मामाजी माणिकचन्द्र वाजपेयी: पत्रकारिता की आत्मा और राष्ट्रधर्म के अग्रदूत

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नैवेद्य पुरोहित

भोपाल । मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी की 106वीं जन्म जयंती के अवसर पर विश्व संवाद केन्द्र भोपाल में “मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी स्मृति व्याख्यान” का आयोजन हुआ। यह आयोजन ध्येयनिष्ठ पत्रकारिता के उस युगपुरुष को नमन करने का अवसर बना, जिन्होंने पत्रकारिता को राष्ट्रधर्म के रूप में जिया। कार्यक्रम की शुरुआत महर्षि वाल्मीकि के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करके हुई। प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी विश्व संवाद केन्द्र की स्मारिका का विमोचन किया गया, जिसका विषय था: “कन्वर्जन का खेल: निशाने पर जनजातीय”।

पत्रकारिता की आत्मा राष्ट्रहित में निहित – गिरीश जोशी

मुख्य वक्ता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के सहायक कुलसचिव गिरीश जोशी ने कहा कि मामाजी की पत्रकारिता का एक ही लक्ष्य था राष्ट्रहित। उन्होंने कहा, “पत्रकारिता का माध्यम बदल सकता है, क्लेवर बदल सकता है, पर उसकी आत्मा नहीं बदलती।” उन्होंने गीता के श्लोक “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि…” का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रकार आत्मा अमर है, उसी प्रकार पत्रकारिता की आत्मा कभी नहीं बदली। भारत में पत्रकारिता की आत्मा को गढ़ने वाले कुछ महर्षियों में मामाजी का नाम सर्वोपरि है। आज हम उनका स्मरण क्यों कर रहे है आखिर क्या था इस व्यक्ति में हम पाएंगे वो जो मूल्य थे उनमें पत्रकारिता के मूल्य थे और पत्रकारिता के अलावा मानवीय मूल्य थे। उन्होंने कुछ अंश जो मामाजी ने लिखे थे वो सुनाए। एक अंश पढ़ा उन्होंने जो आपातकाल के पहले लिखा था। “एक होती है बुद्धि एक है विवेक और फिर है प्रज्ञा जो ध्येय के साथ एकाकार हो जाते है। मामाजी की प्रज्ञा क्या होगी उन्होंने पूर्वाभास जता दिया था कि आपातकाल लग सकता है, अपनी ध्येय से इतना एकाकार हो जाना की प्रज्ञा जागृत हो जाए। प्रज्ञा जागृत हो जाने के बाद आपको भविष्य में जो घटनाएं होने वाली है वो दिख जाती है। उस कालखंड में उनकी कलम की धार देखिए। वह डगमगाई नहीं। उन्हें पढ़ने के बाद पाठक वैचारिक रूप से समृद्ध होता था। आज भी बहुत प्रेरक है।”

मेरी आत्मा पर मामाजी के छींटे पड़े – गिरीश उपाध्याय

स्वदेश के सलाहकार संपादक गिरीश उपाध्याय ने अपने बेहद मार्मिक संस्मरण साझा किए। उन्होंने कहा, “हीरे से पूछिएगा कि जौहरी का क्या महत्व है तो वह क्या बोलेगा। मैं आज जो भी कुछ हूं जहां भी हूं जिस भी स्थिति में हूं उसका संपूर्ण श्रेय मामाजी को है।” जब उन्हें नौकरी की तलाश थी वे राजेन्द्र शर्मा के पास गए उस समय स्वदेश भोपाल से शुरू होने वाला था। राजेन्द्र जी ने इंदौर में मामाजी के पास भेज दिया काम सीखने के लिए। इंदौर में रामबाग स्थित स्वदेश कार्यालय जब वे गए तब स्वदेश का दफ्तर एक आंगन जैसा था, “मामाजी का व्यक्तित्व एक सख्त लौहार जैसा था। मामाजी की मूछें उनके होठों को ढंक लेती थी, उनकी आवाज़ जो थी वो मूंछों के बाल में से छन के आती थी।”
अपनी प्रथम रिपोर्टिंग से जुड़े संस्मरण सुनाते हुए गिरीश जी कहते है, “मामाजी ने रिपोर्टिंग के लिए मुझे इंदौर के सबसे बड़े सांस्कृतिक आयोजन का कवरेज के लिए भेजा वो था अनंत चतुर्दशी की झांकी का कवरेज। उन्होंने मुझे न कोई पोलिटिकल काम सौंपा, न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस में भेजा उन्होंने मुझे पहला काम सौंपा नगर को जानने का। उनका कहना था नगर की संस्कृति को जानो, उसके परिवेश को जानो, उसके जनमानस को जानो, उसके उल्लास को जानो। ये जो स्टेप बाय स्टेप पत्रकार को गढ़ने का काम है। वो उन्होंने किया।”
आखिर में उन्होंने कहा, “मैं धन्य हुआ कि मेरी आत्मा पर मामाजी के छींटे पड़े। मामाजी ने अपने कर्म से अपने धर्म से अपने आचरण से अपने चरित्र से उन्होंने मुझे स्वयंसेवक बनाया। हमको संस्कार देने के लिए किसी को बाध्य करने की आडंबर करने की कोई जरूरत नहीं होती हम वो उदाहरण प्रस्तुत करते है। संपादक की सहजता और सरलता उनसे सीखी जा सकती है। मैं मामाजी से वो 50 रूपए की उधारी लेकर भोपाल आया।”

