अंतरराष्ट्रीय योग दिवस : भारत की प्राचीन साधना से वैश्विक स्वास्थ्य आंदोलन तक

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लखनऊ। मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ ऐसी परंपराएँ होती हैं जो समय, भूगोल और संस्कृति की सीमाओं को पार कर पूरी मानवता की धरोहर बन जाती हैं। योग ऐसी ही एक विरासत है। हजारों वर्षों पूर्व भारतीय मनीषियों द्वारा विकसित यह जीवन-पद्धति आज विश्व के लगभग हर भाग में सम्मान और उत्साह के साथ अपनाई जा रही है। कभी आश्रमों, तपोवनों और साधना स्थलों तक सीमित रहने वाला योग आज विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, कार्यालयों, अस्पतालों, खेल संस्थानों और सामुदायिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यही कारण है कि प्रत्येक वर्ष 21 June को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय योग दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि स्वस्थ, संतुलित और जागरूक जीवन के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता का प्रतीक बन गया है।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का इतिहास अपेक्षाकृत नया है, लेकिन इसकी जड़ें अत्यंत गहरी हैं। वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के समक्ष योग को वैश्विक स्तर पर मान्यता देने का प्रस्ताव रखा गया। इस विचार को विश्व समुदाय का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ और 11 December 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 June को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित कर दिया। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस प्रस्ताव को रिकॉर्ड संख्या में सदस्य देशों का समर्थन प्राप्त हुआ, जो योग की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण था। इसके बाद 21 June 2015 को पहली बार विश्व स्तर पर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया। तब से लेकर आज तक यह दिवस स्वास्थ्य, संतुलन और सामूहिक कल्याण का वैश्विक उत्सव बन चुका है।

21 June को योग दिवस के लिए चुना जाना भी विशेष महत्व रखता है। यह वर्ष का सबसे लंबा दिन माना जाता है और भारतीय परंपरा में इसे ऊर्जा, जागरूकता और आंतरिक विकास से जोड़कर देखा जाता है। प्रकृति के इस विशेष कालखंड को मानव जीवन में संतुलन और साधना के प्रतीक के रूप में भी समझा जाता है। इसलिए यह तिथि योग के सार्वभौमिक संदेश को प्रसारित करने के लिए उपयुक्त मानी गई।

यदि योग की उत्पत्ति की बात करें तो इसकी जड़ें भारतीय सभ्यता के अत्यंत प्राचीन काल तक पहुँचती हैं। वैदिक साहित्य, उपनिषद, महाभारत और अनेक दार्शनिक ग्रंथों में योग संबंधी विचारों का उल्लेख मिलता है। भारतीय चिंतन परंपरा में योग का विकास केवल शरीर को स्वस्थ रखने की तकनीक के रूप में नहीं हुआ, बल्कि जीवन के गहन प्रश्नों को समझने की प्रक्रिया के रूप में हुआ। भारतीय ऋषियों ने मनुष्य के शरीर, मन, बुद्धि और चेतना के संबंधों का सूक्ष्म अध्ययन किया और अनुभव के आधार पर ऐसी पद्धतियाँ विकसित कीं जो व्यक्ति को आत्मानुशासन तथा आत्मबोध की दिशा में ले जाती हैं।

योग की व्यवस्थित व्याख्या में महर्षि पतंजलि का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है। उन्होंने योग को एक संगठित दर्शन के रूप में प्रस्तुत किया। समय के साथ विभिन्न परंपराओं में योग के अनेक स्वरूप विकसित हुए। कहीं ध्यान को अधिक महत्व मिला, कहीं प्राणायाम को, तो कहीं शारीरिक आसनों को। किंतु इन सभी का मूल उद्देश्य मनुष्य के जीवन में संतुलन और सजगता स्थापित करना रहा।

