेठ देसी बोली/भाषा में अपने इसी शो के जरिए बिहार के खेत-खलिहान,सड़कों और गलियों में लोगों से हर मुद्दे पर बतियाती रहती हूँ। आपसे और आपकी Research team से ये उम्मीद नहीं थी। पता नहीं,आपकी बिहार चुनाव के दौरान हीं मेरे शो पर नजर पड़ी। चलिए,देर से हीं आएं..मेरा शो नियमित रूप से देखते रहिए।

बाकी आपने बहुत पहले एक बार मेरे एक performance पर 👇 सराहना भरे शब्द लिखे थें तो मुझे लगा था कि आपकी शख्सियत Progressive सोच की है और महिलाओं को आगे बढ़ते देख, आपको अच्छा लगता है। लेकिन अफसोस कि आप भी उसी पुरूषवादी मानसिकता से ग्रसित हैं, जिस मानसिकता से पान की दुकान पर सिगरेट फूंकते लड़के महिलाओं को ‘वस्तु’ समझ कर टिप्पणी करते हैं।

सालों से मुझे इसी “भाभीजी” नाम से स्नेह और सम्मान मिला। छोटे बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक किसी ने कभी भी मेरे साथ कोई गंदा मजाक या दुर्व्यवहार नहीं किया। शायद,इसका कारण यह है कि हमारे बिहार और हमारी भारतीय संस्कृति में ‘भाभी’ की तुलना सीता से की गई है। माँ और स्नेह की प्रतिमूर्ति के रूप में देखा गया है।
अंत में एक बार फिर से बिहार की इस महिला पत्रकार “भाभीजी” की तरफ से असीम शुभकामनाएं।

बाकी आप इसी तरह मेरा शो देखते रहिये और राहुल गाँधी को शांति का ‘नोबेल पुरस्कार’ दिलाने के लिए अपनी कड़ी मेहनत जारी रखिये।

नेहा निहारिका चौहान

आंबेडकरी विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

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दिल्ली। आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने ग्वालियर के एक कांग्रेसी वकील अनिल मिश्रा पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग की है, क्योंकि उन्होंने बीएन राऊ को संविधान निर्माता माना। यह मांग अतिवादी और गैर-आंबेडकरी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान का मूलभूत अधिकार है। कोई व्यक्ति बीएन राऊ को संविधान निर्माता माने, तो यह उसका वैचारिक अधिकार है, भले ही यह ऐतिहासिक रूप से गलत हो। सत्य स्पष्ट है कि बीएन राऊ संविधान सभा के सदस्य नहीं थे, पर उनकी और एसएन मुखर्जी की कानूनी विशेषज्ञता को बाबा साहब आंबेडकर ने सराहा था। दोनों ने संविधान निर्माण में सहयोग किया, पर बाबा साहब ही इसके प्रमुख शिल्पी थे।

बीएन राऊ को संविधान निर्माता मानना तथ्यात्मक भूल हो सकती है, लेकिन इसे देशद्रोह कहना अतिशयोक्ति है। देशद्रोह का मुकदमा न केवल कानूनी रूप से कमजोर होगा, बल्कि यह समाज में अशांति भी फैला सकता है। क्या जबरन किसी महान व्यक्ति का सम्मान करवाना लोकतंत्र है? आम आदमी पार्टी पर दलित विरोधी होने का आरोप है, और दिल्ली में हार के बाद शायद यही कारण है कि वे बाबा साहब के प्रति अतिरिक्त भक्ति दिखा रहे हैं। यह कहावत कि “नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है” यहाँ चरितार्थ होती है।

बाबा साहब ने अपने जीवन में आलोचनाओं का जवाब तर्क और लेखन से दिया। उनकी किताबें, जैसे एनिहिलेशन ऑफ कास्ट, उनकी तर्कशक्ति का प्रमाण हैं। उन्होंने ग्रंथों की आलोचना की, लेकिन दयाभाग सिद्धांत का उपयोग कर महिलाओं के संपत्ति अधिकारों का समर्थन भी किया। बौद्ध धम्म और आंबेडकरी विचार में कोई भी व्यक्ति या विचार आलोचना से परे नहीं है, चाहे वह तथागत बुद्ध हों या बाबा साहब। 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में बाबा साहब ने कहा था कि किसी को देवता न बनाएं, क्योंकि इससे लोकतंत्र को खतरा है।