मामाजी जैसे संपादकों की हम सिर्फ आज कल्पना कर सकते है – लाजपत आहूजा

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्व संवाद केन्द्र के अध्यक्ष लाजपत आहूजा ने की। उन्होंने कहा, “मामाजी भिंड में एक निजी महाविद्यालय चलाते थे। एक सज्जन को उनके पास भेजा गया। मामाजी ने उनसे कहा तैरना जानते हो, वो अचकचा गए उन्होंने मना किया कि तैरना तो नहीं जानते। फिर बाद में उन्होंने बताया कि महाविद्यालय तक पहुंचने के लिए बीच में नदी पड़ती। पढ़ाओगे तो तब जब वहां पहुंचोगे।बाद में वो दोनों ही लोग स्वदेश के प्रधान संपादक बने एक तो मामाजी थे और दूसरे कृष्ण कुमार अष्ठाना जी।” मामाजी एक जमीनी आदमी थे। जमीनी आदमी पहले जमीनी हकीकत जानना चाहता है। एक शिक्षक से वो पत्रकार बने। मामाजी की गोदी में बैठकर उनकी मूंछों से खेलने वाले भी आज संपादक बन गए है। उन्होंने जो शब्द लिखे वो शब्द जिए है कोई ऐसा संपादक? एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि, “मध्यप्रदेश में एक समय श्रममंत्री हुआ करते थे गंगाराम तिवारी जो एक सेक्स स्कैंडल में फंस गए थे। उनके सारे फोटोग्राफ्स स्वदेश के पास आ गए थे। लेकिन मामाजी ने कहा हमारा पत्र पारिवारिक पत्र है हम संस्कार क्या देंगे। उन्होंने वो सभी चित्र छापने से इनकार कर दिया। मामाजी ने पत्रकारिता के नैतिक मापदंड हमेशा साथ रखें। किसी भी अखबार के लिए उस समय चित्रों का बड़ा महत्व था। ऐसे निष्प्रय संपादकों की सिर्फ आज हम कल्पना कर सकते है।”

कार्यक्रम का संचालन सुश्री अदिति ने किया और आभार विश्व संवाद केन्द्र भोपाल के सचिव लोकेंद्र सिंह ने माना। आज के दौर में जब पत्रकारिता अपनी दिशा खोज रही है, तब मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी के मूल्य ही उसे सही मार्ग दिखा सकते हैं। उनकी पत्रकारिता केवल शब्द नहीं एक साधना थी और उनका जीवन राष्ट्रहित के लिए समर्पित था।

बिहार का चुनाव: सियासी दंगल या लोकतंत्र की अग्नि परीक्षा?