योग को केवल व्यायाम समझ लेना उसकी व्यापकता को सीमित कर देना होगा। वास्तव में योग जीवन जीने की एक समग्र पद्धति है। यह व्यक्ति को अपने शरीर की आवश्यकताओं को समझना सिखाता है, अपने मन की चंचलता को नियंत्रित करना सिखाता है और जीवन के प्रति संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने में सहायता करता है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता में मनुष्य अनेक प्रकार के दबावों से घिरा रहता है। काम का तनाव, समय की कमी, अनियमित दिनचर्या और डिजिटल उपकरणों पर बढ़ती निर्भरता मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। योग इन परिस्थितियों में संतुलन स्थापित करने का सरल और प्रभावी माध्यम बनकर सामने आता है।

योग का शारीरिक महत्व अत्यंत व्यापक है। नियमित अभ्यास से शरीर की लचक बढ़ती है, मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं और शरीर का संतुलन बेहतर होता है। श्वास संबंधी अभ्यास फेफड़ों की कार्यक्षमता को सुदृढ़ बनाने में सहायक माने जाते हैं। इसके साथ ही योग व्यक्ति को अपने शरीर के प्रति सजग बनाता है। यह सजगता स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा देती है, जो दीर्घकालिक स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है।

मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में योग की उपयोगिता और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। आज तनाव, चिंता और मानसिक असंतुलन विश्वव्यापी चुनौतियाँ बन चुके हैं। ऐसी स्थिति में ध्यान, श्वास नियंत्रण और एकाग्रता से जुड़ी योग पद्धतियाँ मन को शांत करने में सहायता करती हैं। योग व्यक्ति को वर्तमान क्षण में जीना सिखाता है। यह जीवन की कठिन परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने और भावनात्मक संतुलन विकसित करने में भी सहायक हो सकता है। इसी कारण विश्वभर में मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में भी योग को महत्व दिया जाने लगा है।

योग का महत्व केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसका सामाजिक आयाम भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। योग अनुशासन, संयम, सहिष्णुता और आत्मनियंत्रण जैसे गुणों को विकसित करता है। जब व्यक्ति स्वयं के भीतर संतुलन स्थापित करता है, तो उसके व्यवहार में भी सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देता है। इससे परिवार, समाज और कार्यस्थल पर बेहतर संबंधों का निर्माण होता है। योग का संदेश प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सामंजस्य का संदेश है। यही कारण है कि इसे शांति और सद्भाव की संस्कृति से भी जोड़ा जाता है।

योग का एक महत्वपूर्ण पक्ष पर्यावरणीय चेतना से भी जुड़ा हुआ है। भारतीय परंपरा में मनुष्य और प्रकृति को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। योग व्यक्ति को यह अनुभव कराता है कि उसका अस्तित्व प्रकृति से अलग नहीं है। जब मनुष्य अपने भीतर संतुलन विकसित करता है, तब वह जल, वायु, भूमि और जैव विविधता के प्रति भी अधिक संवेदनशील बनता है। इसलिए योग का दर्शन केवल व्यक्तिगत कल्याण तक सीमित नहीं है; यह पृथ्वी और समस्त जीव-जगत के प्रति उत्तरदायित्व की भावना को भी प्रोत्साहित करता है।

आज विश्व के अनेक देशों में योग शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक कल्याण की योजनाओं का हिस्सा बन चुका है। लाखों लोग प्रतिदिन योगाभ्यास करते हैं और इसे अपने जीवन की दिनचर्या में शामिल कर चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर विभिन्न देशों में आयोजित सामूहिक कार्यक्रम यह दर्शाते हैं कि योग ने भाषाओं, संस्कृतियों और राष्ट्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर मानवता को जोड़ने का कार्य किया है।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 हमें यह स्मरण कराता है कि आधुनिकता और परंपरा परस्पर विरोधी नहीं हैं। प्राचीन ज्ञान और आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकता है। योग इसी संतुलन का जीवंत उदाहरण है। यह हमें बताता है कि स्वस्थ जीवन केवल शारीरिक क्षमता का प्रश्न नहीं, बल्कि मानसिक स्पष्टता, भावनात्मक स्थिरता और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण का भी विषय है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि योग को केवल एक दिवस तक सीमित न रखा जाए। यदि इसे जीवन की नियमित आदत बनाया जाए, तो इसके लाभ अधिक व्यापक रूप में अनुभव किए जा सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का वास्तविक उद्देश्य भी यही है कि योग जन-जन तक पहुँचे और स्वस्थ, जागरूक तथा संतुलित समाज के निर्माण में योगदान दे। भारत की इस प्राचीन धरोहर ने विश्व को स्वास्थ्य और सामंजस्य का जो मार्ग दिखाया है, वह आने वाले समय में भी मानवता के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