कांग्रेस को अनिल मिश्रा पर कार्रवाई करनी चाहिए, और यदि वे शांति भंग करते हैं, तो बीएनएस की धाराओं के तहत कार्रवाई हो सकती है। लेकिन देशद्रोह जैसे सख्त कानून का दुरुपयोग, जो नेहरू के पहले संविधान संशोधन से प्रचलित हुआ, संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। आंबेडकरी तरीका तर्क और संवाद है, न कि दमन।

आम आदमी पार्टी का जूता-कल्चर: लोकतंत्र पर थूकना और अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटना

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आज के दौर में, जब लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हो रही हैं, राजनीतिक दल अपनी सिद्धांतों को बाजार की तरह बेचने लगे हैं। लेकिन आम आदमी पार्टी (आप) का मामला इससे भी कहीं ज्यादा शर्मनाक और पाखंडी है। एक तरफ यह पार्टी खुद को ‘आम आदमी’ का मसीहा बताती है, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ती है और अभिव्यक्ति की आजादी का ढिंढोरा पीटती है। दूसरी तरफ, वही पार्टी हिंसा, अपमान और दमन के प्रतीक ‘जूता फेंकने’ वालों को न सिर्फ संरक्षण देती है, बल्कि उन्हें राजनीतिक ऊंचाइयों पर बिठा भी देती है। और जब वही हिंसा किसी और पर होती है, तो सख्त कार्रवाई की मांग करती है। हाल ही में पंजाब की आप सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर सीजेआई ‘जूता कांड’ की आलोचना करने वालों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं में एफआईआर दर्ज कराना इसी पाखंड की इंनाम है। यह न सिर्फ आप की दोहरी नैतिकता को उजागर करता है, बल्कि उनके लोकतंत्र को ठगने के अपराध को उजागर करता है।

जूता फेंकना लोकतंत्र का अपमान है-चाहे वह किसी पर हो । सबसे पहले, 2009 का वह कुख्यात जूता-कांड याद करें। पत्रकार जरनैल सिंह ने तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम पर जूता फेंका था। कारण था 1984 के सिख विरोधी दंगों में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा कांग्रेस नेताओं को क्लीन चिट देना। यह घटना अपमानजनक थी, और जरनैल सिंह को गिरफ्तार भी किया गया। लेकिन क्या हुआ आगे? चिदंबरम ने शिकायत नहीं की, लेकिन कानून ने अपना काम किया। फिर आया आप का ‘स्वागत समारोह’। 2013 में आप ने जरनैल सिंह को दिल्ली विधानसभा चुनाव में टिकट दिया, और वे राजौरी गार्डन से विधायक बने। 2014 में लोकसभा चुनाव में पश्चिम दिल्ली से उम्मीदवार बने, भले ही हार गए। 2015 में फिर विधायक बने। आप ने इस ‘जूते वाले नायक’ को न सिर्फ सम्मान दिया, बल्कि पार्टी का चेहरा बनाया। अरविंद केजरीवाल ने खुद जरनैल को ‘सिख अधिकारों का योद्धा’ कहा। लेकिन सवाल यह है: क्या जूता फेंकना लोकतांत्रिक विरोध का तरीका है? नहीं। यह हिंसा है, अपमान है। आप ने इसे पुरस्कृत करके हिंसा को वैध ठहराया। जरनैल सिंह का 2021 में निधन हो गया, लेकिन आप का यह ‘जूता-मॉडल’ आज भी जिंदा है—एक ऐसा मॉडल जो कहता है: ‘ जूता फेंककर अपमान करो, हम तुम्हें टिकट देंगे।’