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नवंबर 6 और 11, 2025 को होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव, और 14 नवंबर को आने वाले नतीजे, इस बार सिर्फ़ एक राजनीतिक मुक़ाबला नहीं बल्कि लोकतंत्र की एक बड़ी परीक्षा माने जा रहे हैं। 243 सीटों पर वोटिंग होगी और 7.42 करोड़ से ज़्यादा मतदाता, जिनमें 14 लाख नए वोटर्स शामिल हैं, तय करेंगे कि बिहार की गद्दी पर कौन बैठेगा — नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला एनडीए या तेजस्वी यादव का इंडिया गठबंधन।

फिलहाल हवा एनडीए के पक्ष में बहती दिखाई दे रही है। जेडीयू और भाजपा का गठबंधन, पिछले लोकसभा चुनावों की तरह, इस बार भी संगठित और आत्मविश्वास से भरा है। NewsX और ABP सर्वे के मुताबिक़ एनडीए को 150-160 सीटों तक मिलने की संभावना है, जबकि बहुमत के लिए 122 सीटें काफ़ी हैं। भाजपा को इस बार “सिंगल लार्जेस्ट पार्टी” बनने का भरोसा है, क्योंकि उसने 2024 में बिहार की 40 में से 30 लोकसभा सीटें जीती थीं।

नीतीश कुमार अब भी बिहार के “सुशासन बाबू” कहलाते हैं। 20 साल से ज़्यादा सत्ता में रहने के बावजूद उनकी छवि एक व्यावहारिक और स्थिर नेता की बनी हुई है। उन्होंने कानून-व्यवस्था में सुधार, सड़कों का जाल और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दों पर काम किया है। भाजपा के केंद्रीय नेताओं — ख़ासकर अमित शाह — ने मोदी सरकार की योजनाओं को “गेम चेंजर” बताया है, जैसे महिलाओं को ₹10,000 वार्षिक सहायता और युवाओं के लिए कौशल विकास कार्यक्रम।

दूसरी तरफ़ इंडिया गठबंधन (RJD + कांग्रेस + वाम दल) की लड़ाई कठिन नज़र आ रही है। तेजस्वी यादव बेरोज़गारी, शिक्षा और “हर बिहारी को बदलाव” जैसे नारों के साथ मैदान में हैं। युवाओं में उनका असर दिखता है — ख़ासकर शहरी मतदाताओं और प्रथम बार वोट देने वालों में। मगर गठबंधन की सबसे बड़ी मुश्किल है एकता की कमी। तेज प्रताप यादव के अलग दल “जनशक्ति जनता दल” ने कुछ हद तक यादव वोटों में सेंध लगाने का खतरा पैदा किया है।

इसी बीच, प्रशांत किशोर की पार्टी “जन सुराज” भी इस चुनाव में तीसरे मोर्चे के रूप में उतर रही है। उसका वोट प्रतिशत भले ही कम (1-2%) दिख रहा हो, लेकिन यह विपक्षी वोटों में कटाव ला सकता है। किशोर का फोकस भ्रष्टाचार के खिलाफ़ और विकास-केंद्रित राजनीति पर है, जिससे वे नौजवान वर्ग को आकर्षित कर रहे हैं।

पब्लिक कॉमेंटेटर प्रोफेसर पारस नाथ चौधरी कहते हैं कि विपक्ष ने इस बार इलेक्शन कमीशन को कटघरे में खड़ा करने की नाकामयाब कोशिश की।
“इस चुनाव की सबसे बड़ी बहस चुनाव आयोग (ECI) की “विशेष मतदाता सूची संशोधन” (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को लेकर है। चुनाव आयोग का कहना है कि यह “डेटा साफ़ करने” का प्रयास था, जिसमें डुप्लीकेट नाम हटाए गए। मगर आधार लिंकिंग से जुड़ी अनियमितताओं ने विवाद बढ़ा दिया है। हालाँकि आयोग ने पारदर्शिता के लिए 100% वेबकास्टिंग, नई डिज़ाइन की EVMs और विशेष पर्यवेक्षक की नियुक्ति जैसी व्यवस्थाएँ की हैं, फिर भी मतदाताओं के बीच अविश्वास बना हुआ है।”

बिहार के समाज ज्ञानी टीपी श्रीवास्तव के मुताबित इस चुनाव में सबसे दिलचस्प और निर्णायक भूमिका युवा मतदाताओं की है — जिनकी संख्या करीब 1.4 करोड़ है। ये जाति समीकरणों से हटकर नौकरी, शिक्षा और अवसर की बात कर रहे हैं। युवा अब विकास की ज़मीन पर वोट दे रहे हैं, न कि केवल नारेबाज़ी पर। चिराग पासवान, और कई वोट कटवा गैंग्स की क्या भूमिका रहेगी, अभी क्लियर नहीं है।