सरकारी कर्मचारियों की impunity: सस्पेंशन की आड़ में न्याय की हत्या

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दिल्ली। स्वतंत्र भारत में भी ब्रिटिश काल की एक खतरनाक परंपरा जीवित है—अपने कर्मचारियों को बचाना। सरकार इसे अपनी जिम्मेवारी समझती है। बड़े से बड़ा अपराध हो, सरकारी कर्मचारी पर उंगली उठाना मुश्किल। सस्पेंड कर दिया जाता है, वेतन आधा मिलता रहता है और जांच की आड़ में पूरा मामला ठंडा पड़ जाता है। जबकि आम आदमी के लिए वही अपराध जेल, जुर्माना और सामाजिक कलंक बन जाता है। यह दोहरा मापदंड न केवल न्याय की हत्या है, बल्कि लोकतंत्र की नींव को भी कमजोर करता है।

उदाहरण लें एक एसएचओ का। हत्या के मामले को दबाने के लिए रिश्वत लेता है और पकड़ा जाता है। उसे मात्र सस्पेंड कर दिया जाता है। सवाल उठता है—जिसने हत्यारे को बचाने में मदद की, उसे हत्या का साथी क्यों नहीं माना जाना चाहिए? उसकी नौकरी क्यों नहीं जाती? कानून की नजर में वह accessory to murder है, लेकिन विभागीय नियमों की दुनिया में वह केवल ‘विभागीय कार्यवाही’ का शिकार है। दुर्भाग्य यह कि इस अधिकारी ने पहले भी न जाने कितने मुकदमों में सच को झूठ और झूठ को सच बनाया होगा। उन पुराने मामलों की फिर कभी जांच नहीं होती। एक बार भ्रष्टाचारी पकड़ा गया तो उसके सारे पुराने फैसले संदिग्ध हो जाते हैं, लेकिन व्यवस्था इस सच्चाई को स्वीकार करने को तैयार नहीं।

यह समस्या ब्रिटिश विरासत है। अंग्रेज अपने अफसरों को बचाते थे क्योंकि वे साम्राज्य की रीढ़ थे। भारतीय Penal Code और पुलिस व्यवस्था उसी मानसिकता पर खड़ी हुई। Article 311 of the Constitution सिविल सेवकों को सुरक्षा देता है। उद्देश्य अच्छा था—arbitrary सजा से बचाना। लेकिन आज यह corrupt अधिकारियों के लिए ढाल बन गया है। सस्पेंशन temporary उपाय है, न कि सजा। जांच लंबी खिंचती है, आरोपी रिटायर हो जाता है या केस दबा दिया जाता है। Prevention of Corruption Act के तहत सजा का प्रावधान है, लेकिन conviction rate निराशाजनक है और मुकदमे दशकों चलते हैं।

परिणामस्वरूप impunity की संस्कृति पनपी है। पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका के बीच nexus मजबूत होता जा रहा है। शक्तिशाली अधिकारी जानते हैं कि worst case scenario में सस्पेंड होना पड़ेगा, लेकिन पद, पेंशन और प्रतिष्ठा बरकरार रहेगी।