अब गुजरात का मामला लें, जो आप की इस नीति का और साफ आईना है। मार्च 2017 में, गुजरात के युवा कार्यकर्ता गोपाल इटालिया ने गृह राज्यमंत्री प्रदीप सिंह जडेजा पर जूता फेंका। आरोप था गुजरात में भ्रष्टाचार का। इटालिया को तत्काल गिरफ्तार किया गया, सरकारी नौकरी से निलंबित कर दिया गया। लेकिन आप ने क्या किया? 2020 में उन्हें गुजरात इकाई का उपाध्यक्ष बनाया। 2022 में विधानसभा चुनाव लड़ा, हारा लेकिन पार्टी का चेहरा बना। फिर 2025 के विशावदार उपचुनाव में जीतकर विधायक बने। आप ने इटालिया को न सिर्फ माफ किया, बल्कि प्रमोट किया। केजरीवाल ने कहा, ‘गोपाल जैसे युवा ही बदलाव लाएंगे।’ लेकिन बदलाव का मतलब हिंसा को बढ़ावा देना? जूता फेंकना विरोध नहीं, अपराध है। भारतीय दंड संहिता की धारा 323 (चोट पहुंचाना) और 504 (अपमान) के तहत यह दंडनीय है। आप ने इसे ‘क्रांति’ का नाम देकर लोकतंत्र को चोट पहुंचाई। अगर आप भ्रष्टाचार के खिलाफ है, तो बहस करो, अदालत जाओ—जूता क्यों?

ये दो उदाहरण ही काफी हैं आप के ‘जूता-संरक्षण’ को साबित करने के लिए। पार्टी ने ऐसे लोगों को टिकट देकर संदेश दिया: ‘हिंसा करो, हम तुम्हें सत्ता का स्वाद चखाएंगे।’ लेकिन अब देखिए उल्टा खेल। अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट में वकील राकेश किशोर ने चीफ जस्टिस बी.आर. गवई के एक टिप्पणी को ‘सनातन धर्म का अपमान’ बताकर, जूता फेंकने की कोशिश की। । यह घटना शर्मनाक थी-न्यायपालिका पर हमला। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने किशोर को निलंबित कर दिया, पुलिस ने पूछताछ की। लेकिन आप का रुख? केजरीवाल ने तुरंत कहा, ‘यह पूर्वनियोजित साजिश है। ऐसी कार्रवाई हो कि कोई आगे हिम्मत न करे।’ उन्होंने इसे ‘न्यायपालिका पर हमला’ और ‘दलितों को दबाने की कोशिश’ कहा। सही है, लेकिन पाखंड क्यों? जब जरनैल या गोपाल ने जूता फेंका, तो आप ने कहा ‘योद्धा’। अब सीजेआई पर जूता, तो ‘सख्त सजा’। यह दोहरा मापदंड नहीं तो क्या?

पंजाब की आप सरकार का सोशल मीडिया दमन, सबसे ताजा घाव है। अक्टूबर 2025 के ‘जूता कांड’ (संभवतः सीजेआई घटना या कोई स्थानीय घटना से जुड़ा) पर सोशल मीडिया पर आलोचना करने वाले आम लोगों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं (आईपीसी 153A, 505—सांप्रदायिकता भड़काना और लोक शांति भंग) में एफआईआर दर्ज। पंजाब पुलिस ने कई यूजर्स को नोटिस भेजे, फोन टैपिंग शुरू की। मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा, ‘फेक न्यूज फैलाने वालों को बख्शेंगे नहीं।’ लेकिन सवाल: आलोचना फेक न्यूज कैसे? जूता फेंकना गलत है, इस पर बहस करना अभिव्यक्ति की आजादी है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत यह मौलिक अधिकार है। आप ने इसे कुचलकर दिखा दिया कि सत्ता मिलते ही ‘आम आदमी’ दुश्मन बन जाता है। कल को ये वही लोग ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का रोना रोएंगे—जैसे केजरीवाल ने दिल्ली में बीजेपी के खिलाफ किया। लेकिन शर्म? बिल्कुल नहीं। पंजाब में पहले भी आप ने विपक्षी नेताओं पर ऐसे ही केस लगाए—2024 में किसान आंदोलन की आलोचना पर। यह तानाशाही नहीं तो क्या?