विश्लेषक बता रहे हैं, बिहार में डिजिटल प्रचार का नया दौर शुरू हुआ है — इंस्टाग्राम रील्स से लेकर व्हाट्सऐप कैंपेन तक। युवा नेता सोशल मीडिया पर ज़्यादा सक्रिय हैं, और गाँव-गाँव “पन्ना प्रमुख” और “युवा संवाद” कार्यक्रमों से बूथ स्तर पर जुड़ाव बनाया जा रहा है।

अगर एनडीए दोबारा सत्ता में आता है, तो यह न केवल नीतीश कुमार के लिए “स्वान सांग” (आख़िरी कार्यकाल) होगा बल्कि भाजपा के लिए बिहार की पकड़ और मज़बूत करने का मौका भी। वहीं इंडिया गठबंधन की हार से विपक्षी राजनीति में नया फेरबदल हो सकता है, और तेजस्वी यादव की लीडरशिप पर सवाल उठेंगे।

बिहार का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का खेल नहीं है, बल्कि यह देखना है कि लोकतंत्र कितना परिपक्व हो चुका है। यहाँ हर वोट मायने रखता है — हर नाम का हटना या जुड़ना, हर बूथ की गिनती, और हर उम्मीदवार का वादा। यह चुनाव तय करेगा कि बिहार “स्थिरता” चाहता है या “बदलाव”।

सोशल मीडिया पर भारत का डिजिटल ज्वार: युवाओं का मनोरंजन, बुजुर्गों का समाचार

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नई दिल्ली: भारत का सोशल मीडिया परिदृश्य एक जीवंत मंच बन चुका है, जहां 70 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ता प्रतिदिन घंटों बिताते हैं। हालिया आंकड़ों के अनुसार, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सएप जैसे प्लेटफॉर्म्स पर सबसे अधिक पढ़ा और साझा किया जा रहा कंटेंट मनोरंजन, समाचार और शिक्षा का मिश्रण है। मेल्टवाटर की 2025 रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं में 55.4 प्रतिशत संगीत वीडियो, 44.1 प्रतिशत कॉमेडी/मेम/वायरल क्लिप्स और 37.2 प्रतिशत एजुकेशनल वीडियो सबसे लोकप्रिय हैं। लेकिन उम्र के आधार पर यह वर्गीकरण और स्पष्ट हो जाता है—युवा पीढ़ी हंसने-हंसाने वाली रील्स में डूबी हुई है, जबकि वरिष्ठ नागरिक समाचार और राजनीति पर नजर रखे हैं।

18-24 वर्ष की युवा पीढ़ी, जो सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं का 60 प्रतिशत हिस्सा है, का झुकाव शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट की ओर है। इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स पर बॉलीवुड गॉसिप, क्रिकेट अपडेट्स और वायरल चैलेंजेस छाए रहते हैं। ग्लोबल स्टैटिस्टिक्स 2025 के अनुसार, क्रिकेट और बॉलीवुड टॉपिक्स सबसे ज्यादा सर्च किए जाते हैं—जैसे एशिया कप मैचों पर ट्रेंडिंग पोस्ट्स ने करोड़ों व्यूज हासिल किए। एक हालिया एआई एनालिसिस में पाया गया कि राहुल गांधी जैसे नेताओं के वीडियो युवाओं में 72 प्रतिशत पॉपुलरिटी हासिल कर रहे हैं, जबकि नरेंद्र मोदी के पोस्ट्स पर 58 प्रतिशत सपोर्ट मिला। टिकटॉक पर भारत-संबंधित वीडियो ने अगस्त में 7.2 बिलियन व्यूज रिकॉर्ड किए, जिनमें से अधिकांश मनोरंजन और सांस्कृतिक क्लिप्स थे। यह पीढ़ी न केवल कंज्यूम करती है, बल्कि क्रिएट भी करती है—रामायण-महाभारत की रीटेलिंग्स और क्षेत्रीय स्टोरीज जैसे ‘कांतारा’ स्टाइल कंटेंट वायरल हो रहे हैं।