न्याय की मूल भावना है—equality before law। Constitution के Article 14 में सभी नागरिक समान हैं। फिर सरकारी कर्मचारी को extra protection क्यों? वह जनता की सेवा के लिए है, जनता का मालिक नहीं। चूंकि उसके पास सत्ता और संसाधन हैं, उसकी जिम्मेवारी भी अधिक होनी चाहिए। भ्रष्टाचार या गंभीर अपराध में उसकी सजा आम आदमी से कड़ी होनी चाहिए। रिश्वत लेकर केस दबाने वाले एसएचओ को नौकरी से बर्खास्तगी के साथ आपराधिक मुकदमे में कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

समाधान क्या है? केंद्र और राज्य सरकारों को कानूनों की पुनर्व्याख्या करनी होगी। पहले, corruption और serious misconduct के मामलों में time-bound inquiry और trial सुनिश्चित करें—अधिकतम 6-12 महीने। दूसरे, convicted अधिकारी के पुराने फैसलों की अनिवार्य समीक्षा हो। तीसरे, Prevention of Corruption Act में संशोधन कर public servant के लिए enhanced punishment का प्रावधान लाएं। चौथे, पुलिस सुधारों को लागू करें—Prakash Singh दिशानिर्देशों के तहत पुलिस को राजनीतिक दबाव से मुक्त करें, fixed tenure दें और accountability commission बनाएं।

साथ ही, technology का इस्तेमाल बढ़ाएं—body cameras, digital FIR, e-governance। Whistleblower protection को मजबूत करें ताकि ईमानदार कर्मचारी भी आवाज उठा सकें। Singapore और Hong Kong के मॉडल से सीख लें जहां उच्च वेतन के साथ swift और severe punishment है, जिससे भ्रष्टाचार न्यूनतम स्तर पर है।

सरकारी कर्मचारी अगर अपराध करता है तो मात्र सस्पेंड नहीं, बल्कि दंडित होना चाहिए। उसकी सजा position के कारण और अधिक कड़ी होनी चाहिए। जब तक हम इस colonial mindset को नहीं छोड़ेंगे, आम आदमी का न्याय और विश्वास हासिल नहीं होगा। लोकतंत्र तभी सार्थक होगा जब कानून सबके लिए समान रूप से लागू हो—चाहे वह आम नागरिक हो या शक्तिशाली अधिकारी।

समय आ गया है कि हम सस्पेंशन की परंपरा को समाप्त करें और जवाबदेही की नई संस्कृति स्थापित करें। “सबका साथ, सबका विकास” तभी संभव है जब ‘सबका विश्वास’ भी हो।

challanpay.in पर भरोसा: सुविधा या जोखिम?

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दिल्ली। ट्रैफिक चालान का झंझट हर वाहन मालिक को परेशान करता है। ऐसे में ChallanPay.in जैसी सेवाएँ आकर्षक लगती हैं, जो Parivahan पोर्टल से चालान चेक करने, भुगतान करने और कोर्ट के मामलों को सुलझाने का वादा करती हैं। Lawyered स्टार्टअप का यह प्रोडक्ट फंडिंग हासिल कर चुका है और मीडिया में चर्चित रहा है, लेकिन यूजर्स के अनुभव ट्रस्ट के मुद्दों को उजागर करते हैं।

Lawyered (Gurugram-आधारित) ने 2025-26 में Rainmatter (Zerodha), Turbostart और अन्य से $2.5 मिलियन (लगभग ₹23 करोड़) की फंडिंग हासिल की। IdeaBaaz शो पर All-Titans डील भी मिली। कंपनी 30 लाख+ वाहनों की सुरक्षा और 2.5 लाख+ चालानों के समाधान का दावा करती है। वे कानूनी नेटवर्क के जरिए चालान रिजॉल्यूशन और कंटेस्ट करने की सुविधा देते हैं, जिसमें कन्वीनियंस फी शामिल है। वेबसाइट सुरक्षित लगती है और स्कैम अलर्ट भी जारी करती है।