आप की यह राजनीति लोकतंत्र के लिए जहर है। शुरू में 2011-12 में भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से उभरी, लेकिन सत्ता की भूख ने इसे ‘जूता-व्यापारी’ बना दिया। दिल्ली में 49 दिन की सरकार, फिर पंजाब-गुजरात में विस्तार-हर जगह वादे टूटे। शिक्षा-स्वास्थ्य के नाम पर प्रचार, लेकिन जूता फेंकने वालों को टिकट? यह युवाओं को गलत संदेश देता है: हिंसा से सफलता मिलेगी। 2025 तक आप के पास 100 से ज्यादा विधायक हैं, लेकिन कितने ‘जूते’ वाले? जरनैल, गोपाल-और कितने छिपे? केजरीवाल खुद कहते हैं ‘सिस्टम चेंज’, लेकिन सिस्टम को जूते से कैसे बदलोगे? अदालतें, बहस, वोट-ये हथियार हैं। जूता नहीं।

इस पाखंड से आप को बाहर आना चाहिए। पार्टी के अंदर जो जूता फेंककर नेता बने हैं, उनको पार्टी से बाहर करो। जिन पत्रकारों ने इस मुद्दे पर चर्चा की, अपनी बात कही है। उन पर एफआईआर वापस लो, वरना देश से ‘आम आदमी – राज ‘ और ‘जूता-राज’ का फर्क मिट जाएगा। लोकतंत्र मजबूत हो, हिंसा कम हो—यह पंजाब की आप सरकार का कर्तव्य है। लेकिन लगता है, सत्ता की मस्ती में भूल गए। केजरीवालजी ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का सम्मान करो। फर्जी मुकदमें वापस लो। वरना इतिहास तुम्हें ‘जूता-पार्टी’ ही लिखेगा।

इस्माइल दरबार के बयान पर विवाद: गौहर खान के अभिनय पर आपत्ति, फेमिनिस्टों की चुप्पी पर सवाल

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सोनाली मिश्रा

मुंबई: मशहूर संगीतकार इस्माइल दरबार ने अपनी बहू, अभिनेत्री गौहर खान के फिल्मों में अभिनय करने पर आपत्ति जताई है। विकी लालवानी को दिए साक्षात्कार में दरबार ने कहा कि उन्हें गौहर का शादी और मां बनने के बाद अभिनय करना पसंद नहीं है। उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी आयशा का उदाहरण देते हुए कहा कि आयशा ने अपने बच्चे की खातिर काम छोड़ दिया, भले ही वह महीने में 5 लाख रुपये कमा रही थीं। दरबार ने यह भी कहा कि वह गौहर के किसी भी अभिनय दृश्य को नहीं देखते, क्योंकि इससे उन्हें असहजता होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि गौहर के पति, उनके बेटे जैद ही उन्हें सलाह दे सकते हैं।

दरबार ने अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए कहा, “मैं एक रूढ़िवादी परिवार से आता हूं। अंतरंग दृश्य देखकर हम इधर-उधर चले जाते थे, और यह आज भी जारी है। गौहर अब हमारे परिवार का हिस्सा है, और उसकी इज्जत की जिम्मेदारी हमारी है।” उन्होंने खुलकर कहा कि वह ऐसे दृश्यों को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे और जरूरत पड़ी तो इसका विरोध भी करेंगे।

इस बयान ने सोशल मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग में बहस छेड़ दी है। हालांकि, आश्चर्यजनक रूप से, फेमिनिस्ट और सामाजिक आंदोलनकारी इस मामले पर खामोश हैं। अगर यही बात किसी हिंदू परिवार से जुड़े व्यक्ति ने कही होती, तो शायद अब तक फेमिनिस्ट संगठन और साहित्यकार पितृसत्ता और मनुवाद के खिलाफ लेख और कविताएं लिख चुके होते। सोशल मीडिया पर तथाकथित प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की यह चुप्पी सवाल उठाती है कि क्या उनकी आलोचना धर्म-विशेष तक सीमित है?

यह दोहरा रवैया तब और स्पष्ट होता है, जब मुस्लिम परिवारों से जुड़े पितृसत्तात्मक बयानों पर फेमिनिस्ट समूह चुप्पी साध लेते हैं। गौहर खान, जो एक स्वतंत्र और सफल अभिनेत्री हैं, के बारे में इस तरह की टिप्पणी न केवल उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सवाल उठाती है, बल्कि समाज में महिलाओं की भूमिका पर भी बहस छेड़ती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि फेमिनिस्ट आवाजें तब ही उठती हैं, जब मुद्दा उनकी विचारधारा के अनुकूल हो।

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