दूसरी ओर, 35 वर्ष से ऊपर के उपयोगकर्ता—जो 32 प्रतिशत सोशल मीडिया यूजर्स हैं—समाचार और राजनीति पर फोकस्ड हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि 41.9 प्रतिशत लोग दोस्त-रिश्तेदारों से जुड़ने के लिए प्लेटफॉर्म्स यूज करते हैं, लेकिन दूसरा बड़ा कारण (32 प्रतिशत) न्यूज स्टोरीज पढ़ना है। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर राजनीतिक बहसें, जैसे जम्मू-कश्मीर या विदेशी फंडिंग पर पोस्ट्स, बुजुर्गों में सबसे ज्यादा शेयर होते हैं। हूटसूट की 2025 ट्रेंड रिपोर्ट में उल्लेख है कि एआई-ड्रिवन पर्सनलाइज्ड न्यूज फीड्स इस ग्रुप को आकर्षित कर रही हैं, जहां सोशल कॉमर्स और हेल्थ टिप्स भी उभर रहे हैं।

यह डिजिटल विभाजन भारत की विविधता को दर्शाता है। युवा एंटरटेनमेंट से तरोताजा होते हैं, जो मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है, जबकि वरिष्ठ समाचार से जागरूक रहते हैं। लेकिन चुनौतियां भी हैं—फेक न्यूज और एडिक्शन। विशेषज्ञों का कहना है कि एजुकेशनल कंटेंट को बढ़ावा देकर इस बैलेंस को साधा जा सकता है। जैसे, यूट्यूब पर लॉन्ग-फॉर्म एजुकेशनल वीडियो अब 3 मिनट तक के हो गए हैं, जो दोनों ग्रुप्स को जोड़ सकते हैं। कुल मिलाकर, सोशल मीडिया भारत का आईना है—जहां हंसी, बहस और सीख एक साथ ट्रेंड कर रही है।

संघ शताब्दी वर्ष – एक स्वर्णिम सौभाग्य

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डाक्टर हेडगेवार जी ने वर्ष 1925 विजयादशमी के पावन अवसर पर जिस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का शुभारंभ किया गया था आज वह अपने शताब्दी वर्ष का उत्सव मना रहा है। संघ की यात्रा कई अवरोधों का सामना करते हुए कठिन संघर्ष, समाज की सतत सेवा तथा मातृ भूमि के प्रति सम्पूर्ण समर्पण के साथ इस पड़ाव पर पहुंची है। अनेकानेक स्वयंसेवकों के, “इदं राष्ट्राय इदं न मम” के भाव के साथ नि:स्वार्थ जीवन खपाने से ही संघ शतायु होकर 101 वें वर्ष में प्रविष्ट हुआ है। संघ ऐसे लाखों स्वयंसेवकों वाला वटवृक्ष है जो अपना निजी जीवन त्याग कर समाज व राष्ट्र की सेवा में अपने आपको समर्पित कर देते हैं। संघ के शताब्दी वर्ष उत्सवों के आरम्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संघ की विकास गाथा का स्मरण करते हुए एक 100 रुपए का सिक्का तथा एक डाक टिकट जारी किया। इस सिक्के पर भारत माता और स्वयंसेवकों का चित्रण है।

सामान्यतः जब कोई संगठन अथवा संस्था 100 वर्ष पूर्ण करती है तो वह भव्य आयोजनों के माध्यम से अपनी प्रशस्ति गाथा गाती है किंतु राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ ने ऐसा बड़ा आयोजन न करने का निर्ण्रय लिया और छोटे- छोटे कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के प्रत्येक क्षेत्र व हिन्दू समाज के प्रत्येक घर तक पहुंचने का संकल्प लिया। इस हेतु सामाजिक सद्भाव बैठकों का आयोजन, व्यापक गृह संपर्क अभियान, हिंदू सम्मेलन, प्रबुद्धजन गोष्ठी व युवा केंद्रित कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा और इनके माध्यम से संघ के विचारों का विस्तार किया जाएगा। शताब्दी वर्ष में इन कार्यक्रमों के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के भाव एक नया प्रवाह दृष्टिगोचर होगा।

संघ की स्थापना अत्यंत कठिन समय में हुई थी जब एक ओर देश अंग्रेजों से लड़ रहा था और दूसरी ओर हिंदू समाज लम्बे समय से भिन्न भिन्न प्रकार से अपनी संस्कृति, संस्कार, ज्ञान, जीवन पद्धति पर हुए आक्रमणों के कारन अपना आत्मबोध खो चुका था, उसका आत्मबल कुंठित था। राष्ट्रीयत्व की दीक्षा देने के लिए हेडगेवार जी ने संघ की स्थापना की। हिन्दू समाज को संगठित करने, उनका स्वाभिमान जगाने के उद्देश्य से संघ की स्थापना की गई। संघ ने अपनी यात्रा में कई उतार चढ़ाव देखे। बार-बार प्रतिबन्ध लगे और आवश्यकता होने पर बार-बार देश सेवा के लिए बुलाया भी संघ को ही गया ।