फिर भी, विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। Instagram, Reddit और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर दर्जनों यूजर्स शिकायत करते हैं कि भुगतान के बाद भी सरकारी पोर्टल (echallan.parivahan.gov.in) पर स्टेटस अपडेट नहीं होता। सपोर्ट टीम कॉल डिसकनेक्ट कर देती है, रिफंड में देरी होती है और कई मामलों में चालान “Pending” ही रह जाता है। कुछ यूजर्स इसे “फ्रॉड” तक बता चुके हैं। Scam-Detector जैसी साइट्स पर इसका ट्रस्ट स्कोर मीडियम है।

मुख्य समस्याएँ:

भुगतान के बावजूद चालान क्लियर न होना
खराब कस्टमर सपोर्ट
रिफंड की देरी
थर्ड-पार्टी फीस के बावजूद कोई गारंटी नहीं

जितना संभव हो, सरकारी वेबसाइट https://echallan.parivahan.gov.in/ का इस्तेमाल करें। ChallanPay जैसी सेवाएँ केवल जटिल कोर्ट केस में छोटी राशि से ट्राई करें और भुगतान के तुरंत बाद खुद स्टेटस वेरिफाई करें। हमेशा .gov.in वाले ऑफिशियल लिंक्स इस्तेमाल करें और अनऑफिशियल SMS/WhatsApp से बचें।

ChallanPay पूरी तरह स्कैम नहीं है, लेकिन इसकी सर्विस अभी पूरी तरह भरोसेमंद नहीं है। सुविधा की चकाचौंध में पैसे गँवाने से बेहतर है खुद सरकारी पोर्टल पर चेक करना। ट्रस्ट कमाने के लिए कंपनी को अपनी सपोर्ट और रिजॉल्यूशन रेट में सुधार करना होगा। सावधानी ही सबसे अच्छी नीति है।

मानसिक विक्षिप्त नही था भरत तिवारी, वह बलिदानी था

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शतरुद्र प्रताप सिंह

पटना। भरत तिवारी मानसिक विक्षिप्त नही था वह बहुत ज्यादा संवेदनशील युवा था , बहुत ही ज्यादा भावुक और ऐसा व्यक्ति अगर हिम्मतवाला भी हो जाये जिसे गांवों में कहते हैं शेरदिल कलेजा वाला , जिगरा वाला , तो ऐसा व्यक्ति शेर की मांद में , सांपो के बिल में हाथ डालने वाला हद दर्जे का हिम्मती होता है। ऐसा व्यक्ति जब भी कोई काम करेगा तो बहुत दिल से करेगा और जिस काम को करने का मन नही तो उससे ब्रम्हा भी वह कार्य नहीं करवा सकते… और यही इनकी कमज़ोरी बन जाती है, दिल से लगा लेना जबकि दिल के साथ दिमाग भी लगाना चाहिए आखिर भगवान ने दिमाग क्यों दिया है यह भी सोचना चाहिए।

इतिहास में जितने भी दिलवाले हुए हैं वह ऐसे ही मारे गए हैं …आप जिसके लिए लड़ते हैं वही दिमाग का इतना ज्यादा प्रयोग करता है कि वह पीछे हट जाता है जबकि थोड़ा सा भी दिल गांव वाले लगाए होते जिनके लिए भरत लड़ रहा था तो आज भरत तिवारी जिंदा होता।

नेता और व्यापारी को आप कितना भी गाली दीजिये लेकिन सत्ता और समाज की कमान इन्ही के हाथों रहेगी , जानते हैं क्यों ? क्योंकि ये दिमाग ज्यादा और दिल थोड़ा सा ही प्रयोग करते हैं…

भरत तिवारी लंबे समय से शासन ,सत्ता से अपने बाढ़ग्रस्त गांव के लिए गुहार लगा रहा था । वह लचर सिस्टम से परेशान हो चुका था और इतना ज्यादा भावुक हो उठा कि हथियार उठा लिया… यही पर उसने बड़ी गलती कर दिया…