परम पूजनीय डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी के बाद प.पू.माधव सदाशिव गोलवलकर (श्री गुरु जी), प.पू.बालासाहेब देवरस, प.पू.राजेंद्र सिंह ( रज्जू भैय्या), प.पू.के. एस. सुदर्शन जी और अब वर्तमान समय में प.पू.डॉक्टर मोहन भागवत जी के नेतृत्व में संघ एक सदानीरा नदी की भांति आगे बढ़ता हुआ हिन्दू समाज का भाव सिंचन कर रहा है। संघ के सभी सर संघचालकों ने संघ को नया आयाम व विचार दिया है जिसके कारण आज संघ भारत के घर -घर तक पहुँच गया है । संघ के सभी संघचालक अत्यंत योग्य व विद्वान महापुरुष थे जिनके मार्ग दर्शन में संघ ने राष्ट्र व समाज में व्यापक सकारात्मक बदलाव लाने के प्रयास किए । व्यक्ति निर्माण से आरम्भ हुआ यह कार्य शताब्दी वर्ष मे पंच परिवर्तन का महाअभियान हाथ में लेकर आगे बढ़ रहा है।

श्री गुरु जी का कार्यकाल संघ के लिए अत्यंत विषम रहा था किंतु वह कभी भी विचलित नहीं हुए और उन्होंने संघ कार्य जारी रखा। उनके ही कार्यकाल में स्वयंसेवकों ने समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में हिन्दुत्व का विचार पहुंचाने के लिए अनेक संगठनों की स्थापना की। बालासाहब देवरस अत्यंत कर्मठ थे। वह बहुत ही क्रांतिकारी व खुले विचारों वाले थे। बालासाहब छुआछूत, जातिभेद, खान-पान में विभिन्न प्रकार के बंधनों एवं रूढ़ियों के घोर विरोधी थे। सामाजिक समानता और समरसता से जुड़े सार्वजानिक कार्यक्रम बालासाहब के कार्यकाल से आरम्भ हुए। रज्जू भैय्या तथा सुदर्शन जी दोनों के कार्यकाल में संघ का व्यापक विस्तार हुआ और नये स्वयंसेवक जुड़ने के साथ साथ नये आयाम भी जुड़े।

शताब्दी वर्ष में लिए गए पंच परिवर्तन संकल्प सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी, पर्यावरण संरक्षण व नागरिक कर्तव्य हैं। इन संकल्पों को व्यवहार में लाने से समाज में व्यापक परिवर्तन आएगा। संघ का यह वर्ष त्याग, तप और राष्ट्र आराधन के साथ ही उसकी स्वर्णिम विरासत का वर्ष है।

आज समाज जीवन का कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है जहां संघ का कोई न कोई स्वयंसेवक कार्य न कर रहा हो । संघ का स्वयंसेवक जहां पर भी होता है उसका एक ही मूल मंत्र होता है और वह है -राष्ट्रप्रथम का का मूलमंत्र। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली वर्तमान सरकार भी राष्ट्र प्रथम की भावना से ही कार्य करती है । वर्तमान समय में जब पूरे विश्व में राजनैतिक व आर्थिक स्तर पर उथल पुथल मची हुई है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भरता व स्वदेशी का मूल मंत्र दिया है जो संघ का ही मूल मंत्र है। इसका उत्तर स्वदेशी और आत्मनिर्भरता ही है।

संघ शाखाओं के माध्यम से व्यक्ति निर्माण एक सतत प्रक्रिया है। संघ के कारण ही आज हिन्दू समाज अपने आप को हिन्दू कहने में गर्व का अनुभव कर रहा है।संघ के ही कारण हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान की गूंज चारों ओर सुनाई दे रही है।संघ के कारण ही आज गोपालन की अवधारणा मजबूत हुई है। संघ के कारण हिंदू समाज का मतांतरण कम हुआ है और नई जागृति आई है। संघ की शाखाओं में गाए जाने वाले गीत प्रेरक व व नई उमंग भरने वाले होते हैं। संघ की प्रार्थना भारत माता को समर्पित है।

संघ का एक ही ध्येय है – परम वैभवं नेतुत्मेतत स्वराष्ट्रं …….

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