बिहार राज्य के भोजपुर जिले का जवनियाँ गांव जो गंगा जी के बाढ़ से पूरा गांव ही जलमग्न होकर गंगा जी मे समा गया… विस्थापितों के पुनर्वास के लिए नेताओ और अधिकारियों के ही दौड़ लगा रहा था उसे मिलता था तो सिर्फ आस्वासन । शासन के अधिकारी और नेता मंन्त्री भी क्या करे?? ये सभी एक भ्रष्ट और अत्याचारी व्यवस्था के अधीन नौकरी और नेतागिरी करते है …

भरत को संघर्ष करना था तो रास्ता हथियार उठाने का नही था…. तुम्हे लड़ना था तो–

तुम लड़ते…
अनशन करते
चुनाव का बहिष्कार करते
समाज को अपने साथ खड़ा करते

और स्वयं चुनाव लड़ते …… भरत तिवारी हथियार न उठाकर ऐसी लड़ाई लड़ते जिसमे समाज अथवा जनता का सहयोग लेते तो निश्चित ही कुछ ही वर्षो में भरत तिवारी को पता चलता कि वह जिस जनता अथवा समाज के लिए लड़ रहा है उसी समाज और जनता ने ही भ्रष्ट अधिकारी , भ्रष्ट नेता और बेईमान व्यापारी को अपने वीर्य से पैदा किया है ( यही वीर्य का तात्पर्य पुरुषार्थ से है ) लेकिन भरत तिवारी ठहरे नितांत भावुक ,अति संवेदनशील और हद दर्जे के हिम्मती….

सारी गलती पुलिस की ही नही है , पुलिस का तो काम ही है सरकार के आदेशों का पालन करना और वह वही काम कर रही थी… कई दिनों से भरत हथियार उठा कर वीडियो बना कर अधिकारियों को मारने की धमकी दे रहे थे… पुलिस पकड़ने गयी तो अपने घर से पुलिस पर फायरिंग करने लगे … खुलेआम पुलिस को लड़ने की चुनौती देने लगे वह भी हथियार के साथ… समय समय पर अपने हथियार से फायरिंग भी करते… निश्चित रूप से यह दुस्साहसिक आपराधिक कृत्य था …

घेरा बंदी के बाद जब भरत तिवारी ने लाइव वीडियो बनाते हुए भ्रष्ट सत्ता शासन को ललकारते हुए अपने हथियार पुलिस के सामने फेंक कर समर्पण कर दिया और पुलिस कह भी रही कि तुम समर्पण करो हम कुछ नही करेंगे…जबकि पुलिस उसे मानसिक विक्षिप्त घोषित कर चुकी थी तो उसका इलाज करवाती लेकिन पुलिस ने आत्मसमर्पण करने के बाद भरत तिवारी को बंदूक के बट से मारा फिर कई गोली उसे मार दिया …… यह बिहार पुलिस का निहायत ही कायराना घटिया अपराध है जिसे भगवान कभी भी क्षमा नही करेंगे… भरत तिवारी कोई अपराधी नही था वह एक राष्ट्रवादी संवेदनशील भावुक युवा था…मोदी -योगी के गीत गाता था लेकिन उसे क्या पता कि ‘ नेता सिर्फ नेता होता है ‘ ,…..

मेरा देश के युवाओ से अपील है कि एक बार भरत तिवारी को पढ़ने की कोशिश करना…अत्यंत सामान्य परिवार का युवा एक ऐसे देश मे जीवन जी रहा था जहाँ जीवन के मुद्दे जाति आरक्षण बनाये गए है , देश का पढ़ा लिखा प्रोफेसर ,डॉक्टर इंजीनियर और नेता जाति आरक्षण को मुद्दा बनाता हो वहाँ भरत तिवारी गरीबो के जीवन जीने की लड़ाई लड़ रहा था…

मैं भरत तिवारी को मानसिक विक्षिप्त नही मानता मैं उसे बलिदानी मानता हूं …. अगर भरत तिवारी बलिदानी नही है तो फिर चंद्रशेखर आज़ाद ,भगतसिंह असफाक , बिस्मिल भी बलिदानी नही है…

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